प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस महीने संभावित इसराइल-यात्रा से पहले, पिछले शनिवार को अरब विदेश मंत्रियों के साथ दूसरी बैठक की मेजबानी करके भारत ने स्पष्ट कर दिया कि पश्चिम एशिया में हमारी गहरी दिलचस्पी है और इस इलाके के आर्थिक-विकास में हम भी भागीदार हैं.
केवल इस इलाके की बात ही नहीं है, बल्कि
विश्व-राजनीति में भी भारत की सक्रिय भूमिका बढ़ने जा रही है. यूके, ईयू और
अमेरिका के साथ व्यापार और दीर्घकालीन नीतिगत समझौते होने के बाद यह स्पष्ट होता
है कि भारत की अर्थव्यवस्था पश्चिमी देशों के साथ ज्यादा बड़े स्तर पर
जुड़ने जा रहा है.
बेहतर तरीके से वैश्विक-संतुलन बनाने में भारत
भी महत्त्वपूर्ण
किरदार निभाएगा. अरब विदेशमंत्रियों की बैठक की पृष्ठभूमि में डॉनल्ड ट्रंप के
‘बोर्ड ऑफ पीस’ के गठन और उसमें शामिल होने के लिए भारत को प्राप्त
आमंत्रण और उसपर चुप्पी पर भी ध्यान देना होगा. अकसर लोगों को लगता है कि भारत ने
प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. पश्चिम एशिया की जटिलता को देखते हुए तीखी
प्रतिक्रियाएँ संभव नहीं है. संज़ीदा डिप्लोमेसी से ऐसी उम्मीद करनी भी नहीं
चाहिए.
ध्यान दें कि गज़ा क्षेत्र के पुनर्निर्माण में भारत के लोगों और कंपनियों को भी काम मिलेगा. दूसरी तरफ ईरान में चल रहे आंदोलन और उसे लेकर अमेरिकी धमकियों पर भी हमें निगाहें रखनी होंगी. विदेश-नीति केवल नैतिक-आधारों पर नहीं चलती हैं. वे राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है. पश्चिम एशिया की डगर आसान नहीं है, क्योंकि वहाँ हर कदम पर जोखिम हैं, फिर भी भारतीय डिप्लोमेसी वहाँ संतुलित और शालीन तरीके से आगे बढ़ रही है.


















