पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई की स्थिति को समझने के लिए ज्यादातर लोग मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर हैं। इंटरनेट के आगमन के बाद से मीडिया के स्वरूप में भारी बदलाव आया है।
युद्ध की कवरेज आसान नहीं होती। इसके दो कारण
हैं। एक तरफ मौत का खतरा और दूसरी तरफ सरकारों की बंदिशें। इस कवरेज में
पारदर्शिता नहीं होती। कोई देश पत्रकारों को छूट नहीं देता।
अलबत्ता मीडिया की टेक्नोलॉजी में बदलाव आने से
सूचनाओं की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ी है। पर सब सही तथ्य नहीं होते। अफवाहें और
प्रचार भी खबरों के लिफाफे में लपेट कर पेश किए जाते हैं। इस समय ऐसा ही हो रहा
है।
1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की टाइम
पत्रिका ने वर्ष के व्यक्ति (मैन ऑफ द इयर) के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज टेड
टर्नर को नामित किया, जिनके केबल न्यूज नेटवर्क (सीएनएन) ने युद्ध की लाइव कवरेज
करके मीडिया-कवरेज के एक नए आयाम का उद्घाटन किया था।
उसके बाद से समाचार की परिभाषा ‘किसी घटना के घटित हुआ था या उसकी विलंबित सूचना से बदलकर, जैसा घटित हो
रहा है, हो गई।’ टाइम पत्रिका ने लिखा, ‘घटनाओं की गतिशीलता
को प्रभावित करने और 150 देशों के दर्शकों को इतिहास का तात्कालिक गवाह बनाने के
लिए, रॉबर्ट एडवर्ड टर्नर को 1991 के लिए टाइम पत्रिका का 'मैन ऑफ द ईयर' चुना गया है।’
समाचार मीडिया के रूप में टेलीविजन के उदय ने
पत्रकारों के एक ताकतवर तबके का उदय भी किया। सीएनएन के लैरी किंग का टॉक शो
अमेरिकी राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण शो बन गया और लैरी किंग को ‘किंग ऑफ किंग्स’ कहा गया।
एम्बैडेड
पत्रकारिता
1991 की लड़ाई
के बाद 2003 में पत्रकारिता की एक नई विधा का जन्म हुआ, जिसे एम्बैडेड पत्रकारिता
(Embedded Journalism) नाम दिया गया। उस दौरान कुछ पत्रकारों
ने युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान सीधे मिलिट्री यूनिट के साथ रहते हुए रिपोर्टिंग
की।
बेशक उस कवरेज
में बहुत सी जानकारियाँ विश्वसनीय होती थीं, पर बहुत से वे बातें, जिन्हें सेना
छिपाना चाहती थीं, छिपा ली जाती थीं।
सूचनाओं की
रिपोर्टिंग के साथ पत्रकारिता की साख जुड़ी है। आज के सोशल मीडिया-युग में इस साख
को बनाए रखने के सवाल भी उभर कर सामने आ रहे हैं। ये सवाल पश्चिम एशिया में चल रही
लड़ाई के सिलसिले में भी उठे हैं।
इस बीच मैंने सामग्री की तलाश की तो तीन जानकारियाँ मुझे मिलीं, जिन्हें मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। इनके पहले इसराइली व्यवस्था के आलोचक माने जाने वाले मीडिया हाउस हारेट्ज़ की एक रिपोर्ट साथ ही टाइम्स ऑफ इसराइल में प्रकाशित एक रिपोर्ट को भी पढ़ें। इस पूरे विवरण में मैंने भारतीय मीडिया को शामिल नहीं किया है। उसके लिए अलग से लिखना होगा।


















