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Monday, June 10, 2019

संवेदना-शून्य समाज में एक बच्ची की हत्या


यह हत्या हमारे समाज के मुँह पर तमाचा है. आश्चर्य इस बात पर है कि अलीगढ़ ज़िले के टप्पल तहसील क्षेत्र में ढाई साल की बच्ची के अपहरण और बेहद क्रूर तरीके से की गई हत्या को लेकर जिस किस्म का रोष देश भर में होना चाहिए था, वह गायब है. कहाँ गईं हमारी संवेदनाएं? पिछले साल जम्मू-कश्मीर के कठुआ क्षेत्र में हुई इसी किस्म की एक हत्या के बाद देश भर में जैसी प्रतिक्रिया हुई थी, उसका दशमांश भी इसबार देखने में नहीं आया. बेशक वह घटना भी इतनी ही निन्दनीय थी. फर्क केवल इतना था कि उस मामले को उठाने वाले लोग इसके राजनीतिक पहलू को लेकर ज्यादा संवेदनशील थे. इस मामले में वह संवेदनशीलता अनुपस्थित है. यानी कि हमारी संवेदनाएं राजनीति से निर्धारित होती हैं.
अलीगढ़ पुलिस के मुताबिक, 'पोस्टमार्टम से लगता है कि बच्ची का रेप नहीं हुआ है. बच्ची के परिवार ने आरोप लगाया था कि उसकी आँख निकाली गई थी, पर ऐसा नहीं हुआ. लेकिन उसका शरीर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुआ है.' इसे लेकर मीडिया में कई तरह की बातें उछली हैं. खासतौर से सोशल मीडिया में अफवाहों की बाढ़ है. पर यह भी सच है कि सोशल मीडिया के कारण ही सरकार और प्रशासन ने इस तरफ ध्यान दिया है. पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए सोशल मीडिया की अफवाहों को शांत किया है, पर अपराध के पीछे के कारणों पर रोशनी नहीं डाली जा सकी है.

Thursday, May 30, 2019

नई सरकार के सामने चुनौतियाँ कम, उम्मीदें ज्यादा

नरेन्द्र मोदी की नई सरकार के सामने कई मायनों में पिछले कार्यकाल के मुकाबले चुनौतियाँ कम हैं, पर उससे उम्मीदें कहीं ज्यादा हैं. राजनीतिक नजरिए से सरकार ने जो जीत हासिल की है, उसके कारण उसके विरोधी फिलहाल न केवल कमजोर पड़ेंगे, बल्कि उनमें बिखराव की प्रक्रिया शुरू होगी. कई राज्यों में विरोधी राजनीति, खासतौर से कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं. दूसरी तरफ उसे जनता ने जो भारी समर्थन दिया है, उसके कारण उसपर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ गया है.

अगले कुछ महीनों में महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और दिल्ली विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं. इन सभी राज्यों में बीजेपी और गठबंधन एनडीए की स्थिति बेहतर है. जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इन चुनावों का शेष देश की राजनीति के लिहाज से महत्व है. वहाँ घाटी और जम्मू क्षेत्र की राजनीति के अलग रंग हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं.

नई सरकार के राजनीतिक-आर्थिक कदमों का पता अगले हफ्ते के बाद लगेगा, जब मंत्रालयों की स्थिति स्पष्ट हो चुकी होगी, पर विदेश-नीति के मोर्चे को संकेत शपथ-ग्रहण के पहले से ही मिलने लगे हैं. मोदी सरकार की वापसी में सबसे बड़ी भूमिका राष्ट्रवाद की है. पुलवामा कांड ने नागरिकों के काफी बड़े वर्ग को नाराज कर दिया है. नई सरकार के शपथ-ग्रहण के साथ ही यह बात स्पष्ट हो रही है कि मोदी सरकार, पाकिस्तान के साथ रिश्तों को लेकर बेहद संजीदा है.

शपथ-ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को निमंत्रण न देकर भारत ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि वह इसबार उसका रुख कठोर है. लगता है कि भारत का रुख अब आक्रामक रहेगा. सब सामान्य रहा, तो 13-14 जून को दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में होगी. उसके आगे की राह शायद वहाँ से तय होगी.

भारत की दिलचस्पी चीन के साथ बातचीत को आगे बढ़ाने की जरूर है. सरकार बनने के पहले ही खबरें हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ वाराणसी में वैसा हा एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित करने का फैसला किया है, जैसा पिछले साल चीन के वुहान में हुआ था. अमेरिका और चीन के रिश्तों में तेजी से आते बदलाव के संदर्भ में इस मुलाकात का बड़ा महत्व है.

Friday, May 24, 2019

बीजेपी के ज़मीनी आधार का विस्तार


इन चुनाव-परिणामों में दो बातें साफ नजर आती हैं. भारतीय जनता पार्टी अपने नजरिए को जनता के सामने न केवल रखने में, बल्कि उसका अनुमोदन पाने में सफल हुई है. दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी इसका काउंटर-नैरेटिव तैयार करने में बुरी तरह विफल हुई है. कांग्रेस जिसे हिन्दू-राष्ट्रवाद और भावनाओं की खेती बता रही थी, उसे जनता ने महत्वपूर्ण माना. वह कांग्रेस की बातें सुनने के लिए वह तैयार ही नहीं है. यह कांग्रेसी साख की पराजय है. कांग्रेस ने गरीबों और किसानों की बातें कीं, पर गरीबों और किसानों ने भी उसकी नहीं सुनी. यह बात सीटों से ही नहीं वोट प्रतिशत से भी जाहिर है.
हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अंतिम वोट प्रतिशत की जानकारी नहीं हो पाई थी, क्योंकि पूरे देश के परिणाम नहीं आए हैं, पर इतना तय है कि बीजेपी को पिछली बार के 31 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं. यह प्रतिशत 40 फीसदी के आसपास तक पहुँच सकता है. बीजेपी की सीटें तो बढ़ी ही हैं, सामाजिक आधार भी बढ़ा है. इसमें बड़ी भूमिका बंगाल और ओडिशा के वोटर की भी है. बंगाल में बीजेपी ने पिछली बार के 17 फीसदी के वोटों को बढ़ाकर करीब 35 फीसदी कर लिया है. वहीं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वोटों में 20 फीसदी की गिरावट आई है. तृणमूल कांग्रेस के भी वोट बढ़े हैं, पर सीटें घटी हैं. इसकी वजह है वाममोर्चे और कांग्रेस का पराभव. उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सपा-बसपा की सोशल इंजीनियरी को धो दिया है. विरोधी दलों की उम्मीदें उत्तर प्रदेश पर टिकी थीं, पर इस प्रदेश में करीब 50 फीसदी के आसपास वोट बीजेपी को मिले हैं. क्या यह हैरत की बात नहीं है?

Monday, May 20, 2019

परिणाम आने से पहले की पहेलियाँ

चुनाव का आखिरी दौर पूरा होने और चुनाव परिणाम आने के बीच कुछ समय है. इस दौरान एक्ज़िट पोल की शक्ल में पहले अनुमान सामने आए हैं, पर कांग्रेस, ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं ने इसे गप्पबाजी बताया है. बहरहाल हमें 23 का इंतजार करना होगा. इस दौरान तीन मुख्य सवाल विश्लेषकों से लेकर सामान्य व्यक्ति के मन में अभी हैं. पहला सवाल है कि परिणाम क्या होंगे? सरकार किसकी बनेगी? यह सवाल पहले सवाल का ही पुछल्ला है. इसके बाद का सवाल है कि आने वाली सरकार की चुनौतियाँ और वरीयताएं क्या होंगी? खबर है कि लम्बे अरसे से खाद्य सामग्री की कीमतों में जो ठहराव था, वह खत्म होने वाला है. खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ने वाली है. मॉनसून फीका होने का अंदेशा है. राजकोषीय घाटा अनुमान से ऊपर जा चुका है. पर ये बातें बाद की हैं. असल सवाल है कि वोटर किसके हाथ सत्ता सौंपने वाला है?

चुनाव परिणामों को लेकर जो मगज़मारी इस वक्त चल रही है उसमें कई तरह की दृश्यावलियों की चर्चा है. मोटे तौर पर तीन मुख्य परिदृश्य बन रहे हैं. पहला यह कि बीजेपी और उसके गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा. साफ बहुमत मिलने का मतलब है कि कम से कम अगले पाँच साल के लिए कई तरह के सिरदर्द खत्म होंगे. अलबत्ता कुछ नए सिरदर्द फौरन ही शुरू भी हो जाएंगे. काफी लोगों को यकीन है कि ऐसे या वैसे सरकार मोदी की बन जाएगी.

Friday, May 10, 2019

इंसाफ के मंदिर की पवित्रता का सवाल


उच्चतम स्तर पर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जो सवाल खड़े हो रहे हैं, उनके जवाब देने की घड़ी आ गई है. ये सवाल परेशान करने वाले जरूर हैं, पर शायद इनके बीच से ही हल निकलेंगे. इन सवालों पर राष्ट्रीय विमर्श और आमराय की जरूरत भी है. हाल के वर्षों में न्यायपालिका से जुड़ी जो घटनाएं हुईं हैं, वे विचलित करने वाली हैं. लम्बे अरसे से देश की न्याय-व्यवस्था को लेकर सवाल हैं. आरोप है कि कुछ परिवारों का इस सिस्टम पर एकाधिकार है. जजों और वकीलों की आपसी रिश्तेदारी है. सारी व्यवस्था उनके बीच और उनके कहने पर ही डोलती है.
पिछले साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने एक संवाददाता सम्मेलन में न्यायपालिका के भीतर के सवालों को उठाया था. यह एक अभूतपूर्व घटना थी. देश की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग भी पिछले साल लाया गया. जज लोया की हत्या को लेकर गम्भीर सवाल खड़े हुए और अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं. सवाल दो हैं. क्या यह सब अनायास हो रहा है या किसी के इशारे से यह सब हो रहा है? खासतौर से यौन उत्पीड़न का मामला उठने के बाद ऐसे सवाल ज्यादा मौजूं हो गए हैं. अब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने खुद इस सवाल को उठाया है. इस मामले ने व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर जो सवाल उठाए हैं उनके जवाब मिलने चाहिए.

Saturday, May 4, 2019

चुनाव के सफल संचालन से माओवाद हारेगा

लोकसभा चुनाव के दौरान माओवादी हिंसा के राजनीतिक निहितार्थ हैं. बिहार, उड़ीसा, बंगाल, आंध्र, छत्तीसगढ़, आंध्र, तेलंगाना और महाराष्ट्र के कई इलाके उस लाल गलियारे में पड़ते हैं, जहाँ माओवादी प्रभाव है. माओवादी इस लोकतांत्रिक गतिविधि को विफल करना चाहते हैं. बावजूद छिटपुट हिंसा के उत्साहजनक खबरें भी मिल रहीं हैं. जनता आगे बढ़कर माओवादियों को चुनौती दे रही है. इस बीच माओवादियों ने कई जगह हमले किए हैं. सबसे बड़ा हमला गढ़चिरौली में हुआ है, जहाँ 15 कमांडो और एक ड्राइवर के शहीद होने की खबर है.

चुनाव शुरू होने के पहले ही माओवादियों ने बहिष्कार की घोषणा कर दी थी और कहा था कि जो भी मतदान के लिए जाएगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. इस धमकी के बावजूद झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्र और तेलंगाना में मतदाताओं ने बहिष्कार के फरमान को नकारा. छत्तीसगढ़ में निर्वाचन आयोग ने सुरक्षा की दृष्टि से अचानक 132 मतदान केंद्रों के स्थान बदल दिए. फिर भी सैकड़ों मतदाताओं ने जुलूस के रूप में 30 किलोमीटर पैदल चलकर मतदान किया. इससे जाहिर होता है कि मतदाताओं के मन में कितना उत्साह है. यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की जीत है. माओवादियों ने गांवों में ही मतदाताओं को रोकने की कोशिशें कीं, जो बेअसर हो गईं.

गढ़चिरौली में माओवादियों की हिंसक कार्रवाई के बाद नक्सलवाद शब्द एकबार फिर से खबरों में है. नक्सलवाद और माओवाद को प्रायः हम एक मान लेते हैं. ऐसा नहीं है. माओवाद अपेक्षाकृत नया आंदोलन है. नक्सलवाद चीन की कम्युनिस्ट क्रांति से प्रेरित-प्रभावित आंदोलन था. उसकी रणनीति के केन्द्र में भी ग्रामीण इलाकों की बगावत थी. शहरों को गाँवों से घेरने की रणनीति. वह रणनीति विफल हुई.

Saturday, April 27, 2019

जम्हूरी जंग में मनोरंजन के महारथी


हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वह टेलीविजन इंटरव्यू काफी चर्चित रहा, जो फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार ने लिया था. सवालों से ज्यादा चर्चा अक्षय कुमार की नई भूमिका को लेकर है. चुनाव के ठीक पहले अचानक तमाम सेलिब्रिटी राजनीति के मैदान में उतरे हैं. कुछ प्रचार के लिए और कुछ प्रत्याशी बनकर. राजधानी दिल्ली से क्रिकेटर गौतम गम्भीर, बॉक्सर विजेन्द्र सिंह और गायक हंसराज हंस मैदान में उतरे हैं. गायक मनोज तिवारी पहले से मैदान में हैं. मथुरा में हेमा मालिनी हैं और मुम्बई में उर्मिला मातोंडकर. दक्षिण में कलाकारों की भरमार है. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की मुनमुन सेन पहले से सांसद हैं, इसबार मिमी चक्रवर्ती समेत कई कलाकारों को पार्टी ने टिकट दिए हैं.
दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना की गुरदासपुर सीट से सनी देओल को बीजेपी टिकट मिलने की खबर भी मीडिया की सुर्खियों में है. खबर है कि कांग्रेस ने भी उन्हें टिकट देने की पेशकश की थी, पर सनी देओल ने बीजेपी को वरीयता दी. पिता धर्मेन्द्र के पदचिह्नों पर चलते हुए वे भी राजनीति के मैदान में उतरे हैं. धर्मेन्द्र राजस्थान की बीकानेर सीट से दो बार भाजपा के सांसद रहे हैं. उनकी पत्नी हेमा मालिनी मथुरा से सांसद हैं और फिर से चुनाव लड़ रहीं हैं.
बिहार के पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा चुनाव मैदान में हैं. उनकी पत्नी पूनम सिन्हा लखनऊ से चुनाव लड़ रहीं हैं. भोजपुरी फिल्मों के स्टार रवि किशन कांग्रेस से पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गए हैं और अब गोरखपुर से चुनाव लड़ रहे हैं. सेलिब्रिटी कलाकारों और खिलाड़ियों की लम्बी फेहरिस्त है, जिनकी दिलचस्पी राजनीति में बढ़ी है. सवाल है कि यह सब क्या है? क्या यह हमारे लोकतंत्र के उत्तम स्वास्थ्य की निशानी है?

Friday, April 19, 2019

पाकिस्तान क्यों है इस चुनाव का बड़ा मुद्दा?


भारतीय चुनावों में पाकिस्तान का मुद्दा कभी इतना महत्वपूर्ण बनकर नहीं बना,  जितना इसबार नजर आ रहा है. इसकी एक वजह 14 फरवरी के पुलवामा हमले को माना जा रहा है. इसके पहले 1999 के करगिल कांड और 2008 के मुम्बई हमले के बाद भी चुनाव हुए थे, पर तब इतनी शिद्दत से पाकिस्तान चुनाव का मुद्दा नहीं बना था, जितना इस बार है. 1999 के लोकसभा चुनाव करगिल युद्ध खत्म होने के दो महीने के भीतर हो गए थे, इसबार चुनाव के दो दौर पूरे हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान और आतंकवाद अब भी बड़ा मसला बना हुआ है. 
यह भी सच है कि नरेन्द्र मोदी और बीजेपी को पाकिस्तानी फैक्टर से लाभ मिल रहा है, पर सवाल है कि यह इतना महत्वपूर्ण बना ही क्यों? कुछ लोगों को लगता है कि पुलवामा कांड जानबूझकर कराया गया है. यह अनुमान जरूरत से ज्यादा है. यों तो 26 नवम्बर 2008 के मुम्बई हमले के पीछे भी भारतीय साजिश का एंगल लोगों ने खोज लिया था, पर उसे 2009 के चुनाव से नहीं जोड़ा था. इस बार के चुनाव में पाकिस्तान कई ऐतिहासिक कारणों से महत्वपूर्ण बना है. सबसे महत्वपूर्ण यह कि इस बार पाकिस्तान खुद एक कारण बनना चाहता है. 
हाल में पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा, हमारे पास विश्वसनीय जानकारी है कि भारत हमारे ऊपर 16 से 20 अप्रैल के बीच फिर हमला करेगा. 16 अप्रैल की तारीख निकल गई, कुछ नहीं हुआ. भारत में अंदेशा था कि शायद पुलवामा जैसा कुछ और न हो जाए. दूसरी तरफ इमरान खान का बयान था कि भारत में नरेंद्र मोदी दूसरा कार्यकाल मिला तो यह पाकिस्तान के लिए बेहतर होगा और कश्मीर के हल की संभावनाएं बेहतर होंगी. पाकिस्तानी नेताओं मुँह से पहले कभी इस किस्म के बयान सुनने को नहीं मिले.

Monday, April 15, 2019

कहाँ गए चुनाव-सुधार के दावे और वायदे?


http://inextepaper.jagran.com/2112325/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/15-04-19#page/8/1
जनवरी 2017 में पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि धर्म, जाति और भाषा के नाम पर वोट माँगना गैर-कानूनी है। कौन नहीं जानता कि इन आधारों पर चुनाव लड़ने पर पहले से रोक है। सुप्रीम कोर्ट के 7 सदस्यीय संविधान पीठ ने जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) की व्याख्या भर की थी। इसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवार के साथ-साथ दूसरे राजनेता, चुनाव एजेंट और धर्मगुरु भी इसके दायरे में आते हैं। क्या आप भरोसे से कह सकते हैं कि इन संकीर्ण आधारों पर वोट नहीं माँगे जाते हैं या माँगे जा रहे हैं? चुनावी शोर के इस दौर में आपको क्या कहीं से चुनाव-सुधारों की आवाज सुनाई पड़ती है? नहीं तो, क्यों?

 जिन दिनों देश सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों से गुजर रहा है सुप्रीम कोर्ट में चुनावी बॉण्डों की वैधता और उपादेयता पर सुनवाई चल रही है। चुनाव आयोग का कहना है कि ये बॉण्ड काले धन को सफेद करने का एक और जरिया है। हालांकि कांग्रेस के घोषणापत्र में कहा गया है कि हम जीतकर आए, तो इन बॉण्डों को खत्म कर देंगे। पर चुनावी ट्रस्ट की व्यवस्था तो कांग्रेस की ही देन है। चुनावी बॉण्डों के रूप में कम्पनियाँ बजाय नकदी के बैंक से खरीदे गए बॉण्ड के रूप में चंदा देती हैं। सच यह है कि पिछले 72 साल में सत्ताधारी दलों ने हमेशा व्यवस्था में छिद्र बनाकर रखे हैं ताकि उन्हें चुनावी चंदा मिलता रहे।

Saturday, April 6, 2019

लोकपाल को लेकर खामोशी क्यों?


http://inextepaper.jagran.com/2099807/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/06-04-19#page/10/1
हमारी राजनीति और समाज की प्राथमिकताएं क्या हैं? सन 2011 में इन्हीं दिनों के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो लगता था कि भ्रष्टाचार इस देश की सबसे बड़ी समस्या है और उसका निदान है जन लोकपाल. लोकपाल आंदोलन के विकास और फिर संसद से लोकपाल कानून पास होने की प्रक्रिया पर नजर डालें, तो नजर आता है कि राजनीति और समाज की दिलचस्पी इस मामले में कम होती गई है. अगस्त 2011 में देश की संसद ने असाधारण स्थितियों में विशेष बैठक करके एक मंतव्य पास किया. फिर 22 दिसम्बर को लोकसभा ने इसका कानून पास किया, जो राज्यसभा से पास नहीं हो पाया.

फिर उस कानून की याद दिसम्बर, 2013 में आई. राज्यसभा ने उसे पास किया और 1 जनवरी को उसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और 16 जनवरी, 2014 को यह कानून लागू हो गया. सारा काम तेजी से निपटाने के अंदाज में हुआ. उसके पीछे भी राजनीतिक दिखावा ज्यादा था. देश फिर इस कानून को भूल गया. सोलहवीं लोकसभा के चुनाव के ठीक पहले यह कानून अस्तित्व में आया और अब सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव के ठीक पहले लोकपाल की नियुक्ति हुई है. इसकी नियुक्ति में हुई इतनी देरी पर भी इस दौरान राजनीतिक हलचल नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट में जरूर याचिका दायर की गई और उसकी वजह से ही यह नियुक्ति हो पाई. 

Friday, March 29, 2019

एंटी-सैटेलाइट टेस्ट के महत्व को भी समझिए

http://inextepaper.jagran.com/2088288/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/29-03-19#page/8/1
एंटी-सैटेलाइट परीक्षण को लेकर कई तरह के सवाल एकसाथ खड़े हुए हैं. काफी सवाल राजनीतिक है, जिनपर अलग से बात होनी चाहिए. यहाँ हम इसके सामरिक और राजनयिक पहलुओं पर बात करेंगे. रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि इसका फैसला सन 2014 में ही कर लिया गया था. सवाल है कि परीक्षण पहले क्यों नहीं किया और अब क्यों किया? इसके दो-तीन कारण हैं. डीआरडीओ को तकनीक विकसित करने की अनुमति देने, धनराशि आवंटित करने और मित्र देशों से विमर्श में भी समय लगता है. रक्षा और राजनीतिक मामलों से जुड़ी कैबिनेट समितियों से अग्रिम स्वीकृतियाँ लेने की जरूरत भी थी. डीआरडीओ का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की अनुमति दो साल पहले दी गई थी.

मौसम और धरती की परिक्रमा कर रहे उपग्रहों की स्थिति पर नजर रखने की आवश्यकता भी थी. मौसम का पता महीनों पहले लगाना होता है. यह भी ध्यान रखना था कि अंतरिक्ष में प्रदूषण न होने पाए. चीन ने 2007 में इसका ध्यान नहीं रखा था, जिसके लिए उसकी निन्दा हुई थी. भारत ने निश्चित रूप से अपने सामरिक मित्रों से भी मशविरा किया होगा. इसी वजह से बुधवार को हमारे विदेश मंत्रालय ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया और प्रधानमंत्री ने अपने सम्बोधन में कहा कि हमने इस परीक्षण में वैश्विक नियमों को ध्यान में रखा है. 

Tuesday, March 26, 2019

आतंकी लाइफ-लाइन को तोड़ना जरूरी

http://inextepaper.jagran.com/2083942/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/26-03-19#page/12/1
पुलवामा के हत्याकांड और फिर बालाकोट में की गई भारतीय कार्रवाई की गहमागहमी के बीच हमने गत 7 मार्च को जम्मू के बस स्टेशन पर हुए ग्रेनेड हमले पर ध्यान नहीं दिया. घटना के फौरन बाद ही इसे अंजाम देने वाला मुख्य अभियुक्त पकड़ लिया गया, पर यह घटना कुछ बातों की तरफ इशारा कर रही है. पिछले नौ महीनों में इसी इलाके में यह तीसरी घटना है. आतंकवादी जम्मू के इस भीड़ भरे इलाके में कोई बड़ी हिंसक कार्रवाई करना चाहते हैं, ताकि जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच टकराव हो. भारतीय सुरक्षाबलों की आक्रामक रणनीति के कारण पराजित होता आतंकी-प्रतिष्ठान नई रणनीतियाँ लेकर सामने आ रहा है.

पुलवामा के बाद जम्मू क्षेत्र में हिंसा भड़की थी. ऐसी प्रतिक्रियाओं का परोक्ष लाभ आतंकी जाल बिछाने वाले उठाते हैं. जम्मू में ग्रेनेड फेंकने वाले की उम्र पर गौर कीजिए. नौवीं कक्षा के छात्र को कुछ पैसे देकर इस काम पर लगाया गया था. आईएसआई के एजेंट किशोरों के बीच सक्रिय हैं. कौन हैं ये एजेंट? जमाते-इस्लामी और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट पर प्रतिबंधों से जाहिर है कि अब उन सूत्रधारों की पहचान हो रही है. वे हमारी उदार नीतियों का लाभ उठाकर हमारी ही जड़ें काटने में लगे हैं. उन तत्वों की सफाई की जरूरत है, जो जहर की खेती कर रहे हैं.

गर्मियाँ आने वाली हैं, जब आतंकी गतिविधियाँ बढ़ती हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान भी वे हरकतें करेंगे. उधर पाकिस्तान को लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानियों के हाथ में फिर से सत्ता आने वाली है. आईएसआई के सूत्रधारों ने पूरे इलाके में भारतीय व्यवस्था के प्रति जहर भरना शुरू कर दिया है. कश्मीर में ही नहीं, वे पंजाब में खत्म हो चुके खालिस्तानी-आंदोलन में फिर से जान डालने का प्रयास कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने अमेरिका में सक्रिय कुछ लोगों की मदद से रेफरेंडम-2020 नाम से एक अभियान शुरू किया है. उन्हें अपना ठिकाना उपलब्ध कराया है. उनकी योजना करतारपुर कॉरिडोर बन जाने के बाद भारत से जाने वाले श्रद्धालुओं के मन में जहर घोलने की है.

Friday, March 15, 2019

शिखर पर पहुँचाएंगे नई पीढ़ी के वोटर


http://inextepaper.jagran.com/2069256/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/15-03-19#page/8/1
लोकसभा के आगामी चुनाव में भारत के 89.9 करोड़ वोटर भाग लेंगे. दुनिया के किसी लोकतंत्र में एकसाथ इतने वोटरों की भागीदारी कभी नहीं हुई. सन 2014 के चुनाव में 81.5 करोड़ वोटरों ने हिस्सा लिया था. इसबार 8.4 करोड़ वोटरों की वृद्धि हुई है. इनमें भी 1.6 करोड़ वोटरों की आयु 18 से 19 वर्ष के बीच है. उनके अलावा छह करोड़ से ऊपर वोटर भी नौजवानों की परिभाषा में आते हैं. इतनी बड़ी संख्या में युवा वोटरों की चुनाव में भागीदारी क्या बताती है? ये वोटर अपनी राजनीति और व्यवस्था से क्या चाहते हैं?

राष्ट्रीय राजनीति के ज्यादातर नियंता अपने जीवन के संध्याकाल में प्रवेश कर चुके हैं. सही या गलत उनके पास अनुभव हैं और अतीत की यादें हैं. पर नए मतदाताओं के पास केवल उम्मीदें और हौसले हैं. इनमें से काफी नौजवान कुपोषण, गरीबी और तमाम असुविधाओं की बाधाओं को पार करके यहाँ तक पहुँचे हैं. व्यवस्था के निर्माण में उनकी भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। उनके सपने पूरे होंगे, तो इसी व्यवस्था की मदद से होंगे. और वे इस व्यवस्था को पुष्ट करेंगे. सवाल है कि क्या हमारा लोकतंत्र इतनी बड़ी संख्या में नौजवानों की उम्मीदों को पूरा करेगा?

संयुक्त राष्ट्र की परिभाषाएं सामान्यतः 15 से 24 साल की अवस्था को युवा की श्रेणी में रखती हैं. भारत की राष्ट्रीय युवा नीति-2003 में 13 से 35 वर्ष की आयु को युवा की श्रेणी में रखा गया था. बाद में 2014 की राष्ट्रीय नीति में इसे 15-29 वर्ष कर दिया गया. यह परिभाषा बदलती रहती है, पर किसी भी परिभाषा से देखें, तो पाएंगे कि दुनिया के सबसे युवा देशों में भारत सबसे आगे है. सन 2018 में भारत की सकल आबादी की औसत उम्र 27.9 वर्ष थी और 2020 में देश की कुल आबादी में 34 फीसदी युवा होंगे.

Friday, March 8, 2019

राजनीति के दरवाजे से बाहर क्यों हैं स्त्रियाँ?

http://inextepaper.jagran.com/2059095/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/08-03-19#page/14/1
बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में भारत के तकनीकी-आर्थिक रूपांतरण के समांतर सबसे बड़ी परिघटना है सामाजिक जीवन में लड़कियों की बढ़ती भागीदारी. सत्तर के दशक तक भारतीय महिलाएं घरों तक सीमित थीं, आज वे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद हैं. युवा स्त्रियाँ आधुनिकीकरण और सामाजिक रूपांतरण में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहीं हैं. भूमिका बढ़ने के साथ उनसे जुड़े सवाल भी खड़े हुए हैं. पिछले साल जब मी-टू आंदोलन ने भारत में प्रवेश किया था, तब काफी स्त्रियों ने अपने जीवन के ढके-छिपे पहलुओं को उजागर किया. न जाने कितने तथ्य अभी छिपे हुए हैं.

यत्र नार्यस्तु...के देश में स्त्रियों के जीवन की जमीन बहुत कठोर है. उन्हें अपनी जगह बनाने में जबर्दस्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. फिर भी वे इनका मुकाबला करते हुए आगे बढ़ रहीं हैं. दिसम्बर, 2012 में दिल्ली रेप कांड के बाद स्त्री-चेतना में विस्मयकारी बदलाव हुआ था. लम्बे अरसे से छिपा गुस्सा एकबारगी सामने आया. यह केवल स्त्रियों का गुस्सा नहीं था, पूरे समाज की नाराजगी थी. उस आंदोलन की अनुगूँज शहरों, कस्बों, गाँवों और गली-मोहल्लों तक में सुनाई पड़ी थी. उस आंदोलन से बड़ा बदलाव भले नहीं हुआ, पर सामाजिक जीवन में एक नया नैरेटिव तैयार हुआ. 

Friday, March 1, 2019

आतंकवाद से लड़ने की पेचीदगियाँ

http://inextepaper.jagran.com/2048752/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/01-03-19#page/12/1
भारतीय पायलट की वापसी के कारण फिलहाल दोनों देशों के बीच फैला तनाव कुछ समय के लिए दूर जरूर हो गया है, पर आतंकवाद का बुनियादी सवाल अपनी जगह है. यह सब पुलवामा कांड के कारण शुरू हुआ था. बुधवार को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फिर से प्रस्ताव रखा है कि जैशे-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जाए. परिषद की प्रतिबंध समिति अगले दस दिन में इसपर विचार करेगी. पता नहीं, प्रस्ताव पास होगा या नहीं. चीन ने पुलवामा कांड की निंदा की है और बालाकोट पर की गई भारतीय वायुसेना की कार्रवाई की आलोचना भी नहीं की है, पर इस प्रस्ताव पर उसका दृष्टिकोण क्या होगा, यह देखना होगा.

पिछले दस साल में यह चौथी कोशिश है. सारी कोशिशें चीन ने नाकाम की हैं. वुज़ान में विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में हालांकि चीन ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की सारी बातों का समर्थन किया, पर पाकिस्तान का नाम नहीं लिया. एक प्रतिबंधित संगठन के नेता पर प्रतिबंध लगाने में इतने पेच हैं. हम इस वास्तविकता की अनदेखी नहीं कर सकते.

आतंकवाद पर विजय केवल फौजी कार्रवाई से हासिल नहीं होगी. उसके लिए राजनयिक मोर्चे पर ही लड़ना होगा. और केवल मसूद अज़हर पर पाबंदी लगाने से सारा काम नहीं होगा. पर वह बड़ा कदम होगा. सफलता तभी मिलेगी, जब पाकिस्तानी समाज इसके खिलाफ खड़ा होगा. सीमा के दोनों तरफ कट्टरता का माहौल खत्म होगा और कश्मीर में शांति की स्थापना होगी. क्या यह सब आसानी से सम्भव है? 


बालाकोट स्थित जैशे-मोहम्मद के ट्रेनिंग सेंटर पर हमले के बाद पाकिस्तानी आईएसपीआर के मेजर जनरल आसिफ़ ग़फ़ूर ने सुबह 5.12 मिनट पर पहला ट्वीट किया था, पर भारत सरकार की तरफ से पहली आधिकारिक जानकारी 11.30 बजे विदेश सचिव विजय गोखले ने दी. रक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक में काफी सोच-विचार के बाद भारत ने इसे ‘नॉन-मिलिट्री’ एक्शन बताया था. हमला पाकिस्तान पर नहीं था, बल्कि ऐसे दुश्मन पर था, जो पाकिस्तान में तो है, पर नॉन-स्टेट एक्टर है. 

Monday, February 25, 2019

कश्मीरियों को जोड़िए, तोड़िए नहीं


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पुलवामा हमले के बाद देश के कई इलाकों में कश्मीरी मूल के लोगों पर हमले की खबरें आईं और इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार समेत 11 राज्यों को नोटिस जारी किया है. अदालत ने सभी राज्यों के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को निर्देश दिया है कि कश्मीरियों पर होने वाले किसी भी हमले के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करें. जिन राज्यों को नोटिस दिया गया है उनमें जम्मू कश्मीर उत्तराखंड, हरियाणा, यूपी, बिहार, मेघालय, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र शामिल हैं.

कश्मीरियों पर हमलों की खबरों के साथ ऐसी खबरें भी हैं कि कई जगहों पर इन्हें बचाने वाले लोग भी सामने आए. हालांकि ऐसी खबरों को ज्यादा तवज्जोह नहीं मिली, पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से भरोसा बढ़ा है. भले ही बचाने वालों की संख्या कम रही हो, पर हमारे बीच सकारात्मक सोच वाले भी मौजूद हैं. लोगों को भावनाओं में बहाना आसान है, सकारात्मक सोच पैदा करना काफी मुश्किल है. पर हमें इसके व्यापक पहलुओं पर विचार करना चाहिए. साथ ही मॉब लिंचिंग की मनोदशा को पूरी ताकत से धिक्कारना होगा. यदि हम कश्मीरियों को कट्टरपंथी रास्ते पर जाने से रोकना चाहते हैं, तो पहले हमें उस रास्ते का बहिष्कार करना होगा. 

Tuesday, February 19, 2019

कुलभूषण जाधव को क्या हम बचा पाएंगे?


पुलवामा कांड के ठीक चार दिन बाद सोमवार से हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कुलभूषण जाधव के मामले की सुनवाई शुरू हो गई है, जो चार दिन चलेगी. इन चार दिनों में न केवल इस मामले के न्यायिक बिन्दुओं की चर्चा होगी, बल्कि भारत-पाकिस्तान रिश्तों की भावी दिशा भी तय होगी. भारत लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि पाकिस्तान का फौजी प्रतिष्ठान अंतरराष्ट्रीय नियमों-मर्यादाओं और मानवाधिकार के बुनियादी सिद्धांतों को मानता नहीं है. पर ज्यादा बड़ा सवाल है कि क्या हम कुलभूषण जाधव को छुड़ा पाएंगे? इस कानूनी लड़ाई के अलावा भारत के पास दबाव बनाने के और तरीके क्या हैं? पर इतना तय है कि आंशिक रूप से भी यदि हम सफल हुए तो वह पाकिस्तान पर दबाव बनाने में मददगार होगा.

इतिहास के बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव पर हम खड़े हैं. इस मामले में अदालत ने सन 2017 में पाकिस्तान को आदेश दिया था कि वह जाधव का मृत्युदंड स्थगित रखे. अदालत का फैसला आने में चार-पाँच महीने लगेंगे, पर यह फैसला दोनों देशों के रिश्तों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. पाकिस्तान को लगता है कि भारत में चुनाव के बाद बनने वाली नई सरकार से उसकी बात हो सकती है, पर जाधव को कुछ हुआ, तो वार्ता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

Tuesday, February 12, 2019

अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय भूमिका की परीक्षा

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अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी अब लगभग निश्चित है. अमेरिका मानता है कि पाकिस्तानी सहयोग के बिना यह समझौता सम्भव नहीं था. उधर तालिबान भी पाकिस्तान का शुक्रगुजार है. रविवार 10 फरवरी को पाकिस्तान के डॉन न्यूज़ टीवी पर प्रसारित एक विशेष इंटरव्यू में तालिबान प्रवक्ता ज़बीउल्ला मुजाहिद ने कहा कि हम सत्ता में वापस आए तो पाकिस्तान को भाई की तरह मानेंगे. उन्होंने कहा कि इस वक्त अफ़ग़ानिस्तान में जो संविधान लागू है, वह अमेरिकी हितों के अनुरूप है. हमारा शत-प्रतिशत मुस्लिम समाज है और हमारा संविधान शरिया पर आधारित होगा.

इसके पहले 6 फरवरी को मॉस्को में रूस की पहल पर हुई बातचीत में आए तालिबान प्रतिनिधियों ने कहा कि हम समावेशी इस्लामी-व्यवस्था चाहते हैं, इसलिए नया संविधान लाना होगा. तालिबानी प्रतिनिधिमंडल के नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकज़ाई ने कहा कि काबुल सरकार का संविधान अवैध है. उसे पश्चिम से आयात किया गया है. वह शांति के रास्ते में अवरोध बनेगा. हमें इस्लामिक संविधान लागू करना होगा, जिसे इस्लामिक विद्वान तैयार करेंगे.

सवाल है कि अफ़ग़ानिस्तान की काबुल सरकार को मँझधार में छोड़कर क्या अमेरिकी सेना यों ही वापस चली जाएगी? पाकिस्तानी सेना के विशेषज्ञों को लगता है कि अब तालिबान शासन आएगा. वे मानते हैं कि तालिबान और अमेरिका के बीच बातचीत में उनके देश ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है और इसका पुरस्कार उसे मिलना चाहिए. अख़बार ‘दुनिया’ में प्रकाशित एक आलेख के मुताबिक़ पाकिस्तान ने तालिबान पर दबाव डाला कि वे अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार हो जाएं. इस वक्त वह ऐसा भी नहीं जताना चाहता कि तालिबान उसके नियंत्रण में है. अलबत्ता अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को आश्वस्त किया है कि हम उसे मँझधार में छोड़कर जाएंगे नहीं. अमेरिका शुरू से मानता रहा है कि तालिबान को पाकिस्तान में सुरक्षित पनाह मिली हुई है.

Wednesday, February 6, 2019

सीबीआई और पुलिस का राजनीतिकरण

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सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता के पुलिस-कमिश्नर राजीव कुमार की गिरफ्तारी रोकने के बावजूद सीबीआई की पूछताछ से उन्हें बरी नहीं किया है. यह पूछताछ होगी. इस मामले में किसी की जीत या हार नहीं हुई है. टकराव फौरी तौर पर टल गया है, पर उसके बुनियादी कारण अपनी जगह कायम हैं. राजनीतिक मसलों में सीबीआई के इस्तेमाल का आरोप देश में पहली बार नहीं लगा है, और लगता नहीं कि केन्द्र की कोई भी सरकार इसे बंधन-मुक्त करेगी. उधर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद राज्य सरकारें पुलिस-सुधार को तैयार नहीं हैं. वे पुलिस का इस्तेमाल अपने तरीके से करना चाहती हैं. राजनीतिकरण इधर भी है और उधर भी.
राजीव कुमार के घर पर छापामारी के समय और तौर-तरीके के कारण विवाद खड़ा हुआ है. सीबीआई जानना चाहती है कि विशेष जाँच दल के प्रमुख के रूप में उन्होंने सारदा घोटाले की क्या जाँच की और उनके पास कौन से दस्तावेज हैं. इस जानकारी को हासिल करने कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए और उसमें अड़ंगे लगाना गलत है, पर देखना होगा कि सीबीआई का तरीका क्या न्याय संगत था? क्या उसने वे सारी प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं, जो इस स्तर के अफसर से पूछताछ के लिए होनी चाहिए? इन बातों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी सुनवाई के बाद ही आएगा.
केन्द्र और ममता बनर्जी दोनों इस मामले का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं. बीजेपी बंगाल में प्रवेश करके ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटें हासिल करने की कोशिश में है, वहीं ममता बनर्जी खुद को बीजेपी-विरोधी मुहिम की नेता के रूप में स्थापित कर रहीं हैं. हाल में उनकी सरकार ने बीजेपी को बंगाल में रथ-यात्राएं निकालने से रोका है. बीजेपी बंगाल के ग्रामीण इलाकों में प्रवेश कर रही है. तृणमूल-विरोधी सीपीएम के कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल होते जा रहे हैं.
संघीय-व्यवस्था में केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच इस प्रकार का विवाद अशोभनीय है. देश की जिन कुछ महत्वपूर्ण संस्थाओं को जनता की जानकारी के अधिकार के दायरे से बाहर रखा गया है, उनमें सीबीआई भी है. इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और मामलों की संवेदनशीलता को मुख्य कारण बताया जाता है, पर जैसे ही इस संस्था को स्वायत्त बनाने और सरकारी नियंत्रण से बाहर रखने की बात होती है, सभी सरकारें हाथ खींच लेती हैं.

Saturday, February 2, 2019

उड़ानें भरता बजट


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मोदी सरकार का अंतिम बजट वैसा ही लुभावना और उम्मीदों से भरा है, जैसा सन 2014 में इस सरकार का पहला बजट था. इसमें गाँवों और किसानों के लिए तोहफों की भरमार है और साथ ही तीन करोड़ आय करदाताओं के लिए खुशखबरी है. कामगारों के लिए पेंशन है. उन सभी वर्गों का इसमें ध्यान रखा गया है, जो जनमत तैयार करते हैं. ऐसा भी नहीं कि इन घोषणाओं से खजाना खाली हो जाएगा, बल्कि अर्थ-व्यवस्था बेहतरी का इशारा कर रही है.

दो हेक्टेयर से कम जोत वाले किसानों सालाना छह हजार रुपये की मदद देने की जो घोषणा की गई है, उसे सार्वभौमिक न्यूनतम आय कार्यक्रम की शुरूआत मान सकते हैं. बेशक यह चुनाव से जुड़ा है, पर इस अधिकार से सरकार को वंचित नहीं कर सकते. अलबत्ता पूछ सकते हैं कि इसे लागू कैसे करेंगे? व्यावहारिक रूप से इन्हें लागू करने में कोई दिक्कत नहीं आएगी. बल्कि आने वाले वर्षों में ये स्कीमें और ज्यादा बड़े आकार में सामने आएंगी, क्योंकि अर्थ-व्यवस्था इन्हें सफलता से लागू करने की स्थिति में है.

पिछले साल जिस तरह से आयुष्मान भारत कार्यक्रम की घोषणा की गई थी, उसी तरह यह एक नई अवधारणा है, जो समय के साथ विकसित होगी. किसान सम्मान निधि से करीब 12 करोड़ छोटे किसानों का भला होगा. इन्हीं परिवारों को उज्ज्वला, सौभाग्य और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ मिलेगा. यह स्कीम 1 दिसम्बर 2018 से लागू हो रही है. यानी कि इसकी पहली किस्त चुनाव के पहले किसानों को मिल भी जाएगी.