वैश्विक-राजनीति में हमेशा ही कोई न कोई घटना ऐसी होती रहती है, जो किसी खास इलाके के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. पिछले हफ्ते भारत में ‘ब्रिक्स’ विदेशमंत्रियों का सम्मेलन और प्रधानमंत्री का पाँच देशों की यात्रा पर निकलना भी ऐसी ही घटनाएँ हैं.
पिछले हफ्ते भारत ने नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ के
विदेशमंत्रियों की बैठक की मेजबानी की और अगले सप्ताह ‘क्वॉड’ के विदेश मंत्रियों
मेजबानी और महीने के अंत में भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन का आयोजन भी करेगा. इनमें
से हरेक आयोजन भारतीय डिप्लोमेसी के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालता है.
‘ब्रिक्स’ और ‘क्वॉड’ को अक्सर वैचारिक रूप से
विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया जाता है. ‘ब्रिक्स’ को पूर्वी देशों
द्वारा पश्चिमी वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के साधन के रूप में, जबकि ‘क्वॉड’ को चीन के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में. इस
प्रकार के वर्णन दोनों समूहों की अतिरंजना करते हैं.
‘ब्रिक्स’ में टकराव
‘ब्रिक्स’ में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच
प्रत्यक्ष संघर्ष हैं. ‘क्वॉड’, अपने बढ़ते सहयोग के बावजूद,
औपचारिक गठबंधन नहीं है. भारत ने तो ‘क्वॉड’ को सुनियोजित सुरक्षा
सहयोग के मंच में बदलने का हमेशा विरोध किया है.
पिछले हफ्ते
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चीन-यात्रा के पीछे भी हमारे लिए कुछ संकेत
छिपे हैं. उधर ‘ब्रिक्स’ के सम्मेलन में ईरान और यूएई के
मतभेद उभर कर आए, जिनके कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका.
अमेरिका और चीन की वार्ता के केंद्र में भारत भले ही नहीं था, पर दोनों के रिश्ते सुधरे, तो उसका, भारत-अमेरिका और भारत-चीन रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ेगा. सवाल है कि क्या रिश्ते सुधरे?
