Saturday, September 30, 2023

मालदीव के चुनाव में भारत बनाम चीन

सोलिह और मुइज़्ज़ु

दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बनाने की भारतीय कोशिशों में सबसे बड़ी बाधा चीन की है. पाकिस्तान के अलावा उसने बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव में काफी पूँजी निवेश किया है. पूँजी निवेश के अलावा चीन इन सभी देशों में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम भी करता है.

इसे प्रत्यक्ष रूप से हिंद महासागर के छोटे से देश मालदीव में देखा जा सकता है. चीन अपनी नौसेना को तेजी से बढ़ा रहा है. वह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस जगह पर अपनी पहुंच बनाना चाहेगा, उसे भारत रोकना चाहता है. चीन यहां अपनी तेल आपूर्ति की सुरक्षा चाहता है, जो इसी रास्ते से होकर गुजरता है.

आज मालदीव में राष्ट्रपति पद की निर्णायक चुनाव है, जिसे भारत और चीन की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जा रहा है. करीब 1,200 छोटे द्वीपों से मिल कर बना मालदीव पर्यटकों का पसंदीदा ठिकाना है. यहां के बीच दुनिया के अमीरों और मशहूर हस्तियों को पसंद आते हैं. सामरिक दृष्टि से भी हिंद महासागर के मध्य में बसा यह द्वीप समूह काफी अहम है, जो पूरब और पश्चिम के बीच कारोबारी जहाजों की आवाजाही का प्रमुख रास्ता है.

चीन-समर्थक मुइज़्ज़ु

चुनाव में आगे चल रहे मोहम्मद मुइज़्ज़ु की पार्टी ने पिछले कार्यकाल में चीन से नजदीकियां काफी ज्यादा बढ़ा ली हैं. चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए खूब सारा धन बटोरा गया. 45 साल के मुइज़्ज़ु माले के मेयर रहे हैं. पिछली सरकार में मालदीव के मुख्य एयरपोर्ट से राजधानी को जोड़ने की 20 करोड़ डॉलर की चीन समर्थित परियोजना का नेतृत्व उन्हीं के हाथ में था.

मालदीव में चीन के पैसे से बनी इसी परियोजना की सबसे अधिक चर्चा है. यह 2.1 किमी लंबा चार लेन का एक पुल है. यह पुल राजधानी माले को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से जोड़ता है. यह हवाई अड्डा एक अलग द्वीप पर स्थित है. इस पुल का उद्घाटन 2018 में किया गया था. उस समय यामीन राष्ट्रपति थे.

9 सितंबर को हुए पहले दौर में उन्हें 46 फीसदी वोट मिले. दूसरी तरफ निवर्तमान राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को 39 फीसदी वोट ही मिल सके. सोलिह ने भारत से रिश्तों को सुधारने में अपना ध्यान लगाया था.

Thursday, September 28, 2023

भारत-कनाडा रिश्ते और अमेरिका की भूमिका

ग्लोबल टाइम्स में कार्टून

भारत-कनाडा रिश्तों में बढ़ती तपिश अब भारत और अमेरिका के रिश्तों पर भी पड़ेगी। भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर इस समय अमेरिका में हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठक में परोक्ष रूप से कनाडा और पश्चिमी देशों के पाखंड का उल्लेख करते हुए कहा है कि हर बात की एक पृष्ठभूमि भी होती है। उसे भी समझें। वस्तुतः पश्चिमी देश हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के आरोपों का जिक्र तो कर रहे हैं, पर इन देशों में चल रही भारत-विरोधी गतिविधियों का उल्लेख नहीं कर रहे हैं।

आज जयशंकर की मुलाकात अमेरिका के विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकन से होगी। जयशंकर ने कहा है कि हमारी नीति इस किस्म की हत्याएं कराने की नहीं है। हमारे सामने ठोस तथ्य रखे जाएंगे, तभी हम कुछ कह पाएंगे। उधर अमेरिकी प्रवक्ता ने कहा है कि हमने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। बहरहाल लगता यह है कि अमेरिका अपनी चीन-विरोधी रणनीति में भारत का इस्तेमाल करना चाहता है, पर इस मामले में अमेरिकी इंटेलिजेंस ने ही कनाडा को कुछ जानकारियाँ दी हैं। सवाल है कि क्या अमेरिका डबल गेम खेल रहा है? यह कहा जा रहा है कि जी-20 की बैठक के दौरान अमेरिका ने भी नरेंद्र मोदी के सामने निज्जर का मामला उठाया था।

दूसरी तरफ इन दिनों चीनी मीडिया लगातार अमेरिकी पाखंड का उल्लेख कर रहा है। चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने चार रिपोर्टें (एक, दो, तीन और चार) इस आशय की जारी की हैं, जिनमें भारत-कनाडा प्रकरण के बहाने अमेरिका के पाखंड का जिक्र किया गया है। 

Wednesday, September 27, 2023

भारत-कनाडा रिश्तों पर ‘खालिस्तानी छाया’


जिस रोज हमारे देश में संसद का विशेष-सत्र शुरू होने वाला था
, उसके ठीक पहले कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत पर बड़ा आरोप लगाकर डिप्लोमैटिक-धमाका कर दिया, जिसकी अनुगूँज काफी देर तक सुनाई पड़ती रहेगी. कनाडा की इस हरकत से भारत के समूचे पश्चिमी खेमे के साथ रिश्ते प्रभावित होंगे.

दूसरी तरफ संभावना इस बात की भी है कि भारत के जवाबी हमलों के सामने उन्हें न केवल झुकना पड़े, बल्कि खालिस्तान को लेकर अपना रुख पूरी तरह बदलना पड़े. बहुत कुछ विदेशमंत्री एस जयशंकर की अमेरिका-यात्रा पर निर्भर करता है.

हालांकि ट्रूडो ने यह भी कहा कि इस मामले में जाँच चल ही रही है, अलबत्ता उन्होंने एक भारतीय राजनयिक को देश से निकलने का आदेश देकर और व्यापार-वार्ता रोककर इस बात को साफ कर दिया कि वे इन रिश्तों को किस हद तक बिगाड़ने को तैयार हैं.

Tuesday, September 26, 2023

इजरायल-सऊदी समझौते के आसार


अमेरिकी मध्यस्थता में इजरायल और सऊदी अरब के बीच एक शांति समझौता होने के आसार बन रहे हैं। कहा यह भी जा रहा है कि यह समझौता हुआ, तो छह-सात और मुस्लिम देश इजरायल को मान्यता दे देंगे। उधर ईरान के राष्ट्रपति इब्राहीम रईसी ने एक अमेरिकी टीवी चैनल से कहा है कि अमेरिकी मध्यस्थता में चल रही यह कोशिश विफल होगी

इजरायल के विदेशमंत्री एली कोहेन ने कहा है कि यदि सऊदी अरब और इजरायल के बीच शांति समझौता हुआ, तो छह या सात और मुस्लिम देश इजरायल को मान्यता दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि ये देश अफ्रीका और एशिया में हैं लेकिन उन्होंने उनका नाम बताने से इनकार कर दिया। पिछले हफ्ते सप्ताह इजरायली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि इजरायल और सऊदी अरब शांति समझौते के ऐतिहासिक मोड़ पर हैं।

यरूशलम पोस्ट के अनुसार कोहेन ने यह बात कान न्यूज को एक इंटरव्यू में बताई। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब के साथ शांति का मतलब है व्यापक मुस्लिम दुनिया के साथ शांति। नेतन्याहू के वक्तव्य के बाद उन्होंने कहा, कम से कम छह या सात अन्य देश हैं जिनके नेताओं से मैं मिला हूँ। ये महत्वपूर्ण मुस्लिम देश हैं, जिनके साथ हमारे संबंध नहीं हैं। वे शांति में यकीन रखते हैं।

वैश्विक-मंच पर ‘नया भारत’

भारत की अध्यक्षता में आयोजित जी-20 समूह के शिखर सम्मेलन में ‘नई दिल्ली घोषणा’ को सर्वसम्मति से अपनाना दो तरह से शुभ संकेत है। वैश्विक-राजनीति में थोड़ी देर के लिए ही सही शांति और सहयोग की संभावनाएं जागी हैं। दूसरे, इससे भारत की बढ़ती वैश्विक-भूमिका पर भी रोशनी पड़ती है। यह सम्मेलन शुरू होने के पहले सर्वानुमति की उम्मीद बहुत कम थी। माना जा रहा था कि यूक्रेन-युद्ध की तल्खी से निपट पाना भारत के लिए काफी मुश्किल होगा। विशेषज्ञों, राजनयिकों और अधिकारियों ने इस बात की उम्मीद बहुत कम ही लगा रखी थी कि भारत के वार्ताकार वह सर्वानुमति हासिल कर पाएंगे, जिसे अब तक कोई हासिल नहीं कर पाया है।

Sunday, September 24, 2023

स्त्री-सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम


नारी शक्ति वंदन विधेयक और उसके छह अनुच्छेद गुरुवार को राज्यसभा से भी पास हो गए। जैसी सर्वानुमति इसे मिली है, वैसी बहुत कम कानूनों को संसद में मिली है।  1996 से 2008 तक संसद में चार बार महिला आरक्षण विधेयक पेश किए गए, पर राजनीतिक दलों ने उन्हें पास होने नहीं दिया। 2010 में यह राज्यसभा से पास जरूर हुआ, फिर भी कुछ नहीं हुआ। ऐसे दौर में जब एक-एक विषय पर राय बँटी हुई है, यह आमराय अपूर्व है। पर इसे लागू करने के साथ दो बड़ी शर्तें जुड़ी हैं। जनगणना और परिसीमन। इस वजह से आगामी चुनाव में यह लागू नहीं होगा, पर चुनाव का एक मुद्दा जरूर बनेगा, जहाँ सभी पार्टियाँ इसका श्रेय लेंगी। 

इसकी सबसे बड़ी वजह है, महिला वोट। महिला पहले वोट बैंक नहीं हुआ करती थीं। 2014 के चुनाव के बाद से वे वोट बैंक बनती नज़र आने लगी हैं। केवल शहरी ही नहीं ग्रामीण महिलाएं भी वोट बैंक बन रही हैं। ज़रूरी नहीं है कि इसका श्रेय किसी एक पार्टी या नेता को मिले। सबसे बड़ी वजह है पिछले दो दशक में भारतीय स्त्रियों की बढ़ती जागरूकता और सामाजिक जीवन में उनकी भूमिका। राजनीति इसमें उत्प्रेरक की भूमिका निभाएगी।   

रोका किसने?

इस विधेयक को लेकर इतनी जबर्दस्त सर्वानुमति है, तो इसे फौरन लागू करने से रोका किसने है?  कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में कहा, जब सरकार नोटबंदी जैसा फैसला तुरत लागू करा सकती है, तब इतने महत्वपूर्ण विधेयक की याद साढ़े नौ साल बाद क्यों आई? बात तो बहुत मार्के की कही है। पर जब दस साल तक कांग्रेस की सरकार थी, तब उन्हें किसने रोका था?  सोनिया गांधी ने लोकसभा में सवाल किया, मैं एक सवाल पूछना चाहती हूं। भारतीय महिलाएं पिछले 13 साल से इस राजनीतिक ज़िम्मेदारी का इंतज़ार कर रही हैं। अब उन्हें कुछ और साल इंतज़ार करने के लिए कहा जा रहा है। कितने साल? दो साल, चार साल, छह साल, या आठ साल? 

संसद में इसबार हुई बहस के दौरान कुछ सदस्यों ने जनगणना और सीटों के परिसीमन की व्यवस्थाओं में संशोधन के लिए प्रस्ताव रखे, पर वे ध्वनिमत से इसलिए नामंजूर हो गए, क्योंकि किसी ने उनपर मतदान कराने की माँग नहीं की। सीधा अर्थ है कि ज्यादातर सदस्य मानते हैं कि जब सीटें बढ़ जाएंगी, तब महिलाओं को उन बढ़ी सीटों में अपना हिस्सा मिल जाएगा। कांग्रेस ने भी मत विभाजन की माँग नहीं की। जब आप दिल्ली-सेवा विधेयक पर मतदान की माँग कर सकते हैं, तो इस विधेयक को फौरन लागू कराने के लिए मत-विभाजन की माँग क्यों नहीं कर पाए? खुशी की बात है कि मंडलवादी पार्टियों ने इसे स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने ओबीसी कोटा की माँग की, जबकि इसके पहले वह इसके लिए तैयार नहीं थी।

Thursday, September 21, 2023

फलस्तीन के समाधान जुड़ा है प.एशिया कॉरिडोर


जी-20 की बैठक के दौरान भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर की घोषणा तो हो गई, पर विशेषज्ञों के मन में इसकी सफलता को लेकर कुछ संदेह हैं. सबसे बड़ा संदेह फलस्तीन की समस्या को लेकर है. जब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा, इस कॉरिडोर की सफलता में संदेह बने रहेंगे.

प्रस्तावित कॉरिडोर का एक सिरा इसरायल के हाइफ़ा तक जाएगा, जहाँ से वह यूरोप का रास्ता पकड़ेगा. जब तक इसराइल और अरब देशों, खासतौर से सऊदी अरब की सहमति नहीं होगी, तबतक हाइफ़ा को कॉरिडोर में शामिल करने की कल्पना नहीं की जा सकती है.

फलस्तीनियों से संवाद

खबरें इस आशय की भी हैं कि अमेरिकी मध्यस्थता में सऊदी अरब और इसराइल के बीच संबंध सामान्य करने को लेकर संभावित ऐतिहासिक समझौते में फ़लस्तीनियों ने अरबों डॉलर और जॉर्डन नदी के पश्चिमी किनारे में इसराइल के पूर्ण कब्ज़े वाली ज़मीन पर नियंत्रण की मांग रखी है.

इस आशय की एक खबर आई थी कि बुधवार 4 सितंबर को रियाद में फ़लस्तीन अथॉरिटी और सऊदी अरब के अधिकारियों के बीच वार्ता हुई. और यह भी कि जल्द ही अमेरिकी अधिकारियों से उनकी मुलाकात होने वाली है.

Sunday, September 17, 2023

ग्लोबल सप्लाई-चेन का हब बनेगा भारत


जी-20 के शिखर-सम्मेलन में भारत को मिली सफलताओं से भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ संभावनाएं पैदा हुई हैं। पिछले साल अप्रेल में बेंगलुरु में आयोजित तीन दिन के सेमीकॉन इंडिया कॉन्फ्रेंस-2022 के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, भारत आने वाले समय में सेमीकंडक्टर का हब बनेगा। प्रधानमंत्री ने उन कुछ कारणों को गिनाया जिनकी वजह से भारत सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी के लिए एक आकर्षक मुकाम होगा। बुनियादी डिजिटल ढांचे का निर्माण और अगली टेक-क्रांति का रास्ता भारत तैयार कर रहा है। 5जी, आईओटी और क्लीन एनर्जी-टेक का विस्तार हो रहा है। हमारे पास दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला स्टार्टअप इको-सिस्टम है। 21वीं सदी की जरूरतों के लिए हम युवा-कौशल प्रशिक्षण में भारी निवेश कर रहे हैं। हमारे पास दुनिया के 20 फीसदी सेमीकंडक्टर डिजाइन इंजीनियरों का असाधारण टेलेंट पूल है। दुनिया की शीर्ष 25 कंपनियों के सेमीकंडक्टर डिजाइन सेंटर हमारे यहाँ हैं। जब सारी दुनिया महामारी से लड़ रही थी, भारत न केवल लोगों के, बल्कि अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य को सुधार रहा था और उसने विनिर्माण के अपने इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी बदलाव किए हैं।

आसन्न बदलाव

सवा साल पहले कही गई उस बात पर काफी लोगों ने ध्यान नहीं दिया, पर इस विषय पर नज़र रखने वालों ने उसके पहले देख लिया था कि ग्लोबल सप्लाई-चेन में बदलाव आने वाला है। इसके पीछे एक वजह चीन की बढ़ती आक्रामकता है। पिछले तीन दशकों में पश्चिमी देशों ने चीन में भारी निवेश और तकनीकी हस्तांतरण करके उसे वैश्विक सप्लाई-चेन का हब तो बना दिया, पर उसके भू-राजनीतिक निहितार्थ पर ध्यान नहीं दिया। चीन ने सबको आँखें दिखानी शुरू कर दी हैं। सप्लाई चेन का मतलब है कि चीन का वैश्विक-कारखाने के रूप में तब्दील हो जाना। यह केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें उत्पादन के विभिन्न चरण शामिल होते हैं। मसलन डिजाइन, असेंबली, मार्केटिंग, प्रोडक्शन और सर्विसिंग वगैरह। ये उत्पाद दूसरे उत्पादों के लिए सहायक होते हैं। मसलन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का विकास इस चेन पर निर्भर करता है। इससे दुनिया को सस्ता माल मिलेगा और इन कार्यों पर लगी पूँजी पर बेहतर मुनाफा।

Thursday, September 14, 2023

हिंदी का विस्तार और आपकी भूमिका


हर साल हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस का समारोह मनाते हैं। हालांकि यह हिंदी के सरकारीकरण का दिन है, फिर भी बड़ी संख्या में लोगों का अपनी भाषा से प्रेम इस बहाने व्यक्त होता है। खासतौर से सरकारी दफ्तरों में तमाम लोग हिंदी के काम को व्यक्तिगत प्रयास से और बड़े उत्साह के साथ करते हैं। बेशक वाचिक भाषा के रूप में हिंदी का विस्तार हुआ है। यानी कि मनोरंजन, खेल और राजनीति की भाषा वह बनी है। वह पैन इंडियन भाषाभी बन गई है। मतलब मुंबइया, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबादी हिंदी की शैलियाँ बनती जा रही हैं। पर ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में उसका वैसा विकास नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों नहीं हुआ।

खबरिया और मनोरंजन चैनलों की वजह से हिंदी जानने वालों की तादाद बढ़ी है। हिंदी सिनेमा की वजह से तो वह थी ही। सच यह भी है कि हिंदी की आधी से ज्यादा ताकत गैर-हिंदी भाषी जन के कारण है। गुजराती, मराठी, पंजाबी, बांग्ला और असमिया इलाकों में हिंदी को समझने वाले काफी पहले से हैं। भारतीय राष्ट्रवाद को विकसित करने में हिंदी की भूमिका को सबसे पहले बंगाल से समर्थन मिला था। 1875 में केशव चन्द्र सेन ने अपने पत्र ’सुलभ समाचार’ में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने की बात उठाई थी।

बंकिम चन्द्र चटर्जी भी हिंदी को ही राष्ट्रभाषा मानते थे। महात्मा गांधी गुजराती थे, फिर भी दक्षिण अफ्रीका से उन्होंने अंग्रेजी में अपना अखबार निकाला, तो उसमें हिंदी, तमिल और गुजराती को भी जगह दी। दो पीढ़ी पहले के हिंदी के श्रेष्ठ पत्रकारों में अमृत लाल चक्रवर्ती, माधव राव सप्रे, बाबूराव विष्णु पराडकर, लक्ष्मण नारायण गर्दे, सिद्धनाथ माधव आगरकर और क्षितीन्द्र मोहन मित्र जैसे अहिंदी भाषी थे।

जैसे-जैसे हिंदी का विस्तार हो रहा है, उसके अंतर्विरोध भी सामने आ रहे हैं। दक्षिण के लोगों को भी समझ मे आ गया है कि बच्चों के बेहतर करिअर के लिए हिंदी का ज्ञान भी ज़रूरी है। इसलिए नहीं कि हिंदी में काम करना है। इसलिए कि हिंदी इलाके में नौकरी करनी है तो उधर की भाषा का ज्ञान होना ही चाहिए। हिंदी की जानकारी होने से एक फायदा यह होता है कि किसी तीसरी भाषा के इलाके में जाएं और वहाँ अंग्रेजी जानने वाला भी न मिले तो हिंदी की मदद मिल जाती है। पर राजनीतिक कारणों से उसका विरोध भी होता है।

हिंदी को आज पूरे देश का स्नेह मिल रहा है और उसे पूरे देश को जोड़ पाने वाली भाषा बनने के लिए जिस खुलेपन की ज़रूरत है, वह भी उसे मिल रहा है। यानी भाषा में शब्दों, वाक्यों और मुहावरों के प्रयोगों को स्वीकार किया जा रहा है। पाकिस्तान को और जोड़ ले तो हिंदी या उर्दू बोलने-समझने वालों की संख्या बहुत बड़ी है। यह इस भाषा की ताकत है।

पश्चिम-एशिया कॉरिडोर में होगी पश्चिमी-प्रतिबद्धता की परीक्षा


जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि शीघ्र ही भारत से पश्चिम एशिया के रास्ते से होते हुए यूरोप तक एक कनेक्टिविटी कॉरिडोर के निर्माण का कार्य शुरू होगा. इस परियोजना में शिपिंग कॉरिडोर से लेकर रेल लाइनों तक का निर्माण किया जाएगा. सैकड़ों साल पुराना भारत-अरब कारोबारी माहौल फिर से जीवित हो रहा है.

इस परियोजना में दो कॉरिडोर बनेंगे. एक पूर्वी कॉरिडोर, जो भारत से जोड़ेगा और दूसरा उत्तरी (या पश्चिमी) कॉरिडोर, जो यूरोप तक जाएगा. इसके पहले ईरान और मध्य एशिया के देशों के रास्ते यूरोप तक जाने वाले उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर पर भी काम चल रहा है. उसमें भी भारत की भूमिका है, पर ईरान और रूस के कारण पश्चिमी देशों की भूमिका उस कार्यक्रम में नहीं है.

एशिया में प्रतिस्पर्धा

पश्चिम एशिया में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास उस परियोजना का हिस्सा नहीं जरूर नहीं है, पर चीन की दिलचस्पी भी इस इलाके में है और हाल में चीन ने ईरान, सऊदी अरब और यूएई के साथ संबंधों को प्रगाढ़ किया है. एक तरह से यह चीन के बीआरआई और पश्चिम के बी3डब्लू (बिल्ड बैक बैटर वर्ल्ड) के बीच प्रतियोगिता होगी.

Tuesday, September 12, 2023

वैश्विक-मंच पर भारत के आगमन का संदेश


सम्मेलन का समापन हो गया. अब कोई कार्यक्रम नहीं है, सिर्फ प्रतिक्रियाएं हैं. सम्मेलन के निष्कर्ष और निहितार्थ भी धीरे-धीरे समझ में आ रहे हैं. कुछ मेहमान अभी रुके हुए हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं सऊदी अरब के शहज़ादे मोहम्मद बिन सलमान अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद.

आज उनके साथ पीएम मोदी की द्विपक्षीय बातचीत हुई है. यह वार्ता दोनों देशों के दीर्घकालीन सहयोग का संकेत दे रही है. एक दिन का यह दौरा दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत करेगा.

कुल मिलाकर वैश्विक मंच पर यह भारत के आगमन की घोषणा है. वैसे ही जैसे 2008 के ओलिंपिक खेलों के साथ चीन का वैश्विक मंच पर आगमन हुआ था. पर्यवेक्षकों की आमतौर पर प्रतिक्रिया है कि भारत में हुआ शिखर सम्मेलन और भारतीय अध्यक्षता कई मायनों में अभूतपूर्व रही है.

ऐसा मानने के दो कारण हैं. एक, आयोजन की भव्यता और दूसरे, ऐसे दौर में जब दुनिया में कड़वाहट बढ़ती जा रही है, सभी पक्षों को संतुष्ट कर पाने में सफल होना. भारत ने जी-20, जी-7, ईयू, रूस और चीन जैसे विभिन्न हितधारकों के बीच अधिकतम सहमतियाँ बनाने की कोशिश की है.

Monday, September 11, 2023

त्वरित-सर्वानुमति ने दिल्ली-सम्मेलन का क्लाइमैक्स बदला


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिखर सम्मेलन के अंतिम दिन प्रतीक रूप में व्यवस्था-दंड (गैवेल) राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो दा सिल्वा को सौंपते हुए जी-20 की अध्यक्षता अगले वर्ष के लिए ब्राज़ील को सौंप दी. भारत-मंडपम में सम्मेलन क तीसर सत्र एक भविष्य के साथ ही दिल्ली-सम्मेलन का समापन हो गया.

समापन के साथ पीएम मोदी ने नवंबर में जी-20 के एक वर्चुअल शिखर सम्मेलन का प्रस्ताव भी किया है, जिसमें दिल्ली सम्मेलन के फैसलों और सुझावों की समीक्षा की जाए. जी-20 की अध्यक्षता 30 नवंबर तक भारत के पास है. इसका अर्थ है कि अभी भारत के पास करीब ढाई महीने और हैं.

जिस दिल्ली-घोषणा को लेकर कई तरह के कयास थे, वह अंतिम दिन जारी होने के बजाय, पहले दिन ही ज़ारी हो गई. इससे शिखर-सम्मेलन का पूरा क्लाइमैक्स ही बदल गया. सम्मेलन के दूसरे दिन दुनिया की निगाहें, भू-राजनीति के बजाय जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसे मसलों पर टिक गईं.

जलवायु परिवर्तन

ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने शिखर सम्मेलन में घोषणा की कि जलवायु परिवर्तन के कारण विपरीत परिस्थितियों का सामना कर रहे विकासशील देशों की सहायता के लिए ब्रिटेन ग्रीन क्लाइमेट फंड (जीसीएफ) में दो अरब डॉलर का योगदान करेगा. यह धनराशि यूके की ओर से अब तक का सबसे बड़ा सिंगल फंडिंग’  योगदान है.

शिखर-सम्मेलन का दूसरा दिन अपेक्षाकृत तनाव-मुक्त था. एक भविष्य विषय पर तीसरा सत्र सुबह 10 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक हुआ, जिसके बाद सम्मेलन का समापन हो गया. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन इस सत्र में शामिल नहीं हुए और वे अपने एयरफोर्स वन विमान पर बैठकर हनोई चले गए, जहाँ वे वियतनाम के नेताओं से भेंट कर रहे हैं.

Sunday, September 10, 2023

दिल्ली-घोषणा से साबित हुआ भारत का राजनयिक-कौशल


लीडर्स घोषणा पत्र पर आमराय बन जाने के साथ जी-20 का नई दिल्ली शिखर सम्मेलन पहले दिन ही पूरी तरह से सफल हो गया है. यूक्रेन-युद्ध प्रसंग सबसे जटिल मुद्दा था, जिसका बड़ी खूबसूरती से हल निकाल लिया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद आमराय की जानकारी शिखर-सम्मेलन में दी. उन्होंने कहा, हमारी टीम के हार्ड वर्क से और आप सभी के सहयोग से नई दिल्ली जी-20 लीडर्स घोषणा पत्र पर आम सहमति बनी है.

राजनीतिक-दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप से जुड़ने की जिस महत्वाकांक्षी-योजना की घोषणा की है, वह एक बड़ा डिप्लोमैटिक-कदम है. इस परियोजना में भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, यूरोपियन संघ, फ्रांस, इटली और जर्मनी शामिल होंगे.

वैश्विक-भरोसा कायम करने में सफल जी-20


लीडर्स घोषणा पत्र पर आमराय बन जाने के साथ जी-20 का नई दिल्ली शिखर सम्मेलन पूरी तरह से सफल हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा, हमारी टीम के हार्ड वर्क से और आप सभी के सहयोग से नई दिल्ली जी-20 लीडर्स घोषणा पत्र पर आम सहमति बनी है। घोषणापत्र पर आमराय बनना और अफ्रीकन यूनियन को समूह का इक्कीसवाँ सदस्य बनाना इस सम्मेलन की उपलब्धियाँ हैं। ऐसा लगता है कि भारत की सहायता करने के लिए पश्चिमी देशों ने अपने रुख में थोड़ी नरमी भी बरती है। 

सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत हालांकि शनिवार को हुई, पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के भारत की ज़मीन पर आगमन के साथ ही समां बन गया था। हवाई जहाज से उतरते ही वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर पहुँचे, जो अपने आप में असाधारण गतिविधि है। देर रात हुई द्विपक्षीय-वार्ता और उसके बाद ज़ारी संयुक्त बयान से भारत-अमेरिका रिश्तों, वैश्विक-राजनीति की दिशा और जी-20 की भूमिका इन तीनों बातों पर रोशनी पड़ी है। सम्मेलन का मूल-स्वर इसी मुलाक़ात से स्थिर हुआ है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अनुपस्थिति ने कुछ अनिश्चय जरूर पैदा किए, पर सम्मेलन सफल हो गया।

जी-20 से आगे वैश्विक-मंच पर भारत की संभावनाएं


भारत-उदय-08

पिछले साल 1 दिसंबर को जब जी-20 समूह की अध्यक्षता एक साल के लिए भारत के पास आई थी, तभी स्पष्ट था कि यह अध्यक्षता बड़े चुनौती भरे समय में भारत को मिली है. दुनिया तेजी से दो ध्रुवों में बँटती जा रही है. बाली सम्मेलन में घोषणापत्र की शब्दावली को तय कर पाना मुश्किल हो गया था.

अब दिल्ली शिखर सम्मेलन में शी चिनफिंग और व्लादिमीर पुतिन की अनुपस्थिति से वैश्विक-एकता और सहयोग के प्रयासों को एकबारगी धक्का लगा है. सम्मेलन में वैश्विक-सर्वानुमति बना पाने में दिक्कतें हैं. उससे ज्यादा बड़ा खतरा जी-20 के विभाजन का है.

शी चिनफिंग की भी वैश्विक राजनीति में भूमिका कमज़ोर होगी और आंतरिक-राजनीति में भी आलोचना झेलनी होगी. उनका निशाना भारत नहीं अमेरिका है. अलबत्ता इसी सम्मेलन में भारत के भावी राजनय की दिशा स्पष्ट हो रही है.

दबाव में चीन

चीन भी दबाव में है. शी चिनफिंग का नहीं आना, चीन की निराशा को व्यक्त कर रहा है. जी-7 की तुलना में जी-20 का आधार ज्यादा बड़ा है. संयुक्त राष्ट्र को अलग कर दें, तो जी-20 ही ऐसे व्यापक आधार वाला समूह है. इसमें रूस-चीन और पश्चिमी देश आमने-सामने बैठ सकते हैं. इस प्रकार का दूसरा कोई समूह नहीं है.  

Saturday, September 9, 2023

जरूरी है सुरक्षा-परिषद की स्थायी-सदस्यता


भारत-
उदय-07

हाल में जोहानेसबर्ग में हुए ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र में दूसरी बातों के अलावा यह भी कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की ज़रूरत है. हम मानते हैं कि सुरक्षा परिषद को ज्यादा लोकतांत्रिक, और दक्ष बनाने के लिए इसमें सुधार करना और विकासशील देशों को इसका सदस्य बनाना जरूरी है.

घोषणापत्र में यह भी कहा गया है कि यह काम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की वाजिब आकांक्षाओं को पूरा करने और वैश्विक-मसलों में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाने में मदद कर पाएगा, जिनमें  ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं.  

चूंकि चीन भी ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है, इसलिए इससे एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चीन ने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर दिया है. ऐसा लगता है कि ब्रिक्स के विस्तार के लिए चीन ने भारत का समर्थन हासिल करने के लिए घोषणापत्र में इसे शामिल करने पर सहमति दी होगी.

बहरहाल इतने मात्र से चीनी समर्थन तब तक नहीं मान लेना चाहिए, जब तक इस आशय की घोषणा उसकी ओर से नहीं हो जाए. पाकिस्तान के साथ उसके रिश्तों को देखते हुए अभी कई प्रकार के किंतु-परंतु बीच में हैं.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सुरक्षा परिषद के स्थायी-सदस्य वे देश हैं, जो दूसरे विश्व-युद्ध में मित्र देश थे और जिन्होंने मिलकर लड़ाई लड़ी. ये देश हैं अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन. 1945 में मूल रूप से तय हुआ था कि सुरक्षा-परिषद के 11 सदस्य होंगे. पाँच स्थायी और छह अस्थायी.

1963 में संरा महासभा ने चार्टर में बदलाव की सिफारिश की. यह बदलाव 31 अगस्त, 1965 से लागू हुआ और सदस्यता 11 से बढ़कर 15 हो गई. अस्थायी सदस्यों में पाँच अफ्रीका और एशिया से, एक पूर्वी यूरोप से, दो लैटिन अमेरिका से और दो पश्चिमी यूरोप या अन्य क्षेत्रों से.

Friday, September 8, 2023

‘सुपर-पावर’ बनने के द्वार पर भारत


भारत-उदय-06

भारत की आर्थिक-प्रगति और वैश्विक-मंचों पर उसकी भूमिका को देखते हुए यह कहा जाने लगा है कि भारत आज नहीं तो कल सुपर-पावर होगा. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वह अगले दशक में और कुछ मानते हैं कि 2025 तक सुपर-पावर की श्रेणी में आ जाएगा. कुछ मानते हैं कि वह सुपर-पावर है.  

पहला सवाल यही होना चाहिए कि सुपर-पावर से आपका मतलब क्या है? सच यह है कि किसी भी देश का सम्मान केवल उसके उदात्त आदर्शों के कारण नहीं होता. उसके दो तत्व बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. एक, राष्ट्रीय हितों की पूर्ति और दूसरा राष्ट्रीय-शक्ति. कमजोर देश अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर सकते. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रसिद्ध अध्येताओं में एक हैंस जोकिम मॉर्गेनथाऊ ने इसीलिए राष्ट्रीय शक्ति को यथार्थ से जोड़ने का सुझाव दिया था.

Wednesday, September 6, 2023

ठंडा क्यों पड़ा दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय-सहयोग?

 


भारत-उदय-05

भारतीय विदेश-नीति की सबसे बड़ी परीक्षा अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे रिश्ते कायम करने में है. दुर्भाग्य से अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम कुछ इस प्रकार घूमा है कि दक्षिण एशिया की घड़ी की सूइयाँ अटकी रह गई हैं. भारत ने दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय एकीकरण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ‘नेबरहुड फर्स्ट नीति’ को अपनाया है. ‘नेबरहुड फर्स्ट’ का अर्थ अपने पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देने से है.

इस उदार दृष्टिकोण के बावजूद दक्षिण एशिया दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल है, जहाँ क्षेत्रीय-सहयोग सबसे कम है. हम आसियान के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट कर सकते हैं, पर दक्षिण एशिया में उससे कहीं कमतर समझौता भी पाकिस्तान से नहीं कर सकते. 1985 में बना दक्षिण एशिया सहयोग संगठन (दक्षेस) आज ठंडा पड़ा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कश्मीर.

पश्चिम एशिया का बदलता परिदृश्य और भारत

 


भारत का उदय-04

दक्षिण अफ्रीका में हुए ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में छह नए देशों को सदस्यता देने का फैसला हुआ है. अब अगले साल अर्जेंटीना, इथोपिया, ईरान, मिस्र, सऊदी अरब और यूएई भी ब्रिक्स के सदस्य बन जाएंगे. इन छह में से चार मुस्लिम देश हैं, जिनके साथ भारत के परंपरागत रूप से बहुत अच्छे रिश्ते हैं. फिर भी हमें बदलती परिस्थितियों को समझने की जरूरत होगी.

ईरान और सऊदी अरब को ब्रिक्स में शामिल करने के पीछे चीन की भूमिका है, जिसने इन दोनों देशों के बिगड़े रिश्तों को ठीक किया है. चीन ने इस इलाके में अपनी गतिविधियाँ तेज की हैं. यूएई और सऊदी अरब तथा इस इलाके के दूसरे देशों की दिलचस्पी तेल की अर्थव्यवस्था से हटकर नए कारोबारों में पूँजी निवेश करने की है.

इन देशों के हमारे साथ भी रिश्ते इसीलिए अच्छे हैं. दुनिया में आ रहे तकनीकी, कारोबारी और भू-राजनीतिक बदलावों के साथ हमें भी कदम मिलाकर चलने की जरूरत है.

Tuesday, September 5, 2023

हिंद-प्रशांत और ‘एक्ट-ईस्ट पॉलिसी’ का केंद्र-बिंदु आसियान


 भारत-उदय-03

हाल के वर्षों में भारतीय विदेश-नीति में सबसे ज्यादा हिंद-प्रशांत शब्द का इस्तेमाल हुआ है. इसकी वजह को समझने की कोशिश करनी चाहिए. हिंद-प्रशांत विशाल भौगोलिक-क्षेत्र है, जिसका कुछ हिस्सा भारत के पश्चिम में है, पर ज्यादातर हिस्सा पूर्व में है. पूर्व में भारत की दिलचस्पी के दो कारण हैं. एक, कारोबार और दूसरा चीनी-विस्तार को रोकना.

भारत का आसियान के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट है. और अब हम अलग-अलग देशों के साथ आर्थिक सहयोग के समझौते भी कर रहे हैं. पर यह हमेशा याद रखना चाहिए कि आर्थिक शक्ति की रक्षा के लिए सामरिक शक्ति की ज़रूरत होती है.

भारत को किसी देश के खिलाफ यह शक्ति नहीं चाहिए. हमारे जीवन में दूसरे शत्रु भी हैं. सागर मार्गों पर डाकू विचरण करते हैं. आतंकवादी भी हैं. इसके अलावा कई तरह के आर्थिक माफिया और अपराधी हैं. इन्हीं बातों के संदर्भ में भारत को अपने राष्ट्रीय-हितों की रक्षा करने के लिए तैयार रहना है.

Monday, September 4, 2023

भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और जी-20

 


भारत-उदय-02

दिल्ली में हो रहे शिखर सम्मेलन में रूस और चीन की भूमिकाओं को लेकर कई तरह के संदेह हैं, पर कुछ नई बातें भी हो रही हैं. भारत ने पहल करके अफ्रीकन यूनियन को जी-20 की पूर्ण-सदस्यता की पेशकश की है. इस प्रकार दुनिया की एक बड़ी आबादी को जी-20 के साथ जुड़कर अपने विकास का मौका मिलेगा. जी-20 की सदस्यता देश या संगठन की वैधानिकता और प्रभाव को व्यक्त करती है और उसे बढ़ाती भी है.

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के दौरान दुनिया की सुरक्षा केवल सैनिक-संघर्षों को टालने तक की मनोकामना तक सीमित थी. पिछले सात दशकों में असुरक्षा का दायरा क्रमशः बड़ा होता गया है. आर्थिक-असुरक्षा या संकट इनमें सबसे बड़े हैं. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण ऐसा क्षेत्र है, जिसका विस्तार वैश्विक है. हाल के वर्षों में इंटरनेट से जुड़े हमलों और अपराधों के कारण सायबर-सुरक्षा एक और नया विषय सामने आया है.

जी-20 का गठन मूलतः आर्थिक-संकटों का सामना करते हुए हुआ है. पर उसका दायरा बढ़ रहा है. दुनिया के 19 देशों और यूरोपियन यूनियन का यह ग्रुप-20 दुनिया की 85 फीसदी अर्थव्यवस्था और करीब दो तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, पर  अभी तक इसमें अफ्रीका महाद्वीप से केवल दक्षिण अफ्रीका ही इस ग्रुप का सदस्य है.

Sunday, September 3, 2023

चीन का नया नक्शा और नक्शेबाज़ी


गत 28 अगस्त को अपने चीन ने अपने राष्ट्रीय मानचित्र का नया संस्करण प्रकाशित किया है, जिसमें उसने अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को अपना हिस्सा बताया है। इस नक्शे में समूचे दक्षिण चीन सागर को भी चीनी सीमा के भीतर दिखाया गया है, जिसकी वजह से भारत के अलावा  फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम और ताइवान की सरकारों ने भी आपत्ति व्यक्त की है। उन्होंने कड़े शब्दों में आरोप लगाया है कि चीन उनके इलाकों पर दावा कर रहा है। फिलीपींस ने 2013 में चीन के राष्ट्रीय मानचित्र के प्रकाशन का विरोध भी किया था, जिसमें कलायान द्वीप समूह या स्प्राटली के कुछ हिस्सों को चीन की राष्ट्रीय सीमा के भीतर रखा गया था। चीनी नक्शा अचानक जारी नहीं हो गया है। पिछले कई वर्षों से जो बात मुँह-जुबानी कही जा रही थी, उसे अब उसने आधिकारिक रूप से जारी कर दिया है। 

अपने आर्थिक-विकास की बिना पर चीन ने न केवल सामरिक-शक्ति का खुला प्रदर्शन शुरू कर दिया है, बल्कि अपने नेतृत्व में एक नई विश्व-व्यवस्था बनाने की घोषणा भी की है। इसके लिए उसने अमेरिका से सीधा टकराव मोल ले लिया है। यूक्रेन में रूसी सैनिक-कार्रवाई के बाद से नए शीत-युद्ध की स्थितियाँ पैदा हो गई हैं। यह टकराव ताइवान में सैनिक-टकराव के अंदेशों को जन्म दे रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने इस हफ्ते दिल्ली में हो रहे जी-20 शिखर सम्मेलन से अलग रहने का इशारा करके भी भारत पर दबाव डालने की कोशिश की है। पुतिन भी इस सम्मेलन में नहीं आएंगे। हालांकि पुतिन के नहीं आने के पीछे भारत से जुड़ी वजह नहीं है, पर इतना स्पष्ट है कि भारत उस पाले में नहीं है, जिस पाले में रूस और चीन हैं। हालांकि आज की परिस्थितियाँ शीत-युद्ध के दौर जैसी नहीं है और आज का भारत पचास के दशक जैसा भारत भी नहीं है।

व्यापारिक-युद्ध

अमेरिका के साथ चीन का व्यापारिक-युद्ध भी चल रहा है। इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था ने अपने आपको वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अच्छी तरह जोड़ लिया है, इसलिए उसका अलगाव आसान नहीं है। अमेरिका भी आज उतनी बड़ी ताकत नहीं है कि चीन को दबाव में ले सके। इसके साथ चीन ने कई तरह के कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनमें बॉर्डर रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) एक महत्वपूर्ण पहल है। उसने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया में अपने लिए दोस्त खोजने शुरू किए हैं। पाकिस्तान में ग्वादर के बंदरगाह का विकास वह कर ही रहा है। कई तरह के विवादों के बावजूद सीपैक पर उसका काम चल रहा है। इस बहाने पाक अधिकृत कश्मीर के कुछ हिस्सों में उसके सैनिक भी तैनात हैं। 

चीन की आक्रामक-नीतियों के कारण भारत का झुकाव धीरे-धीरे पश्चिमी देशों की ओर हो रहा है। भारत ने वैश्विक सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का फैसला किया है, जिसका मतलब है कि चीन के साथ कारोबार में कमी आएगी। यह काम बहुत जल्दी संभव नहीं है, पर अब जरूरी हो गया है। अमेरिका ने भी फंदा कसना शुरू कर दिया है, जिसकी वजह से चीनी अर्थव्यवस्था में अचानक तेजी से गिरावट आ रही है। चीन ने इस दबाव के जवाब में पश्चिम एशिया में सऊदी अरब, ईरान और यूएई को अपने पाले में खींचने के प्रयास किए हैं, जिसमें उसे सफलता भी मिली है। दूसरी तरफ पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और फ्रांस की यात्राओं और एससीओ के शिखर सम्मेलन से भारतीय विदेश-नीति की दिशा स्पष्ट होने लगी है। पश्चिमी देशों के साथ भारत अपने सामरिक और आर्थिक रिश्तों को मजबूत कर रहा है।  

Saturday, September 2, 2023

गठबंधन ‘इंडिया’ का सबसे बड़ा काम शुरू होगा अब


भारत के 28 विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ ने शुक्रवार को मुंबई में आयोजित बैठक के दौरान आगामी लोकसभा चुनाव से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा करने के बाद तीन प्रस्ताव पास किए। पहला, सीट बँटवारे की प्रक्रिया जल्द ही पूरी की जाएगी, दूसरा, इंडिया के घटक दल जनता के मुद्दों पर देश के अलग-अलग हिस्सों में जनसभाएं करेंगे और तीसरा, इंडिया के सभी घटक दलों का अपना चुनाव अभियान जुड़ेगा भार औरजीतेगा इंडिया की थीम पर होगा। इनमें पहला काम सबसे बड़ा और जरूरी होगा। शेष दो काम किसी न किसी रूप में चल ही रहे हैं।

इस बैठक में चार समितियां बनाने का फ़ैसला किया गया है। ‘इंडिया गठबंधन’ की कोऑर्डिनेशन समिति में 1.केसी वेणु गोपाल, 2.शरद पवार, 3.टीआर बालू, 4.संजय राउत, 5.डी राजा, 6.तेजस्वी यादव, 7.अभिषेक बनर्जी, 8.राघव चड्ढा, 9.जावेद अली ख़ान, 10.ललन सिंह, 11.हेमंत सोरेन, 12.महबूबा मुफ्ती और 13.उमर अब्दुल्ला को जगह दी गई है। सीपीएम अपने प्रतिनिधि का नाम बाद में देगी। इस कमेटी के अलावा चार और कमेटियाँ बनेंगी कैम्पेन कमेटी, मीडिया, सोशल मीडिया और रिसर्च। किसी एक कोऑर्डिनेटर की नियुक्ति फिर भी नहीं हुई है। ऐसा करने के शायद जोखिम हैं।

गठबंधन ने पहले कहा था कि एक लोगो भी जारी किया जाएगा, पर ऐसा किया नहीं गया। तृणमूल कांग्रेस ने एक लोगो का सुझाव दिया था, पर कुछ दलों ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। इस बैठक में दिग्विजय सिंह ईवीएम को लेकर एक प्रेज़ेंटेशन रखने वाले थे, पर उसे रोक दिया गया। कुछ लोगों ने कहा कि नकारात्मक बातें इस समय करना उचित नहीं होगा। हाल में कांग्रेस की कर्नाटक में भारी जीत हुई है, ईवीएम के बावजूद।

‘हार्ड’ और ‘सॉफ्ट’ ताकतों से लैस ‘नया भारत’


भारत-उदय
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जी-20 में भारतीय अध्यक्षता का समापन एक नए शीतयुद्ध के प्रस्थान-बिंदु के रूप में हो रहा है. दुनिया फिर से दो ध्रुवों में बँट रही है और उसपर यूक्रेन-युद्ध की छाया है. दिल्ली में हो रहा शिखर सम्मेलन भारत के बढ़ते महत्व को रेखांकित कर रहा है. अलबत्ता उसके धैर्य, विवेक और संतुलन की परीक्षा भी यहाँ होगी.

भारत की भूमिका दो पक्षों के बीच में रहते हुए शांति की राह पर ले जाने वाले मार्ग-दर्शक की है, पर यह पचास के दशक क गुट-निरपेक्ष भारत नहीं है. तब हमारी राज्य-शक्ति सीमित थी. हम केवल नैतिक-शक्ति के सहारे थे. आज हम शक्ति के हार्ड और सॉफ्ट दोनों तत्वों से लैस हैं. दुनिया की महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों में भारत की गिनती अब हो रही है. और भविष्य की दिशा बता रही है कि भारत अब दुनिया का नेतृत्व करेगा.

महाशक्ति की दिशा

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और टिप्पणीकार मार्टिन वुल्फ ने हाल में ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित अपने एक कॉलम में लिखा है कि भारत महाशक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है और 2050 तक भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिका के बराबर पहुँच जाएगी. वे मानते हैं कि बेहतर नीतियों के साथ, यह वृद्धि और भी अधिक हो सकती है.

हाल में चंद्रयान-3 की विजय के बाद पश्चिमी देशों ने भी माना कि आज का स्वाधीन भारत वैश्विक-मंच पर महाशक्ति के रूप में उभर रहा है. नए की परिकल्पना हमेशा रहती है, पर युगांतरकारी मोड़ कभी-कभी आते हैं. भारत में हो रहा जी-20 का शिखर सम्मेलन ऐसे ही एक अवसर की गवाही दे रहा है.

भारत के अंतरिक्ष-कार्यक्रम का इस्तेमाल सार्वजनिक शिक्षा, जनसंचार, मौसम की जानकारी और आपदा-नियंत्रण में हुआ है. समावेशी विकास की यह कहानी जी-20 शिखर सम्मेलन के समानांतर चलेगी. भारत की फोन कॉल, डिजिटल प्रणाली यानी कि इंटरनेट वगैरह दुनिया में सबसे सस्ते हैं. इसका विस्तार हो रहा है, जिससे गरीबों और महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है.