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Sunday, October 18, 2026

सोशल-मीडिया पर विमर्श


सोशल-मीडिया का जन्म किसी स्वस्थ विमर्श को बढ़ावा देने के लिए नहीं हुआ है। वह सामान्य संपर्क और यारी-दोस्ती के संपर्कों के लिए शुरू हुआ था। पर अब यह न केवल विमर्श, बल्कि सूचना-समाचार के माध्यम के रूप में भी तैयार हो गया है। यह विकास कहाँ तक जाएगा, अभी कहना मुश्किल है। पर इसके कथ्यों और तथ्यों पर विचार करना संभव है।

बहरहाल जब मेरे या आपके किसी विचार पर ध्यान देने के बजाय लोग उन्हें व्यक्त करने वालों की राजनीतिक वफादारी का अनुमान लगाने लगें, तब यकीनन खुले विमर्श की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। बेशक व्यक्तिगत धारणाएँ किसी भी विमर्श या विश्लेषण को प्रभावित करती हैं, पर बौद्धिक वस्तुनिष्ठता का तकाज़ा होता है कि आप अपने तर्कों और तथ्यों को विवाद की संभावनाओं से जितना दूर रख सकें, उतना बेहतर है।

मतभेद, स्वस्थ समाज का परिचय देते हैं। इसमें आमराय हमेशा संभव नहीं है, पर आमराय भी होती है। यदि बात को सही तरीके से रखा जाए, तो कुछ लोग अपनी धारणाओं को बदलते भी हैं। अपने विचारों पर दृढ़ रहना या तो अत्यधिक समझे-सुलझे व्यक्ति के लिए संभव है या अल्पज्ञानी के लिए। परिधि पर खड़े लोगों के मन में संशय होते हैं। वे एकदम से किसी एक पक्ष के साथ नहीं जाते। अपेक्षाकृत अपनी वैचारिक दृढ़ता को परखने के लिए प्रतिस्पर्धी विचार को समझने की कोशिश भी होनी चाहिए।

सोशल मीडिया में ट्रोल शब्द का चलन है, जिसमें उपहास या उपेक्षा का भाव है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि जो लोग एक-दूसरे को करीब से कम जानते हैं, या एकदम अपरिचित हैं, तब उनकी प्रतिक्रिया पथरीली होती है। ट्रोलिंग पथरीली प्रतिक्रिया है।

Tuesday, January 29, 2013

विमर्श-विहीनता, विश्वरूपम से आशीष नन्दी तक



संयोग है कि आशीष नन्दी का प्रकरण तभी सामने आया, जब ‘विश्वरूपम’ पर चर्चा चल रही थी। आशीष नंदी विसंगतियों को उभारते हैं। यह उनकी तर्क पद्धति है। वे मूलतः नहीं मानते कि पिछड़े और दलित भ्रष्ट हैं, जैसा कि उनकी बात के एक अंश को सुनने से लगता है। वे मानते हैं कि देश के प्रवर वर्ग का भ्रष्टाचार नज़र नहीं आता। यह जयपुर लिटरेरी फोरम के मंच पर कही गई गई थी। आशीष नन्दी से असहमति प्रकट करने के तमाम तरीके मौज़ूद हैं। पर सीधे एफआईआर का मतलब क्या है? एक मतलब यह कि विमर्श का नहीं कार्रवाई का विषय है। कार्रवाई होनी चाहिए। बेहतर हो कि इस बहस को आगे बढ़ाएं, पर उसके पहले वह माहौल तो बनाएं जिसमें कोई व्यक्ति कुछ कहना चाहे तो वह कह सके।