Monday, May 31, 2021

पिछले वर्ष का जीडीपी संकुचन 7.3 फीसदी

इन परिणामों के आने के पहले
विभिन्न एजेंसियों ने जो अनुमान
लगाए थे, वे इस प्रकार थे।
गत 31 मार्च को खत्म हुई वित्त वर्ष 2020-21 की चौथी तिमाही में देश की जीडीपी ग्रोथ 1.6 फीसदी रही। इस प्रकार पूरे साल में कुल संकुचन -7.3 फीसदी रहा, जो प्रारंभिक अंदेशों की तुलना में अर्थव्यवस्था के बेहतर स्वास्थ्य का संकेत दे रहा है। सन 2019-20 में जीडीपी की संवृद्धि 4.0 फीसदी रही थी। भारत सरकार ने यह जानकारी दी है। चौथी तिमाही की ग्रोथ अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में 0.5 फीसदी की संवृद्धि से बेहतर रही।

सकल घरेलू उत्पाद 2019-20 की जनवरी-मार्च अवधि में संवृद्धि 3 फीसदी थी। राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (NSO) के अनुसार 2019-20 में वार्षिक संवृद्धि 4 फीसदी थी। NSO ने इस साल जनवरी में जारी हुए राष्ट्रीय अकाउंट्स के पहले अग्रिम अनुमान में 2020-21 में जीडीपी में 7.7 फीसदी के संकुचन का आकलन किया था। NSO ने अपने दूसरे संशोधित अनुमान में 8 फीसदी की गिरावट का आकलन जताया था। यानी परिणाम सरकार के अनुमान से बेहतर रहे।

विनिर्माण क्षेत्र का अच्छा प्रदर्शन

चौथी तिमाही में कंस्ट्रक्शन सेक्टर की ग्रोथ 14 फीसदी और यूटिलिटी सेक्टर की ग्रोथ 9.1 फीसदी रही। यूटिलिटी में गैस, बिजली, पानी की सप्लाई आती है। दूसरी तरफ सर्विसेज में 2.3 फीसदी की गिरावट आई। सर्विसेज में होटल, ट्रेड और ट्रांसपोर्ट जैसी चीजें आती हैं। हालांकि, कंस्ट्रक्शन और यूटिलिटी क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन से पिछले वित्त वर्ष जीडीपी में अनुमान से कम गिरावट आई।

जोखिमों के बावजूद टीका ही हराएगा कोरोना को

एक अध्ययन से यह बात निकलकर आई है कि दसेक साल के भीतर कोविड-19 महज सर्दी-जुकाम जैसी बीमारी बनकर रह जाएगा। पुरानी महामारियों के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ तो गायब ही हो गईं। अमेरिका के यूटा विश्वविद्यालय के गणित जीव-विज्ञान के प्रोफेसर फ्रेड एडलर के अनुसार अगले दसेक साल में सामूहिक रूप से मनुष्यों के शरीर की इम्यूनिटी के सामने यह बीमारी मामूली बनकर रह जाएगी। जीव-विज्ञान से जुड़ी नवीनतम जानकारियों के आधार पर तैयार किए गए इस गणितीय मॉडल के अनुसार ऐसा इसलिए नहीं होगा कि कोविड-19 की संरचना में कोई कमजोरी आएगी, बल्कि इसलिए होगा क्योंकि हमारे इम्यून सिस्टम में बदलाव आ जाएगा। यह बदलाव हमारी प्राकृतिक-संरचना करेगी और कुछ वैक्सीन करेंगी।  

जब इस बीमारी का हमला हुआ, वैज्ञानिकों ने पहला काम इसके वायरस की पहचान करने का किया। उसके बाद अलग-अलग तरीकों से इससे लड़ने वाली वैक्सीनों को तैयार करके दिखाया। वैक्सीनों के साथ दूसरे किस्म के जोखिम जुड़े हैं। टीका लगने पर बुखार आ जाता है, सिरदर्द वगैरह जैसी परेशानियाँ भी होती हैं, पर बचाव का सबसे अच्छा रास्ता वैक्सीन ही है।

कितने वेरिएंट

पिछले एक साल में हमारे शरीरों में पलते-पलते इस वायरस का रूप-परिवर्तन भी हुआ है। इस रूप परिवर्तन को देखते हुए वैक्सीनों की उपयोगिता के सवाल भी खड़े होते हैं। हाल में ब्रिटेन से जारी हुए एक प्रि-प्रिंट डेटा (जिसकी पियर-रिव्यू नहीं हुई है) के अनुसार कोरोना वायरस के दो वेरिएंट बी.1.1.7 (जो सबसे पहले ब्रिटेन में पाया गया) और बी.1.617.2 (जो सबसे पहले भारत में पाया गया) पर फायज़र और एस्ट्राजेनेका वैक्सीन कारगर हैं। भारत के लिए यह जानकारी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे यहाँ बी.1.617 सबसे ज्यादा मिला है। बी.1.617.2 इसका ही एक रूप है।  

Sunday, May 30, 2021

दूसरी लहर की वापसी के बाद क्या?

 


अब लग रहा है कि कोविड-19 की दूसरी लहर उतार पर है। शुक्रवार की रात के 12 बजे तक दर्ज नए संक्रमणों की संख्या 1.73 लाख और कुल एक्टिव केसों की संख्या 22 लाख के आसपास आ गई है, जो 10 मई को 37 लाख के ऊपर थी। अभी कुछ समय लगेगा, पर उम्मीद है कि भयावहता कम होगी। अब ऑक्सीजन और अस्पतालों में खाली बिस्तरे उपलब्ध हैं। बहरहाल दुनिया के सामने बड़ा सवाल है कि इस महामारी को क्या हम पूरी तरह परास्त कर पाएंगे? या तीसरी लहर भी आएगी?

संख्या में गिरावट कई राज्यों में लगाए गए लॉकडाउनों की वजह से है। अब अनलॉक होगा। हालांकि केंद्र ने पाबंदियों को 30 जून तक जारी रखने के दिशा-निर्देश दिए हैं, पर यह राज्यों पर निर्भर है कि वे कितनी छूट देंगे। दिल्ली में 31 मई के बाद कुछ गतिविधियाँ फिर से शुरू होंगी। अन्य राज्यों में इस हफ्ते या अगले हफ्तों में ऐसा ही कुछ होगा। इनमें महाराष्ट्र भी शामिल है, जहाँ कुछ समय पहले तक भयावह स्थिति थी। शायद तमिलनाडु, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लॉकडाउन जारी रहेगा।

दूसरी लहर क्यों आई?

लॉकडाउन खुलने के बाद क्या हम एहतियात बरतेंगे? पहली लहर के बाद हम बेफिक्र हो गए थे। अब क्या होगा? तीसरी लहर का भी अंदेशा है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि दूसरी लहर के पीछे केवल अनलॉक ही कारण नहीं है। पहली लहर के बाद अनलॉक पिछले साल जून-जुलाई में शुरू हुआ था। सितम्बर में गिरावट शुरू हुई, तबतक काफी अनलॉक हो चुका था। अनलॉक के बावजूद गिरावट जारी रही।

Friday, May 28, 2021

टीकों को लेकर 'भ्रम' और नीति आयोग का स्पष्टीकरण

 


भारत के कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम को लेकर कई तरह के भ्रम कुछ समय से हवा में हैं। नीति आयोग में सदस्य (स्वास्थ्य) और कोविड-19 (एनईजीवीएसी) के लिए वैक्सीन प्रबंधन पर राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह के अध्यक्ष डॉ विनोद पॉल ने इन भ्रमों को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया है। उन्होंने कहा है कि जो गलतफहमियाँ हैं, उनकी वास्तविकता इस प्रकार है:-

1: विदेशों से टीके खरीदने के लिए केंद्र पर्याप्त प्रयास नहीं कर रहा है

तथ्य: केंद्र सरकार 2020 के मध्य से ही सभी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय वैक्सीन निर्माताओं के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए है। फायज़र, जेएंडजे और मॉडर्ना के साथ कई दौर का वार्तालाप हो चुका है। सरकार ने उन्हें भारत में उनके टीकों की आपूर्ति और/अथवा इन्हें बनाने के लिए सभी प्रकार की सहायता की पेशकश की है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि उनके टीके निःशुल्क रूप से आपूर्ति के लिए उपलब्ध हैं। हमें यह समझने की जरूरत है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर टीके खरीदना 'ऑफ द शैल्फ' वस्तु खरीदने के समान नहीं है। विश्व स्तर पर टीके सीमित आपूर्ति में हैं, और सीमित स्टॉक को आवंटित करने में कंपनियों की अपनी प्राथमिकताएं, योजनाएं और मजबूरियां हैं। वे अपने मूल देशों को भी प्राथमिकता देती हैं जैसे हमारे अपने वैक्सीन निर्माताओं ने हमारे लिए बिना किसी संकोच के किया है। फायज़र ने जैसे ही वैक्सीन की उपलब्धता का संकेत दिया, इसके बाद से ही केंद्र सरकार और कंपनी वैक्सीन के जल्द से जल्द आयात के लिए मिलकर कार्य कर रही हैं। भारत सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप, स्पूतनिक वैक्सीन परीक्षणों में तेजी आई और समय पर अनुमोदन के साथ, रूस ने हमारी कंपनियों को टीके की दो किस्तें भेजते हुए निपुण तकनीक-हस्तांतरण पहले ही कर दी हैं और अब बहुत जल्द ही ये कंपनियां इसका निर्माण भी शुरू कर देंगी। हम सभी अंतर्राष्ट्रीय वैक्सीन निर्माताओं से भारत में आने और भारत और दुनिया के लिए वैक्सीन बनाने के अपने अनुरोध को दोहराते हैं।

2:  विश्व स्तर पर उपलब्ध टीकों को केंद्र ने मंजूरी नहीं दी है

 तथ्य: केंद्र सरकार ने अप्रैल में ही भारत में यूएस एफडीए, ईएमए, यूके की एमएचआरए और जापान की पीएमडीए और डब्ल्यूएचओ की आपातकालीन उपयोग सूची द्वारा अनुमोदित टीकों को प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बना दिया है। इन टीकों को पूर्व ब्रिजिंग परीक्षणों से गुजरने की आवश्यकता नहीं होगी। अन्य देशों में निर्मित बेहतर तरीके से परीक्षित और जाँचे गए टीकों के लिए परीक्षण आवश्यकता को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए प्रावधान में अब और संशोधन किया गया है। औषधि नियंत्रक के पास अनुमोदन के लिए किसी विदेशी विनिर्माता का कोई आवेदन लंबित नहीं है।

Thursday, May 27, 2021

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के साथ सरकारी टकराव निर्णायक दौर में


भारत सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के बीच टकराव अब निर्णायक मोड़ की तरफ बढ़ रहा है। एक तरफ अभिव्यक्ति और प्राइवेसी के अधिकारों की रक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ सामाजिक जिम्मेदारियों, राष्ट्रीय हितों और पारदर्शिता से जुड़े नियमों का सवाल है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वॉट्सऐप ने भारत सरकार के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है, जिसमें नए नियमों पर रोक लगाने की मांग की गई है। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को नई गाइडलाइन बनाने के लिए 90 दिन का वक्त दिया था, जिसकी मियाद मंगलवार को खत्म हो चुकी है।

दूसरी तरफ कल भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय ने एक विज्ञप्ति जारी करके एक लम्बी सफाई दी है कि हम निजता का सम्मान करते हैं, पर किसी एक संदेश लेखक के बारे में जानकारी पाने के पीछे सार्वजनिक हित की कामना है। ऐसी जरूरत सिर्फ उसी मामले में है जब भारत की सम्प्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, दूसरे देशों के साथ दोस्ताना संबंधों या सार्वजनिक आदेश या उक्त अपराधों को उकसाने से संबंधित बहुत गंभीर अपराधों या बलात्कार, यौन सामग्री या बाल यौन उत्पीड़न सामग्री से संबंधित अपराधों की रोकथाम, जांच या सजा के लिए संदेश की जरूरत होती है

सरकार ने टेक कंपनियों से कोरोना से जुड़ी भ्रामक जानकारियों को भी हटाने को कहा है जिसके बाद आरोप लगाया गया कि सरकार अपनी आलोचना से जुड़ी जानकारी को छुपा रही है। सोशल मीडिया कंपनियों के नई गाइडलाइन बनाने के लिए 90 दिन का वक्त दिया गया था, जिसकी मियाद मंगलवार को खत्म हो चुकी है।

गत 25 मई को दाखिल इस याचिका में कंपनी ने कोर्ट में दलील दी है कि भारत सरकार के नए आईटी नियमों से प्राइवेसी खत्म हो जाएगी। वॉट्सऐप के प्रवक्ता ने कहा कि हमारे मैसेज एनक्रिप्ट किए गए हैं। ऐसे में लोगों की चैट को इस तरह ट्रेस करना वॉट्सऐप पर भेजे गए सभी मैसेज पर नजर रखने के बराबर है जो कि इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने वालों की प्राइवेसी को खत्म कर देगा। कंपनी सिर्फ उन लोगों के लिए नियमन चाहती है, जो प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल करते हैं।

उन्होंने कहा कि हम प्राइवेसी के हनन को लेकर दुनियाभर के सिविल सोसाइटी और विशेषज्ञों के संपर्क में हैं। इसके साथ ही लगातार भारत सरकार से चर्चा के जरिए इसका समाधान खोजने में लगे हैं। प्रवक्ता की ओर से कहा गया कि हमारा मकसद लोगों की सुरक्षा और जरूरी कानूनी समस्याओं का हल खोजना है।

Wednesday, May 26, 2021

सवाल है वायरस कहाँ से आया?


कोविड-19 वायरस के वैश्विक-प्रसार का डेढ़ साल पूरा होने के बाद यह चर्चा फिर से शुरू हो गई है कि कहीं यह वायरस चीन के वुहान की किसी प्रयोगशाला से तो सायास या अनायास लीक नहीं हुआ था? हाल में अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जरनल की एक रिपोर्ट ने इस चर्चा को तेज कर दिया है और अब वहाँ का मुख्यधारा का मीडिया भी इस सवाल को उठा रहा है. जबकि पिछले साल यही मीडिया इन खबरों में दिलचस्पी नहीं ले रहा था।

अमेरिका के स्वास्थ्य मंत्री ने डब्लूएचओ से कहा है कि इस मामले की जाँच पारदर्शिता के साथ करें। अखबार ने अमेरिकी इंटेलिजेंस के सूत्रों का हवाला देते हुए कहा है कि सन 2019 के नवंबर में संक्रमण की शुरूआत होने के पहले वुहान प्रयोगशाला के तीन शोधकर्ताओं की अस्पताल में चिकित्सा की गई थी। यह खबर विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक महत्वपूर्ण बैठक के ठीक पहले आई है। इस बैठक में वायरस के स्रोत की जाँच के अगले कदम के बारे में फैसला किया जाएगा।

चीन का कहना है सब झूठ है

दूसरी तरफ चीन ने कोरोना संक्रमण की शुरुआत से पहले अपने वुहान शहर में तीन शोधकर्ताओं के बीमार होकर अस्पताल जाने की ख़बर को चीन ने 'पूरी तरह झूठ' क़रार दिया है। इसके पहले रविवार को 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने अमेरिकी ख़ुफ़िया रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा था कि वुहान लैब के तीन शोधकर्ता साल 2019 के नवंबर महीने में किसी ऐसी बीमारी से जूझ रहे थे जिसके "लक्षण कोविड-19 और आम सर्दी-जुकाम दोनों से मेल खाते थे।" अब दुनिया के संजीदा विशेषज्ञों ने कहा है कि कोई अनुमान लगाने से बेहतर होगा कि इस मामले की ठीक से जाँच की जाए। अमेरिकी राष्ट्रपति के स्वास्थ्य सलाहकार एंटनी फाउची का भी यह सुझाव है।

Tuesday, May 25, 2021

भारत-अमेरिका रिश्तों में मजबूती का दौर


विदेशमंत्री एस जयशंकर रविवार को अमेरिका के दौरे पर पहुंचे। इस दौरान वे संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेश से आज सुबह (भारतीय समय से शाम) मुलाकात करेंगे और उसके बाद वॉशिंगटन डीजी जाएंगे जहां अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन से उनकी भेंट होगी। इस साल जनवरी में राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यभार संभालने के बाद भारत के किसी वरिष्ठ मंत्री का अमेरिका का यह पहला दौरा है। 1 जनवरी 2021 को भारत के संरा सुरक्षा का सदस्य बनने के बाद जयशंकर का पहला दौरा है। दौरे का समापन 28 मई को होगा।

भारत-चीन सम्बन्धों में आती गिरावट, पश्चिम एशिया में पैदा हुई गर्मी, अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी और भारत-पाकिस्तान रिश्तों को लेकर कई तरह के कयासों के मद्देनज़र यह दौरा काफी महत्वपूर्ण है। इन बातों के अलावा वैश्विक महामारी और खासतौर से वैक्सीन वितरण भी इस यात्रा के दौरान महत्वपूर्ण विषय होगा। शायद सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी मसले होंगे, जिनपर आमतौर पर सबसे कम चर्चा होती है।

कुल मिलाकर भारत-अमेरिका के बीच द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक रिश्तों का यह सबसे महत्वपूर्ण दौर है। चतुष्कोणीय सुरक्षा-व्यवस्था यानी क्वॉड ने एकसाथ तीनों आयामों पर रोशनी डाली है। दोनों देशों के बीच जो नई ऊर्जा पैदा हुई है, उसके व्यावहारिक अर्थ अब स्पष्ट होंगे। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ सी राजा मोहन ने आज के इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि अभी तक उपरोक्त तीन विषयों को अलग-अलग देखा जाता था।

भारत की वैश्विक अभिलाषाओं के खुलने और राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा ट्रंप प्रशासन के एकतरफा नजरिए को दरकिनार करने के कारण ये तीनों मसले करीब आ गए हैं। दूसरी तरफ वैश्विक मामलों में पश्चिम के विरोध की भारतीय नीति अब अतीत की बात हो गई है। अब हम यूरोपियन गठबंधन और अमेरिका के साथ हैं।

Monday, May 24, 2021

वैक्सीन ने उघाड़ कर रख दी गैर-बराबरी की चादर

कोविड-19 ने मानवता पर हमला किया है, पर उससे बचाव हम राष्ट्रीय और निजी ढालों तथा छतरियों की मदद से कर रहे हैं। विश्व-समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी का जुमला पाखंडी लगता है। वैश्विक-महामारी से लड़ने के लिए वैक्सीन की योजनाएं भी सरकारें या कम्पनियाँ अपने राजनीतिक या कारोबारी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कर रही हैं। पिछले साल जब महामारी ने सिर उठाया, तो सबसे पहले अमीर देशों में ही वैक्सीन की तलाश शुरू हुई। उनके पास ही साधन थे।

वह तलाश वैश्विक मंच पर नहीं थी और न मानव-समुदाय उसका लक्ष्य था।  गरीब तो उसके दायरे में ही नहीं थे। उन्हें उच्छिष्ट ही मिलना था। पिछले साल अप्रेल में विश्व स्वास्थ्य संगठन, कोलीशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस इनोवेशन (सेपी) और ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्युनाइज़ेशन यानी गावी ने गरीब और मध्यम आय के देशों के लिए वैक्सीन की व्यवस्था करने के कार्यक्रम कोवैक्स का जिम्मा लिया। इसके लिए अमीर देशों ने दान दिया, पर यह कार्यक्रम किस गति से चल रहा है, इसे देखने की फुर्सत उनके पास नहीं है।

अमेरिका ने ढाई अरब दिए और जर्मनी ने एक अरब डॉलर। यह बड़ी रकम है, पर दूसरी तरफ अमेरिका ने अपनी कम्पनियों को 12 अरब डॉलर का अनुदान दिया। इतने बड़े अनुदान के बाद भी ये कम्पनियाँ पेटेंट अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं। कम से कम महामारी से लड़ने के लिए कारोबारी फायदों को छोड़ दो।   

गरीबों की बदकिस्मती

इस साल मार्च तक 10 करोड़ डोज़ कोवैक्स कार्यक्रम को मिलनी थीं, पर अप्रेल तक केवल 3.85 करोड़ डोज़ ही मिलीं। उत्पादन धीमा है और कारोबारी मामले तय नहीं हो पा रहे हैं। जनवरी में गावी ने कहा था कि जिन 46 देशों में टीकाकरण शुरू हुआ है, उनमें से 38 उच्च आय वाले देश हैं। अर्थशास्त्री जोसफ स्टिग्लिट्ज़ ने वॉशिंगटन पोस्ट के एक ऑप-एडिट में कहा, कोविड-वैक्सीन को पेटेंट के दायरे में बाँधना अनैतिक और मूर्खता भरा काम होगा।

Sunday, May 23, 2021

लालबत्ती पर खड़ी अर्थव्यवस्था


इस हफ्ते नरेंद्र मोदी सरकार के सात साल पूरे हो जाएंगे। किस्मत ने राजनीतिक रूप से मोदी का साथ दिया है, पर आर्थिक मोड़ पर उनके सामने चुनौतियाँ खड़ी होती गई हैं। पिछले साल टर्नअराउंड की आशा थी, पर कोरोना ने पानी फेर दिया। और इस साल फरवरी-मार्च में लग रहा था कि गाड़ी पटरी पर आ रही है कि दूसरी लहर ने लाल बत्ती दिखा दी। सदियों में कभी-कभार आने वाली महामारी ने बड़ी चुनौती फेंकी है। क्या भारत इससे उबर पाएगा? दुनिया के दूसरे देशों को भी इस मामले में नाकामी मिली है, पर भारत में समूची व्यवस्था कुछ देर के लिए अभूतपूर्व संकट से घिर गई।

बांग्लादेश से भी पीछे

बांग्लादेश के योजना मंत्री एमए मन्नान ने इस हफ्ते अपने देश की कैबिनेट को सूचित किया कि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 2,064 डॉलर से बढ़कर 2,227 डॉलर हो गई है। भारत की प्रति व्यक्ति आय 1,947 डॉलर से 280 डॉलर अधिक। पिछले साल अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ में यह सम्भावना व्यक्त की थी। हालांकि भारत की जीडीपी के आँकड़े पूरी तरह जारी नहीं हुए हैं, पर जाहिर है कि प्रति व्यक्ति आय में हम बांग्लादेश से पीछे  हैं। वजह है पिछले साल की पहली तिमाही में आया 24 फीसदी का संकुचन। शायद हम अगले साल फिर से आगे चले जाएं, पर हम फिर से लॉकडाउन में हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस टर्नअराउंड की हम उम्मीद कर रहे थे, क्या वह सम्भव होगा?

Friday, May 21, 2021

हमस समर्थकों ने जश्न मनाया

 


पश्चिम एशिया में संघर्ष-विराम लागू होने के बाद दुनिया में जो प्रतिक्रियाएं हुई हैं, उन्होंने ध्यान खींचा है। एक तरफ गज़ा और पश्चिमी किनारे पर रहने वाले हमस समर्थकों ने युद्धविराम को अपनी जीत बताया है, वहीं इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू पर उनके देश के दक्षिणपंथी सांसदों ने उनकी आलोचना की है। संघर्ष-विराम होते ही बड़ी संख्या में फ़लस्तीनी लोग गज़ा में सड़कों पर आकर  जश्न मनाने लगे। हमस ने चेतावनी दी है, "हमारे हाथ ट्रिगर से हटे नहीं हैं।" यानी कि हमला हुआ, तो वे जवाब देने को तैयार है।

यह प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि पिछले कुछ समय से हमस समर्थकों की प्रतिक्रिया उग्र रही है। हालांकि उनके इलाके में भारी तबाही हुई है, पर वे अपने समर्थकों का विश्वास जीतने के लिए अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। दूसरी तरफ वे दुनिया की हमदर्दी भी हासिल करना चाहते हैं। बहरहाल उधर  टाइम्स ऑफ इसराइल अख़बार के अनुसार युद्धविराम को लेकर दक्षिणपंथी सांसद और नेतन्याहू के कुछ राजनीतिक सहयोगी भी नाराज हैं।

कुरैशी साहब बोले

इस बीच पाकिस्तान के बड़बोले विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी सीएनएन के एक इंटरव्यू में इसराइल को लेकर एंकर बियाना गोलोद्रिगा के साथ उलझ गए। इस इंटरव्यू में कुरैशी साहब ने अपने पाकिस्तानी अंदाज में कहा कि इसराइल के पास डीप पॉकेट है। इसपर एंकर बियाना ने उनसे पूछा, इसका मतलब क्या हुआ? इसपर कुरैशी ने कहा, मीडिया को इसराइल कंट्रोल करता है। वे बहुत प्रभावशाली लोग हैं। बावजूद इसके वह मीडिया-वॉर में हार रहा है। टाइड इज़ टर्निंग यानी ज्वार उतर रहा है।

आखिरकार लड़ाई रुकी

 

युद्ध-विराम की घोषणा करते हुए जो बाइडेन

इसराइल और फ़लस्तीनी चरमपंथी हमस के बीच संघर्ष-विराम हो गया। दोनों पक्षों ने 11 दिन की लड़ाई के बाद आपसी सहमति से यह फ़ैसला किया। बताया जाता है कि इस संघर्ष-विराम के पीछे अमेरिका की भूमिका है, जिसने इसराइल पर युद्ध रोकने के लिए दबाव बनाया था। इसराइल की रक्षा-कैबिनेट ने गुरुवार 20 मई की रात 11 बजे हमले रोकने का फैसला किया, जिसके तीन घंटे बाद रात दो बजे युद्ध-विराम लागू हो गया। हमस के एक अधिकारी ने भी पुष्टि की कि यह संघर्ष-विराम आपसी रज़ामंदी से और एक साथ हुआ है, जो शुक्रवार तड़के स्थानीय समय के अनुसार दो बजे से लागू हो गया।

10 मई से शुरू हुई रॉकेट-वर्षा और जवाबी बमबारी में 240 से ज़्यादा लोग मारे गए जिनमें 12 इसराइली हैं और शेष ज़्यादातर मौतें गज़ा में हुईं। 7 मई को अल-अक़्सा मस्जिद के पास यहूदियों और अरबों में झड़प हुई। इसके बाद इस इलाके में प्रदर्शन हुए और इसराइली पुलिस ने अल अक़्सा मस्जिद में प्रवेश किया। इसके दो दिन बाद हमस ने इसराइल पर रॉकेट-वर्षा की जिसका जवाब इसराइली वायुसेना के हमले से हुआ।

गज़ा में कम-से-कम 232 लोगों की जान जा चुकी है। गज़ा पर नियंत्रण करने वाले हमस के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार मारे गए लोगों में लगभग 100 औरतें और बच्चे हैं। इसराइल का कहना है कि गज़ा में मारे गए लोगों में कम-से-कम 150 चरमपंथी हैं। हमस ने अपने लोगों की मौत के बारे में कोई आँकड़ा नहीं दिया है।

Thursday, May 20, 2021

अमेरिका ने लड़ाई रोकने के लिए इसराइल और हमस दोनों पर दबाव बनाया

 

इसराइली बमबारी के बाद गज़ा का एक शहरी इलाका

वॉल स्ट्रीट जरनल के अनुसार जो बाइडेन प्रशासन और पश्चिम एशिया में उसके सहयोगी देश इसराइल और फलस्तीनी उग्रवादी ग्रुप हमस पर संघर्ष रोकने के लिए दबाव बना रहे हैं। इस संघर्ष में नागरिकों की हो रही मौतें चिंता का सबसे बड़ा कारण है।

राष्ट्रपति बाइडेन ने बुधवार को इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की और इस बात की उम्मीद जाहिर की कि फौरन फौजी कार्रवाई कम की जाएगी, ताकि संघर्ष-विराम का रास्ता खुल सके। अमेरिका ने अपने सम्पर्कों के मार्फत हमस के पास भी यह संदेश भिजवाया है।

इसराइली मीडिया के अनुसार नेतन्याहू ने जवाब में कहा कि हम तब तक कार्रवाई जारी रखने के लिए कृत-संकल्प हैं जब तक कि इसराइली नागरिकों की शांति और सुरक्षा सुनिश्चित न हो जाए। नेतन्याहू ने इससे पहले दावा किया था कि इस बार उनकी कार्रवाई से हमस को ऐसे झटके मिले हैं, जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी और वो वर्षों पीछे चले गए हैं।

Wednesday, May 19, 2021

डार्विन की मेहराब ढह गई

 


इक्वेडोर के पर्यावरण मंत्रालय ने अपने फेसबुक पेज पर जानकारी दी है कि दक्षिण पूर्व प्रशांत महासागर के डार्विन द्वीप की प्रसिद्ध प्राकृतिक मेहराब (आर्च) अब टूट गई है। अब उसकी जगह समुद्र में दो स्तम्भ रह गए हैं। उनके ऊपर का पुल जैसा हिस्सा टूट कर गिर गया है। यह मेहराब 141 फुट ऊँची और 230 फुट लम्बी है।

यह मेहराब पानी में डूबी चट्टानों के बीच लाखों वर्षों से खड़ी थी। जिस द्वीप के पास यह थी, उसका नाम विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश वैज्ञानिक के नाम पर था, क्योंकि सन 1835 में इसी द्वीप से वापस आने के बाद चार्ल्स डार्विन ने अपने प्राकृतिक चयन सिद्धांत का विकास किया था।

हालांकि इस द्वीप पर खुले आवागमन की अनुमति नहीं है, पर गत 17 मई को जिस समय यह मेहराब टूट रही थी, एक पर्यटक नौका उधर से गुजर रही थी। उसपर सवार लोगों ने इस ऐतिहासिक घटना का वीडियो भी रिकॉर्ड किया है।  

गैलापागोस द्वीप समूह समुद्र के बीच करीब 2.33 किलोमीटर का एक निर्जन टुकड़ा है। इसकी ऊँची-नीची सतह का सबसे ऊँचा हिस्सा 168 मीटर ऊँचा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि चट्टानों के क्षरण के कारण यह मेहराब टूटी है। इस इलाके में कई प्रकार के समुद्री जीव विचरण करते हैं, इसलिए स्कूबा डाइविंग के लिए यह एक लोकप्रिय स्थान है।

पश्चिम एशिया में भारत किसके साथ है?

हिन्दू में वासिनी वर्धन का कार्टून

गज़ा पट्टी में चल रहे टकराव को रोकने के लिए संरा सुरक्षा परिषद की खुली बैठक में की जा रही कोशिशें अभी तक सफल नहीं हो पाई हैं, क्योंकि ऐसा कोई प्रस्ताव अभी तक सामने नहीं आया है, जिसपर आम-सहमति हो। नवीनतम समाचार यह है कि फ्रांस ने संघर्ष-विराम का एक प्रस्ताव आगे बढ़ाया है, जिसकी शब्दावली पर अमेरिका की राय अलग है। हालांकि राष्ट्रपति जो बाइडेन ने औपचारिक रूप से जो बयान जारी किया है, उसमें दोनों पक्षों से संघर्ष-विराम की अपील की है, पर अमेरिका का सुझाव है कि इसपर सुरक्षा परिषद की खुली बैठक के बजाय बैकरूम बात की जाए। एक तरह से उसने सुप को बयान जारी करने से रोका है।

अब फ्रांस ने कहा है कि हम अब बयान नहीं एक प्रस्ताव लाएंगे, जो कानूनन लागू होगा। इसपर सदस्य मतदान भी करेंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यह बात मिस्र और जॉर्डन के राष्ट्राध्यक्षों से बात करने के बाद कही है। अनुमान है कि इस प्रस्ताव में केवल संघर्ष-विराम की पेशकश ही नहीं है, बल्कि गज़ा में हालात का अध्ययन करने और मानवीय-सहायता पहुँचाने की पेशकश भी है। सम्भवतः अमेरिका को इसपर आपत्ति है। देखना होगा कि ऐसी स्थिति आई, तो अमेरिका उसे वीटो करेगा या नहीं।  

भारत किसके साथ?

उधर इस संघर्ष के दौरान भारत में बहस है कि हम संयुक्त राष्ट्र में किसका साथ दे रहे हैं, इसराइल का या फलस्तीनियों का? भारतीय प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति ने रविवार को सुरक्षा परिषद में जो बयान दिया था, उसे ठीक से पढ़ें, तो वह फलस्तीनियों के पक्ष में है, जिससे इसराइल को दिक्कत होगी। साथ ही भारत ने हमस के रॉकेट हमले की भी भर्त्सना की है।

Tuesday, May 18, 2021

हमस-इसराइल टकराव का निहितार्थ


इसराइल और हमस के बीच टकराव ऐन उस मौके पर हुआ है, जब लग रहा था कि पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के आसार पैदा हो रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि अरब देशों का इसराइल के प्रति कठोर रुख बदलने लगा था। तीन देशों ने उसे मान्यता दे दी थी और सम्भावना इस बात की थी कि सऊदी अरब भी उसे स्वीकार कर लेगा। इस हिंसा से उस प्रक्रिया को धक्का लगेगा। अब उन अरब देशों को भी इसराइल से रिश्ते सुधारने में दिक्कत होगी, जिन्होंने हाल में इसराइल के साथ रिश्ते बनाए हैं। पर वैश्विक राजनीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आने वाला है। इस हिंसा के दौरान इसराइल के समर्थक देशों का रुख भी साफ हुआ है।

इस महीने के पहले हफ्ते में इसराइली सुरक्षा बलों ने यरूशलम के दमिश्क गेट पर फलस्तीनियों को जमा होने से रोका, जिसके कारण यह हिंसा भड़की है। इस घटना में काफी लोग घायल हुए थे। इसके बाद उग्रवादी संगठन हमस को आगे आने का मौका मिला। उन्होंने इसराइल पर रॉकेटों से हमला बोल दिया, जिसका जवाब इसराइल ने बहुत बड़े स्तर पर दिया है। इन दिनों इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अपने देश में राजनीतिक संकट में थे। इस लड़ाई से उनकी स्थिति सुधरेगी। दूसरी तरफ हमस का प्रभाव अब और बढ़ेगा। जहाँ तक भारत का सवाल है, हमारी सरकार ने काफी संतुलित रुख अपनाया है। इस टकराव ने इस्लामिक देशों को इसराइल के बारे में किसी एक रणनीति को बनाने का मौका भी दिया है। एक तरफ मुस्लिम देशों का नया ब्लॉक बनाने की बातें हैं, वहीं सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्ते सुधारने के प्रयास भी हैं। तुर्की भी इस्लामिक देशों का नेतृत्व करने के लिए आगे आया है।  

हालांकि इस टकराव को युद्ध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें आसपास का कोई देश शामिल नहीं हैं पर इससे वैश्विक-राजनीति में आ रहे परिवर्तनों पर प्रभाव पड़ेगा। खासतौर से अरब देशों और इसराइल के रिश्तों में आ रहे सुधार को धक्का लगेगा। इस परिघटना का असर अरब देशों और ईरान के बीच सम्बंध बेहतर होने की प्रक्रिया पर भी पड़ेगा।

Monday, May 17, 2021

महामारी के उस पार क्या खुशहाली खड़ी है?


पिछले साल इतिहासकार युवाल नोवा हरारी ने फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित अपने एक लेख में कहा था कि आपातकाल ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को फास्ट फॉरवर्ड करता है। जिन फ़ैसलों को करने में बरसों लगते हैं, वे रातोंरात हो जाते हैं। उन्हीं दिनों बीबीसी के न्यूज़ऑवर प्रोग्राम में उन्होंने कहा, महामारी ने वैज्ञानिक और राजनीतिक दो तरह के सवालों को जन्म दिया है। वैज्ञानिक चुनौतियों को हल करने की कोशिश तो दुनिया कर रही है लेकिन राजनीतिक समस्याओं की ओर उसका ध्यान कम गया है।

पिछले साल जबसे महामारी ने घेरा है, दुनियाभर के समाजशास्त्री इस बात का विवेचन कर रहे हैं कि इसका जीवन और समाज पर क्या असर होने वाला है। यह असर जीवन के हर क्षेत्र में होगा, मनुष्य की मनोदशा पर भी। हाल में विज्ञान-पत्रिका साइंटिफिक अमेरिकन ने इस दौरान इंसान के भीतर पैदा हुए गुहा लक्षण (केव सिंड्रोम) का उल्लेख किया है।

गुहा-मनोदशा

एक साल से ज्यादा समय से लगातार गुफा में रहने के बाद व्यक्ति के मन में अलग-थलग रहने की जो प्रवृत्ति पैदा हो गई है, क्या वह स्थायी है? क्या इंसान खुद को फिर से उसी प्रकार स्वतंत्र और सुरक्षित महसूस कर पाएगा, जैसा पहले था? क्या सोशल डिस्टेंसिंगदुनिया का स्थायी-भाव होगा? कम से कम इस पीढ़ी पर तो यह बात लागू होती है। वैक्सीन लेने के बाद भी हम खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।

Sunday, May 16, 2021

दूसरी लहर से आगे का परिदृश्य


पिछले एक-डेढ़ महीने के हौलनाक-मंज़र के बाद लगता है कि कोरोना की दूसरी लहर जितनी तेजी से उठी थी, उतनी तेजी से इसके खत्म होने की उम्मीदें हैं। इस लहर का सबसे बड़ा सबक क्या है? क्या हम ईमानदारी से अपनी खामियों को पढ़ पाएंगे? ऐसा क्यों हुआ कि भारी संख्या में लोग अस्पतालों के दरवाजों पर सिर पटक-पटक कर मर गए? उन्हें ऑक्सीजन नहीं मिली, दवाएं नहीं मिलीं, इलाज नहीं मिला। ऐसे तमाम सवाल हैं।

क्या सरकार (जिसमें केंद्र ही नहीं, राज्य भी शामिल हैं) की निष्क्रियता से ऐसा हुआ? क्या सरकारें भविष्य को लेकर चिंतित और कृत-संकल्प है? क्या यह संकल्प ‘राजनीति-मुक्त’ है? भविष्य का कार्यक्रम क्या है? जिस चिकित्सा-तंत्र की हमें जरूरत है, वह कैसे बनेगा और कौन उसे बनाएगा? हमारी सार्वजनिक-स्वास्थ्य नीति क्या है? वैक्सीनेशन-योजना क्या है? लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था क्या सदमे को बर्दाश्त कर पाएगी? सवाल यह भी है कि साल में दूसरी बार संकट से घिरे प्रवासी कामगारों की रक्षा हम कैसे करेंगे?

प्रवासी कामगार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र, दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रवासी श्रमिकों को सूखा राशन प्रदान करने का निर्देश दिया। अधिकारियों को प्रवासी मजदूरों के पहचान पत्रों पर जोर नहीं देना है। मजदूरों पर यकीन करते हुए उन्हें राशन दिया जाए। इन मजदूरों के लिए एनसीआर में सामुदायिक रसोइयाँ स्थापित करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि उन्हें दिन में दो बार भोजन मिले। उन्हें परिवहन मिले, जो अपने घरों में वापस जाना चाहते हैं। ये वही समस्याएं हैं, जो पिछले साल के लॉकडाउन के वक्त इन कामगारों ने झेली थीं।

Friday, May 14, 2021

दूसरी लहर को लेकर काफी सही साबित हो रहा है आईआईटी कानपुर का गणितीय मॉडल


आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने भारत में कोविड-19 की तीसरी लहर का जो गणितीय मॉडल तैयार किया है, वह काफी हद तक राष्ट्रीय स्तर पर और देश के प्रमुख राज्यों के स्तर पर सटीक चल रहा है। हाल में इस मॉडल को लेकर काफी चर्चा रही थी। मैं तबसे इनके अपडेट पर नजर रखता हूँ। आप यदि इसे तारीखों के हिसाब से देखना चाहते हैं, तो इसकी वैबसाइट पर जाना पड़ेगा, पर यदि केवल नेचुरल कर्व को समझ सकते हैं, तो देखें कि नीले रंग की रेखा वास्तविक आँकड़े को बता रही है और नारंगी रेखा इनके मॉडल की है। 

इस मॉडल पर जो जानकारी आज सुबह तक दर्ज है, उसके अनुसार 12 मई को देश में 3,76,013 संक्रमणों के नए मामले आए, जबकि इस मॉडल ने 3,26,092 का अनुमान लगाया था। अब इसका अनुमान है कि 15 मई को यह संख्या तीन लाख के नीचे और 23 मई को दो लाख के नीचे और 3 जून को एक लाख के नीचे चली जाएगी। इसके बाद 8 जुलाई को यह संख्या 10 हजार से भी नीचे होगी। जुलाई और अगस्त में स्थितियाँ करीब-करीब सामान्य होंगी।

दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अनुमानों पर भी नजर डालनी चाहिए। इसके अनुसार 12 मई को दिल्ली में 14,440 नए मामले आए, जबकि इस मॉडल के अनुसार 15,711 आने चाहिए थे। उत्तर प्रदेश का आँकड़ा 11 मई तक का है, जिसके अनुसार 25,289 मामले आए, जबकि इनके मॉडल के अनुसार 23,290 होने चाहिए। इसकी वैबसाइट पर जाकर आप उन शहरों के आँकड़ों की तुलना भी कर सकते हैं, जिनका मॉडल इन्होंने तैयार किया है। मुझे यह मॉडल काफी हद तक सही लग रहा है।  

इनकी वैबसाइट का लिंक यहाँ है 

https://www.sutra-india.in/about

Thursday, May 13, 2021

संघ के कार्यक्रम में अजीम प्रेमजी का सम्बोधन


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 'Positivity Unlimited' नाम से ऑनलाइन भाषणों  की शुरुआत की है। ये भाषण 11 से 15 मई के बीच प्रसारित हो रहे हैं। इनका उद्देश्य लोगों में महामारी के बीच सकारात्मकता और विश्वास बढ़ाना है। यह श्रृंखला संघ की कोविड रेस्पॉन्स टीम आयोजित कर रही है। इसका प्रसारण दूरदर्शन पर रोज हो रहा है। इसके अंतर्गत गत 12 मई को विप्रो के प्रमुख अज़ीम प्रेमजी का भाषण हुआ।

प्रेमजी ने इस मौके पर कहा कि कोविड-19 के कारण पैदा हुए संकट का सामना करने की बुनियाद साइंस और सत्य पर आधारित होनी चाहिए। साथ ही इसका असर कितना गहरा और कितनी दूर तक हुआ है, इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। हमें सबसे पहले पूरी ताकत के साथ हर दिशा में सक्रिय होना चाहिए। साथ ही यह काम अच्छे विज्ञान के सहारे किया जाना चाहिए। जो काम विज्ञान के आधार पर नहीं होते, वे उद्देश्य को पूरा करने में बाधक होते हैं।

उन्होंने कहा कि अच्छे विज्ञान का मतलब है सत्य को स्वीकार करना और उसका सामना करना। यानी हमें वर्तमान संकट के आकार, उसकी गहराई और उसके प्रसार को पूरी तरह स्वीकार करना चाहिए। दो मिनट के वीडियो में प्रेमजी ने कहा कि इस स्थिति में पूरे देश को अपने मतभेदों के भुलाकर और एकजुट होकर समस्या का सामना करना चाहिए। हम जब एकसाथ होते हैं, तब ज्यादा ताकतवर होते हैं, जब बिखरे हुए होते हैं, तब कमजोर होते हैं।  

बांग्लादेश का चीन को जवाब

बांग्लादेश ने क्वॉड को लेकर चीन की चिंता का न केवल जवाब दिया है, बल्कि यह भी कहा है कि हमें विदेश-नीति को लेकर रास्ता न दिखाएं। हम खुद रास्ते देख लेंगे। के विदेश मंत्री डॉ अब्दुल मोमिन ने मंगलवार को कहा कि बांग्लादेश की विदेश नीति गुट-निरपेक्ष और संतुलनकारी सिद्धांत पर आधारित है और हम इसी के हिसाब से आगे बढ़ते हैं। बांग्लादेश के अखबार दे डेली स्टार ने भी अपने विदेशमंत्री के विचारों से मिलते-जुलते विचार व्यक्त किए हैं।

डॉ मोमिन ने मंगलवार को पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा, ''हम स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र हैं। हम अपनी विदेश नीति पर ख़ुद फ़ैसला करेंगे। लेकिन हाँ, कोई देश अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकता है। अगला क्या कहता है हम इसका आदर करते हैं लेकिन हम चीन से ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं करते हैं।'' उन्होंने इस बयान को खेदजनक बताया है।

डॉ मोमिन ने कहा, ''स्वाभाविक रूप से चीनी राजदूत अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे जो चाहते हैं, उसे कह सकते हैं। शायद वे नहीं चाहते हैं कि हम क्वॉड में शामिल हों। लेकिन हमें किसी ने क्वॉड में शामिल होने के लिए संपर्क नहीं किया है। चीन की यह टिप्पणी असमय (एडवांस में) आ गई है।''

चीनी बयान को लेकर केवल सरकार ने ही प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है, बल्कि वहाँ के विदेश-नीति विशेषज्ञों और मीडिया ने भी कहा है कि हमारा देश अपनी विदेश-नीति की दिशा खुद तय करेगा। इसके लिए किसी को बाहर से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। हाँ, हम सभी की बात सुनेंगे, पर जो करना है वह खुद तय करेंगे।

राजदूत का बयान

गत सोमवार को, बांग्लादेश में चीनी राजदूत ली जिमिंग ने ढाका में कहा, बांग्लादेश किसी भी तरह से क्वॉड में शामिल हुआ, तो चीन के साथ द्विपक्षीय संबंध गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाएंगे। जिमिंग ने कहा, हम नहीं चाहते कि बांग्लादेश इस गठबंधन में भाग ले।

Wednesday, May 12, 2021

यरूशलम में क्या हो रहा है?



इसराइल और फ़लस्तीनी अरबों के बीच पिछले शुक्रवार से भड़का संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले सोमवार को इसराइली सेना ने अल-अक़्सा मस्जिद में प्रवेश किया। इसके जवाब में हमस ने इसराइल पर दर्जनों रॉकेटों को छोड़ा। बीबीसी के अनुसार संघर्ष की ताज़ा घटना में फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमस ने कहा है कि उन्होंने इसराइल के शहर तेल अवीव पर 130 मिसाइलें दागी हैं। उन्होंने यह हमला गज़ा पट्टी में एक इमारत पर इसराइल के हवाई हमले का जवाब देने के लिए किया। भारत में इसराइल के राजदूत ने बताया है कि हमस के हमले में एक भारतीय महिला की भी मौत हो गई है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इसराइल ने गज़ा पट्टी में 13-मंज़िला एक अपार्टमेंट पर हमला किया। उन्होंने इससे डेढ़ घंटे पहले चेतावनी दी थी और लोगों को घरों से बाहर निकल जाने के लिए कहा था। इसराइली सेना का कहना है कि वे अपने इलाक़ों में रॉकेट हमलों के जवाब में गज़ा में चरमपंथियों को निशाना बना रहा है। 2017 के बाद से पश्चिम एशिया में दोनों पक्षों के बीच भड़की सबसे गंभीर हिंसा में अब तक कम-से-कम 31 लोगों की जान जा चुकी है। सैकड़ों लोग घायल हैं। इसराइली क्षेत्र में तीन लोगों की मौत हुई है. वहीं इसराइली हमले में अब तक कम-से-कम 28 फ़लस्तीनी मारे जा चुके हैं।

क्या है इसकी पृष्ठभूमि?

बीबीसी हिंदी की वैबसाइट में इस हमले की जो पृष्ठभूमि दी गई है, वह संक्षेप में इस प्रकार है: यह 100 साल से भी ज्यादा पुराना मुद्दा है। पहले विश्व युद्ध में उस्मानिया सल्तनत की हार के बाद पश्चिम एशिया में फ़लस्तीन के नाम से पहचाने जाने वाले हिस्से को ब्रिटेन ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया था। इस ज़मीन पर अल्पसंख्यक यहूदी और बहुसंख्यक अरब बसे हुए थे। दोनों के बीच तनाव तब शुरू हुआ जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ब्रिटेन को यहूदी लोगों के लिए फ़लस्तीन को एक 'राष्ट्रीय घर' के तौर पर स्थापित करने का काम सौंपा।

यहूदियों के लिए यह उनके पूर्वजों का घर है जबकि फ़लस्तीनी अरब भी इस पर दावा करते रहे हैं और इस क़दम का विरोध किया था। 1920 से 1940 के बीच यूरोप में उत्पीड़न और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान होलोकॉस्ट से बचकर भारी संख्या में यहूदी एक मातृभूमि की चाह में यहाँ पर पहुँचे थे। इसी दौरान अरबों और यहूदियों और ब्रिटिश शासन के बीच हिंसा भी शुरू हुई। 1947 में संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन को यहूदियों और अरबों के अलग-अलग राष्ट्र में बाँटने को लेकर मतदान हुआ और यरूशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर बनाया गया। इस योजना को यहूदी नेताओं ने स्वीकार किया जबकि अरब पक्ष ने इसको ख़ारिज कर दिया और यह कभी लागू नहीं हो पाया।

Tuesday, May 11, 2021

एशिया में तेज गतिविधियाँ और भारतीय विदेश-नीति की चुनौतियाँ

 


पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अचानक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। एक तरफ अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से वापसी शुरू हो गई है, वहीं अमेरिका के हटने के बाद की स्थितियों को लेकर आपसी विमर्श तेज हो गया है। अफगानिस्तान में हाल में हुए एक आतंकी हमले में 80 के आसपास लोगों की मृत्यु हुई है, जिनमें ज्यादातर स्कूली लड़कियाँ हैं। ये लड़कियाँ शिया मूल के हज़ारा समुदाय से ताल्लुक रखती हैं।

ऐसा माना जा रहा है कि यह हमला दाएश यानी इस्लामिक स्टेट ने किया है। इस हमले के बाद अमेरिका ने कहा है कि अफगान सरकार और तालिबान को मिलकर इस गिरोह से लड़ना चाहिए। दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री सऊदी अरब का दौरा करके आए हैं। इस दौरे के पीछे भी असली वजह अमेरिका के पश्चिम एशिया से हटकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर जाना है।

सऊदी अरब का प्रयास है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव खत्म हो, ताकि अफगानिस्तान में हालात पर काबू पाया जा सके, साथ ही इस इलाके में आर्थिक सहयोग का माहौल बने। इस बीच सऊदी अरब और ईरान के बीच भी सम्पर्क स्थापित हुआ है। जानकारों के अनुसार अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन का ईरान के साथ परमाणु समझौते को दोबारा बहाल करने की कोशिश करना और चीन का ईरान में 400 अरब डॉलर के निवेश के फ़ैसले के कारण सऊदी अरब के रुख़ में बदलाव नज़र आ रहा है।

अमेरिका की कोशिश भी ईरान से रिश्तों को सुधारने में है। इतना ही नहीं सऊदी और तुर्की रिश्तों में भी बदलाव आने वाला है। इस प्रक्रिया में भारत की नई भूमिका भी उभर कर आएगी। भारत ने प्रायः सभी देशों के साथ रिश्तों को सुधारा है। पाकिस्तान के कारण या किसी और वजह से तुर्की के साथ खलिश बढ़ी है, पर उसमें भी बदलाव आएगा।

आँकड़ों की बाजीगरी और पश्चिमी देशों के मीडिया की भारत के प्रति द्वेष-दृष्टि


भारत पर आई आपदा को लेकर अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों ने मदद भेजी है। करीब 16 साल बाद हमने विदेशी सहायता को स्वीकार किया है। आत्मनिर्भरता से जुड़ी भारतीय मनोकामना के पीछे वह आत्मविश्वास है, जो इक्कीसवीं सदी के भारत की पहचान बन रहा है। इस आत्मविश्वास को लेकर पश्चिमी देशों में एक प्रकार का ईर्ष्या-भाव भी दिखाई पड़ रहा है। खासतौर से कोविड-19 को लेकर पश्चिमी देशों की मीडिया-कवरेज में वह चिढ़ दिखाई पड़ रही है।

पिछले साल जब देश में पहली बार लॉकडाउन हुआ था और उसके बाद यह बात सामने आई कि सीमित साधनों के बावजूद भारत ने कोरोना का सामना मुस्तैदी से किया है, तो दो तरह की बातें कही गईं। एक तो यह कि भारत संक्रमितों की जो संख्या बता रहा है, वह गलत है। दूसरे लॉकडाउन की मदद से संक्रमण कुछ देर के लिए रोक भी लिया, तो लॉकडाउन खुलते ही संक्रमणों की संख्या फिर बढ़ जाएगी।

भारत की चुनौतियाँ

बहुत सी रिपोर्ट शुद्ध अटकलबाजियों पर आधारित थीं, पर अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर डिजीज डायनैमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी की ओर से पिछले साल मार्च में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत के लिए आने वाला समय चुनौतियों से भरा होगा। रिपोर्ट के अनुसार देश की स्वास्थ्य सुविधाओं में बहुत कमी है। देश में लगभग 10 लाख वेंटीलेटरों की जरूरत पड़ेगी, जबकि उपलब्धता 30 से 50 हजार ही है। अमेरिका में 1.60 लाख वेंटीलेटर भी कम पड़ रहे हैं, जबकि वहां की आबादी भारत से कम है।

Monday, May 10, 2021

कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव फिर टला


कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव एक बार फिर टल गया है। कांग्रेस कार्यसमिति की आज 10 मई को हुई वर्चुअल बैठक में महामारी की स्थिति को देखते हुए चुनाव टालने का फैसला किया गया। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में कहा गया कि कोरोना महामारी की मौजूदा स्थिति में चुनाव कराना ठीक नहीं होगा और इसलिए इसे स्थगित करने का फैसला लिया गया है। बैठक में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कोरोना की भयावह स्थिति का हवाला देकर कहा कि ऐसे हालात में फिलहाल चुनाव कराना ठीक नहीं होगा। गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा जैसे नेताओं ने भी गहलोत का समर्थन किया।

पार्टी के केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण ने 23 जून को चुनाव कराने का फैसला किया था। संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने आज की बैठक में 23 जून को चुनाव कराने का प्रस्ताव रखा, जिसे कार्यसमिति ने स्वीकार नहीं किया। बैठक में तय हुआ कि चुनाव के लिए नई तारीख की घोषणा सेंट्रल इलेक्शन अथॉरिटी बाद में करेगी। सन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार के बाद मई 2019 में राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद सोनिया गांधी को पार्टी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था। उसके दो साल बाद भी पार्टी के अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सका है। पहले माना जा रहा था कि जून में राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपी जा सकती है।