पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया राजनीतिक-विवाद का विषय बन गई है, वैसे ही जैसे बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले हुआ था। ममता बनर्जी ने इसे ऐसे राजनीतिक हथियार के रूप में पेश किया है, जो खासतौर से गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और अन्य कमजोर समुदायों के मतदाताओं को निशाना बनाता है, जिनके पास अक्सर सही दस्तावेज या स्थिर पते नहीं होते हैं।
निर्वाचन आयोग
के अनुसार एसआईआर का उद्देश्य डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना, त्रुटियों को ठीक करना और यह सुनिश्चित करना है
कि पात्र मतदाताओं के नाम ही सूची में रहें। आयोग ने इस बात को भी रेखांकित किया
है कि पश्चिम बंगाल में सूची का सत्यापन कर रहे चुनाव-कर्मचारियों के लिए धमकी भरे
माहौल में काम करना मुश्किल हो रहा है। उसने राज्य की मुख्यमंत्री पर उत्तेजक भाषण
देने, एसआईआर के बारे में भ्रामक दावे करने और जनता के मन में संदेह पैदा करने का
आरोप लगाया है।
यह मसला अब सुप्रीम कोर्ट में है, जिसे तय करना है कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता की रक्षा कैसे की जाए और उसके अधिकारियों के लिए सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों को कैसे सुनिश्चित किया जाए। साथ ही यह भी कि वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से कटने से किस प्रकार रोके जाएँ। क्या आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है, जिसमें गलत तरीके से हटाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय हैं? और यह भी कि राज्य सरकार क्या संविधानिक संस्थाओं की आलोचना से जुड़ी मर्यादा-रेखा पार कर चुकी है?
