Friday, September 24, 2021

कमला हैरिस से मोदी की मुलाकात


अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

अमेरिका दौरे पर गए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार 23 सितम्बर को अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से पहली बार आमने-सामने मुलाक़ात की। भारतीय मूल की कमला हैरिस ने पिछले वर्ष इतिहास रचा था जब वे अमेरिका में उपराष्ट्रपति पद तक पहुँचने वाली पहली अश्वेत और दक्षिण एशियाई मूल की राजनेता बनी थीं।

प्रधानमंत्री मोदी ने ह्वाइट हाउस में कमला हैरिस के साथ मुलाक़ात के बाद एक साझा प्रेस वार्ता में भारत और अमेरिका को स्वाभाविक सहयोगी बताया। उन्होंने ने कहा, भारत और अमेरिका स्वाभाविक सहयोगी हैं। हमारे मूल्य समान हैं, हमारे भू-राजनीतिक हित समान हैं।

नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ही ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से मुलाकात की। दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बन रहे समूह क्वाड के सदस्य हैं। मोदी और मॉरिसन ने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच आर्थिक के साथ-साथ आपसी संबंध मजबूत करने पर भी जोर दिया।

Thursday, September 23, 2021

मोदी की अमेरिका यात्रा

 

गुरुवार को वॉशिंगटन में भारतीय मूल की महिलाओं से मुलाकात करते हुए प्रधानमंत्री मोदी।

कोविड महामारी के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल मार्च में बांग्लादेश की एक संक्षिप्त यात्रा के बाद अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए अमेरिका पहुँच गए हैं। वे 26 सितंबर को देर रात दिल्ली लौटेंगे। फिलहाल निगाहें 24 सितम्बर को उनकी अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ बैठक पर होगी। शुक्रवार को ही ह्वाइट हाउस में क्वाड देशों के नेताओं की बैठक होगी। इसके बाद मोदी न्यूयॉर्क के लिए रवाना हो जाएंगे और 25 सितंबर को वहां संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र को संबोधित करेंगे।

मोदी वॉशिंगटन के होटल बिलार्ड में ठहरे हैं, वे यहां भी लोगों के अभिवादन का जवाब देते नजर आए। मोदी आज वे एपल के सीईओ टिम कुक समेत क्वालकॉम, एडोबी और ब्लैकस्टोन जैसी कंपनियों के प्रमुखों से भी होटल में ही मुलाकात कर रहे हैं। हरेक सीईओ को 15 मिनट का समय देने का निश्चय हुआ है।

उन्होंने सबसे पहले क्वालकॉम के सीईओ  क्रिस्टियानो आर अमोन से मुलाकात की। मोदी ने क्रिस्टियानो को भारत में मिलने वाले अवसरों के बारे में बताया। क्वालकॉम के सीईओ ने भारत के 5जी सेक्टर समेत कई क्षेत्रों में मिलकर काम करने की इच्छा जाहिर की। क्वालकॉम एक मल्टीनेशनल फर्म है, जो सेमीकंडक्टर, सॉफ्टवेयर और वायरलेस टेक्नोलॉजी सर्विस पर काम करती है।

वे उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से भी बातचीत करेंगे। दिन के आखिर में वे जापान के प्रधानमंत्री सुगा और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से बातचीत करेंगे। ये दोनों देश क्वॉड ग्रुप में शामिल हैं। भारत और अमेरिका भी क्वॉड में शामिल हैं।

Wednesday, September 22, 2021

संरा महासभा में क्या तालिबान का भाषण होगा?

सुहेल शाहीन

तालिबान को वैश्विक मान्यता मिलेगी या नहीं, इसका अनुमान संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठक के दौरान लगाया जा सकेगा। तालिबान शासन ने संरा से अनुरोध किया है कि हमारे प्रतिनिधि को महासभा में बोलने की अनुमति दी जाए। इसके लिए उन्होंने दोहा स्थित अपने प्रवक्ता सुहेल शाहीन को प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त कर दिया है। संरा की एक प्रामाणिकता (क्रेडेंशियल) समिति अब इस अनुरोध पर फैसला करेगी। इस समिति के नौ सदस्यों में अमेरिका, चीन और रूस के प्रतिनिधि भी शामिल हैं।

इस समिति की बैठक अगले सोमवार यानी 27 सितम्बर के पहले नहीं होगी। अमेरिका का कहना है कि हम इस विषय पर काफी सावधानी से विचार करेंगे। बहरहाल लगता यही है कि फिलहाल अफगानिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि गुलाम इसाकज़ई ही अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व करते रहेंगे, जो पिछली सरकार द्वारा नियुक्त हैं। इस बात की सम्भावना लग रही है कि 27 को वे अफगानिस्तान की ओर से वक्तव्य देंगे। संरा सुरक्षा परिषद की बैठकों में भी वही शामिल हुए थे। तालिबान ने अपने अनुरोध में कहा है कि वे अफगानिस्तान के प्रतिनिधि नहीं हैं। दुनिया के अनेक देशों की सरकारें उस सरकार को मान्यता नहीं देती हैं, जिसने उन्हें नियुक्त किया था।  

अब संयुक्त राष्ट्र के सामने सवाल है कि तालिबान के अनुरोध को स्वीकार करने का मतलब क्या नई सरकार को मान्यता देना नहीं होगा? इससे तालिबान को एक वैधानिक मंच मिल जाएगा। उधर संयुक्त राष्ट्र महासभा के हाशिए पर होने वाली दक्षेस देशों की बैठक इस साल नहीं हो पाएगी, क्योंकि यह तय नहीं हो सका है कि इस बैठक में अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व कौन करेगा। तालिबान या अशरफ ग़नी सरकार का प्रतिनिधि?

Tuesday, September 21, 2021

अफगानिस्तान में अमेरिकी सहयोग के बिना केवल चीनी सहायता से रास्ता नहीं निकलने वाला


वैश्विक एजेंडा पर इस हफ्ते भी अफगानिस्तान सबसे ऊपर है। तालिबान की विजय को एक महीना पूरा हो गया है, पर अस्थिरता कायम है। अफगानिस्तान के भीतर और बाहर भी। इस दौरान एक शिखर सम्मेलन व्लादीवोस्तक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम का हुआ, फिर 9 सितम्बर को दिल्ली में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन। उसके बाद दुशान्बे में शंघाई सहयोग संगठन का सम्मेलन। अब इस हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठक शुरू होगी, जिसमें दूसरी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण अफगानिस्तान का मसला है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें भाग लेंगे, पर उनकी यात्रा का ज्यादा महत्वपूर्ण एजेंडा है राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात का। 24 सितंबर को ह्वाइट हाउस में क्वॉड नेताओं का पहला वास्तविक शिखर-सम्मेलन होने जा रहा है। इसमें बाइडेन के साथ नरेंद्र मोदी, स्कॉट मॉरिसन और योशिहिदे सुगा शामिल होंगे। भारतीय राजनय के लिहाज से वह महत्वपूर्ण परिघटना होगी, पर वैश्विक-दृष्टि से एक और मुलाकात सम्भव है। संरा के हाशिए पर चीन और अमेरिका के राष्ट्रपतियों की मुलाकात। खासतौर से अफगानिस्तान के संदर्भ में।

शी-बाइडेन वार्ता

अफगानिस्तान को भटकाव से बचाने के लिए अमेरिका और चीन का आपसी सहयोग क्या सम्भव है? बाइडेन और शी चिनफिंग के बीच 9-10 सितंबर को करीब 90 मिनट लम्बी बातचीत ने इस सवाल को जन्म दिया है। दोनों नेताओं के बीच सात महीने से अबोला चल रहा था। इस फोन-वार्ता की पेशकश अमेरिका ने की थी। पर्यवेक्षकों के अनुसार दोनों देशों के लिए ही नहीं दुनिया के भविष्य के लिए दोनों का संवाद जरूरी है।

Monday, September 20, 2021

गहमा-गहमी के बाद तय हुआ चन्नी का नाम

पाँच महीने का मुख्यमंत्री? इंडियन
एक्सप्रेस में उन्नी का कार्टून

चुनाव के पाँच महीने पहले मुख्यमंत्री बदलने के कारण तो समझ में आए, पर वैकल्पिक मुख्यमंत्री के नाम पर विचार करने में पार्टी ने देरी की। दूसरे जिस व्यक्ति का चयन किया गया है, उससे जुड़े विवादों पर विचार करने का मौका भी पार्टी को नहीं मिला। चरणजीत सिंह चन्नी की दो बातें उनके पक्ष में गईं। एक तो उनका दलित आधार और दूसरे नवजोत सिंह की जोरदार पैरवी।

अब राज्य में पार्टी और सरकार के बीच दूरी नहीं रहेगी। पर मुख्यमंत्री के चयन के दौरान कई नामों के विरोध से यह बात भी सामने आई है कि पार्टी के भीतर आपसी टकराव काफी हैं। पार्टी सर्वानुमति से फैसला नहीं कर पाई। फैसला हुआ भी तो भीतरी टकराव सामने आया। पार्टी के भीतर सिख बनाम हिन्दू की अवधारणा का टकराव भी देखने को मिला।

नए मुख्यमंत्री का नाम तय होने के बाद भी यह विवाद खत्म होने वाला नहीं है, क्योंकि पंजाब के प्रभारी हरीश रावत ने किसी चैनल पर कह दिया कि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री नवजोत सिंह सिद्धू बनेंगे। इस बात पर सुनील जाखड़ ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सिद्धू समर्थक भी इस बात से नाराज है कि उनके नेता को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। अब प्रतिक्रियाएं श्रृंखला की शक्ल लेंगी और उनके जवाब आएंगे। शायद नेतृत्व ने इन बातों पर विचार नहीं किया था।

राज्य में 32 फीसदी दलित आबादी है और इन्हें अपनी तरफ खींचने की कोशिश सभी पार्टियाँ कर रही हैं। शिरोमणि अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ पहले ही गठबंधन कर लिया है और पहले से कहा है कि यदि उनकी सरकार बनी तो दलित उप-मुख्यमंत्री बनेगा। आम आदमी पार्टी भी दलित वोटबैंक के पीछे है। भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि हमारी सरकार बनी तो दलित को मुख्यमंत्री बनाएंगे। बहरहाल कांग्रेस ने बना दिया। सवाल है कि यदि पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला, तब भी क्या वह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाएगी?

Sunday, September 19, 2021

राहुल-प्रियंका नेतृत्व की परीक्षा की घड़ी


पंजाब में जो राजनीतिक बदलाव हुआ है, उसका श्रेय राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को दिया जा रहा है। पिछले कुछ समय से दोनों पार्टी को दिशा दे रहे हैं, इसलिए आने वाले समय में इन दोनों की परीक्षा होगी। पंजाब में नेतृत्व का सवाल हल होने के बाद चुनाव और उसके बाद की परिस्थितियों से जुड़े फैसले अब उन्हें ही करने होंगे। उसके साथ-साथ पर्यवेक्षक यह भी कह रहे हैं कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मसले भी सिर उठाएंगे।

ऐसा लगता है कि कांग्रेस हाईकमान सबसे पहले अपने ऊपर लगे कमजोर-नेतृत्व के विशेषण को हटाना चाहती है। इसके लिए जरूरी है कि फैसले होने चाहिए। सही या गलत का निर्णय समय करेगा। पंजाब के फैसले को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर बहस शुरू हो गई है, पर ज्यादातर लोग मानते हैं कि राहुल और प्रियंका ने अपनी उपस्थिति को दिखाना शुरू किया है। एक तरह से यह जी-23 के नाम भी संदेश है।

लगता यह भी है कि पार्टी ने होमवर्क किए बगैर अमरिंदर को हटाने का फैसला कर लिया गया है। अन्यथा अबतक नए मुख्यमंत्री का नाम सामने आ जाता। तार्किक रूप से नवजोत सिद्धू को यह पद दिया जाना चाहिए।  

राजनीतिक दृष्टि

नेतृत्व की उपस्थिति साबित होने के अलावा देखना यह भी होगा कि इसके पीछे की राजनीतिक-दृष्टि क्या है और दूरगामी विचार क्या है। बताते हैं कि कांग्रेस के महामंत्री अजय माकन ने चंडीगढ़ में पार्टी के ऑब्ज़र्वर के रूप में जाने के पहले शुक्रवार की शाम को राहुल गांधी से भेंट की।

इसके बाद वे अभिषेक सिंघवी से भी मिले और यह जानकारी ली कि यदि अमरिंदर सिंह विधानसभा भंग करने की सिफारिश करें या केंद्रीय नेतृत्व का निर्देश मानने के बजाय इस्तीफा देने से इनकार कर दें, तब क्या होगा। उस समय तक 60 से ज्यादा विधायकों के हस्ताक्षरों से एक पत्र हाई कमान के पास आ चुका था। यानी पार्टी ने कानूनी व्यवस्थाएं भी कर ली थीं।

दुशान्बे और ‘ऑकस’ के निहितार्थ


वैश्विक-राजनीति और भारतीय विदेश-नीति के नज़रिए से इस हफ्ते की तीन घटनाएं ध्यान खींचती हैं। इन तीनों परिघटनाओं के दीर्घकालीन निहितार्थ हैं, जो न केवल सामरिक और आर्थिक घटनाक्रम को प्रभावित करेंगे, बल्कि वैश्विक-स्थिरता और शांति के नए मानकों को निर्धारित करेंगे। इनमें पहली घटना है, ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे में हुआ शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का शिखर सम्मेलन। दूसरी परिघटना है ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच हुआ सामरिक समझौता ऑकस

तीसरी परिघटना और है, जिसकी तरफ मीडिया का ध्यान अपेक्षाकृत कम है।ऑकसघोषणा के अगले ही दिन चीन ने ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप में शामिल होने की अर्जी दी है। अब दुनिया का और खासतौर से भारतीय पर्यवेक्षकों का ध्यान अगले सप्ताह अमेरिका में क्वॉड के पहले रूबरू शिखर सम्मेलन और फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठक पर होगा। इस बैठक का महत्व प्रचारात्मक होता है, पर हाशिए पर होने वाला मेल-मिलाप महत्वपूर्ण होता है।

अफगान समस्या

दुनिया के सामने इस समय अफगानिस्तान बड़ा मसला है। इस लिहाज से दुशान्बे सम्मेलन का महत्व है। एससीओ का जन्म 2001 में 9/11 के कुछ सप्ताह पहले उसी साल हुआ था, जिस साल अमेरिका ने तालिबान के पिछले शासन के खिलाफ कार्रवाई की थी। इसके गठन के पीछे चीन की बुनियादी दिलचस्पी मध्य एशिया के देशों और रूस के साथ अपनी सीमा के प्रबंधन को लेकर थी। खासतौर से 1991 में सोवियत संघ का विघटन होने के बाद मध्य एशिया के नवगठित देशों में स्थिरता की जरूरत थी। पर अब उसका दायरा बढ़ रहा है। इस समय अफगानिस्तान में स्थिरता कायम करने में इसकी भूमिका देखी जा रही है।

Saturday, September 18, 2021

अमरिंदर सिंह के इस्तीफे से खत्म नहीं होगा कांग्रेस का पंजाब-द्वंद्व



 अब यह करीब-करीब साफ है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के पीछे कांग्रेस हाईकमान की भूमिका है। नवजोत सिंह सिद्धू का इस्तेमाल किया गया है। कहा जा रहा है कि आलाकमान ने कैप्टन पर विधायकों के कहने पर दबाव बनाया, पर कांग्रेस पार्टी के भीतर विधायकों को जब हाईकमान की इच्छा समझ में आ जाती है, तब उनका व्यवहार उसी हिसाब से बदलता है। बहरहाल अब मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह बात महत्वपूर्ण नहीं है। देखना यह होगा कि पार्टी अब आगे की राजनीति का संचालन किस प्रकार करेगी।

अलबत्ता यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि हाईकमान को कैप्टेन से क्या शिकायत हो सकती है। एक बात कही जा रही है कि राज्य में सरकार के खिलाफ जबर्दस्त एंटी-इनकम्बैंसी है। इसलिए नए चेहरे के साथ चुनाव में जाना बेहतर होगा। ऐसी बात थी, तो इतने टेढ़े तरीके से बदलाव की जरूरत क्या थी? महीनों पहले हाईकमान को अमरिंदर को यह बात बता देनी चाहिए थी। अब विधानसभा चुनाव नए मुख्यमंत्री, नवजोत सिद्धू और गांधी परिवार के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। श्रेय भी उन्हें मिलेगा। 

अमरिंदर सिंह का कहना है कि दो महीने में तीन-तीन बार विधायकों की बैठक बुलाने का मतलब क्या था? कल रात अचानक घोषणा हुई कि शनिवार की शाम पांच बजे विधायकों की बैठक होगी।

सूत्रों का कहना है कि 80 में से 50 से अधिक विधायकों ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर मांग की थी कि अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री के पद से हटाया जाए, जिसके कारण विधायकों की आपात बैठक बुलानी पड़ी। विचित्र बात है कि हाईकमान ने विधायकों से सवाल पूछने की कोशिश नहीं की और मुख्यमंत्री से भी बात नहीं की।

Friday, September 17, 2021

चीनी घेराबंदी में अमेरिका का एक और दाँव


ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और युनाइटेड किंगडम के बीच एक महत्वपूर्ण सुरक्षा समझौता हुआ है, जिसके अंतर्गत अब ऑस्ट्रेलिया को शक्तिशाली नाभिकीय शक्ति चालित पनडुब्बियाँ मिल जाएंगी। ऑकस यानी ऑस्ट्रेलिया, यूके और यूएस। इन तीनों देशों के बीच ऑकस नाम से प्रसिद्ध यह समझौता हिंद-प्रशांत क्षेत्र को कवर करेगा।

माना जा रहा है कि यह दाँव चीन को चित्त करने के इरादे से खेला गया है। हफ़्ते भर पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से फ़ोन पर बात की थी और कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखनी चाहिए। उस बातचीत के एक सप्ताह बाद ही अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने यह महत्वपूर्ण रक्षा समझौता किया है।

इस करार के तहत रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा। इस समझौते को लेकर चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि अब नाभिकीय पनडुब्बियों का बुखार पूरी दुनिया को चढ़ेगा। वॉशिंगटन में चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा है कि तीसरे पक्ष के हितों को टारगेट करते हुए अलग ब्लॉक नहीं बनाना चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया, परमाणु अप्रसार संधि के पक्ष में है। इस समझौते के बाद भी एक ग़ैर-परमाणु देश के तौर पर अपना दायित्व पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।

ऑकस सुरक्षा समझौते पर एक संयुक्त बयान जारी कर कहा गया है, ऑकस के तहत पहली पहल के रूप में हम रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।…इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा और ये हमारे साझा मूल्यों और हितों के समर्थन में तैनात होंगी। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के उन सात देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिनके पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ होंगी। इससे पहले अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, भारत और रूस के पास ही यह तकनीक थी।

बीबीसी के रक्षा मामलों के संवाददाता जोनाथन बील के अनुसार इस समझौते का असर मुख्य रूप से दो देशों पर पड़ेगा। पहला है फ़्रांस और दूसरा है चीन। इस समझौते की वजह से ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस के साथ किया एक सौदा रद्द कर दिया है। 2016 में ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए फ़्रांसीसी-डिज़ाइन की 12 पनडुब्बियों के निर्माण का फ़्रांस को कॉन्ट्रैक्ट मिला था। इस अनुबंध की लागत क़रीब 50 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर थी। यह सौदा ऑस्ट्रेलिया का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा माना गया था।

ऑकस को लेकर एक सवाल यह भी कि 'क्वॉड' समूह के होते हुए अमेरिका को इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? क्वॉड में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ जापान और भारत भी है। पर उसमें 'हाई-टेक्नोलॉजी' ट्रांसफर की बात नहीं है।

 

क्वॉड को लेकर भारत और जापान के मन में कुछ संशय हैं। भारत की दिलचस्पी रूस और ईरान के साथ भी रिश्ते बनाने की है। जापान के चीन के साथ अच्छे व्यापारिक रिश्ते हैं। चीन की बीआरआई परियोजना में भी जापान का सहयोग है। जापान, चीन के साथ अपने सारे संबंध ख़त्म नहीं करना चाहता है।

ग्लोबल टाइम्स के लेख में कहा गया है इस समझौते के साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने ख़ुद को चीन का विरोधी बना लिया है। 50 साल में यह पहली बार है जब अमेरिका अपनी पनडुब्बी तकनीक किसी देश से साझा कर रहा है। इससे पहले अमेरिका ने केवल ब्रिटेन के साथ यह तकनीक साझा की थी।

 

 

तालिबान की आंतरिक कलह बरकरार

तालिबान प्रवक्ता ज़बीहुल्ला मुजाहिद मतभेदों का खंडन करते हुए

तालिबान के सह-संस्थापक और कार्यवाहक उप-प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने कहा है कि तालिबान के भीतर किसी प्रकार की आंतरिक कलह नहीं है, फिर भी पर्यवेक्षक इस बात को पूरी तरह सही नहीं मान रहे हैं। अलबत्ता वे यह भी मानते हैं कि यह असहमति सरकार के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं बनेगी।

सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, बरादर ने पहले एक ऑडियो संदेश जारी किया था, फिर बुधवार को अफगान राष्ट्रीय टीवी के साथ एक साक्षात्कार में पिछले उन्होंने राष्ट्रपति भवन में हुए किसी विवाद में घायल होने या मारे जाने की अफवाहों का खंडन किया। इस साक्षात्कार की क्लिप को तालिबान के राजनीतिक कार्यालय ने ट्विटर पर पोस्ट किया गया है। बरादर ने कहा, मैं पूरी तरह से ठीक हूं।

दूसरी तरफ समाचार एजेंसी एपी ने कैथी गैनन की एक विशेष रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा गया है कि तालिबान के भीतर नरमपंथियों और कट्टरपंथियों के बीच पृष्ठभूमि में असहमतियाँ और टकराव जारी है। यह टकराव पिछले हफ्ते देश में कट्टरपंथियों के प्रभुत्व वाली सरकार के गठन के बाद और बढ़ गया है।

यह टकराव पृष्ठभूमि में है, पर अफवाहों के कारण इसके बारे में बातें  बढ़-चढ़ कर सुनाई पड़ रही हैं। अब्दुल ग़नी बरादर नरमपंथी ग्रुप से वास्ता रखते हैं। अमेरिका के साथ तालिबान की वार्ता में वे ही सबसे आगे थे। गत 15 अगस्त को काबुल पर कब्जे के बाद उन्होंने दुनिया को आश्वस्त किया था कि देश में समावेशी सरकार बनेगी, पर ऐसा हुआ नहीं।

Wednesday, September 15, 2021

स्कूल खोलने के खतरे हैं, पर उनकी जरूरत भी है


हालांकि महामारी की तीसरी और चौथी लहरों का खतरा सिर पर है, फिर भी दुनियाभर में स्कूल फिर से खुल रहे हैं। दूसरी तरफ बच्चों के संरक्षकों की चिंताएं बढ़ रही हैं, अदालतों ने कई तरह के एहतियात बरतने के निर्देश दिए हैं, फिर भी बहुत से लोग सवाल कर रहे हैं कि जल्दी क्या है? कुछ समय और रुक जाते, तो क्या हो जाता?  बेशक स्कूलों को खोलने के खतरे हैं, पर कम से कम तीन बड़े कारणों से उन्हें अब खोलने की जरूरत है।

स्कूलों के बंद होने से पूरी एक पीढ़ी समय से पीछे चली गई है, उसे और पीछे धकेलना ठीक नहीं। दूसरे, स्कूलों यानी शिक्षा का रिश्ता पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से है। पिछले साल के शटडाउन के बाद जब शेष व्यवस्था को खोला गया, तो स्कूलों को भी देर-सबेर खोलना होगा। जितनी देर लगाएंगे, नुकसान उतना ज्यादा होगा। तीसरे, बड़ी संख्या में बहुत से लोगों की रोजी-रोटी स्कूलों के साथ जुड़ी हुई है। इनमें शिक्षकों, शिक्षा-सामग्री तैयार करने वालों, बच्चों की यूनिफॉर्म तैयार करने वालों, रिक्शा चालकों से लेकर बस ड्राइवरों, आयाओं और ऐसे तमाम लोगों की रोजी-रोटी का सवाल है। उनका जीवन दूभर हुआ जा रहा है।

एहतियात की जरूरत

स्कूल खोले जाएंगे, तब साथ में कई प्रकार की एहतियात भी बरती जाएंगी। सच यह भी है कि बच्चे अब घरों से बाहर निकलने लगे हैं। मसलन काफी बच्चों ने ट्यूशन पढ़ना शुरू कर दिया है। अपने अपार्टमेंट, कॉलोनी या गाँव में वे खेल भी रहे हैं। दूसरी सामूहिक गतिविधियों में भी शामिल होने लगे हैं। पर औपचारिक स्कूलिंग का अपना महत्व है।

स्कूलों की बंदी का प्रभाव अलग-अलग देशों पर अलग-अलग तरीके से पड़ा है। भारत उन देशों में है, जहाँ स्कूल सबसे लम्बे समय तक बंद रहे हैं। इसका सबसे बड़ा असर ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ा है। उन गरीब घरों के बच्चे कई साल पीछे चले गए हैं, जिन्हें शिक्षा की मदद से आगे आने का मौका मिलता। काफी बच्चों की शिक्षा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। इस साल जुलाई तक दुनिया के करीब 175 देशों में स्कूल फिर से खुल गए थे। भारत भी कब तक उन्हें बंद रखेगा? कुछ देशों में जैसे कि फ्रांस, डेनमार्क, पुर्तगाल और नीदरलैंड्स में ज्यादातर, खासतौर से प्राइमरी स्कूल उस वक्त भी खुले रहे, जब महामारी अपने चरम पर थी।

Tuesday, September 14, 2021

मुल्ला बरादर की काबुल में गैर-हाज़िरी के पीछे कोई न कोई वजह तो है


अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार में नव नियुक्त उप प्रधानमंत्री मुल्ला बरादर की अनुपस्थिति को लेकर कयास जारी हैं। पिछले हफ्ते तालिबान सरकार की घोषणा होने के पहले तक माना जा रहा था कि वे नई सरकार में प्रधानमंत्री बनेंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। उनकी जगह मोहम्मद हसन अखुंद को प्रधानमंत्री बनाया गया, जिन्होंने कभी बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को तोड़ने के काम का नेतृत्व किया था। बताया जाता है कि तालिबान सरकार के पदों को तय करने में पाकिस्तान की भूमिका है। 

दोहा में सोमवार को तालिबान के राजनीतिक दफ़्तर के प्रवक्ता डॉक्टर मोहम्मद नईम की ओर से तालिबान सरकार के उप-प्रधानमंत्री और राजनीतिक दफ़्तर के प्रमुख मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर के ग़ायब होने को लेकर एक वॉट्सऐप ऑडियो संदेश जारी किया गया।

इस ऑडियो संदेश में मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर ने कहा, 'कई दिनों से सोशल मीडिया पर ये ख़बरें गर्दिश कर रही हैं, मैं उन्हीं दिनों में सफ़र में था और कहीं गया हुआ था। अलहम्दुलिल्लाह मैं और हमारे तमाम साथी ठीक हैं। अक्सर औक़ात मीडिया हमारे ख़िलाफ़ ऐसे ही शर्मनाक झूठ बोलता है।'

बीबीसी हिंदी ने इस सिलसिले में इस्लामाबाद से ख़ुदा-ए-नूर नासिर की एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। यह रिपोर्ट बीबीसी की उर्दू वैबसाइट पर भी है।

इससे पहले 12 सितंबर को मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर के एक प्रवक्ता मूसा कलीम की ओर से एक पत्र जारी हुआ था जिसमें कहा गया था, जैसे कि वॉट्सऐप और फेसबुक पर अफ़वाह चल रही थी कि अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति भवन में तालिबान के दो गिरोहों के बीच गोलीबारी में मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर बुरी तरह ज़ख़्मी हुए और फिर इसके कारण उनकी मौत हो गई। ये सब झूठ है।

अलबत्ता बीबीसी की रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है, लेकिन दोहा और काबुल में तालिबान के दो ज़राए (सूत्रों) ने बीबीसी को बताया है कि गुज़श्ता जुमेरात या जुमे की रात को अर्ग में मुल्ला अब्दुल ग़नी बिरादर और हक्कानी नेटवर्क के एक वज़ीर ख़लील अलरहमान के दरम्यान तल्ख़-कलामी हुई और उनके हामियों में इसी तल्ख़-कलामी पर हाथापाई हुई थी, जिसके बाद मुल्ला बिरादर नई तालिबान हुकूमत से नाराज़ हो कर क़ंधार चले गए। ज़राए के मुताबिक़ जाते वक़्त मुल्ुला अबदुलग़नी बिरादर ने हुकूमत को बताया कि उन्हें ऐसी हुकूमत नहीं चाहिए थी।

Monday, September 13, 2021

स्त्रियों की उपेक्षा और अनदेखी करने वाले समाज का नाश निश्चित है


शनिवार 11 सितम्बर को काबुल विश्वविद्यालय के लेक्चर रूम में तालिबान समर्थक करीब 300 अफगान महिलाएं इकट्ठा हुईं थी। सिर से पांव तक पूरी तरह से ढंकी ये महिलाएं हाथों में तालिबान का झंडा लिए हुए थीं। इस दौरान कुछ महिलाओं ने मंच से संबोधित कर तालिबान के प्रति वफादारी की कसमें भी खाईं। इन अफगान महिलाओं की तस्वीरों ने इस्लामिक अमीरात में महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की झलक दिखाई है। कोई इनके हाथ को न देख सके इसके लिए उन्होंने काले रंग के दस्ताने पहन रखे थे। इन महिलाओं ने वायदा किया कि वे लैंगिक अलगाव की तालिबान-नीति का पूरी तरह पालन भी करेंगी।

इसके पहले 2 सितम्बर को अफगानिस्तान के पश्चिमी हेरात प्रांत में गवर्नर कार्यालय के बाहर लगभग तीन दर्जन महिलाओं ने प्रदर्शन किया। उनकी मांग थी कि नई सरकार में महिला अधिकारों के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। इस रैली की आयोजक फ्रिबा कबरजानी ने कहा कि ‘लोया जिरगा’ और मंत्रिमंडल समेत नई सरकार में महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अफगान महिलाएं आज जो कुछ भी हैं, उसे हासिल करने के लिए उन्होंने पिछले 20 साल में कई कुर्बानियां दी हैं। कबरजानी ने कहा, “हम चाहते हैं कि दुनिया हमारी सुने और हम अपने अधिकारों की रक्षा चाहते हैं।” 

Sunday, September 12, 2021

भारत ऑस्ट्रेलिया टू प्लस टू

टू प्लस टू वार्ता में शामिल भारत और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा और विदेशमंत्री

भारत ने शनिवार को ऑस्ट्रेलिया के साथ नई दिल्ली में पहली बार 2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद की मेजबानी की। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने ऑस्ट्रेलिया के रक्षामंत्री पीटर ड्यूटन और विदेशमंत्री मैरिस पाइन
 के साथ अफगानिस्तान के राजनीतिक बदलाव पर चर्चा की।

जून 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच वर्चुअल वार्ता के दौरानभारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक साझेदारी पर बातचीत हुई थी। दोनों देशों के बीच यह साझेदारी एक मुक्तखुलेसमावेशी और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझा दृष्टिकोण पर आधारित थी। इस क्षेत्र में शांतिविकास और व्यापार के मुक्त प्रवाहनियम-आधारित व्यवस्था और आर्थिक विकास में ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों का अहम योगदान है।

बैठक के बाद संयुक्त बयान के अनुसार मंत्रियों ने आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद का मुकाबला करनेआतंकवाद के वित्तपोषण का मुकाबला करनेआतंकवाद और हिंसक उग्रवाद के लिए इंटरनेट के शोषण को रोकनेकानून प्रवर्तन सहयोग को मजबूत करने सहित आतंकवाद के क्षेत्र में सहयोग जारी रखने पर सहमति व्यक्त की। बयान में कहा गया है कि दोनों पक्षों ने संयुक्त राष्ट्रजी20जीसीटीएफएआरएफआईओआरए और एफएटीएफ जैसे बहुपक्षीय मंचों के साथ-साथ क्वॉड परामर्श में आतंकवाद का मुकाबला करने में सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

मालाबार अभ्यास

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने रक्षा संबंधों के महत्व को दोहराया। साथ ही मंत्रियों ने दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग को स्वीकार किया और रक्षा जुड़ाव बढ़ाने की पहल पर चर्चा की. बयान में कहा गया कि दोनों पक्षों ने हाल ही में संपन्न मालाबार अभ्यास 2021 की सफलता का भी स्वागत किया। मंत्रियों ने मालाबार अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया की निरंतर भागीदारी का स्वागत किया। इस बात की सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि ऑस्ट्रेलिया अब मालाबार अभ्यास में स्थायी रूप से भाग लेगा। ऑस्ट्रेलिया ने भारत को भविष्य के तलिस्मान सैबर युद्धाभ्यास में भाग लेने के लिए आमंत्रित कियाजो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच हरेक दो साल में आयोजित होता है।

तालिबान समर्थक स्त्रियाँ भी सामने आईं



शनिवार को काबुल विश्वविद्यालय के लेक्चर रूम में तालिबान समर्थक करीब 300 अफगान महिलाएं इकट्ठा हुईं थी। सिर से पांव तक पूरी तरह से ढंकी ये महिलाएं हाथों में तालिबान का झंडा लिए हुए थीं। इस दौरान कुछ महिलाओं ने मंच से संबोधित कर तालिबान के प्रति वफादारी की कसमें भी खाईं।

इन अफगान महिलाओं की तस्वीरों ने इस्लामिक अमीरात में महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की झलक दिखाई है। कोई इनके हाथ को न देख सके इसके लिए उन्होंने काले रंग के दस्ताने पहन रखे थे। इन महिलाओं ने वायदा किया कि वे लैंगिक अलगाव की तालिबान-नीति का प्रतिबद्धता के साथ पालन भी करेंगी।

नवभारत टाइम्स में पढ़ें विस्तार से

जेहादी-जीत का जश्न

9/11 की 20वीं बरसी को जेहादी अपनी दोहरी जीत के तौर पर मना रहे हैं. यह मौका तालिबान की सत्ता में वापसी का भी है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी को जेहाद के लिए एक तख़्तापलट और देश से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। 20 साल पहले अमेरिका में विमानों को अगवा किए जाने के लिए ज़िम्मेदार आतंकी संगठन अल-क़ायदा ने तालिबान को उसकी 'ऐतिहासिक जीत' के लिए आगे बढ़कर बधाई दी है। यह सब कुछ ऐसे वक़्त में हो रहा है जब पश्चिमी ताक़तें मुस्लिम बहुल हिंसा प्रभावित देशों से अपनी सेनाओं की संख्या कम कर रही हैं।

बीबीसी हिंदी पर विस्तार से पढ़ें मीना अल-लामी का यह आलेख

ग्वांतानामो बे के पाँच कैदी

9/11 हमले की मनहूस वर्षगांठ पर नए सिरे से उसके उन पांच संदिग्धों पर ध्यान देने की ज़रूरत है जिन पर उस साज़िश को रचने का आरोप है। ख़ालिद शेख़ मोहम्मद समेत ये पांचों अभियुक्त ग्वांतानामो बे में इसी हफ़्ते कोरोना वायरस की वजह से 18 महीने के अंतराल के बाद पेश हुए। इस प्री-ट्रायल को देखने वहां इस हमले के शिकार लोगों के रिश्तेदार, एनजीओ के सदस्य और कुछ चुनिंदा पत्रकार भी मौजूद थे। पहले ही दुनिया से कटा हुआ महसूस करने वाले ग्वांतानामो बे और इस मुक़दमे की भयावहता को देखते हुए यह कोर्ट-रूम पहले ही अपने आप में अनूठा था।

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अफगानिस्तान पर असमंजस

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार एक बड़ी गलती करने से बच गई। नई सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह के लिए 11 सितम्बर की तारीख घोषित कर दी गई थी, जिसे बाद में रद्द किया गया। बताया जाता है कि चीन ने सलाह दी कि ऐसी गलती मत करना। फिर भी तालिबान ने उस रोज अपने राष्ट्रपति भवन पर तालिबानी झंडा फहरा कर नई सरकार के औपचारिक कार्यारम्भ की घोषणा की। यानी वे इस दिन से जुड़ी प्रतीकात्मकता को छोड़ेंगे नहीं। 9/11 का आतंकी हमला अमेरिका के इतिहास का काला दिन है। इस दिन शपथ-ग्रहण का मतलब था अमेरिका को साफ इशारा। चूंकि वह हमला अलकायदा ने किया था, इसलिए मतलब साफ था कि हम अलकायदा के साथ हैं। तालिबान और चीन अभी अमेरिका से पंगा लेना नहीं चाहेंगे।

ब्रिक्स सम्मेलन

अफगानिस्तान में कई तरह का धुँधलका है, जिसे साफ होने में समय लगेगा। गत 9 सितम्बर को हुए ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में इस बात पर आम सहमति थी कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल वैश्विक आतंकवाद के लिए नहीं होना चाहिए। सम्मेलन का घोषणापत्र हालांकि भारत की अध्यक्षता में जारी हुआ है, पर इसे भारतीय विदेश-नीति की पूरी अभिव्यक्ति नहीं मान लेना चाहिए। आतंकवाद को लेकर भारत और दूसरी तरफ रूस और चीन के दृष्टिकोणों में अंतर है और ब्रिक्स में इन देशों का खासा प्रभाव है।

चीनी रवैया

यह बात पाँच साल पहले अक्तूबर 2016 में गोवा में हुए ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में स्पष्ट हो गई थी। लगभग उसी समय अमेरिका ने तालिबान के साथ गुपचुप सम्पर्क बना लिया था। सन 2018 को अमेरिका और कतर के प्रभाव से पाकिस्तान ने मुल्ला बरादर को जेल से रिहा कर दिया था। पाकिस्तान ने उन्हें 2010 में गिरफ्तार किया था। अमेरिका-पाकिस्तान-चीन-रूस रिश्तों की भावी रूपरेखा तभी से बनने लगी थी। गोवा ब्रिक्स सम्मेलन जिस साल हुआ उसी साल पठानकोट और उड़ी पर पाकिस्तानी हमले हुए थे और इस सम्मेलन के ठीक पहले भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक किया था।

Saturday, September 11, 2021

‘राजनीतिक हिन्दुत्व’ पर सम्मेलन

 

राजनीतिक हिन्दुत्व को लेकर दुनिया के 53 से ज्यादा विश्वविद्यालयों से जुड़े अकादमिक विद्वानों का एक वर्चुअल सम्मेलन 10 से 12 सितम्बर के बीच चल रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालयों के इन विभागों के सहयोग से हो रहा है। सम्मेलन को लेकर विवाद की एक लहर है, जो भारतीय राजनीति और समाज को जरूर प्रभावित करेगी। सम्मेलन का शीर्षक विचारोत्तेजक है। शीर्षक है, ग्लोबल डिस्मैंटलिंग ऑफ ग्लोबल हिंदुत्व यानी वैश्विक हिंदुत्व का उच्छेदन। इस सम्मेलन के आलोचक पूछते हैं कि क्या आयोजक ऐसा ही कोई सम्मेलन ग्लोबल इस्लाम को लेकर करने की इच्छा रखते हैं? छोड़िए इस्लाम क्या वे डिस्मैंटलिंग कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चायना का आयोजन कर सकते हैं?  

हिंदू और हिंदुत्व का फर्क

सम्मेलन के आयोजक राजनीतिक हिंदुत्व और हिंदू धर्म के बीच सैद्धांतिक रूप से अंतर मानते हैं, पर भारतीय राजनीति में हिंदू और हिंदुत्व का अंतर किया नहीं जाता और व्यावहारिक रूप से हिंदुत्व के आलोचक भी हिंदू और हिंदुत्व के अंतर को अपनी प्रतिक्रियाओं में व्यक्त नहीं करते। बल्कि सम्मेलन के पहले ही दिन विमर्श में शामिल पैनलिस्ट मीना धंढा ने साफ कहा कि मुझे दोनों में कोई फर्क नजर नहीं आता है। बहरहाल इस सम्मेलन के नकारात्मक प्रभाव होंगे। इसके समर्थक मानते हैं कि इसे हिंदू धर्म के खिलाफ अभियान नहीं मानना चाहिए, पर इसके विरोधी सम्मेलन को हिंदू विरोधी मान रहे हैं।

Thursday, September 9, 2021

अब खुलेंगे तालिबान से जुड़े मुद्दे


तालिबान सरकार घोषित होने के अफगानिस्तान के दूतावासों का क्या होगा
? क्या वहाँ नए कर्मचारी आएंगे? यह सवाल तब खड़ा होगा, जब दुनिया की सरकारें तालिबान सरकार को मान्यता देंगी। काबुल में नई सरकार की घोषणा होने के बाद अफगानिस्तान के नई दिल्ली स्थित दूतावास ने एक बयान जारी करके कहा है कि यह सरकार अवैध है। अफगान दूतावास का बयान तालिबान से खुद को दूर करता है, जिन्होंने पिछले महीने सत्ता संभाली थी। सवाल यह भी है कि दूतावास की हैसियत क्या होगी? दुनिया भर में अफगानिस्तान के दूतावासों का अब क्या होगा?

यह सवाल भारत सहित अधिकतर तालिबान के नेतृत्व वाले नए शासन की मान्यता के मुद्दों को खोलेगा। भारत की स्थिति महत्वपूर्ण होगी क्योंकि यह सुरक्षा परिषद का एक अस्थायी सदस्य है और यूएनएससी प्रतिबंध समिति की अध्यक्षता करता है। संयुक्त राष्ट्र को अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन के भविष्य के बारे में फैसला करना होगा, जिसका कार्यादेश इसी महीने समाप्त हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति को भी उन प्रतिबंधित आतंकवादियों के बारे में विचार करना होगा जो मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं। नई सरकार के 33 में से कम से कम 17 संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी सूची में हैं। हाल में सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव से पर्यवेक्षकों ने अनुमान लगाया था कि तालिबान के साथ आतंकवाद का विशेषण हटा लिया गया है। पर यह अनुमान ही है, क्योंकि ऐसी कोई घोषणा नहीं है। पश्चिमी देशों के जिस ब्लॉक के साथ भारत जुड़ा है, उसकी सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि अफगानिस्तान अब चीनी पाले में चला जाएगा। 

तालिबान से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मसला है कि अल कायदा के साथ उसके रिश्तों का। बीबीसी मॉनिटरिंग के द्रिस अल-बे की एक टिप्पणी में पूछा गया है कि तालिबान की वापसी से एक अहम सवाल फिर उठने लगा है कि उनके अल-क़ायदा के साथ के संबंध किस तरह के हैं। अल-क़ायदा अपने 'बे'अह' (निष्ठा की शपथ) की वजह से तालिबान से जुड़ा हुआ है। पहली बार यह 1990 के दशक में ओसामा बिन लादेन ने तालिबान के अपने समकक्ष मुल्ला उमर से यह 'कसम' ली थी। उसके बाद यह शपथ कई बार दोहराई गई, हालाँकि तालिबान ने इसे हमेशा सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।

Wednesday, September 8, 2021

तालिबान की इस सरकार को दुनिया आसानी से मान्यता नहीं देगी

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तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में नई सरकार की कमान जिन हाथों में दी है वे अमेरिकी सरकार की चिंता बढ़ाने वाले हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि जलमय खलीलज़ाद ने दोहा में तालिबान के जिन प्रतिनिधियों के साथ बात करके समझौता किया था, वे लचीले तालिबानी थे, पर सरकार में उनकी हैसियत महत्वपूर्ण नहीं है। कहना मुश्किल है कि वे आने वाले समय में अमेरिका या पश्चिमी देशों को समझ में आएंगे। अमेरिका अभी यह भी देखना चाहेगा कि इस सरकार के साथ अल कायदा के रिश्ते किस प्रकार के हैं। सरकार में कई लोग ऐसे हैं जिन्हें या तो संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादियों की सूची में डाल रखा है या जिनकी अमेरिका को तलाश है। नए गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी पर तो अमेरिका ने 50 लाख डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। अमेरिका को दूसरी चिंता अफगानिस्तान में बढ़ते चीनी प्रभाव की है। मंगलवार को जो बाइडेन ने कहा कि अब चीन इस इलाके में अपना असर बढ़ाने की कोशिश ज़रूर करेगा।

बीबीसी हिंदी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को उधृत करते हुए लिखा है कि बाइडेन से पत्रकारों ने पूछा, क्या आप इस बात से चिंतित हैं कि अमेरिका ने जिसे प्रतिबंधित कर रखा है, उसे चीन फंड देगा? इस पर बाइडन ने कहा, चीन एक वास्तविक समस्या है। वह तालिबान के साथ व्यवस्था बनाने की कोशिश करने जा रहा है। पाकिस्तान, रूस, ईरान सभी अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। उधर ईयू ने कहा है कि तालिबानी सरकार समावेशी नहीं है और उसमें उचित प्रतिनिधित्व भी नहीं है। नई सरकार में सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं हैं। खासतौर से स्त्रियाँ और शिया शामिल नहीं हैं।

कहा यह भी जा रहा है कि तालिबान बगराम एयरबेस चीन के हवाले कर सकता है। अलबत्ता मंगलवार को चीनी विदेश मंत्रालय ने अपनी दैनिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस सम्भावना को ख़ारिज किया। पर क्या मौखिक रूप से खारिज कर देने के बाद खत्म हो जाती है?  अफगानिस्तान को छोड़ते समय अमेरिकी ने सीआईए के अपने दफ्तर की लगभग सारी चीजें फूँक दीं, पर न जाने कितने प्रकार के गोपनीय सूत्र अमेरिका यहाँ छोड़कर गया है। चीन की दिलचस्पी इन बातों में होगी।

अमेरिका और रूस के बीच क्या सम्पर्क-सेतु का काम करेगा भारत?

निकोल पत्रुशेव के साथ अजित डोभाल

दिल्ली में रूस की सिक्योरिटी कौंसिल के प्रमुख और अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख का एकसाथ होना महत्वपूर्ण समाचार है।
सीआईए चीफ विलियम बर्न्स मंगलवार 7 सितम्बर को दिल्ली पहुंचे थे। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात की थी। इस चर्चा में तालिबान की सरकार के गठन और अफगानिस्तान से लोगों को निकालने के प्रयासों पर बात हुई। अब आज बुधवार को रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव जनरल निकोल पत्रुशेव दिल्ली आए हैं। उन्होंने रक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात की है। इनके अलावा वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेशमंत्री एस जयशंकर से भी मुलाकात कर रहे हैं।

अफगानिस्तान के बदले घटनाक्रम को लेकर पर्यवेक्षकों में मन में इस बात को लेकर सवाल हैं कि भारतीय विदेश-नीति की दिशा क्या है? अफगानिस्तान में सरकार बनने में हुई देरी के कारण अभी तालिबान को मान्यता देने के सवाल पर असमंजस है। तालिबान के भीतर अभी कई प्रकार के अंतर्विरोध हैं, जो देर-सबेर सामने आएंगे। तालिबान के पास लड़ाई का अनुभव है, सरकार चलाने का नहीं। दूसरे उन्होंने दुनिया से कई तरह के वायदे कर रखे हैं, पर वायदे करने वाले धड़े की भूमिका सरकार में कमज़ोर है। बहरहाल फिर भी देर-सबेर भारत नई सरकार को मान्यता दे सकता है, पर ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि वैश्विक राजनीति किस दिशा में जाने वाली है। भारत ने पहले ही कहा कि जब लोकतांत्रिक ब्लॉक तालिबान को मान्यता देगा, हम भी दे देंगे।

अमेरिका और रूस के अधिकारियों के साथ दिल्ली में बैठक ऐसे मौके पर हुई है, जब तालिबान ने अंतरिम सरकार का एलान कर दिया है। इसके अलावा आने वाले दिनों में पीएम नरेंद्र मोदी क्वॉड शिखर सम्मेलन और शंघाई सहयोग संगठन की बैठकों में हिस्सा लेने वाले हैं। इस महीने नरेंद्र मोदी तीन दिन की अमेरिका-यात्रा पर जा रहे हैं। उसी दौरान क्वॉड का शिखर सम्मेलन भी होगा। इससे पहले 16-17 सितम्बर को ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे में शंघाई सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन होने वाला है। और आज भारत ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है।

Tuesday, September 7, 2021

ब्रेकथ्रू-इंफेक्शन और वैक्सीन को लेकर उठे नए सवाल


देश में कोरोना के नए मामलों की संख्या में आ रही गिरावट में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। उत्तर भारत में गिरावट जारी है, पर केरल में एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। वहाँ नौ जिलों में वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके लोग बड़ी संख्या में कोविड पॉजिटिव पाए गए हैं। पिछले कुछ दिनों में संक्रमण के ऐसे 40,000 केस सामने आ चुके हैं। इनमें भी पथनामथिट्टा की रिपोर्ट बहुत चिंताजनक है। वायनाड में करीब-करीब सौ फीसदी टीकाकरण हुआ है, पर ब्रेकथ्रू के मामले वहां भी हैं।

दूसरी डोज के बाद कुल ब्रेकथ्रू इंफेक्शन के 46 प्रतिशत केस केरल में आए हैं।  केरल में करीब 80 हजार ब्रेकथ्रू इंफेक्शन (टीका लेने के बाद संक्रमण) के मामले सामने आए हैं। इनमें करीब 40 हजार दूसरी डोज के बाद के हैं। इतने ज्यादा मामलों को देखते हुए केंद्र ने राज्य सरकार से सभी मामलों की जीनोम सीक्वेंसिंग कर पता लगाने को कहा कि कहीं नया वेरिएंट तो यह सब नहीं कर रहा।

ब्रेकथ्रू-इंफेक्शन

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार, ब्रेकथ्रू इंफेक्शन उसे कहते हैं जब वैक्सीन की दोनों डोज लेने के 14 दिन या उससे ज्यादा समय बाद कोई व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव पाया जाए। ऐसे में पहला शक होता है कि कहीं ऐसा कोई वेरिएंट तो नहीं फैल रहा जो टीके से हासिल इम्यूनिटी को ध्वस्त कर रहा हो। केरल में छह सदस्यीय केंद्रीय टीम भेजी गई थी जिसने अपने शुरुआती आकलन में बताया कि ब्रेकथ्रू इंफेक्शन कोवैक्सीन और कोवीशील्ड दोनों ही वैक्सीन लगवाने वाले लोगों में मिले हैं।