Sunday, April 11, 2021

क्या था ऑपरेशन गुलमर्ग?

 


।।चार।।

अगस्त 1947 में विभाजन के पहले ही कश्मीर के भविष्य को लेकर विमर्श शुरू हो गया था। कांग्रेस की इच्छा थी कि कश्मीर का भारत में विलय हो और मुस्लिम लीग का कहना था कि रियासत में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान हैं, इसलिए उसे पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहिए। तमाम तरह के विमर्श के बावजूद महाराजा हरिसिंह अक्तूबर के तीसरे सप्ताह तक फैसला नहीं कर पाए। फिर जब स्थितियाँ उनके नियंत्रण से बाहर हो गईं, तब उन्होंने भारत में विलय का फैसला किया। उन परिस्थितियों पर विस्तार से हम किसी और जगह पर विचार करेंगे, पर यहाँ कम से कम तीन घटनाओं का उल्लेख करने की जरूरत है। 1.जम्मू में मुसलमानों की हत्या. 2.गिलगित-बल्तिस्तान में महाराजा के मुसलमान सैनिकों की बगावत और 3.पश्चिम से कबायलियों का कश्मीर पर हमला।

हाल में मेरी इस सीरीज के दूसरे भाग को जब मैंने फेसबुक पर डाला, तब एक मित्र ने बीबीसी की एक रिपोर्ट के हवाले से लिखा, कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि पाकिस्तान से आने वाले ये कबायली हमलावर थे या वे मुसलमानों की हिफ़ाज़त के लिए आए थे? जम्मू-कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक थे, जबकि उसके शासक महाराजा हरि सिंह हिंदू थे। 1930 के बाद से अधिकारों के लिए मुसलमानों के आंदोलनों में बढ़ोतरी हुई। अगस्त 1947 में देश के बंटवारे के बाद भी यह रियासत हिंसा की आग से बच नहीं पाई… जम्मू में हिंदू अपने मुसलमान पड़ोसियों के ख़िलाफ़ हो गए। कश्मीर सरकार में वरिष्ठ पदों पर रह चुके इतिहासकार डॉ. अब्दुल अहद बताते हैं कि पश्तून कबायली पाकिस्तान से मदद के लिए आए थे, हालांकि उसमें कुछ 'दुष्ट लोग' भी शामिल थे।… उधर, प्रोफ़ेसर सिद्दीक़ वाहिद इस बात पर सहमत होते हैं कि पाकिस्तानी कबायलियों का हमला जम्मू में जारी अशांति का जवाब था।

ऑस्ट्रेलिया के लेखक क्रिस्टोफर स्नेडेन ने अपनी किताब कश्मीर द अनरिटन हिस्ट्री में भी इस बात को लिखा है। हालांकि उनकी वह किताब मूलतः पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के बारे में है, पर उन्होंने किताब की शुरुआत में ही लिखा है कि इस सिलसिले में प्राप्त ज्यादातर विवरणों में बताया जाता है कि पाकिस्तान से आए पश्तून कबायलियों ने स्थिति को बिगाड़ा, इस किताब में बताया गया है कि जम्मू के लोगों ने इसकी शुरुआत की। विभाजन के बाद जम्मू के इलाके में तीन काम हुए। पहला था, पश्चिमी जम्मू प्रांत के पुंछ इलाके में मुसलमानों ने महाराजा हरिसिंह के खिलाफ बगावत शुरू की। दूसरे, पूरे जम्मू-प्रांत में साम्प्रदायिक हिंसा शुरू हो गई, तीसरे पश्चिमी जम्मू क्षेत्र में बागियों ने एक इलाके पर कब्जा करके उसे आज़ाद जम्मू-कश्मीर के नाम से स्वतंत्र क्षेत्र घोषित कर दिया। पूरी रियासत साम्प्रदायिक टुकड़ों में बँटने लगी। यह सब 26 अक्तूबर, 1947 के पहले हुआ और लगने लगा कि पूरे जम्मू-कश्मीर को किसी एक देश के साथ मिलाने का फैसला लागू करना सम्भव नहीं होगा। इस घटनाक्रम पर भी हम आगे जाकर विचार करेंगे, पर पहले उस ऑपरेशन गुलमर्ग का विवरण देते हैं, जिसका उल्लेख पिछले आलेख में किया था।   

लाल गलियारे की चुनौती


कॉरोना, बंगाल के चुनाव और आईपीएल की खबरों में उलझे देश के लिए माओवादी हिंसा ने जोरदार झटके का काम किया है। इन सभी खबरों के तार देश की राजनीति से जुड़े हैं। यह अपने आप में एक समस्या है। आमतौर पर राजनीतिक प्रतिक्रिया होती है, सुरक्षा-व्यवस्था ठीक नहीं थी, इंटेलिजेंस की विफलता है वगैरह। आम जनता की प्रतिक्रिया होती है कि बहुत हो गया, अब फौजी कार्रवाई होनी चाहिए। कुछ लोग हवाई हमले की बातें भी करते हैं।

माओवादियों के हमले आमतौर पर सुरक्षा बलों पर होते हैं, पर बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई 2013 को हुए हमले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी की पहली कतार के ज्यादातर बड़े नेताओं समेत 29 लोग मारे गए थे। उस हमले से यह बात भी रेखांकित हुई थी कि माओवादियों का इस्तेमाल मुख्यधारा की राजनीति में भी परोक्ष रूप से होता है। राजनीतिक दलों के बीच तू-तू, मैं-मैं माओवादियों की मदद करती है। वे बच्चों और महिलाओं को ढाल बनाते हैं, ताकि सरकार के प्रति आदिवासियों का गुस्सा भड़के।

माओवादी रणनीति

बीजापुर में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षाबलों के 22 जवानों की मौत के बाद तमाम तरह के सवाल हवा में हैं। कहा जाता है कि उनकी पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन नंबर 1 के कमांडर हिड़मा ने जंगल में होने की ख़बर प्रचारित की। सुरक्षाबलों के दो हज़ार से अधिक जवान इस बटालियन को घेरने के लिए निकले और माओवादियों के जाल में फँसते चले गए।

Friday, April 9, 2021

पाकिस्तान का कश्मीर पर पहला हमला अर्थात ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’

 


।।तीन।।

कश्मीर का विलय हो या नहीं हो और वह स्वतंत्र रहे या किसी के साथ जाए, इन दुविधाओं के कारण महाराजा हरिसिंह ने स्वतंत्रता के तीन दिन पहले 12 अगस्त 1947 को दोनों देशों के सामने एक स्टैंडस्टिल समझौते का प्रस्ताव रखा। पाकिस्तान ने इस समझौते पर दस्तखत कर दिए, पर भारत ने नहीं किए। भारत इसपर ज्यादा विचार चाहता था और इसके लिए उसने महाराजा को दिल्ली आकर बातचीत करने का सुझाव दिया। वीपी मेनन ने लिखा है, पाकिस्तान ने स्टैंडस्टिल समझौते पर दस्तखत कर दिए थे, पर हम इसके निहितार्थ पर विचार करना चाहते थे। हमने रियासत को अकेला ही रहने दिया …। भारत सरकार की तत्काल कश्मीर में बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। राज्य के सामने अपनी कई तरह की समस्याएं थीं। सच पूछो तो हमारे हाथ भी घिरे हुए थे। कश्मीर के बारे में सोचने का वक्त ही कहाँ था।1

उधर पाकिस्तान ने स्टैंडस्टिल समझौते पर दस्तखत करने के बावजूद कुछ समय बाद ही जम्मू-कश्मीर की आर्थिक और संचार से जुड़ी नाकेबंदी कर दी। हर तरह की आवश्यक सामग्री खाद्यान्न, नमक, पेट्रोल वगैरह की सप्लाई रोक दी गई। उधर भारत कश्मीर के महाराजा से इस बाबत कोई विचार-विमर्श कर पाता, हमला शुरू हो गया। परिस्थितियाँ तेजी से बदल गईं।

24 अक्तूबर, 1947 को गवर्नर जनरल और स्याम के विदेशमंत्री नई दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरू के घर पर रात्रिभोज के लिए आ रहे थे। लॉर्ड माउंटबेटन को पंडित नेहरू ने बताया कि खबरें मिली हैं कि कश्मीर पर पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के कबायलियों ने हमला कर दिया है। स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए लॉर्ड माउंटबेटन ने अगली सुबह 11 बजे डिफेंस कमेटी की विशेष बैठक बुला ली। वहाँ भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ की आधिकारिक रिपोर्ट भी आ चुकी थी, जिन्हें पाकिस्तानी सेना के रावलपिंडी स्थित हैडक्वार्टर्स ने जानकारी दी थी, तीन दिन पहले पश्चिम से करीब 5000 कबायलियों ने कश्मीर में प्रवेश किया है और श्रीनगर की ओर बढ़ते हुए उन्होंने मुजफ्फराबाद शहर में लूटपाट और आगज़नी की है।2 सन 1947 में पाकिस्तानी हमले की यह पहली रिपोर्ट थी।

Thursday, April 8, 2021

कश्मीर समस्या का जन्म कैसे हुआ?


।।दो।। 
अविभाजित भारत में 562 देशी रजवाड़े थे। कश्मीर भी अंग्रेजी राज के अधीन था, पर उसकी स्थिति एक प्रत्यक्ष उपनिवेश जैसी थी और 15 अगस्त 1947 को वह भी स्वतंत्र हो गया। देशी रजवाड़ों के सामने विकल्प था कि वे भारत को चुनें या पाकिस्तान को। देश को जिस भारत अधिनियम के तहत स्वतंत्रता मिली थी, उसकी मंशा थी कि कोई भी रियासत स्वतंत्र देश के रूप में न रहे। बहरहाल कश्मीर राज के मन में असमंजस था।

इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के तहत 15 अगस्त 1947 को जम्मू कश्मीर पर भी अंग्रेज सरकार का आधिपत्य (सुज़रेंटी) समाप्त हो गया। महाराजा के मन में संशय था कि यदि हम भारत में शामिल हुए, तो राज्य की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी को यह बात पसंद नहीं आएगी और यदि पाकिस्तान में विलय करेंगे, तो हिंदू और सिख नागरिकों को दिक्कत होगी। 11 अगस्त को उन्होंने अपने प्रधानमंत्री रामचंद्र काक को बर्खास्त कर दिया। काक ने स्वतंत्र रहने का सुझाव दिया था। इससे पर्यवेक्षकों को लगा कि महाराजा का झुकाव भारत की ओर है।

पाकिस्तान ने कश्मीर के महाराजा को कई तरह से मनाने का प्रयास किया कि वे पकिस्तान में विलय को स्वीकार कर लें। स्वतंत्रता के ठीक पहले जुलाई 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना ने महाराजा को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें हर तरह की सुविधा दी जाएगी। जिन्ना की मुस्लिम लीग ने रामचंद्र काक से भी सम्पर्क बनाया था। बहरहाल महाराजा ने भारत और पाकिस्तान के साथ स्टैंडस्टिल समझौते की पेशकश की। यानी यथास्थिति बनी रहे। भारत ने इस पेशकश पर कोई फैसला नहीं किया, पर पाकिस्तान ने महाराजा की सरकार के साथ स्टैंडस्टिल समझौता कर लिया। पर उसने समझौते का अनुपालन किया नहीं, बल्कि आगे जाकर कश्मीर की नाकेबंदी कर दी और वहाँ पाकिस्तान की ओर से जाने वाली रसद की आपूर्ति रोक दी।

Wednesday, April 7, 2021

क्या था मुशर्रफ का चार-सूत्री समझौता फॉर्मूला?

 


।।एक।।
भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर जमी बर्फ के पिघलने की सम्भावनाओं को लेकर जब हाल में हलचल थी, तब पिछले पाँच दशक में इस दिशा में हुए प्रयासों को लेकर कुछ बातें सामने आई थीं। इनमें शिमला समझौते का जिक्र भी होता है। यह समझौता विफल होने के कगार पर था कि अचानक ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के बीच कुछ बात हुई और समझौते के आसार बन गए देश के अनेक पर्यवेक्षकों का मत है कि भारत ने शिमला समझौता करके गलती की।

भारत-पाकिस्तान के समझौता-प्रयासों की पृष्ठभूमि पर नजर डालने की जरूरत है। कश्मीर के विवाद को लेकर हमें 1947 में वापस जाना पड़ेगा, पर कुछ बातें शिमला समझौते से भी समझी जा सकती हैं। इन बातों के लिए कई लेख लिखने होंगे। पर सबसे पहले मैं चार-सूत्री समझौते की पेशकश और फिर उसके खटाई में पड़ जाने की पृष्ठभूमि पर कुछ लिखूँगा।

पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने अपनी किताब ‘नीदर ए हॉक नॉर ए डव’ में लिखा है कि परवेज़ मुशर्रफ और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच कश्मीर पर चार-सूत्री समझौता होने जा रहा था, जिससे इस समस्या का स्थायी समाधान हो जाता। इस समझौते की पृष्ठभूमि अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज़ मुशर्रफ के आगरा शिखर सम्मेलन में ही तैयार हो गई थी। कहा तो यह भी जाता है कि आगरा में ही दस्तखत हो जाते, पर वह समझौता हुआ नहीं।

बताया जाता है कि मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला था, तब मनमोहन सिंह ने एक फाइल उन्हें सौंपी थी, जिसमें उस चार-सूत्री समझौते से जुड़े विवरण थे। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने हाल में कसूरी का लिखा इस आशय का एक लेख भी प्रकाशित किया है। कसूरी के अनुसार इस चार-सूत्री समझौते की पेशकश की थी। इस समझौते के 11 या 12 महत्वपूर्ण कारक थे, जिनकी शुरुआत कश्मीर के प्रमुख शहरों के विसैन्यीकरण और नियंत्रण रेखा पर न्यूनतम सैनिक उपस्थिति से होती।

Tuesday, April 6, 2021

क्वाड के जवाब में रूसी-चीनी गठबंधन नहीं


रूस के विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव ने आज दिल्ली में कहा कि चीन के साथ रूस कोई सैन्य समझौता नहीं होने जा रहा है। भारत की यात्रा पर आए विदेशमंत्री से सवाल पूछा गया था कि क्या रूस चीन के साथ कोई सैन्य समझौता करने की योजना बना रहा है? इसके जवाब में सर्गेई लावरोव ने कहा, नहीं।

हाल में इस आशय की खबरें थीं कि रूस और चीन ने क्वाड के जवाब में सैनिक गठबंधन बनाने का प्रस्ताव किया है। इसे 'क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद मंच' कहा गया था। यह प्रस्ताव दक्षिणी चीन के शहर गुइलिन में चीन के विदेश मंत्री वांग यी और सर्गेई लावरोव के बीच हुई बैठक के बाद आया। लावरोव ने पिछले दिनों भारत के क्वाड में शामिल होने पर आपत्ति भी व्यक्त की थी।

भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर और रूसी विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव के बीच नाभिकीय, अंतरिक्ष और रक्षा-क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही भागीदारी सहित तमाम विषयों और भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन की तैयारियों को लेकर विस्तृत बातचीत हुई। लावरोव सोमवार की शाम को दिल्ली पहुँचे थे।

मंगलवार को दोनों विदेशमंत्रियों के संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में एस जयशंकर ने कहा,‘बातचीत व्यापक और सार्थक रही।’ उन्होंने कहा कि हमारी  ज्यादातर बातचीत इस साल के आखिर में होने जा रहे भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के बारे में हुई। गौरतलब है कि भारत और रूस का वार्षिक शिखर सम्मेलन पिछले वर्ष कोविड-19 महामारी के कारण नहीं हो सका था।

भारत-अमेरिका और रूस के रिश्ते कसौटी पर


भारत के अमेरिका के साथ रिश्तों के अलावा रूस के साथ रिश्ते भी इस समय कसौटी पर हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव दो दिवसीय यात्रा पर सोमवार रात दिल्ली पहुंच गए। उनकी यह यात्रा तब हो रही है जब दोनों देशों के रिश्तों में तनाव के संकेत हैं। लावरोव के कुछ तीखे बयान भी हाल में सुनाई पड़े हैं। लावरोव की आज मंगलवार को विदेशमंत्री एस जयशंकर से मुलाकात हो रही है। इसमें तमाम द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा ब्रिक्स, एससीओ और आरआईसी (रूस, भारत, चीन) जैसे संगठनों की भावी बैठकों को लेकर भी चर्चा होगी। एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 को लेकर भी चर्चा होगी।

सोमवार को ही अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन कैरी दिल्ली आए हैं। वे भारत सरकार, प्राइवेट सेक्टर व एनजीओ  के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। कैरी 1 से 9 अप्रैल के बीच अबू धाबी, नई दिल्ली और ढाका की यात्रा पर निकले हैं। आगामी 22-23 अप्रैल के बीच जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका द्वारा आयोजित 'नेताओं के शिखर सम्मेलन' और इस वर्ष के अंत में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी26) से पहले कैरी  विचार विमर्श के लिए इन देशों के दौरे पर हैं। 

इन दोनों विदेश मंत्रियों के दौरों के कारण आज दिल्ली में काफी गहमा-गहमी रहेगी। भारत की कोशिश होगी कि अफगानिस्तान में चल रही शांति समझौते की प्रक्रिया को लेकर रूस के पक्ष को समझा जाए। पिछले महीने मॉस्को में हुई बैठक में रूस ने भारत को नहीं बुलाया था। भारत की यात्रा के बाद लावरोव सीधे इस्लामाबाद जाएंगे। वर्ष 2012 के बाद रूस का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान की यात्रा पर जाएगा, लेकिन यह पहली बार है कि रूस का कोई बड़ा नेता भारत आने के बाद पाकिस्तान की यात्रा पर जा रहा है। ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने लावरोव की यात्रा का जो एजेंडा सोमवार को जारी किया, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात का जिक्र नहीं है। ऐसा हुआ, तो यह बात हैरत वाली होगी, क्योंकि ज्यादातर देशओं के विदेशमंत्री दिल्ली आते हैं, तो प्रधानमंत्री से भी मिलते हैं।

Monday, April 5, 2021

बांग्लादेश पर चीनी-प्रभाव को रोकने की चुनौती

 


बांग्लादेश की स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती समारोह के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा ने बांग्लादेश के महत्व पर रोशनी डाली है। मैत्री के तमाम ऐतिहासिक विवरणों के बावजूद पिछले कुछ समय से इन रिश्तों में दरार नजर आ रही थी। इसके पीछे भारतीय राजनीति के आंतरिक कारण हैं और चीनी डिप्लोमेसी की सक्रियता। भारत में बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ, नागरिकता कानून में संशोधन, रोहिंग्या और तीस्ता के पानी जैसे कुछ पुराने विवादों को सुलझाने में हो रही देरी की वजह से दोनों के बीच दूरी बढ़ी है।

पिछले कुछ समय से भारतीय विदेश-नीति में दक्षिण एशिया के देशों से रिश्तों को सुधारने के काम को महत्व दिया जा रहा है। म्यांमार में फौजी सत्ता-पलट के बाद भारत की संतुलित प्रतिक्रिया और संरा मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका विरोधी प्रस्ताव पर मतदान के समय भारत की अनुपस्थिति से इस बात की पुष्टि होती है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में बीजेपी ने बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर जो चुप्पी साधी है, वह भी विदेश-नीति का असर लगता है।  

भारत-बांग्‍लादेश सीमा चार हजार 96 किलोमीटर लंबी है। दोनों देश 54 नदियों के पानी का साझा इस्तेमाल करते हैं। दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापार-सहयोगी बांग्लादेश है। वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था प्रगतिशील है और सामाजिक-सांस्कृतिक लिहाज से हमारे बहुत करीब है। हम बहुत से मामलों में बेहतर स्थिति में हैं, पर ऐतिहासिक कारणों से दोनों देशों के अंतर्विरोध भी हैं। उन्हें सुलझाने की जरूरत है। 

Sunday, April 4, 2021

औद्योगिक विनिवेश क्यों और कैसे?


चार दिन पहले नया वित्तवर्ष शुरू हो गया है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की गतिविधियों ने तेजी पकड़ी है। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने इसपर पलीता लगाने का इशारा भी किया है। विश्व बैंक का ताजा अनुमान है कि 2021-22 के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर 7.5 से 12.5 फीसदी रह सकती है। बैंक भी भ्रम की स्थिति में है, इसीलिए 7.5 फीसदी से लेकर 12.5 फीसदी की रेंज दी गई है।

अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए सामाजिक कल्याण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश की जरूरत है। ये संसाधन केवल कर-राजस्व से पूरे नहीं होंगे। यों भी आमतौर पर बजट के कर-राजस्व अनुमान सही साबित नहीं होते। इस साल के बजट में 22.17 लाख करोड़ रुपये के कर-राजस्व का लक्ष्य रखा गया है, जबकि इसके पिछले साल के यह लक्ष्य 24.23 लाख करोड़ का था। महामारी के कारण उस लक्ष्य में 22 फीसदी की कमी करके उसे 19 लाख करोड़ करना पड़ा। वास्तव में कर संकलन कितना हुआ, उसकी जानकारी आने दीजिए।

संसाधन कहाँ से आएंगे?

संसाधन जुटाने का दूसरा तरीका सार्वजनिक सम्पत्तियों के विनिवेश का है। इसबार के बजट में सरकार ने 1.75 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य रखा है। यह विशाल लक्ष्य है। क्या सरकार इसे पूरा कर पाएगी? पिछले साल का लक्ष्य इससे भी बड़ा 2.1 लाख करोड़ का था। महामारी के कारण सरकार ने हाथ खींच लिए और लक्ष्य बदल कर 32 हजार करोड़ कर दिया गया। बहरहाल 31 मार्च तक सरकार ने इस मद में 32,835 करोड़ रुपये जुटाए।

नब्बे के दशक में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद सार्वजनिक उद्योगों के विनिवेश की बहस निर्णायक दौर में है। सरकारें निजीकरण शब्द का इस्तेमाल करने से घबराती रही हैं। इसके लिए विनिवेश शब्द गढ़ा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने कहा था, सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सन 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल में भी उन्होंने यही बात कही थी। दूसरी तरफ कमांड-अर्थव्यवस्था के समर्थक इसका विरोध कर रहे हैं। हाल में बैंक कर्मचारियों ने दो दिन का आंदोलन करके आंदोलन का बिगुल बजा दिया है।

Saturday, April 3, 2021

नए वैश्विक-सच से पाकिस्तान का सामना


फरवरी 2019 में पुलवामा कांड से लेकर उसी साल अगस्त में अनुच्छेद 370 की वापसी ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को जिस ढलान पर उतार दिया था, वहाँ से पहिया उल्टी दिशा में घूमने लगा है। गत 26 फरवरी को दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी रोकने के सन 2003 के समझौते को पुख्ता तरीके से लागू करने की घोषणा की थी। पता लगा कि तीन महीनों से दोनों देशों के बीच बैक-चैनल बात चल रही है।

पाकिस्तान ने बुधवार को भारत के साथ आंशिक-व्यापार फिर से शुरू करने की घोषणा करके इस उम्मीद को बल दिया था कि रिश्ते सुधरेंगे। उसके अगले ही दिन वहाँ की कैबिनेट ने इस फैसले को बदल दिया और कहा कि जब तक 370 की वापसी नहीं होगी, तब तक भारत के साथ व्यापार नहीं होगा।  इसके पहले इमरान खान और उनके सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने कहा था कि रिश्तों में सुधार होना चाहिए। इन बयानों के बाद नरेंद्र मोदी और इमरान खान के बीच एक रस्मी पत्राचार हुआ, जिसके बड़े डिप्लोमैटिक निहितार्थ दिखाई पड़ रहे हैं।

पीछे की कहानी

दोनों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव बहुत तेजी से आता है, इसलिए इन संदेशों की शब्दावली में बहुत ज्यादा पढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, अलबत्ता पीछे की पटकथा और वैश्विक परिस्थितियों को पढ़ने की जरूरत है। नई बात यह है कि पाकिस्तानी सरकार और सेना एक पेज पर हैं। पाकिस्तान एक कठोर सत्य से रूबरू है। फैसला उसे करना है। अतीत की भारत-पाकिस्तान वार्ताओं में ‘कांफिडेंस बिल्डिंग मैजर्स (सीबीएम)’ का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इस सीबीएम का रास्ता आर्थिक है। दोनों के आर्थिक-सहयोग की जबर्दस्त सम्भावनाएं हैं, पर पाकिस्तान का ‘कश्मीर कॉज़’ आड़े आता है।

Friday, April 2, 2021

भारत-पाकिस्तान: यू टर्न बनाम यू टर्न


भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में कितनी तेजी से उतार-चढ़ाव आता है इसका नमूना दो दिन में देखने को मिला है। पाकिस्तान ने बुधवार को भारत के साथ आंशिक-व्यापार फिर से शुरू करने की घोषणा करके इस उम्मीद को बल दिया था कि रिश्ते सुधरेंगे। उसके अगले ही दिन वहाँ की कैबिनेट ने इस फैसले को बदल दिया और कहा कि जब तक भारत जम्मू-कश्मीर में 370 की वापसी नहीं करेगा, तब तक उसके साथ व्यापार नहीं होगा। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच रिश्तों की बहाली की ताजा कोशिशों पर फिलहाल ब्रेक लग गया है। अब इंतजार करना होगा कि इस ब्रेक के बाद होता क्या है।

भारत से कपास और चीनी के आयात का फैसला पाकिस्तान के नए वित्त मंत्री हम्माद अज़हर द्वारा बुधवार को की गई उस घोषणा के बाद आया जिसमें उन्होंने बताया कि उनकी अध्यक्षता में हुई आर्थिक समन्वय समिति (ईसीसी) की बैठक में आयात का फैसला किया गया था। इसके बाद गुरुवार को देश के मंत्रिमंडल ने इस फैसले को खारिज कर दिया।

इस मुद्दे के राजनीतिक निहितार्थ को लेकर पाकिस्तान में गुरुवार दोपहर बाद से ही कयास लग रहे थे लेकिन अधिकारी खामोश थे। अंतत: फैसले को लेकर पहली टिप्पणी मानवाधिकार मामलों की मंत्री शीरीन मज़ारी की तरफ से आई जिन्हें कश्मीर को लेकर उनके कट्टर रुख के लिए जाना जाता है। एक बात साफ है कि आयात का फैसला इमरान खान की जानकारी में हुआ था। पर देश के कुछ कट्टरपंथी तबकों के विरोध को देखते हुए उन्होंने पलटी मारना बेहतर समझा। मज़ारी ने कहा कि 20 मार्च को कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद से पहली बार मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता कर रहे प्रधानमंत्री इमरान खान ने, “(यह) स्पष्ट किया (कि) भारत के साथ रिश्ते तब तक सामान्य नहीं हो सकते जब तक वे पांच अगस्त 2019 को कश्मीर में की गई कार्रवाई को वापस नहीं ले लेते।”

Thursday, April 1, 2021

बांग्लादेश में भारत-विरोधी हिंसा


प्रधानमंत्री की बांग्लादेश  यात्रा के दौरान हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम संगठन के नेतृत्व में हुई हिंसा ने ध्यान खींचा है। यह संगठन सन 2010 में खड़ा हुआ था और परोक्ष रूप से प्रतिबंधित संगठन जमाते-इस्लामी के एजेंडा को चलाता है।  इस संगठन से जुड़े लोगों ने न केवल सरकारी सम्पत्ति, रेलवे स्टेशन, रेल लाइन, ट्रेन, थानों और सरकारी भवनों को नुकसान पहुँचाया गया। हिंदू-परिवारों पर और मंदिरों पर भी हमले बोले गए। खुफिया रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि जमात, हिफाजत और विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी शेख हसीना की सरकार को गिराने की साजिश रच रहे हैं।

हिंसा की शुरुआत ढाका के बैतूल मुकर्रम इलाके से हुई थी, पर सबसे ज्यादा मौतें ब्राह्मणबरिया जिले में हुईं। इसके अलावा चटगाँव में भी हिंसा हुई, जहाँ हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम का मुख्यालय है। ब्राह्मणबरिया प्रशासन, पत्रकारों और चश्मदीदों के मुताबिक़ हिंसा सुबह 11 बजे से शुरू हुई थी। ज़िला मुख्यालय, नगर पालिका परिषद, केंद्रीय पुस्तकालय, नगरपालिका सभागार, भूमि कार्यालय और प्रेस क्लब समेत टी-ए रोड के दोनों तरफ स्थित अनेक सरकारी इमारतों को आग लगा दी गई थी।

Tuesday, March 30, 2021

स्वेज़ में जहाज फँसने से उठते सवाल


मिस्र की स्वेज़ नहर में जाम खुल गया है। क़रीब एक हफ़्ते से वहां फँसे विशाल जहाज़ को बड़ी मुश्किल से रास्ते से हटाया जा सका। टग बोट्स और ड्रैजर की मदद से 400 मीटर (1,300 फुट) लंबे 'एवर गिवेन' जहाज़ को निकाला गया। जहाज़ को हटाने में मदद करने वाली कंपनी, बोसकालिस के सीईओ पीटर बर्बर्सकी ने कहा, "एवर गिवेन सोमवार को स्थानीय समयानुसार 15:05 बजे फिर पानी पर उतराने लगा था। जिसके बाद स्वेज़ नहर का रास्ता फिर से खोलना संभव हुआ।" जहाज निकल गया, पर दुनिया के लिए कई तरह के सबक छोड़ गया है। 

एवर गिवन जहाज काफी बड़े आकार का है, लेकिन उससे भी बड़े जहाज इससे गुजरते रहे हैं। इसकी लंबाई करीब 400 मीटर, चौड़ाई 60 मीटर और गहराई 14.5 मीटर है। यह कुल दो लाख टन का वजन उठा सकता है। इसके चालक दल के सभी सदस्य भारतीय हैं। पर नहर पार करने का जिम्मा मिस्रवासी पायलट के पास था। यह जहाज 20,000 कंटेनर लेकर शंघाई से रोटरडैम के सफर पर निकला था।

इस अटपटी परिघटना के बाद सवाल है कि जब 19वीं सदी में बने एक ढांचे में 21वीं सदी की तकनीक का इस्तेमाल होने लगता है तब क्या ऐसा ही होता है? एक अहम समुद्री परिवहन मार्ग के अवरुद्ध होने से कुछ ऐसा ही हुआ है। इस घटना के बड़े दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। मंगलवार 23 मार्च की सुबह कंटेनर ढोने वाला जहाज 'एवर गिवन' स्वेज़ नहर से गुजर रहा था। उसी समय वह थोड़ा टेढ़ा होकर किनारे से जा लगा और पूरी नहर ही अवरुद्ध हो गई। 

स्वेज़ नहर के रास्ते होने वाली आवाजाही पूरी तरह बाधित हो गई। इसकी वजह से नहर के मुहाने पर इंतजार कर रहे जहाजों की लंबी कतार लग गई। जहाज के फँसने वाली जगह पर नहर की चौड़ाई करीब 300 मीटर है। उलटे शंकु वाले आकार में बनी स्वेज नहर की तली सतह से कम चौड़ी है और दोनों किनारों पर ढलान बनी हुई है। एवर गिवन जहाज नहर के पूर्वी किनारे पर जाकर मिट्टी में धंस गया था।

Sunday, March 28, 2021

महाराष्ट्र में कुछ होने वाला है

 


महाराष्ट्र की राजनीति में फिर कुछ होने वाला है। ऐसा अनुमान शिवसेना के मुखपत्र सामना में प्रकाशित सांसद संजय राउत के लेख से निकाला जा रहा है। इसके अलावा शरद पवार की अमित शाह से मुलाकात के बाद ये कयास और बढ़ गए हैं।

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की चिट्ठी के बाद शिवसेना और एनसीपी में भितरखाने संग्राम चल रहा है। उधर संजय राउत ने रविवार को कहा कि अनिल देशमुख महाराष्ट्र के गृहमंत्री दुर्घटनावश बने थे। जयंत पाटिल और दिलीप वालसे-पाटिल जैसे वरिष्ठ राकांपा नेताओं के इनकार के बाद उन्हें यह पद मिला।

संजय राउत के इस बयान के साथ-साथ आज मीडिया में खबरें हैं कि शरद पवार तथा प्रफुल्ल पटेल की अहमदाबाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात हुई है। इस मुलाकात के बारे में मीडिया कर्मियों ने जब दिल्ली में अमित शाह से सवाल किया तो उन्होंने यह कहकर विषय को टाल दिया कि कुछ बातें सार्वजनिक नहीं होतीं। गृहमंत्री अमित शाह के इस जवाब से अटकलों को और बल मिला है। उन्होंने मुलाकात की बात से इनकार नहीं किया है। ऐसे में अब इस पर सस्पेंस बढ़ गया है कि तीनों नेताओं की मुलाकात में आखिर क्या बात हुई है? मीटिंग का एजेंडा क्या था?

नीचे पढ़ें संजय राऊत का सामना में प्रकाशित आलेख

 

महाराष्ट्र के चरित्र पर सवाल… ‘डैमेज कंट्रोल’ की दुर्गति!

मार्च 28, 2021  संजय राऊत / कार्यकारी संपादक , मुंबई

विगत कुछ महीनों में जो कुछ हुआ उसके कारण महाराष्ट्र के चरित्र पर सवाल खड़े किए गए। वाझे नामक सहायक पुलिस निरीक्षक का इतना महत्व  कैसे बढ़ गया? यही जांच का विषय है। गृहमंत्री ने वाझे को 100 करोड़ रुपए वसूलने का टार्गेट दिया था, ऐसा आरोप मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह लगा रहे हैं। उन आरोपों का सामना करने के लिए प्रारंभ में कोई भी आगे नहीं आया! सरकार के पास ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोई योजना नहीं है, ये एक बार फिर नजर आया।

पहली वर्षगाँठ, दूसरी लहर


देश में लॉकडाउन की पहली वर्षगाँठ का संदेश बहुत निराशाजनक है। देश में महामारी की एक और लहर कई तरह की चुनौतियों का संदेश दे रही है। साथ ही यह भी बता रही है कि हमने एक साल में कोई सबक नहीं सीखा। जिन  सावधानियों को हमने एक साल पहले अपनाया, उन्हें फौरन भूल गए। खासतौर से जिन पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, वहाँ यह नादानी पूरी शिद्दत से दिखाई पड़ रही है।

शुक्रवार को भारत में कोविड-9 के नए मामलों की संख्या 60 हजार पार कर गई। पहली लहर में देश में एक दिन में अधिकतम नए केसों की संख्या 97,894 तक पहुँची थी, जो पिछले साल 17 सितम्बर को थी। उसके बाद लगातार गिरावट आती चली गई थी। 16 जनवरी से देश में वैक्सीनेशन शुरू होने के बाद उम्मीद थी कि हालात जल्द बेहतर हो जाएंगे। लगता है लोगों ने असावधानी बरतनी शुरू कर दी।

नए स्ट्रीम का हमला

ब्रिटेन से वायरस के म्युटेशन की खबरें सुनाई पड़ीं और देखते ही देखते दुनियाभर से नए स्ट्रीम्स की खबरें आने लगीं। दूसरी लहर के साथ कुछ नए खतरे जुड़े हैं। इसबार का संक्रमण पहली बार के मुकाबले ज्यादा तेज है और दूसरे वायरस-म्युटेशन के कारण उसके कई नए स्ट्रीम हमला बोल रहे हैं। पंजाब में हाल में संक्रमित पाए गए लोगों में कोरोना का जो जीनोम मिला है वह तेज प्रसार वाला ब्रिटिश-प्रारूप है। हो सकता है कि महाराष्ट्र में तेज प्रसार देश में ही विकसित नई किस्म के कारण हो।

Saturday, March 27, 2021

अभ्यास के लिए भारतीय सेना के पाकिस्तान जाने की सम्भावनाएं कम

 


हाल में भारतीय मीडिया में खबरें थीं कि शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के तत्वावधान में पाकिस्तान के पब्बी इलाके में आतंक-विरोधी युद्धाभ्यास में और भारतीय सेना भी शामिल हो सकती है। यह कयास इसलिए है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों एससीओ के सदस्य हैं। इसे लेकर भारत में ही नहीं, पाकिस्तान में भी काफी चर्चा है। ऐसा हुआ, तो विभाजन के बाद पहली बार भारतीय सेना पाकिस्तान में किसी दोस्ताना अभ्यास में शामिल होगी।

एक वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय सेना इस साल शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) देशों की मिलिट्री एक्सरसाइज़ में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान जा सकती है। पाकिस्तान में युद्धाभ्यास का फैसला इस संगठन की क्षेत्रीय एंटी-टैररिस्ट स्ट्रक्चर कौंसिल की ताशकंद, उज्बेकिस्तान में 18 मार्च को हुई 36वीं बैठक में किया गया। यह अभ्यास इस साल सितम्बर-अक्तूबर में पाकिस्तान के नेशनल काउंटर टैररिज्म सेंटर, पब्बी में होगा, जो खैबर पख्तूनख्वा के नौशेरा जिले में है।  

Friday, March 26, 2021

राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा

 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश-यात्रा के तीन बड़े निहितार्थ हैं। पहला है, भारत-बांग्लादेश रिश्तों का महत्व। दूसरे, बदलती वैश्विक परिस्थितियों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में दक्षिण एशिया की भूमिका और तीसरे पश्चिम बंगाल में हो रहे चुनाव में इस यात्रा की भूमिका। इस यात्रा का इसलिए भी प्रतीकात्मक महत्व है कि कोविड-19 के कारण पिछले एक साल से विदेश-यात्राएं न करने वाले प्रधानमंत्री की पहली विदेश-यात्रा का गंतव्य बांग्लादेश है।

यह सिर्फ संयोग नहीं है कि बांग्लादेश का स्वतंत्रता दिवस 26 मार्च उस ‘पाकिस्तान-दिवस’ 23 मार्च के ठीक तीन दिन बाद पड़ता है, जिसके साथ भारत के ही नहीं बांग्लादेश के कड़वे अनुभव जुड़े हुए हैं। हमें यह भी नहीं भुलाना चाहिए कि बांग्लादेश ने अपने राष्ट्रगान के रूप में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीत को चुना था।

हालांकि बांग्लादेश का ध्वज 23 मार्च, 1971 को ही फहरा दिया था, पर बंगबंधु मुजीबुर्रहमान ने स्वतंत्रता की घोषणा 26 मार्च की मध्यरात्रि को की थी। बांग्लादेश मुक्ति का वह संग्राम करीब नौ महीने तक चला और भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद अंततः 16 दिसम्बर, 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्म समर्पण के साथ उस युद्ध का समापन हुआ। बांग्लादेश की स्वतंत्रता पर भारत में वैसा ही जश्न मना था जैसा कोई देश अपने स्वतंत्रता दिवस पर मनाता है। देश के कई राज्यों की विधानसभाओं ने उस मौके पर बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समर्थन में प्रस्‍ताव पास किए थे।

विस्तार से पढ़ें पाञ्चजन्य में


अमेरिका के करीब क्यों गया भारत?


काफी समय तक लगता था कि भारतीय विदेश-नीति की नैया रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बैठाने के फेर में डगमग हो रही है। अब पहली बार लग रहा है कि हमारा झुकाव अमेरिका की तरफ है। विदेशी मामलों को लेकर भारत में ज्यादातर पाँच देशों के इर्द-गिर्द बातें होती हैं। एक, पाकिस्तान, दूसरा चीन, फिर अमेरिका, रूस और ब्रिटेन। पिछले कुछ वर्षों से फ्रांस इस सूची में छठे देश के रूप में जुड़ा है। हाल में क्वाड समूह की शक्ल साफ होते-होते इसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया के नाम भी शामिल हो गए हैं।

लम्बे अरसे तक हम गुट-निरपेक्षता की राह चलते रहे, पर उस राह में भी हमारा झुकाव रूस की ओर था। सच यह है कि भारत की विदेश-नीति स्वतंत्र थी और भविष्य में भी स्वतंत्र ही रहेगी। अपने हितों के बरक्स हमें फैसले करने ही चाहिए। अमेरिका के साथ जो विशेष रिश्ते बने हैं, उनके पीछे वैश्विक घटनाक्रम है। पिछले साल 'बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट फॉर जियो-स्पेशियल कोऑपरेशन’(बेका) समझौता होने के बाद ये रिश्ते ठोस बुनियाद पर खड़े हो गए हैं। अमेरिका अपने रक्षा सहयोगियों के साथ चार बुनियादी समझौते करता है। भारत के साथ ये चारों समझौते हो चुके हैं।

चीन को काबू करने की जरूरत

चीन की सिल्करोड परियोजना

हाल में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी कि चीन के पास
दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य-शक्ति है। रक्षा से जुड़ी वैबसाइट मिलिट्री डायरेक्ट के एक अध्ययन के चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य-शक्ति है। इस अध्ययन में चीनी सैन्य-बल को 82 अंक दिए गए हैं। उसके बाद दूसरे स्थान पर अमेरिका को रखा गया है, जिसे इस स्टडी में 74 अंक दिए गए हैं। 69 अंक के साथ रूस तीसरे और 61 अंक के साथ भारत चौथे स्थान पर है।

इस अध्ययन की पद्धति जो भी रही हो और इससे आप सहमत हों या नहीं हों, पर इतना तो मानेंगे कि आकार और नई तकनीक के मामले में चीनी सेना का काफी विस्तार हुआ है। पनडुब्बियों और विमानवाहक पोतों के कारण उसकी नौसेना ब्लू वॉटर नेवी है। उसके पास पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं और एंटी-सैटेलाइट मिसाइलें हैं। साइबर-वॉर के मामले में भी वह बड़ी ताकत है। जितनी ताकत है, उसके अनुपात में चीन शालीन और शांत-प्रवृत्ति का देश नहीं है। चीनी भाषा में चीन को मिडिल किंगडम कहा जाता है। यानी दुनिया का केंद्र।

Thursday, March 25, 2021

चीन को घेरने की वैश्विक रणनीति


पिछला साल कोविड-19 के कारण पूरी दुनिया को परेशान करता रहा। इस दौरान एक बड़े बदलाव की सम्भावना व्यक्त की जा रही थी, जो किस रूप में होगा यह देखने की घड़ी आ रही है। देखना होगा कि क्या यह साल चीनी पराभव की कहानी लिखेगा? खासतौर से ऐसे माहौल में जब चीनी आक्रामकता चरम पर है।

अमेरिका में जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद ज्यादातर लोगों के मन में सवाल था कि चीन के बरक्स अमेरिका की नीति अब क्या होगी? आम धारणा थी कि डोनाल्ड ट्रंप का रुख चीन के प्रति काफी कड़ा था। शायद बाइडेन का रुख उतना कड़ा नहीं होगा। यह धारणा गलत थी। बाइडेन प्रशासन का चीन के प्रति रुख काफी कड़ा है और लगता नहीं कि उसमें नरमी आएगी। कम से कम चार घटनाएं इस बात की ओर इशारा कर रही हैं।

अलास्का-वार्ता से शुरुआत

अलास्का में अमेरिकी और चीनी प्रतिनिधिमंडलों के बीच 18 और 19 मार्च को दो दिन की वार्ता बेहद टकराव के माहौल में हुई। पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह बैठक कुछ वैसी रही, जैसी शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ की शुरुआती बैठकें होती थीं। कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘पीपुल्स डेली’ ने अपनी खबर में इस वार्ता को लेकर शीर्षक दिया—‘दूसरों को नीचा दिखाने वाली हैसियत से अमेरिका को चीन से बात करने का अधिकार नहीं है।’ चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लीजियन ने कहा, ‘अमेरिकी पक्ष ने चीन की घरेलू तथा विदेश नीतियों पर हमला करके उकसाया। इसे मेजबान की अच्छी तहजीब नहीं माना जाएगा।’

इस वार्ता में चीन का प्रतिनिधित्व विदेशमंत्री वांग यी और कम्युनिस्ट पार्टी के विदेशी मामलों के सेंट्रल कमीशन के निदेशक यांग जिएशी ने किया। अमेरिका की ओर से विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकेन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलीवन थे। इस बैठक से ठीक पहले अमेरिका ने हांगकांग और चीन के 24 अधिकारियों के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए प्रतिबंधों की घोषणा की थी।

क्या ‘क्वाड’ बड़े क्षेत्रीय-सहयोग संगठन के रूप में विकसित होगा?


अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत के शीर्ष-नेताओं की 12 मार्च को हुई वर्चुअल बैठक को बदलते वैश्विक परिदृश्य में महत्वपूर्ण परिघटना के रूप में देखा गया है। क्वाड नाम से चर्चित इस समूह को चीन-विरोधी धुरी के रूप में देखा जा रहा है। खासतौर से भारत की विदेश-नीति को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या अब हमारी विदेश-नीति स्वतंत्र नहीं रह गई है? क्या हम अमेरिकी खेमे में शामिल हो गए हैं? क्या हम अपने दीर्घकालीन मित्र रूस का साथ छोड़ने को तैयार हैं? क्या पश्चिमी देशों की राजनीति नेटो से हटकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर केंद्रित होने वाली है? ऐसा क्यों हो रहा है? इस सिलसिले में सबसे बड़ा सवाल चीन को लेकर है। क्या वह अमेरिका और पश्चिम को परास्त करके दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के रूप में स्थापित होने जा रहा है?

चीन ने इस बैठक को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त की हैं। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बैठक से ठीक पहले कहा कि देशों के बीच विचार-विमर्श और सहयोग की प्रक्रिया चलती है, लेकिन इसका मकसद आपसी विश्वास और समझदारी बढ़ाने का होना चाहिए, तीसरे पक्ष को निशाना बनाने या उसके हितों को नुकसान पहुंचाने का नहीं। क्वाड की शिखर बैठक में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया था कि उसे किसी खास देश के खिलाफ न माना जाए।

इतना ही नहीं, इसे अब सुरक्षा-व्यवस्था की जगह आपसी सहयोग का मंच बनाने की कोशिशें भी हो रही हैं। अब वह केवल सुरक्षा-समूह जैसा नहीं है, बल्कि उसके दायरे में आर्थिक और सामाजिक सहयोग से जुड़े कार्यक्रम भी शामिल हो गए हैं। क्वाड देशों के नेताओं ने शिखर-वार्ता में जिन विषयों पर विचार किया, उनमें वैक्सीन की पहल और अन्य संयुक्त कार्य समूहों के साथ महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन पर सहयोग करना शामिल था।

Wednesday, March 24, 2021

क्या किसान आंदोलन को दलितों का समर्थन मिलेगा?

इस सवाल को भारतीय राजनीति ने गम्भीरता से नहीं लिया कि पंजाब और हरियाणा का किसान आंदोलन बड़ी जोत वाले किसानों (कुलक) के हितों की रक्षा के लिए खड़ा हुआ है या गाँव से जुड़े पूरे खेतिहर समुदाय से, जिनमें खेत-मजदूर भी शामिल हैं? किसान आंदोलन के सहारे वामपंथी विचारधारा उत्तर भारत में अपनी जड़ें जमाने का प्रयास करती नजर आ रही है। लम्बे अरसे तक साम्यवादियों ने किसानों को क्रांतिकारी नहीं माना। चीन के माओ जे दुंग ने उनके सहारे राज-व्यवस्था पर कब्जा किया, जबकि यूरोप में साम्यवादी क्रांति नहीं हुई, जहाँ औद्योगिक-क्रांति हुई थी। बहरहाल साम्यवादी विचारों में बदलाव आया है और भारत की राजनीति में वे अब आमूल बदलाव के बजाय सामाजिक-न्याय और जल, जंगल और जमीन जैसे सवालों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

हरियाणा के कैथल से खबर है कि जवाहर पार्क में रविवार को एससी बीसी संयुक्त मोर्चा कैथल द्वारा बहुजन महापंचायत एवं सामाजिक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने शिरकत की और लोगों को सम्बोधित किया। गुरनाम चढूनी ने कहा कि ये आंदोलन केवल किसानों का आंदोलन नहीं है। ये आंदोलन किसानों ने शुरू किया है, अब यह जनमानस का आंदोलन है, क्योंकि इन तीन कृषि कानूनों का केवल किसानों को ही नुकसान नहीं है बल्कि देश के हर वर्ग को इन कृषि कानूनों का नुकसान है, क्योंकि पूरे देश का भोजन चंद लोगों के खजाने में जाकर कैद हो जाएगा. उन्होंने कहा कि आज की पंचायत को हमने दलित सम्मेलन के नाम से बुलाया है। अब हम सभी एक साथ मिलकर इस आंदोलन को लड़ेंगे क्योंकि यह देश चंद लोगों के हाथों में बिक रहा है।

Tuesday, March 23, 2021

पाकिस्तान के साथ शांति स्थापना की ठोस वजह


भारत और पाकिस्तान के सम्बन्धों में सुधार की सम्भावनाओं पर कुछ लेख मेरे सामने आए हैं, जिन्हें पढ़ने का सुझाव मैं दूँगा। इनमें पहला लेख है शेखर गुप्ता का, जिन्होंने लिखा है:

पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कमर अहमद बाजवा ने बीते गुरुवार को इस्लामाबाद सिक्योरिटी डायलॉग में 13 मिनट का जो भाषण दिया, उस पर भारत के जानकार लोगों की पहली प्रतिक्रिया तो उबासी की ही रही होगी। वह बस यही कह रहे हैं कि भारत और पाकिस्तान को अपने अतीत को दफनाकर नई शुरुआत करनी चाहिए, शांति दोनों देशों के लिए जरूरी है ताकि वे अपनी अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे सकें वगैरह...वगैरह। हर पाकिस्तानी नेता ने चाहे वह निर्वाचित हो या नहीं, कभी न कभी ऐसा ही कहा है। इसके बाद वे पीछे से वार करते हैं तो इसमें नया क्या है?

म्यूचुअल फंड के विज्ञापनों में आने वाले स्पष्टीकरण से एक पंक्ति को लेकर उसे थोड़ा बदलकर कहें तो यदि अतीत भविष्य के बारे में कोई संकेत देता है तो पाकिस्तान के बारे में बात करना निरर्थक है। बेहतर है कि ज्यादा तादाद में स्नाइपर राइफल खरीदिए और नियंत्रण रेखा पर जमे रहिए। तो यह गतिरोध टूटेगा कैसे?

बमबारी करके उन्हें पाषाण युग में पहुंचाना समस्या का हल नहीं है। करगिल, ऑपरेशन पराक्रम और पुलवामा/बालाकोट के बाद हम यह जान चुके हैं। कड़ा रुख रखने वाले अमेरिकी सुरक्षा राजनयिक रिचर्ड आर्मिटेज जिन्होंने 9/11 के बाद इस धमकी के जरिए पाकिस्तान पर काबू किया था, वह जानते थे कि यह बड़बोलापन है। तब से 20 वर्षों तक अमेरिका ने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से को बमबारी कर पाषाण युग में पहुंचा दिया। लेकिन अमेरिका हार कर लौट रहा है। सैन्य, कूटनयिक, राजनीतिक या आर्थिक रूप से कुछ भी ताकत से हासिल नहीं होगा। जैसा कि पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ने पिछले दिनों मुझसे बातचीत में कहा भी कि आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर या अक्साई चिन को सैन्य बल से हासिल करना संभव नहीं है। जहां तक क्षमता का प्रश्न है ऐसा कोई भी प्रयास वैश्विक चिंता पैदा करेगा और बहुत जल्दी युद्ध विराम करना होगा। बहरहाल, ये मेरे शब्द हैं न कि उनके।

बिजनेस स्टैंडर्ड में पढ़ें पूरा आलेख

पाकिस्तानी जनरल बाजवा का बयान

दुनियाभर में आतंकवाद पर घिरे और आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान के सुर बदलने लगे हैं। इमरान सरकार के बाद अब इस देश की शक्तिशाली सेना ने भी शांति का राग अलापा है। सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा कि अतीत को भूलकर भारत और पाकिस्तान आगे बढ़ना चाहिए। उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच शांति से क्षेत्र में संपन्नता और खुशहाली आएगी। इतना ही नहीं भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच आसान हो जाएगा।

Monday, March 22, 2021

परमबीर सिंह के पत्र कांड पर शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' की कवरेज


मुम्बई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नाम चिट्ठी की खबर आने के बाद से इस मामले ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया है। हालांकि शिवसेना ने अभी तक अपनी स्थिति को स्पष्ट नहीं किया था, पर उसके मुखपत्र सामना में आज के संपादकीय से स्थिति स्पष्ट होती है। इसके अलावा अखबार की कवर स्टोरी से भी लगता है कि शरद पवार के साथ पार्टी की सहमति है। सामना के संपादकीय में लिखा है, 'परमबीर सिंह के निलंबन की मांग कल तक महाराष्ट्र का विपक्ष कर रहा था। आज परमबीर सिंह विरोधियों की ‘डार्लिंग’ बन गए हैं और परमबीर सिंह के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार पर निशाना साध रहे हैं। महा विकास आघाड़ी सरकार के पास आज भी अच्छा बहुमत है। बहुमत पर हावी होने की कोशिश करोगे तो आग लगेगी, यह चेतावनी न होकर वास्तविकता है। किसी अधिकारी के कारण सरकार बनती नहीं और गिरती भी नहीं है, यह विपक्ष को भूलना नहीं चाहिए!'

सामना की खबर में कहा गया है कि मुकेश अंबानी के घर के बाहर खड़ी कार की जांच एनआईए कर रही है। दूसरी तरफ मनसुख हिरेन प्रकरण की जांच एटीएस कर रही है। इन सब हलचलों के बीच नेता प्रतिपक्ष देवेंद्र फडणवीस ने दिल्ली का दौरा किया और उसके तुरंत बाद ही परमबीर सिंह का पत्र मीडिया के सामने आया। यह कहते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने ‘लेटर बम’ की ‘टाइमिंग’ पर ध्यान आकर्षित किया। गृहमंत्री अनिल देशमुख पर लगाए गए आरोप गंभीर हैं। इस मामले को लेकर आज, सोमवार को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से चर्चा होगी। गृहमंत्री देशमुख का भी पक्ष सुना जाएगा, ऐसा पवार ने बताया।

गृहमंत्री अनिल देशमुख ने हर महीने 100 करोड़ रुपए जुटाने का टारगेट परमबीर सिंह को दिया था। मुंबई पुलिस आयुक्त पद से तबादला होने के बाद सिंह ने ई-मेल से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र भेजकर इस तरह का आरोप लगाया। इस पत्र के कारण राज्यभर में खलबली मची हुई है। कल भाजपा ने गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन किया। इस पृष्ठभूमि पर शरद पवार ने नई दिल्ली स्थित अपने आवास पर एक पत्रकार परिषद का आयोजन किया।

सबूत कहां हैं?

परमबीर सिंह के पत्र के पहले पेज पर देशमुख पर आरोप लगाए गए हैं तो दूसरे पेज पर आत्महत्या कर चुके सांसद मोहन डेलकर का उल्लेख है। सिंह द्वारा लगाए गए आरोप सही में बेहद गंभीर हैं लेकिन उनके द्वारा बताए गए 100 करोड़ रुपए की टारगेट के पैसे कहां जाते हैं, उसका कहीं जिक्र नहीं है।

सरकार अस्थिर करने का प्रयास

शरद पवार ने स्पष्ट किया कि इस मामले के पीछे राज्य की महाविकास आघाड़ी सरकार अस्थिर करने का विरोधियों का प्रयास है। लेकिन विपक्ष चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, राज्य सरकार को कोई खतरा नहीं है।

यूएई के प्रयास से भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सुधारने की खुफिया कोशिश


भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में सुधार की कोशिशों को लेकर ब्लूमबर्ग ने खबर दी है कि पिछले महीने दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा पर शांति बनाने की जो घोषणा की है, उसके पीछे संयुक्त अरब अमीरात का एक खुफिया रोडमैप है। इसकी झलक गत 25 फरवरी को विदेशमंत्री एस जयशंकर और यूएई के विदेशमंत्री शेख अब्दुल्ला बिन ज़ायेद के संयुक्त घोषणापत्र में देखी जा सकती है।

खबर के अनुसार यूएई के महीनों के खुफिया प्रयासों से नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम संभव हो पाया। अपना उल्लेख न करने का आग्रह करते हुए जिस अधिकारी ने यह जानकारी दी है, उसके अनुसार यह युद्धविराम उस लंबी प्रक्रिया की शुरुआत मात्र है, जो इस शांति-स्थापना का काम करेगी।

इस प्रक्रिया का अगला चरण है दोनों देशों के उच्चायुक्तों की बहाली। अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की वापसी के बाद पाकिस्तान ने अपने उच्चायुक्त को वापस बुला लिया था। जवाब में भारतीय उच्चायुक्त भी बुला लिए गए थे।

राजनयिक रिश्तों की बहाली के बाद व्यापारिक रिश्तों की बहाली होगी और कश्मीर के स्थायी समाधान पर बातचीत की शुरुआत होगी। हालांकि सरकारी अधिकारी मानते हैं कि कारोबार और उच्चायुक्तों की बहाली के बाद की प्रक्रिया आसान नहीं है। अलबत्ता पंजाब के ज़मीनी रास्ते से व्यापार फिर शुरू हो सकता है।

भारत और रूस के बीच बढ़ती दूरियाँ


भारत और पाकिस्तान से जूड़े मामलों के पूर्व रूसी प्रभारी ग्लेब इवाशेंत्सोव ने तीन साल पहले एक वीडियो कांफ्रेंस में कहा था कि इस्लामाबाद के साथ बढ़ते रूसी सामरिक रिश्तों को अब रोका नहीं जा सकेगा। ऐसा करना हमारे हित में नहीं होगा। पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण देश है, जिसकी क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका है। पाकिस्तान के साथ रूस की बढ़ती नजदीकी के समांतर भारत के साथ उसकी बढ़ती दूरी भी नजर आने लगी है। भले ही यह अलगाव अभी बहुत साफ नहीं है, पर अनदेखी करने लायक भी नहीं है। इसे अफगानिस्तान में चल रहे शांति-प्रयासों और हाल में हुए क्वाड शिखर सम्मेलन की रोशनी में देखना चाहिए। और यह देखते हुए भी कि अफगानिस्तान में रूस की दिलचस्पी काफी ज्यादा है।  

पिछले साल तालिबान के साथ हुए समझौते के तहत अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की तारीख 1 मई करीब आ रही है। अमेरिका में प्रशासनिक परिवर्तन हुआ है। राष्ट्रपति जो बाइडेन की नीति बजाय एकतरफा वापसी के सामूहिक पहल के सहारे समाधान खोजने की है। हमारी दृष्टि से महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के झंडे-तले एक पहल शुरू की है, जिसमें भारत को भी भागीदार बनाया है।

हिंद-प्रशांत गठजोड़

इस सिलसिले में हाल में अमेरिका के विशेष दूत जलमय खलीलज़ाद अफगानिस्तान आए थे, वहाँ से उन्होंने भारत के  विदेशमंत्री एस जयशंकर के साथ फोन पर बातचीत की। इस बीच 19 से 21 मार्च तक अमेरिकी रक्षामंत्री जनरल लॉयड ऑस्टिन भारत-यात्रा पर आ रहे हैं। इस दौरान न केवल अफगानिस्तान, बल्कि हिंद-प्रशांत सुरक्षा के नए गठजोड़  पर बात होगी। इन दोनों बातों का संबंध भारत-रूस रिश्तों से भी जुड़ा है।

Sunday, March 21, 2021

मुम्बई का ‘वसूली’ मामला कहाँ तक जाएगा?


मुम्बई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह के पत्र ने केवल महाराष्ट्र की ही नहीं, सारे देश की राजनीति में खलबली मचा दी है। देखना यह है कि इस मामले के तार कहाँ तक जाते हैं, क्योंकि राजनीति और पुलिस का यह मेल केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख को हटा दिया जाएगा। इस तरह से महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) की सरकार बची रहेगी और धीरे-धीरे लोग इस मामले को भूल जाएंगे। पर क्या ऐसा ही होगा? इस मामले के राजनीतिक निहितार्थ गम्भीर होने वाले हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि राज्य के सत्ता समीकरण बदलें। संजय राउत ने एमवीए के सहयोगी दलों से कहा है कि वे आत्ममंथन करें। इस बीच इस मामले से जुड़े मनसुख हिरेन की मौत से जुड़े मामले को केंद्रीय गृम मंत्रालय ने एनआईए को सौंपने की घोषणा की ही थी कि मुम्बई पुलिस के एंटी टेररिज्म स्क्वाड (एटीएस) ने कहा कि इस मामले की हमने जाँच पूरी कर ली है। घूम-फिरकर यह मामला राजनीति का विषय बन गया है। 

इस वसूली के छींटे केवल एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना तक ही सीमित नहीं रहेंगे। इसके सहारे कुछ और रहस्य भी सामने आ सकते हैं। अलबत्ता इन बातों से इतना स्पष्ट जरूर हो रहा है कि देश के राजनीतिक दल पुलिस सुधार क्यों नहीं करना चाहते। पिछले कुछ दिनों से मुंबई पुलिस कई कारणों से मीडिया में छाई हुई है। पहले मुकेश अंबानी के घर के पास विस्फोटक रखने के आरोप में पुलिस अधिकारी सचिन वझे फँसे। बात बढ़ने पर पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को पद से हटा दिया गया। इसपर परमबीर सिंह ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को चिट्ठी लिखी।

सवाल है कि परमबीर सिंह को यह चिट्ठी लिखने की सलाह किसने दी और क्यों दी? उन्हें जब यह बात पता थी, तब उन्होंने इसकी जानकारी दुनिया को देने में देरी क्यों की? सच्चे पुलिस अधिकारी का कर्तव्य था कि वे ऐसे गृहमंत्री के खिलाफ केस दायर करते। पर क्या भारत में ऐसा कोई पुलिस अफसर हो सकता है? विडंबना है कि हम इस वसूली के तमाम रहस्यों को सच मानते हैं। हो सकता है कि काफी बातें गलत हों, पर वसूली नहीं होती, ऐसा कौन कह सकता है? 

 सवाल यह भी है कि मुकेश अम्बानी के घर के पास मोटर वाहन से विस्फोट मिलने के पीछे रहस्य क्या है? सचिन वझे इस पूरे प्रकरण में मामूली सा मोहरा नजर आता है। असली ताकत कहीं और है। बेशक वह पुलिस कमिश्नर और शायद गृहमंत्री से भी ऊँची कोई ताकत है। यहाँ यह साफ कर देने की जरूरत है कि कोई भी राजनीतिक दल दूध का धुला नहीं है। 

बीजेपी का अश्वमेध यज्ञ

अगले शनिवार को असम और बंगाल में विधानसभा चुनावों के पहले दौर के साथ देश की राजनीति का रोचक पिटारा खुलेगा। इन दो के अलावा 6 अप्रेल को पुदुच्चेरी, तमिलनाडु और केरल में चुनाव होंगे, जहाँ की एक-एक सीट का राजनीतिक महत्व है। इन पाँचों से कुल 116 सदस्य लोकसभा में जाते हैं, जो कुल संख्या का मोटे तौर पर पाँचवां हिस्सा हैं। यहाँ की विधानसभाएं राज्यसभा में 51 सदस्यों (21%) को भी भेजती हैं।

इस चुनाव को भारतीय जनता पार्टी के अश्वमेध यज्ञ की संज्ञा दी जा सकती है। सन 2019 के चुनाव में हालांकि भारतीय जनता पार्टी को जबर्दस्त सफलता मिली, पर उसे मूलतः हिंदी-पट्टी की पार्टी माना जाता है। पुदुच्चेरी में उसका गठबंधन सत्ता पाने की उम्मीद कर रहा है, जो तमिलनाडु का प्रवेश-द्वार है। पूर्वांचल में उसने असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में पैठ बना ली है, पर उसका सबसे महत्वपूर्ण मुकाबला पश्चिम बंगाल में हैं, जहाँ विधानसभा की कुल 294 सीटें हैं। 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने यहां 211 सीटें जीती थीं। लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को 70 और बीजेपी को सिर्फ तीन। फिर भी वह मुकाबले में है, तो उसके पीछे कुछ कारण हैं।  

लोकसभा 2019 के चुनाव में भाजपा ने बंगाल में भी झंडे गाड़े। राज्य के तकरीबन 40 फ़ीसदी वोटों की मदद से 18 लोकसभा सीटें उसे हासिल हुईं। तृणमूल ने 43 फ़ीसदी वोट पाकर 22 सीटें जीतीं। दो सीटें कांग्रेस को मिलीं और 34 साल तक बंगाल पर राज करने वाली सीपीएम का खाता भी नहीं खुला। पिछले कई वर्षों से बीजेपी इस राज्य में शिद्दत से जुटी है। अब पहली बार उसकी उम्मीदें आसमान पर हैं। अमित शाह का दावा है, अबकी बार 200 पार। क्या यह सच होगा?

बंगाल का महत्व

बंगाल का महत्व कितना है, इसे समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों पर ध्यान दें। गत 18 मार्च को उन्होंने पुरुलिया को संबोधित किया। यह रैली शनिवार 20 मार्च को होनी थी लेकिन इसे दो दिन पहले ही आयोजित कराया गया। 20 मार्च को खड़गपुर में रैली हुई। आज बांकुड़ा में और 24 को कांटी मिदनापुर में रैलियाँ होंगी। पार्टी पहले चरण से ही माहौल बनाने की कोशिश में है। इससे पहले मोदी 7 मार्च को बंगाल आए थे। तब उन्होंने कोलकाता के बिग्रेड मैदान में जनसभा को संबोधित कर ममता पर निशाना साधा था।

Saturday, March 20, 2021

मोदी की बांग्लादेश यात्रा से भी जुड़ा है पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव

पिछले साल मतुआ समाज की बोरो मां वीणापाणि देवी से आशीर्वाद लेते नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले हफ्ते बांग्लादेश की दो दिन की यात्रा पर जा रहे हैं। इस यात्रा का दो देशों के रिश्तों से जितना वास्ता है, उतना ही पश्चिमी बंगाल में हो रहे विधानसभा चुनाव से भी है। हो सकता है कि भविष्य के तीस्ता जैसे समझौतों से भी हो। बांग्लादेश में इस साल मुजीब वर्ष यानी शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। इसके साथ ही बांग्लादेश की मुक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के 50 वर्ष भी इस साल पूरे हो रहे हैं। दोनों देशों के राजनयिक संबंधों के 50 साल भी।

बांग्लादेश में मोदी तुंगीपाड़ा स्थित बंगबंधु स्मारक में जाएंगे। इसके अलावा वे ओराकंडी स्थित हरिचंद ठाकुर के मंदिर में भी जाएंगे। नरेंद्र मोदी 27 मार्च को ओराकंडी में मतुआ मंदिर जाएंगे। यह पहली बार है जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री इस मंदिर का दौरा करेगा। वे बारीसाल जिले के शिकारपुर में सुगंध शक्तिपीठ में भी जाएंगे। इसके अलावा वे कुश्तिया में रवीन्द्र कुटी बाड़ी और बाघा जतिन के पैतृक घर में भी जा सकते हैं। इन सभी जगहों का राजनीतिक महत्व है।

ओराकंडी मतुआ समुदाय के गुरु हरिचंद ठाकुर और गुरुचंद ठाकुर का जन्मस्थल है। इसकी स्थापना 1860 में एक सुधार आंदोलन के रूप में की गई थी। इस समुदाय के लोग नामशूद्र कहलाते थे और अस्पृश्य माने जाते थे। हरिचंद ठाकुर ने इनमें चेतना जगाने का काम किया। उनके समुदाय के लोग उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं। मतुआ धर्म महासंघ समाज के दबे-कुचले तबके के उत्थान के लिए काम करता है। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में कुल आबादी के 23.5 प्रतिशत दलित और 5.8 प्रतिशत आदिवासी हैं। बंगाल के दलित एवं आदिवासी मतुआ धर्म महासंघ के स्वाभाविक समर्थक माने जाते हैं।

उत्तर 24 परगना जिले में बनगांव स्थित मतुआ धर्म महासंघ के मुख्यालय में मतुआ माता वीणापाणि देवी के साथ गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक की थी। वीणापाणि देवी के दबाव में ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार को मतुआ कल्याण परिषद का गठन करना पड़ा। वीणापाणि देवी का गत वर्ष निधन हो गया। अब उनके पुत्र और पौत्र मतुआ आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं।

Friday, March 19, 2021

पाकिस्तान से शांति का संदेश

 


पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने और फिर सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने कहा है, कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार होना चाहिए। प्रधानमंत्री के साथ जनरल बाजवा के बयान का आना भी बड़ा संदेश दे रहा है।

पिछले बुधवार को इमरान खान ने पाकिस्तान के थिंकटैंक नेशनल सिक्योरिटी डिवीजन के दो दिन के इस्लामाबाद सिक्योरिटी डायलॉग का उद्घाटन करते हुए कहा कि हम भारत के साथ रिश्तों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, पर भारत को इसमें पहल करनी चाहिए। पर उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनका आशय क्या है।

इसी कार्यक्रम में बाद में जनरल बाजवा बोले थे। इसमें उन्होंने कहा, ''जब तक कश्मीर मुद्दा हल नहीं हो जाता तब तक उपमहाद्वीप में शांति का सपना पूरा नहीं होगा। अब अतीत को भुला कर आगे बढ़ने का समय आ गया है।" पाकिस्तान की तरफ़ से हाल ही में सीमा पर युद्ध विराम समझौता किया गया है। जिसके बाद सेना प्रमुख जनरल जावेद बाजवा की भारत से बातचीत की पेशकश सामने आई है। उनकी इस पेशकश की सकारात्मक बात यह है कि इसमें कश्मीर से अनुच्छेद 370 की वापसी और इसी किस्म के विवादास्पद विषयों के नहीं उठाया गया है।

इस सिलसिले में एक और रोचक खबर यह है कि क़मर जावेद बाजवा ने अपनी सेना के जवानों को भारतीय लोकतंत्र की सफलता पर आधारित किताब पढ़ने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि यह जानने की ज़रूरत है कि भारत ने किस तरह से राजनीति को अपनी सेना को अलग रखा है।

Tuesday, March 16, 2021

बंगाल की भगदड़ और मीडिया का यथास्थितिवादी नज़रिया


पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम विधानसभा सीट पर सबकी निगाहें हैं। यहाँ से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मुकाबला उनसे बगावत करके भारतीय जनता पार्टी में आए शुभेंदु अधिकारी से है। इस क्षेत्र का मतदान 1 अप्रेल को यानी दूसरे दौर में होना है। शुरुआती दौर में ही राज्य की राजनीति पूरे उरूज पर है। एक तरफ बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर भागने की होड़ लगी हुई है, वहीं मीडिया के चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में अब भी ममता बनर्जी की सरकार बनने की आशा व्यक्त की गई है। शायद यह उनकी यथास्थितिवादी समझ है। चुनाव कार्यक्रम को पूरा होने में करीब डेढ़ महीने का समय बाकी है, इसलिए इन सर्वेक्षणों के बदलते निष्कर्षों पर नजर रखने की जरूरत भी होगी।

भारत में चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों का इतिहास अच्छा नहीं रहा है। आमतौर पर उनके निष्कर्ष भटके हुए होते हैं। फिर ममता बनर्जी की पराजय की घोषणा करने के लिए साहस और आत्मविश्वास भी चाहिए। बंगाल का मीडिया लम्बे अर्से से उनके प्रभाव में रहा है। बंगाल के ही एक मीडिया हाउस से जुड़ा एक राष्ट्रीय चैनल इस बात की घोषणा कर रहा है, तो विस्मय भी नहीं होना चाहिए। अलबत्ता तृणमूल के भीतर जैसी भगदड़ है, उसपर ध्यान देने की जरूरत है। मीडिया के विश्लेषण 27 मार्च को मतदान के पहले दौर के बाद ज्यादा ठोस जमीन पर होंगे। पर 29 अप्रैल के मतदान के बाद जो एक्ज़िट पोल आएंगे, सम्भव है उनमें कहानी बदली हुई हो।

भगदड़ का माहौल

सन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से टीएमसी के 17 विधायक, एक सांसद कांग्रेस, सीपीएम और सीपीआई के एक-एक विधायक अपनी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। यह संख्या लगातार बदल रही है। हाल में मालदा के हबीबपुर से तृणमूल कांग्रेस की प्रत्याशी सरला मुर्मू ने टिकट मिलने के बावजूद तृणमूल छोड़ दी और सोमवार 8 मार्च को भाजपा में शामिल हो गईं। बंगाल में यह पहला मौका है, जब किसी प्रत्याशी ने टिकट मिलने के बावजूद अपनी पार्टी छोड़ी है। बात केवल बड़े नेताओं की नहीं, छोटे कार्यकर्ताओं की है। केवल तृणमूल के कार्यकर्ता ही नहीं सीपीएम के कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी को छोड़कर भागे हैं। इसकी वजह पिछले दस वर्षों से व्याप्त राजनीतिक हिंसा है।