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Saturday, August 24, 2019

‘नकद को ना’ यानी डिजिटल भुगतान की दिशा में बढ़ते कदम


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले के प्राचीर से अपने राष्ट्रीय संबोधन में कहा कि देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना चाहिए जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। उन्होंने कहा कि दुकानों पर डिजिटल पेमेंट को 'हाँ', और नकद को 'ना' के बोर्ड लगाने चाहिए। सामान्य व्यक्ति को भले ही यह समझ में नहीं आता हो कि भुगतान की इस प्रणाली से अर्थव्यवस्था को मजबूती किस प्रकार मिलती है, फिर भी व्यक्तिगत रूप से उसे पहली नजर में यह प्रणाली सुविधाजनक लगती है। इसमें एक तो बटुए में पैसा भरकर नहीं रखना पड़ता। साथ ही बटुआ खोने या जेबकतरों का शिकार होने का डर नहीं। नोटों के भीगने, कटने-फटने और दूसरे तरीकों से नष्ट होने का डर भी नहीं। रेज़गारी नहीं होने पर सही भुगतान करने और पैसा वापस लेने में भी दिक्कतें होती हैं। और पर्याप्त पैसा जेब में नहीं होने के कारण कई बार व्यक्ति भुगतान से वंचित रह जाता है।

Sunday, August 4, 2019

डिजिटल इंडिया के पास है बेरोजगारी का समाधान


अस्सी और नब्बे के दशक में जब देश में कम्प्यूटराइजेशन की शुरुआत हो रही थी, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में श्रमिकों की गेट मीटिंगें इस चिंता को लेकर होने लगी थीं कि कम्प्यूटर हमारी रोजी-रोटी छीन लेगा। ऑटोमेशन को गलत रास्ता बताया गया और कहा गया कि इसे किसी भी कीमत पर होने नहीं देंगे। बहरहाल उसी दौर में सॉफ्टवेयर क्रांति हुई और तकरीबन हर क्षेत्र में आईटी-इनेबल्ड तकनीक ने प्रवेश किया। सेवाओं में सुधार हुआ और रोजगार के नए दरवाजे खुले। तकरीबन उसी दौर में देश के वस्त्रोद्योग पर संकट आया और एक के बाद एक टेक्सटाइल मिलें बंद होने लगीं।
देश में रोजगार का बड़ा जरिया था वस्त्रोद्योग। कपड़ा मिलों के बंद होने का कारण कम्प्यूटराइजेशन नहीं था। कारण दूसरे थे। कपड़ा मिलों के स्वामियों ने समय के साथ अपने कारखानों का आधुनिकीकरण नहीं किया। ट्रेड यूनियनों ने ऐसी माँगें रखीं, जिन्हें स्वीकार करने में दिक्कतें थीं, राजनीतिक दल कारोबारियों से चंदे लेने में व्यस्त थे और सरकारें उद्योगों को लेकर उदासीन थीं। जैसे ही कोई उद्योग संकट में आता तो उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता। औद्योगिक बीमारी ने करोड़ों रोजगारों की हत्या कर दी।
हाल में हमने बैंक राष्ट्रीयकरण की पचासवीं जयंती मनाई। माना जाता है कि राष्ट्रीयकरण के कारण बैंक गाँव-गाँव तक पहुँचे, पर उचित विनियमन के अभाव में लाखों करोड़ रुपये के कर्ज बट्टेखाते में चले गए। तमाम विरोधों के बावजूद सार्वजनिक बैंकों और जीवन बीमा निगम में तकनीकी बदलाव हुआ, भले ही देर से हुआ। आम नागरिकों को ज्यादा बड़ा बदलाव रेल आरक्षण में देखने को मिला, जिसकी वजह से कई तरह की सेवाएं और सुविधाएं बढ़ीं। आज आप बाराबंकी में रहते हुए भी चेन्नई से बेंगलुरु की ट्रेन का आरक्षण करा सकते हैं, जो कुछ दशक पहले सम्भव नहीं था।
नवम्बर 2016 में जब नोटबंदी की घोषणा हुई थी, तब तमाम बातों के अलावा यह भी कहा गया था कि इस कदम के कारण अर्थव्यवस्था के डिजिटाइज़ेशन की प्रक्रिया बढ़ेगी। यह बढ़ी भी। पर यह सवाल अब भी उठता है कि यह डिजिटाइटेशन रोजगारों को खा रहा है या बढ़ा रहा है?   

Sunday, July 5, 2015

तकनीकी क्रांति की सौगात

नरेंद्र मोदी सरकार के ‘डिजिटल इंडिया’ कार्यक्रम की उपयोगिता पर राय देने के पहले यह जानकारी देना उपयोगी होगा कि सरकार प्राथमिक कृषि उत्पादों के लिए एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल शुरू करने की कोशिश कर रही है। यह पोर्टल शुरू हुआ तो एक प्रकार से एक अखिल भारतीय मंडी या बाजार की स्थापना हो जाएगी, जिसमें किसान अपनी फसल देश के किसी भी इलाके के खरीदार को बेच सकेगा। ऐसे बाजार का संचालन तकनीक की मदद से सम्भव है। ऐसे बाजार की स्थापना के पहले सरकार को कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) कानून में बदलाव करना होगा।

Saturday, July 4, 2015

‘डिजिटल इंडिया’ के लिए क्या हम तैयार हैं?

मोबाइल फोन की वजह से भारत में कितना बड़ा बदलाव आया?  हमने इसे अपनी आँखों से देखा है।  पर इस बदलाव के अंतर्विरोध भी हैं। पिछले दिनों हरियाणा की दो लड़कियों के साथ एक बस में कुछ लड़कों की मारपीट हुई। इसका किसी ने अपने मोबाइल फोन में वीडियो बना लिया। उस वीडियो से लड़कों पर आरोप लग रहे थे तो एक और वीडियो सामने आ गया। जब सारे पहलुओं पर गौर किया जाए तो कुछ निष्कर्ष बदले। ऐसा ही एक वीडियो दिल्ली में एक ट्रैफिक पुलिस कर्मी और एक स्कूटर सवार महिला के बीच झगड़े का नमूदार हुआ। वीडियो के जवाब में एक और वीडियो आया। पूरे देश में सैकड़ों, हजारों ऐसे वीडियो हर समय बनने लगे हैं। सिर्फ झगड़ों के ही नहीं। सैर-सपाटों, जन्मदिन, समारोहों, जयंतियों, मीटिंगों और अपराध के।

सॉफ्टवेयर के मामले में भारत दुनिया का नम्बर एक देश कब और कैसे बन गया, इसके बारे में आपने कभी सोचा? पिछले तीन-साढ़े तीन दशक में भारी बदलाव आया है। सन 1986 में सेंटर फॉर रेलवे सिस्टम (सीआरआईएस-क्रिस) की स्थापना हुई, जिसने यात्रियों के सीट रिज़र्वेशन की प्रणाली का विकास किया। हालांकि इस सिस्टम को लेकर अब भी शिकायतें हैं, पर इसमें दो राय नहीं कि तीन दशक पहले की और आज की रेल यात्रा में बुनियादी बदलाव आ चुका है। पूरे देश में यात्रियों का आवागमन कई गुना बढ़ा है। यह आवागमन बढ़ता ही जा रहा है। ऐसी क्रांति दुनिया में कहीं नहीं हुई। पिछले साल दीवाली के मौके पर अचानक ई-रिटेल के कारोबार ने दस्तक दी। इसके कारण केवल सेवा का विस्तार ही नहीं हुआ है, नए किस्म के रोजगार भी तैयार हुए हैं।