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Saturday, November 2, 2019

यूरोपियन सांसदों के दौरे के बाद कश्मीर


पाकिस्तान की दिलचस्पी कश्मीर समस्या के अंतरराष्ट्रीयकरण में है. इसके लिए पिछले तीन महीनों में उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में खून की नदियाँ बहाने की साफ-साफ धमकी दी थी. हाल में पाक-परस्तों ने सेब के कारोबार से जुड़े लोगों की हत्या करने का जो अभियान छेड़ा है, उससे उनकी पोल खुली है.
पाक-परस्त ताकतों ने भारत की लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी व्यवस्था को लेकर उन देशों में जाकर सवाल उठाए हैं, जो भारत के मित्र समझे जाते हैं. वे जबर्दस्त प्रचार युद्ध में जुटे हैं. ऐसे में हमारी जिम्मेदारी है कि हम कश्मीर के संदर्भ में भारत के रुख से सारी दुनिया को परिचित कराएं और पाकिस्तान की साजिशों की ओर दुनिया का ध्यान खींचें. इसी उद्देश्य से हाल में भारत ने यूरोपियन संसद के 23 सदस्यों को कश्मीर बुलाकर उन्हें दिखाया कि पाकिस्तान भारत पर मानवाधिकार हनन के जो आरोप लगा रहा है, उनकी सच्चाई वे खुद आकर देखें.

Friday, November 1, 2019

राज्य पुनर्गठन के बाद जम्मू-कश्मीर


गत 5 और 6 अगस्त को संसद ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के जिस प्रस्ताव को पास किया था, वह अपनी तार्किक परिणति तक पहुँच चुका है। राज्य का नक्शा बदल गया है और वह दो राज्यों में तब्दील हो चुका है। पर यह औपचारिकता का पहला चरण है। इस प्रक्रिया को पूरा होने में अभी समय लगेगा। कई प्रकार के कानूनी बदलाव अब भी हो रहे हैं। सरकारी अफसरों से लेकर राज्यों की सम्पत्ति के बँटवारे की प्रक्रिया अभी चल ही रही है। राज्य पुनर्गठन विधेयक के तहत साल भर का समय इस काम के लिए मुकर्रर है, पर व्यावहारिक रूप से यह काम बरसों तक चलता है। तेलंगाना राज्य अधिनियम 2013 में पास हुआ था, पर पुनर्गठन से जुड़े मसले अब भी सुलझाए जा रहे हैं।
बहरहाल पुनर्गठन से इतर राज्य में तीन तरह की चुनौतियाँ हैं। पहली पाकिस्तान-परस्त आतंकी गिरोहों की है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था पर हमले कर रहे हैं। हाल में ट्रक ड्राइवरों की हत्या करके उन्होंने अपने इरादों को जता भी दिया है, पर इस तरीके से वे स्थानीय जनता की नाराजगी भी मोल लेंगे, जो उनकी बंदूक के डर से बोल नहीं पाती थी। अब यदि सरकार सख्ती करेगी, तो उसे कम से कम सेब के कारोबार से जुड़े लोगों का समर्थन मिलेगा। दूसरी चुनौती राज्य में राजनीतिक शक्तियों के पुनर्गठन की है। और तीसरी चुनौती नए राजनीतिक मुहावरों की है, जो राज्य की जनता को समझ में आएं। ये तीनों चुनौतियाँ कश्मीर घाटी में हैं। जम्मू और लद्दाख में नहीं।

Sunday, September 29, 2019

संरा में धैर्य और उन्माद का टकराव


संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के भाषणों में वह अंतर देखा जा सकता है, जो दोनों देशों के वैश्विक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। दोनों देशों के नेताओं के पिछले कुछ वर्षों के भाषणों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पाएंगे कि पाकिस्तान का सारा जोर कश्मीर मसले के अंतरराष्ट्रीयकरण और उसकी नाटकीयता पर होता है। इसबार वह नाटकीयता सारी सीमाएं पार कर गई। इमरान खान के विपरीत भारत के प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कश्मीर और पाकिस्तान का एकबार भी जिक्र किए बगैर एक दूसरे किस्म का संदेश दिया है।

नरेंद्र मोदी ने न केवल भारत की विश्व-दृष्टि को पेश किया, बल्कि कश्मीर के संदर्भ में यह संदेश भी दिया कि वह हमारा आंतरिक मामला है और किसी को उसके बारे में बोलने का अधिकार नहीं है। पिछले आठ साल में पहली बार संरा महासभा में प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया है। दुनिया के सामने पाकिस्तान के कारनामों का जिक्र हम बार-बार करते रहे हैं। इसबार नहीं कर रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान खुद चीख-चीखकर अपने कारनामों का पर्दाफाश कर रहा है। इमरान खान ने एटमी युद्ध, खूनखराबे और बंदूक उठाने की खुली घोषणा कर दी।

चूंकि इमरान खान ने भारत और कश्मीर के बारे में अनाप-शनाप बोल दिया, इसलिए उन्हें जवाब भी मिलना चाहिए। भारत के विदेश मंत्रालय की प्रथम सचिव विदिशा मित्रा ने उत्तर देने के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा कि क्या पाकिस्तान इस बात को नहीं मानेगा कि वह दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादी को पेंशन देता है? क्या वह इस बात से इंकार करेगा कि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने अपने 27 में से 20 मानकों के उल्लंघन पर उसे नोटिस दिया है? क्या इमरान खान न्यूयॉर्क शहर से नहीं कहेंगे कि उन्होंने ओसामा बिन लादेन का खुलकर समर्थन किया है?

Sunday, September 1, 2019

राहुल का कश्मीर कनफ्यूज़न


कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। ज्यादातर सरकारी फैसलों के दूसरे पहलू पर रोशनी डालने की जिम्मेदारी कांग्रेस की है, क्योंकि वह सबसे बड़ा विरोधी दल है। पार्टी की जिम्मेदारी है कि वह अपने वृहत्तर दृष्टिकोण या नैरेटिव को राष्ट्रीय हित से जोड़े। उसे यह विवेचन करना होगा कि पिछले छह साल में उससे क्या गलतियाँ हुईं, जिनके कारण वह पिछड़ गई। केवल इतना कहने से काम नहीं चलेगा कि जनता की भावनाओं को भड़काकर बीजेपी उन्मादी माहौल तैयार कर रही है।
कांग्रेसी नैरेटिव के अंतर्विरोध कश्मीर में साफ नजर आते हैं। इस महीने का घटनाक्रम गवाही दे रहा है। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का आदेश पास होने के 23 दिन बाद राहुल गांधी ने कश्मीर के सवाल पर महत्वपूर्ण ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, सरकार के साथ हमारे कई मुद्दों को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन साफ है कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है। पाकिस्तान वहां हिंसा फैलाने के लिए आतंकियों का समर्थन कर रहा है। इसमें पाकिस्तान समेत किसी भी देश के दखल की जरूरत नहीं है।
राहुल गांधी का यह बयान स्वतः नहीं है, बल्कि पेशबंदी में है। यही इसका दोष है। इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र को लिखे गए पाकिस्तानी ख़त का मजमून है, जिसमें पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि कश्मीर में हालात सामान्य होने के भारत के दावे झूठे हैं। इन दावों के समर्थन में राहुल गांधी के एक बयान का उल्लेख किया गया है, जिसमें राहुल ने माना कि 'कश्मीर में लोग मर रहे हैं' और वहां हालात सामान्य नहीं हैं। राहुल गांधी को अपने बयानों को फिर से पढ़ना चाहिए। क्या वे देश की जनता की मनोभावना का प्रतिनिधित्व करते हैं?

Saturday, August 31, 2019

कश्मीर पर किस असमंजस में है कांग्रेस?


अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का आदेश पास होने के 23 दिन बाद राहुल गांधी ने कश्मीर के सवाल पर एक महत्वपूर्ण ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, सरकार के साथ हमारे कई मुद्दों को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह साफ है कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है। पाकिस्तान वहां हिंसा फैलाने के लिए आतंकियों का समर्थन कर रहा है। इसमें पाकिस्तान समेत किसी भी देश के दखल की जरूरत नहीं है।
राहुल गांधी ने ऐसा बयान क्यों जारी किया, इस वक्त क्यों किया और अभी तक क्यों नहीं किया था। ऐसे कई सवाल मन में आते हैं। राहुल के बयान के पीछे निश्चित रूप से पाकिस्तान सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र को लिखे गए एक ख़त का मजमून है। इसमें पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि कश्मीर में हालात सामान्य होने के भारत के दावे झूठे हैं। इन दावों के समर्थन में राहुल गांधी के एक बयान का उल्लेख किया गया है, जिसमें राहुल ने माना है कि 'कश्मीर में लोग मर रहे हैं' और वहां हालात सामान्य नहीं हैं।
बड़ी देर कर दी…
हालात सामान्य नहीं हैं तक बात मामूली है, क्योंकि देश में काफी लोग मान रहे हैं कि कश्मीर में हालात सामान्य नहीं है। सरकार भी एक सीमा तक यह बात मानती है। पर 'कश्मीर में लोग मर रहे हैं' कहने पर मतलब कुछ और निकलता है। तथ्य यह है कश्मीर में किसी आंदोलनकारी के मरने की खबर अभी तक नहीं है। पाकिस्तानी चिट्ठी में नाम आने से राहुल गांधी का सारा राजनीतिक गणित उलट गया है। उन्होंने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने में देर कर दी है। कहना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में उनकी राजनीति की दिशा क्या होगी।

Monday, August 26, 2019

अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर विफल पाकिस्तान


पिछले 72 साल में पाकिस्तान की कोशिश या तो कश्मीर को फौजी ताकत से हासिल करने की रही है या फिर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की रही है। पिछले दो या तीन सप्ताह में स्थितियाँ बड़ी तेजी से बदली हैं। कहना मुश्किल है कि इस इलाके में शांति स्थापित होगी या हालात बिगड़ेंगे। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान की आंतरिक और बाहरी राजनीति किस दिशा में जाती है। पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तानी डीप स्टेट का रुख क्या रहता है।
विभाजन के दो महीने बाद अक्तूबर 1947 में फिर 1965, फिर 1971 और फिर 1999 में कम से कम चार ऐसे मौके आए, जिनमें पाकिस्तान ने बड़े स्तर पर फौजी कार्रवाई की। बीच का समय छद्म युद्ध और कश्मीर से जुड़ी डिप्लोमेसी में बीता है। हालांकि 1948 में संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को लेकर भारत गया था, पर शीतयुद्ध के उस दौर में पाकिस्तान को पश्चिमी देशों का सहारा मिला। फिर भी समाधान नहीं हुआ।
चीनी ढाल का सहारा
इस वक्त पाकिस्तान एक तरफ चीन और दूसरी तरफ अमेरिका के सहारे अपने मंसूबे पूरे करना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तानी डिप्लोमेसी को अमेरिका से झिड़कियाँ खाने को मिली हैं। इस वजह से उसने चीन का दामन थामा है। उसका सबसे बड़ा दोस्त या संरक्षक अब चीन है। अनुच्छेद 370 के सिलसिले में भारत सरकार के फैसले के बाद से पाकिस्तान ने राजनयिक गतिविधियों को तेजी से बढ़ाया और फिर से कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण पर पूरी जान लगा दी। फिलहाल उसे सफलता नहीं मिली है, पर कहानी खत्म भी नहीं हुई है।

Sunday, August 18, 2019

सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्मों पर होगा पाकिस्तान से मुकाबला


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भारत के प्रति द्वेष और द्रोह की आग में जलता पाकिस्तान कश्मीर में बड़ी फौजी कार्रवाई की हिम्मत भले ही न करे, पर अपने छाया-युद्ध को जरूर संचालित करता रहेगा। दूसरी तरफ वह कश्मीर मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण पर पूरी ताकत से जुट गया है। हालांकि 16 अगस्त को हुई सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक के बाद किसी किस्म का औपचारिक प्रस्ताव जारी नहीं हुआ, पर पाकिस्तानी कोशिशें खत्म नहीं हुईं हैं। पाकिस्तान इस बैठक को कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण मानता है, गोकि बैठक में उपस्थित ज्यादातर देशों ने इसे दोनों देशों के बीच का मामला बताया है।
इस बैठक में चीन की भूमिका खुलकर पाकिस्तान के पक्ष में थी और अब माना जा रहा है कि रूस ने भी अपना परम्परागत रुख बदला है। हालांकि जो जानकारी सामने आई है उसके अनुसार रूस, अमेरिका और फ्रांस ने चीनी प्रस्ताव को ब्लॉक किया था, पर रूसी प्रतिनिधि के एक ट्वीट के कारण कुछ संदेह पैदा हुए हैं। अलबत्ता यह बात स्भीपष्ट है कि ब्रिटेन ने इस बैठक में हुए विमर्श पर एक औपचारिक दस्तावेज जारी करने का समर्थन किया था। औपचारिक दस्तावेज जारी होने से इस मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण खुलकर होता, जो पाकिस्तान की इच्छा थी। 
इन बातों से लगता है कि भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय सम्पर्क को बेहतर बनाना होगा। पिछले दो हफ्तों के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि हमें संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान से लड़ाई लड़नी होगी और सोशल मीडिया पर उसके दुष्प्रचार का जवाब भी देना होगा। वस्तुतः उसके पास कोई विकल्प नहीं है। वह सोशल मीडिया पर उल्टी-सीधी खबरें परोसकर गलतफहमियाँ पैदा करना चाहता है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने अपने स्वतंत्रता दिवस संदेश में यह बात कही भी है।

Friday, August 16, 2019

पहली प्राथमिकता है जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद कम से कम चार तरह के प्रभावों परिणामों की प्रतीक्षा हमें करनी होगी। सबसे पहले राज्य में व्यवस्था के सामान्य होने की प्रतीक्षा करनी होगी। केंद्र राष्ट्रपति की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की शुरुआत हो चुकी है। इसलिए हमें न्यायिक समीक्षा की प्रतीक्षा करनी होगी। तीसरे सुरक्षा-व्यवस्था पर कड़ी नजर रखनी होगी और चौथे इसपर वैश्विक प्रतिक्रिया का इंतजार करना होगा।

फौरी तौर पर सुरक्षा का स्थान सबसे ऊपर रहेगा, क्योंकि इसमें ढील हुई, तो परिस्थितियों पर नियंत्रण पाने में दिक्कत होगी। पाकिस्तान की रणनीति एक तरफ कश्मीर मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण में है और दूसरी तरफ भारत में हिंसा भड़काने में। यह हिंसा कश्मीर में हो सकती है और दूसरे हिस्सों में भी। वह मानकर चल रहा है कि इस वक्त अमेरिका का दबाव भारत पर डाला जा सकता है। पर पाकिस्तान के अनुमान गलत साबित होंगे, क्योंकि भारत पर अमेरिकी एक सीमा तक ही काम कर सकता है। कश्मीर के मामले में अब कोई भी अंतरराष्ट्रीय दबाव काम नहीं करेगा। यह प्रसंग 1948 से ही अंतरराष्ट्रीय फोरम में जाने के कारण पेचीदा हुआ था और पाकिस्तान का हौसला इससे बढ़ा है।

ट्रंप के बयान से हौसला बढ़ा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में एक से ज्यादा बार मध्यस्थता की बात करके उसके हौसले को बढ़ा दिया था। ट्रंप ने दूसरी बार भी इस बात को दोहराया, पर पिछले सोमवार को 370 से जुड़े निर्णय के बाद वे खामोश हो गए हैं। अमेरिकी सरकार ने अपने औपचारिक बयान में इसे भारत का आंतरिक मामला बताया है। इतना ही नहीं अमेरिकी विदेश विभाग की वरिष्ठ अधिकारी एलिस वेल्स इस्लामाबाद होते हुए भारत आई हैं। अनुच्छेद 370 के फैसले के बाद पाकिस्तानी राजनय की दिशा फिर से भारत की तरफ मुड़ी है।

Thursday, August 15, 2019

हमारी आजादी पर हमले करती ‘आजादी’!


इस साल स्वतंत्रता दिवस ऐसे मौके पर मनाया जा रहा है, जब कश्मीर पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं. स्वतंत्रता के बाद कई मायनों में यह हमारी व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है. आजादी के दो महीने बाद ही पाकिस्तानी सेना ने कबायलियों की मदद से कश्मीर पर हमला बोला था. वह लड़ाई तब से लगातार चल रही है. तकरीबन 72 साल बाद भारत ने कश्मीर में एक निर्णायक कार्रवाई की है. क्या हम इस युद्ध को उसकी तार्किक परिणति तक पहुँचाने में कामयाब होंगे?
तमाम विफलताओं के बावजूद भारत की ताकत है उसका लोकतंत्र. सन 1947 में भारत का एकीकरण इसलिए ज्यादा दिक्कत तलब नहीं हुआ, क्योंकि भारत एक अवधारणा के रूप में देश के लोगों के मन में पहले से मौजूद था. इस नई मनोकामना की धुरी पर है हमारा लोकतंत्र. पर यह निर्गुण लोकतंत्र नहीं है. इसके कुछ सामाजिक लक्ष्य हैं. स्वतंत्र भारत ने अपने नागरिकों को तीन महत्वपूर्ण लक्ष्य पूरे करने का मौका दिया है. ये लक्ष्य हैं राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय और गरीबी का उन्मूलन.
भारतीय राष्ट्र-राज्य अभी विकसित हो ही रहा है. कई तरह के अंतर्विरोध हमारे सामने आ रहे हैं और उनका समाधान भी हमारी व्यवस्था को करना है. कश्मीर भी एक अंतर्विरोध और विडंबना है. उसकी बड़ी वजह है पाकिस्तान, जिसका वजूद ही भारत-विरोध की मूल-संकल्पना पर टिका है. बहरहाल कश्मीर के अंतर्विरोध हमारे सामने हैं. घाटी का समूचा क्षेत्र इन दिनों प्रतिबंधों की छाया में है. कोई नहीं चाहता कि वहाँ प्रतिबंध हों, पर क्या हम जानते हैं कि अनुच्छेद 370 के फैसले के बाद वहाँ सारी व्यवस्थाएं सामान्य नहीं रह सकती थीं.

Sunday, August 11, 2019

प्रधानमंत्री की साफगोई


जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 की छाया से मुक्त करने के बाद गुरुवार की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश की सबसे बड़ी बात है कि इसमें संदेश में न तो याचना है और न धमकी। सारी बात सादगी और साफ शब्दों में कही गई है। कई सवालों के जवाब मिले हैं और उम्मीद जागी है कि हालात अब सुधरेंगे। साथ ही इसमें यह संदेश भी है कि कुछ कड़े फैसले अभी और होंगे। इसमें पाकिस्तान के नाम संदेश है कि वह जो कर सकता है वह करे। जम्मू-कश्मीर का भविष्य अब पूरी तरह भारत के साथ जुड़ा है। अब पुरानी स्थिति की वापसी संभव नहीं। पर उनका जोर इस बात पर है कि कश्मीर के युवा बागडोर संभालें विकास के साथ खुशहाली का माहौल तैयार करें।
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के संबोधन की तरह इस संबोधन को देश में ही नहीं, दुनिया भर में बहुत गौर से सुना गया। इस भाषण में संदेश कठोर है, और साफ शब्दों में है। उन्होंने न तो अतिशय नरम शब्दों का इस्तेमाल किया है और न कड़वी बात कही। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के प्रायः उधृत इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत सिद्धांत का एक बार भी हवाला नहीं दिया। खुद दो साल पहले उन्होंने लालकिले से कहा था ना गोली से, ना गाली से, कश्मीर समस्या सुलझेगी गले लगाने से। पर इस बार ऐसी कोई बात इस भाषण में नहीं थी।

Tuesday, August 6, 2019

पहली चुनौती है कश्मीर में हालात सामान्य बनाने की


भारतीय राष्ट्र राज्य के लिए इतना बड़ा फैसला पिछले कई दशकों में नहीं हुआ है। सरकार ने बड़ा जोखिम उठाया है। इसके वास्तविक निहितार्थ सामने आने में समय लगेगा। फिलहाल लगता है कि सरकार ने प्रशासनिक और सैनिक स्तर पर इतनी पक्की व्यवस्थाएं कर रखी हैं कि सब कुछ काबू में रहेगा। अलबत्ता तीन बातों का इंतजार करना होगा। सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी जाएगी। हालांकि सरकार ने सांविधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत ही फैसला किया है, पर उसे अभी न्यायिक समीक्षा को भी पार करना होगा। खासतौर से इस बात की व्याख्या अदालत से ही होगी कि केंद्र को राज्यों के पुनर्गठन का अधिकार है या नहीं। इस फैसले के राजनीतिक निहितार्थों का इंतजार भी करना होगा। और तीसरे राज्य की व्यवस्था को सामान्य बनाना होगा। घाटी के नागरिकों की पहली प्रतिक्रिया का अनुमान सबको है, पर बहुत सी बातें अब भी स्पष्ट नहीं हैं। इन तीन बातों के अलावा अंतरराष्ट्रीय जनमत को अपने नजरिए से परिचित कराने की चुनौती है। सबसे ज्यादा पाकिस्तानी लश्करों की गतिविधियों पर नजर रखने की जरूरत है।

Tuesday, March 26, 2019

आतंकी लाइफ-लाइन को तोड़ना जरूरी

http://inextepaper.jagran.com/2083942/Kanpur-Hindi-ePaper,-Kanpur-Hindi-Newspaper-InextLive/26-03-19#page/12/1
पुलवामा के हत्याकांड और फिर बालाकोट में की गई भारतीय कार्रवाई की गहमागहमी के बीच हमने गत 7 मार्च को जम्मू के बस स्टेशन पर हुए ग्रेनेड हमले पर ध्यान नहीं दिया. घटना के फौरन बाद ही इसे अंजाम देने वाला मुख्य अभियुक्त पकड़ लिया गया, पर यह घटना कुछ बातों की तरफ इशारा कर रही है. पिछले नौ महीनों में इसी इलाके में यह तीसरी घटना है. आतंकवादी जम्मू के इस भीड़ भरे इलाके में कोई बड़ी हिंसक कार्रवाई करना चाहते हैं, ताकि जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच टकराव हो. भारतीय सुरक्षाबलों की आक्रामक रणनीति के कारण पराजित होता आतंकी-प्रतिष्ठान नई रणनीतियाँ लेकर सामने आ रहा है.

पुलवामा के बाद जम्मू क्षेत्र में हिंसा भड़की थी. ऐसी प्रतिक्रियाओं का परोक्ष लाभ आतंकी जाल बिछाने वाले उठाते हैं. जम्मू में ग्रेनेड फेंकने वाले की उम्र पर गौर कीजिए. नौवीं कक्षा के छात्र को कुछ पैसे देकर इस काम पर लगाया गया था. आईएसआई के एजेंट किशोरों के बीच सक्रिय हैं. कौन हैं ये एजेंट? जमाते-इस्लामी और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट पर प्रतिबंधों से जाहिर है कि अब उन सूत्रधारों की पहचान हो रही है. वे हमारी उदार नीतियों का लाभ उठाकर हमारी ही जड़ें काटने में लगे हैं. उन तत्वों की सफाई की जरूरत है, जो जहर की खेती कर रहे हैं.

गर्मियाँ आने वाली हैं, जब आतंकी गतिविधियाँ बढ़ती हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान भी वे हरकतें करेंगे. उधर पाकिस्तान को लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानियों के हाथ में फिर से सत्ता आने वाली है. आईएसआई के सूत्रधारों ने पूरे इलाके में भारतीय व्यवस्था के प्रति जहर भरना शुरू कर दिया है. कश्मीर में ही नहीं, वे पंजाब में खत्म हो चुके खालिस्तानी-आंदोलन में फिर से जान डालने का प्रयास कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने अमेरिका में सक्रिय कुछ लोगों की मदद से रेफरेंडम-2020 नाम से एक अभियान शुरू किया है. उन्हें अपना ठिकाना उपलब्ध कराया है. उनकी योजना करतारपुर कॉरिडोर बन जाने के बाद भारत से जाने वाले श्रद्धालुओं के मन में जहर घोलने की है.

Sunday, March 24, 2019

कश्मीर पर नई लाल रेखा

http://epaper.haribhoomi.com/?mod=1&pgnum=1&edcode=75&pagedate=2019-03-24
पिछले पाँच साल में कश्मीर को लेकर मोदी सरकार की नीतियाँ निरंतर सख्त होती गईं हैं और इस वक्त अपने कठोरतम स्तर पर हैं। इन पाँच वर्षों में सरकार ने नर्म रुख अख्तियार करने की कोशिश भी की, पर हालात ऐसे बने कि उसका रुख सख्त होता चला गया। पिछले हफ्ते की कुछ घटनाओं से लगता है कि सरकार ने राजनयिक स्तर पर एक और नई रेखा खींची है। यह रेखा हुर्रियत के खिलाफ है। हुर्रियत के दो महत्वपूर्ण घटकों जमाते-इस्लामी और अब जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) पर प्रतिबंध लगाया गया है। 


पाकिस्तान दिवस (23 मार्च) की पूर्व-संध्या पर दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग में हुए कार्यक्रम में भारत सरकार के मंत्री इसलिए शामिल नहीं हुए, क्योंकि हुर्रियत को बुलाया गया था। यह एक और रेड लाइन रेखा है। उधर प्रधानमंत्री ने इमरान खान के नाम बधाई संदेश भी भेजा है। इसे कुछ लोग संशय बता रहे हैं। ऐसा नहीं है। कश्मीर के मामले में भारत का कड़ा संदेश है और बधाई एक परम्परा के तहत है, जो दुनिया के सभी देश एक-दूसरे के साथ निभाते हैं। इन पत्रों का औपचारिक महत्व होता है आधिकारिक नहीं।  

Sunday, June 17, 2018

शुजात बुखारी की हत्या के मायने

राइजिंग कश्मीर के सम्पादक शुजात बुखारी की हत्या,जिस रोज हुई, उसी रोज सेना के एक जवान औरंगजेब खान की हत्या की खबर भी आई थी। इसके दो-तीन दिन पहले से कश्मीर में अचानक हिंसा का सिलसिला तेज हो गया था। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी गोलीबारी से बीएसएफ के चार जवानों की हत्या की खबरें भी इसी दौरान आईं थीं। हिंसा की ये घटनाएं कथित युद्ध-विराम के दौरान तीन हफ्ते की अपेक्षाकृत शांति के बाद हुई हैं। कौन है इस हिंसा के पीछे?भारतीय विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसमें लश्कर या हिज्बुल मुजाहिदीन का हाथ है।

Wednesday, May 31, 2017

कश्मीर को बचाए रखने में सेना की भूमिका भी है

जनरल बिपिन रावत के तीखे तेवरों का संदेश क्या है? मेजर गोगोई की पहल को क्या हम मानवाधिकार उल्लंघन के दायरे में रखते हैं? क्या जनरल रावत का कश्मीरी आंदोलनकारियों को हथियार उठाने की चुनौती देना उचित है? उन्होंने क्यों कहा कि कश्मीरी पत्थर की जगह गोली चलाएं तो बेहतर है? तब हम वो करेंगे जो करना चाहते हैं। उन्होंने क्यों कहा कि लोगों में सेना का डर खत्म होने पर देश का विनाश हो जाता है? उनके स्वर राजनेता जैसे हैं या उनसे सैनिक का गुस्सा टपक रहा है?

कश्मीर केवल राजनीतिक समस्या नहीं है, उसका सामरिक आयाम भी है। हथियारबंद लोगों का सामना सेना ही करती है और कर रही है। वहाँ के राजनीतिक हालात सेना ने नहीं बिगाड़े। जनरल रावत को तीन सीनियर अफसरों पर तरजीह देकर सेनाध्यक्ष बनाया गया था। तब रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा था कि यह नियुक्ति बहुत सोच समझ कर की गई है। नियुक्ति के परिणाम सामने आ रहे हैं। सेना ने दक्षिण कश्मीर के आतंक पीड़ित इलाकों में कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रखा है। पिछले दो हफ्तों में उसे सफलताएं भी मिली हैं। 

Wednesday, October 26, 2016

कश्मीर में ट्रैक-टू वार्ता

पिछले दो दिनों से खबरें हैं कि यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में पाँच सदस्यों की एक टीम इन दिनों कश्मीर में अलगाववादियों के साथ बातचीत कर रही है। इस शिष्टमंडल ने कट्टरपंथी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक से श्रीनगर में मुलाकात की। सिन्हा के नेतृत्व में शिष्टमंडल ने हैदरपोरा इलाका स्थित गिलानी के घर पर उनसे मुलाकात की। गिलानी के साथ बैठक से पहले सिन्हा ने संवाददाताओं को बताया कि वे यहां किसी शिष्टमंडल के रूप में नहीं आए। उन्होंने कहा, ‘हम लोग सद्भावना और मानवता के आधार पर यहां आए हैं। इसका लक्ष्य लोगों के दुख दर्द और कष्टों को साझा करना है। अगर हम ऐसा कर सके तो खुद को धन्य महसूस करेंगे।’ मीरवाइज उमर फारूक और मोहम्मद यासिन मलिक जैसे अन्य अलगाववादी नेताओं से मिलने के बारे में पूछे जाने पर सिन्हा ने कहा कि वे हर किसी से मिलने की कोशिश कर रहे हैं। शिष्टमंडल के राज्य में अलगाववादी नेताओं से मिलने पर सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि न तो सरकार और न ही पार्टी (बीजेपी) का इससे कुछ लेना-देना है। यह उनका निजी दौरा है। गृहराज्य मंत्री किरण रिजीजू ने शिष्टमंडल के इस दौरे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुछ भी अगर स्वेच्छा से किया गया हो तो उसे रोका नहीं जा सकता है। रिजीजू ने कहा कि इसके आगे मेरे पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं है। वहीं, यूपीए शासनकाल में रक्षा मंत्री रहे एके एंटनी ने कहा कि प्रतिष्ठा का ख्याल रखे बिना सरकार को हर किसी से बातचीत करनी चाहिए। बातचीत से समस्या का समाधान तलाशिए। सरकार को कश्मीर के युवाओं के मिजाज को समझना होगा।

Tuesday, August 30, 2016

जब 2010 में कश्मीर गया था सर्वदलीय शिष्टमंडल

कश्मीर में 52 दिन से लगा कर्फ़्यू हट जाने के बाद ज्यादा बड़ा सवाल सामने है कि अब क्या किया जाए? हिंसा का रुक जाना समस्या का समाधान नहीं है। वह किसी भी दिन फिर शुरू हो सकती है। इसका स्थायी समाधान क्या है? कई महीनों से सुनाई पड़ रहा है कि यह राजनीतिक समस्या है और कश्मीर के लोगों से बात करनी चाहिए। बहरहाल शांति बहाली और सभी पक्षों से वार्ता करने के लिए सभी दलों के प्रतिनिधि 4 सितंबर को कश्मीर जाएंगे। इस दल का नेतृत्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। इसके सामने भी सवाल होगा कि किससे करें और क्या बात करें? इसके पहले सन 20 सितम्बर 2010 को इसी प्रकार का एक संसदीय दल कश्मीर गया था। उसने वहाँ किस प्रकार की बातें कीं, यह जानना रोचक होगा। 4 सितम्बर की यात्रा के पहले एक नजर सन 2010 के कश्मीर के हालात पर डालना भी उपयोगी होगा।

इस प्रतिनिधि मंडल की यात्रा की खबर पढ़ें हिन्दू की वैबसाइट में यहाँ। 20 सितम्बर 2010 की यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया की वैबसाइट में छपी है, जिसके मुख्य अंश इस प्रकार हैंः-

All-party delegation in Kashmir interacts with 'open mind'
SRINAGAR: Union Home Minister P Chidambaram on Monday said the all-party delegation has come to Jammu and Kashmir with an 'open mind' and hopes to 'carve out a path for taking the region out of its present cycle of violence'.
"The team has come with an open mind and the main purpose was to interact with people, listen to them patiently," said Chidambaram.
"We are here to listen to your views, we will give you a patient hearing, what you think we need to do, in order to bring to the people of Jammu and Kashmir, the hope and the belief that their honour and dignity and their future are secure as part of India," he added.
PDP President Mehbooba Mufti did not meet the delegation but sent senior leader Nizamuddin Bhatt. who told reporters later 'although we were given just 15 minutes to put our point' , we have told the delegation that "all suggestions from the mainstream or separatist quarters should be considered."

Sunday, August 28, 2016

कश्मीरी अराजकता पर काबू जरूरी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 22 सांसदों को अपने देश का दूत बनाकर दुनिया के देशों में भेजने का फैसला किया है जो कश्मीर के मामले में पाकिस्तान का पक्ष रखेंगे। हालांकि चीन को छोड़कर दुनिया में ऐसे देश कम बचे हैं जिन्हें पाकिस्तान पर विश्वास हो, पर मानवाधिकार के सवालों पर दुनिया के अनेक देश ऐसे हैं, जो इस प्रचार से प्रभावित हो सकते हैं। पिछले एक साल से कश्मीर में कुछ न कुछ हो रहा है। हमारी सरकार ने बहुत सी बातों की अनदेखी है। कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी सरकार को इस बीच जो भी मौका मिला उसका फायदा उठाने के बजाए दोनों पार्टियाँ आपसी विवादों में उलझी रहीं। 

जरूरत इस बात की है कश्मीर की अराजकता को जल्द से जल्द काबू में किया जाए। इसके लिए कश्मीरी आंदोलन से जुड़े नेताओं से संवाद की जरूरत भी होगी। यह संवाद अनौपचारिक रूप से ही होगा। सन 2002 में ही स्पष्ट हो गया था कि हुर्रियत के सभी पक्ष एक जैसा नहीं सोचते। जम्मू-कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी ने इस पक्ष की उपेक्षा करके गलती की है, जबकि इन दोनों की पहल से ही अब तक का सबसे गम्भीर संवाद कश्मीर में हुआ था।  

Sunday, July 24, 2016

कश्मीरी नौजवानों को कोई भड़का भी तो रहा है

कश्मीर मामले को पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर उठाने की तैयारी कर रहा है। वहाँ 20 जुलाई को जो काला दिवस मनाया गया, जो इस योजना का हिस्सा था। नवाज शरीफ ने पाकिस्तान वापसी के बाद शुक्रवार को राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक बुलाई जिसमें सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ भी शामिल हुए। पिछले दो हफ्तों में पाकिस्तान ने अपने तमाम दूतावासों को सक्रिय कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य देशों के साथ खासतौर से सम्पर्क साधा गया है। यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि कश्मीर घाटी में असाधारण जनांदोलन है।

कश्मीरी नौजवानों को कोई भड़का भी तो रहा है

कश्मीर मामले को पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर उठाने की तैयारी कर रहा है। वहाँ 20 जुलाई को जो काला दिवस मनाया गया, जो इस योजना का हिस्सा था। नवाज शरीफ ने पाकिस्तान वापसी के बाद शुक्रवार को राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक बुलाई जिसमें सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ भी शामिल हुए। पिछले दो हफ्तों में पाकिस्तान ने अपने तमाम दूतावासों को सक्रिय कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य देशों के साथ खासतौर से सम्पर्क साधा गया है। यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि कश्मीर घाटी में असाधारण जनांदोलन है।