Sunday, October 19, 2014

आत्मनिर्भर भाजपा की आहट

आज हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम वैसे ही रहे जैसे कि एक्ज़िट पोल बता रहे हैं तब भारतीय राजनीति में तीन नई प्रवृत्तियाँ सामने आएंगी। भाजपा निर्विवाद रूप से देश की सबसे प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी बनेगी। दूसरे कांग्रेस के सामने क्षेत्रीय दल बनने का खतरा पैदा हो जाएगा। तीसरे क्षेत्रीय दलों के पराभव का नया दौर शुरू होगा। भाजपा को अब दिल्ली विधानसभा के चुनाव कराने का फैसला लाभकारी लगेगा। मोदी लहर को खारिज करने वाले खारिज हो जाएंगे। और अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी के नए नेतृत्व को मान्यता मिल जाएगी। 

इन दोनों राज्यों में कांग्रेस को प्रतीकात्मक सफलता भी मिली तो ठीक। वरना पार्टी अंधे कुएं में जा गिरेगी। दूसरी ओर गठबंधन सहयोगियों के बगैर चुनाव में सफल हुई भाजपा के आत्मविश्वास में कई गुना वृद्धि होगी। अब सवाल है कि क्या पार्टी एनडीए को बनाए रखना चाहेगी? क्या क्षेत्रीय दलों के लिए यह खतरे की घंटी है? और क्या इसके कारण राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-विरोधी मोर्चे को बनाने की मुहिम जोर नहीं पकड़ेगी?

Saturday, October 18, 2014

संयुक्त राष्ट्र नहीं, महत्वपूर्ण है हमारी संसद का प्रस्ताव

जम्मू-कश्मीर के मामले में दो बातें समझ ली जानी चाहिए। पहली यह कि इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में भारत लेकर गया था न कि पाकिस्तान। 1 जनवरी 1948 को भारत ने यह मामला उठाया और इसमें साफ तौर पर पाकिस्तान की ओर से कबायलियों और पाकिस्तानी सेना के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश की शिकायत की गई थी। यह मसला अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी फोरम पर कभी नहीं उठा। भारत की सदाशयता के कारण पारित सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के एक अंश को पाकिस्तान आज तक रह-रहकर उठाता रहा है, पर पूरी स्थिति को कभी नहीं बताता। 13 अगस्त 1948 के प्रस्ताव को लागू कराने को लेकर पाकिस्तान संज़ीदा था तो उसी समय पाकिस्तानी सेना जम्मू-कश्मीर छोड़कर क्यों नहीं चली गई और उसने कश्मीर में घुस आए कबायलियों को वापस पाकिस्तान ले जाने की कोशिश क्यों नहीं कीप्रस्ताव के अनुसार पहला काम उसे यही करना था।

Sunday, October 12, 2014

अशांति के दौर में शांति का पुरस्कार

इस साल का नोबेल शांति-पुरस्कार एक विसंगति की ओर इशारा कर रहा है। इस पुरस्कार की घोषणा जिस वक्त हुई है उस वक्त भारत और पाकिस्तान की सुरक्षा सेनाएं जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा पर एक अघोषित युद्ध लड़ रहीं है। दोनों देश एटम बमों से लैस हैं, दोनों के पास दुनिया के बेहतरीन शस्त्रास्त्र हैं, दोनों बदलाव के एक महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहे हैं और दोनों के नागरिकों के सामने भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की बुनियादी सुविधाओं का संकट है। नोबेल पुरस्कार समिति ने संयुक्त पुरस्कार क्या सोचकर दिया कहना मुश्किल है, पर दोनों देशों के नागरिकों को इस पुरस्कार के गहरे निहितार्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिए। यह पुरस्कार मलाला और कैलाश सत्यार्थी से ज्यादा इन दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है।

Saturday, October 11, 2014

ई-रिटेल का खेल, अभी तो यह शुरुआत है

फ्लिपकार्ट की बिग-बैंग सेल के बाद भारत के ई-रिटेल को लेकर कई बातें रोशनी में आईं हैं। इसकी अच्छाइयों और बुराइयों के किस्से सामने हैं, कई पेचीदगियों ने सिर उठाया है और सम्भावनाओं का नया आसमान खुला है। इस नए बाज़ार ने व्यापार कानूनों के छिद्रों की ओर भी इशारा किया है। यह बाज़ार इंटरनेट के सहारे है जिसकी पहली पायदान पर ही हम खड़े हैं। ‘बिग बिलियन डे’ की सेल ने नए मायावी संसार की झलक भारतवासियों को दिखाई साथ ही फ्लिपकार्ट की प्रबंध क्षमता और तकनीकी प्रबंध पर सवाल भी उठाए। इसके लिए उसके सह-संस्थापकों सचिन बंसल और बिनी बंसल ने फौरन अपने ग्राहकों से माफी माँगी। उनकी असली परीक्षा अब अगले कुछ दिनों में होगी।

Thursday, October 9, 2014

अब खुल रहा है ई-बाज़ार...

पिछले एक हफ्ते की गतिविधियों को देखते हुए शायद दिनकर की पंक्तियों को कुछ संशोधित करके इस तरह कहने की घड़ी आ रही है, सेनानी करो प्रयाण अभय, सायबर आकाश तुम्हारा है. चीन की ई-कॉमर्स वेबसाइट अलीबाबा न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हो गयी. उसके संस्थापक और कार्यकारी अध्यक्ष जैक मा 21 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बन गए. नौजवानों को स्टीव जॉब्स, जुकेनबर्ग और बिल गेट्स जैसा एक और रोल मॉडल मिल गया है. उधर भारत में सबसे बड़े ई-रिटेल ग्रुप फ्लिपकार्ट ने अपनी बंपर सेल के 'बिग बिलियन डे' को बिगबैंग के अंदाज़ में मनाया. यह अलग बात है कि कुछ नासमझी, कुछ अनुभवहीनता और कुछ तकनीकी सीमाओं ने फ्लिपकार्ट को फ्लॉपकार्ट बनाने में देर नहीं की और सोशल मीडिया ने उसका जमकर मज़ाक उड़ाया. 

Monday, October 6, 2014

खेलों में हम फिसड्डी ही साबित क्यों होते हैं?

इंचियॉन के एशिया खेलों में जब भारत की टीम जा रही थी तब उम्मीद ज़ाहिर की गई थी कि सन 2010 के ग्वांगझो एशियाड के मुकाबले इस बार हमारे खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन करेंगे। ग्वांगझो में हमें कुल 65 मेडल मिले थे। एशिया खेलों में वह हमारा अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इसके पहले सन 1982 के दिल्ली एशियाड में हमें 57 मेडल मिले थे। पहले एशिया खेल सन 1951 में दिल्ली में हुए थे। तब पदक तालिका में हम 51 मेडलों के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जबकि 60 मेडलों के साथ जापान पहले स्थान पर रहा। 1982 में कुल 57 मेडलों के साथ हम पाँचवें पर, 2010 में छठे पर और इस बार 57 मेडलों के साथ हम आठवें स्थान पर रहे। 342 मेडलों के साथ चीन का पहला नम्बर रहा।

Sunday, October 5, 2014

सामूहिक इच्छा होगी तो सब साफ हो जाएगा

महात्मा गांधी के चरखा यज्ञ की सामाजिक भूमिका पर कम लोगों ने ध्यान दिया होगा। देशभर के लाखों लोग जब चरखा चलाते थे, तब कपड़ा बनाने के लिए सूत तैयार होता था साथ ही करोड़ों लोगों की ऊर्जा एकाकार होकर राष्ट्रीय ऊर्जा में तबदील होती थी। प्रतीकात्मक कार्यक्रमों का कुशलता से इस्तेमाल व्यावहारिक रूप से बड़े परिणाम भी देता है। जैसे लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान, जय किसान के नारे ने संकट के मौके पर देश को एक कर दिया। यह एकता केवल संकटों का सामना करने के लिए ही नहीं चाहिए, बल्कि राष्ट्रीय निर्माण के लिए भी इसकी जरूरत है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना-आंदोलन या निर्भया मामले में जनता के रोष के पीछे भी यह राष्ट्रीय एकता खड़ी थी। इस एकता या सर्वानुमति की अक्सर जरूरत होगी, क्योंकि हमारी व्यवस्था इतनी प्रभावशाली नहीं है कि सारे काम हल करके दे दे। उसे प्रभावशाली बनाने के लिए भी जनांदोलनों की जरूरत है।

Sunday, September 28, 2014

मोदी का ‘ग्लोबल कनेक्ट’

यह लेख नरेंद्र मोदी के संयुक्त राष्ट्र महासभा के भाषण के पहले लिखा गया था। महासभा के भाषणों का व्यावहारिक महत्व कोई खास नहीं होता। भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर कहा-सुनी चलती है। भारत मानता है कि यह द्विपक्षीय प्रश्न है, इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया नहीं जाना चाहिए। पर सच है कि इसे भारत ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर लेकर गया था। पाकिस्तान ने हमेशा इसका फायदा उठाया और पश्चिम के साथ अच्छे सम्पर्कों का उसे फायदा मिला। पश्चिमी देश भारत को मित्र मानते हैं पर सामरिक कारणों से पाकिस्तान को वे अपने गठबंधन का हिस्सा मानते हैं। सीटो और सेंटो का जब तक वजूद था, पाकिस्तान उनका गठबंधन सहयोगी था भी। आने वाले वर्षों में भारत को अपने आकार और प्रभावशाली अर्थ-व्यवस्था का लाभ मिलेगा। पर देश की आंतरिक राजनीति और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रौढ़ होने में समय लग रहा है। हमारी विकास की गति धीमी है। फैसले करने में दिक्कतें हैं। बहरहाल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया से कुछ खरी बातें कहने की स्थिति में आ गया है। यह बात धीरे-धीरे ज्यादा साफ होती जाएगी।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका आने के ठीक पहले वॉल स्ट्रीट जनरल के लिए लेख लिखा है। इस लेख में उन्होंने अपने सपनों के भारत का खाका खींचा है साथ ही अमेरिका समेत दुनिया को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया है। उन्होंने लिखा है, कहते हैं ना काम को सही करना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सही काम करना। अमेरिका रवाना होने के ठीक पहले दिल्ली में और दुनिया के अनेक देशों में एक साथ शुरू हुए मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत की थी। इस अभियान के ठीक एक दिन पहले भारत के वैज्ञानिकों ने मंगलयान अभियान के सफल होने की घोषणा की। संयोग है कि समूचा भारत पितृ-पक्ष के बाद नव-रात्रि मना रहा है। त्योहारों और पर्वों का यह दौर अब अगले कई महीने तक चलेगा।

Saturday, September 27, 2014

न्यूक्लियर डील के पेचो-ख़म

पहले जापान, फिर चीन और अब अमेरिका के साथ बातचीत की बेला में भारतीय विदेश नीति के अंतर्विरोध नज़र आने लगे हैं। सन 2005 के भारत-अमेरिका सामरिक सहयोग के समझौते के बाद सन 2008 के न्यूक्लियर डील ने दोनों देशों को काफी करीब कर दिया था। इसी डील ने दोनों के बीच खटास पैदा कर दी है। विवाद की जड़ में है सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट 2010 की वे व्यवस्थाएं जो परमाणु दुर्घटना की स्थिति में मुआवजा देने की स्थिति में उपकरण सप्लाई करने वाली कम्पनी पर जिम्मेदारी डालती हैं। खासतौर से इस कानून की धारा 17 से जुड़े मसले पर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं है। यह असहमति केवल अमेरिका के साथ ही नहीं है, दूसरे देशों के साथ भी है। जापान के साथ तो हमारा कुछ बुनियादी बातों को लेकर समझौता ही नहीं हो पा रहा है।

Thursday, September 25, 2014

मंगलयान माने रास्ता इधर से है

संयोग से मंगलयान की सफलता और 'मेक इन इंडिया' अभियान की खबरें एक साथ आ रहीं हैं. पिछले साल नवम्बर में जब मंगलयान अपनी यात्रा पर निकला था, तब काफी लोगों को उसकी सफलता पर संशय था. व्यावहारिक दिक्कतों के कारण भारत ने इस यान को पीएसएलवी के मार्फत छोड़ा था. इस वजह से इसने अमेरिकी यान के मुकाबले ज्यादा वक्त लगाया और अनेक जोखिमों का सामना किया. हालांकि यह बात कहने वाले आज भी काफी हैं कि भारत जैसे गरीब देश को इतने महंगे अंतरिक्ष अभियानों की जरूरत नहीं है, पर वे इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि अंतरिक्ष तकनीक के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार की तमाम तकनीकें जुड़ी हैं, जो अंततः हमारे जन-जीवन को बेहतर बनाने में मददगार होंगी. फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की अंतरिक्ष तकनीक के लिए विकासशील देशों का बहुत बड़ा बाज़ार तैयार है. हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश और नेपाल तक अपने उपग्रह भजना चाहते हैं. चूंकि उनके पास यह तकनीक नहीं है, इसलिए ज्यादातर देश चीन की ओर देख रहे हैं. मंगलयान की सफलता ने भारत की एक नई तकनीकी खिड़की खोली है.

Friday, September 19, 2014

चीन से रिश्ते तो बनेंगे, पर भरोसा बनाने में वक्त लगेगा

हालांकि जून 1954 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई का नागरिक अभिनंदन किया गया था। उसे भी शामिल कर लें तब भी आज तक चीन के किसी नेता का भारत में ऐसा स्वागत नहीं हुआ जैसा राष्ट्रपति शी जिनपिंग का हुआ है। नेहरू युग में गढ़े गए हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे की हवा सन 1962 में निकल गई। उसके बाद से भारत के लोगों के मन में चीन को लेकर गहरा संशय है। इसीलिए 70 करोड़ डॉलर के सालाना कारोबार के बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा पर जारी तनाव हमें सबसे बड़ी समस्या लगता है। हमारे संशय के वाजिब कारण हैं और जब तक वे हैं हम चीन पर पूरा भरोसा नहीं करेंगे।

मोदी सरकार ने सीमा पर फैली इस धुंध को ही दूर करने की कोशिश की है। सच यह है कि वैश्विक मंच पर चीन हमारा प्रतिद्वंद्वी बना रहेगा, पर इसका मतलब दुश्मनी नहीं है। शी जिनपिंग के पहले सन 2005 और 2010 में चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की भारत यात्रा काफी नाटकीय थी। जियाबाओ को दोनों देशों के रिश्तों को पटरी पर लाने का श्रेय जाता है। उनकी 2005 की यात्रा के बाद 2006 में राष्ट्रपति हू जिनताओ भी भारत आए थे, पर रिश्तों को नाटकीय अंदाज में सरस बनाने का काम जियाबाओ ने ही किया। संस्कृत-श्लोकों को उद्धृत करने से लेकर हजारों साल पुराने सांस्कृतिक रिश्तों का उन्होंने उसी तरह इस्तेमाल किया था। इस बार मोदी ने उन्हें साबरमती की यात्रा कराकर भारत की सॉफ्टपावर से रूबरू कराया। हमने भारत को अभी दुनिया में ठीक से शोकेस नहीं किया है। उसका समय भी आ रहा है। 

इस यात्रा मात्र से चीन हमारा प्यारा दोस्त नहीं बन गया। व्यावहारिक राजनय का तकाज़ा है कि हम वक्त की आवाज़ को सुनें। शी जिनपिंग की इस यात्रा से पहले उम्मीद जाहिर की जा रही थी कि वे लगभग 100 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा करेंगे। मोदी की यात्रा के दौरान जापान ने 35 करोड़ डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। पर चीन ने अगले पाँच साल में 20 करोड़ डॉलर के निवेश की घोषणा की है। हाँ इस यात्रा की उपलब्धि है भारत-चीन रिश्तों पर जमी बर्फ का टूटना। सीमा के मामले को मजबूती और सफाई के साथ रखने की जरूरत है। यदि चीनी सेना मानती है कि वह अपने इलाके की चौकसी करती है तो उसे उन अपने नक्शों को मुहैया कराना होगा।
नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘मैंने सीमा के इर्द-गिर्द की घटनाओं पर चिंता से चीनी राष्ट्रपति को अवगत कराया है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्पष्टता की जरूरत है। चीन की वीजा नीति के साथ ही पानी के मुद्दे पर चिंता व्यक्त की। इनका समाधान संबंधों को और मजबूत बनाएगा। 

Tuesday, September 16, 2014

कमंडल की प्रयोगशाला फेल

 मंगलवार, 16 सितंबर, 2014 को 14:24 IST तक के समाचार
मोदी और मुलायम
विधानसभा की जिन 33 सीटों पर उप चुनाव हुए थे, उनका लोकसभा चुनाव परिणामों के आधार पर फैसला होता तो इनमें से 25 सीटें भाजपा को मिलनी चाहिए थीं.
परिणामों से ज़ाहिर है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो ‘लहर’ बनी थी, वह लुप्त हो चुकी है. और दूसरे उत्तर प्रदेश को ‘प्रयोगशाला’ बनाने की भगवा कोशिश फेल हुई है.
फिर भी इसे मोदी सरकार के प्रति जनता की प्रतिक्रिया मानना जल्दबाज़ी होगी. लोकसभा चुनाव के मुद्दे-मसले और मुहावरे इन चुनावों में नहीं थे.
फीका मतदान भी इसका प्रमाण है. दूसरी ओर भाजपा को पश्चिम बंगाल और असम में सफलता मिलना नई परिघटना है. उसके क्षेत्र का विस्तार हो रहा है.

पढ़िए उप चुनाव के नतीजों पर प्रमोद जोशी का विश्लेषण विस्तार से

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सफलता चुनावी गणित का परिणाम है. पार्टी इस चुनाव में भाजपा-विरोधी वोटों को बिखरने से रोकने में कामयाब हुई. यह नहीं कि उत्तर प्रदेश का वोटर अखिलेश सरकार के प्रदर्शन और प्रदेश में बिजली की किल्लत और कानून-व्यवस्था की स्थिति से संतुष्ट है.
मुलायम और अखिलेश
माना जा सकता है कि मोदी के पक्ष में वोट डालने वाले इस बार बाहर नहीं निकले. उन्हें इन चुनाव में जीत हासिल करने की कोई बड़ी चुनौती दिखाई नहीं दी. उत्तर प्रदेश का सामाजिक गणित पिछले महीने के बिहार-प्रयोग की तरह सफल साबित हुआ.

गैर-भाजपा मोर्चे की उम्मीदें

इसका मतलब है कि यदि सांप्रदायिकता विरोध के आधार पर राजनीतिक एकता कायम हो तो उसे सफलता मिल सकती है. गुजरात और राजस्थान से कांग्रेस के लिए संदेश है कि हमने आपका साथ पूरी तरह छोड़ा नहीं है. वसुंधरा राजे की सरकार के लिए तीन सीटें हारना अशुभ संकेत है.
उत्तर प्रदेश की जिन 11 सीटों पर चुनाव हुए वे भाजपा की सीटें थीं. इनमें हार का असर पार्टी के प्रदेश संगठन और स्थानीय नेतृत्व पर पड़ेगा.
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की ‘जान में जान’ आई है. लोकसभा चुनाव में भारी हार से पार्टी ने सबक लिया और मुलायम सिंह यादव ख़ुद आम चुनाव की तरह सक्रिय रहे. एक-एक सीट की रणनीति उन्होंने खुद बनाई. आमतौर पर मुख्यमंत्री उपचुनाव के लिए प्रचार नहीं करते लेकिन अखिलेश यादव ने पूरा समय इन चुनाव को दिया.

Sunday, September 14, 2014

भाषा, पत्रकारिता और हिन्दी समाज के रिश्ते बिखर रहे हैं

हिंदी पत्रकारिता का हिंदी से क्या रिश्ता है?

प्रमोद जोशी
पूर्व संपादक, हिन्दुस्तान
हिंदी के नाम पर हम दो दिन खासतौर से मनाते हैं। पहला हिंदी पत्रकारिता दिवस, जो 30 मई 1826 को प्रकाशितहिंदी के पहले साप्ताहिक अख़बार ‘उदंत मार्तंड’ की याद में मनाया जाता है और दूसरा हिंदी दिवस जो संविधान में हिंदी कोसंघ की राजभाषा बनाए जाने से जुड़े प्रस्ताव की तारीख 14 सितम्बर 1949 की याद में मनाया जाता है। हिंदी और पत्रकारिता का खास रिश्ता बनता है। उन्हें अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। संयोग से पत्रकारिता और हिंदी दोनों इन दिनों बड़े बदलावों से गुज़र रहे हैं। और दोनों की गिरावट को लेकर एक बड़े तबके को शिकायत है। हाल के वर्षों में रोमन हिंदी का चलन बढ़ा है। उसके लोकप्रिय होने की वजह को भी हमें समझना होगा।
समय के साथ संसार बदलता है। भाषाएं और उनकी पत्रकारिता भी। हिंदी को भी बदलना है। पर क्या उसमें आ रहे बदलाव स्वाभाविक हैं? बदलाव से आशय है, उसमें प्रवेश कर रहे अंग्रेज़ी के शब्द। मसलन प्रधानमंत्री को प्राइम मिनिस्टर, छात्र को स्टूडेंट और गाड़ी को वेईकल लिखने से क्या भाषा ज्यादा सरल और सहज बनती है? दुनियाभर में अख़बार अपनी भाषा को आसान और आम-फहम बनाने की कोशिश करते हैं, क्योंकि उनका पाठक-वर्ग काफी बड़ा होता है। हिंदी के जिस रूप को हम देख रहे हैं वह डेढ़ सौ से दो सौ साल पुराना है। उदंत मार्तंड की हिंदी और आज की हिंदी में काफी बदलाव आ चुका है। हिंदी के इस स्वरूप की बुनियाद फोर्ट विलियम कॉलेज की पाठ्य-पुस्तकों से पड़ी।

हिन्दी के नए वैश्विक सिपाही : क्या आप उन्हें जानते हैं?


मोदी सरकार सोशल मीडिया के मार्फत देश की जनता से जुड़ना चाहती है। और यह भी कि नरेन्द्र मोदी ने हिन्दी को राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संवाद की भाषा बना दिया। राजदीप सरदेसाई, अर्णब गोस्वामी, सागरिका घोष से लेकर बरखा दत्त तक सब हिन्दी में बोलने लगे। महात्मा गांधी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक जो हिन्दी में बोला वह भारत से जुड़ा और जो नहीं बोला वह कटा रहा। पर यह कैसी हिन्दी? कौन है जो इस हिन्दी का पालनहार है?

किसी भी भाषा की जन-संचार, शिक्षा और विचार-विमर्श में जो भूमिका है वह उसके कद को भी निर्धारित करती है। अंग्रेजी को विश्व-भाषा बनने में कई सदियाँ लगीं। इसमें दो राय नहीं कि उसके आर्थिक महत्व ने उसके सामाजिक सम्मान को कायम किया। हम अपने देश में अंग्रेजी का बोल-बाला सिर्फ इसलिए देख रहे हैं क्योंकि जो अंग्रेजी बोलता है उसका रसूख है। नौकरी पानी है तो अंग्रेजी बोलो। हिन्दी जिनकी मातृ-भाषा है उनके मन में अपनी भाषा के प्रति सम्मान है, पर वे जानते हैं कि इससे पेट नहीं भरता। बावजूद इसके उसका अपना एक अलग प्रभाव-क्षेत्र है। खासतौर से मनोरंजन और राजनीति में। एक माने में हिन्दी का असीम विस्तार हो रहा है, पर दूसरी और उसे लेकर हमारे मन में ग्लानि भाव भी है। हिन्दी की दिलचस्पी ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, इतिहास, कला और विमर्श में नहीं है।

कांग्रेस : अबके डूबे तो...

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों की तारीख आने के साथ देश के राजनीतिक-मंथन का अगला दौर शुरू हो गया है। इस दौर में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की ताकत और कमज़ोरियों का परीक्षण होगा। बिहार और उत्तर प्रदेश के उपचुनावों से निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। बिहार में कांग्रेस, जदयू और राजद के महागठबंधन ने बेशक भाजपा-विरोधी विरोधी मोर्चे की सम्भावनाओं की राह दिखाई है, पर यह राष्ट्रीय प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उत्तर प्रदेश के उप-चुनावों से बसपा ने अलग होकर सपा और कांग्रेस को कोई संदेश दिया है या भाजपा को रोकने की उत्तर प्रदेश रणनीति की और इशारा किया है यह चुनाव परिणाम आने के बाद ही कहा जा सकेगा। पर इसमें दो राय नहीं कि सबसे ज्यादा फज़ीहत जिस पार्टी की है वह है कांग्रेस। देखना यह है कि लोकसभा चुनाव के दौरान पैदा हुई मोदी-लहर अभी प्रभावी है या नहीं। अलबत्ता इन दोनों राज्यों में प्रचार के लिए मोदी जाने वाले हैं। उनके मुकाबले कांग्रेस के पास सोनिया और राहुल की जोड़ी है। क्या वह काम करेगी?