Monday, October 6, 2014

खेलों में हम फिसड्डी ही साबित क्यों होते हैं?

इंचियॉन के एशिया खेलों में जब भारत की टीम जा रही थी तब उम्मीद ज़ाहिर की गई थी कि सन 2010 के ग्वांगझो एशियाड के मुकाबले इस बार हमारे खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन करेंगे। ग्वांगझो में हमें कुल 65 मेडल मिले थे। एशिया खेलों में वह हमारा अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इसके पहले सन 1982 के दिल्ली एशियाड में हमें 57 मेडल मिले थे। पहले एशिया खेल सन 1951 में दिल्ली में हुए थे। तब पदक तालिका में हम 51 मेडलों के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जबकि 60 मेडलों के साथ जापान पहले स्थान पर रहा। 1982 में कुल 57 मेडलों के साथ हम पाँचवें पर, 2010 में छठे पर और इस बार 57 मेडलों के साथ हम आठवें स्थान पर रहे। 342 मेडलों के साथ चीन का पहला नम्बर रहा।


खेलों को आर्थिक-सामाजिक विकास का संकेतक मानें तो हमारी कोई सुन्दर तस्वीर उभर कर नहीं आती है। दूसरी और चीनी तस्वीर दिन-पर-दिन बेहतर होती जा रही है। सन 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के 35 साल बाद सन 1984 के लॉस एंजेलस ओलिम्पिक खेलों में चीन को पहली बार भाग लेने का मौका मिला और उसने 15 गोल्ड, 8 सिल्वर और 9 ब्रॉंज़ मेडल जीतकर चौथा स्थान हासिल किया था। उस ओलिम्पिक में सोवियत गुट के देश शामिल नहीं थे। पर चीन ने धमाके के साथ अपनी भावी वैश्विक महत्ता को दर्ज कराया था।

सन 1988 के सोल ओलिम्पिक में सोवियत संघ ने जोरदार वापसी की सबसे ज्यादा मेडल जीते। चीन उस ओलिम्पिक में 11 वें स्थान पर रहा। 1992 के बार्सिलोना ओलिम्पिक सोवियत संघ के विघटन की पृष्ठभूमि में हुए। चीन फिर से चौथे स्थान पर आया। सन 1996 में भी वह चौथे स्थान पर रहा, सहस्राब्दी बदलने पर सन 2000 के सिडनी ओलिम्पिक में वह तीसरे स्थान पर आया और सन 2004 के एथेंस खेलों में दूसरे पर। सन 2000 के ओलिम्पिक खेल चीन अपने यहाँ आयोजित करना चाहता था ताकि वह कह सके कि इक्कीसवीं सदी चीन की है। ऐसा हो नहीं पाया, पर सन 2008 के बीजिंग ओलिम्पिक को उसने जबर्दस्त तरीके से शोकेस किया। सिर्फ आयोजन से ही नहीं मैदान में अपने प्रदर्शन से भी। कुल 100 मेडल जीतकर वह पहले स्थान पर आया।

एटम बमों से तबाह जापान ने युद्ध के बाद बीस साल में जो चमत्कार किया वह उसने 1964 के तोक्यो ओलिम्पिक में दिखाया। प्रतीक थी बुलेट ट्रेन जो ओलिम्पिक के मौके पर शुरू की गई थी। दूसरा विश्वयुद्ध न रोकता तो 1940 के ओलिम्पिक तोक्यो में होते। जापान के बाद 1988 में दक्षिण कोरिया ने खुद को शोकेस किया। ऐसी ही मौका 2010 के कॉमनवैल्थ गेम्स के मार्फत भारत को भी मिला था, ये खेल उल्टे गले पड़े। बात केवल आयोजन क्षमता की नहीं है। खेल सामाजिक विकास की कहानी भी कहते हैं। इस मामले में हम अफ्रीका के देशों से भी पीछे हैं। केमरून, इथोपिया, घाना, हेती, केन्या, मोज़ाम्बीक, नाइजीरिया और उगाण्डा जैसे देशों ने भारत के मुकाबले ओलिम्पिक में बेहतर प्रदर्शन किया है।

इंचियॉन एशियाड में हमारी महत्वाकांक्षा 70 से 75 मेडल हासिल करने की थी। वह भी पूरी नहीं हुई। हमारे लक्ष्य ही इतने छोटे हैं कि क्या कहें। चीन ने इन खेलों का इस्तेमाल सन 2016 के रियो डि जेनेरो ओलिम्पिक की तैयारी के रूप में किया। हम अपने ऊपर निगाह डालें तो इन खेलों में सबसे बड़ी सफलता हॉकी टीम का रियो ओलिम्पिक के लिए क्वालिफाई करना है। अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ की रैंकिंग में हमारा स्थान नौवाँ हैं। यदि आप एथलेटिक्स के विश्व स्तर को देखें तो हमारे खिलाड़ी पन्द्रहवें और बीसवें नम्बर भी नहीं दिखाई पड़ेंगे। खेल सिर्फ शारीरिक सौष्ठव और दम-खम का परिचय ही नहीं देते। इनसे यह पता भी लगता है कि हम कितने अनुशासनबद्ध है, नियमों का पालन करते हैं, प्रतिभाओं का किस तरह सम्मान करते हैं और प्रतियोगिता को कितना बढ़ावा देते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में हमें ज्यादा ऊँचा, तीव्रतर और दृढ़तर होना चाहिए। लंदन ओलिम्पिक में एक हज़ार के आस पास मेडल दिए गए। उनमें से छह हमें मिले। यह हमारी ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

खेलों का रिश्ता सामाजिक संरचना और जीन्स से भी होता होगा। मसलन कैरीबियन सागर के छोटे से देश जमैका का स्प्रिंट यानी छोटी दूरी की रेसों में बोलबाला है। उसैन बोल्ट और अफाफा पॉवेल इसके उदाहरण हैं। मैराथन जैसी लम्बी दूरी की रेसों में अफ्रीका के केन्या और इथोपिया जैसे देशों की धाक है। कुश्ती और बॉक्सिंग में पूर्वी यूरोप और एशिया की सीमा के कॉकेशियन लोग सफल हैं। बैडमिंटन और टेबल टेनिस प्रतियोगिताओं के ज्यादातर विजेता चीनी मूल के खिलाड़ी होते हैं। मोटे तौर पर गोरे यूरोपियन, अफ्रीकी मूल के अश्वेत और चीनी मूल के खिलाड़ी खेल के मैदान पर राज करते हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में अमेरिका इन तीनों तरह के खिलाड़ियों को प्रश्रय देता है और दुनिया का नम्बर एक देश है।

चीन में खेलों के उत्कर्ष के सामाजिक-राजनीतिक कारण भी हैं। चीनी सरकार सावधानी के साथ खेलों पर पैसा खर्च करती है और महंगी ट्रेनिंग की व्यवस्था करती है। आर्थिक खुलेपन के साथ वहाँ खेलों के वित्तपोषक भी बढ़े हैं। वैसे ही जैसे हमारे क्रिकेट में। पर हमारी व्यावसायिकता राष्ट्रीय-प्रतिष्ठा को बढ़ाने में मददगार नहीं हुई। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने एशिया खेलों के लिए टी-20 क्रिकेट टीम भेजने से मना कर दिया। यानी महिला और पुरुष वर्ग के दो सम्भावित गोल्ड मेडल हमने खो दिए। क्रिकेट ने हमें कैसी प्रतिष्ठा दी है? मैच फिक्सिंग के नाम पर बदनामी। हमारा राजनीतिक समाज तिकड़म को खेल मानता है। खेल संघों पर कौन लोग बैठे हैं? खेल भावना पारदर्शी बनने को कहती है। इस मामले में हमें सानिया मिर्जा की तारीफ करनी होगी, जिसने प्रफेशनल टेनिस टुअर के अंक गँवाने का जोखिम उठाया और टीम को गोल्ड दिलाने में मदद की। सामाजिक बदलाव में खेल अपनी भूमिका ज़रूर अदा करेंगे, पर तभी जब समाज खेलों की इज्जत करेगा। इस बात को समझिए।    
  

2 comments:

  1. आपकी लिखी रचना मंगलवार 07 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आज के समय में भारत में राजनीति ने हर
    क्षेत्र को गन्दा कर दिया है. चाहे वो शिक्षा का
    क्षेत्र हो या खेल का ! जिसके कारण कुछ युवा तो निराश
    और हताश हो जाते हैं

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