Friday, August 9, 2013

बहुत कठिन है डगर यूपीए की

 शुक्रवार, 9 अगस्त, 2013 को 07:41 IST तक के समाचार
भारतीय संसद
हालिया घटनाक्रम ने संसद सत्र के दौरान सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं
चार दिन की गहमा-गहमी के बाद संसद सोमवार तक के लिए स्थगित हो गई. पिछले सोमवार को आशा थी कि इस मॉनसून सत्र में कुछ कुछ संजीदा काम संभव होगा. पर चार दिन में सरकार केवल खाद्य सुरक्षा विधेयक पेश कर पाई.
दूसरी ओर राज्यसभा ने कंपनी कानून पास कर दिया. लोकसभा उसे पहले ही पास कर चुकी है.
कॉरपोरेट गवर्नेंस को बेहतर और पारदर्शी बनाने के लिए इस विधेयक का पास होना शुभ समाचार है. लगभग 57 साल पुराने इस कानून में बदलाव की जरूरत लम्बे अर्से से महसूस की जा रही थी.
राष्ट्रीय विकास, आर्थिक प्रगति और प्रशासनिक सुधार के लिए संसद के सामने पड़े दूसरे विधेयकों का निस्तारण भी इतना ही जरूरी है.
इस काम के लिए यूपीए को राजनीतिक समझदारी का परिचय देना होगा. और इतनी ही समझदारी पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने में दिखानी होगी. यह बेहद संवेदनशील मसला है. और इसमें जोखिम उठाने होंगे.
चार दिन की राजनीतिक गतिविधियाँ इस बात का संकेत दे रही हैं कि आर्थिक उदारीकरण की गाड़ी को गति देना और पाकिस्तान के साथ रिश्तों को बेहतर बनाना तलवार की धार पर चलने के समान है.
दोनों में भारी राजनीतिक जोखिम हैं और दोनों का दक्षिण एशिया के आर्थिक-सामाजिक विकास के साथ गहरा रिश्ता है.
हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून

सतीश आचार्य का कार्टून

Thursday, August 8, 2013

कैसा 'माकूल जवाब' दे सकती है सरकार?

 गुरुवार, 8 अगस्त, 2013 को 07:09 IST तक के समाचार
जम्मू-कश्मीर में पाँच भारतीय सैनिकों की हत्या के मामले में रक्षामंत्री एके एंटनी का मंगलवार को राज्यसभा में दिया गया वक्तव्य विवाद का विषय बना, तो इसमें विस्मय की बात नहीं है.
सीमा पर घट रही घटनाओं पर भाजपा का रोष या उत्तेजना एक सहज प्रतिक्रिया है. वह इसका भरपूर राजनीतिक लाभ भी लेना चाहेगी.
पर क्या क्लिक करेंएंटनी के पास कोई ऐसी जानकारी है, जिसे उन्होंने बताया नहीं या बताना नहीं चाहते? हमलावरों को पाकिस्तानी फ़ौजी मानने में उन्हें किस बात का संशय है? क्या उन्हें पाकिस्तान सरकार के इस बयान पर पक्का भरोसा है कि यह हमला उसकी सेना ने नहीं किया?
इस विश्वास की भी कोई वजह होगी. पर यह मान लेने पर कि हमला आतंकवादियों ने किया है, हमें उसके तार्किक निहितार्थ समझने होंगे. इसका मतलब क्या है?
यानी आतंकवादी गिरोह पहले से ज्यादा ताकतवर और गोलबंद हैं और वे हमारी सेना पर आसानी से हमला बोल सकते हैं.
साथ ही पाकिस्तानी सेना या तो उन्हें रोक नहीं सकती या उसकी इनके साथ मिलीभगत है. या यहक्लिक करेंसीमा पर पिछले कुछ समय से चल रही छिटपुट वारदात की परिणति है, जिन पर हमने ध्यान नहीं दिया

Wednesday, August 7, 2013

संसद का बदलता परिदृश्य

 बुधवार, 7 अगस्त, 2013 को 13:35 IST तक के समाचार
भारतीय संसद
मॉनसून सत्र के दूसरे दिन भी विपक्ष के सरकार पर हमले जारी हैं
संसद के मॉनसून सत्र में तेलंगाना राज्य के गठन, उत्तराखंड की आपदा, रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश, दुर्गाशक्ति नागपाल या महंगाई के सवाल पर हंगामा होता, उसके पहले ही जम्मू-कश्मीर सीमा पर पाँच भारतीय सैनिकों की हत्या ने सनसनी फैला दी है.
आज सम्भव है प्रधानमंत्री को इस मसले पर संसद में सफाई पेश करनी पड़े. सरकार पर ‘माकूल जवाब’ देने का दबाव है. पर माकूल जवाब के माने क्या हैं?
अगले कुछ दिन संसद के भीतर और बाहर यह मसला हावी रहे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल

राष्ट्रीय सुरक्षा भारत में एक बड़ा राजनीतिक मसला है. आज सरकार को विपक्ष के वार झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए.
रक्षा मंत्री एके एंटनी का वक्तव्य सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है, क्योंकि उन्होंने सैनिकों की हत्या के लिए पाकिस्तानी सेना को सीधे दोषी नहीं ठहराया.
भाजपा कार्यकर्ताओं ने मंगलवार की शाम से ही एंटनी के घर के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिए.
मंगलवार की सुबह लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने पर अध्यक्ष मीरा कुमार ने जैसे ही प्रश्नकाल शुरू करने की घोषणा की, भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने नियंत्रण रेखा पर भारतीय सैनिकों की हत्या का मामला उठाया.
दोनों सदनों में दिनभर यह मसला किसी न किसी रूप में छाया रहा.
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर पूरा लेख पढ़ें

Tuesday, August 6, 2013

हिन्दी अखबार कैसा हो और क्यों हो?

नवभारत टाइम्स के लखनऊ संस्करण में मेरी दिलचस्पी इस कारण भी है, क्योंकि यह देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह का हिन्दी अखबार है। एक समय तक दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया से भी ज्यादा प्रसारित होता था। नब्बे के दशक में इसकी कीमत घटाकर एक रुपया कर देने के बाद दिल्ली में अंग्रेजी अखबार पढ़ने वाले पाठक बड़ी संख्या में इसकी ओर आकृष्ट हुए। उसके बाद इसके मनोरंजन परिशिष्टों ने युवा पीढ़ी का ध्यान खींचा। मुझे याद है सन 1998 में मेरी एकबार अमर उजाला के तत्कालीन प्रमुख अतुल माहेश्वरी से काफी लम्बी मुलाकात हुई। वे समीर जैन की व्यावसायिक समझ की बेहद प्रशंसा कर रहे थे।

Monday, August 5, 2013

NBT@ लखनऊ


सन 1983 में लखनऊ से नवभारत टाइम्स का औपचारिक रूप से पहला अंक अक्टूबर में निकल गया था, टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ। पर वास्तव में पहला अंक नवम्बर में निकला था। उस वक्त तक नवभारत भारत टाइम्स को लेकर टाइम्स ग्रुप में कोई बड़ा उत्साह नहीं था। हिन्दी की व्यावसायिक ताकत तब तक स्थापित नहीं थी। हालांकि सम्भावनाएं उस समय भी नजर आती थीं। बहरहाल इसी ब्रैंड नाम का अखबार फिर से लखनऊ से निकला है तो जिज्ञासा बढ़ी है। अखबार का अपने समाज से रिश्ता और उसका कारोबार दोनों मेरी दिलचस्पी के विषय हैं। मैं चाहता हूँ कि लखनऊ के मेरे मित्र नवभारत टाइम्स और हिन्दी पत्रकारिता पर मेरी जानकारी बढ़ाएं। आभारी रहूँगा।

पिछले साल अक्टूबर में टाइम्स हाउस ने कोलकाता से एई समय नाम से बांग्ला अखबार शुरू किया था। हिन्दी और बांग्ला के वैचारिक परिवेश को परखने में टाइम्स हाउस की व्यावसायिक समझ एकदम ठीक ही होगी। मेरा अनुमान है कि लखनऊ में टाइम्स हाउस ने पत्रकारिता को लेकर उन जुम्लों का इस्तेमाल नहीं किया होगा, जो कोलकाता में किया गया। हिन्दी इलाके के लोगों के मन में अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता के प्रति चेतना दूसरे प्रकार की है। वे भविष्य-मुखी, करियर-मुखी और चमकदार जीवन-पद्धति के कायल हैं। कोलकाता में एई समय से पहले आनन्द बाजार पत्रिका ने एबेला नाम से एक टेब्लॉयड शुरू किया था। इसकी वजह वही थी जो लखनऊ में है। कोलकाता में भी टेब्लॉयड संस्कृति जन्म ले रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया बांग्ला टेब्लॉयड मनोवृत्ति का पूरी तरह दोहन करे उससे पहले आनन्द बाजार ने चटख अखबार निकाल दिया।

Sunday, August 4, 2013

वेंटीलेटर पर लोकतंत्र

हालांकि चार अलग-अलग प्रसंग हैं, पर सूत्र एक है। लगता है हम लोकतंत्र से भाग रहे हैं। या फिर हम अभी लोकतंत्र के लायक नहीं हैं। या लोकतंत्र हमारे लायक नहीं है। या लोकतंत्र को हम जितना पाक-साफ समझते हैं, वह उतना नहीं हो सकता। उसकी व्यावहारिक दिक्कतें हैं। वह जिस समाज में है, वह खुद पाक-साफ नहीं है। दो साल पहले इन्हीं दिनों जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था तब बार-बार यह बात कही जाती थी कि कानून बनाने से भ्रष्टाचार नहीं खत्म नहीं होगा। इसके लिए बड़े स्तर पर सामाजिक बदलाव की जरूरत है। सामाजिक बदलाव बाद में होगा, कानून ही नहीं बना। किसने रोका उसे? और कैसे होगा बदलाव?

Saturday, August 3, 2013

निवेश को जज्ब करने वाला समाज भी चाहिए

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वैश्वीकरण की प्रत्यक्ष देन है। भारत में ही नहीं दुनिया भर में 1990 के दशक से इसका नाम ज्यादा सुना जा रहा है। पश्चिमी पूँजी को विस्तार के लिए नए इलाकों की तलाश है, जहाँ से बेहतर फायदा मिल सके। साथ ही इन इलाकों को पूँजी की तलाश है जो आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाए, ताकि रोजगार बढ़ें। बहस भी इसी बात को लेकर है कि रोजगार बढ़ते हैं या नहीं। बहरहाल सन 2009 में यूपीए-2 की सरकार के दुबारा आने के बाद उम्मीद थी कि अब आर्थिक उदारीकरण का चक्का तेजी से चलेगा। यानी प्रत्यक्ष कर, बैंकिग, इंश्योरेंस, जीएसटी, भूमि अधिग्रहण और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जुड़े मसले निपटाए जाएंगे। पर दो बातों ने इस चक्के की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिए। एक तो सरकार घपलों-घोटालों की राजनीति में फँस गई और दूसरे पश्चिमी देश मंदी में आने लगे जिसके कारण पूँजी का विस्तार थमने लगा।

हमने उदारीकरण का मतलब घोटाले मान लिया, जबकि ये घोटाले समय से सुधार न हो पाने की देन थे। कई बार लगता है कि सरकार और पार्टी के बीच भी एक सतह पर असहमतियाँ हैं। पिछले साल प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के पहले तक सुधारों की गाड़ी डगमगा कर ही चल रही थी। पर उसके बाद बाद सोनिया गांधी ने साफ किया कि आर्थिक सुधारों का काम पूरा होगा। इस दिशा में पहला कदम था सिंगल ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश का फैसला। यह फैसला एक साल पहले ही लागू होता, पर ममता बनर्जी के विरोध के कारण रुका पड़ा था। इसकी खातिर सरकार को द्रविड़ प्राणायाम करके सपा-बसपा को साथ लाना पड़ा।

Thursday, August 1, 2013

मोदी-वीजा प्रकरण, पाखंड ही पाखंड

फेंकू, लपकू, पप्पू और चप्पू के इस दौर में संजीदा बातें मसखरी की शिकार हो रहीं हैं. चुनाव करीब आने के साथ राजनीतिक ताकतों की रस्सा-कसी बढ़ रही है. वार और पलटवार के इस दौर में नरेन्द्र मोदी के अमेरिकी वीज़ा प्रकरण ने ध्यान खींचा है. कैलीफोर्निया के फोरेंसिक डाक्यूमेंट एक्जामिनरविभाग ने साफ किया कि चिट्ठी पर दस्तखत असली हैं यानी कट एंड पेस्टनहीं हैं. कुछ सांसदों ने कहा था कि इस पर हमारे दस्तखत नहीं हैं. सीताराम येचुरी का कहना था कि कट एंड पेस्ट भी हो सकता है. इस चिट्ठी के अंतिम पन्ने पर सिर्फ दो दस्तखत हैं, बाकी 63 दस्तखत अलग पन्नों पर हैं. इसलिए संदेह अस्वाभाविक नहीं. पर दस्तखतों के असली न होने की शिकायत सिर्फ एक सांसद ने की थी. आम शिकायत यह है कि हमने तो कोई और चिट्ठी देखकर दस्तखत किए थे, इस पर नहीं. यह मामला संसद के आगामी सत्र में उठाया जा सकता है.

Wednesday, July 31, 2013

राग तेलंगाना, ताल हैदराबादी

जोखिम भरी है तेलंगाना की राह
लोकसभा चुनाव समय पर हुए तब तक भी शायद तेलंगाना बन नहीं पाएगा. पहले हुए तो बात ही कुछ और है. इसलिए कांग्रेस ने इसका फैसला चुनाव के लिए किया है भी तो वह भावनात्मक है, व्यावहारिक नहीं. यानी जिन राजनीतिक शक्तियों को परास्त करने की मनोकामनाएं हैं, उनपर अभी सीधा असर नहीं होगा.
कांग्रेस कार्यसमिति का फैसला हो जाने भर से तेलंगाना नहीं बन जाएगा। कांग्रेस ने तो सन 2004 में ही सीधे-सीधे मान लिया था कि तेलंगाना बनेगा। उसके बाद पाँच साल तक नहीं बना और के चन्द्रशेखर राव ने आमरण अनशन शुरू किया तो पी चिदम्बरम ने उनके अनशन को खत्म कराने के लिए साफ-साफ कहा कि तेलंगाना बनेगा। अभी इस बाबत कैबिनेट को फैसला करना होगा, फिर यह प्रस्ताव आंध्र प्रदेश की विधानसभा के पास जाएगा। वहाँ से यह संसद में आएगा। दोनों जगह से इस प्रस्ताव को पास कराने के रास्ते में कई तरह की चुनौतियाँ हैं। चूंकि भाजपा ने तेलंगाना बनाने का समर्थन किया है इसलिए संसद से यह प्रस्ताव पास होने में अड़चन नहीं है, पर तेलंगाना के भौगोलिक स्वरूप को लेकर दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। 

Tuesday, July 30, 2013

तेलंगाना में कांग्रेस का गणित

 मंगलवार, 30 जुलाई, 2013 को 07:52 IST तक के समाचार
सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी
हालांकि कांग्रेस पार्टी बड़ी सावधानी से आंध्र प्रदेश में अपनी रणनीति तैयार कर रही है पर ऐसा लगता है कि तेलंगाना मामले में उसने अपने ही ख़िलाफ़ गोल कर लिया है. फ़िलहाल उसके सामने चुनौती है कि तेलंगाना बने और इसका नुकसान कम से कम हो.
दो बातों ने कांग्रेस के लिए हालात बिगाड़े हैं. एक तो इस फैसले को लगातार टालने की कोशिश. चुनाव जब सिर पर आ गए हैं तब पार्टी फैसला कर रही है. दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री वाइ एस आर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी के साथ पार्टी ने रिश्ते बुरी तरह खराब कर लिए हैं. यह बात तटीय आंध्र और रायलसीमा क्षेत्र में कांग्रेस के ख़िलाफ़ जाएगी.
सन 2004 के चुनाव में एनडीए की पराजय के दो बड़े केन्द्र थे तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश. इस बार भाजपा कांग्रेस के इस महत्वपूर्ण गढ़ को भेदना चाहती है. भाजपा की कोशिश है कि तेलुगुदेसम या टीडीपी और टीआरएस के साथ मिलकर कांग्रेस को हराया जाए. वह ख़ामोशी के साथ कांग्रेस को इस दलदल में फँसते हुए देख रही है. उसने तेलंगाना का समर्थन किया है और टीडीपी भी इसके साथ नज़र आती है.
तेलंगाना के कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अब पार्टी जो कुछ भी हासिल कर सकती है तेलंगाना में ही संभव है. तटीय आंध्र प्रदेश और रायलसीमा में जगनमोहन रेड्डी ने अपने पैर काफी मजबूत कर लिए हैं. वहाँ कुछ मिलना नहीं है. तेलंगाना क्षेत्र में विधानसभा की 294 में से 119 और लोकसभा की कुल 42 में से 17 सीटें हैं. इतना साफ़ लगता है कि नया राज्य बनेगा तो टीआरएस को फायदा होगा. और नहीं भी बना तो उसे लड़ाई जारी रखने का लाभ मिलेगा.

Sunday, July 21, 2013

हिन्दी के मीडिया महारथी


शनिवार की रात कनॉट प्लेस के होटल पार्क में समाचार फॉर मीडिया के मीडिया महारथी समारोह में जाने का मौका मिला। एक्सचेंज फॉर मीडिया मूलतः कारोबारी संस्था है और वह मीडिया के बिजनेस पक्ष से जुड़े मसलों पर सामग्री प्रकाशित करती है। हिन्दी के पत्रकारों के बारे में उन्हें सोचने की जरूरत इसलिए हुई होगी, क्योंकि हिन्दी अखबारों का अभी कारोबारी विस्तार हो रहा है। बात को रखने के लिए आदर्शों के रेशमी रूमाल की जरूरत भी होती है, इसलिए इस संस्था के प्रमुख ने वह सब कहा, जो ऐसे मौके पर कहा जाता है। हिन्दी पत्रकारिता को 'समृद्ध' करने में जिन समकालीन पत्रकारों की भूमिका है, इसे लेकर एक राय बनाना आसान नहीं है इसलिए उस पर चर्चा करना व्यर्थ है। पर भूमिका और समृद्ध करना जैसे शब्दों के माने क्या हैं, यही स्पष्ट करने में काफी समय लगेगा। अलबत्ता यह कार्यक्रम दो-तीन कारणों से मनोरंजक लगा। इसमें उस पाखंड का पूरा नजारा था, जिसने मीडिया जगत को लपेट रखा है।

जहर सिस्टम में है, सिर्फ मिड डे मील में नहीं

इस मसले को राजनीतिक दलों ने सबसे पहले अपना मसला बनाया। फिर मीडिया ने इसमें सनसनी का रस घोला। गरीब बच्चों की असहाय तस्वीरें देखने में आईं। फिर देखते ही देखते देशभर के मिड डे मील में साँप, छिपकली और चूहे निकलने लगे। ऐसा लगता है कि मिड डे मील में जहर घोलने की साजिश है। दो दिन की रस्म अदायगी के बाद गाड़ी अगले मामले की ओर बढ़ गई। असल सवाल जस का तस पड़ा है। सरकार गरीब बच्चों को मिड डे मील दे रही है। देश के लगभग 65 फीसदी लोगों को अब भोजन की गारंटी दे रही है। पर बुनियादी सवाल छूट गया है। आखिर बीमारी क्या है? और इलाज क्या है? बीमारी है गरीबी, अज्ञान और कुशासन।

Thursday, July 18, 2013

संज्ञा-शून्य समाज में बार गर्ल्स

पिछले कुछ साल से लोक सभा और विधान सभा चुनावों में एक नया चलन देखने को मिल रहा है. चुनाव सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए नेताओं के भाषण के पहले लड़कियों का नाच कराया जाता है. इन लड़कियों को अब बार गर्ल्स कहा जाने लगा है. पुराने नामों के मुकाबले हालांकि यह शालीन नाम है, पर यह नाच हमारी संस्कृति के पाखंड की परतों में छिपा है. कौन मजबूर करता है इन्हें नाचने के लिए? और फिर कौन उनपर फब्तियाँ कसता है? कौन उन्हें धिक्कारता है और कौन उनपर पाबंदियाँ लगाता है? किसने रोका है उन्हें सम्मानित नागरिक बनने से?

हमें तुम्हारी जरूरत है मंडेला

मन कहता है, तुम जियो हजारों साल. बीसवीं सदी ने दुनिया को जितने महान नेता दिए उतने दूसरी किसी सदी ने नहीं दिए. नेलसन मंडेला उस कद-काठी के आखिरी नेताओं में एक हैं. फिदेल कास्त्रो, अमेरिका के जिमी कार्टर और चीन के जियांग जेमिन उनसे उम्र में छह से आठ साल छोटे हैं और पहचान में भी. नेलसन मंडेला का आज जन्म दिन है. वे आज 95 वर्ष पूरे कर लेंगे (जन्मतिथि 18 जुलाई 1918). उनकी बीमारी को लेकर सारी दुनिया फिक्रमंद है. हमारी कामना है कि वे दीर्घायु हों, शतायु हों. हमें उनके जैसे नेता की आज बेहद जरूरत है। 

नेलसन मंडेला हमें अपने लगते हैं. महात्मा गांधी सत्याग्रह का अपना विचार दक्षिण अफ्रीका से लेकर आए थे। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ चली लड़ाई महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर चली थी. नेलसन मंडेला और महात्मा गांधी की मुलाकात कभी नहीं हुई, फिर भी दोनों गहरे दोस्त लगते हैं. अमेरिका की साप्ताहिक टाइम मैग्ज़ीन का 3 जनवरी 2000 का अंक सदी के महान व्यक्तियों पर केन्द्रित था. इसमें महात्मा गाँधी पर लेख नेलसन मंडेला ने लिखा था. उन्होंने लिखा, भारत ने दक्षिण अफ्रीका को जो गाँधी सौंपा वह बैरिस्टर था, जबकि दक्षिण अफ्रीका ने उस गाँधी को महात्मा बनाकर भारत को लौटाया. भारत ने केवल दो गैर-भारतीयों को भारत रत्न दिया है. पहले थे खान अब्दुल गफ्फार खां और दूसरे नेलसन मंडेला.

Sunday, July 14, 2013

इस फजीहत से नहीं रुकेगा आतंकवाद

इसी हफ्ते गृहमंत्री सुशील शिंदे ने बताया कि नेशनल काउंटर टैररिज्म सेंटर (एनसीटीसी) के गठन का प्रस्ताव पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। उसे देश की राजनीति खा गई। इन दिनों इंटेलीजेंस ब्यूरो और नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी तथा सीबीआई के बीच इशरत जहाँ के मामले को लेकर जवाबी कव्वाली चल रही है। सीबीआई के ऊपर आपराधिक मामलों की जांच की जिम्मेदारी है। और खुफिया एजेंसियों के पास देश के खिलाफ होने वाली आपराधिक गतिविधियों पर नजर रखने की। दुनिया के किसी देश की खुफिया एजेंसी नियमों और नैतिकताओं का शत-प्रतिशत पालन करने का दावा नहीं कर सकती। इसीलिए खुफिया एजेंसियों के कई प्रकार के खर्चों को सामान्य लेखा परीक्षा के बाहर रखा जाता है। उनकी गोपनीयता को संरक्षण दिया जाता है। बहरहाल इस मामले में अभी बहस चल ही रही थी कि बोधगया में धमाके हो गए। वहाँ तेरह बम लगाए गए थे, जिनमें से दस फट गए। यह सब तब हुआ जब खुफिया विभाग ने पहले से सूचना दे रखी थी कि बोधगया ही नहीं अनेक बौद्ध स्थलों पर हमला होने का खतरा है।

Saturday, July 13, 2013

नरेन्द्र मोदी की बात पर हंगामा है क्यों...

 शनिवार, 13 जुलाई, 2013 को 13:55 IST तक के समाचार
नरेंद्र मोदी
मोदी के "कुत्ते के पिल्ले के मरने पर भी दुख होता है" बयान के बाद हंगामा मच गया है
नरेन्द्र मोदी भारत के ध्रुवीकारी नेताओं में सबसे आगे हैं, इसे मान लिया जाना चाहिए. उनका समर्थन और विरोध लगभग समान आक्रामक अंदाज़ में होता है. इस वजह से उन्हें ख़बरों में बने रहने के लिए अब कुछ नहीं करना पड़ता.
ख़बरों को उनकी तलाश रहती है. इसमें आक्रामक समर्थकों से ज़्यादा उनके आक्रामक विरोधियों की भूमिका होती है.
दूसरी बात यह कि उनसे जुड़ी हर बात घूम फिर कर सन 2002 पर जाती है. रॉयटर्स के रॉस कॉल्विन और श्रुति गोत्तीपति का पहला सवाल इसी से जुड़ा था. वे जानना चाहते थे कि नरेन्द्र मोदी को क्या घटनाक्रम पर कोई पछतावा है.

पिल्ले का रूपक

मोदी का वही जवाब था जो अब तक देते रहे हैं. उनका कहना था, "फ्रस्टेशन तब आएगा जब मैने कोई ग़लती की होगी. मैंने कुछ ग़लत किया ही नहीं."

विपक्ष का ‘गेम चेंजर’ भी हो सकता है खाद्य सुरक्षा अध्यादेश

खाद्य सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा विधेयक और खाद्य सुरक्षा अध्यादेश एक सिक्के के तीन पहलू हैं। खाद्य सुरक्षा पर सिद्धांततः राष्ट्रीय सवार्नुमति है। किसी पार्टी में हिम्मत नहीं कि वह खुद को जन-विरोधी साबित करे।
भले ही अर्थशास्त्रीय दृष्टि कहती हो कि अंततः इसकी कीमत गरीब जनता को चुकानी होगी। पर खाद्य सुरक्षा विधेयक को लेकर गहरी असहमतियाँ हैं। वामपंथी दल चाहते हैं कि खाद्य सुरक्षा सार्वभौमिक होनी चाहिए। सबके लिए समान। 
भाजपा बहस चाहती है। अध्यादेश के रास्ते इसे लागू करने का समर्थन किसी ने नहीं किया है। पर क्या विपक्ष इस अध्यादेश को रोकेगा? और रोका तो क्या कांग्रेस को इसका राजनीतिक लाभ मिलेगा? और क्या विपक्ष इस मामले में कांग्रेस का पर्दाफाश कर पाएगा?
 दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक-कल्याण योजना क्या बगैर संसदीय विमर्श के लागू हो जाएगी? कांग्रेस क्या अर्दब में है या विपक्ष एक मास्टर स्ट्रोक में मारा गया?

Friday, July 5, 2013

क्या भाजपा चेहरा बदल रही है?

 शुक्रवार, 5 जुलाई, 2013 को 06:49 IST तक के समाचार
भाजपा की अंदरूनी राजनीति
मीडिया रिपोर्टों पर भरोसा करें तो इशरत जहाँ मामले में क्लिक करेंचार्जशीटदाखिल होने के बाद सीबीआई और आईबी के भीतर व्यक्तिगत स्तर पर गंभीर चर्चा है.
ये न्याय की लड़ाई है या राजनीतिक रस्साकसी, जिसमें दोनों संगठनों का क्लिक करेंइस्तेमाल हो रहा है?
जावेद शेख उर्फ प्रणेश पिल्लै के वकील मुकुल सिन्हा हैरान हैं कि आईबी के स्पेशल डायरेक्टर राजेन्द्र कुमार का नाम सीबीआई की पहली चार्जशीट में क्यों नहीं है.
उन्हें लगता है कि राजेन्द्र कुमार का नाम न आने के पीछे क्लिक करेंराजनीतिक दबाव है.
इसका मतलब है कि जिस रोज सरकार सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई को आजाद पंछी बनाने का हलफनामा दे रही थी उसी रोज सीबीआई ऐसा आरोप-पत्र पेश कर रही थी, जिसके कारण उसपर सरकारी दबाव में काम करने का आरोप लगता है.
राजेन्द्र कुमार का नाम होता तो भाजपा को आश्चर्य होता. नहीं है तो मुकुल सिन्हा को आश्चर्य है.
अभी क्लिक करेंतफ्तीश ख़त्म नहीं हुई है. सीबीआई सप्लीमेंट्री यानि पूरक चार्जशीट भी दाखिल करेगी लेकिन इस मामले में अभी कई विस्मय बाकी हैं.

Thursday, July 4, 2013

विज्ञान-मुखी नहीं है भारतीय समाज

भारत ने अपने नेवीगेशन सैटेलाइट का प्रक्षेपण करके विज्ञान और तकनीक के मामले में जितना लम्बा कदम रखा है उतना हमने महसूस नहीं किया। इस नेटवर्क को पूरा करने के लिए अभी छह और सैटेलाइट भेजे जाएंगे। यह काम 2015 तक पूरा होगा। हम स्पेस साइंस की बिग लीग में शामिल हो चुके हैं। अमेरिका, रूस, यूरोपीय यूनियन और चीन के साथ। जापान का क्वाज़ी ज़ेनिट सिस्टम भी इस साल पूरी तरह स्थापित हो जाएगा। ग्लोबल पोज़ीशनिंग सिस्टम का इस्तेमाल हवाई और समुद्री यात्राओं के अलावा सुदूर इलाकों से सम्पर्क रखने में होता है। काफी ज़रूरत सेना को होती है। खासतौर से मिसाइल प्रणालियों के वास्ते।  

इस साल बजट अभिभाषण में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि भारत इस साल अपना उपग्रह मंगल की ओर भेजेगा। केवल मंगलयान ही नहीं, चन्द्रयान-2 कार्यक्रम तैयार है। सन 2016 में पहली बार दो भारतीय अंतरिक्ष यात्री स्वदेशी यान में बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे। सन 2015 या 16 में हमारा आदित्य-1 प्रोब सूर्य की ओर रवाना होगा। सन 2020 तक हम चन्द्रमा पर अपना यात्री भेजना चाहते हैं। किसी चीनी यात्री के चन्द्रमा पहुँचने के पाँच साल पहले। इस बीच हमें अपने क्रायोजेनिक इंजन की सफलता का इंतजार है, जिसकी वजह से जीएसएलवी कार्यक्रम ठहरा हुआ है। देश का हाइपरसोनिक स्पेसक्राफ्ट किसी भी समय सामने आ सकता है। अगले दशक के लिए न्यूक्लियर इनर्जी का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार है।