गत 16 सितंबर को अमेरिकी संसद ने एक व्यापक विधेयक पारित किया जिसका उद्देश्य यूक्रेन के खिलाफ रूसी युद्ध को मदद देने वाली वित्तीय-व्यवस्था को तोड़ना है। एक साल से अधिक समय से चल रहे विरोध को पार करते हुए, संसद ने राष्ट्रपति ट्रंप को एक ऐसा विधेयक भेजा है, जिसके आधार पर वे मॉस्को पर कड़े नए प्रतिबंध लगा सकते हैं।
'लिंडसे ओ ग्राहम
सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' अमेरिकी राष्ट्रपति को मॉस्को से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अभूतपूर्व
शक्तियाँ प्रदान करता है। वे चीन और भारत सहित उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ
लगा सकते हैं, जो रूसी तेल या गैस के शीर्ष पाँच खरीदारों में शामिल हैं, और तथाकथित 'अवैध जहाजों के बेड़े' के प्रमुख सूत्रधार हैं, जिनका उपयोग रूस के तेल निर्यात पर प्रतिबंधों से
बचने के लिए किया जाता है।
भारत पर असर
हालाँकि विधेयक पारित हो जाने के बाद यह टैरिफ अपने आप नहीं लग जाएगा, बल्कि अब यह ट्रंप पर निर्भर करेगा कि वे किसपर, कितना और कब टैरिफ लगाएँगे। अलबत्ता भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है, ‘भारत अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है।’ इसके साथ ही भारत ने अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर संभावित प्रभावों की चेतावनी भी दी। विदेश मंत्रालय ने एक बयान में इस बात पर जोर दिया है कि इस मुद्दे पर हाल के महीनों में विभिन्न अमेरिकी वार्ताकारों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा की गई है।
अमेरिका का यह कदम
ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका, महीनों की बातचीत के बाद द्विपक्षीय
व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार सरकार
ने पिछले कुछ हफ्तों और महीनों में, इस तरह के दंडात्मक कदम के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव
से अन्य लोगों के साथ-साथ अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और भारत में अमेरिकी
राजदूत सर्जियो गोर को भी अवगत कराया था।
इस विधेयक के
प्रस्तावक दक्षिण कैरोलिना के रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम का जुलाई में निधन
हो गया था। इसका नेतृत्व ग्राहम के अलावा कनेक्टिकट के डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड
ब्लूमेंथल ने किया था। उन्होंने एक साल से अधिक समय तक इस विधेयक के लिए समर्थन
जुटाने में बिताया था, यह
विधेयक रूसी अधिकारियों, वहाँ
के महत्त्वपूर्ण लोगों और वित्तीय संस्थानों पर भी प्रतिबंध लगा सकता है। इसे 262
के मुकाबले 159 मतों से मंजूरी मिल गई, जिससे ट्रंप के लिए रास्ता साफ हो गया, जिन्होंने संकेत दिया है कि वे इस पर हस्ताक्षर
करेंगे।
ट्रंप के
अधिकार
रूस को दंडित करने
के लिए दोनों दलों का मजबूत समर्थन होने के बावजूद, 152 डेमोक्रेट्स ने इस विधेयक का विरोध किया,
उनका तर्क था कि यह एक ऐसे राष्ट्रपति
को बहुत अधिक नए टैरिफ अधिकार देता है जो व्यापार मामलों में पहले ही कई बार
कांग्रेस को दरकिनार कर चुके हैं। इस विधेयक में ईरान के ऊर्जा और हथियार
क्षेत्रों को लक्षित करने वाले प्रतिबंधों को पाँच साल के लिए बढ़ाने का प्रावधान
शामिल है, जो मॉस्को और तेहरान
के बीच घनिष्ठ सैन्य संबंधों को लेकर अमेरिकी संसद में व्याप्त चिंता को दर्शाता
है।
यूक्रेन के सबसे
मुखर समर्थकों में शामिल कुछ डेमोक्रेट्स ने टैरिफ प्रावधानों पर आपत्ति जताई,
खासकर तब जब सुप्रीम कोर्ट ने
कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति के बिना टैरिफ लगाने के ट्रंप के कुछ पिछले प्रयासों पर
रोक लगा दी थी। उन्होंने चेतावनी दी कि राष्ट्रपति नई व्यापार शक्तियों का
इस्तेमाल कांग्रेस के इरादे से कहीं अधिक व्यापक रूप से कर सकते हैं।
द्विपक्षीय
संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर इसके संभावित प्रभावों को भारतीय
पक्ष ने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है। भारतीय पक्ष ने अपने व्यापार और आर्थिक
हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करने का अपना दृढ़ संकल्प भी स्पष्ट किया
है। मंत्रालय के बयान में कहा गया है, कि सरकार इन घटनाक्रमों के प्रभावों से
निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग निकायों के साथ मिलकर काम करेगी।
टैरिफ के संभावित
लक्ष्य बनने वाले देश वे होंगे जो कानून के लागू होने की तारीख से पहले के 12 महीनों में रूसी मूल के कच्चे तेल या
प्राकृतिक गैस के ‘कुल मात्रा के आधार पर शीर्ष पांच सबसे बड़े आयातक’ हैं,
और जिन्होंने विधेयक के कानून बनने की
तारीख से 30 दिनों के बाद
जानबूझकर रूसी कच्चे तेल की नई खरीद की है। जो देश ‘रूसी तेल प्रतिबंधों से बचने
में सहायता करने वाले’ शीर्ष पाँच देशों में शामिल है, वे भी 100% तक के टैरिफ के लिए पात्र होंगे। जिन देशों ने रूस से प्राकृतिक गैस के आयात
को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं या जिनका गैस आयात रूस के कुल गैस
निर्यात के 15% से कम था,
उन्हें प्रतिबंधों से छूट दी जाएगी।
रूसी-आयात बढ़ा
नवीनतम आधिकारिक आँकड़ों
के अनुसार, जुलाई में भारत के
तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51% से अधिक रही, जो अब तक का
उच्चतम स्तर है। पिछले महीने यह हिस्सेदारी 50% से थोड़ी कम थी। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आँकड़ों
के विश्लेषण से पता चलता है कि जुलाई 2026 में, जिसके आँकड़े उपलब्ध
हैं, भारत ने रूस से 110.4 लाख टन तेल आयात किया। यह उस माह के भारत
के कुल तेल आयात का लगभग 52%
है, जो रूसी तेल का अब तक का
सबसे बड़ा हिस्सा है।
जुलाई 2026 में रूस से भारत का तेल आयात जून की तुलना
में 26% अधिक था, और पिछले वर्ष जुलाई की तुलना में लगभग 55% अधिक था। तेल की ऊँची कीमतों के साथ-साथ
मात्रा में इस तीव्र वृद्धि का मतलब यह भी था कि जुलाई 2026 में भारत का रूसी तेल आयात बिल पिछले वर्ष की तुलना
में काफी बढ़ गया। यानी, जुलाई
2026 में रूसी तेल पर भारत का
आयात बिल 7.3 अरब डॉलर था,
जो पिछले वर्ष जुलाई में खर्च किए गए 3.6
अरब डॉलर से दोगुने से भी अधिक था।
इससे पहले,
भारत ने रूसी तेल की खरीद में कटौती
की थी, जो दिसंबर 2025 में 38 महीनों के निचले स्तर पर पहुँच गई थी। ट्रंप
प्रशासन ने रूसी ऊर्जा की खरीद पर भारत द्वारा लगाए जाने वाले तत्कालीन 25% टैरिफ के अतिरिक्त 25% अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा की थी। अमेरिकी
वित्त मंत्रालय ने 11 मार्च,
2026 से पहले पारगमन में मौजूद तेल
शिपमेंट पर प्रतिबंधों को स्थगित कर दिया था, क्योंकि अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद आपूर्ति
प्रभावित हुई थी।

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