Tuesday, December 4, 2018

किसानों का दर्द और जीडीपी के आँकड़े


दो तरह की खबरों को एकसाथ पढ़ें, तो समझ में आता है कि लोकसभा चुनाव करीब आ गए हैं. नीति आयोग और सांख्यिकी मंत्रालय ने राष्ट्रीय विकास दर के नए आँकड़े जारी किए हैं. इन आँकड़ों की प्रासंगिकता पर बहस चल ही रही थी कि दिल्ली में हुई दो दिन की किसान रैली ने देश का ध्यान खींच लिया. दोनों परिघटनाओं की पृष्ठभूमि अलग-अलग है, पर ठिकाना एक ही है. दोनों को लोकसभा चुनाव की प्रस्तावना मानना चाहिए.

संसद के शीत-सत्र की तारीखें आ चुकी हैं. किसानों का मसला उठेगा, पर इससे केवल माहौल बनेगा. नीतिगत बदलाव की अब आशा नहीं है. इसके बाद बजट सत्र केवल नाम के लिए होगा. जहाँ तक किसानों से जुड़े दो निजी विधेयकों का प्रश्न है, यह माँग हमारी परम्परा से मेल नहीं खाती. ऐसे कानून बनने हैं, तो विधेयक सरकार को लाने होंगे, वैसे ही जैसे लोकपाल विधेयक लाया था. यों उसका हश्र क्या हुआ, आप बेहतर जानते हैं.


राजनीतिक मंशा के बावजूद किसान रैली ने वाजिब सवालों को उठाया है और सरकार को आगाह किया है कि चुनाव में उसे इन सवालों के जवाब लेकर आना होगा. अभी 10 दिसम्बर को पाँच विधान सभाओं के चुनाव परिणाम इसका पहला संकेत देंगे. खासतौर से मध्य प्रदेश के परिणाम खेती से जुड़ी विसंगतियों की तरफ इशारा करेंगे. पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों के आंदोलन में गोली चलने से छह व्यक्तियों की मौत के बाद और पिछले कुछ वर्षों से किसानों की आत्महत्या की खबरों के कारण खेती-किसानी विमर्श के केन्द्र में है.

इस रैली ने उन विडंबनाओं की तरफ इशारा किया है, जो मध्य प्रदेश में पैदा हुईं हैं. हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश में कृषि की विकास दर राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा रही है. यदि साल-दर-साल के आँकड़ों को जोड़ें तो वहाँ पिछले एक दशक में कृषि की सकल आय दुगनी हो चुकी है, फिर भी वहाँ आत्महत्या करने वाले किसानों की तादाद बढ़ी है. पिछले साल रिकॉर्ड फसल के बावजूद किसानों का संकट बढ़ा, क्योंकि दाम गिर गए.

खेती की समस्या के कई पहलू हैं, जिनपर हमें ध्यान देना चाहिए. फसल अच्छी हो तब भी किसान की आँखों में आँसू आते हैं. जब तक उसे लाभकारी दाम नहीं मिलेगा, उसकी मेहनत बेकार है. फसल खराब होने पर तो उसे रोना ही है. अच्छी होने पर कई बार नौबत आती है, जब वह अपने टमाटर, प्याज, मूली, गोभी से लेकर अनार तक नष्ट करने को मजबूर होता है. तमाम कृषि-उत्पाद भंडारण की व्यवस्था न होने की वजह से अलाभकारी हो जाते हैं. बाढ़-सूखे और बीमारियों का सामना करने के लिए कृषि बीमा व्यवस्था या तो विकसित नहीं है या किसान उसके प्रति जागरूक नहीं है.

दिल्ली की रैली किसानों की समस्या पर केन्द्रित जरूर थी, पर उसका उद्देश्य इसे राजनीतिक मसला बनाना था, समस्या का समाधान नहीं. समाधान विरोधी दलों के पास भी नहीं है. रैली में राजनीतिक नेताओं की उपस्थिति और उनके वक्तव्यों के कारण यह रैली महागठबंधन की चुनाव रैली में तब्दील हो गई. रैली का स्वर था कि किसानों का भला करना है, तो सरकार को बदलो. खेती-किसानी की समस्या पर केन्द्रित यह आयोजन एक तरह से विरोधी दलों की एकता की रैली साबित हुआ. सवाल अपनी जगह फिर भी कायम है कि विरोधी एकता इस समस्या का स्थायी समाधान कैसे करेगी?

किसानों की समस्याओं का समाधान सरकारें बदलने से निकलता, तो अबतक निकल चुका होता. ये समस्याएं आज की नहीं हैं. रैली का उद्देश्य किसानों के दर्द को उभारना था, जिसमें उसे सफलता मिली. रैली में राहुल गांधी, शरद पवार, सीताराम येचुरी, अरविंद केजरीवाल, फारुक़ अब्दुल्ला, शरद यादव और योगेन्द्र यादव वगैरह के भाषण हुए. ज्यादातर वक्ताओं का निशाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर था.

तीस साल पहले अक्तूबर 1988 में भारतीय किसान यूनियन के नेता महेन्द्र सिंह टिकैत ने बोट क्लब पर जो विरोध प्रदर्शन किया था, वह गैर-राजनीतिक था. इस रैली का आयोजन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) ने किया है. यह 200 से ज्यादा किसान संगठनों का अम्ब्रेला समूह है, जिसका इसका गठन जून 2017 में अखिल भारतीय किसान सभा और दूसरे वामपंथी किसान संगठनों के तत्वावधान में हुआ था.

कृषि राज्य का विषय है. समाधान में राज्यों की भूमिका ज्यादा बड़ी है. कानून बनाकर समर्थन मूल्य पर फसलों की अनिवार्य खरीद के लिए साधन चाहिए और इंफ्रास्ट्रक्चर भी. केंद्रीय स्तर पर फैसला करने के लिए करीब दो लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी. इतने बड़े स्तर पर भंडारण की व्यवस्था बनाना आसान बात नहीं है. फिर भी इस विषय पर गहराई से विचार किया जाना चाहिए.   

किसानों की आत्महत्याओं की खबरें उन्हीं इलाकों से ज्यादा मिल रहीं हैं जहां के किसान खेती की मुख्य खाद्य पैदावारों पर निर्भर नहीं हैं बल्कि अंगूर, कपास, प्याज, फल-सब्जी, दलहन आदि बेहतर कमाई देने वाली नकदी फसलों से लेकर दूध तक के उत्पादन से भी जुड़े हैं. इन किसानों ने अपनी आय बढ़ाने के लिए ज्यादा निवेश किया और कर्ज के फंदे में फँस गए. फसलों का लाभकारी मूल्य तय करना आसान नहीं है.

कर्ज़-माफी दूसरी समस्याओं को जन्म दे रही है. एक तरफ राज्यों का खजाना खाली हो रहा है, वहीं एक नई प्रवृत्ति जन्म ले रही है. जो किसान कर्ज चुका देते हैं उन्हें लाभ नहीं मिलता. लाभ मिलता है, कर्ज न चुका पाने वालों को. इसलिए कर्ज न चुकाने की प्रवृत्ति बढ़ती है. इस विषय पर गंभीर चिंतन अपनी जगह है, पर राजनीतिक धरातल इस रैली ने एनडीए सरकार के सामने चुनौती पेश कर दी है. इसकी पेशबंदी में सरकार ने विकास दर के नए आँकड़े पेश कर दिए हैं. ये आँकड़े छह महीने या उससे भी पहले जारी किए जा सकते थे. इस मौके पर जारी होने का राजनीतिक मतलब है. ऐसा ही निहितार्थ किसान रैली का है. 




1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (05-12-2018) को "बीता कौन, वर्ष या तुम" (चर्चा अंक-3176) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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