प्रेस की आज़ादी का व्यावहारिक अर्थ है मीडिया के मालिक की आज़ादी। इसमें पत्रकार की जिम्मेदारी उन नैतिक दायित्वों की रक्षा करने की थी जो इस कर्म को जनोन्मुखी बनाते हैं। पर देर सबेर सम्पादक पद से पत्रकार हट गए, हटा दिए गए या निष्क्रिय कर दिए गए। या उनकी जगह तिकड़मियों और दलाल किस्म के लोगों ने ले ली। पर कोई मालिक खुद ऐसा क्यों करेगा, जिससे उसके मीडिया की साख गिरे? इसकी वजह कारोबारी ज़रूरतों का नैतिकताओं पर हावी होते जाना है। मीडिया जबर्दस्त कारोबार के रूप में विकसित हुआ है। मीडिया कम्पनियाँ शेयर बाज़ार में उतर रही हैं और उन सब तिकड़मों को कर रही हैं, जो क्रोनी कैपीटलिज़्म में होती हैं। वे अपने ऊपर सदाशयता का आवरण भी ओढ़े रहती हैं। साख को वे कूड़दान में डाल चुकी हैं। उन्हें अपने पाठकों की नादानी और नासमझी पर भी पूरा यकीन है। इन अंतर्विरोधों के कारण गड़बड़झाला पैदा हो गया है। इसकी दूरगामी परिणति मीडिया -ओनरशिप को नए ढंग से परिभाषित करने में होगी। ऐसा आज हो या सौ साल बाद। जब मालिक की दिलचस्पी नैतिक मूल्यों में होगी तभी उनकी रक्षा होगी। मीडिया की उपादेयता खत्म हो सकती है, पत्रकारिता की नहीं। क्योंकि वह धंधा नहीं एक मूल्य है।
Monday, October 24, 2011
कारोबार और पत्रकारिता के बीच की दीवार कैसे टूटी?
Sunday, October 23, 2011
चुनाव व्यवस्था पर नए सिरे से सोचना चाहिए
चनाव-व्यवस्था-1
जरूरी है चुनावी व्यवस्था की समीक्षा
भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी व्यवस्था तब तक निरर्थक है जब तक राजनीतिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव न हो। राजनीतिक व्यवस्था की एक हिस्सा है चुनाव। चुनाव के बारे में व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए। शिशिर सिंह ने इस सिलसिले में मेरे पास लेख भेजा है। इस विषय पर आप कोई राय रखते हों तो कृपया भेजें। मुझे इस ब्लॉग पर प्रकाशित करने में खुशी होगी।
लोग केवल मजबूत लोकपाल नहीं चाहते वह चाहते हैं कि राइट टू रिजेक्ट को भी लागू किया जाए। हालांकि जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने की इस धारणा पर मिश्रित प्रतिक्रिया आई हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने इसे भारत के लिहाज से अव्यावहारिक बताया है। सही भी है ऐसे देश में जहाँ कानूनों के उपयोग से ज्यादा उनका दुरूप्रयोग होता हो, राइट टू रिजेक्ट अस्थिरता और प्रतिद्वंदिता निकालने की गंदी राजनीति का हथियार बन सकता है। लेकिन अगर व्यवस्थाओं में परिवर्तन चाहते हैं तो भरपूर दुरूप्रयोग हो चुकी चुनाव की मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन लाना ही पड़ेगा क्योंकि अच्छी व्यवस्था के लिए अच्छा जनप्रतिनिधि होना भी बेहद जरूरी है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी चुनावी व्यवस्था की नए सिर से समीक्षा करें।
Friday, October 21, 2011
चुनाव सुधरेंगे तो सब सुधरेगा
अन्ना-आंदोलन शुरू होने पर सबसे पहले कहा गया कि चुनाव का रास्ता खुला है। आप उधर से आइए। चुनाव के रास्ते पर व्यवस्थित रूप से बैरियर लगे हैं जो सीधे-सरल और ईमानदार लोगों को रोक लेते हैं। चुनाव पावर गेम है। इसमें मसल और मनी मिलकर माइंड पर हावी रहते हैं। जनता का बड़ा तबका भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का समर्थन सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि उसे लगता है कि व्यवस्था पूरी तरह ठीक न भी हो, पर एक हद तक ढर्रे पर लाई जा सकती है।
Wednesday, October 19, 2011
Monday, October 17, 2011
स्मारकों से ज्यादा महत्वपूर्ण है स्मृतियों का होना
शायद सन 1979 की बात है। प्रेमचंद के जन्मशती वर्ष की शुरूआत की जा रही थी। लखनऊ दूरदर्शन की एक परिचर्चा में मेरे एक सहचर्चाकार ने सुझाव दिया कि लमही और वाराणसी में प्रेमचंद के घरों को स्मारक बना दिया जाए। सुझाव अच्छा था, पर मेरी राय यह थी कि प्रेमचंद के साहित्य को पढना या पढ़ाया जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है। जो समाज अपने लेखकों को पढ़ता नहीं, वह ईंट-पत्थर के स्मारकों का क्या करेगा? स्मारकों के साथ स्मृतियों का होना महत्वपूर्ण है। स्मृतियाँ हर तरह की होती हैं। मीठी भी कड़वी भी।
Sunday, October 16, 2011
गठबंधन राजनीति के नए असमंजसों को जन्म देगा यूपी का चुनाव
उत्तर प्रदेश में गली-गली खुले वोट बैंक उसकी राजनीति को हमेशा असमंजस में रखेंगे। 1967 में पहली बार साझा सरकार बनने के बाद यहाँ साझा सरकारों की कई किस्में सामने आईं, पर एक भी साझा लम्बा नहीं खिंचा। 2007 के यूपी चुनाव परिणाम एक हद तक विस्मयकारी थे। उस विस्मय की ज़मीन प्रदेश की सामाजिक संरचना में थी। पर वह स्थिति आज नहीं है।
अंदेशा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं देंगे। सन 2007 की चमत्कारिक सोशल इंजीनियरी ने बसपा को जिस तरह की सफलता दी थी उसकी सम्भावना इस बार नहीं है। उत्तर प्रदेश के चुनाव हवा में नहीं सामाजिक ज़मीन पर होते हैं। सामाजिक समीकरण पहले से बता देते हैं कि माहौल क्या है। इस बार का माहौल असमंजस वाला है। और हालात इसी तरह रहे तो 2014 के लोकसभा चुनाव तक यह असमंजस पूरे देश में होगा। अब महत्वपूर्ण हैं चुनाव के बाद के गठबंधन। पिछले साठ साल का उत्तर प्रदेश का चुनाव इतिहास गवाह है कि यहाँ बड़ी संख्या में निर्दलीय या छोटे दलों के सदस्य चुनकर आते हैं, जो गठबंधन की राजनीति को आकार देने में मददगार होते हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड और पंजाब में दो राजनीतिक शक्तियों के बीच सीधा टकराव होगा।Friday, October 14, 2011
अन्ना-पहेली बनाम राष्ट्रीय राजनीति
Monday, October 10, 2011
अन्ना की 'राजनीति' का फैसला वोटर करेगा, उसे फैसला करने दो

अन्ना हज़ारे के लिए बेहतर होगा कि वे अपने आंदोलन को किसी एक राजनीतिक दल के फायदे में जाने से बचाएं। पर इस बारे में क्या कभी किसी को संशय था कि उनका आंदोलन कांग्रेस विरोधी है? खासतौर से जून के आखिरी हफ्ते में जब यूपीए सरकार की ओर से कह दिया गया कि हम कैबिनेट में लोकपाल विधेयक कानून का अपना प्रारूप रखेंगे। सबको पता था कि इस प्रारूप में अन्ना आंदोलन की बुनियादी बातें शामिल नहीं होंगी। रामलीला मैदान में यह आंदोलन किस तरह चला, संसद में इसे लेकर किस प्रकार की बहस हुई और किसने इसे समर्थन दिया और किसने इसका विरोध किया, यह बताने की ज़रूरत नहीं। भाजपा ने इसका मुखर समर्थन किया और कांग्रेस ने दबी ज़ुबान में सीबीआई को इसके अधीन रखने, राज्यों के लिए भी कानून बनाने और सिटीज़ंस चार्टर पर सहमत होने की कोशिश करने का भरोसा दिलाया। भाजपा से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस आंदोलन का समर्थन करने की घोषणा कर दी थी। फिर भी सितम्बर के पहले हफ्ते तक आधिकारिक रूप से यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं था। और आज भी नहीं है। पर परोक्षतः यह भाजपा के पक्ष में जाएगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि आंदोलन वोटर के सामने सीधे यह सवाल रख रहा है। चुनाव लड़ने के बजाय इस तरीके से चुनाव में हिस्सा लेने में क्या हर्ज़ है? इसका नफा-नुकसान आंदोलन का नेतृत्व समझे।
Friday, October 7, 2011
स्टीव जॉब्स
स्टीव जॉब्स को हम इतनी अच्छी तरह जानते थे यह मुझे पता नहीं था। पर मीडिया की कवरेज से पता लगता है कि दुनियाभर के लोग इनोवेशन, लगन और सादगी को पसंद करते हैं। आज के अखबारों पर नजर डालने के बाद और नेट पर खोज करने के बाद मुझे काफी सामग्री नजर आई। सब कुछ एक साथ देना सम्भव नहीं है। कुछ अखबारों के पहले सफे और कुछ कार्टून पेश हैं। चित्रों को बड़ा करने के लिए उन्हें क्लिक करें
एक और अंत का प्रारम्भ !!!
Tuesday, October 4, 2011
अंतर्विरोधों से घिरा पाकिस्तान
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ाई भारत यात्रा पर आ रहे हैं। एक अर्से से पाकिस्तान की कोशिश थी कि अफगानिस्तान में भारत की कोई भूमिका न रहे। जो भी हो पाकिस्तान के नज़रिए से हो। ऐसा तभी होगा, जब वहाँ पाक-परस्त निज़ाम होगा। शुरू में अमेरिका भी पाकिस्तान की इस नीति का पक्षधर था। पर हाल के घटनाक्रम में अमेरिका की राय बदली है। इसका असर देखने को मिल रहा है। पाकिस्तान ने अमेरिका के सामने चीन-कार्ड फेंका है। तुम नहीं तो कोई दूसरा। पर चीन के भी पाकिस्तान में हित जुडें हैं। वह पाकिस्तान का फायदा उठाना चाहता है। वह उसकी उस हद तक मदद भी नहीं कर सकता जिस हद तक अमेरिका ने की है। अफगानिस्तान की सरकार भी पाकिस्तान समर्थक नहीं है। जन संदेश टाइम्स में प्रकाशित मेरा लेख
भारत-पाकिस्तान रिश्तों के लिहाज से पिछले दो हफ्ते की घटनाओं पर ध्यान देने की ज़रूरत है। अमेरिका-पाकिस्तान, चीन-भारत और अफगानिस्तान इस घटनाक्रम के केन्द्र में हैं। अगले कुछ दिनों में एक ओर भारत-अफगानिस्तान रक्षा सहयोग के समझौते की उम्मीद है वहीं पाकिस्तान और चीन के बीच एक फौजी गठबंधन की खबरें हवा में हैं। दोनों देशों के रिश्तों में चीन एक महत्वपूर्ण देश के रूप में उभर रहा है। जिस तरह भारत ने वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया और जापान के साथ रिश्ते सुधारे हैं उसके जवाब में पाकिस्तान ने भी अपनी ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ घोषित की है।
Friday, September 30, 2011
फिर प्रधानमंत्री की भूमिका क्या है?
![]() |
| हिन्दू में केशव का कार्टून |
Monday, September 26, 2011
दिल्ली प्रहसन ...ब्रेक के बाद
Saturday, September 24, 2011
मीडिया-भ्रष्टाचार के खिलाफ बंद !!!
ऐसा पहली बार सुनाई पड़ा है। कर्नाटक के एक कस्बे में जनता ने मीडिया के भ्रष्टाचार के विरोध में बंद रखा। आमतौर पर कन्नड़ पत्रकारों से जुड़े मीडिया ब्लॉग सैंस सैरिफ ने यह खबर कन्नड़ अखबार प्रजा वाणी के मार्फत दी है। बहरहाल अब यह पता लगाने की ज़रूरत है कि मीडिया के किस तरह के काम से जनता नाराज़ है। एक शिकायत पक्षपात की होती है, यहाँ तो बात वसूली और आरटीआई के दुरुपयोग वगैरह की है।
सैंस सैरिफ के अनुसार उत्तरी कर्नाटक के मुधोल शहर में यह बंद पूरी तरह सफल रहा। इस बंद में दुकानदार, कर्मचारी राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, यहाँ तक कि पत्रकार भी शामिल हुए। सैंस सैरिफ की रपट इस प्रकार हैः-
A town shuts down to protest media corruption!24 September 2011Unbelievable as it may sound, residents of the town of Mudhol in North Karnataka observed a bandh (shutdown) on Tuesday, September 20, to protest “blackmail journalism” and the growing number of imposters masquerading as journalists to extort money.
According to a report in the Kannada daily Praja Vani, the bandhin the town of 100,000 residents was a “complete success”.
Shops and business establishments downed their shutters for a few hours, and vehicles were off the roads.
The protestors included politicians, farmers, even journalists, and a host of other organisations. They marched to thetahsildar‘s office and presented a memorandum.
One protestor slammed weekly newspapers for bringing a bad name to the entire profession, and another targetted the misuse of the right to information (RTI) Act to ferret out information that was later used for extortion.
Mudhol town is famous for its country-bred hounds used for hunting.
सैंस सैरिफ पढ़ने के लिए क्लिक करें
पीएम जी और उनके 2जी !!!
वित्त मंत्रालय का वह नोट किस तरह बना, क्यों बना, किसने उसे माँगा और उसका अभी तक जिक्र क्यों नहीं हुआ, यह बातें अगले जो-एक रोज़ में रोचक मोड़ लेंगी। फिलहाल प्रधानमंत्री जब देश वापस आएंगे तो कुछ नई परेशानियाँ उनके सामने होंगी। पारदर्शिता का ज़माना है। आज हिन्दू में सुरेन्द्र का कार्टून जोरदार है। आनन्द लें
इस मामले पर फर्स्ट पोस्ट में रमन किरपाल ने लिखा है कि यह नोट किसी ह्विसिल ब्लोवर का काम है। जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स की रपट कहती है कि यह सरकार के बचाव के लिए अच्छी तरह विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया नोट है। आप खुद इस नोट को पढ़ कर देखना चाहते हैं तो क्लिक करें
इस मामले पर फर्स्ट पोस्ट में रमन किरपाल ने लिखा है कि यह नोट किसी ह्विसिल ब्लोवर का काम है। जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स की रपट कहती है कि यह सरकार के बचाव के लिए अच्छी तरह विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया नोट है। आप खुद इस नोट को पढ़ कर देखना चाहते हैं तो क्लिक करें
Friday, September 23, 2011
एटमी ऊर्जा की तस्वीर साफ होनी चाहिए
जयललिता के आश्वासन के बाद तमिलनाडु के कूडानकुलम एटमी बिजलीघर के विरोध में चल रहा आमरण अनशन स्थगित हो गया है, पर मामला कुछ और जटिल हो गया है। जयललिता ने कहा है कि प्रदेश विधानसभा प्रस्ताव पास करके केन्द्र से अनुरोध करेगी कि बिजलीघर हटा ले। जापान के फुकुशीमा हादसे के बाद नाभिकीय ऊर्जा विवाद का विषय बन गई है, पर अभी दुनिया भर में एटमी बिजलीघर चल रहे हैं और लग भी रहे हैं। चीन ने नए रिएक्टर स्थापित करने पर रोक लगाई थी, पर अब 25 नए रिएक्टर लगाने की घोषणा की है। केवल विरोध के आधार पर बिजलीघरों के मामले में फैसला नहीं होना चाहिए। हाँ सरकार को यह बताना चाहिए कि ये बिजलीघर किस तरह सुरक्षित हैं।
इस साल मार्च में जापानी सुनामी के बाद जब फुकुशीमा एटमी बिजलीघर में विस्फोट होने लगे तभी समझ में आ गया था कि आने वाले दिनों में नए एटमी बिजलीघर लगाना आसान नहीं होगा। एटमी बिजलीघरों की सुरक्षा को लेकर बहस खत्म होने वाली नहीं। रेडिएशन के खतरों को लेकर दुनिया भर में शोर है। पर सच यह भी है कि आने वाले लम्बे समय तक एटमी बिजली के बराबर साफ और सुरक्षित ऊर्जा का साधन कहीं विकसित नहीं हो पा रहा है। सौर, पवन और हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक ऊर्जा विकल्प या तो बेहद छोटे हैं या बेहद महंगे।
Wednesday, September 21, 2011
श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार
ज्ञानपीठ पुरस्कार देश का सबसे सम्मानित पुरस्कार है। 1965 में जब यह पुरस्कार शुरू हुआ था तब उसे अंग्रेजी मीडिया में भी तवज्जोह मिल जाती थी। धीरे-धीरे अंग्रेजी मीडिया ने उस तरफ ध्यान देना बंद कर दिया। अब शेष भारतीय भाषाओं का मीडिया भी उस तरफ कम ध्यान देता है। बहरहाल आज लखनऊ के जन संदेश टाइम्स ने इस खबर को लीड की तरह छापा तो मुझे विस्मय हुआ। यह खबर एक रोज पहले जारी हो गई थी, इसलिए इसे इतनी प्रमुखता मिलने की सम्भावना कम थी। पर लखनऊ और इलाहाबाद के लिए यह बड़ी खबर थी ही। इन शहरों के लेखक हैं। क्या इन शहरों के युवा जानते हैं कि ये हमारे लेखक हैं? बहरहाल मीडिया को तय करना होता है कि वह इसे कितना महत्व दे। लेखकों, साहित्यकारों और दूसरे वैचारिक कर्मों से जुड़े विषयों की कवरेज अब अखबारों में कम हो गई है।
1965 से अब तक हिन्दी के सात लेखकों को यह पुरस्कार मिल चुका है। इनके नाम हैं- 1.सुमित्रानंदन पंत(1968), 2.रामधारी सिंह "दिनकर"(1972), 3.सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय(1978), 4.महादेवी वर्मा(1982), 5.नरेश मेहता(1992), 6.निर्मल वर्मा(1999), 7.कुंवर नारायण।
कोई लेखक, विचारक, कलाकार, रंगकर्मी क्यों महत्वपूर्ण होता है, कितना महत्वपूर्ण होता है, लगता है इसपर विचार करने की ज़रूरत भी है। फिल्मी कलाकारों, क्रिकेट खिलाड़ियों या किसी दूसरी वजह से सेलेब्रिटी बने लोगों के सामने ये लोग फीके क्यों पड़ते हैं, यह हम सबको सोचना चाहिए। अखबारों में पुरस्कार राशि भी छपी है। यह राशि ऐश्वर्या या करीना कपूर की एक फिल्म या शाहरुख के एक स्टेज शो की राशि के सामने कुछ भी नहीं है। बहरहाल आज के जन संदेश टाइम्स के सम्पादकीय पेज पर वीरेन्द्र यादव का लेख पढ़कर भी अच्छा लगा। खुशी इस बात की है कि किसी ने इन बातों पर ध्यान दिया।
वीरेन्द्र यादव का लेख पढ़ने के लिए कतरन पर क्लिक करें
1965 से अब तक हिन्दी के सात लेखकों को यह पुरस्कार मिल चुका है। इनके नाम हैं- 1.सुमित्रानंदन पंत(1968), 2.रामधारी सिंह "दिनकर"(1972), 3.सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय(1978), 4.महादेवी वर्मा(1982), 5.नरेश मेहता(1992), 6.निर्मल वर्मा(1999), 7.कुंवर नारायण।
कोई लेखक, विचारक, कलाकार, रंगकर्मी क्यों महत्वपूर्ण होता है, कितना महत्वपूर्ण होता है, लगता है इसपर विचार करने की ज़रूरत भी है। फिल्मी कलाकारों, क्रिकेट खिलाड़ियों या किसी दूसरी वजह से सेलेब्रिटी बने लोगों के सामने ये लोग फीके क्यों पड़ते हैं, यह हम सबको सोचना चाहिए। अखबारों में पुरस्कार राशि भी छपी है। यह राशि ऐश्वर्या या करीना कपूर की एक फिल्म या शाहरुख के एक स्टेज शो की राशि के सामने कुछ भी नहीं है। बहरहाल आज के जन संदेश टाइम्स के सम्पादकीय पेज पर वीरेन्द्र यादव का लेख पढ़कर भी अच्छा लगा। खुशी इस बात की है कि किसी ने इन बातों पर ध्यान दिया।वीरेन्द्र यादव का लेख पढ़ने के लिए कतरन पर क्लिक करें
Tuesday, September 20, 2011
राष्ट्रीय पार्टियों के लिए चुनौती होंगे 2012 के चुनाव
उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को नरेन्द्र मोदी की विजय के रूप में भाजपा प्रचारित कर रही है। और लालकृष्ण आडवाणी की और रथयात्रा पर निकलने वाले हैं। अमेरिकी संसद के एक पेपर के निहितार्थ को लेकर विशेषज्ञ प्राइम टाइम को धन्य कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, सपा और बसपा की गतिविधियाँ तेज़ हो गईं हैं। इस इतवार को शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक समिति के चुनाव में कांग्रेस और अकाली दल की ताकत का पंजाब में पहला इम्तहान होगा। 2012 के विधान सभा चुनाव पर इसका असर नज़र आएगा। कांग्रेस इस चुनाव में औपचारिक रूप से नहीं उतरी है, पर उसके प्रत्याशी और नेता मैदान में हैं। उत्तर भारत के इन तीन राज्यों के अलावा मणिपुर और गोवा में भी अगले साल चुनाव हैं। इन पाँचों राज्यों से लोकसभा की 100 सीटें है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मसले अलग और वक्त भी अलग है, पर कहीं न कहीं वोटर के मिजाज़ का पता लगने लगता है। अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद पहली बार देश के बड़े हिस्से के लोगों की राजनीतिक राय सामने आएगी। हर लिहाज़ से ये चुनाव महत्वपूर्ण साबित होंगे।
शहरयार की तस्वीर
Monday, September 19, 2011
राजनीति में जिसका स्वांग चल जाए वही सफल है
दारुल-उल-उलूम देवबंद के पूर्व मोहातमिम गुलाम मुहम्मद वस्तानवी ने नरेन्द्र मोदी के बारे में क्या कहा था? यही कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात का विकास हुआ है। और दूसरे यह कि जहाँ तक विकास की बात है मुसलमानों के साथ भेदभाव नहीं बरता गया। उन्होंने यह भी कहा कि 2002 के दंगे देश के लिए कलंक हैं। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। दंगों के दौरान पुलिस ने मुसलमानों को नहीं बचाया, क्योंकि ऊपर से राजनीतिक दबाव था। वस्तानवी ने इसके अलावा यह भी कहा कि मुसलमानों को अच्छी शिक्षा लेनी चाहिए। उनके लिए नौकरियों का बंदोबस्त तभी हो सकता है जब वे अच्छी तरह पढ़ें।
मोदी के बारे में वस्तानवी का बयान एकतरफा नहीं था। पर शायद देवबंद के प्रमुख पद पर बैठे व्यक्ति से देश के ज्यादातर मुसलमानों को ऐसी उम्मीद नहीं थी। मोदी के बारे में मुसलमानों को नरम बयान नहीं चाहिए। गुजरात में मुसलमानों का जिस तरह संहार किया गया वह क्या कभी भुलाया जा सकता है? फिर वस्तानवी ने ऐसा बयान क्यों दिया? वे तो गुजराती हैं। उन्हें तो दंगों की भयावहता की जानकारी थी। उनकी ईमानदारी पर पहले किसी को संदेह नहीं था। पर इस बयान से कहानी बदल गई। उन्हें पद से हटा दिया गया। और जब उन्हें हटाया जा रहा था तभी यह बात कही जा रही थी कि उनके हटने की वजह यह भी है कि वे गुजरात से हैं। वस्तानवी उन कुछ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी राय है कि हमें गोधरा कांड के बाद हुए दंगों से आगे बढ़ना चाहिए। बात मोदी को माफ करने या उन्हें समर्थन देने की नहीं है। बल्कि नए दौर में मुसलमानों के दूसरे सवालों को रेखांकित करने की भी है।
Sunday, September 18, 2011
चीन में जनता का विरोध
चीन में ऐसी तस्वीरें मीडिया में प्रसारित नहीं होतीं। हेनिंग, जेंगजियांग प्रांत के होंगशियाओ के तरकीबन 500 निवासियों ने जिंको सोलर कॉरपोरेशन के सामने प्रदर्शन किया और उसके आस-पास खड़ी आठ गाड़ियों को उल्टा कर दिया। यह कार उनमें से एक है। चीन की जनता नाराज होती है और उपद्रव भी करती है, इस बात पर विस्मय होता है। यह फोटो ग्लोबल टाइम्स की वैबसाइट पर नजर आई।
Saturday, September 17, 2011
गूगल पर अनंत पै
गूगल के होम पेज पर अक्सर देशकाल के हिसाब से चित्र बदलता है। 17 सितम्बर को अनंत पै के 82 वें जन्म दिन की याद करते हुए उनका चित्र लगाया है। अनंत पै को न जाने कितने भारतीय याद रखते हैं। उनका योगदान केवल चित्रकथाएं नहीं हैं। उन्होंने अमर चित्र कथा के रूप में एक नए विषय का प्रवेश कराया। भारत में फैंटम, मैनड्रेक और फ्लैश गॉर्डन जैसे पात्रों का प्रवेश कराया और बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के लिए सुरुचिपूर्ण सामग्री तैयार की।
बीमारी का इलाज
सन 2008-09 में वैश्विक आर्थिक मंदी की बेला में भारतीय उद्योग-व्यापार ने हाहाकार शुरू कर दिया था। इस पर सरकार ने 1.86 लाख करोड़ रु की कर राहत दी थी। वह अभी जारी है। अभी उद्योगपति और कर राहत चाहते हैं। सरकार खाद्य सुरक्षा का बिल ला रही है। इस पर काफी खर्च होगा। सरकार के पास वित्तीय घाटे को सन 2013-14 तक 3.5 प्रतिशत पर लाने का तरीका सिर्फ यही है कि उपभोक्ता पर लगने वाला टैक्स बढ़ाओ। पेट्रोल के 70 रु में 45 से ज्याद टैक्स है। पेट्रोल की कीमत बढ़ने से सिर्फ कार चलाने वालों को ही कष्ट नहीं होता। सब्जी से लेकर दूध तक महंगा हो जाता है। वही हो रहा है। हिन्दू में केशव का यह कार्टून सही इशारा कर रहा है। डीएनए में मंजुल का कार्टून कार चलाने वालों की टूटती साँस की ओर इशारा कर रहा है
Friday, September 16, 2011
प्रत्याशियों का चुनाव खर्च
जन प्रतिनिधियों के चुनाव खर्च को लेकर पिछले दो दशक में काफी दबाव बना है। व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद अब भी जितना सामने है उससे ज्यादा छिपा रहता है। बहरहाल देश की कुछ संस्थाएं चुनाव पर नज़र रखने लगीं हैं। उनमें एक है एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर)। इसी के तहत इलेक्शन वॉच का काम होता है।
एडीआर ने इस साल हुए पाँच राज्यों के चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च का विवरण दिया है वह रोचक है। जिन पाँच राज्यों में चुनाव हुआ उनके नाम हैं प बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी। इनमे पहले चार राज्यों में प्रत्याशियों के खर्च की सीमा 16 लाख रु है और पुदुच्चेरी में 9 लाख रु। प्रत्याशियों को अपने खर्च का विवरण 30 दिन में देना होता है। इस साल 13 मई को चुनाव परिणाम घोषित हुए थे। इस प्रकार 30 जून तक प्रत्याशियों ने विवरण दिए। एक हफ्ता चुनाव आयोग को लगा। 20 जून तक चुनाव आयोग की साइट पर इनका विवरण आ गया। चुनाव घोषित होने के 45 दिन के भीतर चुनाव खर्च को लेकर चुनौती दी जा सकती है। इन चुनावों के संदर्भ में वह तारीख थी 28 जुलाई। कितने प्रत्याशियों के चुनाव को चुनौती मिली पता नहीं, पर प्रत्याशियों ने जो विवरण दिया है वह रोचक है।
राज्य
|
सीटों का विवरण
|
खर्च की सीमा
|
औसत खर्च
|
|
1
|
असम
|
126
|
16 लाख रु
|
9.01 लाख रु
|
2
|
बंगाल
|
217
|
16 लाख रु
|
7.06 लाख रु
|
3
|
केरल
|
139
|
16 लाख रु
|
9.39 लाख रु
|
4
|
तमिलनाडु
|
234
|
16 लाख रु
|
7.12 लाख रु
|
5
|
पुदुच्चेरी
|
039
|
09 लाख रु
|
3.12 लाख रु
|
एडीआर ने कुल 746 एमएलए के खर्च का विश्लेषण किया है। इनमें से केवल 32 ने माना है कि उन्होंने खर्च की सीमा के 80 फीसदी से ज्यादा खर्च किया। 403 ने 50 फीसदी से कम खर्च किया। किसी भी एमएलए ने सीमा से ज्यादा खर्च नहीं किया। यहाँ दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिएः-
1. लगभग सभी दल माँग करते हैं कि चुनाव खर्च की सीमा कम है। उसे बढ़ाया जाना चाहिए। पर जब खर्च होता है तो वे सीमा से कहीं कम खर्च करते हैं।
2. चुनाव आयोग के पर्यवेक्षकों ने इस दौरान काफी नकद राशि बरामद की। अकेले तमिलनाडु में ही 60 करोड़ रु से ज्यादा बरामद हुए। यह किसका पैसा था और कौन खर्च कर रहा था? अकेले तिरुचिरापल्ली में एक बस से 5.11 करोड़ रु बरामद हुए। एक और छापे में मदुरै में 3.5 करोड़ रु बरामद हुए थे।
आप राज्यवार विवरण पढ़ना चाहें तो यहाँ पढ़ सकते हैं।
एडीआर की साइट पर जब आप जाएंगे तो माय नेता और इलेक्शन वॉच वगैरह के नाम दिखाई देंगे। एक जगह इंडिया अगेंस्ट करप्शन का नाम भी दिखाई देगा। सवाल है कि क्या इस विश्लेषण के पीछे कोई साजिश काम कर रही है? क्या यह राजनीति को बदनाम करने की कोशिश है? इस काम के लिए हो सकता है कुछ निजी कम्पनियों ने चंदा भी दिया हो। तब क्या इस विश्लेषण को इन कम्पनियों की साजिश मानना चाहिए?
अगले साल के विधान सभा चुनाव में ये गतिविधियाँ बढ़ेगी। इन्हें हम नए मध्य वर्ग की जागृति मानें या देश की गरीब जनता के विरोध में खड़ा आंदोलन? हो सकता है कि कुछ लोग पूछें कि इन लोगों की जल,जंगल, जमीन वगैरह के बारे में राय क्या है। मुझे पता नहीं कि शर्मिला इरोम की जल,जंगल और जमीन के बारे में या भारत की विदेश नीति, आर्थिक नीति और औद्योगिक नीति पर राय क्या है, पर एक तबका उनका नाम लेकर सिविल सोसायटी की अवधारणा को ही खारिज करता है।
इनकी वैब साइट से मैने इनके बारे में भी जानकारी लेकर नीचे दी है। मुझे इनका काम सकारात्मक लगता है। हमने जिस संवैधानिक-लोकतांत्रिक व्यवस्था का वरण किया है, उसमें जनता का हस्तक्षेप बुनियादी शर्त है। इन लोगों ने देश की अदालतों की मदद से चुनाव सुधार में मदद ली है। आप उचित समझें तो मैं उन तथ्यों को एकत्र कर सकता हूँ, जिनसे पता लगता है कि देश के राजनीतिक दलों ने इस प्रकार के सुधारों का विरोध किया है। लोकतंत्र केवल चुनाव लड़ना ही नहीं है, चुनाव की पद्धति को दुरुस्त करना भी है। बेशक भ्रष्टाचार केवल इतने से खत्म नहीं हो जाएगा। बहरहाल नीचे इनका परिचय पढ़ें, जो इन्होंने अपनी वैबसाइट में दिया है। ।
Association for Democratic Reforms (ADR) was established in 1999 by group of professor from Indian Institute of Management (IIM) Ahmedabad. In 1999, Public Interest Litigation (PIL) was filed by them with Delhi High Court asking the disclosure of criminal, financial and educational background of the candidates contesting elections. Based on this, the Supreme Court in 2002 and subsequently in 2003, made it mandatory for all candidates contesting elections to disclose Criminal, Financial and educational background prior to the polls by filing an affidavit with Election Commission.
The first election watch was conducted by ADR in 2002 for Gujrat Assembly Elections whereby detailed analysis of the backgrounds of candidates contesting elections was provided to the electorate in order to help the electorate make an informed choice during polls. Since then ADR has conducted Election Watches for almost all state and parliament elections in collaboration with the National Election Watch. It conducts multiple projects aimed at increasing transparency and accountability in the political and electoral system of the country.
Our Mission
Our goal is to improve governance and strengthen democracy by continuous work in the area of Electoral and Political Reforms. The ambit and scope of work in this field is enormous, Hence, ADR has chosen to concentrate its efforts in the following areas pertaining to the political system of the country:
Corruption and criminalization in the political process.
Empowerment of the electorate through greater dissemination of information relating to the candidates and the parties, for a better and informed choice.
Need for greater accountability of Political Parties.Need for inner-party democracy and transparency in party-functioning and gaps in the disclosure of candidate’s profile.
Tuesday, September 13, 2011
Monday, September 12, 2011
साम्प्रदायिक हिंसा कानून के राजनीतिक निहितार्थ
साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ प्रस्तावित कानून की भावना जितनी अच्छी है उतना ही मुश्किल है इसका व्यावहारिक रूप। यह कानून अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए बनाया जा रहा है। पर इसका जितना प्रचार होगा उतना ही बहुसंख्यक वर्ग इसके खिलाफ जाएगा। हो सकता है कि कांग्रेस को इससे राजनीतिक लाभ मिले, पर भाजपा को भी तो मिलेगा। इस कानून के संघीय व्यवस्था के संदर्भ में भी कुछ निहितार्थ हैं। इसका नुकसान किसे होगा? बहरहाल इस कानून की भावना जो भी हो इसे सामने लाने का समय ठीक नहीं है।
यूपीए दो की सरकार बनने के बाद लगा कि भाजपा के दिन लद गए। अटल बिहारी वाजपेयी के नेपथ्य में जाने के बाद पार्टी के पास मंच पर कोई दूसरा नेता नहीं बचा। पिछले दो साल से पार्टी की नैया हिचकोले खा रही है। पिछले साल झारखंड में शिबू सोरेन के साथ लेन-देन के शुरूआती झटकों के बाद पार्टी के नेतृत्व में सरकार बन गई। कर्नाटक में अच्छी भली सरकार बन गई थी, पर येदियुरप्पा को रेड्डी बंधुओं की दोस्ती रास नहीं आई। सन 2009 के अंत में एकदम अनजाने से नितिन गडकरी पार्टी अध्यक्ष बने तब लगा कि इसे चलाने वालों का सिर फिर गया है। पर वक्त की बात है कि इसे प्रणवायु मिलती रही। इसमे पार्टी की अपनी भूमिका कम दूसरों की ज्यादा है। पिछले डेढ़ साल से भाजपा को यूपीए सरकार प्लेट में रखकर मौके दे रही है। पता नहीं अन्ना-आंदोलन में इनका कितना हाथ था, पर ये फायदा उठा ले गए। और अब सरकार संसद के शीत सत्र में साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ जो विधेयक पेश करने वाली है, उसका फायदा कांग्रेस को मिले न मिले, भाजपा को ज़रूर मिलेगा।
Sunday, September 11, 2011
यह मीडिया का आतंकवाद है
आतंकवादी हिंसा, साम्प्रदायिक
हिंसा और दूसरे किस्म के टकरावों की कवरेज को लेकर विचार करने का समय आ गया है। नवम्बर
2008 के मुम्बई हमलों के दौरान कई दिन तक चली धारावाहिक कवरेज का फायदा हमलावरों के
आकाओं ने उठाया। जब तक हम समझ पाते नुकसान हो चुका था। हिंसा की कवरेज और उसके संदर्भ
में होने वाले स्टूडियो डिस्कशन अक्सर माहौल को सम्हालने के बजाय बिगाड़ देते हैं।
आतंवादियों का उद्देश्य हमारे मनोबल पर हमला करना होता है। अक्सर उसके इस इरादे को
मीडिया से मदद मिलती है।
Friday, September 9, 2011
आत्मविश्वास हमारा, या आतंकवादियों का?
दो दिन बाद 9/11 की दसवीं बरसी है। 9 सितम्बर 2001 को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के अलावा दो और इमारतें ध्वस्त हो गईं थीं। सोलह एकड़ का यह क्षेत्र अमेरिकी जनता के मन में गहरा घर कर गया है। उसी रोज न्यूयॉर्क के मेयर रूडी गुइलानी, गवर्नर जॉर्ज पैटकी और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने घोषणा की थी कि इन बिल्डिंगों को फिर से तैयार किया जाएगा। इनमें से एक 7 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर 2006 में तैयार हो गई और बाकी दो भी तैयार हो रही हैं।
अमेरिकी मानते हैं कि इन इमारतों को नहीं बनाया जाता तो यह आतंकवादियों की जीत होती। सच यह है कि उस दिन के बाद से न्यूयॉर्क ने आतंकवादियों को दूसरी कार्रवाई का मौका नहीं दिया। अमेरिका आज़ादी का देश था। वहाँ कोई भी अपने ढंग से रह सकता था। पिछले दस साल में यह देश बदल गया। अमेरिकी सरकार ने 400 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि सुरक्षा व्यवस्थाओं पर खर्च की और करीब एक हजार तीन सौ अरब डॉलर इराक और अफगानिस्तान की लड़ाइयों पर, जिन्हें यह देश 9/11 से जोड़ता है। पिछले दस साल में लोगों की व्यक्तिगत आज़ादी कम हो गई है। सारा ध्यान सुरक्षा पर है। वहाँ नागरिक अधिकारों के समर्थक इस अतिशय सुरक्षा का विरोध कर रहे हैं।
Monday, September 5, 2011
राजनीति में ही है राजनीतिक संकट का हल
दो साल पहले की बात है।
प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी को किसी सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। तभी
उन्होंने कहीं कहा कि मैं राजनीति में आना चाहता हूँ। उनकी माँ को विश्वास है कि उनका
बेटा राजनीति में आकर मंत्री बनेगा। कुछ साल पहले फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने
कहीं कहा था कि मैं राजनीति में कभी नहीं आना चाहूँगी। ऐसे शब्दों को हम खोजने की कोशिश
करें, जिनके अर्थ सबसे ज्यादा भ्रामक हैं तो राजनीति उनमें प्रमुख शब्द होगा। व्यावहारिक
अर्थ में राजनीति अंतर्विरोधों के बीच सामंजस्य बैठाने की कला है। भारत जैसे देश में
जहाँ दुनिया के सबसे ज्यादा अंतर्विरोध पाए जाते हैं, इस कला की सबसे ज्यादा ज़रूरत
है। संयोग से हमारे यहाँ राजनीति की कमी नहीं है, बल्कि इफरात है। फिर भी हाल के अन्ना
हजारे के आंदोलन में सबसे ज्यादा फजीहत राजनीति की हुई। लोगों को लगता है कि यह आंदोलन
राजनीति-विरोधी था।
Friday, September 2, 2011
जनता माने क्या, जनतंत्र माने क्या?
इस आंदोलन को अन्ना हजारे का आंदोलन नाम दिया गया है, क्योंकि हम व्यक्ति पर ज्यादा जोर देते हैं। उसकी वंदना करते वक्त और आलोचना करते वक्त भी। आरोप यह भी है कि सिविल सोसायटी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा नष्ट करते हुए तानाशाही अंदाज़ में सारा काम कराना चाहा। काफी हद तक यह बात सही है, पर क्या हमारे यहाँ जनता की भागीदारी सुनिश्चित कराने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं? जनता को अपनी व्यवस्था में भाग लेने का अधिकार है या नहीं? जब हम राइट टु इनफॉर्मेशन की बात कर रहे थे, तब क्या यह तर्क नहीं था कि देश में तो ऑफीशियल सीक्रेट्स एक्ट है। जनता कौन होती है जानकारी माँगने वाली? आज हम यह सवाल नहीं करते। इस आंदोलन में काफी लोगों की भागीदारी थी, फिर भी काफी लोग उसमें शामिल नहीं थे या उसके आलोचक थे। ऐसा क्यों था? जनता की भागीदारी के माने क्या हैं? जनता क्या है? कौन लोग जनता हैं और कौन लोग जनता के बाहर हैं? जनता का सबसे नीचे वाला तबका (सबआल्टर्न) क्या सोचता है? ऐसी तमाम बातें हैं। हमें इनपर भी सोचना चाहिए।
इस आंदोलन के दौरान यह
बात कई बार कही गई कि जन प्रतिनिधि प्रणाली और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन हो रहा
है। यह भी कहा गया कि कोई बदलाव करना है तो चुनाव लड़िए, चुनकर आइए और बदलाव कीजिए।
आपको बाहर रहकर बदलाव के लिए दबाव डालने का अधिकार नहीं है। इसकी तुलना फिल्म शोले
में टंकी पर चढ़कर बसंती का हाथ माँगने वाले वीरू से की गई। पर टंकी या छत पर चढ़कर
अपनी माँग मनवाने का चलन आज का नहीं है। जनता की भागीदारी का भी यह पहला आंदोलन नहीं
था। अलबत्ता क्षेत्रीय, जातीय और साम्प्रदायिक मसलों पर भीड़ बेहतर जुड़ती है। ज्यादा
बड़े मसलों पर जनता को जमा करना आसान नहीं होता। और वह जमा होती है तो विस्मय होता
है कि ऐसा क्योंकर हो गया। उसके बाद कांसिपिरेसी थियरी जन्म लेती है।
Monday, August 29, 2011
दस दिन का अनशन
हरिशंकर परसाई की यह रचना रोचक है और आज के संदर्भों से जुड़ी है। इन दिनों नेट पर पढ़ी जा रही है। आपने पढ़ी न हो तो पढ़ लें। इसे मैने एक जिद्दी धुन नाम के ब्लॉग से लिया है। लगे हाथ मैं एक बात साफ कर दूँ कि मुझे इसके आधार पर अन्ना हजारे के अनशन का विरोधी न माना जाए। मैं लोकपाल बिल के आंदोलन के साथ जुड़ी भावना से सहमत हूँ।
10 जनवरी
आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है कि संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."
बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.
कैसा संवाद संकलन?
27 के इंडियन एक्सप्रेस में श्रीमती मृणाल पांडे का लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें हिन्दी अखबारों के संवाददाताओं को विज्ञापन लाने के काम में लगाने का जिक्र है। हिन्दी अखबारों की प्रवृत्तियों पर इंटरनेट के अलावा दूसरे मीडिया पर बहुत कम लिखा जाता है। अन्ना हजारे के अनशन के दौरान कुछ लोगों ने कहा कि हमारी भ्रष्ट-व्यवस्था में मीडिया की भूमिका भी है। ज्यादातर लोग मीडिया से उम्मीद करते हैं कि वह जनता की ओर से व्यवस्था से लड़ेगा। पर क्या मीडिया इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं है? और मीडिया का कारोबारी नज़रिया उसे जन-पक्षधरता से दूर तो नहीं करता? बिजनेस तो इस व्यवस्था का हिस्सा है ही।
अन्ना या नो अन्ना, देश की भावना को समझिए
संसद में शनिवार की बहस
सुनने के बाद आपको क्या लगता है? संसद में मौजूद सांसदों और पार्टियों का सबसे बड़ा
वर्ग टीम अन्ना के प्रस्तावों से सहमत है। ऐसा लगता है कि हर पार्टी गैलरी के लिए बोल
रही है। और यह गैलरी पूरा देश नहीं, अपना चुनाव कोना है। अपने समर्थकों तक अपनी बात
पहुँचाने की कोशिश में कोई पूरा सच बोलना नहीं चाहता। उन्हें भड़काए रखना चाहता है।
संविधान से टकराव और संसदीय मर्यादा की बात सब कह रहे हैं, पर किसका किससे टकराव हुआ? टकराव है तो सामने आता। आश्चर्य इस बात का है कि पिछले छह महीने से देश एक ऐसे
मसले की बारीकियों पर पिला पड़ा है, जिससे सिद्धांततः किसी को आपत्ति नहीं। व्यावहारिक
आपत्तियों की लम्बी सूची है।
Friday, August 26, 2011
अब अनशन की ज़रूरत नहीं
सर्वदलीय बैठक के अगले दिन लोकसभा में प्रधानमंत्री, विपक्ष
की नेता और लोकसभा अध्यक्ष के वचन देने के बाद अन्ना हजारे के आंदोलन का एक चरण पूरा
हो गया है। उनका अनशन सफल हुआ है, विफल नहीं। अब उसे जारी रखने की ज़रूरत नहीं। पहली
बार देश की संसद ने इस प्रकार का आश्वासन दिया है। अन्ना को श्रेय जाता है कि उन्होंने
जनता की नाराज़गी को इस ऊँचाई तक पहुँचाया। अब संसद को फैसला करना चाहिए। बेशक जनता
की भागीदारी के मौके कभी-कभार आते हैं, पर जनता का दबाव खत्म हो जाएगा, ऐसा नहीं मानना
चाहिए। एक अर्थ में एक नए किस्म का आंदोलन देश में अब शुरू हो रहा है। खत्म नहीं। राजनीतिक-प्रशासनिक
व्यवस्था के तमाम पहलुओं पर अभी विचार होना है। अन्ना चाहते हैं कि उनके जन-लोकपाल
बिल पर संसद विचार करे। वह अब होगा। कम से कम उसपर बहस जनता के सामने होगी। इसके बाद
जो कानून बनकर आएगा वह सम्भव है जन-लोकपाल विधेयक से ज्यादा प्रभावशाली हो।
Wednesday, August 24, 2011
मीडिया असंतुलित है, अपराधी नहीं
अन्ना हजारे के आंदोलन के उद्देश्य और लक्ष्य के अलावा दो-तीन बातों ने ध्यान खींचा है। ये बातें सार्वजनिक विमर्श से जुड़ी हैं, जो अंततः लोकमत को व्यक्त करता है और उसे बनाता भी है। इस आंदोलन का जितना भी शोर सुनाई पड़ा हो, देश के बौद्धिक-वर्ग की प्रतिक्रिया भ्रामक रही। एक बड़े वर्ग ने इसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रवर्तित माना। संघ के साथ इसे सवर्ण जातियों का आंदोलन भी माना गया। सिविल सोसायटी और मध्यवर्ग इनकी आलोचना के केन्द्र में रहे।
आंदोलन के विरोधी लोग इसे अल्पजनसंख्या का प्रभावहीन आंदोलन तो कह रहे हैं, पर लगभग नियमित रूप से इसकी आलोचना कर रहे हैं। यदि यह प्रभावहीन और जन-प्रतिनिधित्वविहीन है तो इसकी इतनी परवाह क्यों है? हालांकि फेसबुक और ट्विटर विमर्श का पैमाना नहीं है, पर सुबह से शाम तक कई-कई बार वॉल पर लिखने से इतना तो पता लगता है कि आप इसे महत्व दे रहे हैं। एक वाजिब कारण यह समझ में आता है कि मीडिया ने इस आंदोलन को बड़ी तवज्जो दी, जो इस वर्ग के विचार से गलत था। इनके अनुसार इस आंदोलन को मीडिया ने ही खड़ा किया। चूंकि इस आंदोलन के मंच पर कुछ जाने-पहचाने नेता नहीं थे, इसलिए इसे प्रगतिशील आंदोलन मानने में हिचक है।
आंदोलन के विरोधी लोग इसे अल्पजनसंख्या का प्रभावहीन आंदोलन तो कह रहे हैं, पर लगभग नियमित रूप से इसकी आलोचना कर रहे हैं। यदि यह प्रभावहीन और जन-प्रतिनिधित्वविहीन है तो इसकी इतनी परवाह क्यों है? हालांकि फेसबुक और ट्विटर विमर्श का पैमाना नहीं है, पर सुबह से शाम तक कई-कई बार वॉल पर लिखने से इतना तो पता लगता है कि आप इसे महत्व दे रहे हैं। एक वाजिब कारण यह समझ में आता है कि मीडिया ने इस आंदोलन को बड़ी तवज्जो दी, जो इस वर्ग के विचार से गलत था। इनके अनुसार इस आंदोलन को मीडिया ने ही खड़ा किया। चूंकि इस आंदोलन के मंच पर कुछ जाने-पहचाने नेता नहीं थे, इसलिए इसे प्रगतिशील आंदोलन मानने में हिचक है।
Tuesday, August 23, 2011
आंदोलन सफल हो या विफल सकारात्मक बदलाव होगा
नंदन नीलेकनी ने हाल में एक टीवी चैनल पर कहा कि
भ्रष्टाचार किसी एक कानून के बन जाने से खत्म नहीं हो जाएगा। मैं इस आंदोलन में
शामिल लोगों की फिक्र से सहमत हूँ, पर यह नहीं मानता कि कोई जादू की गोली इसका
इलाज है। संयोग से नंदन नीलेकनी के इनफोसिस के पुराने मित्र मोहनदास पै एक और चैनल
पर इस आंदोलन को जनांदोलन बता रहे थे और इसे दबाने की सरकारी कोशिशों का विरोध कर
रहे थे। जिन दो मित्रों के बीच एक कम्पनी और कार्य-संस्कृति का विज़न एक सा था, वे
इस मामले में एक तरह से क्यों नहीं सोच पा रहे हैं? शायद नीलेकनी का पद आड़े
आता है। या वे वास्तव में इस मसले की तह तक जाकर सोचते हैं और हम बेवजह उनके
सरकारी पद को इस मसले से जोड़कर देख रहे हैं। यह सिर्फ नीलेकनी और पै का मामला
नहीं है।
Monday, August 22, 2011
यह बदलाव की प्रक्रिया है, देर तक चलेगी
अन्ना के अनशन के सात
दिन आज पूरे हो जाएंगे। और अभी तक यह समझ में नहीं आ रहा है कि यह कब तक चलेगा और कहाँ
तक चलेगा। आंदोलन के समर्थन और विरोध में बहस वह मूल प्रश्नों के बाहर नहीं निकल पाई
है। क्या केवल इस कानून से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? क्या यह सम्भव है कि अन्ना का प्रस्तावित विधेयक हूबहू पास कर दिया जाए? सरकार ने जो विधेयक पेश किया है उसका क्या होगा? क्या सरकार उसे वापस लेने को मजबूर होगी? सवाल यह भी है कि सरकार ने
विपक्षी दलों के साथ इस विषय पर बात क्यों नहीं की। क्या वह उनके सहयोग के बगैर इस
संकट का सामना कर सकेगी? क्या हम किसी बड़े व्यवस्था परिवर्तन की ओर बढ़
रहे हैं? क्या सरकार आने वाले राजनैतिक संकट की गम्भीरता को नहीं समझ
पा रही है?
Sunday, August 21, 2011
आंदोलन तैयार कर रहा है एक राजनीतिक शून्य
लड़ाई का पहला राउंड
अण्णा हज़ारे के पक्ष में गया है। टीम-अण्णा ने यूपीए को तकरीबन हर मोड़ पर शिकस्त
दे दी है। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के पास कोई बड़ा संगठनात्मक आधार नहीं है और इतने
साधन भी नहीं कि वे कोई बड़ा प्रचार अभियान चला पाते। पर परिस्थितियों और उत्साही युवा
कार्यकर्ताओं ने कहानी बदल दी। सोशल नेटवर्किंग साइटों और एसएमएस के रूप में मिली संचार
तकनीक ने भी कमाल किया। पर यह आंदोलन की जीत ही नहीं, सरकारी नासमझी की हार भी है।
उसने इस आंदोलन को मामूली राजनैतिक बाज़ीगरी मान लिया था। बाबा रामदेव के अनशन को फुस्स
करने के बाद सरकार का हौसला और बढ़ गया।
शुक्रवार की शाम रामलीला
मैदान पर मीडिया से चर्चा के दौरान अरविन्द केजरीवाल ने कहा, हम चुनाव नहीं लड़ेंगे।
हम जनता हैं, जनता ही रहेंगे। बात अच्छी लगती है, अधूरी है। जनता के आंदोलन का अर्थ
क्या है? इस दौरान पैदा हुई जन-जागृति को आगे लेकर कौन जाएगा? लोकपाल की माँग राजनैतिक थी तो राजनैतिक माध्यमों के मार्फत आती। जनता लोकपाल
विधेयक की बारीकियों को नहीं समझती। उसका गुस्सा राजनैतिक शक्तियों पर है और वह वैकल्पिक
राजनीति चाहती है। टीम अण्णा का राजनैतिक एजेंडा हो या न हो, पर इतना साफ है कि यह
कांग्रेस-विरोधी है। यूपीए और कांग्रेस का राजनीति हाशिए पर आ गई है। और कोई दूसरी
ताकत उसकी जगह उभर नहीं रही है। इस समूचे आंदोलन ने जहाँ देश भर को आलोड़ित कर दिया
है वहीं राजनैतिक स्तर पर एक जबर्दस्त शून्य भी पैदा कर दिया है। इस आंदोलन से जो स्पेस
पैदा हुआ है उसे कौन भरेगा?
Friday, August 19, 2011
यह जनांदोलन है
इस आंदोलन में दस हजार लोग शामिल हैं या बीस हजार. यह आंदोलन प्रतिक्रयावादी है या प्रतिगामी, अण्णा अलोकतांत्रिक हैं या अनपढ़, इस बहस में पड़े बगैर एक बात माननी चाहिए कि इसके साथ काफी बड़े वर्ग की हमदर्दी है, खासकर मध्यवर्ग की। गाँव का गरीब, दलित, खेत मजदूर यों भी अपनी भावनाएं व्यक्त करना नहीं जानता। उनके नाम पर कुछ नेता ही घोषणा करते हैं कि वे किसके साथ हैं। मध्य वर्ग नासमझ है, इस भ्रष्टाचार में भागीदार है, यह भी मान लिया पर मध्यवर्ग ही आंदोलनों के आगे आता है तब बात बढ़ती है। इस आंदोलन से असहमति रखने वाले लोग भी इसी मध्यवर्ग से आते हैं। आप इस आंदोलन में शामिल हों या न हों, पर इस बात को मानें कि इसने देश में बहस का दायरा बढ़ाया है। यही इसकी उपलब्धि है।
अण्णा हजारे के आंदोलन की तार्किक परिणति चाहे जो हो, इसने कुछ
रोचक अंतर्विरोध खड़े किए हैं। बुनियादी सवाल यह है कि इसे जनांदोलन माना जाए या नहीं। इसलिए कुछ लोग इसे
सिर्फ आंदोलन लिख रहे हैं, जनांदोलन नहीं। जनांदोलन का अर्थ है कि उसके आगे कोई वामपंथी
पार्टी हो या दलित-मजदूर नाम का कोई बिल्ला हो। जनांदोलन को परिभाषित करने वाले विशेषज्ञों
के अनुसार दो बातें इसे आंदोलन बना सकतीं हैं। एक, जनता की भागीदारी। वह शहरी और मध्य
वर्ग की जनता है, इसलिए अधूरी जनता है। सरकारी दमन भी इसे आंदोलन बनाता है। पर इस आंदोलन
का व्यापक राजनैतिक दर्शन स्पष्ट नहीं है। कम से कम वे प्रगतिशील वामपंथी नहीं हैं।
इसलिए यह जनांदोलन नहीं है। बल्कि इनमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता घुसे
हुए हैं। इस आंदोलन का वर्ग चरित्र तय हो गया कि ये लोग शहरी मध्य वर्ग के सवर्ण और
आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाने वाले लोग हैं। यह आंदोलन मीडिया ने खड़ा किया है। इसके
पीछे भारतीय पूँजीपति वर्ग और अमेरिका है। कुछ लोग इसे अण्णा और कांग्रेस की मिली-भगत
भी मानते हैं।
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