नोटबंदी के खिलाफ विरोधी दलों ने आंदोलन खड़ा कर दिया है।
उनका कहना है कि इस फैसले से आम आदमी की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। मोटे तौर पर यह
बात सच भी है। पर ये मुश्किलें किस प्रकार की हैं और कितनी हैं तथा कब तक चलेंगी,
इसके बारे में भी विचार किया जाना चाहिए। देवोत्थान एकादशी के बाद शादियाँ शुरू हो
जाती हैं। जिन लोगों ने पहले से पैसे जमा करके रखे थे, उनके सामने दिक्कतें खड़ी
हो गईं। जनवासे का इंतजाम, बैड की व्यवस्था, हलवाई का खर्चा और जेवरों की खरीदारी
सारे काम नकदी से होते हैं। नेग-शगुन, पंडित जी को भी पैसे देने होते हैं।
Sunday, November 27, 2016
Saturday, November 26, 2016
कांग्रेस एक पायदान नीचे
नोटबंदी के दो हफ्ते बाद राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष की
भावी रणनीति भी सामने आने लगी है। इसमें सबसे ज्यादा तेजी दिखाई है ममता बनर्जी
ने, जिन्होंने जेडीयू, सपा, एनसीपी और आम आदमी पार्टी के साथ सम्पर्क करके आंदोलन
खड़ा करने की योजना बना ली है। इसकी पहली झलक बुधवार को दिल्ली में दिखाई दी। जंतर-मंतर
की रैली के बाद अचानक ममता बनर्जी का कद मोदी की बराबरी पर नजर आने लगा है। पर
ज्यादा महत्वपूर्ण है कांग्रेस का विपक्षी सीढ़ी पर एक पायदान और नीचे चले जाना। नोटबंदी
के खिलाफ एक आंदोलन ममता ने खड़ा किया है और दूसरा आंदोलन कांग्रेस चला रही है।
बावजूद संगठनात्मक लिहाज से ज्यादा ताकतवर होने के कांग्रेस के आंदोलन में धार नजर
नहीं आ रही है। राहुल गांधी अब मुलायम सिंह, मायावती और नीतीश कुमार के बराबर के
नेता भी नजर नहीं आते हैं।
Friday, November 25, 2016
विपक्ष के लिए एक मौका
नोटबंदी के दो हफ्ते बाद उसकी राजनीति ने अँगड़ाई
लेना शुरू कर दिया है. बुधवार को संसद भवन में गांधी प्रतिमा के पास तकरीबन 200
सांसदों ने जमा होकर अपनी नाराजगी को व्यक्त किया. वहीं तृणमूल कांग्रेस की नेता
ममता बनर्जी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर जंतर-मंतर पर रैली की. गुरुवार को
संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस, सीपीएम तथा बसपा ने सरकार की घेराबंदी की. कांग्रेस
ने पूर्व प्रधानमंत्री को इस फैसले के खिलाफ खड़ा किया, जबकि अमूमन मनमोहन सिंह
बोलते नहीं हैं. कांग्रेस मनमोहन की विशेषज्ञता का लाभ लेना चाहती थी. पर मनमोहन सिंह ने इस फैसले की नहीं, उसे लागू करने वाली व्यवस्था की आलोचना की, उधर मायावती ने कहा कि हिम्मत है तो लोकसभा भंग
करके चुनाव करा लो. पता लग जाएगा कि जनता आपके साथ है या नहीं. उम्मीद थी कि संसद
के इस सत्र पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ हावी होगा, पर नोटबंदी
ने विपक्ष की मुराद पूरी कर दी.
Sunday, November 20, 2016
नोटबंदी साध्य नहीं, साधन है
नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर के
संदेश और उसके बाद के भाषणों में इस बात को कहा है कि सार्वजनिक जीवन में
भ्रष्टाचार के खिलाफ मैं बड़ी लड़ाई लड़ना चाहता हूँ। बहुत से लोगों को उनकी बात
पर यकीन नहीं है, पर जिन्हें यकीन है उनकी तादाद भी कम नहीं है। मोदी ने कहा है कि
मुझे कम से कम 50 दिन दो। भारतीय जनता के मूड को देखें तो वह उन्हें पचास दिन नहीं
पाँच साल देने को तैयार है, बशर्ते उस काम को पूरा करें, जिसका वादा है। सन 1971
और 1977 में देश की जनता ने सत्ताधारियों को ताकत देने में देर नहीं लगाई थी।
नोटबंदी की घोषणा होने के बाद से कांग्रेस सहित ज्यादातर
विरोधी दलों ने आंदोलन का रुख अख्तियार किया है। वे जनता की दिक्कतों को रेखांकित
कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले अरविन्द केजरीवाल भी इस फैसले
के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि यह फैसला खुद में बड़ा स्कैम है। कहा यह भी जा रहा
है कि बीजेपी ने नोटबंदी की चाल अपने राजनीतिक प्रतिस्पर्धियों को यूपी में मात
देने के लिए चली है। बीजेपी ने अपना इंतजाम करने के बाद विरोधियों को चौपट कर दिया
है।
Monday, November 14, 2016
नेहरू को बिसराना भी गलत है
पिछले साल जब सरकार ने योजना
आयोग की जगह ‘नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) यानी ‘नीति’ आयोग बनाने
की घोषणा की थी तब कुछ लोगों ने इसे छह दशक से चले आ रहे नेहरूवादी समाजवाद की
समाप्ति के रूप में लिया. यह तय करने की जरूरत है कि वह राजनीतिक प्रतिशोध था या
भारतीय रूपांतरण के नए फॉर्मूले की खोज. वह एक संस्था की समाप्ति जरूर थी, पर क्या
योजना की जरूरत खत्म हो गई? नेहरू का हो या मोदी का ‘विज़न’ या दृष्टि की जरूरत
हमें तब भी थी और आज भी है.
Sunday, November 13, 2016
काले धन पर वार तो यह है
काफी लोगों को समझ में नहीं आ रहा
है कि नोटों को बदल देने से काला धन कैसे बाहर आ जाएगा। अक्सर हम काले धन का मतलब
भी नहीं जानते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि बड़ी मात्रा में किसी के पास कैश हो तो वह काला धन है। कैश का
मतलब हमेशा काला धन नहीं है। पर प्रायः कैश के रूप में काला धन होता है। यदि नकदी
का विवरण किसी के पास है और वह व्यक्ति उसमें से उपयुक्त राशि टैक्स वगैरह के रूप
में जमा करता है तो वह काला धन नहीं है।
फिलहाल दुनिया में समझ यह बन रही है कि लेन-देन को नकदी के बजाय औपचारिक रिकॉर्डेड तरीके से करना सम्भव हो तो 'काले धन' का बनना कम हो जाएगा। इनफॉर्मेशन तकनीक ने इसे सम्भव बना दिया है। भारत में गरीबी, अशिक्षा और तकनीकी नेटवर्क के अधूरे विस्तार के कारण दिक्कतें हैं। उन्हें दूर करने की कोशिश तो करनी ही होगी।
Thursday, November 10, 2016
ट्रम्प से ज्यादा महत्वपूर्ण है अमेरिकी सिस्टम
अमेरिकी मीडिया के कयास के विपरीत डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना कुछ लोगों को विस्मयकारी लगा, जिसकी जरूरत नहीं है। अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया ऐसी है कि ज्यादा वोट जीतने वाला भी हार सकता है। यदि वे हार भी जाते तो उस विचार की हार नहीं होती, जो इस चुनाव के पीछे है। लगभग कुछ दशक की उदार अमेरिकी व्यवस्था के बाद अपने राष्ट्रीय हितों की फिक्र वोटर को हुई है। कुछ लोग इसे वैश्वीकरण की पराजय भी मान रहे हैं। वस्तुतः यह अंतर्विरोधों का खुलना है। इसमें किसी विचार की पूर्ण पराजय या अंतिम विजय सम्भव नहीं है। अमेरिका शेष विश्व से कुछ मानों में फर्क देश है। यह वास्तव में बहुराष्ट्रीय संसार है। इसमें कई तरह की राष्ट्रीयताएं बसती हैं। हाल के वर्षों में पूँजी के वैश्वीकरण के कारण चीन और भारत का उदय हुआ है। इससे अमेरिकी नागरिकों के आर्थिक हितों को भी चोट लगी है। ट्रम्प उसकी प्रतिक्रिया हैं। क्या यह प्रतिक्रिया गलत है? गलत या सही दृष्टिकोण पर निर्भर है। पर यह प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं है। दुनिया के ऐतिहासिक विकास की यह महत्वपूर्ण घड़ी है। अमेरिकी चुनाव की खूबसूरती है कि हारने के बाद प्रत्याशी विजेता को समर्थन देने का वायदा करता है और जीता प्रत्याशी अपने आप को उदार बनाता है। ट्रम्प ने चुनाव के बाद इस उदारता का परिचय दिया है। अमेरिकी प्रसासनिक व्यवस्था में राष्ट्रपति बहुत ताकतवर होता है, पर वह निरंकुश नहीं हो सकता। अंततः वह व्यवस्था ही काम करती है।
अमेरिका में राष्ट्रपति पद का जैसा चुनाव इस बार हुआ है,
वैसा कभी नहीं हुआ। दोनों प्रत्याशियों की तरफ से कटुता चरम सीमा पर थी। अल्ट्रा
लेफ्ट और अल्ट्रा राइट खुलकर आमने-सामने थे। डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में अभी कुछ
भी कहना मुश्किल है, सिवाय इसके कि वे धुर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी राष्ट्रपति
साबित होंगे। पर सबसे बड़ा खतरा यह है कि उनके ही कार्यकाल में अमेरिका की
अर्थ-व्यवस्था पहले नम्बर से हटकर दूसरे नम्बर की बनने जा रही है।
Wednesday, November 9, 2016
काले धन पर सरकार का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
2014 के चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि विदेश में 400 से 500 अरब डॉलर का भारतीय कालाधन विदेशों में जमा है. विदेश में जमा काला धन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मकड़जाल में फंस कर रह गया. इस वजह से मोदी सरकार को जवाब देते नहीं बनता है. काले धन का मसला राजनीति और गवर्नेंस दोनों से जुड़ा है. हाल में भारत सरकार ने अघोषित आय को घोषित करने की जो योजना 1 जून 2016 से लेकर 30 सितंबर 2016 तक के लिए चलाई थी वह काफी सफल रही.
योजना की समाप्ति के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि अघोषित आय घोषणा योजना के माध्यम से 64,275 लोगों ने 65 हजार 250 करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की. सवाल है कि क्या 64 हजार लोगों के पास ही अघोषित आय है? फिर भी ये अब तक की सबसे बड़ी अघोषित आय थी. पर अनुमान है कि इससे कहीं बड़ी राशि अभी अघोषित है. नोटों को बदलने की योजना आजादी के बाद काले धन को बाहर निकालने की शायद सबसे बड़ी कोशिश है. इसके मोटे निहितार्थ इस प्रकार हैं-
योजना की समाप्ति के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि अघोषित आय घोषणा योजना के माध्यम से 64,275 लोगों ने 65 हजार 250 करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की. सवाल है कि क्या 64 हजार लोगों के पास ही अघोषित आय है? फिर भी ये अब तक की सबसे बड़ी अघोषित आय थी. पर अनुमान है कि इससे कहीं बड़ी राशि अभी अघोषित है. नोटों को बदलने की योजना आजादी के बाद काले धन को बाहर निकालने की शायद सबसे बड़ी कोशिश है. इसके मोटे निहितार्थ इस प्रकार हैं-
Tuesday, November 8, 2016
क्या सरकार ने घबराकर एनडीटीवी का बैन हटाया?
एनडीटीवी इंडिया को एक दिन के लिए ऑफ-एयर करने के सरकारी आदेश का अनुपालन रोकने की खबर 7 नवम्बर को आने के बाद से दो तरह की बातें सामने आ रही हैं। एनडीटीवी पर पाबंदी लगाने के समर्थकों का कहना है कि सरकार ने यह कदम गलत उठाया है। सवाल है कि क्या सरकार ने यह कदम एनडीटीवी पर कृपा करके उठाया है या इसलिए उठाया है कि चैनल अदालत चला गया था और सरकार घबरा गई थी?
एनडीटीवी इंडिया की वैबसाइट पर खबर में कहा गया है कि इस फैसले की चौतरफा आलोचना के बाद बैन सम्बंधी आदेश को स्थगित किया गया। यह फैसला तब आया जब सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को इस बैन पर स्टे संबंधी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया।
इस संबंध में सोमवार की दोपहर NDTV के प्रतिनिधियों ने सूचना और प्रसारण मंत्री से मुलाकात की। उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि एनडीटीवी इंडिया ने जनवरी में पठानकोट के एयरफोर्स बेस पर हमले के संबंध में संवेदनशील ब्यौरे का प्रसारण नहीं किया। साथ ही कहा कि चैनल को अपनी तरफ से साक्ष्य पेश करने का उपयुक्त मौका नहीं दिया। चैनल ने ऐसी कोई सूचना प्रसारित नहीं की जो उस वक्त बाकी चैनलों और अख़बारों से भिन्न रही हो।
एनडीटीवी इंडिया की वैबसाइट पर खबर में कहा गया है कि इस फैसले की चौतरफा आलोचना के बाद बैन सम्बंधी आदेश को स्थगित किया गया। यह फैसला तब आया जब सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को इस बैन पर स्टे संबंधी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया।
इस संबंध में सोमवार की दोपहर NDTV के प्रतिनिधियों ने सूचना और प्रसारण मंत्री से मुलाकात की। उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि एनडीटीवी इंडिया ने जनवरी में पठानकोट के एयरफोर्स बेस पर हमले के संबंध में संवेदनशील ब्यौरे का प्रसारण नहीं किया। साथ ही कहा कि चैनल को अपनी तरफ से साक्ष्य पेश करने का उपयुक्त मौका नहीं दिया। चैनल ने ऐसी कोई सूचना प्रसारित नहीं की जो उस वक्त बाकी चैनलों और अख़बारों से भिन्न रही हो।
Monday, November 7, 2016
अखिलेश और पीके की मुलाकात तो हुई
कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर उर्फ पीके की रविवार की यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सोमवार 7 नवम्बर को आखिरकार मुलाकात हो गई। इसके पहले खबरें थीं कि अखिलेश ने उनसे मिलने से मना कर दिया है। बहरहाल इस मुलाकात के बाद समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के गठबंधन के कयासों को और हवा मिल गई है।
प्रशांत इससे पहले दिल्ली में और फिर लखनऊ में मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव से मुलाकात कर चुके हैं। वहीं पीके को लेकर कांग्रेस के भीतर असमंजस है। दिल्ली में राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की तैयारियाँ हो रहीं है। उधर खबरें हैं कि कांग्रेस के प्रदेश सचिव सुनील राय समेत कई पदाधिकारियों ने उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लिखे पत्र में यूपी में गठजोड़ का विरोध किया है।
प्रशांत इससे पहले दिल्ली में और फिर लखनऊ में मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव से मुलाकात कर चुके हैं। वहीं पीके को लेकर कांग्रेस के भीतर असमंजस है। दिल्ली में राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की तैयारियाँ हो रहीं है। उधर खबरें हैं कि कांग्रेस के प्रदेश सचिव सुनील राय समेत कई पदाधिकारियों ने उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लिखे पत्र में यूपी में गठजोड़ का विरोध किया है।
अब तलवार तो अखिलेश के हाथ में है
समाजवादी पार्टी ने अपना रजत जयंती समारोह मना लिया और यूपी
में बिहार जैसा महागठबंधन बनाने की सम्भावनाओं को भी जगा दिया, पर उसकी घरेलू कलह कालीन के नीचे दबी पड़ी है। जैसे ही मौका मिलेगा बाहर निकल आएगी। पार्टी साफ़
तौर पर दो हिस्सों में बंट चुकी है। पार्टी सुप्रीमो ने एक को पार्टी दी है और
दूसरे को सरकार। पार्टी अलग जा रही है और सरकार अलग। मुलायम सिंह असहाय खड़े दोनों
को देख रहे हैं। बावजूद बातों के अभी यह मान लेना गलत होगा कि उत्तर प्रदेश
में महागठबंधन बनने वाला है। धीरे-धीरे साफ हो रहा है कि तलवार अब अखिलेश के हाथ में
है।
Sunday, November 6, 2016
क्या एनडीटीवी को एकतरफा घेरा गया?
एनडीटीवी प्रकरण को लेकर यह बात कही जा रही है कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है। उस मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता। केबल टीवी नेटवर्क्स रूल्स, 1994 में पिछले साल संशोधन करके आतंकी हमलों के समय की लाइव कवरेज को लेकर कड़ाई की व्यवस्था। इस संशोधन को लेकर भी आपत्तियाँ हैं। इसके अलावा एनडीटीवी के प्रसंग में कहा जा रहा है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके आधार पर कहा जा सके कि देश की सुरक्षा संकट में पड़ गई। इस सिलसिले में वैबसाइट द वायर ने अपने सम्पादकीय में कहा है कि ऐसी पाबंदी, भले ही एक दिन के लिए लगाई जाए, खतरनाक है और इससे राजनेताओं और उनके चुनींदा नौकरशाहों के हाथ में एक हथियार आ जाएगा। द वायर का सम्पादकीय इस सिलसिले में एक दिशा को बताता है वहीं ब्लॉग Angry Lok में अमित सेन के नाम से प्रकाशित आलेख में घटनाक्रम का विस्तार से विवरण देते हुए बताया गया है कि एनडीटीवी को दूसरे चैनलों से अलग करते हुए खासतौर से निशाना बनाया गया है। पढ़ें द वायर का सम्पादकीय और ब्लॉग Angry Log का आलेख
Ever since the chaotic and unseemly media spectacle which unfolded in downtown Mumbai during the 26/11 attacks, government managers, the courts – and journalists – have been especially mindful of the need for restraint and sensitivity in news coverage of ongoing security operations against terrorists. After the Mumbai attack ended, it emerged that some of the terrorists had planned their next moves on the basis of instructions received by telephone from handlers in Pakistan who learned about impending commando deployments from the live coverage several Indian TV channels were providing. Last year, the Modi government amended the Cable TV Network Rules, 1994, to add a new clause, 6(1) p, prohibiting TV channels from carrying content “which contains live coverage of any anti-terrorist operation by security forces, wherein media coverage shall be restricted to periodic briefing by an officer designated by the appropriate Government, till such operation concludes.”
उम्मीद की किरण है जीएसटी
लम्बे अरसे से टलती
जा रही जीएसटी व्यवस्था आखिरकार शक्ल लेने लगी है। पिछले गुरुवार को जीएसटी कौंसिल
ने आम सहमति से टैक्स की चार दरों पर सहमति कायम करके एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया
है। अब जो सबसे जटिल मसला है वह यह कि इस राजस्व के वितरण का फॉर्मूला क्या होगा।
चूंकि इसे 1 अप्रैल 2017 से लागू होना है, इसलिए यह काम जल्द से जल्द निपटाना
होगा। चूंकि इस साल बजट भी अपेक्षाकृत जल्दी आ रहा है, इसलिए यह उत्सुकता बनी है
कि यह सब कैसे होगा।
Friday, November 4, 2016
चिंता का विषय है एनडीटीवी को मिली सजा
![]() |
| एडिटर्स गिल्ड का वक्तव्य |
कुछ लोगों ने इसे विनाशकाले विपरीत बुद्धि बताया है और कुछ ने इसे इमर्जेंसी की पुनरावृत्ति कहा है. पर क्या यह राजनीतिक सवाल है? क्या एनडीटीवी को राजनीतिक कारणों से सजा दी गई है? इस किस्म की पाबंदी अच्छे लक्षण नहीं हैं. एक दिन के लिए ही सही, पर यह रोक चिंता का विषय है. पर चिंता का विषय यह भी है कि मीडिया कवरेज के कारण रक्षा से जुड़ी संवेदनशील विवरणों पर रोशनी पड़ी. मीडिया की जिम्मेदारी भी बनती है. अलबत्ता सरकार को स्पष्ट करना ही चाहिए कि वे कौन सी बातें हैं, जिनके कारण यह कदम उठाया है. मीडिया हाउस कहता है कि हमारी तरफ से गलती नहीं हुई है, पर यह तय कौन करेगा कि गलत हुआ या नहीं. लगता यह है कि चैनल अब अदालत के दरवाजे खटखटाएगा. यही सबसे अच्छा रास्ता है.
Thursday, November 3, 2016
इनोवेटिव विज्ञापन अखबारों की बिगड़ती साख के प्रतीक न बनें
नवभारत टाइम्स, दिल्ली के 3 नवम्बर के अंक में विज्ञापनदाता का जैकेट है।
जैकेट इस तरह डिजाइन किया गया है, जिससे बाहर से देखने पर अख़बार का नाम ‘न्यूट्रीचार्ज टाइम्स’ नजर आता है। अखबारों
के चलन को देखते हुए यह बात विस्मयकारी नहीं लगती, पर अखबारों की बिगड़ती साख पर
यह प्रतीकात्मक टिप्पणी जरूर है। यह कारोबार का मामला है। अखबारों में इनोवेटिव विज्ञापनों के नाम पर ऐसे
विज्ञापनों की भरमार है। इनमें कभी-कभार इनोवेशन नजर आता है, पर जो बात सबसे
ज्यादा दिखाई पड़ती है वह है विज्ञापनों को वहाँ जगह दिलाना जहाँ पहले वे नजर नहीं
आते थे। भारतीय भाषाओं के कुछ अखबारों ने अब सम्पादकीय पेज पर विज्ञापन देने शुरू
कर दिए हैं।
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