करीब एक दशक पहले नए दौर का सूत्र था नेट-साक्षरता। यानी इंटरनेट पटु होना सामान्य साक्षरता का हिस्सा बना। सिद्धांत थी कि जो इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाएगा वही सजग नागरिक है। वजह साफ थी। जीवन से जुड़ा ज्यादातर कार्य-व्यवहार इंटरनेट के मार्फत होने लगा था। इसका व्यावसायिक महत्व बढ़ा। इस तकनीक ने जीवन को पारदर्शी बनाया और लोकतंत्र को सार्थक बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया।
नेट के विस्तार के साथ-साथ कुछ अंतर्विरोधी
बातें भी सामने आई हैं, जिनके बीज पत्रकारिता के करीब चार सौ से ज्यादा वर्षों के
इतिहास में भी देखे जा सकते हैं। इसकी वजह दो बातें हैं, तकनीक और पूँजी। इंटरनेट
की सार्वजनिक जीवन में भूमिका होने के बावजूद इसका विस्तार निजी पूँजी की मदद से
हो रहा है। निजी पूँजी मुनाफे के लिए काम करती है।
सूचना-प्रसार केवल व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था है। जानकारी पाना या देना, कनेक्ट करना और जाग्रत विश्व के संपर्क में रहना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इंटरनेट के सहारे यह काम आसानी से हो सकता है।
तेज विस्तार
मोटे तौर
पर इस वक्त दुनिया भर में लगभग 6.12 अरब लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। यह
संख्या वैश्विक आबादी का लगभग 73.8 प्रतिशत है। एक दशक पहले यह संख्या करीब 3.5
अरब थी। सबसे अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं वाले देशों में चीन (लगभग 1.1 अरब) पहले
स्थान पर और भारत (95 करोड़ से अधिक) दूसरे स्थान पर है। यह संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है।
इंटरनेट
एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) के अनुसार, भारत में वर्तमान में 95 करोड़ से अधिक (लगभग
958 मिलियन) सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। इसके साथ ही भारत दुनिया के सबसे बड़े
डिजिटल बाजारों में से एक है। देश के कुल उपयोगकर्ताओं में से 57% (करीब 54.8
करोड़) लोग ग्रामीण भारत से आते हैं, जो
इंटरनेट के विस्तार को दर्शाता है।
इस
वृद्धि का मुख्य कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी का बढ़ना, एआई ) का
उपयोग,
शॉर्ट-वीडियो की खपत और ई-कॉमर्स
का तेजी से प्रसार है। डिजिटल इंडिया, भारतनेट और यूपीआई जैसी सरकारी पहलों ने देश
में इंटरनेट की पहुँच को आसान और सुलभ बनाया है।
नेट न्यूट्रैलिटी
इसका मतलब है कि इंटरनेट संपर्क का जबर्दस्त
माध्यम बनकर उभरा है। यह व्यवस्था सबको समान अवसर देने वाली होनी चाहिए, पर पूँजी
का खेल है। बेशक बाजार और पूँजी भी अंततः सार्वजनिक हितों की अनदेखी नहीं कर सकते।
ऐसे में बाजार के नियामक की जरूरत होगी, जिसे तैनात करना
राज्य की जिम्मेदारी है। उसे देखना है कि इजारेदारी कायम न होने पाए। इंटरनेट
सर्विस प्रदाता या टेलीकॉम कम्पनियाँ ऐसे गेटकीपर न बनें जो दूसरों के प्रवेश को
रोकें।
इस कारोबार ने कुछ लोगों को अपार अमीरी प्रदान
की, तो आम जनता को पारदर्शिता और जीवन में आसानी। पर यहाँ भी डिजिटल डिवाइड का
संकट है। गरीबों और अमीरों में फर्क है। सर्विस प्रोवाइडरों की इज़ारेदारी है। ऐसे
में नेट न्यूट्रैलिटी की जरूरत है। टेलीकॉम ऑपरेटर, फोन
कम्पनियाँ और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर इस स्थिति में होते हैं कि वे उपभोक्ता की
सेवा को नियंत्रित कर सकें। मसलन आपकी पहुँच किस साइट तक हो, किस स्पीड से हो और किस सेवा का क्या शुल्क वसूला जाए।
नेट न्यूट्रैलिटी उस अवधारणा का नाम है जो कहती
है कि दुनिया को सूचना और जानकारी देने तथा अभिव्यक्ति की निर्बाध स्वतंत्रता तथा
ऑनलाइन कारोबार को सहूलियत के साथ चलाने के लिए जरूरी है कि नेट तक यह पहुँच
निर्बाध और तटस्थ हो। सभी साइटों तक समान रूप से उपभोक्ता की पहुँच हो। सबकी स्पीड
समान हो और प्रति किलोबाइट-मेगाबाइट डेटा-मूल्य समान हो।
इंटरनेट कंपनियों की न तो लाइसेंसिंग जैसी कोई व्यवस्था हो और न
गेटवे हों। उन्हें किसी सेवा को न तो ब्लॉक करना चाहिए और न ही उसकी स्पीड स्लो
करनी चाहिए। वैसे ही जैसे सड़क पर हर तरह के ट्रैफिक के साथ समान बर्ताव किया जाए।
सामाजिक-प्रभाव
अब इसके
सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव पर नज़र डालें। सोशल मीडिया पर ग्रामीण क्षेत्र से
जन्मी रीलों की भरमार है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, वॉट्सएप, टेलीग्राम वगैरह पर
ग्रामीण इलाकों से निकली कहानियाँ हैं। इन्हें बनाने वाले अपने इलाके के स्टार
बनकर उभर रहे हैं। इनमें लड़कियों की संख्या भी काफी बड़ी है।
इसका
दूसरा पहलू संचार से जुड़ा है। यूट्यूब पर ऐसे चैनलों की संख्या बढ़ती जा रही है,
जो अजब-अजब विषयों पर केंद्रित हैं। सुबह से शाम तक की दिनचर्या, छोटे बच्चों, बिल्लियों
और कुत्तों की हरकतों, चुटकुलों, नर्सरी राइम्स, जैसे विषयों से लेकर राजनीति,
इतिहास, विज्ञान, तकनीक, जीवन-शैली, सिनेमा जैसे मसलों से जुड़े चैनल हैं, जिनकी
संख्या बढ़ रही है।
रायपुर
से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित तुलसी गांव को 2023
में मीडिया द्वारा भारत की‘यूट्यूब की राजधानी’का नाम दिया गया था। आंशिक रूप से पक्की
सड़कों वाले इस छोटे से गाँव को ग्रामीण डिजिटल आकांक्षा के एक आदर्श के रूप में
प्रस्तुत किया गया था, जहाँ 2018 में यूट्यूब की लोकप्रियता में उछाल से
प्रभावित होकर इसके लगभग 4,000 निवासियों में से एक चौथाई ने कंटेंट निर्माणके क्षेत्र में कदम रखा था। आज तुलसी से वह उत्साह गायब हो चुका है, पर ऐसी
कहानियाँ देश के कई इलाकों में बिखरी हैं, उसी तरह जैसे झारखंड के कुछ इलाके साइबर
क्राइम के कारण प्रसिद्ध हुए।
यह
संख्या बढ़ने का एक कारण यह भी है कि यूट्यूब ने आमदनी का नया रास्ता खोला है।
लाखों और करोड़ों कमाने वाले यूट्यूबर भी तैयार हो गए हैं। इन सफलताओं के कारण पत्रकारों,
कलाकारों, अभिनेताओं, वकीलों, राजनेताओं, इतिहासकारों और न जाने कितने किस्म के
विशेषज्ञों ने यह काम शुरू कर दिया है, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
कमाई का
रास्ता
कमाई का
यह रास्ता फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स वगैरह पर भी खुला है। अचानक फेसबुक में उन
हैंडलों की भरमार है, जो पैसा देकर अपनी पोस्ट का प्रचार करा रहे हैं। इसके पीछे
अपने विचार या रचनाओं का प्रचार है और कुछ कमाने की मनोकामना। कुछ समय पहले ये सभी
सेवाएँ निशुल्क थीं, जो अब सशुल्क पैकेज प्रदान कर रही हैं। ये लोग डिजिटल
क्रिएटर, इनफ्लुएंसर, कंटेंट क्रिएटर जैसे नामों से विभूषित हैं।
जिन्हें
इन इनफ्लुएंसरों की ज़रूरत है, वे इन्हें फीस भी देते हैं। राजनीति और कारोबार दो
ऐसे क्षेत्र हैं, जिसे प्रचार की ज़रूरत है। कौन प्रचारक है और कौन विचारक, यह तय
कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। एआई के प्रवेश ने इस संकल्पना को नए आयाम प्रदान
किए हैं। तकनीकी विकास इसे किस रास्ते पर ले जाएगा, इसकी कल्पना करना मुश्किल है।
भयावह
अमीरी
सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक
दृष्टि से इस परिस्थिति ने दो चीजें तैयार की हैं। एक है सूचना की प्रचुरता, जिसके
भीतर 90 प्रतिशत तक झूठ, ‘टिल्ट एंड ट्विस्ट ’शामिल है। दूसरे है अमीर बनने की ‘भयावह’
चाहत, यानी एफ्लुएंज़ा यानी प्रचुरता की बीमारी। भयावह शब्द का इस्तेमाल मैंने इसलिए किया है, क्योंकि इस तकनीक के मालिकों
की जीवनशैली को देखें, तो पाएँगे कि मध्ययुग के बादशाहों और सामंतों ने अपने चारों
ओर वैसा विलास-तंत्र नहीं रचा जैसा अब रचा जा रहा है। वे उस सफलता को ठीक से पचा नहीं पा रहे हैं।
इनके पास
अपने द्वीप हैं, अपने हवाई अड्डे, लक्ज़री पोत और महल हैं। काम केवल तकनीक के
बाजार को खरीदना-बेचना और राजनेताओं तथा खरबपतियों के संपर्क में रहना है। अब
ऑटोमोबाइल, एविएशन, स्टील, सीमेंट वगैरह जैसे कारोबार पीछे चले गए हैं। केवल इंटरनेट
और डिजिटल तकनीक ने दुनिया के सबसे अमीर लोगों को जन्म दिया है, जिन्होंने
सर्च इंजन, सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स
और क्लाउड कंप्यूटिंग के दम पर अरबों-खरबों की संपत्ति बनाई है।
इनमें
प्रमुख नाम जेफ बेजोस (Amazon), मार्क ज़ुकरबर्ग (Meta), लैरी
पेज (Google) और एलोन मस्क (Tesla/SpaceX) शामिल
हैं। इसकी मदद से अपनी किस्मत बदलने वाले शीर्ष अरबपतियों और खरबपतियों की एक छोटी
सी सूची पर नज़र डालें:
एलोन
मस्क (Elon Musk) इस वक्त सबसे आगे हैं, जिन्होंने इंटरनेट
आधारित वित्तीय सेवा कंपनी ‘एक्स
डॉट कॉम' (जो बाद में PayPal बनी) से
शुरुआत करके टेस्ला और स्पेसएक्स जैसी तकनीकी कंपनियों का निर्माण किया। नवीनतम
समाचार यह है कि वे दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर (खरबपति) बन गए हैं।
जेफ
बेजोस (Jeff Bezos) ने इंटरनेट की ताकत को पहचानते हुए 1994 में ‘अमेज़न'
(Amazon) की
शुरुआत की, जो दुनिया की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स और क्लाउड
कंप्यूटिंग कंपनी बन गई।
लैरी पेज
(Larry Page) और सर्गेई ब्रिन (Sergey Brin) ने स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान
1998 में 'गूगल'
(Google) की
स्थापना की। गूगल आज इंटरनेट सर्च और डिजिटल विज्ञापन का सबसे बड़ा साम्राज्य है।
गूगल के
सीईओ सुंदर पिचाई एक कर्मचारी के रूप में इस तकनीकी क्रांति का नेतृत्व करते हुए
दुनिया के शीर्ष तकनीकी अधिकारियों और अरबपतियों में शामिल हो गए हैं।
मार्क ज़ुकरबर्ग
(Mark Zuckerberg)ने 2004 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में 'फेसबुक' की
स्थापना की। आज यह कंपनी 'मेटा'
(Meta) के रूप
में फेसबुक, इंस्टाग्राम और वॉट्सएप जैसे इंटरनेट
प्लेटफॉर्म्स का संचालन करती है।
इवान स्पीगेल
(Evan Spiegel) और बॉबी मर्फी (Bobby Murphy)ने लोकप्रिय फोटो और वीडियो शेयरिंग ऐप 'स्नैपचैट' (Snapchat) बनाकर अरबों डॉलर का साम्राज्य खड़ा कर लिया।
बिल
गेट्स (Bill Gates) की पहचान माइक्रोसॉफ्ट और विंडोज़ ऑपरेटिंग
सिस्टम से है, लेकिन बाद में उन्होंने इंटरनेट और क्लाउड
सेवाओं पर विशेष ध्यान देकर अपनी संपत्ति को कई गुना बढ़ाया।
मार्क
बेनिओफ (Marc Benioff) ने 1999 में क्लाउड-आधारित सॉफ्टवेयर कंपनी 'सेल्सफोर्स' (Salesforce) की स्थापना की, जिसने
कॉर्पोरेट इंटरनेट सॉफ्टवेयर की दुनिया में क्रांति ला दी।
यह लंबी
सूची है। बेशक यह कारोबार है और इसमें सफल उद्यमियों को आगे बढ़ने का पूरा मौका
मिलता चाहिए, पर इन सफलताओं ने ऐश-अय्याशी और विलास की जिस संस्कृति को जन्म दिया
है, उसकी तरफ भी ध्यान देना चाहिए। वह भी ऐसे समय में जब दुनिया में ऐसे लोगों की
संख्या अरबों में है, जिनके पास दो जून की रोटी का इंतज़ाम नहीं है।

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