Monday, December 14, 2015

राजनीति की फुटबॉल बना समान कानून का मसला

सन 1985 में शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी ने पचास के दशक की जवाहर लाल नेहरू जैसी दृढ़ता दिखाई होती तो शायद राष्ट्रीय राजनीति में साम्प्रदायिकता की वह भूमिका नहीं होती, जो आज नजर आती है। दुर्भाग्य से समान नागरिक संहिता की बहस साम्प्रदायिक राजनीति की शिकार हो गई और लगता नहीं कि लम्बे समय तक हम इसके बाहर आ पाएंगे। इस अंतर्विरोध की शुरुआत संविधान सभा से ही हो गई थी, जब इस मसले को मौलिक अधिकारों से हटाकर नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा बनाया गया। यह  सवाल हमारे बीच आज भी कायम है तो इसकी वजह है हमारे सामाजिक अंतर्विरोध और राजनीतिक पाखंड। राजनीतिक दलों ने प्रगतिशीलता के नाम पर संकीर्णता को ही बढ़ावा दिया। यह बात समझ में आती है कि सामाजिक बदलाव के लिए भी समय दिया जाना चाहिए, पर क्या हमारे समाज में विवेकशीलता और वैज्ञानिकता को बढ़ाने की कोई मुहिम है?

पचास के दशक में नेहरू का मुकाबला अपनी ही पार्टी के हिन्दूवादी तत्वों से था। उनके दबाव में हिन्दू कोड बिल निष्फल हुआ और आम्बेडकर ने निराश होकर इस्तीफा दे दिया। उस दौर में पार्टी को दुधारी तलवार पर चलना पड़ा था। उसे यह भी साबित करना था कि उसकी प्रगतिशीलता केवल हिन्दू संकीर्णता के विरोध तक ही सीमित नहीं है। अंततः सन 1956 में हिन्दू कोड बिल भी आया। पर इससे बहुसंख्यक हिन्दू कांग्रेस के खिलाफ नहीं हुए। और न जनसंघ किसी बड़ी ताकत के रूप में उभर कर सामने आई थी।

Sunday, December 13, 2015

उल्टी भी पड़ सकती है कांग्रेसी आक्रामकता


सन 2014 के चुनाव में भारी पराजय के बाद कांग्रेस के सामने मुख्यधारा में फिर से वापस आने की चुनौती है। जिस तरह सन 1977 की पराजय के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी वापसी की थी। पार्टी उसी लाइन पर भारतीय जनता पार्टी को लगातार दबाव में लाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की इसी छापामार राजनीति का नमूना संसद के मॉनसून सत्र में देखने को मिला. संयोग से उसके बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिलीं। इस दौरान राहुल गांधी के तेवरों में भी तेजी आई है।

संसद के इस सत्र में भी कांग्रेस मोल-भाव की मुद्रा में है। पिछले हफ्ते दिल्ली हाईकोर्ट ने नेशनल हैरल्ड के मामले में जो फैसला सुनाया है, उसने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान खींचा है। सहज भाव से कांग्रेस पहले रोज से ही इस मामले में बजाय रक्षात्मक होने के आक्रामक है। देखना होगा कि क्या पार्टी इस आक्रामकता को बरकरार रख सकती है। क्या सन 2016 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को कमोबेश सफलता मिलेगी?


पहली नजर में हैरल्ड मामले में कांग्रेस पार्टी की प्रतिक्रिया न तो संतुलित है और न सुविचारित। इसके कानूनी और राजनीतिक पहलुओं पर सोचे समझे बगैर पार्टी ने पहले दिन से जो रुख अपनाया है, वह कांग्रेस के पुराने दिनों की याद दिलाता है, जब इंदिरा गांधी के खिलाफ तनिक सी बात सामने आने पर भी देशभर में रैलियाँ होने लगती थीं। पार्टी को गलतफहमी है कि संसद से सड़क तक हंगामा करने से उसकी वापसी हो जाएगी। पार्टी का अदालती प्रक्रिया को लेकर रवैया खतरनाक है। देश भूला नहीं है कि सन 1975 का आपातकाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के कारण लागू हुआ था। संयोग से सोनिया गांधी ने ‘इंदिरा की बहू हूँ’ कहकर उसकी पुष्टि भी कर दी। यह एक सामान्य मामला है तो उन्हें अदालत में दोषी ठहराया ही नहीं जा सकता। जब वे दोषी हैं नहीं तो कोई उनको फँसा कैसे देगा?

Saturday, December 12, 2015

निजी विधेयकों का रास्ता बंद क्यों?

प्रमोद जोशी

भारत की संसद
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इस साल अप्रैल में ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए क़ानून बनने की राह निजी विधेयक की मदद से खुली थी. राज्यसभा ने द्रमुक सांसद टी शिवा के इस आशय के विधेयक को पास किया.
ये विधेयक इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि लगभग 45 साल बाद किसी सदन ने निजी विधेयक पास किया था. पिछले हफ़्ते राज्यसभा में 14 निजी विधेयक पेश किए गए और लोकसभा में 30. इनमें सरकारी हिंदी को आसान बनाने, बढ़ते प्रदूषण पर रोक लगाने, मतदान को अनिवार्य करने से लेकर इंटरनेट की 'लत' रोकने तक के मामले हैं.
राज्यसभा सदस्य कनिमोझी सदन में मृत्युदंड ख़त्म करने से जुड़ा विधेयक लाना चाहती हैं जिसके प्रारूप पर अभी विचार-विमर्श हो रहा है. कांग्रेस सांसद शशि थरूर धारा 377 में बदलाव के लिए विधेयक ला रहे हैं.
शशि थरूरImage copyrightPIB
निजी विधेयक सामाजिक आकांक्षाओं को व्यक्त करते हैं और सरकार का ध्यान किसी ख़ास पहलू की ओर खींचते हैं.
जागरूकता के प्रतीक रहे भारतीय संसद के पहले 18 साल में 14 क़ानूनों का निजी विधेयकों की मदद से बनना और उसके बाद 45 साल तक किसी क़ानून का नहीं बनना किस बात की ओर इशारा करता है? क़ानून बनाने की ज़िम्मेदारी धीरे-धीरे सरकार के पास चली गई है.
निजी विधेयक क़ानून बनाने से ज़्यादा सामाजिक जागरुकता की ओर इशारा करते हैं और इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है.
भारत की संसदImage copyrightReuters
भारतीय संसद क़ानून बनाती है. शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर वह कार्यपालिका से स्वतंत्र है, पर उस तरह नहीं जैसी अमरीकी अध्यक्षात्मक प्रणाली है.
हमारी संसद में सरकारी विधेयकों के अलावा सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से विधेयक पेश करने का अधिकार है लेकिन विधायिका का काफ़ी काम कार्यपालिका यानी सरकार ही तय करती है. एक तरह से पार्टी लाइन ही क़ानूनों की दिशा तय करती है.

Wednesday, December 9, 2015

भारत-पाकिस्तान एक कदम आगे

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में एक हफ्ते के भीतर भारी बदलाव आ गया है. यह बदलाव बैंकॉक में अजित डोभाल और नसीर खान जंजुआ की मुलाकात भर से नहीं आया है. यह इस बात का साफ इशारा है कि दोनों देशों ने बातचीत को आगे बढ़ाने का फैसला किया है. यह मामला बेहद संवेदनशील है. दोनों देशों की जनता इसे भावनाओं से जोड़कर देखती है. बैंकॉक-वार्ता के गुपचुप होने की सबसे बड़ी वजह शायद यही थी. और अब कड़ी प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं. दूसरी ओर विदेशमंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान के महत्वपूर्ण नेताओं से मुलाकात भी कर चुकी हैं. सब ठीक रहा तो अब तक क्रिकेट सीरीज खेले जाने का फैसला भी सामने आ चुका होगा. यह सब काफी तेजी से हुआ है.

Sunday, December 6, 2015

अपने ही बनाए घेरे में घिरी भाजपा

जो भारतीय जनता पार्टी अस्सी के दशक में लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में हिन्दुत्व की लहरों पर सवार थी और मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा लगा रही थी, उसे सन 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिनी सरकार बनने के बाद पता लगा कि वह अकेली पड़ चुकी है। राजनीतिक दृष्टि से अछूत की श्रेणी में आ गई है। इसके बाद उसने अपने तीखे तेवरों पर ब्रेक लगाया और दोस्तों की तलाश शुरू की। जब सन 1998 में गिरधर गमंग के एक वोट से हारी तो उसने फ्लोर मैनेजमेंट पर ध्यान देना शुरू किया। असहिष्णुता के सवाल पर घेरे में आई पार्टी के लिए आज के दौर की राजनीति में भी कुछ सबक छिपे हैं, बशर्ते वह सीख ले।

Friday, December 4, 2015

पीएम मोदी की 'संत मुद्रा' के मायने क्या हैं?

प्रमोद जोशी

नरेंद्र मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसद के दोनों सदनों में दिए गए बयान उपदेशात्मक और आदर्शों से ओत-प्रोत हैं, पर उनसे वास्तविक सवालों के जवाब नहीं मिलते.
लगता नहीं कि विपक्ष इन सवालों को आसानी से भूलकर सरकार को बचकर निकलने का मौका देगा.
राज्यसभा में सीपीएम नेता सीताराम येचुरी के एक नोटिस को सभापति ने विचार के लिए स्वीकार कर लिया है.
येचुरी ने असहिष्णुता व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मुद्दे पर एक पंक्ति का यह प्रस्ताव दिया है.
देखना होगा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस प्रस्ताव को पास कराने में मदद करेंगे या नहीं. और यह भी कि इस प्रस्ताव का इस्तेमाल सरकार की निंदा के रूप में होगा या नहीं.
दोनों सदनों में प्रधानमंत्री के बयान सकारात्मक जरूर हैं, पर वे विपक्ष के भावी प्रहारों की पेशबंदी जैसे लगते हैं. प्रधानमंत्री की यह संत-मुद्रा बताती है कि वे राजनीतिक दबाव में हैं.

नरेंद्र मोदीImage copyrightPTI

मोदी जी ने किसी भी सवाल का सीधे जवाब नहीं दिया है. जबकि देश उम्मीद रखता है कि वे उन सारे सवालों के जवाब दें जो इस बीच उठाए गए हैं.
गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सम्मान वापस करने वाले लेखकों और कलाकारों से मिलने की इच्छा व्यक्त की है. गृह मंत्री के बजाय प्रधानमंत्री को ऐसा कदम उठाना चाहिए था.
दादरी में मोहम्मद अख़लाक की हत्या से देश में दहशत का माहौल बना था. उसके बाद कुछ मंत्रियों और सांसदों के बयानों से माहौल और बिगड़ा.
प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या को लेकर लेखकों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपना आक्रोश व्यक्त किया तो बजाय हमदर्दी जताने के उनकी आलोचना हुई.
इसके बाद सम्मान वापसी को देशद्रोह साबित करने की कोशिश की गई. बात-बात पर लोगों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी गई. इन बातों को बेहतर तरीके से सुलझाया जा सकता था. ऐसा हुआ नहीं.


Wednesday, December 2, 2015

The decline of the Indian Parliament

The Lok Sabha has been progressively setting aside fewer days to meet, and meeting even less on those allotted days


Photo: Hindustan Times
Photo: Hindustan Times
The Lok Sabha—the running of which rests with representatives elected by the people of India—has been in a perennial state of decline. It has been progressively setting aside fewer days to meet, and meeting even less on those allotted days. As a result, it is squabbling more and discussing less, and then trying to make up for lost time by pushing through legislation faster. Even the current majority government has failed to rewrite that script.
Parliament is convening, and sitting, for fewer days
The first Congress government in 1952 and the last Congress-led government in 2009 were both in power for about 1,800 days. But the 1952 group of MPs spent almost twice as many days in the Lok Sabha as the 2009 group. This decline has been progressive during these 57 years, across governments. Even the currenty Bharatiya Janata Party (BJP)-led government is averaging numbers similar to those of the last two Congress-led governments.
The effect is felt less in the quantity of legislation…
Measured in terms of government tenure, the number of bills being passed by Lok Sabhas in the past decade has seen a 20-40% drop over the first two. However, measured in terms of how much Parliament meets, there has not been a corresponding drop in bills passed. This suggests that the Lok Sabha is passing bills faster, raising questions about whether these pieces of legislation were adequately discussed before being cleared.
…and more in the quality of discourse that nourishes governance
Speaking in Parliament last week, Prime Minister Narendra Modi said “conversation and debates are the soul of Parliament”. That soul is under serious assault. Torn between the polarity of no work—caused by a hostile, tit-for-tat opposition—and the speedy passage of bills to make up for lost time, there’s virtually no time or inclination for discourse that richens a democracy.

Sunday, November 29, 2015

मोदी क्या कर पाएंगे समावेशी राजनीति?

संसद के शीत सत्र के पहले दो दिन की विशेष चर्चा और शुक्रवार की शाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की मुलाकात के बाद दो बातें स्पष्ट हुईं हैं। एक, भारतीय जनता पार्टी को व्यापक जनाधार बनाने के लिए अपनी रणनीति में सुधार करना होगा। इस रणनीति का आंशिक असर है कि शीत सत्र से उम्मीदें बढ़ गईं हैं। शुक्रवार को संसद में नरेन्द्र मोदी ने इस बात का संकेत दिया कि वे आमराय बनाकर काम करना पसंद करेंगे। उन्होंने देश की बहुल संस्कृति को भी बार-बार याद किया।

देखना होगा कि क्या भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कोई गुणात्मक बदलाव आने वाला है या नहीं। पार्टी को अटल बिहारी वाजपेयी के अनुभव का लाभ उठाना चाहिए। संसद में मोदी के अपेक्षाकृत संतुलित बयान और शाम को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के साथ विचार-विमर्श से अच्छे संकेत जरूर मिले हैं, फिर भी कहना मुश्किल है कि संसद का यह सत्र कामयाब होगा। अलबत्ता उम्मीद बँधी है। देशवासी चाहते हैं कि संसदीय कर्म संजीदगी से सम्पादित किया जाना चाहिए। मॉनसून सत्र का पूरी तरह धुल जाना अच्छी बात नहीं थी।

Saturday, November 28, 2015

अब गैर-भाजपा राजनीति का दौर

लोकसभा चुनाव के पहले तक देश में तीसरे या चौथे मोर्चे की अवधारणा गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा मोर्चे के रूप में होती थी, पर पछले कुछ समय से गैर-भाजपा मोर्चा बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इनमें कांग्रेस भी शामिल है। इससे दो बातें साबित होती हैं। एक- भाजपा देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई है और दूसरे भाजपा का विकल्प कांग्रेस नहीं है। धर्म निरपेक्ष राजनीति के झंडे तले तमाम क्षेत्रीय ताकतों को एक करने की कोशिश हो रही है। प्रश्न है कि कांग्रेस इस ताकत का नेतृत्व करेगी या इनमें से एक होगी? सन 2016 के विधानसभा चुनावों में इसका जवाब मिलेगा। 

सन 1962 के आम चुनाव तक भारतीय राजनीति निर्विवाद रूप से एकदलीय थी। सन 1967 में गठबंधनों का एक नया दौर शुरू होने के बावजूद 1971 तक इस राजनीति का रूप एकदलीय रहा। जो कुछ भी था एकदलीय था और विपक्ष माने गैर-कांग्रेसवाद। गैर-कांग्रेसवाद 1967 के बाद प्रचलित नारा था। पर गैर-कांग्रेसवाद का अर्थ जनसंघवाद या कम्युनिस्ट पार्टी वाद नहीं था। कोई भी पार्टी ऐसी नहीं थी, जो कांग्रेस का विकल्प बनती। इसीलिए 1977 में जब देश की जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का मन बनाया तो विकल्प एक गठजोड़ के रूप में सामने आया, जिसके पास कोई साझा विरासत नहीं थी। यह गठजोड़ दो साल के भीतर बिखर गया।

Thursday, November 26, 2015

शीत सत्र में उम्मीदों पर भारी अंदेशे!

प्रमोद जोशी

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संसद के शीतकालीन सत्र के पहले सरकार और विपक्ष ने मोर्चेबंदी कर ली है. पहले दो दिन मोर्चे पर शांति रहेगी, पर उसके बाद क्या होगा कहना मुश्किल है. फिलहाल सत्र को लेकर उम्मीदों से ज़्यादा अंदेशे नज़र आते हैं.
सरकार इस सत्र में ज़रूरी विधेयकों को पास कराना चाहती है. उसने विपक्ष की तरफ सहयोग का हाथ भी बढ़ाया है. प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय सभा में जीएसटी जैसे विधेयक को देश के लिए महत्वपूर्ण बताया है.
इधर, लोकसभा अध्यक्ष ने गरिमा बनाए रखने की आशा के साथ सांसदों को पत्र लिखा है. पर क्या इतने भर से विपक्ष पिघलेगा?
मॉनसून सत्र पूरी तरह हंगामे का शिकार हो गया. लोकसभा में कांग्रेस के 44 में से 25 सदस्यों का निलंबन हुआ. इस बार तो बिहार विधानसभा चुनाव में जीत से विपक्ष वैसे भी घोड़े पर सवार है.
सत्र के पहले दिन 'संविधान दिवस' मनाया जाएगा. सन 1949 की 26 नवंबर को हमारे संविधान को स्वीकार किया गया था. देश में इस साल से 'संविधान दिवस' मनाने की परंपरा शुरू की जा रही है.
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Image captionफिल्म अभिनेता आमिर ख़ान के बयान के बाद असहनशीलता पर फिर बहस तेज़ हो गई है
इस साल डॉ. भीमराव आंबेडकर की 125वीं जयंती भी है. सत्र के पहले दो दिन संविधान-चर्चा को समर्पित हैं. यानी शेष संसदीय कर्म सोमवार 30 नवंबर से शुरू होगा.
असहिष्णुता को लेकर जो बहस सड़क पर है, वह अब संसद में प्रवेश करेगी. यहाँ बहस किस रूप में होगी और उसका प्रतिफल क्या होगा यह देखना ज़्यादा महत्वपूर्ण है. ख़ासतौर से राज्यसभा में जहाँ सरकार निर्बल है.
सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने राज्यसभा और कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा में असहिष्णुता पर चर्चा का नोटिस दिया है. येचुरी चाहते हैं कि नियमावली 168 के तहत इस पर चर्चा हो और सदन 'देश में व्याप्त असहिष्णुता के माहौल की निंदा का प्रस्ताव' पास करे.
देखना होगा कि पीठासीन अधिकारी किस नियम के तहत इस विषय पर चर्चा को स्वीकार करते हैं. फिलहाल सरकार घिरी हुई है. सम्मान वापसी ने उसकी छवि को पहले से बिगाड़ रखा है.

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Wednesday, November 25, 2015

संसद में दिखाई पड़ता है राजनीति का श्रेष्ठ और निकृष्ट

संसद का शीत सत्र कल से शुरू हो रहा है और कल ही देश पहली बार अपना संविधान दिवस मनाएगा. सन 1949 में 26 नवम्बर को हमारा संविधान स्वीकार किया गया था, जिसे 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया था. इस साल हम देश भर में संविधान से जुड़े कार्यों को देखेंगे. इस साल डॉ भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती भी मनायी जा रही है. इन दिवसों की औपचारिकताओं के साथ यह देखने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है हमारे लोकतंत्र के सिद्धांत और व्यवहार में किस तरह की विसंगतियाँ हैं. समाज के श्रेष्ठ और निकृष्ट दोनों इसी राजनीति में है. इसकी एक परीक्षा संसद के सत्रों में होती है. इसमें दो राय नहीं कि भारतीय संसद समय की कसौटी पर खरी उतरी है, पर अफसोस के मौके भी आए. इस साल संसद का शीत सत्र शोर-शराबे का शिकार रहा. उससे हमारे लोकतंत्र के आलोचकों को मौका मिला. चुनौती यह साबित करने की है कि राजनीति घटिया काम नहीं है.

Sunday, November 22, 2015

खांटी राजनेता बनकर उभरे केजरीवाल..?

प्रमोद जोशी



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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ट्विटर प्रोफाइल पर उनका सूत्र वाक्य लिखा है, ‘भारत जल्दी बदलेगा.’ आंदोलनकारी नेता से खांटी राजनेता के रूप में उनका तेज़ रूपांतरण उनके सूत्र वाक्य की पुष्टि करता है.
पिछले दो साल में केजरीवाल ने अपनी राजनीति और अपने सहयोगियों को जितनी तेज़ी से बदला है वह उनकी परिवर्तनशील-प्रतिभा का प्रतीक है.
मीडिया कवरेज के मुताबिक पटना में महागठबंधन सरकार के शपथ-समारोह में अरविंद केजरीवाल को बेमन से लालू यादव के गले लगना पड़ा.
व्यावहारिक बात यह है कि केजरीवाल लालू से गले मिले और यह जाहिर करने में कामयाब भी रहे कि चाहते नहीं थे... इस बीच सोशल मीडिया पर केजरीवाल के कुछ पुराने ट्वीट उछाले गए जिनमें उन्होंने लालू की आलोचना की थी. पर उससे फर्क क्या पड़ता है?

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मोदी-विरोधी राजनीति के साथ केजरीवाल ने अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ाए हैं. बिहार में महागठबंधन की विजय इसका पहला पड़ाव है और पटना में केजरीवाल की उपस्थिति पहला प्रमाण.
केजरीवाल मोदी-विरोधी ताकतों के साथ आगे बढ़ना और शायद उसका नेतृत्व भी करना चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने वाराणसी से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा था.
केन्द्र से टकराव का नया बिन्दु अब वे दिल्ली जन लोकायुक्त विधेयक को बनाएंगे. उनके कैबिनेट ने हाल में विधेयक के प्रारूप को स्वीकार किया है.
फरवरी 2014 में उनके कैबिनेट ने इसी तरह का विधेयक मंजूर किया था. उसे विधान सभा में रखे जाने के पहले ही उप राज्यपाल ने आपत्ति व्यक्त की थी कि उनसे स्वीकृति नहीं ली गई है. अब भाजपा के सूत्रों का कहना है कि सरकार ने उप राज्यपाल से मंजूरी नहीं ली है.

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आम आदमी पार्टी के सूत्रों का कहना है कि यह विधेयक उत्तराखंड के 2011 के क़ानून जैसा है. उस बिल को तैयार करने में केजरीवाल का हाथ बताया गया था. यह बात केन्द्र सरकार को असमंजस में डालेगी. क्या भाजपा सरकार ऐसे कानून का विरोध करेगी?
उप राज्यपाल की अनुमति के संदर्भ में भी परिस्थितियाँ फरवरी 2014 जैसी हैं. फर्क केवल यह है कि विधानसभा में पार्टी का भारी बहुमत है. बिल पास होने के बाद उप राज्यपाल उसे स्वीकार करें या न करें, वह टकराव का बिन्दु बनेगा.
केजरीवाल की राजनीति भीतरी और बाहरी टकरावों की मदद से बढ़ रही है. कुछ महीने पहले पार्टी के भीतर पहला टकराव इस बात को लेकर हुआ था कि दिल्ली के बाहर दूसरे राज्यों में जाना चाहिए या नहीं.

संसदीय भूमिका पर भी बहस होनी चाहिए

संसद का शीत सत्र इस हफ्ते शुरू होगा। हमारी राजनीति में चुनाव और संसदीय सत्र दो परिघटनाएं राजनीतिक सरगर्मियों से भरी रहती है। दोनों ही गतिविधियाँ देश के जीवन और स्वास्थ्य के साथ गहरा वास्ता रखती हैं। चुनाव और संसदीय कर्म ठीक रहे तो काया पलटते देर नहीं लगेगी। पर दुर्भाग्य से देश की जनता को दोनों मामलों में शिकायत रही है। चुनाव के दौरान सामाजिक अंतर्विरोध और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप चरम सीमा पर होते हैं और संसदीय सत्र के दौरान स्वस्थ बहस पर शोर-शराबा हावी रहता है।

पिछले मॉनसून सत्र में व्यापम घोटाला और ललित मोदी प्रसंग छाया रहा। इस वजह से अनेक सरकारी विधेयक पास नहीं हो पाए। दोनों प्रसंग महत्वपूर्ण थे, पर दोनों मसलों पर बहस नहीं हो पाई। उल्टे पूरे सत्र में संसद का काम ठप रहा। यह पहला मौका नहीं था, जब राजनीति के कारण संसदीय कर्म प्रभावित हुआ हो। अलबत्ता राजनीतिक दलों से उम्मीद की जानी चाहिए कि उन्हें अपनी राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों का अंदाज भी होता होगा। इस हफ्ते शीत सत्र शुरू होने के पहले सर्वदलीय बैठक होगी। बेहतर हो कि सभी पार्टियाँ कुछ बुनियादी बातों पर एक राय कायम करें। कांग्रेस के नेता आनन्द शर्मा ने कहा है, ‘विधेयक हमारी प्राथमिकता नहीं है। देश में जो हो रहा है उसे देखना हमारी प्राथमिकता है। संसदीय लोकतंत्र केवल एक या दो विधेयकों तक सीमित नहीं हो सकता।’

Saturday, November 21, 2015

गठबंधन-चातुर्य और राजनीति का महा-मंथन

इस साल संसद का मॉनसून सत्र सूखा रहा। पूरे सत्र में सकारात्मक संसदीय कर्म ठप रहा। अब शीत सत्र सामने है। इसमें क्या होने वाला है? सरकार क्या अपने विधेयकों को पास करा पाएगी? क्या वह भारतीय राजनीति के ज्वलंत सवालों का ठीक से जवाब देगी? दूसरी ओर सवाल यह भी है कि क्या विपक्ष एक होकर किसी नई राष्ट्रीय ताकत को तैयार करेगा? बिहार विधान सभा के चुनाव परिणामों से उत्साहित विपक्ष क्या अपनी एकता को संसद में भी साबित करेगा? भाजपा-विरोधी इस राजनीति का नेतृत्व कौन करेगा? यह एकता क्या भविष्य के विधान सभा चुनावों में भी देखने को मिलेगी? 

बिहार-परिणाम के विश्लेषक अब भी इस गुत्थी से उलझे पड़े हैं कि भाजपा की पराजय के पीछे महागठबंधन का जातीय-साम्प्रदायिक गणित था या उसकी असहिष्णु राजनीति। भविष्य की राजनीति का रिश्ता इस सवाल से जुड़ा है। और पूरे देश की राजनीति सोशल इंजीनियरी से जुड़ी है। इस जातीय गणित की अगली महा-परीक्षा अब 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव में होगी। महागठबंधन बिहार की परिस्थितियों से मेल खाता था। देखना होगा कि दूसरे राज्यों में वह किस रूप में बनेगा। और यह भी कि उसका नेतृत्व कौन करेगा?   

बिहार में एनडीए की विफलता और महागठबंधन की सफलता से कांग्रेस प्रफुल्लित जरूर है, पर आने वाले समय में उसके सामने नेतृत्व की चुनौती खड़ी होगी। अब वह जमाना नहीं रहा जब शेर के नेतृत्व में जंगल के सारे जानवर लाइन लगाकर चलते थे। अब सबकी महत्वाकांक्षाएं हैं। जेडीयू का नेतृत्व नीतीश कुमार को नए राष्ट्रीय नेता के रूप में खड़ा करना चाहता है। नीतीश कुमार का शपथ ग्रहण समारोह इसीलिए विपक्ष की एकता के महा-सम्मेलन जैसा बन गया। पर उसके अंतर्विरोध भी छिपे हैं। महागठबंधन के आलोचकों को लालू-नीतीश दोस्ती की दीर्घायु को अब भी लेकर संदेह है।
बिहार में महागठबंधन बनाने में नीतीश कुमार की कोशिशों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। पर जेडीयू की निगाह गैर-कांग्रेस विपक्ष पर है। पार्टी के महासचिव केसी त्यागी ने हाल में कहा है कि जदयू, तृणमूल और आम आदमी पार्टी कई मुद्दों पर समान विचारों वाले हैं और देश में सहयोगात्मक संघवाद को मजबूत करने का समय आ गया है। इस संघवाद को जोड़ने लायक लम्बा धागा कांग्रेस या भाजपा के पास ही है। अतीत में इसमें वाम मोर्चा की भूमिका रही है, जो अभी पृष्ठभूमि में है। वामपंथी सामने आए तो इस मोर्चे के अंतर्विरोध मुखर होंगे।

Friday, November 20, 2015

जेहादियों को फ्रांस का अनोखा जवाब

एक हफ्ते पहले पेरिस में हत्याकांड हुआ, जिसके जवाब में देश के राष्ट्रपति ने आईसिस के खिलाफ युद्ध की घोषणा की. अगले रोज उसकी वायुसेना ने सीरिया के ठिकानों पर हमले तेज कर दिए. हमले में शामिल लोगों को पहचानने की कार्रवाई तेज कर दी गई और बुधवार को इस हमले के मास्टरमाइंड का खात्मा कर दिया गया. हमलों के बाद फ्रांस में तीन दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई. पेरिस की मेयर ऐन हिडाल्गो ने कहा है कि शहर ने चरमपंथ की बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है. हमलावरों ने उन जगहों को निशाना बनाया जहां सप्ताहांत में युवा जाते हैं. उन्होंने बाद में घोषणा भी की कि हमें इस गलीज संस्कृति से नफरत है.