रंगों की बौछार से कड़वाहटों को भुलाने का मौका
होली रंगों का त्योहार है, पर केवल रंग उड़ाने या मौज मस्ती तक सीमित नहीं है। अवध के इलाके में परंपरा है कि होली के बाद सब एक-दूसरे के गले मिलते हैं। यह क्रम करीब एक पखवाड़े तक चलता है। हरेक परिवार अपने पड़ोस के हरेक घर में होली मिलने जाता है। पड़ोसी उनके घर आते हैं। यह क्रम एक पखवाड़े से ज्यादा समय तक चलता है। ऐसी परंपराएँ होली को सामाजिक मेलजोल का सबसे बड़ा त्योहार बनाती हैं। पूरे देश में ऐसा ही कुछ किसी न किसी रूप में और किसी न किसी परंपरा के साथ होता है।
यह कई दिन चलने वाली गतिविधि है, जो चार महीनों
की ठंडक के कारण जड़ीभूत निष्क्रियता को तोड़ने का काम करती है। पूरे देश के अलग-अलग
हिस्सों में इससे जुड़ी रोचक परंपराएँ हैं, जो केवल रंग बिखरने से ही नहीं जुड़ी
है। इसके साथ खान-पान, संगीत, दस्तकारी और लोक कलाओं की जबर्दस्त परंपराएँ जुड़ी
हुई हैं। होली के रंग ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति और धर्म के
बंधनों को तोड़कर, वैर-भाव भूलकर सभी को समान धरातल पर लाते हैं। यह पर्व सामाजिक
सद्भाव और दोस्ताना समाज की स्थापना करता है।
वसंत पंचमी से ही फाग और धमार का गाना प्रारंभ
हो जाता है। प्रकृति भी इस समय खिली हुई होती है। सरसों के पीले फूल धरती को रंग
देते हैं। गेहूँ की बालियाँ निकल आती हैं। आम पर बौर फूलने लगते हैं। किसान खुश
होकर गीत गाते हैं। यह त्योहार सभी पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाता है, जाति, पंथ और उम्र की बाधाओं को पार करते हुए एकता
और समुदाय की भावना को बढ़ावा देता है। क्षमा और मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करता
है। खुशी की बेलाग अभिव्यक्ति और कड़वाहटों को भुलाने का दिन।
सबसे पुराना त्योहार
जब हम इसके इतिहास पर जाते हैं, तब पता लगता है कि यह देश के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों में इस पर्व का प्रचलन था। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ से प्राप्त ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में होली मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गाहय-सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। सातवीं शताब्दी के राजा हर्ष ने अपनी रचना 'रत्नावली' में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है।




