शेख हसीना के अपदस्थ होने के 18 महीने बाद, बांग्लादेश में जन-प्रतिनिधि सरकार की स्थापना हो गई है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत के बाद अब वहाँ स्थिरता की उम्मीदें हैं.
आम चुनाव के
साथ संवैधानिक-सुधारों के लिए जनमत संग्रह भी हुआ है. तमाम बदलावों को जनता ने स्वीकार
कर लिया है, पर असल सवाल है कि वास्तव में बांग्लादेश का लोकतंत्र कैसा होगा? वहाँ क्या शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की
व्यवस्था कायम हो पाएगी?
नए सांसदों ने शपथ ले ली है, लेकिन संवैधानिक
सुधार परिषद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई है
क्योंकि बीएनपी सदस्यों ने सांसदों के रूप में शपथ तो ले ली, लेकिन प्रस्तावित परिषद के सदस्यों के रूप में
शपथ नहीं ली. उन्होंने कहा कि संविधान में इस परिषद के लिए पद की शपथ लेने का कोई
प्रावधान नहीं है.
यह सब मुहम्मद
यूनुस की अस्थायी सरकार की देखरेख में हुआ, जो अपनी घोषणाओं
के बावज़ूद बढ़ते
सांप्रदायिक उन्माद और आर्थिक बदहाली को रोक नहीं पाई. भारत से रिश्ते बिगाड़ने
में भी उसने कसर नहीं छोड़ी.
दक्षिण एशिया में समावेशी-आधुनिकता और संकीर्ण सांप्रदायिक-प्रवृत्तियों का टकराव बड़ी समस्या है. भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में होने वाली घटनाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. तीनों के साझा अतीत में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों बातें हैं.
परंपरागत
राजनीति
सबसे बड़ी बात
है कि जनता ने बीएनपी के रूप में परंपरागत राजनीति को ही स्वीकार कर लिया है. 2024
की बगावत के सूत्रधारों यानी नेशनल सिटिजंस पार्टी और जमात-ए-इस्लामी को सत्ता नहीं
सौंपी, जिन्होंने गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा.
शेख हसीना पर
तानाशाही के आरोप हैं, पर बीएनपी भी दूध की धुली पार्टी नहीं है, उस पर भी
भ्रष्टाचार के आरोप हैं. फिर भी वोटर ने उस पर भरोसा किया. क्या वह कट्टरपंथी
ताकतों के उभार पर रोक लगा सकेगी?
पूर्व प्रधानमंत्री
खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान, रिश्वतखोरी और
भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण 2008 से निर्वासन में थे. शेख हसीना के पलायन के बाद
वे देश में आए हैं. अदालतों ने बड़ी तेजी से उन्हें सभी आरोपों से मुक्त भी कर
दिया. और वे अब देश के प्रधानमंत्री हैं.
अंतरिम सरकार
ने सबसे बड़ी पार्टी, अवामी लीग को चुनाव से बाहर कर दिया, पर अब देखना होगा कि बीएनपी
सरकार उसकी वापसी होने देती है या नहीं. शेख हसीना को तानाशाह के रूप में देखा गया
और ज्यादातर पर्यवेक्षक मानते हैं कि उनकी मनमानी उनके पतन का कारण बनी.
क्या अब अवामी
लीग को समाप्त मान लें? नहीं, उसकी जड़ें काफी गहरी हैं. वह आसानी से समाप्त नहीं
होगी. इसके पहले भी वह ऐसी ही परिस्थितियों से लड़ते हुए वापसी कर चुकी है. उसके
भीतर भी अंतर्मंथन चल रहा है.
भारत-पाकिस्तान
नए
सत्ताधारियों की परीक्षा भारत और पाकिस्तान के प्रति उनकी नीतियों से भी होगी.
अतीत में बीएनपी के पाकिस्तान के प्रति झुकाव और भारत के प्रति संदेह को देखते हुए, यह सवाल कम महत्त्वपूर्ण नहीं है.
अवामी लीग और
बीएनपी की आपसी प्रतिद्वंद्विता बांग्ला राजनीति की बुनियाद में है. बीएनपी से
भारत की दूरी के पीछे एक बड़ा कारण अवामी लीग के प्रति भारत का झुकाव था.
बीएनपी का उभार
बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद 1978 में जनरल जियाउर्रहमान द्वारा
इस पार्टी की स्थापना के बाद हुआ था. 15 अगस्त, 1975 को शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद 1977 में जनरल जिया सत्ता में आए
थे.
1979 में जनरल ज़िया
ने चुनाव कराया, जिसमें उनकी नवगठित पार्टी ने बहुमत
हासिल किया. उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा चला नहीं. 1981 में एक और तख्तापलट में उनकी
हत्या कर दी गई, और जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद के हाथ में सत्ता की बागडोर आ गई. इन
सभी प्रसंगों के केंद्र में पाकिस्तान के साथ रिश्ते भी थे.
धर्मनिरपेक्षता
जनरल ज़िया के
कार्यकाल में देश ने धर्मनिरपेक्ष रुझान को त्याग दिया. हालाँकि 1971 में उन्होंने
भी देश की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी थी, पर उनकी सरकार ने बजाय
भारत के, पाकिस्तान के साथ संबंध-सुधार का निश्चय किया.
एक दशक बाद, जब देश में फौजी शासन खत्म हुआ, तब उनकी पत्नी खालिदा
जिया ने सत्ता संभाली. इस दौरान जनरल इरशाद के शासनकाल में भी बांग्लादेश
धर्मनिरपेक्षता से कुछ और दूर चला गया था. 1988 में इस्लाम को ‘राज्य-धर्म’ घोषित किया गया.
ऐसा लगता है कि
इस बार के चुनाव में देश की हिंदू आबादी ने अवामी लीग की अनुपस्थिति में बीएनपी का
साथ दिया है. क्या बीएनपी उसके रक्षक की भूमिका निभाएगी? हिंदू आबादी के साथ उसका व्यवहार कैसा रहेगा, जो 1981 में 12 प्रतिशत से
घटकर आज लगभग 8 प्रतिशत हो गई है.
बीएनपी बहुसंख्यक
आबादी की उस धार्मिकता का पल्लू भी नहीं छोड़ेगी, जो बांग्लादेश की राजनीति की एक
विशेषता के रूप में उभरी है. उसकी तुलना में अवामी लीग धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में
ज्यादा दृढ़ता से खड़ी थी.
अवामी लीग का भविष्य
हाल में जब बीएनपी से पूछा गया कि लोकतंत्र की बहाली
के तहत वे अवामी लीग को क्या फिर से राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने का समर्थन
करेंगे, तो वरिष्ठ नेता महमूद चौधरी ने कहा, ‘यह फ़ैसला हमारा नहीं है.’
अवामी लीग को बांग्लादेश की चुनावी प्रक्रिया
में वापस आने में समय लगेगा, क्योंकि उनकी विश्वसनीयता
सवालों के घेरे में है. काफी कुछ वहाँ की जनता पर निर्भर करेगा.
इस समय उसके दल के प्रति जनता के मन में गुस्सा
है, लेकिन बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए,
अवामी लीग को हमेशा के लिए ख़त्म मान लेना भी जल्दबाज़ी होगी.
भारत से
रिश्ते
भारत सरकार को
परिस्थितियों का अनुमान है. चुनाव-परिणाम आने के पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने कुछ सोचकर ही तारिक रहमान से टेलीफोन पर बात की और चुनावों में उनकी जीत
पर बधाई दी.
तारिक रहमान ने
भी कहा कि उन्हें नरेंद्र मोदी से बात करके बहुत खुशी हुई. पिछले साल के अंत में जब
तारिक रहमान की माता खालिदा जिया का निधन हुआ था, तब विदेशमंत्री एस जयशंकर उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए ढाका गए थे.
बेशक अवामी लीग
के रूप में बांग्लादेश में भारत की मित्रवत सरकार थी, पर नई सरकार की अनदेखी नहीं का जा सकती विदेश-नीति में राष्ट्रीय हित
सर्वोपरि होते हैं. भारत, राष्ट्रीय हितों को ही ऊपर रखेगा.
मोहम्मद यूनुस की सरकार की तुलना में बीएनपी की
सरकार के तौर-तरीके फर्क होंगे, पर संबंधों को सुधारना उतना आसान नहीं होगा, जितना
पहली नज़र में लगता है. वैसे भी भारत के साथ उनके रिश्ते उतने अच्छे नहीं रहेंगे,
जितने शेख हसीना की सरकार के साथ थे.
भारत इतना बड़ा पड़ोसी है कि उसे पूरी तरह से
दरकिनार नहीं किया जा सकेगा. बांग्लादेश को भी हमारी ज़रूरत है.
चीन का प्रभाव
समाचार एजेंसी रायटर्स का विश्लेषण है कि
बांग्लादेश पर चीन का प्रभाव बढ़ेगा, पर वह कब नहीं था? चीनी राजदूत याओ वेन को
अक्सर बांग्लादेशी राजनेताओं, अधिकारियों और पत्रकारों से
मिलते देखा जाता है.
अरबों डॉलर की बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को
लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग चल ही रहा है. इसमें रक्षा-सामग्री से जुड़ा सहयोग
भी शामिल है.
माना जाता है कि शेख हसीना को अपदस्थ करने के
पीछे पश्चिमी शक्तियों का हाथ भी था. संभवतः तारिक रहमान को पश्चिम का समर्थन मिलेगा.
क्या अमेरिका को चीन के प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार पसंद आएगा?
हसीना फैक्टर
बीएनपी की खालिदा ज़िया और शेख हसीना के बीच
प्रतिद्वंद्विता चलती थी, जिसमें भारत का झुकाव शेख हसीना के पक्ष में रहता था, पर
अब बेगम ज़िया हैं नहीं और हसीना देश से बाहर हैं.
अपने पहले
संवाददाता सम्मेलन में विदेश-नीति से जुड़े सवालों के जवाब में तारिक रहमान ने कहा, देश की जनता के उनके हितों को ध्यान में रखते हुए
विदेश नीति तय करेंगे. उसी समय पार्टी की स्थायी समिति के सदस्य अमीर खसरू महमूद
चौधरी ने कहा, हमारी विदेश-नीति किसी एक देश के प्रति
वफादारी पर नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, समानता और विश्वास पर आधारित होगी.
तारिक रहमान के
विदेशी मामलों के सलाहकार हुमायूँ कबीर ने ‘द हिंदू’ से एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि भारत
को ‘अतीत से नाता तोड़ना’ चाहिए. यह भी कहा कि भारत में सांप्रदायिक
घटनाएं बांग्लादेश के लिए ‘चिंता का विषय’ हैं.
शेख हसीना और अवामी लीग के वरिष्ठ नेताओं और
कार्यकर्ताओं की भारत में मौजूदगी चुनौती बनेगी. हसीना के प्रत्यर्पण के अलावा,
गंगा और तीस्ता के जल-बँटवारे,
सीमा पर हत्याएँ, अदानी विद्युत-समझौता और
कनेक्टिविटी और पारगमन दोनों देशों के बीच कुछ जटिल मुद्दे हैं.
1996 में हुई
गंगाजल-संधि का नवीनीकरण इस साल दिसंबर तक होना है. बीएनपी सरकार बनने के बाद, संधि का नवीनीकरण द्विपक्षीय वार्ता की मेज पर
होगा.
भारत सरकार चाहेगी कि बांग्लादेश से होने वाली भारत-विरोधी
गतिविधियों पर लगाम लगे. 2001-2006 जब में बीएनपी-जमात का गठबंधन सत्ता में था,
तब भारत को बांग्लादेश की धरती से आतंकवाद का संचालन होता था, जिसके
कारण अविश्वास का बीजारोपण हुआ था.
पाकिस्तानी
उम्मीदें
जिस तरह भारत
को बांग्लादेश की विदेश-नीति की आस है, उसी तरह पाकिस्तान को भी कई उम्मीदें हैं.
कुछ समय से वे दक्षिण एशिया में बांग्लादेश और चीन के सहयोग से एक नए गठबंधन की
परिकल्पना कर रहे हैं.
उत्साही
पाकिस्तानी विश्लेषक मानते हैं कि दोनों देशों का ऐसा रक्षा-समझौता हो सकता है,
जिसमें एक पर हुआ हमला दूसरे पर माना जाएगा. यह सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए
समझौते जैसा हो सकता है. तुर्की को भी इसमें शामिल किया जा सकता है.
अंतरिम सरकार ने
दक्षेस को फिर से सक्रिय करने की बात कही थी, जो प्रकारांतर से पाकिस्तान को इस
इलाके में ज्यादा बड़ी भूमिका देने का विचार है.
फिर भी पाकिस्तान
के कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि नई सरकार, भारत से रिश्ते नहीं तोड़ेगी. 2021 में
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के सत्ता में आने पर पाकिस्तान उत्साहित था, लेकिन
समय बीतने के साथ, दोनों देशों के संबंध ठंडे पड़ गए. वहीं अफगान
तालिबान ने भारत के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित कर लिए हैं.
बांग्लादेश में
कोई भी सरकार भारत के साथ अपने संबंधों को खराब नहीं करेगी, क्योंकि उसके तमाम
आर्थिक और सामरिक-हित भारत के साथ जुड़े हैं, पाकिस्तान के साथ नहीं. बांग्लादेश
की भारत के साथ लंबी सीमा है और बंगाल की खाड़ी में भारत का दबदबा है.
जनमत संग्रह
आम चुनाव के साथ बांग्लादेश में कुछ प्रश्नों पर
जनमत संग्रह भी हुआ, जिसे जनता की स्वीकृति मिल गई. इसे ‘जुलाई
नेशनल चार्टर’ नाम से जाना गया, जो वस्तुतः संविधान में बदलाव और
राजनीतिक सुधारों का पैकेज है. 1971 के बाद से यह चौथा ऐसा जनमत संग्रह है जो देश
के इतिहास में हुआ है.
इस बार के जनमत संग्रह में मतदाताओं से पूछा गया
कि क्या वे ‘जुलाई नेशनल चार्टर’ के तहत प्रस्तावित 48 बड़े संवैधानिक सुधारों के
पक्ष में ‘हैं’ या ‘नहीं’. इनमें शासन व्यवस्था, चुनाव प्रणाली, निष्पक्ष चुनावों के प्रावधान, न्यायपालिका की शक्ति,
महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने जैसे बदलाव शामिल हैं.
68 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने ‘हाँ’ में वोट किया, यानी वे प्रस्तावित संविधान-सुधारों
के पक्ष में हैं.
·
नव निर्वाचित संसद, परिवर्तनों को लागू करने के लिए
संविधान सभा के रूप में कार्य करेगी.
·
जनता ने संविधान में बड़े सुधारों को स्वीकार
किया—जैसे चुनावों को और अधिक निष्पक्ष बनाना, प्रधानमंत्री के कार्यकाल पर
सीमा लगाना, एक नए उच्च सदन का गठन, न्यायपालिका और चुनावी संस्थाओं को मजबूत करना आदि.
·
पिछले कुछ वर्षों में हुई राजनीतिक हलचल को देखते हुए ये
बदलाव देश की राजनीति में नया अध्याय शुरू करेंगे.

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