गत 8 जून को ‘इंडिया’ गठबंधन ने पाँच-सूत्री प्रस्ताव पारित किया, जिसमें एक यह भी है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा जाएगा। यह गठबंधन ‘एसआईआर’ को ‘वोट चोरी’ मानता है। इसके कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘एसआईआर’ को लेकर चुनाव-आयोग को क्लीन-चिट दी है। प्रश्न है कि ऐसे में पत्र लिखने से मिलेगा क्या? यह व्यक्तिगत मसला नहीं है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कहना है,
हम इसे ‘वोट लूट’ की कोशिश मानते हैं। भारत में घुसपैठ और नागरिकता रजिस्टर पिछले
कई दशकों से बहस में हैं और यह बहस अब मतदाता सूची की बहस के साथ जुड़ गई है। ‘एसआईआर’ के देश में दो दौर हो चुके हैं और तीसरा शुरू हो गया है। पहला दौर
मुख्यतः बिहार-केंद्रित था, जो जून से सितंबर 2025 तक चला। 27 अक्तूबर से दूसरा
दौर शुरू हुआ, जिसमें उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल समेत, नौ राज्य और तीन
केंद्र-शासित क्षेत्र शामिल थे।
गत 14 मई को निर्वाचन आयोग ने ‘एसआईआर’ के तीसरे दौर की भी घोषणा कर दी, जिसमें सोलह राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों को कवर किया गया है। इसके पूरा होने के बाद जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश को छोड़कर पूरे देश में यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इसके साथ इस प्रक्रिया से जुड़ी बहस नए सिरे से शुरू होगी, जिसकी अनुगूँज संसद के मॉनसून सत्र में सुनाई पड़ेगी।
शिकायतें पहले दौर के पहले से ही थीं, पर पश्चिम
बंगाल का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक गया। इस दौर में करीब 27 लाख वोटरों ने अपने नाम कटने
को चुनौती दी। वे विधानसभा चुनाव में वोट नहीं दे पाए, क्योंकि उनकी सुनवाई के लिए
नियुक्त न्यायाधिकरण इस काम को पूरा नहीं कर पाए। यह काम चुनाव परिणाम आने के बाद
भी चल ही रहा है। इन 27 लाख में 60 प्रतिशत से ज्यादा वोटरों की सूची में वापसी हो
चुकी है और अंतिम समाचार मिलने तक न्यायाधिकरणों की प्रक्रिया जारी है।
सवाल है कि इस मामले को दुरुस्त करने के लिए नागरिक-प्रशासन
पर राज्य सरकार ने भरोसा क्यों नहीं किया? अदालती-प्रक्रिया
में समय लगता ही है। चुनाव-आयोग की व्यवस्था है कि ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ के कारण कोई नाम ‘अनमैप्ड’ रह जाए, तो एक सूची में वर्णित दस्तावेज़ों में से कोई एक देकर अपने नाम
को बनाए रखा जा सकता है। पर बंगाल में अविश्वास इतना गहरा था कि उस रास्ते पर जाने
के बजाय लंबे रास्ते को अपनाया गया, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में लोग वोट नहीं दे
पाए।
कई तरह के सवाल सभी पक्षों से हैं। आयोग ने सूची
के गहन-संशोधन के लिए पर्याप्त समय क्यों नहीं दिया? 2002
और 2003 की मतदाता सूचियों तक पहुँच पाना आसान काम नहीं है। पुरानी सूचियाँ जिस
तरीके से बनाई गईं हैं, उनमें नाम, पते और वोटर कार्ड की संख्या खोजना खासा
मुश्किल काम है। सामान्य नागरिक कागज-पत्तरों के आदी नहीं हैं, उनके लिए यह
प्रक्रिया आसान नहीं है।
देश की आम जनता
दस्तावेजों की अभ्यस्त नहीं है। ‘लॉजिकल
डिस्क्रिपेंसी’ को दूर करने के लिए दस्तावेज़ों को भी
आसान बनाने की ज़रूरत है। वोटर को पुरानी सूची में अपना नाम खोजने में दिक्कत होती
है। उसकी मदद की जानी चाहिए। आयोग की वैबसाइट को सरल बनाने और इस काम को करने वाले
बीएलओ को बेहतर तरीके से तैयार करने की ज़रूरत भी है।
विरोधी-दलों ने इसे ‘वोट चोरी’ साबित करते हुए, राजनीतिक
सवाल बनाया। चुनाव-आयोग, उसकी प्रक्रिया और ईवीएम की साख पर लगातार हमले हो रहे
हैं। इस बात को उन्हें सुप्रीम कोर्ट में साबित करना होगा। जब उन्हें विजय मिलती
है, तब वे सवाल करते, क्यों नहीं करते? दिसंबर में लोकसभा में
चुनाव-सुधारों पर हो रही बहस के दौरान एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा,
'मैं इसी मशीन से चुनकर आई हूं, इसलिए मैं ईवीएम
या वीवीपैट पर सवाल नहीं उठाऊँगी।'
सवाल हैं भी, तो उन्हें या तो आयोग और या फिर
सुप्रीम कोर्ट में उठाना चाहिए। पर अब तो अदालती फैसलों पर भी संदेह पैदा किया
जाता है। कहा जा रहा है कि आयोग को ‘एसआईआर’ कराने का अधिकार है ही
नहीं। फिर मतदाता सूची में संशोधन या सुधार कैसे होगा? सोशल
मीडिया के शोर ने स्थितियों को और बिगाड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अब 27 मई को याचिकाकर्ताओं के
ज्यादातर तर्कों को मानने से इनकार कर दिया। वहीं चुनाव-आयोग के तर्कों को स्वीकार
किया और उन्हें और स्पष्ट किया। हालांकि यह मामला बिहार में मतदाता सूची में नाम
दर्ज कराने के नियम को लागू करने से संबंधित था, लेकिन अदालत में विचारार्थ रखे गए
मुद्दे और उसके निष्कर्ष देश भर की मतदाता सूचियों में नाम दर्ज कराने के अधिकार
पर दूरगामी प्रभाव डालेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि आयोग
का संवैधानिक दायित्व है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करे। यह बात
भी निर्विवाद है कि जिस मतदाता सूची पर चुनाव आधारित हैं, वह
सटीक और विश्वसनीय होनी चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल ने, इन सिद्धांतों
या मान्यताओं पर सवाल नहीं उठाया है। इस बात को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि आयोग
की भारत के लोकतांत्रिक विकास में अग्रणी भूमिका है। और यह भी कि बड़े पैमाने पर
प्रवासन, तीव्र शहरीकरण, अवैध सीमा पार
आवागमन, मृत्यु की सूचना न देने और प्रविष्टियों की
पुनरावृत्ति को देखते हुए मतदाता सूची की समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है। लेकिन
समस्या यहीं से शुरू होती है।
कमजोर मतदाताओं पर सबूत का बोझ डालना, एक बोझिल
दस्तावेज-प्रणाली, समय-सीमा का कम होना और अपील प्रक्रिया के लिए समय-सीमा
निर्धारित न करना सबसे ज्यादा चिंता के विषय हैं। अदालत के फैसले के बाद आयोग को असीमित
प्रक्रियात्मक छूट मिल गई है। खासतौर से नागरिकता के मुद्दे पर भी, आयोग को मिली छूट को लेकर कुछ विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है।
मतदाता सूची के पहले से देश में नागरिकता को
लेकर बहस चल रही है। हालाँकि एसआईआर नागरिकता की परीक्षा नहीं है, लेकिन इसके मार्फत ‘नागरिकता की सीमित जाँच’ का
आधार बन सकता है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने के बाद से एक वर्ग के मन
में संशय के बादल पहले से हैं। उधर खबरें हैं कि बिहार और बंगाल की नई सरकारों ने
घोषणा की है कि मतदाता सूची से जिनके नाम कट गए हैं, उन्हें सरकारी लाभ नहीं
मिलेंगे।
अब मई के अंत में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अवैध
प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (डेमोग्राफिक चेंज) का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति
का गठन किया है। इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस
प्रकाश प्रभाकर नावलेकर हैं। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त,
2025 को लाल किले के प्राचीर से ‘घुसपैठियों’ का उल्लेख करते हुए ऐसी
समिति की आवश्यकता की घोषणा की थी।
ऐसे समय में जब ‘घुसपैठिया’ शब्द को लेकर भय का माहौल है, तब आम नागरिक के मन में चिंता के कारण बनते
हैं। करीब-करीब ऐसा ही भय देशभर में काम कर रहे प्रवासी कामगारों के मन में है।
बहुत से नहीं जानते कि उनके गृह-राज्य की सूची में उनका नाम है या नहीं। हाल में
बंगाल में हुए चुनाव के समय प्रवासियों के बीच मची भगदड़ के पीछे एक भय यह भी था
कि वोट नहीं डालेंगे, तो सुविधाएँ कट जाएँगी।

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