Thursday, April 2, 2026

बंगाल माँगे एक और ‘पोरिबोर्तोन!’

पिछले सात-दशक के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो साफ दिखाई पड़ता है कि पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाम राजनीति और राजनीति के मायने हिंसा हो गए हैं।  2011 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जबर्दस्त जीत दिलाकर जब ममता बनर्जी सत्ता के रथ पर सवार हुईं थीं, तब उनका ध्येय-वाक्य था ‘पोरिबोर्तोन।’ आज भारतीय जनता पार्टी का भी यही ध्येय-वाक्य है। वे परिवर्तन का नारा लेकर सफल हुई थीं, क्योंकि बंगाल की जनता वामपंथी तौर तरीकों से परेशान हो गई थी। वह बदलाव चाहती थी।

ममता बनर्जी कम से कम तीन कारणों से अपना रौब-दाब कायम रखने में अब तक सफल हुई हैं: एक, जुझारू छवि, दो, कल्याणकारी कार्यक्रम और तीन, सांप्रदायिक झुकाव। अपनी जुझारू छवि क उन्होंने केंद्र से विरोध को जोड़कर रखा है। मतदाता सूचियों में गहन संशोधन की प्रक्रिया का जिस स्तर का विरोध उन्होंने किया है, वह अभूतपूर्व है। इसके अलावा उन्होंने राज्य में केंद्र सरकार द्वारा घोषित कल्याण कार्यक्रमों का प्रवेश वस्तुतः पूरी तरह रोक रखा है।

आगामी चुनाव में वे भवानीपुर सीट से खड़ी हुई हैं, जहाँ उनके मुकाबले बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी खड़े हैं, जिन्होंने 2021 में उन्हें नंदीग्राम से अपमानजनक हार दी थी। इस वर्ष रमज़ान और नवरात्र एक साथ थे। दोनों प्रत्याशियों ने अपने अभियान की शुरुआत अपने-अपने सांकेतिक तरीकों से की। ममता बनर्जी कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फ़ित्र की नमाज में शामिल हुईं, और सुवेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर गए।

ममता बनर्जी के पिछले 15 साल के कार्यकाल को देखें, तो यह बात आसानी से समझ में आ जाएगी। इनमें से पहले से चली आ रही कुछ बातों को उन्होंने अपनाया और कुछ का आविष्कार किया। उनकी राजनीति की शुरुआत शहरों से हुई थी। बंगाल के शहरों में रहने वाला मध्य वर्ग, वामपंथी राजनीति से आजिज़ आ गया था। वही मध्यवर्ग आज ममता से नाराज़ नजर आता है, क्या गाँवों में भी यही स्थिति है?

अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं, सवाल किया जा रहा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी, राज्य में एक और बड़े परिवर्तन की सूत्रधार बनेगी? क्या परिस्थितियाँ 2011 जैसी हैं? वामपंथी दलों के 34 साल के शासन की अभेद्य नज़र आने वाली दीवार को ममता ने तोड़ा था। अब ममता के शासन के भी 15 साल हो रहे हैं। क्या उनकी विदाई होगी? क्या ऐसा संभव है?

देश में आधुनिक राजनीतिक-प्रशासनिक और शैक्षिक संस्थाओं का सबसे पहले जन्म बंगाल में हुआ, पर आज अनेक गलत कारण राज्य की पहचान बन गए हैं। वस्तुतः इनकी नींव वामपंथी सरकार के दौर में ही पड़ गई थी, पर ममता-राज में उन्हीं बातों को विस्तार पाने का मौका मिला। साठ और सत्तर के दशक में इसी बंगाल के नक्सलबाड़ी ने देश का ध्यान खींचा था। उसके केंद्र में हिंसा थी।

आज भी राज्य की राजनीति के केंद्र में हिंसा है। वर्तमान हिंसा की जड़ों में उस वामपंथी हिंसा की क्रिया-प्रतिक्रियाएं ही हैं। ममता बनर्जी स्वयं हिंसा के इस पुष्पक विमान पर सवार होकर आईं थीं, जिसकी मदद से उन्होंने सीपीएम की हिंसा पर काबू पाने में सफलता प्राप्त की थी। अब ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा ही उनका राजनीतिक संबल बनी है। ममता की खासियत है कि वे आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं हटतीं। गलत को और ज्यादा जोर देकर सच साबित करने की कोशिश में लग जाती हैं।

हिंसक राजनीति

ममता की हिंसा का आगाज़ सीपीएम के राज में सिंगुर के आंदोलन में हुआ था। सीपीएम ने राज्य की बुनियादी समस्याओं के समाधान की दिशा में औद्योगीकरण का जो रास्ता खोजा था, ममता बनर्जी ने उसके छिद्रों के सहारे सत्ता के गलियारों में प्रवेश किया। पर अब उनके सहयोगी भी मानते हैं कि उस आंदोलन के कारण उद्योग जगत में बंगाल की नकारात्मक छवि बन गई।

बंगाल की इस हिंसा पर शोध कर रहे सुजात भद्र के अनुसार, शोध करते हुए मैंने जाना कि भारत में सबसे ज्यादा राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ अगर कहीं हुई हैं, तो वह बंगाल है। इस हिंसा के पीछे तीन बड़ी वजहें मानी जा रही हैं- बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था पर सत्ताधारी दल का वर्चस्व और नई राजनीतिक शक्तियों का प्रवेश।

यहाँ की वामपंथी सरकारें तमाम सैद्धांतिक बातें करती रहीं, पर उन्होंने नौजवानों को रोजगार दिलाने के रास्ते नहीं खोजे। और जब उनकी सरकार ने इस दिशा में सोचना शुरू किया, ममता बनर्जी तकरीबन वैसी ही राजनीति लेकर सामने आईं, जैसी वामपंथी सरकारें चला रहीं थीं। इस राजनीति में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को भी उन्होंने अपने साथ जोड़ लिया। मुसलमानों के मन में डर पैदा करने की मनोवृत्ति इसका बड़ा कारण है।

सांप्रदायिक रंग

पिछले साल मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड से जुड़े कानून में संशोधन को लेकर हुई हिंसा ने इस बात को साबित किया। केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा था, जिसे संसद ने अप्रैल की शुरुआत में पारित कर दिया था। इस कानून की पेशबंदी में हुई हिंसा बंगाल के मुस्लिम बहुल जिलों मे, जिनमें मुर्शिदाबाद भी शामिल था, सबसे तीव्र रहीं।

सोशल मीडिया के ज़रिए फैलाई गई गलत सूचनाओं और भड़काऊ संदेशों ने विरोध प्रदर्शनों को हवा दी। इसके अलावा भी राज्य में हाल में हुई राजनीतिक और सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। 2023 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी व्यापक हिंसा देखी गई, जिसमें चुनाव संबंधी झड़पों से जुड़ी मौतों की संख्या 48 से 55 के बीच बताई गई। मतपेटियों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी बड़े पैमाने पर हुईं।

राज्य की 10 करोड़ से अधिक आबादी में मुसलमानों की संख्या 30 प्रतिशत है, जिनका काफी बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी का समर्थक है। राज्य में 294 में से 85-126 सीटें ऐसी हैं, जिनपर हार-जीत का निर्धारण मुस्लिम मत तय करते हैं। 2021 में ऐसी 85 सीटों में से 75 सीटें ममता के पाले में आईं थीं। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी को ध्रुवीकरण का दोष दिया जाता है, पर बंगाल में ध्रुवीकरण तृणमूल के लिए लाभकारी है। इसकी वजह से कांग्रेस और वामपंथी दल हाशिए पर चले गए हैं, जिन्हें पहले मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलता था।

लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी बंगाल की राजनीति में प्रभावी शक्ति नहीं रही। पर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों से ज़ाहिर हुआ कि बंगाल में भी उसे लोकप्रियता हासिल है। हिंदुओं पर हमले होने पर वह प्रतिक्रिया को स्वर देती है। पिछले साल मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा से यह बात प्रकट होती है।

मुर्शिदाबाद हिंसा

हालाँकि ममता बनर्जी ने उस हिंसा के पीछे बांग्लादेशी अपराधियों का हाथ होने का आरोप लगाकर न केवल पल्ला झाड़ा, बल्कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) और बीजेपी को भी ज़िम्मेदार ठहराया। उनकी टिप्पणियों के जवाब में बीजेपी ने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि मुर्शिदाबाद में हिंसा में शामिल होने के आरोप में जो दो सौ से ज़्यादा लोग गिरफ़्तार किए गए हैं, उनमें से कितने बांग्लादेशी नागरिक हैं।

सीमा सुरक्षा बल और केंद्रीय सुरक्षा बलों को लेकर वे अक्सर विपरीत टिप्पणियाँ करती रहती हैं। यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है कि वक़्फ़ क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलन इतनी जल्दी इतना हिंसक कैसे हो गया? इससे पहले संशोधित नागरिकता क़ानून के मुद्दे पर भी उस इलाक़े में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे।

मुर्शिदाबाद की हिंसा के कारण 500 के आसपास हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़कर मालदा जिले में पलायन करना पड़ा। फसादियों ने 200 घरों और दुकानों में आग लगा दी और लूटपाट की। इसमें तीन लोगों की मौत हुई। इस हिंसा पर कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा गठित तीन सदस्यीय तथ्य-जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में हिंसा स्थल पर स्थानीय तृणमूल कांग्रेस पार्षद और विधायक की उपस्थिति को रेखांकित किया।

रिपोर्ट के अनुसार, मुर्शिदाबाद के बेगुना जैसे गाँवों में हिंदू घरों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, पानी के कनेक्शन काट दिए और टंकियाँ नष्ट कर दीं ताकि पीड़ित आग न बुझा सकें। दिसंबर 2025 में राज्य के कुछ हिस्सों में साधु-संतों के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार की खबरें सामने आईं।

गत 20 जनवरी को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि केंद्र सरकार राज्य की रिपोर्ट को देखे और यह तय करे कि क्या एनआईए जैसी केंद्रीय एजेंसी से जाँच करवाने की जरूरत है। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एनआईए को जाँच सौंपने का आदेश जारी किया। इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची। उसका कहना था कि इस मामले में केंद्रीय जाँच एजेंसी की कोई जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जाँच रोकने से इंकार किया है।

2016 में हावड़ा जिले के धुलागढ़ में रामनवमी जुलूस के बाद हिंसा भड़की, जिसमें दर्जनों हिंदू घरों और दुकानों को लूटकर जला दिया गया था। इसी तरह 2017 में एक फेसबुक पोस्ट के बाद बदौरिया-बसीरहाट में भड़की हिंसा में कई मंदिरों और घरों को नुकसान पहुंचाया गया। 2018 में पुरुलिया, रानीगंज और आसनसोल जैसे क्षेत्रों में रामनवमी के जुलूसों के दौरान हुई झड़पों में चार लोगों की मौत हुई थी।

2021 की हिंसा

2021 में राज्य में तृणमूल कांग्रेस की विजय के बाद जबर्दस्त हिंसा हुई थी। हैरत की बात थी कि उस समय बंगाल के अखबारों ने इन खबरों की या तो अनदेखी की है या शांति बनाए रखने की मुख्यमंत्री की अपील को प्रमुखता दी है। चौबीस घंटे सनसनी फैलाने वाले टीवी चैनलों के प्रतिनिधियों या कैमरामैनों ने भी घटनास्थलों तक जाकर पीड़ितों से बात करने का प्रयास नहीं किया।

जो वीडियो सामने आए थे, वे घटनास्थलों पर उपस्थित लोगों ने मोबाइल फोनों से तैयार किए थे। इस कवरेज से ही पता लगा था स्त्रियों के साथ क्या सलूक हुआ। बंगाल में अक्सर पूरे गाँव के गाँव राजनीतिक दबाव में रहते हैं। इसकी शुरूआत वामपंथी दलों के शासन में ही हो गई थी और तृणमूल कांग्रेस ने उस हिंसा का जवाब हिंसा से देकर अपनी जगह बनाई। क्या इसे लोकतांत्रिक परिघटना माना जाए?

केंद्रीय बलों पर टिप्पणी

पिछले चुनाव के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों को लेकर भी टिप्पणियाँ हुई, जो चिंतनीय बात थी। मीडिया के प्रतिनिधियों ने जो जानकारियाँ दी थीं, उनमें सीमा सुरक्षा बल के जवानों के घरों पर हुए हमलों की खबरें चिंतनीय थीं। तैश और आवेश ममता की राजनीति का प्रमुख तत्त्व है। चुनाव संचालन में केंद्रीय बलों की मदद लेने को भी वे गलत मानती रही हैं।

2016 में नोटबंदी का विरोध करने के सिलसिले में दिल्ली गईं, जहाँ से वापस लौटते समय कोलकाता में उनके विमान को उतरने में देरी हुई, जिसे लेकर हंगामा हुआ। विमान प्रकरण चल ही रहा था कि टोल प्लाजा पर सेना की एक्सरसाइज़ को लेकर उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया। उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने हमारे खिलाफ सेना तैनात कर दी है।

बांग्ला राष्ट्रवाद

ममता की राजनीति में एक बड़ी विसंगति है। एक तरफ वे राष्ट्रीय नेता बनना चाहती हैं, वहीं वे हिंदीभाषी क्षेत्रों के प्रति हिकारत भी फेंकती हैं, वैसे ही जैसे तमिलनाडु में डीएमके के कुछ नेता करते हैं। वे भाजपा को बाहरी लोगों की यानी उत्तर प्रदेश, बिहार की पार्टी के तौर पर प्रचारित करत हैं और बांग्ला भाषा, संस्कृति और बांग्ला अस्मिता के मुद्दे को उठाती हैं।

2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कई बार बीजेपी नेताओं को बाहरी या बंगाल विरोधी बताया है। भाजपा के उत्तर भारत से आने वाले नेताओं को वे स्थानीय संस्कृति से अनभिज्ञ और बाहरी मानती हैं। इसे वे बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी हस्तक्षेप के तौर पर पेश करती हैं। इस नैरेटिव का उद्देश्य अपनी राजनीतिक जमीन को 'बंगाली अस्मिता' के साथ जोड़कर मजबूत करना और उत्तर भारतीय हिंदी भाषी नेताओं के प्रभाव को कम करना रहा है।

केंद्र से टकराव

ममता बनर्जी जहाँ अपने आपको गरीब-परवर साबित करती हैं और तमाम कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करती हैं, वहीं उन्होंने केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को या तो अस्वीकार कर दिया है या उन्हें कमजोर कर दिया है और उन्हें राज्य-नियंत्रित समकक्ष योजनाओं से बदल दिया है।

2015 में केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना लेकर आई थी, जिसका उद्देश्य जन्म आधारित लिंग चयन को रोकना, लिंग अनुपात में सुधार लाना और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना था। यह योजना पश्चिम बंगाल में कभी ठीक से लागू नहीं हो पाई। इसकी जगह राज्य सरकार ने कन्याश्री जैसी योजना लागू की। वन नेशन वन राशन कार्ड पश्चिम बंगाल में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद लागू हो पाया। जल जीवन मिशन (केवल 55 प्रतिशत जनता तक ही जल की उपलब्धता है) यह राज्य देश में सबसे निचले पायदान पर है।

पश्चिम बंगाल ने केंद्रीय नई शिक्षा नीति के स्थान पर अपनी नई शिक्षा नीति बनाई है। आयुष्मान भारत से लेकर पीएम-किसान तक, आठ केंद्रीय योजनाओं को अवरुद्ध या कमजोर कर दिया। यह एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने नीति आयोग के आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है। आयुष्मान भारत की जगह स्वास्थ्य साथी योजना लागू की गई। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने दिसंबर 2025 में राज्यसभा को बताया कि इससे अकेले बंगाल के सबसे गरीब लोगों को केंद्र सरकार से मिलने वाली धनराशि में सालाना लगभग 785 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। प्रधानमंत्री किसान योजना कई वर्षों तक अटकी रही और उसकी जगह कृषक बंधु योजना लागू की गई। बाद में राज्य सरकार ने कुछ शर्तों के साथ आंशिक रूप से रियायत दी।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से भी बाहर रहने का विकल्प चुना गया, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को ठीक से लागू नहीं किया और प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना और स्मार्ट सिटी मिशन को शुरू नहीं किया गया। कोविड के दौरान राज्य में गरीब कल्याण रोजगार अभियान भी ठीक से नहीं चल पाया क्योंकि प्रवासी श्रमिकों का डेटा साझा नहीं किया गया था।

इस प्रकार की अस्वीकृति के पीछे प्रशासनिक मतभेद हों, तब भी कोई बात है। पर इनके पीछे राजनीतिक साजिश नज़र आती है। बंगाल का मॉडल केंद्रीय योजना की दिल्ली-छाप को मतदाता तक पहुँचने से रोकता है। इसके स्थान पर, वह राज्य-चिह्नित कार्यक्रम पेश करता है, जिसे तटस्थ प्रशासकों के बजाय टीएमसी के बूथ-स्तरीय पदाधिकारी संचालित करते हैं।

आम जनता, सरकारी कर्मचारियों के बजाय, सुविधाओं के लिए तृणमूल कार्यकर्ताओं पर निर्भर रहती है। हजारों करोड़ रुपये से चलने वाली लक्ष्मी भंडार योजना के लाभार्थियों का पंजीकरण करने वाला स्थानीय पदाधिकारी मतदान के समय पार्टी का प्रतिनिधि बनकर सामने आएगा। कल्याणकारी योजनाओं को चलाने वाले लोग ही पार्टी के उम्मीदवार बनते हैं।

बीजेपी की परिवर्तन यात्रा के दौरान रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि बंगाल में कई रेलवे परियोजनाएँ भूमि अधिग्रहण की धीमी गति और राज्य के सीमित समर्थन के कारण लगातार पीछे चल रही हैं। अभी तक केवल 27 प्रतिशत भूमि का ही अधिग्रहण हो पाया है। भारत-बांग्लादेश सीमा बाड़बंदी परियोजना में पश्चिम बंगाल की भूमि अधिग्रहण की रफ्तार कछुए जैसी है। यह मामला अदालत में भी चल रहा है।

नीति आयोग की मल्टीडाइमेंशनल पावर्टी 2023 रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में गरीबी की स्थिति गंभीर है। वहाँ रहने वाले लगभग 9 करोड़ लोगों में से 11 प्रतिशत लोग अब भी मल्टीडाइमेंशनल गरीबी के शिकार हैं। इसका सीधा मतलब है कि उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए जन कल्याणकारी योजनाओं की जरूरत है।

राज्य ने एक समांतर मॉडल विकसित किया है जिसमें राज्य निधि का चुनींदा इस्तेमाल किसी विशेष समुदाय को राजनीतिक रूप से संतुष्ट रखने के लिए है, जबकि अन्य को कम उदार या तटस्थ केंद्रीय लाभों पर निर्भर रहने दिया जाता है। जब धन संघ सरकार से आता है और योजनाएँ पूरे देश के लिए हैं, तो उचित अपेक्षा है कि राज्य इन्हें मनमाने ढंग से न रोकें, न विलंबित करें या दुरुपयोग करें।

कट मनीकल्चर

वाममोर्चा सरकार के समय से ही पार्टी और सरकार के बीच का भेद खत्म हो गया था। सरकारी काम कर्मचारियों के बजाय पार्टी कार्यकर्ताओं के मार्फत होने लगे। इससे कट मनीकी परंपरा शुरू हुई, जिसे अब संस्थागत रूप मिल गया है। ज्यादातर सरकारी कार्यों के लिए कमीशन वसूला जाता है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की राशि में से स्थानीय नेता और बिचौलिए हिस्सा वसूलते हैं। बिना कमीशन दिए सरकारी लाभ नहीं मिलता।

हाल में राज्य के दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह ने भी कट मनी का मुद्दा उठाया था और कहा था कि यह राज्य के विकास में प्रमुख बाधाओं में एक है। माकपा और कांग्रेस भी इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार को घेरती रही है। व्यवस्था ऐसी है कि सरकारी मदद पार्टी कार्यकर्ताओं के मार्फत ही जनता तक पहुँच पाती है।

इसे लेकर अक्सर स्थानीय गुटों में टकराव भी होता है। जून 2019 में ममता बनर्जी ने सार्वजनिक मंच से अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को चेतावनी देते हुए कहा था कि जिन्होंने जनता का पैसा लिया है, वे उसे वापस करें। इस बयान के बाद प्रदर्शन हुए और लोगों ने स्थानीय नेताओं के घरों के बाहर धन वापसी के लिए घेराव भी किया। कुछ समय यह चला, पर फिर सब कुछ उसी तरह चलने लगा।

 

चुनावी परिदृश्य

यों तो हरेक चुनाव महत्त्वपूर्ण होता है, पर पाँच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भावी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस की प्रासंगिकता की एक और परीक्षा होंगी, वहीं बंगाल में बीजेपी की संगठन-क्षमता की परीक्षा होगी। क्या वह तृणमूल कांग्रेस के चक्रव्यूह को इस बार भेद पाएगी? पार्टी के सामने तमिलनाडु और केरल के प्रवेशद्वार को पार करने की परीक्षा भी है।

पाँचों राज्यों में पश्चिम बंगाल, भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लक्ष्य बना हुआ है। वैचारिक और रणनीतिक दृष्टि से, पार्टी बंगाल को एक महत्त्वपूर्ण मोर्चे के रूप में देखती है। राज्य में भाजपा का उदय उल्लेखनीय रहा है। 2011 के विधानसभा चुनावों में, पार्टी को केवल 4% वोट मिले थे और उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। अब यह टीएमसी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरी है। यानी कि कांग्रेस और वाममोर्चे को उसने काफी पीछे धकेल दिया है। अब इस राज्य की कहानी भाजपा बनाम तृणमूल है।

हाल में एक रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, हालाँकि भाजपा और उसके एनडीए सहयोगी 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता में हैं, लेकिन यह ‘पर्याप्त नहीं है’। उन्होंने कहा, ‘जब बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर मुस्कान होगी।’ 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से राज्य और उसकी राजनीति में काफी उथल-पुथल मची हुई है, जब भाजपा ने 42 में से 18 सीटें जीतकर 40.64 प्रतिशत वोट शेयर के साथ केंद्रीय सत्ता में वापसी की थी। इसी वजह से 2021 के विधानसभा चुनाव बेहद महत्त्वपूर्ण हो गए थे, पर टीएमसी ने 294 में से 215 सीटें जीतकर 48.02 प्रतिशत मत हासिल किए। भाजपा को हालाँकि सिर्फ 77 सीटें मिलीं, लेकिन उसका मत प्रतिशत 37.97 हो गया। राज्य में वह दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है। पर क्या यह पर्याप्त है?

तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम सीट पर इस बार विशेष ध्यान केंद्रित किया है, जहाँ पिछली बार ममता बनर्जी को हार का मुँह देखना पड़ा था। उम्मीदवारों की सूची जारी होने से ठीक पहले पार्टी ने भाजपा से पबित्र कर को तोड़ कर अपने साथ जोड़ लिया। कर को नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी के मुकाबले टीएमसी का उम्मीदवार बनाया गया है। विश्लेषकों के अनुसार, पबित्र कर का चयन सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। कर पहले सुवेंदु के करीबी माने जाते थे और इलाके में उनकी अच्छी पकड़ है।

पूर्वी मिदनापुर जिला, खासकर नंदीग्राम, लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस का गढ़ रहा, लेकिन 2021 के बाद से यहाँ भाजपा का प्रभाव बढ़ा है। 2021 के विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम सीट पर बेहद काँटे की टक्कर देखने को मिली थी, जहां सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हरा दिया। ममता बनर्जी ने बाद में भवानीपुर सीट से उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री पद बरकरार रखा। इस बार सुवेंदु अधिकारी, नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं।

कोलकाता और हावड़ा से सटे शहरी क्षेत्र, दक्षिण और उत्तर 24 परगना के कुछ हिस्से और ‘राढ़ बंगला’ क्षेत्र में आने वाले इलाके, जैसे पूर्वी बर्धमान, बीरभूम, हुगली और पश्चिम बर्धमान का औद्योगिक क्षेत्र, टीएमसी के गढ़ माने जाते हैं। 2024 में, टीएमसी ने इन क्षेत्रों में आने वाली सभी 20 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की, जबकि 2021 में पार्टी ने 140 विधानसभा सीटों में से 100 से अधिक सीटें जीतीं। भाजपा को उम्मीद है कि वह इनमें से कुछ सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएगी, जिसमें गैर-बांग्लाभाषी लोगों तक पहुँचना भी शामिल है। भाजपा के एक नेता ने दावा किया, ‘आरजी कर बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएं और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार हमें मतदाताओं को लामबंद करने में मदद करेंगे। हमें उम्मीद है कि इससे हमें टीएमसी को हराने में मदद मिलेगी। अगर मतदाताओं को स्वतंत्र रूप से मतदान करने दिया गया, तो टीएमसी नहीं जीतेगी। इस बार तो मुसलमान भी टीएमसी से खुश नहीं हैं।’

चुनावी आँकड़े

तृणमूल कांग्रेस ने 2021 के विधानसभा चुनावों में 215 सीटें जीती थीं। उसके बाद हुए 2024 के लोकसभा चुनावों में उसे 192 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल थी। सच यह भी है कि 2011 में सत्ता में आने के बाद से तृणमूल ने हर विधानसभा चुनाव में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने में कामयाबी हासिल की है: 2011 में उसकी सीटें 184 से बढ़कर 2021 में 215 हो गईं, जो 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए ज़रूरी 148 सीटों से कहीं अधिक है। 2019 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल को झटका लगा जब बीजेपी ने 42 में से 18 सीटें जीतीं। उस चुनाव में तृणमूल को 22 सीटें मिलीं, लेकिन उसने 2024 के चुनावों में 29 लोकसभा सीटें जीतकर वापसी की। उस चुनाव में बीजेपी को 12 सीटें मिलीं। अलबत्ता तृणमूल 2014 के लोकसभा चुनावों के रिकॉर्ड 34 सीटों से इन दोनों चुनावों में  पीछे रही है।

इसका अर्थ है कि बीजेपी ने उसके जनाधार को कमज़ोर ज़रूर किया है, पर निर्णायक विजय हासिल नहीं की है। उसकी सफलता लोकसभा चुनावों में ज्यादा उल्लेखनीय रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों के विश्लेषण से पता लगता है कि 2021 के विधानसभा चुनावों की तुलना में तृणमूल के प्रदर्शन में गिरावट आई है। 2024 में, टीएमसी ने 192 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की, जबकि भाजपा ने 90 सीटों पर। कांग्रेस ने 11 सीटों पर और माकपा ने एक सीट पर बढ़त बनाई।

ये आँकड़े लोकसभा चुनाव के हैं, जिसमें मतदाताओं का नज़रिया अलग होता है। फिर भी इससे भाजपा के बढ़ते प्रभाव की पुष्टि होती है। लोकसभा चुनाव में टीएमसी को 45.8 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 38.7 प्रतिशत। इस बार चुनाव में कांग्रेस-वाम गठबंधन नहीं है और टीएमसी छोड़कर आए हुमायूं कबीर सहित कुछ मुस्लिम नेताओं ने नई पार्टियाँ बना लीं हैं। इधर हुमायूँ कबीर की जन उन्नयन पार्टी और असदुद्दीन ओवेसी की एआईएमआईएम के बीच गठबंधन भी हुआ है। इससे मुस्लिम वोटों के विभाजन की संभावना भी है। इसके अलावा बीजेपी को एंटी इनकंबैंसी का सहारा भी है, जो 15 साल से शासन कर रही ममता बनर्जी के विरुद्ध कहीं न कहीं पनप रहा होगा।

सरकारी खजाना खुला

ममता बनर्जी ने लोकप्रियता हासिल करने के लिए सरकारी खजाने का भी जमकर इस्तेमाल किया है। बिहार के विधानसभा चुनाव में महिलाओं के खाते में जितनी धनराशि डालने का वादा किया गया था, उससे ज्यादा ममता बनर्जी की सरकार महिलाओं को देती है। मसलन सामान्य श्रेणी को 1000 प्रति माह, एससी और एसटी को 1200रुपये प्रतिमाह। अब इस धनराशि में चुनाव के बाद 500 रुपये और बढ़ाने का वादा किया है। चुनाव के बाद सभी के लिए पक्के घर समेत अन्य सुविधाएं देने का भी वादा है। महिला वोटरों को साधने और उन्हें अपनी तरफ़ एकजुट करने के लिए लक्ष्मी भंडार जैसी योजना का पैसा बढ़ाया गया, बेरोज़गार युवाओं के लिए 'बांग्लार युवा साथी' के तहत प्रति माह 1500 रुपए की वित्तीय सहायता, राज्य के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते का भुगतान करना, पुरोहितों और मुअज्जिनों के मानदेय में बढ़ोतरी करने जैसे कदम उठाना उनके तरकश के तीर हैं।

पाञ्चजन्य में प्रकाशित

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