Friday, April 3, 2026

अंतरिक्ष में चीन और अमेरिका की रेस


अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासाने 2 अप्रैल को ऐतिहासिक आर्टेमिस 2 मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से सुबह 3:54 बजे (भारतीय समयानुसार) एसएलएस रॉकेट के जरिए चार अंतरिक्ष यात्री 10 दिनों की चंद्रमा यात्रा पर निकले हैं। 54 वर्षों में यह पहली मानवयुक्त चंद्र उड़ान है, जो चंद्रमा चक्कर लगाकर 10 अप्रैल को पृथ्वी पर लौटेगी। उधर चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) को उम्मीद है कि वह 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतार देगी। चीन पहले ही कई रोबोट चंद्रमा पर भेज चुका है और चंद्र नमूने वापस ला चुका है।  

चीन इस साल अपने नए मेंगझोऊ (ड्रीम शिप) अंतरिक्ष यान की परीक्षण उड़ान आयोजित करने जा रहा है। पुराने शेनझोउ की जगह लेने वाला यह अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्र कक्षा में ले जाएगा। संभव है कि चंद्रमा पर अमेरिकी यात्री पहले उतर जाए, पर इस बात के आसार बन रहे हैं कि स्पेस साइंस में अब अमेरिका के साथ चीन बराबरी के स्तर पर आने की होड़ में है।

अभी इसे बराबरी कहना आसान नहीं है, पर एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें वह अमेरिका के बराबर आ गया है या कुछ आगे निकल गया है। वह है स्पेस नेवीगेशन। चीन के बेइदू ने अमेरिकी जीपीएस को पीछे कर दिया है। इस बात को अमेरिकी विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं। चीन को उम्मीद है कि वह 2035 तक चंद्रमा पर समानव वैज्ञानिक बेस का एक बुनियादी संस्करण तैयार कर लेगा, जिसे इंटरनेशनल ल्यूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस) कहा जाएगा।

यह बेस चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास बनाया जाएगा, जहाँ बर्फ के रूप में पानी मौजूद होने की संभावना है। इस परियोजना में रूस भी चीन के साथ है। दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन ने लगभग 20 अरब डॉलर की लागत से चंद्रमा पर एक बेस बनाने का कार्यक्रम शुरू किया है।

इसके विपरीत, नासा का आर्टेमिस चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम लगातार पिछड़ रहा है। आर्टेमिस 2 समानव फ्लाई बाय यान है, लैंडिंगक्राफ्ट नहीं। कई बार स्थगित होने के बाद 2 अप्रैल को इसका प्रक्षेपण हो पाया। पहली अमेरिकी मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग को आर्टेमिस 4 तक टाल दिया गया है, जो 2028 से पहले संभव नहीं। चीन का कार्यक्रम, जो तीन दशकों से अधिक समय से एक एकीकृत योजना पर आधारित है, काफी हद तक उस राजनीतिक उथल-पुथल से अछूता रहा है, जो अमेरिका में तल रही हैं।  

चीन का समानव प्रोजेक्ट 921, सितंबर, 1992 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष स्टेशन विकसित करना है। इस कार्यक्रम के तहत 2003 में चीनी अंतरिक्ष यात्री यांग लीवेई की पहली उड़ान के बाद से लगभग 15 मानवयुक्त मिशन संचालित किए जा चुके हैं। 2011 में अमेरिका ने अपने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में चीन को शामिल करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद चीन ने अपना स्टेशन बनाने का फैसला किया और वह बना लिया। तियांगोंग, 2021 से काम कर रहा है और इसमें इस समय तीन चीनी अंतरिक्ष यात्री काम कर रहे हैं। चीन के किसी भी मानवयुक्त प्रक्षेपण में कोई मौत नहीं हुई है।

चीन ने अपनी पंचवर्षीय योजनाओं के दो सत्रों में विमानन और अंतरिक्ष उद्योग को 'स्तंभ उद्योग' का दर्जा दिया है। पहले यह विषय उभरते हुए क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत था। पहली बार, 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-30) में स्पष्ट रूप से 2030 तक चीन को एक अंतरिक्ष शक्ति बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

पांच वर्षीय योजना में पुनरोपयोगी प्रक्षेपण यानों, बड़े पैमाने पर उपग्रह समूहों और अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के व्यावसायीकरण को प्राथमिकता दी गई है, जिसमें लागत में कमी को दीर्घकालिक व्यवहार्यता के लिए केंद्रीय माना गया है। एक नया 'स्पेस+' दृष्टिकोण बताता है कि उपग्रह अवसंरचना को व्यापक औद्योगिक प्रणाली के हिस्से के रूप में माना जा रहा है, जिसमें केवल संचार के बजाय पृथ्वी की कक्षा के कंप्यूटिंग उपयोग को लेकर दिलचस्पी बढ़ रही है।

इस लिहाज से यह साल अमेरिका और चीन दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। चीनी रॉकेट अमेरिकी स्पेसएक्स के फैल्कन 9 के प्रतिस्पर्धी हैं, लेकिन फैल्कन 9 का पहला चरण नियमित रूप से पुनः उपयोग में लाया जा सकता है, और कुछ बूस्टर अब तक 30 बार तक उपयोग में लाए जा चुके हैं। इससे आंतरिक लागत डिस्पोज़ेबल रॉकेट की तुलना में कहीं कम हो जाती है।

नेविगेशन के क्षेत्र में, चीन ने एक ऐसी प्रणाली विकसित की है, जो अमेरिका के जीपीएस के बराबर या उससे भी बेहतर है। सैटेलाइट इंटरनेट के मामले में, यह स्टारलिंक से कई साल पीछे है, जबकि सबसे मुश्किल काम, हजारों सैटेलाइटों को किफायती लागत पर पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने में, वह पीछे है। नेविगेशन सैटेलाइट इतनी ऊँचाई पर होती हैं कि कुछ दर्जन सैटेलाइट ही पूरी दुनिया को कवर कर सकती हैं, जबकि इंटरनेट नेटवर्क को उपयोगी कवरेज प्रदान करने के लिए हजारों निचली कक्षा के सैटेलाइटों की आवश्यकता होती है। चीन के पास अभी इतनी बड़ी संख्या में उपग्रहों के प्रक्षेपण की क्षमता नहीं है।

बेइदू, अमेरिकी जीपीएस से अधिक उपग्रहों का संचालन करता है। अमेरिकी सरकार के नेविगेशन सलाहकार बोर्ड ने 2023 में स्वीकार किया था कि जीपीएस पिछड़ गया है। आम उपयोगकर्ताओं के लिए, अंतर मामूली है, लेकिन बेइदू की बढ़त महत्वपूर्ण है। चीन के भीतर यह सेंटीमीटर स्तर की सटीकता तक पहुँचता है। चीन ग्लोबल साउथ के देशों में बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं में निवेश के साथ-साथ बेइदू प्रणाली को अपनाने पर जोर दे रहा है, ताकि इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से के लिए डिफॉल्ट नेविगेशन बुनियादी ढाँचे के रूप में स्थापित किया जा सके।

सैटेलाइट इंटरनेट में चीन अभी पीछे है। स्टारलिंक के पास लगभग 8,000 उपग्रह हैं, जो स्पेसएक्स से लगभग 35 गुना अधिक हैं। ये पहले से ही 100 से अधिक देशों को सेवा प्रदान कर रहे हैं। चीन के पास कुछ सौ उपग्रहों का वैश्विक नेटवर्क है, जो मुकाबला नहीं कर सकता। स्टारलिंक को इस बाज़ार में बड़ी और लगातार बढ़ती बढ़त हासिल है, जो सबसे ज़्यादा मायने रखता है। ग्लोबल साउथ के उन क्षेत्रों में किफायती ब्रॉडबैंड सेवा जहाँ इसकी पहुँच कम है, चीनी नेटवर्क भविष्य में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, लेकिन उन्हें बराबरी की कवरेज प्रदान करने में कई साल लगेंगे।

बहरहाल चीनी अंतरिक्ष कार्यक्रम की कुछ उपलब्धियों पर नज़र डालें, तो आप मानेंगे कि वह अमेरिका को देर-सबेर पकड़ लेगा। स्वतंत्र अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग, 2021-2022 में तीन मॉड्यूल लॉन्च करके पूरा किया गया। यह लगातार चालू है और इसमें ताइकोनॉट्स छह महीने या उससे ज्यादा समय तक रहते हैं। ताइकोनॉट्स चीन के अंतरिक्ष यात्रियों को दिया गया नाम है।

2025 में चीन ने 92-93 ऑर्बिटल लॉन्च किए, जो उसका राष्ट्रीय रेकॉर्ड है। इसमें लॉन्ग मार्च सीरीज के रॉकेट मुख्य हैं। लॉन्ग मार्च 5, 7, 10 जैसे भारी रॉकेट विकसित हो रही हैं, जो चंद्रमा मिशनों के लिए जरूरी हैं। चंद्रमा अन्वेषण (चैंग कार्यक्रम): चैंग-4 ने 2019 में चंद्रमा के सुदूर हिस्से पर पहली सॉफ्ट लैंडिंग और रोवर भेजा।

चैंग-5 2020 में चंद्रमा से सैंपल लाकर पृथ्वी पर वापस लाया (पहली बार 44 साल बाद कोई देश ऐसा कर सका)। चैंग-6 चंद्रमा के दूर वाले हिस्से से दुनिया का पहला सैंपल रिटर्न मिशन पूरा किया। इस साल चैंग-7 की उड़ान प्रस्तावित है, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की बर्फ और संसाधनों की खोज करेगा। इसके बाद 2028 में चैंग-8 चंद्रमा पर बेस निर्माण की टेस्टिंग करेगा।

दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित

No comments:

Post a Comment