Tuesday, March 3, 2026

ईरानी आपदा पर चीन की चुप्पी

 

इकोनॉमिस्ट से साभार

ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की चीन ने निंदा की है, पर उसने अमेरिका का उतना कड़ा विरोध नहीं किया है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इसके पीछे के कारणों को विशेषज्ञों ने समझने की कोशिश भी की है।

हांगकांग के अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि चीन ने ईरान में अपने एक चीनी नागरिक की मौत और देश से अपने 3,000 नागरिकों को निकालने की पुष्टि की और शनिवार को रूस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई और सैन्य कार्रवाई की निंदा की। सोमवार को रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन कॉल में, चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी ने ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की निंदा करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया।

इस प्रकार के शाब्दिक विरोध के अलावा, चीन ने ईरान के लिए किसी प्रकार की ठोस मदद की पेशकश से परहेज किया है, ठीक वैसे ही जैसे उसने तब किया था जब इसराइल ने पिछले साल जून में ईरान के सैन्य और परमाणु स्थलों पर हमले किए थे।

बीजिंग की प्रतिक्रिया राजनयिक समर्थन देने और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचने की उसकी पुरानी रणनीति के अनुरूप है, जैसा कि उसने जनवरी में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अमेरिकी अपहरण के समय भी किया था। लेकिन हमलों से एक दिन पहले प्रकाशित चैटम हाउस के एसोसिएट फैलो अहमद अबूदूह के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान विवाद में चीन के राजनयिक संयम को चीनी अविश्वसनीयता या उदासीनता के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए

थिंक टैंक के मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका कार्यक्रम के सदस्य अबूदूह ने लिखा कि बीजिंग ईरान में एक लंबी रणनीति अपना रहा था, और शासन की बढ़ती कमजोरियों को तेहरान की चीन पर निर्भरता बढ़ाने और वाशिंगटन का ध्यान भटकाने के अवसर के रूप में देख रहा था।

1971 में राजनयिक संबंध स्थापित करने के बाद, चीन और ईरान के बीच संबंधों में 2016 में एक बड़ी छलाँग लगी, जब राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तेहरान का दौरा किया और द्विपक्षीय संबंधों को एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाया। इस कदम से ईरान के साथ चीन के संबंध सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और फ्रांस, स्पेन और इटली जैसे कुछ यूरोपीय देशों के साथ उसके संबंधों के बराबर हो गए।

 

हिज़्बुल्ला और हूती जैसे समूहों को ईरान के समर्थन ने उसे फारस की खाड़ी के देशों से अलग-थलग कर दिया और दशकों तक देश को गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों और राजनयिक अलगाव का सामना करना पड़ा। 2023 में, चीन ने ईरान और सऊदी अरब के बीच राजनयिक संबंध फिर से शुरू करने के लिए एक समझौते में मध्यस्थता की। तेहरान शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स में भी शामिल हो गया है। दोनों का नेतृत्व चीन पश्चिमी प्रभाव के प्रति संतुलन के रूप में कर रहा है।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने खामनेई द्वारा संचालित ईरान की "लुक ईस्ट" नीति को एक टिकाऊ गठबंधन के बजाय व्यावहारिक अवसरवादिता से भरी एक दोषपूर्ण रणनीति के रूप में देखा है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, जहाँ तेहरान रूस और चीन को पश्चिम के रणनीतिक प्रतिकार के रूप में देखता है, वहीं मॉस्को और बीजिंग ईरान को उपयोगी, लेकिन गैरज़रूरी वस्तु के रूप में मानते हैं, जिससे देश के रणनीतिक रूप से हाशिए पर चले जाने का खतरा बना रहता है।

2021 में आर्थिक संबंध और गहरे हुए जब चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने तेहरान का दौरा किया और 25 साल के सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें ईरानी तेल की निरंतर आपूर्ति के बदले ईरान के ऊर्जा, बैंकिंग, दूरसंचार और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में अनुमानित 400 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश शामिल था। पिछले साल सितंबर में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की चीन यात्रा ने दीर्घकालिक सहयोग समझौते को पूरी तरह से लागू करने के लिए तेहरान की प्रतिबद्धता को और मजबूत किया।

ईरान की प्रतिबंधों से प्रभावित अर्थव्यवस्था के लिए चीन एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा रहा है, और खबरों के अनुसार, इसने 2025 में ईरान के निर्यातित तेल का 80 प्रतिशत से अधिक खरीदा था। चीन-ईरान व्यापार में चीन का पलड़ा भारी है। चीनी सीमा शुल्क आँकड़ों के अनुसार, जिनमें प्रतिबंधों के कारण ईरानी तेल आयात शामिल नहीं है, 2025 में द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर थी, जिसमें ईरान को चीनी निर्यात का हिस्सा 7 अरब अमेरिकी डॉलर था।

हालांकि चीन ने ईरान को कोई सुरक्षा गारंटी नहीं दी है, लेकिन खबरों के अनुसार बीजिंग ने तेहरान को वाईएलसी-8बी रडार की आपूर्ति की है, जिसे दुनिया के उन चुनिंदा सिस्टमों में से एक माना जाता है जो लंबी दूरी पर पश्चिमी पाँचवीं पीढ़ी के विमान का लगातार पता लगा सकता है और उस पर नजर रख सकता है। चीन परमाणु अप्रसार संधि के तहत शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा उपयोग के ईरान के अधिकार का समर्थन करते हुए ईरान द्वारा परमाणु हथियार बनाने के प्रयास का विरोध करता है।

चीन को डर है कि परमाणु हथियारों से लैस ईरान क्षेत्रीय युद्ध को भड़का सकता है, जिससे खाड़ी देशों में अस्थिरता पैदा हो सकती है और संभावित रूप से न केवल मध्य पूर्व में बल्कि जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के बीच भी हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है, जो उन्हें परमाणु हथियार हासिल करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।

एक्सेटर विश्वविद्यालय में लेक्चरर और चाइनामेड प्रोजेक्ट में अनुसंधान प्रमुख एंड्रिया ग़िसेली के अनुसार, खामनेई की हत्या से चीन थोड़ा अस्थिर हो सकता है, लेकिन तेहरान में किसी भी नए नेतृत्व के साथ उसका जोड़ बैठ जाएगा। उन्होंने रविवार को लिखा, अब जो कुछ भी होगा, उससे सऊदी अरब और खाड़ी सहयोग परिषद देशों की चीन के साथ व्यापार संबंधों में रुचि और निर्भरता कम नहीं होगी, और न इसराइल के बारे में उनकी चिंता कम होगी।

चीनी विरोधाभास

उधर ब्रिटिश पत्रिका इकोनॉमिस्ट के अनुसार जब अमेरिकी और इसराइली युद्धक विमानों ने ईरान पर हमला किया, और सर्वोच्च नेता अली खामनेई की हत्या कर दी, तो चीन के प्रमुख मीडिया ने रात की खबरों में बुनियादी तथ्यों को स्पष्ट और तुरंत रिपोर्ट किया। इसकी तुलना उस घटना से करें जो लगभग दो महीने पहले की है। उस वक्त इस्लामी गणराज्य में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। पहले दो हफ्तों तक, चीन के समाचार प्रस्तोताओं ने चुप्पी साधकर रखी। अंततः उन्होंने जब उन्हें कवर किया, तो प्रदर्शनकारियों को ‘बाहरी ताकतों’ के मोहरे बताया।

यह विरोधाभास बताता है कि इस वक्त चीन के नेता तेहरान पर जारी हमलों से उतने परेशान क्यों नहीं हैं, जितना कई लोग समझते हैं। दिसंबर के अंत में ईरानियों का अपनी ही सरकार के खिलाफ विद्रोह करना, चीन को परेशान कर रहा था। जनांदोलन द्वारा निरंकुश शासन को उखाड़ फेंकना, चीन को परेशान करता है। चीन के नज़रिए से राजनीतिक सुप्रीमो की हवाई हमले में मौत सुरक्षा की चूक है, और इसकी मदद से युद्ध भड़काने वाले अमेरिकियों के प्रति आक्रोश व्यक्त करना आसान है। यह बात चीन के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

अमेरिका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के कुछ समर्थकों ने खामनेई की मृत्यु को न केवल इस्लामी गणराज्य के लिए, बल्कि चीन के लिए भी बड़ा झटका बताया है। उन्हें लगता है कि चीन का मनोबल गिर गया है। एक दौर में लग रहा था कि पश्चिम एशिया में चीन एक नया ताकतवर मध्यस्थ बनकर उभर रहा है। तीन साल पहले वह ईरान और सऊदी अरब को बातचीत की मेज पर ले आया था। कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का प्रमाण माना था। अब अमेरिका-इसराइल के संयुक्त हमलों ने इसके विपरीत विचार को पुख्ता किया है: पश्चिम एशिया में चीन का प्रभाव और महत्वाकांक्षाएं फिलहाल सीमित हो जाएँगी।

ईरान के मामले में तब खामोश रहने के साथ-साथ, जनवरी में वेनेजुएला में भी चीन ने उस वक्त भी तटस्थ रुख अपनाया, जब हिंसा और धौंस के शहंशाह ट्रंप ने चीन के मित्र निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाने के लिए अमेरिकी सेना भेजी। तुलनात्मक रूप से इन दोनों देशों में, ईरान ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।  

चीन के कुल खनिज तेल आयात के आयात में वेनेजुएला से 4 फीसदी से भी कम की आपूर्ति होती है, जबकि ईरान से 10 फीसदी से ज्यादा। अमेरिका के लिए ईरान बड़ा काँटा भी रहा है। उसके प्रॉक्सी पूरे इलाके में अमेरिकियों और सहयोगियों को निशाना बनाते रहे हैं। इन सारी वजहों से अमेरिका में माना जाता है कि ईरान पर बमबारी से चीन को नुकसान हुआ है।

पर यह निष्कर्ष भी काफी हद तक निराधार है। चीन को इस बात की कोई फिक्र नहीं है। साफ तौर पर कोई नहीं जानता कि इस फौजी अभियान का परिणाम क्या होगा। यदि अमेरिका ईरान में लंबा उलझा, जिसकी प्रबल संभावना है, तो चीन निश्चित रूप से इस बात से खुश होगा। पिछले दो-ढाई दशक में अमेरिका के मुख्य प्रतिस्पर्धी के रूप में चीन का उभार हुआ है। यह प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।

यहाँ भी इराक या अफगानिस्तान जैसा कुछ हुआ, तो अमेरिका को परेशानी में डालेगा। जो बाइडेन के प्रशासन में सुरक्षा अधिकारी जूलियन गेविर्ट्ज़ का कहना है कि इराक जैसी स्थिति उत्पन्न न होने पर भी, इस बात की संभावना अधिक है कि अमेरिका को पश्चिम एशिया पर फिर से ध्यान देना होगा, और यह चीन के लिए फायदेमंद है। गेविर्ट्ज़ कहते हैं, ‘हमारे पास सीमित संख्या में विमानवाहक पोत हैं, हमारे पास राष्ट्रपति का सीमित समय और ध्यान है।’

चीन को ईरान की उतनी ज़रूरत भी नहीं है, जितनी ईरान को चीन की है। ईरान के कच्चे तेल के निर्यात का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा चीनी खरीदारों के पास है। हालांकि ईरानी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे हुए हैं, फिर भी छोटे चीनी रिफाइनर इसे मलेशियाई कच्चे तेल के रूप में बेचने के लिए बड़ी आसानी से तैयार रहते हैं। चीन ने ईरान को महत्वपूर्ण तकनीक भी बेची है, जिसमें डिजिटल निगरानी उपकरण भी शामिल हैं, जिनकी मदद से ईरान ने हाल के विरोध प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचला।

चीन ने समझ लिया है कि ईरान का महत्व अब कम होने वाला है। उसके पास कच्चे तेल के आपूर्तिकर्ताओं का एक विविध पोर्टफोलियो है और वैसे भी, इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती माँग के कारण तेल की उसकी भारी माँग अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। फिर भी चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक बना हुआ है। चीन ने इसके विपरीत वादे करने के बावजूद ईरान में अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष निवेश किया है। ईरान की अनिश्चितता से चीनी नेतृत्व चिंतित है। वे ईरानी परमाणु कार्यक्रम को लेकर दबी हुई चिंता ही व्यक्त करते हैं। आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि इससे एशिया में चीन के प्रतिद्वंद्वियों, विशेष रूप से जापान पर परमाणु निषेध का दबाव डाला जा सकता है।

चीन का संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में भी बड़ा निवेश है और वहाँ बड़ी संख्या में प्रवासी चीनी रहते हैं। ईरान द्वारा इन देशों पर किए गए हमलों को चीन ने पसंद नहीं किया है। अमेरिकी थिंक-टैंक अटलांटिक काउंसिल के जोनाथन फुल्टन कहते हैं, ‘चीन और पश्चिम की प्रतिस्पर्धा की तमाम बातों के बावजूद, पश्चिम एशिया में चीन के सबसे करीबी संबंध मुख्य रूप से अमेरिकी साझेदारों और सहयोगियों के साथ हैं। चीन वास्तव में इस क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने वाला देश है।’

इन सब बातों से चीन की बेरुखी झलकती है। वह ईरान को साझेदार के रूप में तो बनाए रखना चाहता है, पर उसे शायद इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं है कि मौलवी सत्ता में बने रहें या क्रांतिकारी गार्डों से प्रेरित कोई दूसरा नेता सत्ता में आए। चीन के लिए जरूरी हैं, पश्चिम एशिया में उसके हित, जिनमें स्थिर पेट्रोलियम की कीमतों से लेकर निवेशकों के लिए सुरक्षित वातावरण शामिल है। अमेरिकी कार्रवाई से किसी तरह ईरान में ऐसी सरकार बन गई, जो सचमुच परमाणु कार्यक्रम त्याग देगी, तो यह और भी अच्छा। शंघाई इंटरनेशनल स्टडीज यूनिवर्सिटी के डिंग लॉन्ग कहते हैं, ‘जो भी हो, ईरानी शासन को बहुत कुछ सोचने और सुधारने की ज़रूरत है।’

चीन की चुप्पी से ईरान को भी हैरत नहीं होगी। उसे पहले से ही पता है कि क्या होने वाला है। जब जून 2025 में इसराइल ने उसके परमाणु संयंत्रों पर बमबारी की, तो चीन ने कड़ी निंदा के अलावा कुछ खास किया नहीं। खामनेई की हत्या से पहले ही, चीन की भाषा में नरमी थी। अगर अमेरिका अंततः ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाएगा, तो इराक की तरह वहाँ भी पुनर्निर्माण शुरू होगा। ऐसे में बुनियादी ढाँचे की प्रौद्योगिकी और व्यापार में विशेषज्ञता रखने वाली चीनी कंपनियां वहाँ पहुँचेंगी। ईरानी तेल का प्रवाह भी बढ़ सकता है।

यह एक फौरी गणना है, जिसके पीछे यह नज़रिया है कि इस इलाके में चीन के बड़े आर्थिक हित तो हैं, लेकिन इस क्षेत्र की जटिल राजनीति में अपनी टाँग अड़ाने की क्षमता या इच्छा बहुत कम है। फिलहाल, ईरान पर बम गिर रहे हैं और चीन खामोश है। पुनर्निर्माण शुरू होने पर वह खामोश नहीं रहेगा।

 

 

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