Wednesday, March 11, 2026

पश्चिम एशिया-युद्ध में वैश्विक-मीडिया की भूमिका


पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई की स्थिति को समझने के लिए ज्यादातर लोग मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर हैं। इंटरनेट के आगमन के बाद से मीडिया के स्वरूप में भारी बदलाव आया है।

युद्ध की कवरेज आसान नहीं होती। इसके दो कारण हैं। एक तरफ मौत का खतरा और दूसरी तरफ सरकारों की बंदिशें। इस कवरेज में पारदर्शिता नहीं होती। कोई देश पत्रकारों को छूट नहीं देता।

अलबत्ता मीडिया की टेक्नोलॉजी में बदलाव आने से सूचनाओं की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ी है। पर सब सही तथ्य नहीं होते। अफवाहें और प्रचार भी खबरों के लिफाफे में लपेट कर पेश किए जाते हैं। इस समय ऐसा ही हो रहा है।

1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की टाइम पत्रिका ने वर्ष के व्यक्ति (मैन ऑफ द इयर) के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज टेड टर्नर को नामित किया, जिनके केबल न्यूज नेटवर्क (सीएनएन) ने युद्ध की लाइव कवरेज करके मीडिया-कवरेज के एक नए आयाम का उद्घाटन किया था।

उसके बाद से समाचार की परिभाषा किसी घटना के घटित हुआ था या उसकी विलंबित सूचना से बदलकर, जैसा घटित हो रहा है, हो गई।’ टाइम पत्रिका ने लिखा, घटनाओं की गतिशीलता को प्रभावित करने और 150 देशों के दर्शकों को इतिहास का तात्कालिक गवाह बनाने के लिए, रॉबर्ट एडवर्ड टर्नर को 1991 के लिए टाइम पत्रिका का 'मैन ऑफ द ईयर' चुना गया है।’

समाचार मीडिया के रूप में टेलीविजन के उदय ने पत्रकारों के एक ताकतवर तबके का उदय भी किया। सीएनएन के लैरी किंग का टॉक शो अमेरिकी राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण शो बन गया और लैरी किंग को किंग ऑफ किंग्स कहा गया।

एम्बैडेड पत्रकारिता

1991 की लड़ाई के बाद 2003 में पत्रकारिता की एक नई विधा का जन्म हुआ, जिसे एम्बैडेड पत्रकारिता (Embedded Journalism) नाम दिया गया। उस दौरान कुछ पत्रकारों ने युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान सीधे मिलिट्री यूनिट के साथ रहते हुए रिपोर्टिंग की।

बेशक उस कवरेज में बहुत सी जानकारियाँ विश्वसनीय होती थीं, पर बहुत से वे बातें, जिन्हें सेना छिपाना चाहती थीं, छिपा ली जाती थीं।

सूचनाओं की रिपोर्टिंग के साथ पत्रकारिता की साख जुड़ी है। आज के सोशल मीडिया-युग में इस साख को बनाए रखने के सवाल भी उभर कर सामने आ रहे हैं। ये सवाल पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई के सिलसिले में भी उठे हैं।

इस बीच मैंने सामग्री की तलाश की तो तीन जानकारियाँ मुझे मिलीं, जिन्हें मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। इनके पहले इसराइली व्यवस्था के आलोचक माने जाने वाले मीडिया हाउस हारेट्ज़ की एक रिपोर्ट साथ ही टाइम्स ऑफ इसराइल में प्रकाशित एक रिपोर्ट को भी पढ़ें। इस पूरे विवरण में मैंने भारतीय मीडिया को शामिल नहीं किया है। उसके लिए अलग से लिखना होगा। 

एएफपी का सर्वे

फ्रांस की समाचार एजेंसी एएफपी ने हांगकांग डेटलाइन से खबर दी है कि पश्चिम एशिया में युद्ध को कवर करने वाले पत्रकारों को सरकारों और सशस्त्र समूहों द्वारा लगाए गए बढ़ते प्रतिबंधों और सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है, जिसके तहत पत्रकारों को रोका जा रहा है और उनसे पूछताछ की जा रही है। यहाँ तक ​​कि उन्हें हिरासत में भी लिया जा रहा है। इस रिपोर्ट को मैंने फ्रांस24 से उठाया है।

क्षेत्र के एएफपी ब्यूरो प्रमुखों के एक सर्वेक्षण से यह पता चला है। एएफपी पश्चिमी एजेंसी है, इसलिए मेरा सुझाव है कि उसके विवरणों की सत्यता और इरादों के बारे में आप अपने तरीके से देखें, तो बेहतर होगा, पर उसकी कवरेज को पूरी तरह झुठलाना भी सही नहीं होगा।

एजेंसी के अनुसार कुछ सबसे सख्त प्रतिबंध ईरान और इसराइल में हैं, हालांकि खाड़ी के राजतंत्रों ने भी, जो ईरान से अभूतपूर्व ड्रोन और मिसाइल हमलों के निशाने पर हैं, कड़े नियंत्रण लागू किए हैं।

सरकारें विशेष रूप से उन तस्वीरों को लेकर चिंतित नजर आती हैं जो मिसाइल और ड्रोन हमलों के स्थान को दिखाती हैं, या जिनमें मिसाइलों को रोके जाने का दृश्य दिखाया गया है। ईरान में आधिकारिक चैनलों से इतर स्वतंत्र जानकारी प्राप्त करना विशेष रूप से कठिन है, जहाँ राजधानी तेहरान के बाहर के क्षेत्रों में मीडिया की पहुँच सीमित या न के बराबर है।

तेहरान में ब्यूरो रखने वाले कुछ अंतरराष्ट्रीय समाचार आउटलेट्स में से एक एएफपी, दक्षिणी शहर मीनाब में एक स्कूल पर हुए हमले के घटनास्थल का दौरा करने में असमर्थ रहा है, जहाँ ईरानी अधिकारियों का कहना है कि 150 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें से कई बच्चे थे।

ईरान में इंटरनेट की स्थिति बहुत खराब है और सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी है, जिसके कारण ईरान के भीतर से स्वतंत्र रूप से बनाई गई सामग्री बहुत कम पोस्ट की जा रही है। यह स्थिति यूक्रेन में युद्ध की शुरुआत से बिलकुल अलग है, जब पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से यात्रा करने की अनुमति थी और नागरिकों ने रूसी हमलों की तस्वीरें पोस्ट की थीं।

तेहरान के बाहर क्या हो रहा है, इसकी निष्पक्ष जानकारी प्राप्त करने के लिए, एएफपी देश छोड़कर भाग चुके लोगों के साक्षात्कारों पर बहुत अधिक निर्भर है, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने ईरान की सीमाओं को पार करके पड़ोसी देशों में प्रवेश किया है।

साथ ही देश के अंदर संपर्क रखने वाले ईरानी प्रवासी समुदाय के सदस्यों द्वारा प्रदान की गई जानकारी पर भी निर्भर है। ईरान में फोन लगभग काम नहीं कर रहे हैं, ऐसे में एएफपी के पेरिस मुख्यालय में स्थित एक समर्पित टीम अपने संपर्कों का इस्तेमाल करके देश छोड़कर जा चुके ईरानियों से बात कर रही है और सोशल मीडिया पर जानकारी जुटा रही है।

एजेंसी के तेहरान ब्यूरो के कर्मचारियों के लिए जमीनी स्तर पर स्वतंत्र रूप से काम करना मुश्किल है, हालांकि अधिकारी उन नागरिक स्थलों पर मीडिया के दौरे आयोजित कर रहे हैं जिन्हें निशाना बनाया गया है, जिनमें घर, स्कूल, खेल स्टेडियम और अस्पताल शामिल हैं।

संस्कृति और इस्लामी मार्गदर्शन मंत्रालय, जिसे इरशाद के नाम से जाना जाता है, प्रेस को नियंत्रित करता है और आमतौर पर कवरेज से पहले अपनी मंजूरी देना आवश्यक होता है।

ईरान का सरकारी मीडिया मुख्य रूप से नागरिकों की मौत और नागरिक ठिकानों को हुए नुकसान की खबरें दे रहा है। यह सैन्य नुकसानों का ब्योरा नहीं दे रहा है, हालांकि यह इसराइल और क्षेत्र के अन्य लक्ष्यों की ओर मिसाइलों और ड्रोन के प्रक्षेपण की घोषणा जरूर कर रहा है।

एएफपी की पश्चिम एशिया फोटो प्रमुख ज्वेल समद ने बताया कि ईरान के खुफिया मंत्रालय ने चेतावनी दी है: ‘यदि कोई संवेदनशील स्थानों या क्षतिग्रस्त इमारतों और क्षेत्रों की तस्वीरें लेता है या जीपीएस डिवाइस या मोबाइल फोन से केंद्रों के स्थानों को रिकॉर्ड करेगा और उन्हें चिह्नित करेगा, तो वह अमेरिकी-ज़ायोनी दुश्मन का एजेंट हो सकता है।’

मंत्रालय ने लोगों से अपील की है कि यदि वे किसी को ऐसा करते हुए देखें तो अधिकारियों को सूचित करें। एएफपी की तेहरान टीम दूर से हमलों की तस्वीरें लेने में कामयाब रही है, जिनमें मुख्य रूप से धुआँ उठता दिख रहा है।

इसराइल में पाबंदियाँ

उधर इसराइल ने दशकों से संवेदनशील सैन्य अभियानों पर कड़ी सैन्य सेंसरशिप लगा रखी है।  ईरान और लेबनान में ईरान समर्थित शिया मिलीशिया हिज़बुल्ला के हमलों का सामना करने के बाद उसने अपने प्रतिबंधों को और कड़ा कर दिया है।

मिसाइलों या ड्रोन के आने की चेतावनी देने के लिए अलार्म बजने पर सेना ने इसराइली क्षितिज (होराइज़न) के लाइव प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया है।

युद्ध की शुरुआत में हवाई सुरक्षा प्रणालियों द्वारा आने वाली मिसाइलों को रोकने की तस्वीरें कवरेज का एक प्रमुख हिस्सा थीं। जून 2025 में इसराइल और ईरान के बीच हुए युद्ध के कवरेज में भी यह एक प्रमुख विशेषता थी। अब इसपर भी पाबंदी है।

सेना ने सुरक्षा स्थलों पर या उसके आसपास होने वाले प्रभावों की फिल्मिंग पर भी प्रतिबंध लगा दिया है, हालांकि यह नागरिक क्षति की कवरेज की अनुमति देता है, बशर्ते सटीक स्थानों का खुलासा न किया जाए।

दिशा-निर्देश

इसराइल में मीडिया संस्थानों को भेजे गए दिशानिर्देशों में, सेना के मुख्य सेंसर ब्रिगेडियर जनरल नेतनेल कुला ने कई विषयों और मुद्दों की सूची दी है जिन्हें आधिकारिक मंजूरी के बिना प्रकाशित नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, ‘इसका प्राथमिक उद्देश्य युद्धकाल के दौरान दुश्मन को सहायता पहुंचाने से रोकना है, जो राज्य की सुरक्षा के लिए एक ठोस खतरा है।’ दिशा-निर्देशों के अनुसार, पत्रकारों को सैन्य योजना और तैयारियों, हवाई सुरक्षा और प्रभाव स्थलों और स्थानों के बारे में जानकारी देने से प्रतिबंधित किया गया है।

लेबनान और खाड़ी देश

इसराइल के उत्तरी पड़ोसी लेबनान में, जहां हिज़बुल्ला के मिसाइल और ड्रोन हमलों के जवाब में इसराइल ने भारी हमले किए हैं, पत्रकारों को ईरान समर्थक मिलीशिया द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है।

हिज़बुल्ला ने पत्रकारों को बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में स्थित अपने गढ़ में स्वतंत्र रूप से प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर रखा है, हालांकि संगठन प्रेस यात्राओं का आयोजन करता है।

ईरान के हमलों का सामना करते हुए, खाड़ी के राजतंत्रों ने पत्रकारों पर कड़ी पाबंदियां लगा दी हैं। एएफपी के दुबई स्थित खाड़ी और यमन ब्यूरो के प्रमुख तालेक हैरिस ने कहा, ‘खाड़ी देशों में पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल आम तौर पर बहुत कठिन होता जा रहा है।’

कतर में, आंतरिक मंत्रालय ने सोमवार को घोषणा की कि ईरानी हमलों के बारे में तस्वीरें और भ्रामक जानकारी साझा करने के आरोप में 300 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

मंत्रालय ने कहा कि गिरफ्तार किए गए विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लोगों ने ‘वीडियो क्लिप फिल्माए और प्रसारित किए तथा भ्रामक जानकारी और अफवाहें प्रकाशित कीं जो जनमत को भड़का सकती थीं’।

संयुक्त अरब अमीरात के अटॉर्नी जनरल हमाद सैफ अल शम्सी ने उन तस्वीरों को खींचने, प्रकाशित करने या प्रसारित करने के खिलाफ चेतावनी दी है जिनमें प्रक्षेपास्त्र या शार्पनल्स (छर्रे) गिरने से हुए नुकसान को दिखाया गया हो।

शम्सी ने कहा, ‘इस तरह की सामग्री या गलत जानकारी फैलाने से जनता में दहशत फैल सकती है और देश की वास्तविक स्थिति के बारे में गलत धारणा बन सकती है।’

यूएई के अधिकारी ऑनलाइन पोस्ट की जा रही फर्जी और एआई-जनित छवियों को लेकर भी चिंतित थे, और शम्सी ने चेतावनी दी कि ऐसा करने वालों के साथ ‘नरमी नहीं बरती जाएगी’।

सऊदी अरब में, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और राजनयिक क्षेत्रों की फिल्मिंग पर, जो ईरानी हमलों का सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं, पहले भी बेहद कड़े प्रतिबंध थे। युद्ध ने इसे और बढ़ा दिया है।

सऊदी अधिकारी आधिकारिक बयानों के इतर आधिकारिक तौर पर बोलने से नियमित रूप से इनकार करते हैं, जबकि शाही दरबार की मीडिया सेवा ने पत्रकारों पर अपने गुमनाम स्रोतों की पहचान उजागर करने के लिए दबाव डाला है।

इस बीच, कुवैती आंतरिक मंत्रालय ने कहा कि उसने दो लोगों को गिरफ्तार किया है जिन्होंने सेना का ‘मजाक उड़ाने वाले’ वीडियो क्लिप साझा किए थे, और एक तीसरे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जिसने ‘प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों के नेताओं की तस्वीरें अपनी प्रोफाइल पर इस्तेमाल की थीं’।

बहरीन के आंतरिक मंत्रालय ने घोषणा की कि ईरानी हमलों की फुटेज फिल्माने और साझा करने तथा कथित तौर पर झूठी जानकारी फैलाने के आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और कहा कि उनके कृत्य ‘देशद्रोह’ के बराबर हैं।

मुकदमों का खतरा

जॉर्डन के मीडिया आयोग ने राज्य के रक्षा अभियानों से संबंधित किसी भी वीडियो या जानकारी के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया है और चेतावनी दी है कि उल्लंघन करने वालों को आपराधिक अभियोजन का सामना करना पड़ेगा।

इराक में, एएफपी के बग़दाद ब्यूरो प्रमुख रोबा अल हुसैनी ने कहा कि अधिकारी संघर्ष के बारे में सीमित जानकारी ही दे रहे हैं। पत्रकारों को आमतौर पर बगदाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास फिल्मांकन करने से रोका जाता है और उन्हें ईरान की सीमा चौकियों तक पहुंचने की अनुमति नहीं है।

 

देश के कुर्द-नियंत्रित उत्तरी हिस्से में, अधिकारियों ने कहा है कि पत्रकार आने वाली मिसाइलों या रॉकेटों के लाइव वीडियो प्रकाशित नहीं कर सकते, हमले का समय और स्थान प्रकट नहीं कर सकते, या किसी भी नुकसान का विवरण नहीं दे सकते।

उन्हें सैन्य और सुरक्षा स्थलों, सरकारी इमारतों या राजनयिक मिशनों जैसे संवेदनशील स्थानों के आसपास तस्वीरें नहीं खींचनी चाहिए।

पत्रकारों को नागरिकों द्वारा अपलोड किए गए वीडियो को साझा करने में सावधानी बरतने की भी चेतावनी दी गई है, क्योंकि वे संवेदनशील स्थितियों या बुनियादी ढांचे का खुलासा कर सकते हैं।

अमेरिका

अमेरिका की ओर से, और 2003 के खाड़ी युद्ध के विपरीत, पेंटागन ने एएफपी जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया को सैन्य अभियानों में शामिल होने के लिए आमंत्रित नहीं किया है।

एएफपी, एपी, फॉक्स न्यूज और न्यूयॉर्क टाइम्स सहित अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय समाचार आउटलेट्स से पिछले साल के अंत में पेंटागन की मान्यताएं छीन ली गईं, जब उन्होंने नए मीडिया नियमों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।

उपरोक्त रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

 अमेरिकी रिपोर्ट

अब आप अमेरिका के नेशनल पब्लिक रेडियो (एनपीआर) की एक रिपोर्ट को संक्षेप में पढ़ें, जो डेविड फोल्केनफ्लिक और आयशा रास्को के बीच बातचीत के रूप में है। इसे 8 मार्च 2026, सुबह 7:50 बजे पूर्वी समय (ईटी) वीकेंड एडिशन संडे पर सुना गया:

आयशा रास्को, होस्ट: पश्चिम एशिया में युद्ध के हालात बेहद गंभीर होते जा रहे हैं। युद्ध को कवर करना पत्रकारों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील कार्यों में से एक है। तथ्यों तक पहुंचना अक्सर मुश्किल होता है। एनपीआर के मीडिया संवाददाता डेविड फोल्केनफ्लिक का कहना है कि इस समय तथ्य जुटाना और भी मुश्किल है, और वे अपना विश्लेषण प्रस्तुत करने के लिए हमारे साथ जुड़ रहे हैं।

रास्को: तो चलिए एक व्यापक दृष्टिकोण से शुरू करते हैं। डेविड, युद्ध के कवरेज को देखते हुए आपको क्या दिखाई देता है?

फोल्केनफ्लिक: प्रेस की लगातार आलोचना करने के बावजूद, राष्ट्रपति ट्रंप ने कई प्रमुख समाचार चैनलों को साक्षात्कार दिए हैं, जिनमें से कई की उन्होंने वर्षों से आलोचना की है। सीएनएन, द वाशिंगटन पोस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स, द अटलांटिक, और न जाने कितने। फिर भी राष्ट्रपति ने ईरान के नेतृत्व को हटाने के अपने फैसले के पीछे कोई ठोस तर्क देने के लिए जनता, राष्ट्र या दुनिया के नाम कोई बड़ा संबोधन नहीं दिया है। राष्ट्रपति ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे क्या उम्मीद करते हैं या आगे क्या चाहते हैं। और इस बात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है कि राष्ट्रपति और उनका मंत्रिमंडल इसे युद्ध घोषित करना चाहते हैं या नहीं। और मुझे लगता है कि हमने देखा है कि इससे मीडिया को इस बात का औचित्य जानने में परेशानी हो रही है कि इस कठोर कार्रवाई के पीछे क्या तर्क है, न कि बाद में कोई स्पष्टीकरण।

रास्को: इस संघर्ष को कवर करने में कुछ खास चुनौतियां क्या हैं, जो अभी एक सप्ताह से थोड़ा अधिक समय से चल रहा है?

फोल्केनफ्लिक: आइए मौजूदा प्रतिबंधों की बात करें। ईरान में एक अत्यंत निरंकुश शासन है। इन संघर्षों के शुरू होने के बाद पहली बार, वह एक अमेरिकी समाचार चैनल के पत्रकार को देश में आने की अनुमति दे रहा है और कड़ी निगरानी रखेगा। इसी तरह, इसराइल में भी सेंसरशिप के नियम लागू हैं, और वे भी कड़ी निगरानी रखेंगे ताकि समाचार चैनल यह जानकारी न दें कि उनकी मिसाइल रक्षा प्रणाली कैसे काम करती है।

और फिर अमेरिकी प्रशासन बहुत कम जानकारी दे रहा है। और जब देता भी है, तो अक्सर पुरानी जानकारी ही होती है। मैं आपको ईरान से उसकी शत्रुता का एक उदाहरण देता हूँ। अमेरिकी एजेंसी के जिस पहले पत्रकार ने ईरान का रुख किया, वो थे फ्रेड प्लीटजेन। गुरुवार को प्रकाशित उनकी एक रिपोर्ट का अंश यहाँ प्रस्तुत है:

 

फ्रेड प्लीटगेन(रिकॉर्डेड ध्वनि): मैं रास्ते में कॉफी के लिए थोड़ी देर का ब्रेक ले रहा हूँ। हम कई घंटों से गाड़ी चला रहे हैं। हमने कुछ बातें गौर की हैं। पहली बात तो यह है कि सभी दुकानें खुली हैं। सभी दुकानों में भरपूर सामान है, यहाँ तक कि ताज़ा चीजें भी, जैसे फल और सब्जियाँ।

फोल्केनफ्लिक: तो इसमें बहस की कोई बात नहीं है। यह नीरस, सामान्य यात्रा वृत्तांत है जो प्लीटजेन और उनके दल के घटनाक्रम के करीब पहुँचने से पहले का माहौल तैयार करता है। और फिर भी, विदेश विभाग के एक उप अधिकारी ने इसे सीधे तौर पर ईरान समर्थक शासन का प्रचार बताया। सीएनएन का कहना है कि प्लीटजेन बिना किसी एजेंडा के और संदर्भ के साथ केवल प्रत्यक्षदर्शी थे।

हमारी सहयोगी मिशेल केलेमेन ने विदेश विभाग से पूछा, इसे दुष्प्रचार क्यों कहा जा रहा है? विभाग ने उन्हें बताया कि समाचार माध्यमों को जनता के सामने प्रस्तुत करने से पहले अमेरिकी सरकार से अपनी रिपोर्ट की पुष्टि करनी चाहिए। यह तर्कसंगत बात लगती है, लेकिन यहाँ इसका कोई मतलब नहीं बनता। ईरान में कोई अमेरिकी राजनयिक नहीं है। उस गैस स्टेशन के आसपास कई मील के दायरे में कोई अमेरिकी सरकारी कर्मचारी नहीं है।

रास्को: हमें इसके बारे में और विस्तार से बताएं। जैसे, समाचार चैनलों ने ऐसी कौन सी बातें बताई हैं जिन्हें प्रशासन सार्वजनिक नहीं होने देना चाहता?

फोल्केनफ्लिक: हाल के दिनों में मैंने अपने कुछ कंज़र्वेटिव मित्रों से सुना है कि प्रेस जो कुछ भी दिखा रहा है, वह सब ट्रंप को बदनाम करने और उन्हें बुरा दिखाने के लिए रचा गया है। लेकिन ऐसे समाचार माध्यमों के उदाहरण भी हैं जो तथ्यों का पता लगाने के लिए वास्तविक रिपोर्टिंग कर रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स को ही लीजिए। इसने स्वतंत्र फोरेंसिक जाँच करके यह सत्यापित किया कि 28 फरवरी को मीनाब शहर में ईरानी सेना के अड्डे के पास स्थित एक लड़कियों के स्कूल पर अमेरिकी मिसाइलों ने हमला किया था। इसी तरह के सैटेलाइट फुटेज की जांच करते हुए एनपीआर ने भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचा। ईरानियों का कहना है कि 160 से अधिक लोग मारे गए, हालांकि इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना मुश्किल है। रक्षा सचिव पीट हैगसैथ ने बस इतना कहा है कि हम जाँच कर रहे हैं, लेकिन उनके पास कोई ठोस तथ्य नहीं हैं।

दूसरी बात, जैसा कि आप जानते हैं, वाइट हाउस ने दावा किया था कि ईरान जल्द ही अमेरिकी मुख्य भूमि तक पहुँचने में सक्षम मिसाइलें विकसित कर लेगा और हमलों के कारणों में से एक यह भी था। लेकिन बाद में न्यूयॉर्क टाइम्स, रॉयटर्स और सीएनएन ने रिपोर्ट किया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने वास्तव में इससे बिलकुल अलग बात कही थी, कि ईरान को इस तरह की क्षमता हासिल करने में कई साल लगेंगे।

रास्को: कंज़र्वेटिव मीडिया और सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर प्रशासन के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आपने उन्हें किस रूप में देखा है?

फोल्केनफ्लिक: मुझे जबर्दस्त विभाजन दिखाई पड़ा है। फॉक्स न्यूज़, ज्यादातर दोस्ताना रवैया अपनाता है। सचिव हैगसैथ, पहले फॉक्स न्यूज़ के स्टार रह चुके हैं। लेकिन मतभेद भी देखने को मिले हैं। मैट वॉल्श, टकर कार्लसन और मेगन केली जैसे लोगों को देखें। टकर कार्लसन ने तो वाइट हाउस जाकर ट्रंप को ईरान पर बमबारी न करने के लिए मनाने की कोशिश भी की थी। दूसरी तरफ, बेन शापिरो, लौरा लूमर, मार्क लेविन और अन्य लोग हैं जिन्होंने इस विचार और ईरान से निपटने में पार्टीज़न रुख अपनाने का पुरजोर समर्थन किया है। ये मीडिया हस्तियाँ, खुद को 'अमेरिका फर्स्ट' के नारे में लपेटकर रखती हैं। उन्हें अपने रवैये को क्या बदलना नहीं चाहिए। ऐसा राष्ट्रपति जिसने विदेशी युद्धों को रोकने का वादा किया था, अब युद्ध छेड़ने का फैसला कर रहा है।

इसे मूल रूप से अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

सीपीजे का डॉक्यूमेंटेशन

अब पढ़ें कमेटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) का डॉक्यूमेंटेशन, जिसमें पत्रकारों पर लगे प्रतिबंधों का विवरण है। सीपीजे ने पत्रकारों की गिरफ्तारी, रिपोर्टिंग में हस्तक्षेप, मीडिया के इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने वाले हवाई हमलों और कवरेज पर व्यापक प्रतिबंधों का दस्तावेजीकरण किया है।

सीपीजे ईरान, इसराइल और अधिकृत फ़लस्तीनी क्षेत्र, जॉर्डन, इराक, सीरिया, लेबनान, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, कतर और बहरीन में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थितियों पर नज़र रख रहा है। सीपीजे ने निम्नलिखित बातों का दस्तावेजीकरण किया है:

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से 2 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है।

हवाई हमलों में 8 मीडिया आउटलेट क्षतिग्रस्त हो गए।

7 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया या उनसे पूछताछ की गई

ईरान में राष्ट्रव्यापी इंटरनेट ब्लैकआउट

इसके बाद पत्रकारों और मीडिया को प्रभावित करने वाली घटनाओं का एक क्रमबद्ध विवरण दिया गया है, जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं

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