ग़ाज़ियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के लिए एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में शिफ्ट कर दिया गया है। इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को पूरा होने में कई सप्ताह लग सकते हैं, क्योंकि इसमें कई चरण शामिल हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया की व्यावहारिकता से जुड़े कई सवाल अभी हैं, पर अब बहस एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा देकर या किसी दूसरे तरीके से मृत्यु देने पर भी होगी। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि संसद इस विषय पर कानून बनाए। 2018 और 2026 के फैसलों के बावजूद संसद ने अभी तक समग्र कानून नहीं बनाया। कोर्ट ने कई बार विधायिका से कानून बनाने की अपील की है
पैलिएटिव केयर में ऐसी चिकित्सा देखभाल होती है,
जिसका उद्देश्य गंभीर या असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीज को आराम देना
और बीमारी को पूरी तरह ठीक करने के बजाय मरीज के दर्द, साँस
लेने में तकलीफ, घबराहट, बेचैनी या
अन्य शारीरिक-मानसिक परेशानियों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। सक्रिय
इच्छामृत्यु मृत्यु का एक नया कारण उत्पन्न करती है; निष्क्रिय
इच्छामृत्यु पहले से ही चल रही प्राकृतिक मृत्यु में बाधा को दूर करती है। एक
मृत्यु का कारण बनती है; दूसरी मृत्यु को स्वाभाविक रूप से
होने देती है। एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा या किसी दूसरे तरीके से मौत देना पूरी
तरह अवैध है।
प्रश्न है कि संविधान के अनुच्छेद 21के तहत ‘जीने के अधिकार’ में ‘गरिमापूर्ण मरने का अधिकार’ शामिल है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अधिकार है, लेकिन सीमित परिस्थितियों में। हरीश राणा केस के फैसले के बाद भी, यह बहस अभी अपूर्ण है। इच्छामृत्यु के विरोध में जो तर्क है, उसके अनुसार जीवन ईश्वर का दिया हुआ है, उसमें मानवीय हस्तक्षेप गलत है। इच्छामृत्यु के अधिकार का दुरुपयोग होने का खतरा भी है। डॉक्टर ‘किलर’ बन जाएँगे। कोमा में पड़े लोगों को व्यर्थ समझ लिया जाएगा। कैथलिक चर्च, कई हिंदू संगठन और इस्लामी विद्वान इसे जीवन के खिलाफ मानते हैं।
यदि इसे लागू भी किया जाए, तो देश में अच्छी पैलिएटिव
केयर बहुत कम है, इसलिए कई लोग इच्छामृत्यु को ‘आखिरी विकल्प’ मानते हैं। इस समय बहस
का केंद्र बिंदु यही है कि पैसिव इच्छामृत्यु को और सुगम बनाया जाए या नहीं,
जबकि एक्टिव इच्छामृत्यु को वैध करने की माँग अभी बहुत कमजोर है। सुप्रीम
कोर्ट ने साफ कहा है कि केवल असंभव रिकवरी वाले केस में, सख्त
मेडिकल बोर्ड और न्यायिक देखरेख के साथ ही इसकी अनुमति देने पर विचार संभव है। बहुत
से विशेषज्ञ मानते हैं कि असली समाधान बेहतर पैलिएटिव केयर की व्यवस्था को मजबूत
करने में है, न कि जल्दबाजी में एक्टिव इच्छामृत्यु को वैध
करने में।
2013 में चंडीगढ़ में एक हादसे में चौथी मंजिल
से गिरने के बाद से हरीश अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हुए हैं, और लाइफ सपोर्ट
सिस्टम पर निर्भर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गत 11 मार्च को उनके मामले में, पैसिव इच्छामृत्यु
की अनुमति देकर भारत में पहली बार इस अधिकार के व्यावहारिक इस्तेमाल की अनुमति दी
है। अदालत ने 2018 में इसे संवैधानिक अधिकार मान लिया था।
हरीश राणा के माता-पिता की याचिका को, पहले
दिल्ली उच्च न्यायालय ने और फिर उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था। 2025 में उच्चतम
न्यायालय ने अपने फैसले पर पुनर्विचार किया और यह निर्णय सुनाया। यह मामला 2018
में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित और 2023 में सरलीकृत कानूनी ढाँचे और इन
दिशानिर्देशों को लागू करने में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को उजागर करता है।
विशेषज्ञ सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के
बीच अंतर पर और भारत में मजबूत देखभाल अवसंरचना की आवश्यकता पर भी चर्चा करते हैं।
जटिल समस्या यह नहीं है कि कानून किस बात की अनुमति देता है, बल्कि यह है कि रोगी, जब स्वयं बोलने में असमर्थ हो, तो कौन और किस आधार पर निर्णय कर सकता है। स्वस्थ दिमाग वाला वयस्क किसी
भी चिकित्सा उपचार को अस्वीकार कर सकता है, और चिकित्सक को उस
अस्वीकृति का सम्मान करना होता है। ज्यादा मुश्किल मामला अनैच्छिक मृत्यु का है। ऐसा
रोगी जो स्थायी रूप से कोमा में है, जिसका अस्तित्व पूरी तरह
से चिकित्सा तकनीक पर निर्भर है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन
के दो-न्यायाधीशों के पीठ के इस फैसले को पूरी तरह से समझने के लिए, 2011 में अरुणा शानबाग के मामले से लेकर 2018 में कॉमन
कॉज बनाम भारत संघ मामले में संवैधानिक फैसले तक की कड़ी को जोड़ना आवश्यक है। अरुणा
रामचंद्र शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में नर्स थीं, जिनका 27 नवंबर, 1973 की रात
को एक वार्ड अटेंडेंट ने गला घोंट दिया था। गला घुटने से उनके मस्तिष्क में
ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक गई थी। लगभग 42 वर्षों तक वे उसी
अस्पताल में अचेत अवस्था में रहीं और 2015 में उनकी
स्वाभाविक मृत्यु हो गई।
2011 में, सर्वोच्च
न्यायालय में उनकी जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति देने के लिए याचिका दायर की
गई थी। दो न्यायाधीशों के पीठ ने अपने फैसले में याचिका खारिज कर दी, लेकिन भारतीय कानून में पहली बार परोक्ष इच्छामृत्यु के लिए दिशानिर्देश
निर्धारित किए। अदालत ने दयामृत्यु को अस्वीकार करने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह
बताया कि मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्सें और अन्य कर्मचारी अरुणा को मरने देना
नहीं चाहते। इन नर्सों ने 37 साल से अरुणा की पूरी जिम्मेदारी ले रखी थी। नर्सों
के जीवन में अरुणा का एक मतलब हो गया था, जो उनकी एकता की कड़ी थी। अदालत ने इन
कर्मचारियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि हर भारतीय को ऐसे कर्मचारियों पर फख्र
होना चाहिए।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने 2018 के फैसले में 2011 के फैसले की संरचनात्मक खामियों को उजागर किया। 2018 में कॉमन कॉज़ मामले में पाँच न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने सर्वसम्मति
से माना कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में
गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल है और असाध्य कोमा में पड़े रोगी के परिवार
के सदस्य जीवन रक्षक उपचार बंद करने के लिए अदालत से अनुमति माँग सकते हैं। पीठ ने
प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय निर्धारित किए—दो स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड, परिवार की अनिवार्य सहमति और 30 दिन की पुनर्विचार
अवधि—और अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को मान्यता दी, जिनके
द्वारा कोई व्यक्ति सक्षम रहते हुए भी अपने जीवन के अंतिम समय की प्राथमिकताओं को
दर्ज कर सकता है।
राणा परिवार ने जब 2024
में अपने बेटे को जीवित रखने वाली फीडिंग ट्यूब हटाने की अनुमति माँगने के लिए
पहली बार दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया, तो अदालत ने
याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा, हरीश स्वतंत्र रूप से साँस लेकर बिना चिकित्सकीय
सहायता के स्वयं को जीवित रख रहा है, इसलिए फीडिंग ट्यूब जीवन रक्षक प्रणाली को नहीं
हटाया जा सकता। अब 11 मार्च के फैसले में इसे बदल दिया गया। न्यायालय
ने अब यह माना है कि चिकित्सकीय सहायता प्राप्त पोषण को हटाना रोगी को भूखा रखना
नहीं है। यह एक ऐसे हस्तक्षेप को हटाना है जिसका कोई चिकित्सीय उद्देश्य नहीं रह
गया है।
शानबाग से लेकर कॉमन कॉज़ और हरीश राणा तक का
सैद्धांतिक विकास 15 वर्षीय यात्रा है, जो कुछ नए सवाल खड़े
कर रही है। 11 मार्च का फैसला सिद्धांत तो स्थापित कर देता
है, जो विधि आयोग की 2006 की 196वीं रिपोर्ट में कानून की सिफारिश के बाद से ही अनसुलझा है। संसद ने इस
विषय पर कोई कानून नहीं बनाया, परिणाम यह है कि इस अधिकार का सहारा लेने की इच्छा
रखने वाले परिवारों का कठिन समय अदालतों के चक्कर लगाने में जा रहा है।

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