Friday, September 13, 2013

आडवाणी कब तक नाराज रहेंगे?

नीचे प्रकाशित आलेख 13 सितम्बर की सुबह लिखा गया था। चूंकि फैसला हो गया इसलिए अब इसकी कालावधि पूरी हो गई। पर अब यह समझने की जरूरत है कि फैसला जिस तरह से हुआ है, उसका मतलब क्या है। क्या आडवाणी जी हाशिए पर गए? क्या अब मोदी के वर्चस्व का समय आ गया है?  संघ के पूरे दबाव के बावजूद आडवाणी जी ने हार नहीं मानी। ऐसा क्यों हुआ? ऐसी क्या बात हुई कि वे पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक में आना चाहकर भी नहीं आ पाए? क्या यह व्यक्तिगत पीड़ा है? मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज की बैठक में उपस्थिति के बावजूद इतना स्पष्ट है कि वे खुश नहीं हैं। ऐसा लगता है कि आडवाणी को यकीन है कि मोदी विफल होंगे। आज विरोध दर्ज कराते हुए वे अपने कल की पेशबंदी कर रहे हैं। ताकि कह सकें कि मैने अपना विरोध दर्ज कराया था। व्यक्तिगत रूप से देखें तो असंतुष्ट नेताओं में सुषमा स्वराज ही ऐसी हैं, जो भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। मुरली मनोहर जोशी भी ज्यादा समय के नेता नहीं हैं। भाजपा के पास प्रधानमंत्री पद के लिए सुयोज्ञ पात्र सुषमा जी हैं, पर इस वक्त कांग्रेस को परास्त करने के लिए मोदी जैसे आक्रामक व्यक्ति की भाजपा को जरूरत है। कांग्रेस जबर्दस्त एंटी इनकम्बैंसी की शिकार है। साथ ही उसके पास लोकप्रिय नेता नहीं है। फिलहाल नरेन्द्र मोदी की परीक्षा चार राज्यों के चुनाव में होगी, पर उसके पहले देखना होगा कि पार्टी संगठन किस प्रकार चुनाव में उतरता है। मोदी को कहीं भितरघात का सामना तो नहीं करना होगा? उसके पहले देखना यह है कि आडवाणी जी मोदी को कैसा आशीर्वाद देते हैं। क्या वे लम्बे समय तक नाराज रह सकेंगे? उनकी नाराजगी मोदी से है या संघ से, जिसने उनकी उपेक्षा की है? मोदी को आगे करने का फैसला कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ गया है।

फैसला मोदी नहीं, आडवाणी के बारे में होना है?

 शुक्रवार, 13 सितंबर, 2013 को 11:26 IST तक के समाचार
भारतीय जनता पार्टी क्या अपने सबसे बड़े कद के नेता को हाशिए पर डालने की हिम्मत रखती है? पार्टी में मतभेदों के सार्वजनिक होने के बाद अपनी फजीहत और कांग्रेस के व्यंग्य-बाणों से खुद को बचाने की क्या कोई योजना उसके पास है? और क्या इस फजीहत का असर चार राज्यों के विधान सभा चुनाव पर नहीं पड़ेगा?
लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी के कम से कम तीन-चार बड़े नेताओं का समर्थन हासिल है. पर यह भी लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के फैसले की कद्र करते हुए शायद इनमें से कोई भी नेता अंतिम क्षण तक आडवाणी जी का साथ नहीं देगा.
हो सकता है कि अंततः आडवाणी भी इसे कबूल कर लें, पर क्या वे मोदी के नाम का प्रस्ताव करेंगे? या इस फैसले के बाबत होने वाली प्रेस कांफ्रेस में साथ में खड़े होंगे? या फिर से पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा देंगे?
जून में जब गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था तब उन्होंने पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा दे दिया था. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अध्यक्ष मोहन भागवत के सीधे हस्तक्षेप के बाद उन्होंने अपने हाथ खींचे थे.
उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि प्रधान मंत्री पद का फैसला करते वक्त आपको शामिल किया जाएगा और इसीलिए इस हफ्ते पार्टी के तमाम नेता उन्हें लगातार मनाने की कोशिश करते रहे हैं. क्या अब उन्हें मनाने की कोशिश बंद कर दी जाएगी?

Wednesday, September 11, 2013

चुनाव-महोत्सव की 'फॉर्मूला रेस'

कृषि-प्रधान होने के साथ-साथ भारत मनोरंजन-प्रधान देश भी है. मनोरंजन के तीन साधन हैं. सिनेमा, क्रिकेट और राजनीति. तीनों को जोड़ता है टीवी, जो सब कुछ है. इन सबके तड़के से तैयार होता है द ग्रेट इंडियन रियलिटी शो. कभी सोचा है कि राजनीति वाला सिनेमा में सिनेमा वाला खेल मे और खेल वाला राजनीति में क्यों है? तीनों की अपनी फॉर्मूला रेस है और अपना सीजन. राजनीति का सीजन आ रहा है और उसके साथ आने वाला है उसका अपना कॉमेडी सर्कस. कुछ विधानसभाओं के चुनाव सिर पर हैं और इनके तीन महीने बाद लोकसभा के. इस लोकतांत्रिक-महोत्सव के बरक्स देश की अर्थनीति, राजनीति और प्रजानीति पर नजर डालनी चाहिए.

    

तीन-चार हफ्ते से देश आर्थिक संकट को लेकर बिलबिला रहा था. पिछले हफ्ते रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद सम्हालने के दिन ही रघुराम राजन ने कुछ घोषणाएं कीं और वित्तीय बाजारों की धारणा बदलने लगी. रुपए की कीमत जो डॉलर के मुकाबले 68 रुपए के पार थी वह 65 के आसपास आ गई. शेयर बाजार में गिरावट रुक गई. बहरहाल हमारे पास विदेशी मुद्रा भंडार इतना है कि लम्बे अरसे तक किसी किस्म की परेशानी नहीं होगी. अब कहा जा रहा है कि फंडामेंटल्स मजबूत है. अच्छे मॉनसून के कारण अनाज और खेती से जुड़ी वस्तुओं के दाम गिरेंगे और मुद्रास्फीति पर रोक लगेगी. एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख संजीदा व्यक्ति हैं. उनका कहना है कि भारत खराब दौर से बाहर आ गया है. इस साल की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर 4.4 प्रतिशत पर आ गई, जो पिछले दशक की सबसे धीमी गति है. इसे बॉटम आउट मानें तो अब इससे बेहतर समय आएगा.

Thursday, September 5, 2013

बेटे के अध्यापक को अब्राहम लिंकन का पत्र

बेटे के अध्यापक को अब्राहम लिंकन का पत्र
Lincoln's letter

अब्राहम लिंकन ने यह पत्र अपने बेटे के अध्यापक को लिखा था। लिंकन ने इसमें वे तमाम बातें लिखी थीं जो वे अपने बेटे को सिखाना चाहते थे।

सम्माननीय महोदय,
मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी। पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है।

आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्‍छी बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।

आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।

मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्‍छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।

आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।

ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी।

आपका
अब्राहम लिंकन

Sunday, September 1, 2013

संकट नहीं, हमारी अकुशलता है

मीडिया की कवरेज को देखने से लगता है कि देश सन 1991 के आर्थिक संकट से भी ज्यादा बड़े संकट से घिर गया है। वित्त मंत्री और उनके बाद प्रधानमंत्री ने भी माना है कि संकट के पीछे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के अलावा राष्ट्रीय कारण भी छिपे हैं। राज्यसभा में शुक्रवार को प्रधानमंत्री तैश में भी आ गए और विपक्ष के नेता अरुण जेटली के साथ उनकी तकरार भी हो गई। पर उससे ज्यादा खराब खबर यह थी कि इस साल की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की संवृद्धि की दर 4.4 फीसदी रह गई है, जो पिछले चार साल के न्यूनतम स्तर पर है। रुपए का डॉलर के मुकाबले गिरना दरअसल संकट नहीं संकट का एक लक्षण मात्र है। यदि हमारी अर्थव्यवस्था निर्यातोन्मुखी होती तो रुपए की कमजोरी हमारे फायदे का कारण बनती। पर हम दुर्भाग्य से आयातोन्मुखी हैं। पेट्रोलियम से लेकर सोने और हथियारों तक हम आयात के सहारे हैं।

Saturday, August 31, 2013

सीरियाः पश्चिम एशिया में एक और ‘इराक’?

 कई सवाल एक साथ हैं? अमेरिकी सेना अगले साल अफगानिस्तान से हटने जा रही है, पर उससे पहले ही सीरिया में अपने पैर फँसाकर क्या वह हाराकीरी करेगी? या वह शिया और सुन्नियों के बीच झगड़ा बढ़ाकर अपनी रोटी सेकना चाहता है? क्या उसने ईरान पर दबाव बनाने के लिए सलाफी इस्लाम के समर्थकों से हाथ मिला लिया है, जिनका गढ़ पाकिस्तान है और जिसे सऊदी अरब से पैसा मिलता है? उधर रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने सऊदी अरब को धमकी दी है कि सीरिया पर हमला हुआ तो हम सऊदी अरब पर हमला बोल देंगे?  यह धमकी सऊदी शाहजादे बंदर बिन सुल्तान अल-सऊद की इस बात से नाराज होकर दी है कि रूस यदि सीरिया की पराजय को स्वीकार नहीं करेगा तो अगले साल फरवरी में होने वाले विंटर ओलिम्पिक्स के दौरान चेचेन चरमपंथियों खूनी खेल खेलने से रोक नहीं पाएगा। पुतिन की सऊदी शाहजादे से इसी महीने मुलाकात हुई है। पर इसका मतलब क्या है? यह अमेरिका की लड़ाई है या सऊदी अरब की?  अमेरिका इस इलाके में लोकतंत्र का संदेश लेकर आया है तो वह सऊदी अरब के साथ मिलकर क्या कर रहा है?

Thursday, August 29, 2013

यूपीए का आर्थिक राजनीति शास्त्र

देश का राजनीतिक अर्थशास्त्र या आर्थिक राजनीति शास्त्र एक दिशा में चलता है और व्यावहारिक अर्थ व्यवस्था दूसरी दिशा में जाती है। सन 1991 में हमने जो आर्थिक दिशा पकड़ी थी वह कम से कम कांग्रेस की विचारधारात्मक देन नहीं थी। मनमोहन सिंह ने विश्व बैंक के 'वॉशिंगटन कंसेंसस' के अनुरूप ही अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया। वह दौर वैश्वीकरण का शुरूआती दौर था। ऐसा कहा जा रहा था कि भारत इस दौड़ में चीन से तकरीबन डेढ़ दशक पीछे है, जापान और कोऱिया से और भी ज्यादा पिछड़ गया है। बहरहाल तमाम आलोचनाओं के उदारीकरण की गाड़ी चलती रही। एनडीए सरकार भी इसी रास्ते पर चली। सन 2004 में यूपीए सरकार ने दो रास्ते पकड़े। एक था सामाजिक कल्याण पर खर्च बढ़ाने की राह और दूसरी उदारीकरण की गाड़ी को आगे बढ़ाने की राह। 2009 के बाद यूपीए का यह अंतर्विरोध और बढ़ा। आज जिस पॉलिसी पैरेलिसिस का आरोप मनमोहन सिंह पर लग रहा है वह वस्तुतः सोनिया गांधी के नेतृत्व के कारण है। यदि वे मानती हैं कि उदारीकरण गलत है तो प्रधानमंत्री बदलतीं। आज का आर्थिक संकट यूपीए के असमंजस का संकट भी है। यह असमंजस एनडीए की सरकार में भी रहेगा। भारत की राजनीति और राजनेताओं के पास या तो आर्थिक दृष्टि नहीं है या साफ कहने में वे डरते हैं। 

जिस विधेयक को लेकर राजनीति में ज्वालामुखी फूट रहे थे वह खुशबू के झोंके सा निकल गया. लेफ्ट से राइट तक पक्षियों और विपक्षियों में उसे गले लगाने की ऐसी होड़ लगी जैसे अपना बच्चा हो. उसकी आलोचना भी की तो जुबान दबाकर. ईर्ष्या भाव से कि जैसे दुश्मन ले गया जलेबी का थाल. यों भी उसे पास होना था, पर जिस अंदाज में हुआ उससे कांग्रेस का दिल खुश हुआ होगा. जब संसद के मॉनसून सत्र के पहले सरकार अध्यादेश लाई तो वृन्दा करात ने कहा था, हम उसके समर्थक हैं पर हमारी आपत्तियाँ हैं. हम चाहते हैं कि इस पर संसद में बहस हो. खाद्य सुरक्षा सार्वभौमिक होनी चाहिए. सबके लिए समान. मुलायम सिंह ने कहा, यह किसान विरोधी है. नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी कि मुख्यमंत्रियों से बात कीजिए. पर लगता है उन्होंने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से बात नहीं की. भाजपा के नेता इन दिनों अलग-अलग सुर में हैं. दिल्ली में विधान सभा चुनाव होने हैं और पार्टी संग्राम के मोड में है. बिल पर संसद में जो बहस हुई, उसमें तकरीबन हरेक दल ने इसे चुनाव सुरक्षा विधेयक मानकर ही अपने विचार व्यक्त किए. सोमवार की रात कांग्रेसी सांसद विपक्ष के संशोधनों को धड़ाधड़ रद्द करने के चक्कर में सरकारी संशोधन को भी खारिज कर गए. इस गेम चेंजर का खौफ विपक्ष पर इस कदर हावी था कि सुषमा स्वराज को कहना पड़ा कि हम इस आधे-अधूरे और कमजोर विधेयक का भी समर्थन करते हैं. जब हम सत्ता में आएंगे तो इसे सुधार लेंगे.  

Tuesday, August 27, 2013

लोक और तंत्र के बीच यह कौन बैठा है?

पिछले साल दिसम्बर में दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद अचानक लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। वे समझ नहीं पा रहे थे कि किसके खिलाफ इस गुस्से का इजहार करें? और किससे करें? देश भयावह संदेहों का शिकार है। एक तरफ आर्थिक संवृद्धि, विकास और समृद्धि के कंगूरे हैं तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार और बेईमानी की कीचड़भरी राह है। समझ में नहीं आता हम कहाँ जा रहे हैं? आजादी के 66 साल पूरे हो चुके हैं और लगता है कि हम चार कदम आगे आए हैं तो छह कदम पीछे चले गए हैं। दो साल पहले इन्हीं दिनों अन्ना हजारे का आंदोलन जब शुरू हुआ था तब उसके साथ करोड़ों आँखों की उम्मीदें जुड़ गई थीं। पर वह आंदोलन तार्किक परिणति तक नहीं पहुँचा। और अन्ना आज अपनी जनतांत्रिक यात्राओं के साथ देश के कोने-कोने में जा रहे हैं। पर संशय कम होने के बजाय बढ़ रहे हैं। संसद से सड़क तक देश सत्याग्रह की ओर बढ़ रहा है। सत्याग्रह यानी आंदोलन। कैसा आंदोलन और किसके खिलाफ आंदोलन? गांधी का सत्याग्रह सुराज की खोज थी। कहाँ गया सुराज का सपना?

Monday, August 26, 2013

डिफेंस मॉनिटर का नया अंक

रक्षा आयात से भी चाहिए आजादी

डिफेंस मॉनिटर का छठा अंक बाजार में आ गया है। यह अंक रक्षा सामग्री के स्वदेशीकरण पर केन्द्रित है। इसके मुख्य लेख इस प्रकार हैं :-

कहानी पर्वत और तूफान की : रक्षा सामग्री के स्वदेशीकरण की दिशा में फाइटर प्लेन एचएफ-24 मारुत और युद्धपोत नीलगिरि के निर्माण की कहानियाँ दो अलग किस्म के अनुभवों को बताती है। रियर एडमिरल विजय एस चौधरी (सेनि) का विशेष लेख
एम्फीबियस एयरक्राफ्ट से और बढ़ेगी नौसेना की ताकत : एम्फीबियस विमान सागर की सतह पर भी उतर सकते हैं। जापानी विमान शिनमेवा यूएस-2 दुनिया का सर्वश्रेष्ठ एम्फीबियस विमान है, जिन्हें भारत खरीदने का विचार कर रहा है।
हाइड्रोग्राफी : सागर की गहराइयों की राजदार : कैप्टेन जीएस इंदा
तलवार की धार पर अफगानिस्तान : गुरमीत कँवल
कैसा हो आदर्श रक्षा उत्पादन : मृणाल पाण्डे
जीतेगा वही जो सोचेगा, हम पीछे क्यों रहें : प्रमोद जोशी
इंपोर्टेड माल की पुरानी लत है सेनाओं को : सुशील शर्मा
हिमालय सा हौसला लिए  जुटी रही आईटीबीपी :  श्याम प्रधान

इसके अलावा वर्दी वाले देवदूत, मिग-21 विमान : 50 साल का गबरू, उत्तराखंड में राहत की एक्सक्लूसिव तस्वीरें और रक्षा शब्दावली।


Sunday, August 25, 2013

रुपए की नहीं गवर्नेंस की फिक्र कीजिए

डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरने का मतलब कितने लोग जानते हैं? कितने लोग यह जानते हैं कि यह कीमत तय कैसे होती है? और कितने लोग जानते हैं कि इसका हमारी जिन्दगी से वास्ता क्या है? हम महंगाई को जानते हैं बाजार में चीजों की उपलब्धता को पहचानते हैं और अपनी आय को कम या ज्यादा होने की प्रक्रिया को भी समझते हैं। विश्व की मुद्राओं की खरीद-फरोख्त का बाजार है विदेशी मुद्रा बाजार। दूसरे वित्तीय बाजारों के मुकाबले यह काफी नया है और सत्तर के दशक में शुरू हुआ है। फिर भी कारोबार के लिहाज से यह सबसे बड़ा बाजार है। विदेशी मुद्राओं में प्रतिदिन लगभग चार हजार अरब अमेरिकी डालर के बराबर कामकाज होता है। दूसरे बाजारों के मुकाबले यह सबसे ज्यादा स्थायित्व वाला बाजार है। फिर भी इसमें इन दिनों हो रहे बदलाव से हम परेशान हैं। यह बदलाव लम्बा नहीं चलेगा। एक जगह पर जाकर स्थिरता आएगी। वह बिन्दु कौन सा है यह अगले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा।

Wednesday, August 21, 2013

Growth Vs Development Debate

Everything you wanted to know about the Sen-Bhagwati debate

The debate between two of the finest Indian economists—Amartya Sen and Jagdish Bhagwati—reflects the deeper question facing India’s political leaders

 The debate on economic policy has never been as riveting as it is today, with two giants from the world of academic economics, Amartya Sen and Jagdish Bhagwati, tackling each other on what India’s governance priorities should be. Sen is a Nobel Prize winner in economics and a professor of economics and philosophy at Harvard University. Bhagwati is a Columbia University professor of economics, who has been nominated for the top honour several times. Along with Sen and Avinash Dixit, he is considered to be among the three greatest Indian economists ever.

Tuesday, August 20, 2013

लाइसेंसी पत्रकारिता सम्भव नहीं

पत्रकारिता से जुड़ी वैबसाइट सैंस सैरिफ ने अपने पाठकों से इस विषय पर राय माँगी है कि पत्रकारों के चयन के लिए क्या कोई राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा होनी चाहिए? और यह भी क्या कोई लाइसेंस होना चाहिए जैसा वकालत या डॉक्टरी वगैरह का होता है? रोचक बात यह है कि इस पोल के जवाब में लगभग बराबरी की संख्या में पक्ष और विपक्ष में वोट पड़े हैं। कुछ समय पहले जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भी पत्रकारिता से जुड़ने के एक बुनियादी शैक्षिक योग्यता की सलाह दी थी। बड़ी संख्या में पत्रकार भी मानते हैं कि योग्यता होनी चाहिए। इसे बड़ी संख्या कहने के बजाय लगभग बहुमत कहना चाहिए। किसी को क्यों आपत्ति होगी? हाँ आपत्ति उस तरीके और कारण पर होनी चाहिए जो इस माँग के पीछे है। बहरहाल आप अपनी राय बनाएं उससे पहले इस बात की पृष्ठभूमि तक भी आपको जाना चाहिए।

Sunday, August 18, 2013

सदाचार भी इसी राजनीति में है

जोनाथन स्विफ्ट ने लिखा है, 'दुनिया जिसे राजनीति के नाम से जानती है वह केवल भ्रष्टाचार है और कुछ नहीं।' सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के इंग्लैंड में राजनीतिक व्यवस्था बन ही रही थी। पत्रकारिता जन्म ले रही थी। उन दिनों विमर्श पैम्फलेट्स के मार्फत होता था। आपने गुलीवर की यात्राएं पढ़ी होंगी, उसके लेखक जोनाथन स्विफ्ट। स्विफ्ट अपने दौर के श्रेष्ठ पैम्फलेटीयर थे। वह भी नई विधा थी। स्विफ्ट ने उस दौर की दोनों महत्वपूर्ण पार्टियों टोरी और ह्विग के लिए पर्चे लिखे थे। वे श्रेष्ठ व्यंग्य लेखक थे। अखबारों में सम्पादकीय लेखन के सूत्रधार थे, बल्कि पहले सम्पादकीय लेखक थे। तकरीबन तीन सौ साल पहले उनकी राजनीति के बारे में ऐसी राय थी।

सत्ता-केन्द्र कांग्रेस-भाजपा ही रहेंगे

हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण तमाम कारणों से विश्वसनीय नहीं होते। फिर भी वे सच के करीब होते हैं। सर्वेक्षणों के संचालक अक्सर अपने दृष्टिकोण आरोपित करते हैं। फिर भी धीरे-धीरे यह राय बन रही है कि सन 2014 के चुनाव परिणामों कैसे होंगे। मोटा निष्कर्ष है कि न तो यूपीए को और न एनडीए को कोई खास फायदा होगा। शायद क्षेत्रीय दलों को कुछ लाभ हो। वह भी कितना और कैसा होगा इसे लेकर भ्रम है। इस साल जनवरी में हुए इंडिया टुडे-नील्सन और एबीपी न्यूज-नील्सन के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे के अनुसार देश में आज चुनाव हों तो भाजपा की अगुआई वाला एनडीए कांग्रेस के नेतृत्व में सत्तारूढ़ यूपीए-2 पर भारी पड़ेगा। फिर मई में कुछ सर्वेक्षणों से यह बात उभर कर आई कि कांग्रेस हार जाएगी। मतलब नहीं कि भाजपा जीत जाएगी। मतलब सिर्फ इतना है कि जनता आज के हालात से नाराज़ है।

Friday, August 16, 2013

प्रधानमंत्री बनाम मोदी पर मीडिया

प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश के जवाब में नरेन्द्र मोदी के भाषण के बारे में अखबारों की कवरेज में खासी विविधता है। स्वतंत्रता दिवस का अवकाश होने के कारण देश के कई इलाकों में अखबार नहीं निकले, इसलिए उस स्तर पर कवरेज नहीं हुई जितनी सामान्य दिनों में होती है। दो-तीन बातें मुझे समझ में आईं जिनका विवरण मैं देना चाहता हूँ।

1. इस विषय पर सम्पादकीय टिप्पणी केवल अंग्रेजी के कुछ अखबारों में देखने को मिली। हिन्दी के अखबार ऐसे विषयों पर सम्पादकीय लिखने से बचते हैं, जिनमें राजनीतिक जोखिम हो।

2. हिन्दी के अखबारों ने पेज एक पर खबर देने में भी सावधानी बरती है। अलबत्ता नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान ने लगभग एक जैसे शीर्षक के साथ खबर दी है। नवभारत टाइम्स की लीड है 'अटैक कर घिर गए मोदी।' हिन्दुस्तान में लीड के साथ जुड़ी खबर है 'पीएम पर टिप्पणी करके चौतरफा घिर गए मोदी।' दैनिक जागरण की लीड है 'जश्न के मौके पर सियासी जंग।'इन सभी अखबारों ने प्रधानमंत्री के संबोधन पर औपचारिक सम्पादकीय हैं।

3. बिजनेस दैनिक मिंट की लीड का शीर्षक है, 'Study in contrast/ I-day speeches set stage for 2014' मुम्बई के डीएनए की नीति सम्पादकीय पेज छापने की नहीं है। उसने दोनों के वक्तव्यों को आमने-सामने रखकर एक ग्रैफिक दिया है।



Thursday, August 15, 2013

राष्ट्र के नाम संदेश बनाम राजनीतिक संदेश

राष्ट्रीय संबोधनों का राजनीतिक तमाशा

 गुरुवार, 15 अगस्त, 2013 को 18:42 IST तक के समाचार
narendra modi
साल 2001 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी राज्यस्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह जिला मुख्यालयों पर आयोजित करते आ रहे हैं.
इस बार यह समारोह कच्छ जिला मुख्यालय भुज के लालन कॉलेज कैंपस में हुआ. वे पहले भी प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषणों की समीक्षा इस प्रकार करते रहे हैं, जैसी इस बार की. पर इस बार उन्होंने ख़बरदार करके यह हमला बोला है.
क्या यह एक नई परंपरा पड़ने जा रही है? केंद्र सरकार और केंद्रीय राजनीतिक शक्ति के साथ असहमतियाँ आने वाले समय में कम नहीं बल्कि ज़्यादा ही होंगी. ऐसे में क्या स्वतंत्रता दिवस के संबोधनों को राजनीतिक संबोधनों के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. लेकिन लगता है कि लालकिले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस का संबोधन राजनीति से नहीं बच पाएगा.
मनमोहन सिंह यों भी सार्वजनिक सभाओं के लिहाज़ से अच्छे वक्ता नहीं हैं. ग्रासरूट राजनीति का उनका अनुभव नहीं है. उनके मुकाबले नरेंद्र मोदी शुरू से जमीन पर काम करते रहे हैं. उनके पास जनता को लुभाने वाले मुहावरे और लच्छेदार भाषा है. वे खांटी देसी अंदाज़ में बोलते हैं.