Tuesday, October 23, 2012

अपने सवालों पर क्यों खामोश हो जाता है मीडिया

जिन्दल स्टील की ओर से ज़ी न्यूज़ के खिलाफ की गई शिकायत की जाँच चल रही है। जाँच के नतीज़े किस तरह सामने आएंगे, अभी कहना मुश्किल है, पर मुख्यधारा के मीडिया में इस सवाल पर चुप्पी है। लगभग ऐसी ही चुप्पी नीरा राडिया मामला उठने पर देखी गई थी। बेशक यह एक शिकायत है और किसी भी पक्ष को लेकर कोई बात नहीं कही जा सकती, पर सामान्य जानकारियाँ तो सामने लाई जा सकती हैं। अपने से जुड़े जितने भी मामले आए, जिनमें पेड न्यूज़ का मामला भी है, हमारा मीडिया खामोश हो जाता है। खामोश रहकर सुविचारित बात कहना उसकी फितरत नहीं है। केजरीवाल, गडकरी, सलमान खुर्शीद, रॉबर्ट वडरा और अंजली दमनिया के मामले सामने हैं। इधर पायनियर में सपन दासगुप्ता ने एक लेख लिखा है जो ध्यान खींचता है। उनके लेख का यह अंश महत्वपूर्ण हैः-

"The media didn’t react to the JSPL sting with the same measure of breathless excitement that greets every political corruption scandal because it is aware that this is just the tip of the iceberg. A thorough exploration of the media will unearth not merely sharp business practices but even horrifying criminality....
"Since the Press Council of India chairman Justice (retired) Markandey Katjuis desperate to make a mark, he would do well to suo moto establish a working group to inquire into journalistic ethics. He could travel to a small State in western India where there persistent rumours that those who claim to be high-minded crusaders arm-twisted a Chief Minister into bankrolling an event as the quid pro quo for not publishing an investigation into some dirty practices.
"The emphasis these days is on non-publishing. One editor, for example, specialised in the art of actually commissioning stories, treating it in the proper journalistic way and even creating a dummy page. This dummy page would be sent to the victim along with a verbal ‘demand notice’. Most of them paid up. This may be a reason why this gentleman’s unpublished works are thought to be more significant than the few scribbles that reached the readers and for which he received lots of awards."

सपन दासगुप्ता एक नए चलन की ओर ध्यान दिला रहे हैं। वह है खबर न छापना। उन्होंने एक सम्पादक का ज़िक्र किया है जो किसी के बारे में पड़ताल कराते हैं, फिर उसके बारे में  एक पेज बनवाते हैं। फिर उस डमी पेज को सम्बद्ध व्यक्ति के पास भिजवाते हैं। माँग पूरी होने पर पेज रुक जाता है। ऐसा कितना होता है पता नहीं, पर अखबारों और टीवी स्टिंग के किस्से बताते हैं कि खोजी पत्रकारिता का एक रूप अब खोज-खबर पर ढक्कन लगाना हो गया है। हाल के वर्षों में हमारे मीडिया की साख को सबसे जबर्दस्त धक्का लगा है। पेड न्यूज़ के चलन के पीछे मालिकों का हाथ भी था। इसमें केवल पत्रकार होते तो उनके बारे में कुछ कहा भी जाता। यानी रोग ज्यादा बड़ा है। अफसोस इस बात का  है कि इसका ज़िक्र भी नहीं होता। हाल में आईबीएन-सीएनेन के राजदीप सरदेसाई ने एक ट्वीट किया,“Behind every successful neta is a real estate co, sugar mill, mining co, education baron”, इसके जवाब में कांग्रेस सांसद मिलिन्द देवड़ा का ट्वीट आया, “Not newspaper/news channel?” पत्रकार निर्भीक तब होते थे, जब वे फक्कड़ थे। तब उन्हें इतना सीधा जवाब नहीं मिलता था। अब वे भी शीशे के घरों में रहने लगे हैं। 

सपन दासगुप्ता का लेख
ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष के नाम सुधीर चौधरी का पत्र
कोयला घोटाले में मीडिया मालिक
कोलगेट में मीडिया हाउस
चार मीडिया हाउसों पर उंगलियाँ

Monday, October 22, 2012

सरकार के गले की हड्डी बनेगा ज़मीन का सवाल


 आर्थिक-सामाजिक विकास के सैद्धांतिक सवालों पर टकराव चरम बिन्दु पर आ रहा है। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन विधेयक 2012 के मसौदे को पिछले हफ्ते ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स से स्वीकृति मिलने के बाद उम्मीद है कि कैबिनेट से स्वीकृति मिलने में देर नहीं है और संसद के अगले सत्र में इसे पास करा लिया जाएगा। पिछले साल 7 सितम्बर को इसे लोकसभा में पेश किया गया था, जिसके बाद इसे ग्रामीण विकास की स्थायी समिति के पास भेज दिया था, जिसने मई 2012 में इसे अपनी रपट के साथ वापस भेजा था। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स ने स्थायी समिति की सिफारिशों को शामिल करते हुए इसे अंतिम रूप दे दिया है। 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए सन 2007 में एक विधेयक पेश किया गया था। इसके बाद भूमि अधिग्रहण से विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्स्थापन के लिए एक और विधेयक पेश किया गया। दोनों 2009 में लैप्स हो गए। इस बीच सिंगुर-नंदीग्राम से नोएडा और कूडानकुलम तक कई तरह के आंदोलन शुरू हुए जो अभी तक चल रहे हैं। आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को तेजी से लागू करने के कारण सरकारी अलोकप्रियता बढ़ी है। इसलिए सरकार अब दूसरे विकल्पों की ओर जाएगी। उसके पास खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण के कानूनों के प्रस्ताव भी हैं, जो ग्रामीण इलाकों में उसकी लोकप्रियता बढ़ा सकते हैं।

Sunday, October 21, 2012

राष्ट्रगान के विश्व रिकॉर्ड

25 जनवरी 2012 औरंगाबाद

20 अक्टूबर 2012 लाहौर
केवल राष्ट्रगान गाने से काम चलता हो तो पाकिस्तान ने गिनीज़ बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के अंतर्गत विश्व रिकॉर्ड कायम कर लिया है। शनिवार 20 अक्टूबर को लाहौर के नेशनल हॉकी स्टेडियम में 44,200 लोगों ने एक साथ खड़े होकर देश का राष्ट्रगान गाया। पाकिस्तान के लिए एक उपलब्धि यह भी थी कि उसने इस मामले में भारत का रिकॉर्ड तोड़ा था। 25 जनवरी 2012 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के डिवीज़नल स्पोर्ट्स ग्राउंड में 15,243 लोगों ने एक साथ खड़े होकर वंदे मातरम गाया था। वह कार्यक्रम लोकमत मीडिया कम्पनी ने आयोजित किया था। उसके पहले 14 अगस्त 2011 को पाकिस्तान के कराची शहर में 5,857 लोगों ने एक साथ अपना राष्ट्रगान गाया था। इस रिकॉर्ड को कायम करने के लिए फेसबुक और ट्विटर की मदद ली गई थी।

शनिवार को लाहौर में कायम किए गए विश्व रिकॉर्ड में पाकिस्तान के पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ भी शामिल थे। राष्ट्रगान और समूहगान हमें एक जुट होने की प्रेरणा देते हैं। हाल में मलाला युसुफज़ई प्रकरण में पाकिस्तान की सिविल सोसायटी ने एकता का परिचय दिया था। इस एकता की दिशा बदहाली और बुराइयों से लड़ने की होनी चाहिए। हम होंगे कामयाब जैसे समूहगान चमत्कारी हो सकते हैं बशर्ते हमारी सामूहिक पहलकदमी में दम हो। सम्भव है कल भारत में कोई इससे भी बड़ी भीड़ से राष्ट्रगान गवाने में कामयाब हो जाए, पर असल बात भावना की है।

पाकिस्तान में 44,200 ने एक साथ गाया राष्ट्रगान

Friday, October 19, 2012

न्यूज़वीक का प्रिंट संस्करण बंद होगा

पिछले दो साल से लड़खड़ाती समाचार पत्रिका न्यूज़वीक आखिरकार प्रिंट मीडिया के एडवर्टाइज़िंग रेवेन्यू में लगातार गिरावट का शिकार हो गई। गुरुवार को घोषणा की गई कि इस साल के अंत तक या अगले साल के शुरू में इसके प्रिंट संस्करण का प्रकाशन बंद हो जाएगा। इसका ऑनलाइन रूप बना रहेगा, जो ऑनलाइन पत्रिका डेली बीस्ट के साथ इस समय भी चल रहा है। 

हाल के वर्षों में न्यूज़वीक पर सबसे बड़ा संकट  2010 में आया। तब उसे एक दानी किस्म के स्वामी ने खरीद लिया। इसे ख़रीदने वाले 91 साल के सिडनी हर्मन थे, जो ऑडियो उपकरणों की कंपनी हर्मन इंडस्ट्रीज़ के संस्थापक थे। वॉशिंगटन पोस्ट कम्पनी, जिसने न्यूज़वीक को बेचा, न्यूज़वीक’ अपने आप में और इसे खरीदने वाले सिडनी हर्मन तीनों किसी न किसी वजह से महत्वपूर्ण हैं। कैथरीन ग्राहम जैसी जुझारू मालकिन के परिवार के अलावा वॉशिंगटन पोस्ट के काफी शेयर बर्कशर हैथवे के पास हैं, जिसके स्वामी वॉरेन बफेट हैं।न्यूज़वीक को ख़रीदने की कोशिश करने वालों में न्यूयॉर्क डेली न्यूज़ के पूर्व प्रकाशक फ्रेड ड्रासनर और टीवी गाइड के मालिक ओपनगेट कैपिटल भी शामिल थे। पर सिडनी हर्मन ने 1 डॉलर में खरीदकर इसकी सारी देनदारी अपने ऊपर ले ली। 

Monday, October 15, 2012

टाइम्स ऑफ इंडिया का एई समय


 कुछ दिन पहले आनन्द बाज़ार पत्रिका ग्रुप ने कोलकाता से बांग्ला अखबार 'एबेला' यानी इस घड़ी  शुरू किया था। और अब दुर्गापूजा के उत्सव की शुरूआत यानी महालया के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया ने 'एई समय' लांच किया है। दोनों में बुनियादी फर्क है। एबेला टेबलॉयड है और 'एई समय' ब्रॉडशीट अखबार है।

बांग्ला और हिन्दी समाज में भाषा का कितना फर्क है वह यहाँ देखा जा सकता है। कोलकाता के लिए आनन्द बाज़ार पत्रिका जीवन का एक हिस्सा है। उसके मुकाबले किसी गैर-बांग्ला समूह द्वारा बांग्ला अखबार निकालने की कोशिश अपने आप में दुस्साहस है। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह ने चेन्नई में हिन्दू के मुकाबले अंग्रेजी अखबार निकाला था, पर कोलकाता में वह बांग्ला अखबार के साथ सामने आए हैं। एक ज़माने में टाइम्स हाउस ने कोलकाता से हिन्दी का नवभारत टाइम्स भी निकाला था, जो चला नहीं।

ऐसे जन सत्याग्रहों की हमें ज़रूरत है


मज़रूह सुलतानपुरी  की नज़्म है , 'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।' ( मूल आलेख में मैंने इसे मखदूम मोहियुद्दीन की  रचना लिखा था, जिसे अब मैंने सुधार दिया है। इसका संदर्भ कमेंट में देखें।)

हालांकि एकता परिषद की कहानी के पीछे वामपंथी जोश-खरोश नहीं है। और न इसकी कार्यशैली और नारे इंकलाबी हैं, पर यह संगठन रेखांकित करता है कि आधुनिक भारत का विकास गरीब-गुरबों, दलितों, आदिवासियों, खेत-मज़दूरों और छोटे किसानों के विकास के बगैर सम्भव नहीं है। और इनके अधिकारों की उपेक्षा करके बड़े औद्योगिक-आर्थिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती । पर इस विशाल जन-शक्ति का आवाज़ उठाने के लिए ज़रूरी नहीं है कि कड़वाहट भरा, तिक्त-शब्दावली से गुंथा-बुना सशस्त्र आंदोलन खड़ा किया जाए। इसके कार्यक्रम सुस्पष्ट हैं और इनमें नारेबाजी की जगह मर्यादा और अनुशासन है। इससे जुड़े लोगों ने पूरे देश में कई तरह की यात्राएं की है, जिससे इनका जुड़ाव सार्वदेशिक है। आप चाहें तो इसे राजनीतिक आंदोलन कह सकते हैं क्योंकि आखिरकार यह राजव्यवस्था और राजनीति से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाता है, पर सत्ता को सीधे अपने हाथ में लेने का प्रयास नहीं करता है। पिछले हफ्ते इसका  जन सत्याग्रह एक मोड़ पर आकर वापस हो गया। साथ में अनेक सवाल पीछे छोड़ गया। यह बात अलग है कि इसकी आवाज़ उतने ज़ोर से नहीं सुनी गई, जितने ज़ोर से कुछ दूसरे आंदोलनों की सुन ली जाती है। यह बात हमारे लोकतंत्र, सरकारी कार्य-प्रणाली और मीडिया की समझ को भी रोखांकित करती हैं।

पिछले साल जब अन्ना-आंदोलन की लाइव कवरेज मीडिया में हो रही थी, तब थोड़ी देर के लिए महसूस हुआ कि हमारा मीडिया अब राष्ट्रीय महत्व के सवालों को उठाना चाहता है। यह गलतफहमी जल्द दूर हो गई। पिछले हफ्ते 11 अक्टूबर को महानायक अमिताभ बच्चन के जन्मदिन की कवरेज देखने से लगा कि हमारी वरीयताएं बदली नहीं हैं। न जाने क्यों मीडिया की शब्दावली का ‘फटीग फैक्टर’ इन जन्मदिनों पर लागू नहीं होता? साँप-सपेरे, जादू-टोना, प्रिंस, मटुकनाथ, सचिन, धोनी, सहवाग से लेकर राहुल महाजन और राखी सावंत तक सारे प्रयोग करके देख लिए। पर मस्ती-मसाला को लेकर मीडिया थका नहीं। बहरहाल पिछली दो अक्टूबर को ग्वालियर से तकरीबन साठ हजार लोगों का एक विशाल मर्यादित जुलूस दिल्ली की ओर चला था। इसका नाम था जन सत्याग्रह 2012। उम्मीद थी कि इस बार मीडिया की नजरे इनायत इधर भी होगी। और सरकार ने इसी खतरे को भाँपते हुए समय रहते इसे टाल दिया। 

Friday, October 12, 2012

तोता राजनीति के मैंगो पीपुल

भारतीय राज-व्यवस्था के प्राण तोतों में बसने लगे हैं। एक तोता सीबीआई का है, जिसमें अनेक राजनेताओं के प्राण हैं। फिर मायावती, मुलायम सिंह, ममता और करुणानिधि के तोते हैं। उनमें यूपीए के प्राण बसते हैं। तू मेरे प्राण छोड़, मैं तेरे प्राण छोड़ूं का दौर है। ये सब तोते सात समंदर और सात पहाड़ों के पार सात परकोटों से घिरी मीनार की सातवीं मंजिल में सात राक्षसों के पहरे में रहते हैं। तोतों, पहाड़ों और राक्षसों की अनंत श्रृंखलाएं हैं, और राजकुमार लापता हैं। तिरछी गांधी टोपी सिर पर रखकर अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में कटी बत्तियाँ जोड़ रहे हैं। हाल में उन्होंने गांधी के हिन्द स्वराज की तर्ज पर एक किताब लिखी है। टोपियाँ पहने  आठ-दस लोगों ने एक नई पार्टी बनाने की घोषणा की है। पिछले 65 साल में भारतीय राजनीति में तमाम प्रतीक और रूपक बदले पर टोपियों और तोतों के रूपक नहीं बदले। इस दौरान हमने अपनी संस्थाओं, व्यवस्थाओं और नेताओं की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी है। आम आदमी ‘मैंगो पीपुल’ में तब्दील हो गया है। संज़ीदगी की जगह घटिया कॉमेडी ने ले ली है। 

Monday, October 8, 2012

समस्या उदारीकरण नहीं, कुप्रशासन है

आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण और आर्थिक गतिविधियों में तेजी के बगैर हमारे देश में गहराई तक बैठी गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने का तरीका नज़र नहीं आता। इसके साथ कुछ बातें जुड़ी हैं। जैसे ही ऊपर बताई गतिविधियँ शुरू होंगी सबसे पहले इससे वे लोग ही जुड़ेंगे जो शिक्षित, किसी खास धंधे में कुशल, स्वस्थ और सक्रिय हैं। दुनिया में इस समय जो व्यवस्था है वह पूँजीवादी है। इस दौरान सोवियत संघ और चीन जैसे कुछ देशों में पूँजीवाद का समाजवादी मॉडल आया था, जिसमें नियोजन और लगभग युद्ध की अर्थव्यवस्था के तर्ज पर पिछड़ेपन को दूर करने की कोशिश की गई थी। इस कोशिश में रूस के लाखों किसान मारे गए थे। चीन में ग्राम-केन्द्रित क्रांति हुई थी, जिसने तीन दशक पहले रास्ता बदल लिया। एक मानवीय और उच्चस्तरीय व्यवस्था के आने के पहले जिसे आप समाजवाद कह सकते हैं, पिछड़ेपन से छुटकारा ज़रूरी है। पिछड़ेपन के तमाम रूप हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक वगैरह। यूरोप और अमेरिका का समाज रूस और चीन के समाज से ऊँचे स्तर पर आ चुका था, पर वहाँ समाजवाद नहीं आया। इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ नहीं आ सकता या नहीं आएगा। कार्ल मार्क्स आज प्रासंगिक हैं तो पूँजीवाद के विश्लेषण के कारण। पर उन्होंने अपने समाजवाद की कोई रूपरेखा नहीं दी थी। लेनिन ने अपने तरीके से उसे परिभाषित किया और रूस में एक शुरूआत की। मार्क्सवाद के कुछ प्रवर्तकों को संशोधनवादी कहा जाता है। इनमें बंर्सटीन और कौटस्की भी हैं। इनका विचार है कि पूँजीवादी व्यवस्था का समाजवाद में रूपांतरण होना चाहिए। इस लिहाज से समाजवाद भी पूँजीवाद की तरह वैश्विक विचार है। इस अवधारणा पर जब आगे बढ़ते हैं तब कई प्रकार के विचार एक साथ सामने आते हैं। सोवियत संघ में आर्थिक गतिविधियाँ पूरी तरह राज्य केन्द्रित थीं। वॉशिंगटन कंसेंसस पूरी तरह से निजी हाथों में और समृद्ध होने को आतुर व्यक्तियों के हाथों में सत्ता देने को आतुर है। रूसी साम्यवाद परास्त हुआ और वॉशिंगटन कंसेंसस भी विफल है। पर हम अभी मँझधार में हैं। हमें वैश्विक आर्थिक और तकनीकी प्रतियोगिता में बने रहने के लिए विशाल ताने-बाने की ज़रूरत है। इस प्रयास में टू-जी और कोल-गेट वगैरह होते हैं। ज़रूरत इनके नियमन और जनता के दबाव की है। इसके लिए जनता का स्वस्थ, शिक्षित और जागरूक होना ज़रूरी है। बेहतर हो हम तरीके बताएं कि यह काम कैसे होगा। मेरे विचार से हम लोग मध्य वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। यह वर्ग पढ़ा-लिखा और अपेक्षाकृत जागरूक और व्यवस्था को समझने वाला होता है। अभी मैं हस्तक्षेप में अरुण महेश्वरी का लेख पढ़ रहा था। उन्हें ममता बनर्जी के राज में निराशा मिली है। दरअसल वाम मोर्चा को लम्बे समय बाद यह समझ में आया कि रास्ता कहाँ है। तब तक राजनीतिक रूप से वे गलतियाँ कर चुके थे। वामपंथी पार्टियों को वैश्विक गतिविधियों के बरक्स अपने विचार बनाने चाहिए। रूसी म़डल फेल हो चुका है। चीन में अभी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है। यह शासन दो-चार लोगों की साज़िश का परिणाम नहीं है। उसके अंतर्विरोध भी सामने आ रहे हैं। हमें पहले तय करना चाहिए कि हम तेज आधुनिकीकरण चाहते हैं या नहीं। बेशक क्रोनी कैपिटलिज़्म, कॉरपोरेट क्राइम और पूँजी के नाम पर प्राकृतिक सम्पदा का ध्वंस गलत है, पर निजी पूँजी, विदेशी पूँजी और शहरीकरण में चाहिए। यदि आप समझते हैं कि नहीं चाहिए, तब फिर अपनी पूरी बात को बताएं कि आपका रास्ता क्या है।  नीचे सी एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख है, पर यह संदर्भ इसलिए ज़रूरी है कि हम सारी चीजों को एक साथ देख रहे हैं। समस्या उदारीकरण है तो उसे खत्म कीजिए। उपयोगी है तो पूरी ताकत से लागू कीजिए।

Friday, October 5, 2012

हिन्दी में रक्षा और सामरिक विषयों पर पत्रिका ‘डिफेंस मॉनिटर’


हिन्दी में रक्षा, आंतरिक सुरक्षा, विदेशनीति और नागरिक उड्डयन जैसे विषयों पर केन्द्रित पत्रिका डिफेंस मॉनिटर का पहला अंक प्रकाशित होकर सामने आया है। अंग्रेज़ी में निश या विशिष्ट पत्रिकाओं का चलन है। हिन्दी में यह अपने किस्म की पहली पत्रिका है। इसका पहला अंक वायुसेना विशेषांक है। इसमें पूर्व नौसेनाध्यक्ष अरुण प्रकाश, एयर मार्शल(सेनि) एके सिंह, एयर वाइस मार्शल(सेनि) कपिल काक, हर्ष वी पंत, घनश्री जयराम और राजीव रंजन के अलावा मृणाल पांडे का उन्नीसवी सदी के भारतीय फौजियों पर विशेष लेख है। इसके अलावा सुखोई विमानों में ब्रह्मोस मिसाइल तैनात करने पर एक विशेष आलेख है। हिन्दी सिनेमा और भारतीय सेना पर आलेख है साथ ही एचएएल के चेयरमैन आरके त्यागी और डीआरडीओ के प्रमुख वीके सारस्वत के इंटरव्यू हैं। पत्रिका के प्रबंध सम्पादक सुशील शर्मा ने बताया कि इसी विषय पर केन्द्रित द्विभाषी वैबसाइट भारत डिफेंस कवच की सफलता के बाद इसे द्वैमासिक पत्रिका के रूप में शुरू किया गया है। कुछ समय बाद इसकी समयावधि मासिक करने की योजना है। पत्रिका के मुख्य सम्पादक हैं प्रमोद जोशी।   

Tuesday, October 2, 2012

न्यूयॉर्कर में समीर जैन और टाइम्स ऑफ इंडिया



बुनियादी तौर पर अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के जीवन और संस्कृति पर केन्द्रित पत्रिका न्यूयॉर्कर निबंध लेखन, फिक्शन, व्यंग्य लेखन, कविता और खासतौर से कार्टूनों के लिए विशिष्ट है। किसी ज़माने में हिन्दी में भी ऐसी पत्रिकाएं थीं, पर आधुनिकता की दौड़ में हमने सबको खत्म होने दिया। इधर पिछले कुछ वर्षों में भारत केन्द्रित लेख भी प्रकाशित हुए हैं। पत्रिका के ताज़ा अंक (8अक्टूबर,2012) में भारत के समीर जैन, विनीत जैन और टाइम्स ऑफ इंडिया के बारे में इसके प्रसिद्ध मीडिया क्रिटिक केन ऑलेटा का नौ पेज का आलेख छपा है। ऑलेटा 1992 से एनल्स ऑव कम्युनिकेशंस कॉलम लिख रहे हैं। सिटिज़ंस जैन शीर्षक आलेख में उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के विस्तार का विवरण दिया है। आलेख के पहले सफे के सबसे नीचे इसका सार इन शब्दों में दिया गया है, "Their success is a product of an unorthodox philosophy." 

Monday, October 1, 2012

बीजेपी को चाहिए हाजमोला

लाल कृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में 15 सितम्बर को फ्रांसिस फुकुयामा की इतिहास का अंत अवधारणा का हवाला देते हुए भारतीय राजनीति के युगांतरकारी मोड़ का ज़िक्र किया है। उनके अनुसार 1989 भारत के राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ रहा। इस वर्ष के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने एक लम्बी छलांग लगाते हुए 1984 की दयनीय दो सीटों के मुकाबले 86 सीटों का सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया। भाजपा राष्ट्रीय राजनीति पर कांग्रेस पार्टी के एकाधिकार को चुनौती देने वाले मुख्य दल के रुप में उभरी। अगले दशक में भाजपा 1996 तक, तेजी से बढ़ती रही और कांग्रेस पार्टी सिकुड़ती गई, जब भाजपा लोक सभा में सर्वाधिक बड़े दल के रुप में उभरी, और 1998-1999 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने केंद्र सरकार का पूर्ण नियंत्रण संभाल लिया। आडवाणी जी ने लिखा, तब से, जब भी कोई मुझसे पूछता है: राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के मुख्य योगदान को आप कैसे निरूपित करेंगें; तो सदैव मेरा उत्तर रहता है: भारत की एकदलीय प्रभुत्व वाली राजनीति को द्विध्रुवीय राजनीति में परिवर्तित करना। यह उपलब्धि न केवल भाजपा अपितु कांग्रेस और निस्संदेह देश तथा इसके लोकतंत्र के लिए वरदान सिध्द हुई है। दुर्भाग्य से कांग्रेस पार्टी इसे इस रुप में नहीं लेती, भाजपा को एक मुख्य विपक्ष मानकर जिसके साथ सतत् सवांद करना शासन के लिए लाभकारी हो सकता है के बजाय इसे एक शत्रु के रुप में मानती है जिसे हटाना और किसी भी कीमत पर मिटाना उसका लक्ष्य है। प्रणव मुखर्जी अपवाद थे। नेता लोकसभा के रुप में यूपीए के अधिकांश कार्यकाल में उन्होंने मुख्य विपक्ष के नेतृत्व से निरंतर संवाद बनाए रखा। 

Friday, September 28, 2012

चुनावी नगाड़े और महाराष्ट्र का शोर

ऐसा लगता है कि एनसीपी के ताज़ा विवाद में अजित पवार नुकसान उठाने जा रहे हैं। शरद पवार का कहना है कि यह विवाद सुलझ गया है। यानी अजित पवार का इस्तीफा मंज़ूर और बाकी मंत्रियों का इस्तीफा नामंज़ूर। आज शुक्रवार को मुम्बई में एनसीपी विधायकों की बैठक हो रही है, जिसमें स्थिति और साफ होगी।
नेपथ्य में चुनाव के नगाड़े बजने लगे हैं। तृणमूल कांग्रेस की विदाई के बाद एनसीपी के विवाद के शोर में नितिन गडकरी का संदेश भी शामिल हो गया है कि जल्द ही चुनाव के लिए तैयार हो जाइए। बीजेपी ने एफडीआई को मुद्दा बनाने का फैसला किया है। पिछले महीने कोल ब्लॉक पर बलिहारी पार्टी को यह मुद्दा यूपीए ने खुद आगे बढ़कर दे दिया है। पर व्यापक फलक पर असमंजस है। बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठकों के समांतर यूपीए समन्वय समिति की पहली बैठक गुरुवार को हुई। यह समन्वय समिति दो महीने पहले जुलाई के अंतिम सप्ताह में कांग्रेस और एनसीपी के बीच विवाद को निपटाने का कारण बनी थी। संयोग है कि उसकी पहली बैठक के लिए एक और विवाद खड़ा हो गया है। अब एनसीपी के टूटने का खतरा है और महाराष्ट्र में नए समीकरण बन रहे हैं। वास्तव में चुनाव करीब हैं।