Sunday, December 25, 2022

संविधान, संसद और सुशासन


संसद का शीतकालीन सत्र इस साल पूर्व निर्धारित समय से छह दिन पहले पूरा हो गया। पूर्व निर्धारित समय 29 दिसंबर था, पर वह 23 को ही पूरा हो गया। सत्र के दौरान दोनों सदनों से नौ विधेयक पास हुए। संसदीय कार्य मंत्रालय के अनुसार इस सत्र में लोकसभा में 97 प्रतिशत और राज्यसभा में 103 प्रतिशत उत्पादकता रही। यानी कई मायनों में यह सत्र उल्लेखनीय रहा, जिसमें कम समय में ज्यादा काम हो गया। तवांग में भारत-चीन मुठभेड़, कोविड-19 के नए खतरे, जजों की नियुक्ति और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में अड़ंगों की खबरों के बावजूद इस सत्र में उत्पादकता अच्छी रही। बीच में हंगामा भी हुआ, पर संसदीय कर्म चलता रहा। अलबत्ता एक बात रह-रहकर परेशान करती है। असहमतियाँ जीवंत लोकतंत्र की निशानी हैं, पर कुछ सवालों पर राष्ट्रीय आमराय भी होनी चाहिए। कुछ मामलों पर आमराय बनाने में हमारी राजनीति विफल क्यों है?  

श्रेष्ठ परंपराएं

संसदीय गतिविधियों को देखते हुए कुछ सवाल मन में आते हैं। श्रेष्ठ संसदीय कर्म क्या है और गुड-गवर्नेंस यानी सुशासन की संज्ञा किसे दें? समय से पहले सत्र का समापन होने पर चलते-चलाते कांग्रेस ने कहा कि यह सब राहुल गांधी की यात्रा को रोकने की कोशिश है। और यह भी कि सरकार चर्चा से भागना चाहती है, जबकि सरकार का कहना है कि दोनों सदनों की बिजनेस एडवाइज़री कमेटी की बैठक में सर्वसम्मति से सत्र जल्दी खत्म करने का फैसला किया गया। क्या इस सर्वसम्मति में कांग्रेस पार्टी शामिल नहीं थी? बहरहाल यह राजनीति है, जिसमें कहने और करने के बीच फर्क होता है। दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने एकबार फिर से याद दिलाया कि मसलों पर असहमतियों और सहमतियों की अभिव्यक्ति चर्चा की गुणवत्ता के रूप में व्यक्त होनी चाहिए न कि गतिरोध के रूप में। पर व्यावहारिक राजनीति को ये बातें भी औपचारिकता ही लगता ही लगती हैं।

सुशासन दिवस

संविधान, संसद और सुशासन का करीबी रिश्ता है। तीनों साथ-साथ चलते हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से नवंबर और दिसंबर के महीनों में दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू किए गए। एक है 26 नवंबर को संविधान दिवस और दूसरा है 25 दिसंबर को सुशासन दिवस। 1949 की 26 नवंबर को हमारे संविधान को स्वीकार किया गया था। 2015 से संविधान दिवसमनाने की परंपरा शुरू की गई। उस साल संसद में दो दिन का विशेष अधिवेशन रखा गया, जिसमें सदस्यों ने जो विचार व्यक्त किए थे, उनपर गौर करने की जरूरत है। इसके एक साल पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 23 दिसंबर 2014 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, और पंडित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) को भारत-रत्न से अलंकृत किया। उसके साथ ही यह घोषणा की गई कि अटल जी की जयंती को प्रतिवर्ष सुशासन-दिवस मनाया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अटल बिहारी वाजपेयी के दृष्टिकोण 'अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार' को कार्यान्वित करने का वायदा किया था।

Wednesday, December 21, 2022

तवांग-प्रकरण और चीन की वैश्विक-राजनीति

 


देस-परदेश

गत 9 दिसंबर को तवांग के यांग्त्से क्षेत्र में हुई हिंसक भिड़ंत को भारत-चीन रिश्तों के अलावा वैश्विक-संदर्भों में भी देखने की जरूरत है. अक्तूबर के महीने में हुई चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस से दो संदेश निकल कर आए थे. एक, राष्ट्रपति शी चिनफिंग की निजी ताकत में इज़ाफा और उनके नेतृत्व में चीन की आक्रामक मुद्रा. दूसरी तरफ उसके सामने खड़ी मुसीबतें भी कम नहीं हैं, खासतौर से कोविड-19 वहाँ फिर से जाग गया है. 

पिछले साल फरवरी में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से विश्व-व्यवस्था को लेकर कुछ बुनियादी धारणाएं ध्वस्त हुई हैं. इनमें सबसे बड़ी धारणा यह थी कि अब देशों के बीच लड़ाइयों का ज़माना नहीं रहा. यूक्रेन के बाद ताइवान को लेकर चीनी गर्जन-तर्जन को देखते हुए सारे सिद्धांत बदल रहे हैं. दक्षिण चीन सागर में चीन संरा समुद्री कानून संधि का खुला उल्लंघन करके विश्व-व्यवस्था को चुनौती दे रहा है.

अभी तक माना जा रहा था कि जब दुनिया के सभी देशों का आपसी व्यापार एक-दूसरे से हो रहा है, तब युद्ध की स्थितियाँ बनेंगी नहीं, क्योंकि सब एक-दूसरे पर आश्रित हैं. एक विचार यह भी था कि जब पश्चिमी देशों के साथ चीन की अर्थव्यवस्था काफी जुड़ गई है, तब मार्केट-मुखी चीन इस व्यवस्था को तोड़ना नहीं चाहेगा. पर हो कुछ और रहा है.

एक गलतफहमी यह भी थी कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की आर्थिक-पाबंदियों का तोड़ निकाल पाना किसी देश के बस की बात नहीं. उसे भी रूस ने ध्वस्त कर दिया है. परंपराएं टूट रही हैं, भरोसा खत्म हो रहा है. ऐसा लगता है कि जैसे बदहवासी का दौर है.

भारतीय दुविधा

इस लिहाज से भारत को भी अपनी विदेश और रक्षा-नीति पर विचार करना जरूरी हो गया है. आंतरिक राजनीति में जो भी कहा जाए, चीनी आक्रामकता का जवाब फौजी हमले से नहीं दिया जा सकता. इन बातों का निपटारा डिप्लोमैटिक तरीकों से ही होगा. अलबत्ता भारत को अपनी आर्थिक, सैनिक और राजनयिक-शक्ति को बढ़ाना और उसका समझदारी से इस्तेमाल करना होगा. साथ ही वैश्विक-समीकरणों को ठीक से समझना भी होगा.

तवांग-प्रकरण के साथ तीन परिघटनाओं पर ध्यान देने की जरूरत है. एक, भारत के अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण. दो, अमेरिका का रक्षा-बजट, जो 858 अरब डॉलर के साथ इतिहास का सबसे बड़ा सैनिक खर्च तो है ही, साथ ही उससे चीन से मुकाबले की प्रतिध्वनि आ रही है. तीसरी परिघटना है जापान की रक्षा-नीति में बड़ा बदलाव, जिसमें आने वाले समय के खतरनाक संकेत छिपे है.

चुनौतियाँ

यह सब रूस-यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में हो रहा है, जिसका अंत होता अभी दिखाई नहीं पड़ता. इन सब बातों के अलावा उत्तरी कोरिया और पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों में सक्रिय अल कायदा, बोको हराम और इस्लामिक स्टेट जैसे अतिवादी समूहों की चुनौतियाँ भी हैं.

चीनी अर्थव्यवस्था का विस्तार अंततः उसकी भिड़ंत अमेरिका जैसी ताकतों से कराएगा ही साथ ही ऐसी ताकतों से भी कराएगा, जो वैधानिक-व्यवस्था के दायरे से बाहर हैं. इनमें समुद्री डाकुओं और संगठित अपराध का नेटवर्क शामिल है. थोड़ी देर के लिए लगता है कि दुनिया एकबार फिर से दो ध्रुवीय होने वाली है, पर अब यह आसान नहीं है. इसका कोई नया रूप ही बनेगा और इसमें भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी.

विश्व-व्यवस्था

ज्यादा बड़ी समस्या वैश्विक-व्यवस्था यानी ग्लोबल ऑर्डर से जुड़ी है. आज की विश्व-व्यवस्था की अघोषित धुरी है अमेरिका और उसके पीछे खड़े पश्चिमी देश. इसकी शुरुआत पहले विश्व-युद्ध के बाद से हुई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने लीग ऑफ नेशंस के मार्फत नई विश्व-व्यवस्था कायम करने का ठेका उठाया. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद गठित संयुक्त राष्ट्र और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के पीछे अमेरिका है.

उसके पहले उन्नीसवीं सदी में एक और अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने अमेरिका के महाशक्ति बनने की घोषणा कर दी थी. बहरहाल बीसवीं सदी में अमेरिका और उसके साथ वैश्विक-थानेदार बने रहे. पर यह अनंतकाल तक नहीं चलेगा. और जरूरी नहीं कि उसी तौर-तरीके से चले जैसे अभी तक चला आ रहा था. इक्कीसवीं सदी में चीन की महत्वाकांक्षाएं उभर कर सामने आ रही हैं. पर यह राह सरल नहीं है. भारत को किसी का पिछलग्गू बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र राह पर चलना है.

Sunday, December 18, 2022

भारत-चीन टकराव और आंतरिक राजनीति


गत 9 दिसंबर को अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़पें अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से ज्यादा भारतीय राजनीति का विषय बन गई हैं। पाकिस्तान ने संरा में जहाँ कश्मीर के मसले को उठाया है और उनके विदेशमंत्री बिलावल भुट्टो ने नरेंद्र मोदी पर बेहूदा टिप्पणी की है, वहीं इसी अंदाज में आंतरिक राजनीति के स्वर सुनाई पड़े हैं। भारत के विदेशमंत्री जहाँ चीन-पाक गठजोड़ पर प्रहार कर रहे हैं, वहीं आंतरिक राजनीति नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर वार कर रही है। तवांग-प्रकरण देश की सुरक्षा और आत्म-सम्मान से जुड़ा है, पर आंतरिक राजनीति के अंतर्विरोधों ने इसे दूसरा मोड़ दे दिया है। इस हफ्ते संरा सुरक्षा परिषद में भारत की अध्यक्षता में वैश्विक आतंकवाद को लेकर कुछ सवाल उठाए गए हैं, जिनके कारण भारत-चीन और पाकिस्तान के रिश्तों की तल्खी एकबार फिर से साथ उभर कर आई है।

टकराव और कारोबार

क्या वजह है कि नियंत्रण रेखा पर चीन ऐसी हरकतें करता रहता है, जिससे बदमज़गी बनी हुई है? पिछले दो-ढाई साल से पूर्वी लद्दाख में यह सब चल रहा था। अब पूर्वोत्तर में छेड़खानी का मतलब क्या है? क्या वजह है कि लद्दाख-प्रकरण में भी सोलह दौर की बातचीत के बावजूद चीनी सेना अप्रेल 2020 से पहले की स्थिति में वापस नहीं गई हैं? यह भारतीय राजनय की विफलता है या चीनी हठधर्मी है? सुरक्षा और राजनयिक मसलों के अलावा चीन के साथ आर्थिक रिश्तों से जुड़े मसले भी हैं। चीन के साथ जहाँ सामरिक रिश्ते खराब हो रहे हैं, वहीं कारोबारी रिश्ते बढ़ रहे हैं। 2019-20 में दोनों देशों के बीच 86 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था, जो 2021-22 में बढ़कर 115 अरब डॉलर हो गया। इसमें आयात करीब 94 अरब डॉलर और निर्यात करीब 21 अरब डॉलर का था। तमाम प्रयास करने के बावजूद हम अपनी सप्लाई चेन को बदल नहीं पाए हैं। यह सब एक झटके में संभव भी नहीं है।

क्या लड़ाई छेड़ दें?

राहुल गांधी के बयान ने आग में घी का काम किया। उन्होंने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को राजनीतिक बयानों से अब तक अलग रखा था, पर अब वे अपने आपको रोक नहीं पाए। उन्होंने कहा, चीन हमारे सैनिकों को पीट रहा है और देश की सरकार सोई हुई है। फौरन बीजेपी का जवाब आया, राहुल गांधी के नाना जी सो रहे थे और सोते-सोते उन्होंने भारत का 37000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र गँवा दिया। इस जवाबी कव्वाली से इस प्रसंग की गंभीरता प्रभावित हुई है। सवाल है कि भारत क्या करे? क्या लड़ाई शुरू कर दे? अभी तक माना यही जाता है कि बातचीत ही एक रास्ता है। इसमें काफी धैर्य की जरूरत होती है, पर ऐसे बयान उकसाते हैं। यूपीए की सरकार के दौरान भी ऐसी कार्रवाइयाँ हुई हैं, तब मनमोहन सिंह की तत्कालीन सरकार ने मीडिया से कहा था कि वे चीन के साथ सीमा पर होने वाली गतिविधियों को ओवरप्ले न करें। इतना ही नहीं एक राष्ट्रीय दैनिक के दो पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज भी की गई थी। 2013 में भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन ने पूर्वी लद्दाख में इसी किस्म की गश्त से भारत का 640 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हथिया लिया है। श्याम सरन तब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष थे। पहले सरकार ने और फिर श्याम सरन ने भी इस रिपोर्ट का खंडन कर दिया। भारत ने उस साल चीन के साथ बॉर्डर डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बीसीडीए) पर हस्ताक्षर किए थे। बावजूद इसके उसी साल अप्रैल में देपसांग इलाके में चीनी घुसपैठ हुई और उसके अगले साल चुमार इलाके में। दरअसल चीन के साथ 1993, 1996, 2005 और 2012 में भी ऐसे ही समझौते हुए थे, पर सीमा को लेकर चीन के दावे हर साल बदलते रहे।

किसने किसको पीटा?

9 दिसंबर को तवांग के यांग्त्से क्षेत्र में हुई घटना का विस्तृत विवरण अभी उपलब्ध नहीं है। कुछ वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुए हैं, पर उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों को पीटा है। गलवान में भारतीय सैनिकों को मृत्यु की सूचना सेना और रक्षा मंत्रालय ने घटना के दिन ही दे दी थी। इस घटना की सूचना रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 13 दिसंबर को संसद के दोनों सदनों में दी है। प्राप्त सूचनाओं से दो बातें स्पष्ट हो रही हैं। एक यह कि चीनी सैनिकों ने पहाड़ी की चोटी पर एक भारतीय चौकी पर कब्जा करने की कोशिश की थी, जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली और वापस जाना पड़ा। दूसरी तरफ चीनी सेना के प्रवक्ता ने कहा है कि पीएलए (चीनी सेना) का दस्ता चीनी भूभाग पर रोजमर्रा गश्त लगा रहा था, तभी भारतीय सैनिक चीन के हिस्से में आ गए और उन्होंने चीनी सैनिकों को रोका। इस टकराव में दोनों पक्षों को सैनिकों को चोटें आई हैं, पर यह भी बताया जाता है कि चीनी सैनिकों को ज्यादा नुकसान हुआ। बताया जाता है कि टकराव के समय चीन के 300 से 600 के बीच सैनिक उपस्थित थे। सामान्य गश्त में इतने सैनिक नहीं होते। वस्तुतः चीन इस इलाके पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कई बार कर चुका है। अक्तूबर, 2021 में भी यांग्त्से में चीन ने 17,000 फुट ऊँची इस चोटी पर कब्जा करने का प्रयास किया था। इस चोटी से नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ के क्षेत्र का व्यापक पर्यवेक्षण संभव है। इस समय भारतीय वायुसेना भी इस इलाके में टोही उड़ानें भर रही है।

Friday, December 16, 2022

सुरक्षित और असीमित ऊर्जा के दरवाजे खुले-2


अमेरिका का प्रयोग इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें कम ऊर्जा लगाकर ज्यादा ऊर्जा की प्राप्ति की गई है। पर इसके पहले भी ऐसे प्रयोग होते रहे हैं। इन्हें कृत्रिम सूर्य कह सकते हैं। पिछले साल 30 दिसंबर को चीन ने भी ऐसा प्रयोग करके दिखाया था। चीन के हैफेई में स्थित चीन के इस न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर या कृत्रिम सूर्य से 1,056 सेकंड या करीब 17 मिनट तक 7 करोड़ डिग्री सेल्सियस ऊर्जा निकली थी। भारत में भी इस दिशा में काम हो रहा है।

जिज्ञासुओं का प्रश्न होता है कि संलयन ऊर्जा की खोज किसने कब की?  संलयन ऊर्जा की खोज स्वयं प्रकृति ने की। बिग-बैंग के करीब 10 करोड़ साल बाद, बहुत ही अधिक घनत्व एवं ताप वाले,एक दैत्याकार गैसीय गोले में, जो कि हाइड्रोजन गैस के बादलों से बना था, पहली संलयन क्रिया हुई और इस तरह पहले सितारे का जन्म हुआ। इसके बाद यह प्रक्रिया लगातार चलती रही और लाखों सितारों का जन्म हुआ और आज भी हो रहा है।

प्राकृतिक ऊर्जा

ब्रह्मांड में संलयन, अन्य सभी अवस्थाओं (ठोस, द्रव एवं गैस) में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है। सौर-परिवार में, जहाँ हम रहते हैं, कुल द्रव्यमान का लगभग 99.86%, संलयन अवस्था में है। 20वीं सदी की शुरूआत तक सूर्य की तेज़ चमक और तारों की दिल लुभावनी झिलमिलाहट ऐसे आश्चर्य थे, जिनकी व्याख्या करना संभव नहीं था। 1920में एक अंग्रेज वैज्ञानिक आर्थर ऐडिंगटन ने सबसे पहले यह बताया कि तारे अपनी असीमित ऊर्जा हाइड्रोजन के हीलियम में संलयन द्वारा प्राप्त करते हैं।

ऐडिंगटन का सिद्धांत 1926 में उनकी सितारों की आंतरिक संरचना रचना में प्रकाशित हुआ जिसने आधुनिक सैद्धांतिक खगोल भौतिकी की नींव रखी। जिस सिद्धांत एवं विधियों की अवधारणा ऐडिंगटन ने की, उन्हें सही तरीके से एक अन्य वैज्ञानिक हैंस बैथ ने समझाया। 1939 में हैंस बैथ (1906-2005) के  प्रोटोन-प्रोटोन चक्र सिद्धांत ने इस रहस्य को खोला। बैथ को उनके कार्य 'स्टैलर न्यूक्लियोसिंथेसिस' पर 1967 में नोबेल पुरस्कार मिला।

Thursday, December 15, 2022

सुरक्षित और असीमित ऊर्जा के दरवाजे खुले-1

लिवरमोर कैलीफोर्निया की प्रयोगशाला

अमेरिका के वैज्ञानिकों ने संलयन ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त करने की घोषणा की है। हालांकि व्यावसायिक रूप से इस पद्धति से बिजली बनाने में अभी कई दशक लगेंगे, पर भविष्य में यह ऊर्जा का सबसे विश्वसनीय स्रोत साबित होगा। हालांकि यह बिजली भी परमाणु के नाभिकीय में छिपे ऊर्जा स्रोत पर आधारित होगी, पर अभी प्रचलित विखंडन पर आधारित नाभिकीय ऊर्जा से एकदम अलग और सुरक्षित होगी। यह ऊर्जा उसी प्राकृतिक सिद्धांत पर आधारित होगी, जो सूर्य और अंतरिक्ष में फैले तमाम नक्षत्रों के निरंतर प्रज्ज्वलन के कारण को बताता है।

अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने 13 दिसंबर, 2022 को कहा कि पहली बार-और कई दशकों के प्रयास के बाद-वैज्ञानिकों ने ऊर्जा प्राप्ति की प्रक्रिया में लगाई जाने वाली ऊर्जा से अधिक ऊर्जा प्राप्त करने में कामयाबी हासिल की है। कैलिफोर्निया में अमेरिकी सरकार की नेशनल इग्नीशन फैसिलिटी के शोधकर्ताओं ने पहली बार प्रदर्शित किया है, जिसे "फ्यूजन इग्नीशन" के रूप में जाना जाता है। इग्नीशन तब होता है जब एक संलयन प्रतिक्रिया बाहरी स्रोत से प्रतिक्रिया में डाली जा रही ऊर्जा से अधिक ऊर्जा पैदा करती है और आत्मनिर्भर हो जाती है।

अब सवाल हैं कि इसका विकास कितना महत्वपूर्ण है? और प्रचुर मात्रा में, स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करने वाले संलयन का लंबे समय से प्रतीक्षित सपना कब पूरा होगा? विश्लेषकों का अनुमान है कि हम इस ऊर्जा के इस्तेमाल से बीस से तीस साल दूर है।

जब दो हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के परिणाम स्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनों नाभिकों के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है। जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन के समीकरण E = mc2 से ज्ञात करते हैं। नक्षत्रों के अन्दर यह क्रिया निरन्तर जारी है। सबसे सरल संयोजन की प्रक्रिया है चार हाइड्रोजन परमाणुओं के संयोजन द्वारा एक हीलियम परमाणु का निर्माण।

दुनिया में नाभिकीय ऊर्जा प्राप्त करने की जो पद्धति इस समय प्रचलित है, वह फ़िज़न यानी विखंडन पर आधारित है। दोनों प्रक्रियाओं में ऊर्जा पैदा होती है, पर संलयन से प्राप्त ऊर्जा कहीं ज्यादा होती है और वह सुरक्षित भी होती है। भौतिक विज्ञानी दशकों से परमाणु ऊर्जा प्रौद्योगिकी पर शोध कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना ​​है कि यह पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा का असीमित स्रोत हो सकता है।

संलयन का प्रक्रिया के लिए भी दुनिया में कम से कम दो तरीके अपनाए जा रहे हैं। दोनों तरीकों में फर्क केवल संलयन की स्थिति तैयार करने के लिए जिस उच्च तापमान की जरूरत है, उसके तरीके में फर्क है। लॉरेंस लिवरमोर फैसिलिटी में वैज्ञानिकों ने उस तापना को प्राप्त करने के लिए हाई इनर्जी लेज़र बीम्स का इस्तेमाल किया। इसे इनर्शियल फ्यूज़न का नाम दिया गया है। दूसरा तरीका फ्रांस में अपनाया जा रहा है, जिसे इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपैरिमेंटल रिएक्टर या संक्षेप में ईटर या आइटर ITER कहा जाता है। इसमें बहुत शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड का इस्तेमाल उच्च तापमान प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस कार्यक्रम में भारत भी शामिल है।