दिल्ली में केंद्र और राज्य
सरकार के बीच टकराव मर्यादा की सीमाएं तोड़ रहा है. स्थिति हास्यास्पद हो चुकी है.
सरकार का कानून मंत्री फर्जी डिग्री के आरोप में गिरफ्तार है. सवाल उठ रहे हैं कि
गिरफ्तारी की इतनी जल्दी क्या थी? इस मामले में अदालती फैसले
का इंतज़ार क्यों नहीं किया गया? मंत्री के खिलाफ एफआईआर
करने वाली दिल्ली बार काउंसिल से भी सवाल किया जा रहा है कि उसके पंजीकरण की
व्यवस्था कैसी है, जिसमें बगैर कागज़ों की पक्की पड़ताल के वकालत का लाइसेंस मिल
गया? प्रदेश सरकार अपने ही उप-राज्यपाल के खिलाफ
कानूनी कार्रवाई की धमकी दे रही है. उप-राज्यपाल ने एंटी करप्शन ब्रांच के प्रमुख
पद पर एक पुलिस अधिकारी की नियुक्ति कर दी. सरकार ने उस नियुक्ति को खारिज कर
दिया, फिर भी उस अधिकारी ने नए पद पर काम शुरू करके अपने अधीनस्थों के साथ बैठक कर
ली. कहाँ है दिल्ली की गवर्नेंस? यह सब कैसा नाटक है? आम आदमी पार्टी इसे केजरीवाल बनाम मोदी की लड़ाई के रूप
में पेश कर रही है. क्या है इसके पीछे की सियासत?
Wednesday, June 10, 2015
Sunday, June 7, 2015
पूर्वोत्तर में अशनि संकेत
मणिपुर के चंदेल
जिले में गुरुवार को भारतीय सेना की डोगरा के सैनिकों पर हुआ हमला कोई नया संकेत
तो नहीं दे रहा है? पूर्वोत्तर में आतंकी गिरोह एकताबद्ध हो रहे हैं। क्या यह किसी
के इशारे पर हो रहा है या हमने इस इलाके के ‘बागी’ गुटों के साथ राजनीतिक-संवाद कायम करने में
देरी कर दी है? नगालैंड में पिछले दो दशक से और मिजोरम में तीन दशक से महत्वपूर्ण गुटों के
साथ समझौतों के कारण अपेक्षाकृत शांति चल रही है, पर हाल में एक महत्वपूर्ण गुट के
साथ सम्पर्क टूटने और कुछ ग्रुपों के एक साथ आ जाने के कारण स्थिति बदली है। इसमें
दो राय नहीं कि म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश में भारत-विरोधी गतिविधियों को हवा
मिलती है। ऐसा इन देशों की सरकारों के कारण न होकर वहाँ की सुरक्षा व्यवस्था में
बैठे भ्रष्टाचार के कारण भी है।
Thursday, June 4, 2015
Monday, June 1, 2015
क्रॉसफायरिंग में फँसी नौकरशाही
आईएएस अधिकारियों के
केंद्रीय सेवाओं से जुड़े संगठन ने पिछले हफ्ते 25 मई को अपनी बैठक करके दिल्ली
प्रशासन से जुड़े कुछ अधिकारियों के साथ किए गए असम्मानजनक व्यवहार की निन्दा की
है। एसोसिएशन का निवेदन है कि उन्हें अपने कार्य के निर्वाह के लिए स्वतंत्र,
निष्पक्ष और सम्माननीय माहौल मिलना चाहिए। एसोसिएशन ने जिन तीन मसलों पर ध्यान
दिलाया है उनमें से पहला मसला दिल्ली में उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों के अधिकार
को लेकर पैदा हुए भ्रम के कारण उपजा है। इस दौरान अफसरों की पोस्टिंग का सवाल ही
नहीं खड़ा हुआ, अफसरों की ईमानदारी को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी भी हुई, जो साफ-साफ
चरित्र हत्या थी।
Sunday, May 31, 2015
दिल्ली दंगल से हासिल क्या हुआ?
तकरीबन दो हफ्ते की
जद्दो-जहद के बाद दिल्ली में मुख्यमंत्री और उप-राज्यपाल के बीच अधिकारियों का
संग्राम अनिर्णीत है। दिल्ली सरकार ने विधान सभा का विशेष सत्र बुलाने, केंद्र की
अधिसूचना को फाड़ने और उसके खिलाफ प्रस्ताव पास करने के बाद अंततः स्वीकार कर लिया
कि वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों के फैसलों पर उप-राज्यपाल की अनुमति
ली जाएगी। यदि एलजी और मुख्यमंत्री के बीच मतभेद होगा तो संस्तुति राष्ट्रपति को
भेजी जाएगी। राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह से फैसला करेंगे। यानी कुल
मिलाकर जैसा केंद्र सरकार कहेगी वैसा होगा। यह भी लगता है कि अंतिम फैसला आने तक
केंद्रीय अधिसूचना जारी रहेगी।
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