पत्रकारिता या दूसरे शब्दों में कहें, तो ईमानदार पत्रकारिता की ज़रूरत किसे है? पत्रकारों को, उनके संगठनों को, प्रेस क्लबों को, मीडिया-मालिकों को, राजनीतिक दलों को या आम जनता यानी पाठकों और दर्शकों को? सिद्धांततः पत्रकारिता खुद में एक प्रकार की राजनीति है। ऐसी राजनीति जिसका केंद्रीय विषय सार्वजनिक हित है, सत्ता पाना नहीं। सत्ता की राजनीति भी ऐसा ही दावा करती है, पर वह जिन आधारों पर चल रही है, वे संकीर्ण होते जा रहे हैं। पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि वह उन संकीर्ण आधारों पर चोट करे। इसके लिए उसे अपनी साख बनानी होगी।
यह काम पत्रकारिता ने अपने लिए खुद तय नहीं किया
है, बल्कि समाज ने तय किया है। शुरूआती पत्रकार ताकतवर राजनेताओं के लिए पैम्फलेट
लिखते हुए ही इस धंधे में आए थे। पर आज की लोकतांत्रिक-व्यवस्था में पत्रकार की
जरूरत सोसायटी को है, और इस बात में ही तमाम पेच हैं। वोटर को सूचना चाहिए, जिसके आधार
पर वह अपनी राय बनाए।
सोलह साल पहले नीरा राडिया ने बड़ी ईमानदारी से
अपना काम किया। पता नहीं वे अपने क्लाइंट्स के दृष्टिकोण को किस हद तक मीडिया में
ला पाने में कामयाब हुईं, पर इतना तय है कि उन्होंने उसी तरह
काम किया जैसी हमारे मीडिया की संरचना है। एक दौर तक इस मीडिया के भीतर कुछ आदर्श
थे, जो अब आउटडेटेड हैं। ओल्ड स्टाइल मीडिया माने जो सूचना
के गैर-वाजिब इस्तेमाल को तैयार न हो। और नए स्कूल के माने? सवाल है कि
क्या सब ऐसे ही रहेगा?
मुझे रसूख
चाहिए
कुछ साल पहले मुझे माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल जाने और नए पुराने छात्रों से संवाद करने का मौका मिला। मौका था नए सत्र का आरम्भ, जिसका समारोह था। मैंने सभा में बैठे छात्रों से पूछा- आप पत्रकार क्यों बनना चाहते हैं? ज्यादातर का जवाब था- सामाजिक जरूरत के लिए। पाठकों को सही जानकारी देने के लिए। एक छात्र ने खड़े होकर कहा, “ मैं पैसे, पहचान और ऊंची पहुंच और रसूख बनाने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं।” पूरे हाउस में ठहाका लगा।
पता नहीं उस छात्र ने वह बात गंभीरता में कही या मजाक में, पर यह महत्वपूर्ण बात थी। सभी न सही कुछ पत्रकार सेलिब्रिटी बन रहे हैं। पैसे, पद औऱ पहचान के लिहाज से वे टॉप पर आने लगे हैं। इसकी कीमत कौन देता है? पत्रकार महात्मा गांधी थे, तिलक भी। महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर राजेंद्र माथुर तक तमाम नाम हैं। उस छात्र का आशय जो भी रहा हो, पर उसने कहा, मैं ताकत चाहता हूँ जिससे लोग डरें।
सूचना, यानी जिंस
लोकतांत्रिक-व्यवस्था
में चुनाव जीतना और कारोबार में किसी भी तरीके से अपना माल बेचना, सबसे बड़ा कर्म
है, तो ऐसे ही रहेगा, बल्कि और बिगड़ेगा। व्यक्तियों के
व्यवहार से इतना व्यथित होने की ज़रूरत नहीं है। पहले अपने मीडिया को देखें। उसकी
शक्ल क्या है। ऐसा क्या कमाल वह किए दे रहा है कि पत्रकारिता के मापदंडों की खोज
की जाए।
अब इसके अंतर्विरोध को देखें। मीडिया ने ही तमाम
घोटालों की खबरें दीं या नहीं? अपने तमाम अंतरविरोधों के
बावजूद वह बढ़ ही रहा है। उसके लिए बड़ा पाठक और दर्शक वर्ग तैयार है, क्योंकि जिस
किस्म की सूचना चाहिए, वह उसे मिल रही है। उसपर रंग-रोगन पोतने वाले अपना काम कर
रहे हैं। पत्रकारीय नैतिकता की कोई भी बहस बहुत दूर नहीं जाएगी। जिनपर दलाली
वगैरह के आरोप हैं, उन्होंने अपनी राह खुद चुनी है। उनकी पहुँच ऊँची है, तो उनकी
प्रशस्ति करने वालों की तादाद भी उतनी ही बड़ी है। जरूरत प्रभावशाली होने या
नैतिकताओं का पालन करने की नहीं है। उससे किसी को मिलता क्या है?
पत्रकारिता से हटकर एकबार राजनीति पर आएँ। टिकट
किसे और किस बिना पर मिलता है? विनेबिलिटी पर। व्यक्ति की
काबिलीयत, योग्यता, ईमानदारी यहाँ तक कि जनता के बीच उसकी छवि पर नहीं मिलता। जनता
भी उसे वोट नहीं देती। वह उसे वोट देती है, जो उनके काम करा दे। सही या गलत।
सबका लेखक एक!
एक पत्रकार-मित्र ने अपना अनुभव सुनाया। जब वे
कष्ट में थे, तब उन्हें चुनाव के दौरान एक प्रिंटिंग-प्रेस में काम मिला, जहाँ
पैम्फलेट छपते थे। नेताओं के पास लिखने-पढ़ने जैसी वाहियात बातों के लिए वक्त नहीं
होता। उन्होंने प्रेस को ठेका दे दिया। ठेका एक ही पार्टी का नहीं था। हर तरह की
विचारधाराओं का कारोबार करने वालों की तरफ से था। हमारे मित्र ने सबके लिए पर्चे
लिखे। सबके पक्ष और विपक्ष का पता उन्हें था। उनकी अपनी धारणा, जो भी रही हो, जैसे
माल की जरूरत थी, वैसा लिखा। वह ईमानदारी का मेहनताना था। वह कारोबारी ईमानदारी
थी, भले ही वह वैचारिक ईमानदारी नहीं थी, पर उनका कहना था, चुनाव लड़ने वाले सभी
प्रत्याशियों का ठिकाना भी एक ही था, सिर्फ उनकी दलीलें अलग थीं।
जर्नलिज्म की जरूरत जिस जनता को है पहले उसे
समझना चाहिए। हमारे बीच विद्वान बहुत है, पर छोटी-छोटी बातों को जानने-समझने वाले
कम है। जब जनता को समझ में आएगा कि उसे क्या चाहिए, तो उस किस्म के पत्रकार भी तैयार
हो जाएंगे। फिलहाल इस काम में शामिल होने के लिए जितने नए नौजवान शामिल होते हैं,
उनमें बड़ी संख्या आदर्शों से प्रेरित लोगों की होती है।
उनकी आँखें यहाँ आकर खुलतीं हैं। ठीक उसी तरह
जैसे जमीन से उठे लोग जब सत्ता की हवेली में जाकर बैठते हैं तो उन्हें एक नई
दुनिया दिखाई पड़ती है। वे अपने जीवन की राह खुद चुनते हैं। कुछ आगे जाते हैं,
कुछ लड़ते रहते हैं, कुछ हार जाते हैं।
पत्रकार, स्टार पत्रकार और ए लिस्टर जैसी उनकी श्रेणियाँ
बनती जाती हैं।

No comments:
Post a Comment