Sunday, April 7, 2013

अलोकप्रियता के ढलान पर ममता की राजनीति

राजनेता वही सफल है जो सामाजिक जीवन की विसंगतियों को समझता हो और दो विपरीत ताकतों और हालात के बीच से रास्ता निकालना जानता हो। ममता बनर्जी की छवि जुनूनी, लड़ाका और विघ्नसंतोषी की है। संसद से सड़क तक उनके किस्से ही किस्से हैं। पिछले साल रेल बजट पेश करने के बाद दिनेश त्रिवेदी को उन्होंने जिस तरह से हटाया, उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती। उनकी तुलना जयललिता, मायावती और उमा भारती से की जाती है। कई बार इंदिरा गांधी से भी। मूलतः वे स्ट्रीट फाइटर हैं। उन्हें इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने वाम मोर्चा के 34 साल पुराने मजबूत गढ़ को गिरा कर दिखा दिया। पर लगता है कि वे गिराना जानती हैं, बनाना नहीं। इन दिनों बंगाल में अचानक उनकी सरकार के खिलाफ आक्रोश भड़क उठा है। सीपीएम की छात्र शाखा एसएफआई के नेता सुदीप्तो गुप्ता की मौत इस गुस्से का ट्रिगर पॉइंट है। यह सच है कि वे कोरी हवाबाजी से नहीं उभरी हैं। उनके जीवन में सादगी, ईमानदारी और साहस है। वे फाइटर के साथ-साथ मुख्यमंत्री भी हैं और सात-आठ मंत्रालयों का काम सम्हालती हैं। यह बात उनकी जीवन शैली से मेल नहीं खाती। फाइलों में समय खपाना उनका शगल नहीं है। उन्होंने सिर्फ अपने बलबूते एक पार्टी खड़ी कर दी, यह बात उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है, पर इसी कारण से उनका पूरा संगठन व्यक्ति केन्द्रित बन गया है।  

Monday, April 1, 2013

विचार और सिद्धांत की अनदेखी करती राजनीति

पिछले बुधवार को तमिलनाडु विधानसभा ने एक प्रस्ताव पास करके माँग की कि केंद्र सरकार श्रीलंका के साथ मित्र राष्ट्र जैसा व्यवहार बंद करे। इसके पहले यूपीए-2 को समर्थन दे रही पार्टी डीएमके ने केन्द्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया। तमिलनाडु में श्रीलंका को लेकर पिछले तीन दशक से उबाल है, पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि श्रीलंका के खिलाड़ी वहाँ खेल न पाए हों। या भारतीय टीम के तमिल खिलाड़ियों को श्रीलंका में कोई परेशानी हुई हो। पर तमिलनाडु में अब श्रीलंका के पर्यटकों का ही नहीं खिलाड़ियों का प्रवेश भी मुश्किल हो गया है। मुख्यमंत्री जयललिता ने हाल में श्रीलंकाई एथलीटों का राज्य में प्रवेश रोक दिय़ा। पिछले साल सितम्बर में उन्होंने श्रीलंकाई छात्रों को चेन्नई में दोस्ताना फुटबाल मैच खेलने की अनुमति नहीं दी थी। और अब आईपीएल के मैचों में श्रीलंका के खिलाड़ी चेन्नई में खेले जा रहे मैचों में नहीं खेल पाएंगे। दूसरी ओर जब तक ममता बनर्जी की पार्टी यूपीए में शामिल थी केन्द्र सरकार की नीतियों को लागू कर पाना मुश्किल हो गया था। खासतौर से विदेश नीति के मामले में ममता ने भी उसी तरह के अड़ंगे लगाने शुरू कर दिए थे जैसे आज तमिलनाडु की राजनीति लगा रही है। ममता बनर्जी ने पहले तीस्ता पर, फिर एफडीआई, फिर रेलमंत्री, फिर एनसीटीसी और फिर राष्ट्रपति प्रत्याशी पर हठी रुख अख्तियार करके कांग्रेस को ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया था, जहाँ से पीछे हटने का रास्ता नहीं बचा था। और अंततः दोस्ती खत्म हो गई।

Tuesday, March 26, 2013

राजनीति में साल भर चलती है होली


पिछला हफ्ता राजनीतिक तूफानों का था तो अगला हफ्ता होली का होगा। संसद के बजट सत्र का इंटरवल चल है। अब 22 अप्रेल को फिर शुरू होगा, जो 10 मई तक चलेगा। पिछले हफ्ते डीएमके, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच के रिश्तों ने अचानक मोड़ ले लिया। किसी की मंशा सरकार गिराने की नहीं है, पर लगता है कि अंत का प्रारम्भ हो गया है। किसी को किसी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की ज़रूरत नहीं है। शायद सरकार खुद ही तकरीबन छह महीने पहले चुनाव कराने का प्रस्ताव लेकर आए। पर उसके पहले कुछ बातें साफ हो जाएंगी। एक तो यह कि उदारीकरण के जुड़े कानून संसद के शेष दिनों में पास करा दिए जाएंगे और दूसरे चुनाव पूर्व के गठबंधन भले ही तय न हो पाएं, चुनावोत्तर गठबंधनों की सम्भावनाओं पर गहरा विमर्श हो जाएगा।

Tuesday, March 19, 2013

इच्छाधारी राजनीति


प्रधानमंत्री पद का एक अनार और इच्छाधारी सौ बीमार भारत की इच्छाधारी राजनीति बड़े रोचक दौर में प्रवेश कर रही है। हालांकि अभी लोकसभा चुनाव तकरीबन एक साल दूर है, पर तय होने लगा है कि प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी कौन है। दो प्रत्याशी दौड़ में सबसे आगे हैं। नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी। पर कम से कम आधा दर्जन प्रत्याशी और हैं। इनमें नीतीश कुमार, मुलायम सिंह, मायावती, ममता बनर्जी, शरद पवार, जे जयललिता, पी चिदम्बरम, एके एंटनी सहित कुछ नाम और हैं। प्रधानमंत्री बनने की इनकी सम्भावनाओं और कामनाओं के ऐतिहासिक कारण हैं। जुलाई 1979 के पहले कौन कह सकता था कि चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बनेंगे? इसी तरह दिसम्बर 1989 के पहले वीपी सिंह के बारे में, नवम्बर 1990 के पहले चन्द्रशेखर के बारे में, जून 1991 के पहले पीवी नरसिंहराव के बारे में, जून 1996 के पहले एचडी देवेगौडा के बारे में और अप्रेल 1997 के पहले इन्द्र कुमार गुजराल के बारे में कहना मुश्किल था कि वे प्रधानमंत्री बनेंगे, पर बने। वे किसी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं थे। इसी तरह जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के असामयिक निधन के बाद इंदिरा गांधी के और अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी के निधन के बाद राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने की परिस्थितियाँ असामान्य थीं। कई बार हालात अचानक मोड़ दे देते हैं और तमाम तैयारियाँ धरी की धरी रह जाती हैं। इसलिए देश की राजनीति में एक तबका ऐसा भी है जो विपरीत राजयोग का इंतज़ार करता रहता है। परिस्थितियाँ बनें और राजतिलक हो।

Monday, March 18, 2013

उदीयमान भारत के अंतर्विरोध


जवाहर लाल के कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति काफी अच्छी थी। गुट निरपेक्ष देशों के नेताओं टीटो-नासर और नेहरू की वृहत्त्रयी ने जो आभा मंडल बनाया था, वह भावनात्मक ज्यादा था। उसके पीछे व्यावहारिक शक्ति नहीं थी। सन 1962 में चीन के साथ हुई लड़ाई में नेहरू का वह आभा मंडल अचानक पिघल गया। उसके बाद सन 1971 में इंदिरा गांधी ने अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय देते हुए एक ताकतवर भारत की परिकल्पना पेश की। हालांकि उसी दौर में भारत के अंदरूनी अंतर्विरोध भी उभरे। सन 1973 का आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव अस्सी के दशक में पंजाब आंदोलन और अंततः इंदिरा गांधी की हत्या का कारण भी बना। उन्हीं दिनों मंडल और कमंडल के दो बड़े आंदोलनों ने हमारे सामाजिक अंतर्विरोधों को खोला। पाकिस्तान में उसी दौरान ज़िया-उल-हक ने कट्टरता की फसल को बोना शुरू कर दिया। सन 1971 के आहत पाकिस्तान का निशाना कश्मीर था, जहाँ अस्सी के उतरते दशक में हिंसक आंदोलन शुरू हो गया। और जिसमें पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूमिका थी।

Saturday, March 16, 2013

अद्भुत सुनामी बादल




अद्भुत विश्व/ Amazing world



अमेरिका के फ्लोरिडा में इन अद्भुत सुनामी बादलों की ये तस्वीरें एक साल पुरानी हैं। हेलिकॉप्टर पायलट माइक शैफर ने ये तस्वीरें खीचीं थीं। वास्तविक सुनामी में पानी की लहरें इतनी ऊँची उठती हैं। पर यह प्रभाव तब पैदा होता है जब पानी से भरी हवा की तेज लहर अपेक्षाकृत धीमी लहर के ऊपर से गुजरती है। मौसम विज्ञानी डैन शैटरफील्ड ने इस प्रभाव को अपने ब्लॉग में समझाया है। उन्होंने लिखा हैः- Cool air offshore was very nearly at the saturation point, with a temperature near 20ºC and a dew point of about 19.5ºC. The air at this temperature can only hold a certain amount of water vapor, and how much it can hold depends heavily on the temperature. If you add more water into the air, a cloud will form, but you can also get a cloud to form by cooling the air. Drop the temperature, and it can no long hold as much water vapor, so some of it will condense out and a cloud will form.




Friday, March 15, 2013

कश्मीर के बारे में भारतीय संसद का 22 फरवरी 1994 का प्रस्ताव


पाकिस्तानी राजनेताओं को या तो सम्प्रभुता और संसदीय गरिमा की समझ नहीं है  या उन्होंने किसी दीर्घकालीन रणनीति के तहत संसद के माध्यम से प्रस्ताव पास किया है।  उन दिनों जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो बार-बार कह रहीं थीं कि कश्मीर का मसला विभाजन के बाद बचा अधूरा काम है। इस पर भारत के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की भारत में वापसी ही अधूरा रह गया काम  है। वह समय था जब कश्मीर में हिंसा चरमोत्कर्ष पर थी। बढ़ती हुई आतंकवादी हिंसा के मद्देनज़र भारतीय संसद के दोनों सदनों ने 22 फरवरी 1994 को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया और इस बात पर जोर दिया कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसलिए पाकिस्तान को अपने कब्जे वाले राज्य के हिस्सों को खाली करना होगा । संकल्प का पाठ इस प्रकार है।



"यह सदन"
पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित शिविरों में आतंकवादियों को प्रशिक्षण प्रदान करने, साथ ही हथियार और धन देकर जम्मू और कश्मीर में विदेशी भाड़े के सैनिकों सहित प्रशिक्षित उग्रवादियों की घुसपैठ में सहायता से सामाजिक सद्भाव को नष्ट करने और तोड़फोड़ के घोषित उद्देश्य की आपूर्ति में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करता है |

सदन ने दोहराया कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित उग्रवादी हत्या, लूट, लोगों को बंधक बनाने और आतंक का वातावरण निर्मित करने जैसे अन्य जघन्य अपराधों में लिप्त हैं;

भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर में विध्वंसक और आतंकवादी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान द्वारा जारी समर्थन और प्रोत्साहन की सदन द्रढता से निंदा करता है |

पाकिस्तान अविलम्ब आतंकवादियों को सहयोग करना बंद करे, जोकि शिमला समझौते का उल्लंघन है तथा दोनों देशों के मध्य तनाव का मुख्य कारण तथा पारस्परिक संबंधों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानदंडों के विरुद्ध है| साथ ही सदन ने भारतीय राजनीतिक और लोकतांत्रिक ढांचे और अपने सभी नागरिकों के संविधान प्रदत्त अधिकारों व मानवाधिकारों के संरक्षण करने का विश्वास दिलाया और अपने समर्थन को दोहराया |

पाकिस्तान के भारत-विरोधी अभियान को अस्वीकार कर उसे दुखद रूप में झूठ बताते हुए उसकी निंदा की |
वातावरण दूषित करने और जनमत उत्तेजित करने बाले पाकिस्तान के बेहद उत्तेजक बयानों को गंभीर चिंता विषय मानते हुए उनसे बचने का आग्रह पाकिस्तान से किया |

पाकिस्तान के अवैध कब्जे बाले क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों की दयनीय स्थिति तथा उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रहने पर चिंता व्यक्त की गई |
भारत के लोगों की ओर से,

मजबूती से कहते हैं कि-

(क) जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहा है, है और रहेगा तथा उसे देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के किसी भी प्रयास का सभी आवश्यक साधन के द्वारा विरोध किया जाएगा;

(ख) भारत में अपनी एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध होने वाले किसी भी आक्रमण का मजबूती से मुकाबला करने की इच्छाशक्ति व क्षमता है

और मांग है कि -

(सी) पाकिस्तान बल पूर्वक कब्जाए हुए भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर क्षेत्रों को खाली करे; और सदन पारित करता है कि -

(d) भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के सभी प्रयासों से सख्ती से निबटा जाए."

प्रस्ताव सर्वसम्मति से अपनाया गया ।
अध्यक्ष महोदय: प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है।

Tuesday, March 12, 2013

बदलते दौर में पाकिस्तान


पाकिस्तानी प्रधानमंत्री राजा परवेज की अजमेर शरीफ की निजी यात्रा को भारतीय मीडिया ने इस तरीके से कवर किया मानो ओबामा की सरकारी यात्रा हो। प्रायः हर चैनल में एंकर दिन भर यह सवाल पूछते रहे कि पाकिस्तान हमारे फौजियों की गर्दनें काट रहा है और हम उनके प्रधानमंत्री को लंच दे रहे हैं। शायद श्रोताओं और दर्शकों को यह सवाल पसंद आता है। पर पसंद क्यों आता है? इसकी एक वजह यह भी है कि यही मीडिया अपने दर्शकों, पाठकों को चुनींदा जानकारी देता है। यह बात सरहद के दोनों ओर है। इतिहास के क्रूर हाथों ने दोनों देशों को एक-दूसरे का दुश्मन क्यों बनाया और क्या यह दुश्मनी अनंतकाल तक चल सकती है? क्या हम एक-दूसरे के अंदेशों, संदेहों और जानकारियों से परिचित हैं? पाकिस्तान क्या वैसा ही है जैसा हम समझते हैं? और क्या भारत वैसा ही है जैसा पाकिस्तानियों को बताया जाता है?

इटली बनाम भारत!!!

पिछले दिनों जब वेस्टलैंड ऑगस्टा हेलिकॉप्टर की खरीद के मामले में कमीशनखोरी का मामला इटली की अदालत में पहुँचा तो भारत सरकार ने विवरण माँगे तो वहाँ की व्यवस्था ने इनकार कर दिया। संयोग से उन्हीं दिनों इटली के नौसैनिकों का मामला भारतीय अदालतों में चल रहा था। केरल से होता हुआ यह सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। देश की अदालत ने इन कर्मचारियों को अपने देश जाकर वहाँ चुनाव में हिस्सा लेने की छूट भी दे दी। अब इटली के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत में हत्या के आरोपों का सामना कर रहे इटली के नौ‍सैनिक भारत वापस नहीं लौटेंगे। इन सैनिकों पर आरोप है कि एक साल पहले उन्होंने दो भारतीय मछुआरों को गाली मार दी थी। ये सैनिक इटली के एक जहाज़ पर तैनात थे ताकि उसे समुद्री लुटेरों से बचा सकें जबकि नौसैनिकों का कहना है कि उन्होंने हिंद सागर में भारतीय मछुआरों को समुद्री लुटेरे समझ कर उन पर गोलियां चला दीं थी।

Tuesday, March 5, 2013

हम भी छू सकते हैं सूरज और चाँद बशर्ते...


बजट सत्र की शुरूआत करते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने घोषणा की कि भारत इस साल अपना उपग्रह मंगल ग्रह की ओर भेजेगा। केवल मंगलयान ही नहीं। हमारा चन्द्रयान-2 कार्यक्रम तैयार है। सन 2016 में पहली बार दो भारतीय अंतरिक्ष यात्री स्वदेशी यान में बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे। सन 2015 या 16 में हमारा आदित्य-1 प्रोब सूर्य की ओर रवाना होगा। और सन 2020 तक हम चन्द्रमा पर अपना यात्री भेजना चाहते हैं। किसी चीनी यात्री के चन्द्रमा पहुँचने के पाँच साल पहले। देश का हाइपरसोनिक स्पेसक्राफ्ट अब किसी भी समय सामने आ सकता है। अगले दशक के लिए न्यूक्लियर इनर्जी का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार है। एटमी शक्ति से चलने वाली भारतीय पनडुब्बी अरिहंत नौसेना के बेड़े में शामिल हो चुकी है। हमारा अपना बनाया तेजस विमान तैयार है। युद्धक टैंक अर्जुन-2 दुनिया के सबसे अच्छे टैंकों से भी बेहतर बताया जा रहा है। भारत के डिज़ाइन से तैयार हो रहा है अपना विमानवाहक पोत। हम रूस के साथ मिलकर पाँचवी पीढ़ी का युद्धक विमान विकसित कर रहे हैं। रूस के साथ मिलकर ही बहुउद्देश्यीय माल-वाहक विमान भी हम डिज़ाइन करने जा रहे हैं।

Monday, March 4, 2013

बांग्लादेश का एक और मुक्ति संग्राम


बांग्लादेश में जिस वक्त हिंसा का दौर चल रहा है हमारे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की यात्रा माने रखती है। पर बांग्ला विपक्ष की नेता खालिदा ज़िया ने प्रणव मुखर्जी से मुलाकात को रद्द करके इस आंदोलन को नया रूप दे दिया है। देश में एक ओर जमात-ए-इस्लामी का आंदोलन चल रहा है, वहीं पिछले तीन हफ्ते से ढाका के शाहबाग चौक में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के समर्थक जमा हैं। इस साल के अंत में बांग्लादेश में चुनाव भी होने हैं। शायद इस देश में स्थिरता लाने के पहले इस प्रकार के आंदोलन अनिवार्य हैं। 
भारत के लिए बांग्लादेश प्रतिष्ठा का प्रश्न रहा है। इस देश का जन्म भाषा, संस्कृति, धर्म और राष्ट्रवाद के कुछ बुनियादी सवालों के साथ हुआ था। इन सारे सवालों का रिश्ता भारतीय इतिहास और संस्कृति से है। इन सवालों के जवाब आज भी पूरी तरह नहीं मिले हैं। पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्व में बांग्लादेश भारत के अंतर्विरोधों के प्रतीक हैं। संयोग है तीनों देश इस साल चुनाव की देहलीज पर हैं। पाकिस्तान में अगले दो महीने और भारत और बांग्लादेश में अगला एक साल लोकतंत्र की परीक्षा का साल है। इस दौरान इस इलाके की जनता को तय करना है कि उसे आधुनिकता, विकास और संस्कृति का कैसा समन्वय चाहिए। पर बांग्लादेश की हिंसा अलग से हमारा ध्यान खींचती है।
जमात-ए-इस्लामी के नेता दिलावर हुसैन सईदी को मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद बांग्लादेश के अलग-अलग इलाकों में दंगे भड़के हैं। अभी तक बांग्लादेश नेशनल पार्टी ने इस मामले में पहल नहीं की थी, पर शुक्रवार को उसकी नेता खालिदा जिया ने सरकार पर नरसंहार का आरोप लगाकर इसे राजनीतिक रंग दे दिया है। देश के 15 ज़िले हिंसा से प्रभावित हैं। कई शहरों में सत्तारूढ़ अवामी लीग और जमात-ए-इस्लामी कार्यकर्ताओं के बीच टकराव हुए हैं। सन 1971 के बाद से देश में यह सबसे बड़ी हिंसा है। नेआखाली के बेगमगंज में मंदिरों और हिंदू परिवारों पर हमले हुए हैं। जमात-ए-इस्लामी और उसकी छात्र शाखा इस्लामी छात्र शिविर ने मंदिरों को ही नहीं मस्जिदों को भी निशाना बनाया है। बांग्लादेश की शाही मस्जिद कहलाने वाली बैतुल मुकर्रम मस्जिद में कट्टरपंथियों ने तोड़फोड़ की है। यह हिंसा लगभग एक महीने से चल रही है। और इस कट्टरपंथी हिंसा के जवाब में पिछले एक महीने से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी नौजवानों का आंदोलन भी चल रहा है। यह आंदोलन भी देश भर में फैल गया है। देखना यह है कि क्या बांग्लादेश आधुनिकतावाद को अपनी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बना पाएगा।

Wednesday, February 27, 2013

पवन बंसल का राम भरोसे रेल बजट

रेल किराए या इसी किस्म की लोकलुभावन बातों पर गौर न करें तो भारत के आधुनिकीकरण में रेलवे की भावी भूमिका और अंदेशों का संकेत तो इस बार के रेल बजट में मिलता है, पर जवाब कहीं नहीं मिलता। रेल बजट को लोकलुभावन बनाने का ममता बनर्जी का फ़र्मूला किराया न बढ़ाना था तो पवन बंसल का फ़ॉर्मूला विकास के कार्यों को रोक देने का है। लगता है सरकार ने सारे काम भविष्य पर छोड़ दिए हैं। रेलवे की सबसे बड़ी ज़रूरत है माल ढोने के लिए आधार ढाँचे को तैयार करना, यात्रियों की सुरक्षा और सहूलियतों में इज़ाफा, विद्युतीकरण, आमान परिवर्तन और नई लाइनों का निर्माण। हमें अपने बजट को इसी लिहाज से देखना चाहिए। और यह देखना चाहिए कि सरकार कितना निवेश इन कामों पर करने जा रही है। इसके लिए पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में रेलवे के लिए 5.19 लाख करोड़ रुपए के निवेश की ज़रूरत है। इसमें से आंतरिक साधनों से 1.05 लाख करोड़ की व्यवस्था करने का निश्चय किया गया है। इसमें से केवल 10,000 करोड़ रुपए की व्यवस्था पिछले साल के बजट में की गई थी। यानी 95,000 करोड़ रुपए का इंतज़ाम अगले चार साल पर छोड़ दिया गया। पिछले साल रेलवे का योजनागत व्यय 60,100 करोड़ रुपए था, जो संशोधित कर 52,265 करोड़ रु कर दिया गया। यानी वह व्यवस्था भी नहीं हो पाई। इस साल 63, 363 करोड़ रु की व्यवस्था बजट में की गई है। यानी दो साल में योजनागत व्यय एक लाख 15, 628 करोड़ रु हुआ। यानी अगले तीन साल में 4.04 लाख करोड़ रु की व्यवस्था करनी होगी। यानी अगले तीन साल तक रेलवे को योजनागत व्यय में इस साल के व्यय का तकरीबन ढाई गुना खर्च करना होगा। यह काम लगभग असम्भव है।

Tuesday, February 26, 2013

हंगामा करने मात्र से आतंक को हराना सम्भव नहीं


हैदराबाद के बम धमाके जब हुए हैं तब हमारी संसद का सत्र चल रहा है। धमाकों की गूँज संसद में सुनाई भी पड़ी है। उम्मीद करनी चाहिए कि राष्ट्रीय राजनीति इन धमाकों  के निहितार्थ को जनता का सामने रखेगी और कोई समाधान पेश करेगी। यह मानने के पहले हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि आतंकी गतिविधियाँ फिलंहाल हमारे जीवन का हिस्सा हैं। इन्हें पूरी तरह खत्म करने का दावा नहीं किया जा सकता, पर समाधान खोजा जा  सकता है। न्यूयॉर्क और लंदन से लेकर मैड्रिड तक धमाकों के मंज़र देख चुके हैं। भारत के मुकाबले अमेरिका आतंकवादियों का ज़्यादा बड़ा निशाना है, पर 9/11 के बाद अमेरिका ने दूसरा मौका धमाका-परस्तों को नहीं दिया। बेशक हम उतने समृद्ध नहीं। भौगोलिक रूप से हमारी ज़मीन पर दुश्मन का प्रवेश आसान है। इन बातों के बावज़ूद हमें खुले दिमाग से कुछ मसलों पर विचार करना चाहिए। खासतौर से इस बात को ध्यान में रखते हुए कि भारत आर्थिक बदलाव के महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा है और नए प्रकार की राष्ट्र-रचना का काम चल रहा है। तथ्य यह है कि नवम्बर 2008 में मुम्बई धमाकों और उसके बाद छह शहरों में हुए धमाकों में से किसी की तह तक हम नहीं पहुँच पाए। बावजूद इसके कि हमने नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी बनाई है, जिसका काम सिर्फ आतंकवादी मामलों की जाँच करना है। दिल्ली हाईकोर्ट धमाकों में भी कोई बड़ी प्रगति नहीं हो पाई। आमतौर पर धमाकों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन या हूजी का हाथ माना जाता है जो प्रकारांतर से लश्करे तैयबा से जुड़ते हैं। हाल में हिन्दुत्ववादी संगठनों का हाथ भी देखा गया है। आतंकवाद से सुरक्षा के दो पहलू हैं। एक है कार्रवाई से पहले की खुफिया सूचना और दूसरा है जाँच। हम दोनों जगह नाकाम हैं।
हैदराबाद धमाकों के राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक निहितार्थ को एक-एक करके देखें तो कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक बातें सामने आएंगी। धमाकों की खबर के साथ ही मीडिया हरकत में आ गया जैसा कि हमेशा होता है। रात के पौने नौ बजे अपने आप को सबसे तेज़ कहने वाले चैनल ने मरने वालों की संख्या  24 पर पहुँचा दी थी। यह संख्या दूसरे चैनलों के अनुमानों की दुगनी थी और अब तक के अनुमानों से भी ज्यादा है। दूसरे चैनल बम धमाकों की संख्या दो या तीन के बीच अटके थे वहीं इस चैनल पर इससे ज्यादा का अंदेशा व्यक्त किया जा रहा था। धमाकों का उद्देश्य अफरा-तफरी फैलाने का था तो मीडिया का काम उसे बढ़ाने का नहीं होना चाहिए। न्यूयॉर्क पर हुए आतंकी हमले की कवरेज को देखें तो आप पाएंगे कि मीडिया ने अव्यवस्था और अराजकता के बजाय व्यवस्था को दिखाने की कोशिश की। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ऊँची इमारत की सीढ़ियों में दो कतारें अपने आप बन गईं। एक कतार में लोग उतर रहे थे और दूसरी कतार में राहतकर्मी ऊपर जा रहे थे। आपने लाशों की तस्वीरें देखी भी नहीं होंगी। इसके विपरीत मुम्बई पर हुए आतंकी हमले की भारतीय मीडिया कवरेज ने पाकिस्तान में बैठे आतंकियों को मदद पहुँचाई। आतंकियों और उन्हें निर्देश देने वालों के फोन-संदेशों ने इस बात की पुष्टि की। ज़रूरत इस बात की है कि मीडियाकर्मियों को इन स्थितियों में कवरेज का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
दूसरा पाठ प्रशासनिक व्यवस्था का है। गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे के वक्तव्य से लगता है कि सरकार के पास कुछ शहरों में धमाकों के अंदेशे की खुफिया जानकारी थी। जानकारी इतनी साफ हो कि किस वक्त पर कहाँ हमला हो सकता है तो हमला हो ही नहीं पाता। पर मोटा अंदेशा हो तो पेशबंदी की जा सकती है। हैदराबाद में क्या पेशबंदी थी, अभी यह स्पष्ट नहीं है। लगता है कि सुरक्षा-व्यवस्था को इसका गुमान नहीं  था। इसे इंटेलिजेंस फेल होना कहते हैं। इंटेलिजेंस या खुफियागीरी कई तरह से होती है। इसमें तकनीक का इस्तेमाल होता है, दूसरे देशों या संगठनों की सूचनाओं को एकत्र किया जाता है और जनता से सीधे प्राप्त जानकारियों को हासिल किया जाता है। इसे मानवीय या ह्यूमन इंटेलिजेंस कहते हैं। हमारे यहाँ ह्यूमन इंटेलिजेंस बेहद कमज़ोर है। इसके सामाजिक और प्रशासनिक दोनों कारण हैं। मसलन हैदराबाद में अमोनियम नाइट्रेट से बम बनाया गया था। यह सबसे आसानी से मिलने वाला विस्फोटक है जो खेती के काम भी आता है। इसकी बिक्री को नियंत्रित करने के साथ-साथ इसके विक्रेताओं से सम्पर्क रखने और उन्हें प्रशिक्षित करने की ज़रूरत भी होगी। पर हम यह काम नहीं कर पाए हैं। हमने जानकारियों का नेशनल ग्रिड (नैट ग्रिड) बनाया है, पर लगता है जानकारियों के विश्लेषण की पद्धति तैयार नहीं की। इससे भी बड़ी बात यह है कि पुलिस बलों के पास पर्याप्त लोग नहीं हैं, जो अपने इलाके की जनता से दोस्ताना रिश्ता रखें। उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित भी नहीं किया गया है। इसी महीने सुप्रीम कोर्ट में एक लोक याचिका के संदर्भ में तमाम तथ्य सामने आए हैं कि किस तरीके से हमारे नेता वीआईपी सुरक्षा के नाम लाल बत्ती, एक्स-वाई-जेड सुरक्षा की तलाश में रहते हैं। इसके कारण जनता की सुरक्षा पीछे रह जाती है। खुफिया एजेंसियों में युवा खून की ज़रूरत भी है। अधिकतर एजेंसियों में 50 से ऊपर की उम्र के लोग यह काम कर रहे हैं, जबकि आतंकी संगठन किशोरों को आकर्षित कर रहे हैं। इसमें भी दो राय नहीं कि बेरोज़गारी और गरीबी ने किशोरों को भ्रमित कर दिया है। उन्हें सकारात्मक रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी व्यवस्था की है। और भ्रष्टाचार पर काबू पाने की ज़रूरत भी है, क्योंकि आतंकियों के पास पैसा हथियार बैकडोर से आते हैं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो हमारे सामने सबसे बड़ा उदाहरण है नेशनल काउंटर टैररिज़्म सेंटर (एनसीटीसी)। पिछले साल फरवरी में सरकार ने अचानक इसे बनाने की घोषणा कर दी। इसपर कुछ राज्य सरकारों ने इसमें अड़ंगा लगा दिया। यदि हमें एनसीटीसी की ज़रूरत है तो उसके राजनीतिक निहितार्थ को जल्द से जल्द समझ कर इसका रास्ता साफ करना चाहिए। पिछले एक साल में यह मामला जस का तस है। हैदराबाद की घटना क्या मजलिसे इत्तहादुल मुस्लिमीन के विधायक अकबरुद्दीन ओवेसी के भाषण का परिणाम थी? लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने यह सवाल उठाया है। उनका यह भी कहना था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सरकार और भाजपा का दृष्टिकोण एक नहीं है। यह चिंतनीय वक्तव्य है। इन दो दलों का नहीं पूरे देश का दृष्टिकोण एक होना चाहिए। यह आम जनता की सुरक्षा का सवाल है। बेशक जब अकबरुद्दीन ओवेसी का ज़िक्र होगा तो प्रवीण तोगड़िया का भी होगा। राजनीतिक दलों को इस मामले की संवेदनशीलता को समझना चाहिए। 
एक महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। इस बात तक की तह तक पहुँचने की ज़रूरत है कि पाकिस्तान में कराची प्रोजेक्टनाम से लश्करे तैयबा का वह गिरोह चल रहा है या नहीं जिसका उद्देश्य भारत में अराजकता फैलाना है। कराची प्रोजेक्ट के बारे में डेविड कोल हैडली ने अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को जानकारी दी थी। यह प्रोजेक्ट 2003 से चल रहा था और अनुमान है कि आज भी सक्रिय है। लश्करे तैयबा अपने नए नाम दारुल उद दावा के रूप में सक्रिय है और हाफिज सईद दिफा-ए-पाकिस्तान कौंसिल के नाम से कट्टरपंथी आंदोलन चला रहे हैं। मुम्बई धमाकों के सिलसिले में पाकिस्तान सरकार के आश्वासन के बावज़ूद वहाँ से आए आयोग की जानकारी को पाकिस्तान की अदालत ने साक्ष्य नहीं माना। और अब एक नए आयोग की व्यवस्था की जा रही है, जो इस मामले की तफतीश से जुड़े लोगों से बात करेगा। इतना साफ है कि पाकिस्तान की नागरिक सरकार इतनी ताकतवर नहीं है कि वह लश्करे तैयबा पर काबू पा सके। हाफिज सईद पर अमेरिका की ओर से 10 मिलियन डॉलर के इनाम की घोषणा के बाद से उसके हौसले बढ़े ही हैं, कम नहीं हुए। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम तभी जीत सकते हैं जब सामाजिक और राजनीतिक रूप से एक और प्रशासनिक रूप से कुशल हों। 

Wednesday, February 20, 2013

खतरा ! वीआईपी आ रहा है


वीआईपीवाद से मुक्ति चाहती है जनता
इंटरनेट ने सामान्य व्यक्ति के दुख-दर्द को उजागर करने का काम किया है। एक ब्लॉगर ने लिखा, लगता है कि वीआईपी होने का सुख जिसे भी मिलता हो, पर उसका दुख पूरा शहर सहन करता है। कुछ साल पहले कानपुर में प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान ट्रैफिक में फँसा एक घायल बच्चा समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सका और उसकी मौत हो गई। इसी तरह प्रधानमंत्री का चंड़ीगढ़ दौरा एक मरीज का मौत का कारण बन गया था। गम्भीर रूप से बीमार व्यक्ति को पुलिस वालों ने इसलिए नहीं जाने दिया क्योंकि प्रधानमंत्री का काफिला उधर से गुजरने वाला था। गुर्दे का मरीज होने की वजह से वह हर महीने पीजीआई खून बदलवाने के लिए जाया करता था। उसके परिजनों ने पुलिस वालों को लाख समझाया, पर उनकी नहीं सुनी गई। भारत जैसी वीआईपी सुरक्षा शायद दुनिया के किसी देश में नहीं होगी। एम्बुलेंस को रास्ता देना आधुनिकता का प्रतीक है, पर आप देश की राजधानी में अक्सर वीआईपी मूवमेंट के कारण रोके गए ट्रैफिक में फँसी एम्बुलेंसों को देख सकते हैं। इंडिया गेट के पास से गुजरते वीआईपी के लिए रुके ट्रैफिक के कारण कनॉट प्लेस में लगे जाम को देख सकते हैं। आम जनता के जरूरी काम, इंटरव्यू, डॉक्टरों से अपॉइंटमेंट, मीडिंग सब बेकार हैं। सबसे ज़रूरी है साहब बहादुर की सवारी।

Tuesday, February 19, 2013

इंटरनेट सेंसरशिप


ग्वालियर की एक अदालत के आदेश पर कार्रवाई करते हुए सरकार ने उन 78 यूआरएल को ब्लाक करने के आदेश जारी किए जिनमें आईआईपीएम या फिर उनके निदेशक अरिन्दम चौधरी के बारे में कुछ अभद्र कहा सुना गया था। चीन में इंटरनेट सेंसरशिप चलती है, पर भारत में हाल के दिनों में इसे लेकर विमर्श चल रहा है। आईआईपीएम का तर्क अपनी जगह है कि यदि कोई किसी के भी बारे में अपनी राय व्यक्त करने को स्वतंत्र है तो किसी को अपने बारे में कुछ भी लिखे गए को स्वीकार करने या न करने की आजादी भी है। पिछली 14 फरवरी को ग्वालियर की एक अदालत के आदेश के बाद डीओटी की कम्प्यूटर इमरजंसी रिस्पांस टीम ने कार्रवाई भी कर दी। मीडियानामा नामक एक वेबसाइट ने उन सभी यूआरएल की लिस्ट भी प्रसारित कर दी जिन्हें ब्लाक किया जा रहा है। रोचक बात यह है कि जिन यूआरएल को ब्लाक करने की लिस्ट जारी की गई है उसमें यूजीसी की वेबसाइट का एक पन्ना भी शामिल है। हालांकि इस वक्त यूजीसी साइट का वह पन्ना विजिबल है जिसके ब्लाक करने की खबर कही गई थी। ऐसे कुछ और पन्ने भी देखे जा सकते हैं। ब्लाक लिस्ट में रीडिफ, आउटलुक, कैरेवान, इंडियन एक्सप्रेस के भी कुछ पन्ने शामिल हैं जिसमें आईआईपीएम के बारे में कथित 'गलत जानकारी' दी गई थी। इन वैबसाइटों में से कुछ का कहना है कि उनके पन्ने ब्लॉक करने के पहले कोई सूचना नहीं दी गई। 

इंटरनेट पर विवादित सामग्री के प्रकाशन को लेकर धीरे-धीरे मामले सामने आएंगे, पर आश्चर्य इस बात का है कि भारतीय मीडिया में इस सवाल पर चर्चा बहुत क्षीण है। कम से कम हिन्दी अखबारों के सम्पादकों को तो लगता है कि इसकी भनक भी नहीं हैं, हालांकि लगभग सभी में अपने आप को यंगिस्तान के पहलवान साबित करने की होड़ लगी है। वस्तुतः यह अभिव्यक्ति के अधिकार और व्यवसाय चलाने की स्वतंत्रता के अंतर्विरोधों को उजागर करने का मामला है और जनता के सामने सारे तथ्य आने चाहिए। पर जैसा कि पहले होता रहा है मीडिया अपने मामलों पर विमर्श में पीछे रहता है। 18 फरवरी के हिन्दू के ऑपएड पेज पर वासुदेव मुकंठ और अनुज श्रीवास का लेख प्रकाशित हुआ। आज हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस ने इस मसले पर सम्पादकीय भी लिखे हैं। हिन्दू में Think beyond censorship शीर्षक सम्पादकीय में इटरनेट ब्लॉक करने की तकनीकी खामियों की ओर इशारा किया गया है। हिन्दू के सम्पादकीय अंशः-

 That bruising lesson must have been learnt by all actors involved in the blocking of over 70 web pages containing content critical of the Indian Institute of Planning and Management, an agency that widely advertises a variety of study courses and degrees. The online community has responded with a counter-offensive against the institution on a devastating scale, and called attention worldwide to precisely what the institute wanted purged. Moreover, the episode proves once again that the Information Technology Act is a handy censorship tool. Although the order to the Department of Telecommunications to block the web pages was issued by a Gwalior court, it is flawed, because no opportunity was provided to the websites to enter a defence. It is shocking that the court saw merit in the plaintiff’s plea to block a page of the University Grants Commission, the highest body regulating the general university system, simply because it declared that within the meaning of the UGC Act, IIPM is not a university, and does not have the right to confer or grant degrees. पूरा पढ़ें

इंडियन एक्सप्रेस

Block games
IIPM case highlights the inept way information is blocked online

Defamation is a serious business, and quick legal recourse is everyone’s due. That said, the IIPM case has revealed the bluntness of the instrument — the way IT legislation can be misused to blank out important public information, like the UGC’s notice. Courts are meant to use interim injunctions only in extraordinary situations, because of the way they can chill free speech. What’s more, this blocking was done silently, without offering the websites a chance to explain their side of the story, without even informing them. If the IIPM’s partner was hoping that all unflattering references would be quietly effaced, he would have realised his mistake by now. As tends to happen on the internet in response to clumsy attempts at suppression, that material has now sprouted all around, as publications and individuals defiantly reposted the content. The hacker collective, Anonymous India, targeted the IIPM for a while. On Twitter, Minister of State for HRD Shashi Tharoor flagged the UGC-blocking news to his counterpart in the communications ministry, Milind Deora. This kind of selective filtering of websites, and the pressure on intermediaries to remove “offensive” content, has come to characterise the official approach in recent years. The IIPM case is still unfolding in court, but it has revealed how, by default, the internet regulation regime appears to be set against free expression. पूरा पढ़ें

20 फरवरी 2013 के हिन्दू में प्रकाशित अपर्णा विश्वनाथन के लेख का अंश। पूरा लेख यहाँ पढ़ें

On February 6, 2013, Sanjay Chaudhary was arrested under section 66A of the Information Technology (IT) Act for posting ‘objectionable comments and caricatures’ of Prime Minister Manmohan Singh, Union Minister Kapil Sibal and Samajwadi Party president Mulayam Singh Yadav on his Facebook wall.

This arrest follows numerous others over the past few months for political speech through social media: Manoj Oswal for having caused ‘inconvenience’ to relatives of Nationalist Congress Party chief Sharad Pawar for allegations made on his website; Jadavpur University Professor Ambikesh Mahapatra for a political cartoon about West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee; businessman Ravi Srinivasan in Puducherry for an allegedly defamatory tweet against the son of Union Finance Minister P. Chidambaram; two Air India employees, who were jailed for 12 days for allegedly defamatory remarks on Facebook and Orkut against a trade union leader and a politician; Aseem Trivedi, accused of violation of the IT Act for drawing cartoons lampooning Parliament and the Constitution to depict its ineffectiveness. However, the incident that rocked the nation was the arrest last November of two young women, Shaheen Dadha and her friend Renu Srinivasan, for a comment posted on Facebook that questioned the shutdown of Mumbai following the demise of Shiv Sena Supremo Bal Thackeray. The girls were arrested under Section 66A(a) of the IT Act for allegedly sending a ‘grossly offensive’ and ‘menacing’ message through a communication device.


कुछ यूआरएल जो बंद किए गए। पूरी सूची यहाँ देखें
http://bitly.com/bundles/maheshmurthy/5
http://www.consumercourt.in/other-product-services/114783-fraud-done-iipm-delhi.html
http://akosha.com/IIPM-complaints-98.html
http://www.consumercourt.nic.in/other-department/88450-fraud-iipm-bangalore-campus.html
कुछ वे यूआरएल जो अभी देखे जा सकते हैं
http://www.iipmfraud.com/
http://www.fakingnews.com/2011/07/iipm-appoints-poonam-pandey-as-their-brand-ambassador/
http://harishc.blogspot.in/2011/06/caravan-iipm-article.html
http://www.indianexpress.com/news/court-asks-iipm-ugc-to-clarify-on-affiliation/676123/
http://kafila.org/2011/06/22/arindam-chaudhuri-silchar/

Call me ugly but don't attack my business: Arindam Caudhari


Monday, February 18, 2013

भारतीय सुरक्षा को प्रभावित करेगी यह 'भिंडी बाज़ार' मनोवृत्ति


भारत सरकार ने ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर के समझौते को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। समझौते का रद्द होना इटली की कम्पनी फिनमैकेनिका के लिए बहुत बड़ा झटका साबित होगा। इतना ही बड़ा झटका यूपीए सरकार को लगेगा। क्योंकि इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। मीडिया में इस आशय की जानकारियाँ अलग-अलग स्रोतों से आने लगी हैं कि फायदा परिवार को मिला। इस तरह की बातों से भ्रम की स्थिति पैदा होती है। प्रमाणों के साथ बात की जानी चाहिए। अच्छी बात यह है कि मामले की शुरूआत इटली सरकार ने की है। हमें जो भी जानकारियाँ मिल रहीं हैं, वे सब वहीं से हासिल हो रही हैं। अब सीबीआई को इटली जाकर जाँच करने का मौका मिलेगा, पर उसके पहले वहाँ की सरकार और अदालत से इज़ाज़त लेनी होगी। इस मामले की तुलना बोफोर्स मामले से की जाती है, पर उस मामले में स्वीडन सरकार ने सहयोग नहीं किया था। सारी जाँच भारतीय एजेंसियों और मीडिया के मार्फत हुई थी। इस बार इटली की सरकार ने पहल की है। आश्चर्य इस बात पर है कि तकरीबन एक साल से यह मामला भारतीय मीडिया में उछल रहा था, पर सरकार ने पहल नहीं की।

Saturday, February 16, 2013

हिन्द महासागर में भारत-विरोधी हवाओं पर ध्यान दें


सिद्धांततः भारत को मालदीव की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, पर वहाँ जो कुछ हो रहा है, उसे बैठे-बैठे देखते रहना भी नहीं चाहिए। पिछले साल जब मालदीव में सत्ता परिवर्तन हुआ था वह किसी प्रकार से न्यायपूर्ण नहीं था। फौजी ताकत के सहारे चुने हुए राष्ट्रपति को हटाना कहीं से उचित नहीं था। और अब उस राष्ट्रपति को चुनाव में खड़ा होने से रोकने की कोशिशें की जा रहीं है। इतना ही नहीं देश का एक तबका परोक्ष रूप से भारत-विरोधी बातें बोलता है। वह भी तब जब भारत उसका मददगार है। दरअसल हमें मालदीव ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया और खासतौर से हिन्द महासागर में भारत-विरोधी माहौल पैदा करने की कोशिशों के बाबत सतर्क रहना चाहिए।  16 फरवरी 2013 के हिन्दी ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा लेखः-
Maldivian army and policemen face supporters of Mohamed Nasheed, who resigned Tuesday from his post as Maldivian President, during a protest in Male on Wednesday.
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद की गिरफ़्तारी का वॉरंट जारी होने के बाद उनका माले में स्थित भारतीय दूतावास में आना एक महत्वपूर्ण घटना है। पिछले साल फरवरी में जब नाशीद का तख्ता पलट किया गया था तब भारत सरकार ने उस घटना की अनदेखी की थी, पर लगता है कि अब यह घटनाक्रम किसी तार्किक परिणति की ओर बढ़ेगा। शायद हम अभी इस मामले को ठीक से समझ नहीं पाए हैं, पर यह बात साफ दिखाई पड़ रही है कि नाशीद को इस साल वहाँ अगस्त-सितम्बर में होने वाले चुनावों में खड़ा होने से रोकने की पीठिका तैयार की जा रही है। इसके पहले दिसम्बर 2012 में मालदीव सरकार ने भारतीय कम्पनी जीएमआर को बाहर का रास्ता दिखाकर हमें महत्वपूर्ण संदेश दिया था। माले के इब्राहिम नासिर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की देखरेख के लिए जीएमआर को दिया गया 50 करोड़ डॉलर का करार रद्द होना शायद बहुत बड़ी बात न हो, पर इसके पीछे के कारणों पर जाने की कोशिश करें तो हमारी चंताएं बढ़ेंगी। समझना यह है कि पिछले एक साल से यहाँ चल रही जद्दो-जेहद सिर्फ स्थानीय राजनीतिक खींचतान के कारण है या इसके पीछे चीन और पाकिस्तान का हाथ है।

Monday, February 11, 2013

फाँसी की राजनीति


भारत में किसी भी बात पर राजनीति हो सकती है। अफज़ल गुरू को फाँसी देने के सवाल पर और उससे जुड़ी तमाम पेचीदगियों पर भी। और अब अफज़ल गुरू के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह तथा राजीव गांधी की हत्या के अभियुक्तों को फाँसी की मसला राजनीति का विषय बनेगा।  
फेसबुक पर कानपुर के पत्रकार ज़फर इरशाद का स्टेटस था, कांग्रेस के लोगों के पास ज़बरदस्त दिमाग है..जैसे ही उसने देखा कुम्भ में बहुत मोदी-मोदी हो रहा है, उसने अफज़ल को फाँसी देकर सारी ख़बरों को डाइवर्ट कर दिया..अब कोई बचा है क्या फाँसी के लिए?” अजमल कसाब की तरह अफज़ल गुरू की फाँसी न्यायिक प्रक्रिया से ज़्यादा राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नज़र आती हैं। इस सिलसिले में अभी कुछ और पात्र बचे हैं, जिनकी सज़ा राजनीतिक कारणों से रुकी है। बहरहाल एक और टिप्पणी थी फ्रॉम सॉफ्ट टु एक्शन टेकिंग स्टेट। यानी सरकार अपनी छवि बदलने की कोशिश में है। यह भाजपा के हिन्दुत्व को दिया गया जवाब है। लम्बे अरसे से कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान में ही नहीं, हमारे दो बड़े राजनीतिक दलों के बीच रस्साकशी चलती रही है। और यह बात कश्मीर समस्या और भारत-पाकिस्तान रिश्तों को परिभाषित करने में बड़ी बाधा है। अजमल कसाब और अफज़ल गुरू को फाँसी देने में जिस किस्म की गोपनीयता बरती गई वह इस अंतर्विरोध को रेखांकित करती है। हमारी  आंतरिक राजनीति पर विभाजन की छाया हमेशा रही है। और ऐसा ही पाकिस्तान में है। दोनों देशों में चुनाव की राजनीति इस प्रवृत्ति को बजाय कम करने के और ज्यादा बढ़ाती है। दोनों देशों के चुनाव करीब है।

Sunday, February 10, 2013

फाँसी के बाद भी सवाल उठेंगे


अब इस बात पर विचार करने का वक्त नहीं है कि अफज़ल गुरू को फाँसी होनी चाहिए थी या नहीं, पर इतना साफ है कि यह फाँसी केन्द्र सरकार पर बढ़ते दबाव के कारण देनी पड़ी। अजमल कसाब की फाँसी की यह तार्किक परिणति थी। और प्रयाग के महाकुम्भ में धर्मसंसद की बैठक के कारण पैदा हुआ दबाव। सन 2014 के चुनाव के पहले देश में एक बार फिर से भावनात्मक आँधियाँ चलने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। पर उसके पहले पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआणा और राजीव गांधी की हत्या में शामिल संतन, मुरुगन और पेरारिवालन की सजाओं के बारे में भी विचार करना होगा। इन सजाओं के भी राजनीतिक निहितार्थ हैं। राजोआणा को फाँसी होने से शिरोमणि अकाली दल की लोकप्रियता पर असर पड़ेगा, जो भारतीय जनता पार्टी का मित्र दल है। और राजीव हत्याकांड के दोषियों को फाँसी का असर द्रमुक पर पड़ेगा, जो यूपीए में शामिल पार्टी है। समाज के किसी न किसी हिस्से की इन लोगों के साथ सहानुभूति है। सरकार दोहरे दबाव में है। एक ओर गुजरते वक्त के साथ उसके ऊपर सॉफ्ट होने का आरोप लगता है, दूसरे न्याय-प्रक्रिया में रुकावट आती है।
पिछले साल तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने एक साथ 35 हत्यारों की फाँसी माफ कर दी, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था। जिन 35 व्यक्तियों की फाँसी की सजा उम्रकैद में बदली गई है, वे 60 से ज्यादा लोगों की हत्या में दोषी ठहराए गए थे। क्या वह प्रतिभा पाटिल का व्यक्तिगत निर्णय था? ऐसा नहीं है। राष्ट्रपति के निर्णय गृहमंत्री की संस्तुति पर होते हैं। पिछले साल तक सरकार धीरे-धीरे देश में मौत की सजा की समाप्ति की ओर बढ़ रही थी। यों भी सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि फाँसी रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामले में दी जाए। दुनिया के अधिकतर देश मौत की सज़ा खत्म कर रहे हैं। पर दिल्ली गैंगरेप के बाद मौत की सजा के पक्ष में ज़ोरदार तर्क सामने आए हैं। हालांकि जस्टिस वर्मा समिति ने रेप के लिए मौत की सजा को उचित नहीं माना है, पर सरकार ने जो अध्यादेश जारी किया है, उसमें रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामले में मौत की सजा को भी शामिल किया है। यहाँ भी राजनीति का दबाव न्याय-तंत्र पर दिखाई पड़ता है। पर हम स्त्रियों के मसले पर नहीं आतंकवादी हिंसा या देश पर हमले की बात कर रहे हैं। ऐसी हिंसा पर मौत की सजा का विरोध करना काफी मुश्किल है। हालांकि कसाब को फाँसी मिलने के बाद यह बात उठी थी कि हमें फाँसी की सज़ा पूरी तरह खत्म कर देनी चाहिए। यह बात उन सिद्धांतवादियों की ओर से आई थी जो मृत्युदंड के खिलाफ हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस रेयर ऑफ द रेयरेस्ट की बात कही है, वह पहली नज़र में अपराध के जघन्य होने की ओर इशारा करता है। पहली नज़र में लगता है कि सामूहिक बलात्कार, क्रूरता और वीभत्सता की कसौटी पर रेयर ऑफ द रेयरेस्ट को परखा जाना चाहिए। क्या इसमें राजनीतिक हिंसा को शामिल नहीं किया जा सकता? राजनीतिक उद्देश्यों से हिंसा में शामिल होने वाले ज्यादा बड़े लक्ष्यों के साथ आते हैं। उनका व्यक्तिगत हित इसमें नहीं होता। पर दूसरे नज़रिए से देखें तो राजनीतिक सज़ा को टालते रहना ज्यादा खतरनाक साबित हुआ है। मसलन सन 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण करके लाहौर ले जाने वाले लोगों की योजना मौलाना मसूद अज़हर, अहमद उमर सईद शेख और मुश्ताक अहमद ज़रगर को रिहा कराने की थी। यदि इन लोगों को समय से मौत की सजा दिलवाकर फाँसी दे दी गई होती तो विमान अपहरण न होता। अपराधियों को छुड़ाने के लिए विमान यात्रियों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक को बंधक बनाने की परम्परा दुनिया भर में है। भारत में झारखंड, ओडीसा और बंगाल में सरकार को कई बार नक्सली बंदियों की रिहाई करनी पड़ी। इसके विपरीत कहा जाता है कि राजनीतिक प्रश्नों का हल राजनीति से होना चाहिए। नक्सलपंथ या इस्लामी आतंकवाद एक राजनीतिक सवाल है, उनका बुनियादी हल निकलना चाहिए।
पर कुछ बड़े सवाल अनुत्तरित हैं। क्या अफज़ल गुरू की फाँसी अनिश्चित काल तक टाली जा सकती थी? पर उससे बड़ा सवाल है कि क्या वास्तव में अफ़ज़ल गुरू संसद पर हमले का गुनहगार था? उसका मास्टरमाइंड कौन थाउस हमले के दौरान मारे गए पाँच आतंकवादी कौन थे, वे कहाँ से आए थे? इस मामले में पकड़े गए दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक एसएआर गीलानी की रिहाई के बाद यह सवाल पैदा हुआ था कि क्या अफज़ल गुरू को भी फँसाया गया था? अरुंधती रॉय उसके मामले को फर्ज़ी मानती हैं। उनका कहना है कि अफज़ल ने ऐसा दावा नहीं किया कि वह बिलकुल निर्दोष है, पर इस मामले में पूरी तहकीकात नहीं की गई। 13 दिसम्बर शीर्षक से पेंगुइन बुक्स की एक पुस्तक ज़ारी भी की गई, जिसकी प्रस्तावना अरुंधती रॉय ने लिखी थी। इस किताब में अनेक सवाल उठाए गए थे। सवाल अब भी उठेंगे। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या में दोषी पाए गए केहर सिंह को दी गई फाँसी की सज़ा के बाद भी ऐसे सवाल उठे थे। सम्भव है आने वाले समय में इस पर कुछ रोशनी पड़े।

Wednesday, February 6, 2013

यह उजाले पर अंधेरों का वार है

अक्टूबर 2011 में बीबीसी हिन्दी की वैबसाइट पर संवाददाता समरा फ़ातिमा की रपट में बताया गया था कि अलगाववादी आंदोलन और हिंसा के दृश्यों के बीच कश्मीर में इन दिनों सुरीली आवाजें सुनाई दे रही हैं। उभरते युवा संगीतकार चार से पाँच लोगों का एक बैंड बना कर ख़ुद अपने गाने लिखने और इनका संगीत बनाने लगे हैं। चूंकि इनके गीतों में तकलीफों का बयान था, इसलिए पुलिस की निगाहें इनपर पड़ीं। 'एम सी कैश' के नाम से गाने बनाने वाले 20 वर्षीय 'रोशन इलाही' ने बताया कि 2010 के सितंबर में पुलिस ने उनके स्टूडियो में छापा मारा और उसे बंद कर दिया। इन कश्मीरी बैंडों में अदनान मट्टू का ब्लड रॉक्ज़ भी है, जिनकी प्रेरणा से तीन लड़कियों का बैंड प्रगाश सामने आया।
प्रगाश के फेसबुक पेज पर जाएं तो आपको समझ में आएगा कि कट्टरपंथी उनका विरोध क्यों कर रहे हैं। जैसे ही वे चर्चा में आईं उनके फ़ेस बुक अकाउंट पर नफरत भरे संदेशों का सिलसिला शुरू हो गया। सबसे पहले उनका पेज खोजना मुश्किल है, क्योंकि इस नाम से कई पेज बने हैं। असली पेज का पता इन लड़कियों के बैंड छोड़ने की घोषणा से लगता है। प्रगाश के माने हैं अंधेरे से रोशनी की ओर। रोशनी की ओर जाना कट्टरपंथियों को पसंद नहीं है। पिछले रविवार को कश्मीर के प्रधान मुफ़्ती ने उनके गाने को ग़ैर इस्लामीकरार दिया, पर उसके दो दिन पहले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया था कि थोड़े से पागल लोग इनकी आवाज़ को खामोश नहीं कर पाएंगे। पर तीनों लड़कियों को बैंड छोड़ने का फैसला करना पड़ा। इससे पहले हुर्रियत कांफ़्रेंस ने भी इन उनकी यह कह कर आलोचना की थी कि वह पश्चिमी मूल्यों का अनुसरण कर रही हैं। कश्मीर के ये बैंड सन 2004 के बाद से सक्रिय हुए हैं। कश्मीर में ही नहीं पाकिस्तान में संगीत का खासा चलन है। हाल में दिल्ली आया पाकिस्तानीलाल बैंडकाफी लोकप्रिय हुआ। लाल बैंड प्रगतिशील गीत गाता है। इन्होंने रॉक संगीत में फैज अहमद फैज जैसे शायरों के बोल ढाले और उन्हें सूफी कलाम के नज़दीक पहुंचाया। पाकिस्तान और कश्मीर में सूफी संगीत पहले से लोकप्रिय है। ऐसा क्यों हुआ कि जब लड़कियों ने बैंड बनाया तो फतवा ज़ारी हुआ?

Monday, February 4, 2013

कानूनी सुधार का अधूरा चिंतन


पिछले दो साल में हुए दो बड़े जनांदोलनों की छाया से सरकार बच नहीं पा रही है। यह छाया 21 फरवरी से शुरू होने वाले बजट सत्र पर भी पड़ेगी। इन आंदोलनों की नकारात्मक छाया से बचने के लिए सरकार ने पिछले हफ्ते दो बड़े फैसले किए हैं। केन्द्रीय कैबिनेट ने पहले लोकपाल विधेयक के संशोधित प्रारूप को मंज़ूरी दी और उसके बाद स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए कानून में बदलाव की पहल करते हुए अध्यादेश लाने का फैसला किया। दोनों मामलों में सरकार कुछ देर से चेती है और दोनों में उसका आधा-अधूरा चिंतन दिखाई पड़ता है। अंदेशा यह है कि यह कदम उल्टा भी पड़ सकता है। सीपीएम ने इस बात को सीधे-सीधे कह भी दिया है। यह अधूरापन केवल सरकार में नहीं समूची राजनीति में है। इसके प्रमाण आपके सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह की याचिका पर छह साल पहले सरकार को निर्देश दिया था कि वह पुलिस सुधार का काम करे। ज्यादातर राज्य सरकारों की दिलचस्पी इसमें नहीं है। पिछले साल लोकपाल आंदोलन को देखते हुए लगभग सभी दलों ने संसद में आश्वसान दिया था कि कानून बनाया जाएगा। जब 2011 के दिसम्बर में संसद में बहस की नौबत आई तो बिल लटक गया। सरकार अब जो विधेयक संशोधन के साथ लाने वाली है उसके पास होने के बाद लोकपाल की परिकल्पना बदल चुकी होगी। दिसम्बर 2011 में ही समयबद्ध सेवाएं पाने और शिकायतों की सुनवाई के नागरिकों के अधिकार का विधेयक भी पेश किया गया था। कार्यस्थल पर यौन शोषण से स्त्रियों की रक्षा का विधेयक 2010 से अटका पड़ा है। ह्विसिल ब्लोवर कानून के खिलाफ विधेयक अटका पड़ा है। भोजन का अधिकार विधेयक अटका पड़ा है। यह संख्या बहुत बड़ी है।

Tuesday, January 29, 2013

विमर्श-विहीनता, विश्वरूपम से आशीष नन्दी तक



संयोग है कि आशीष नन्दी का प्रकरण तभी सामने आया, जब विश्वरूपमपर चर्चा चल रही थी। आशीष नंदी विसंगतियों को उभारते हैं। यह उनकी तर्क पद्धति है। वे मूलतः नहीं मानते कि पिछड़े और दलित भ्रष्ट हैं, जैसा कि उनकी बात के एक अंश को सुनने से लगता है। वे मानते हैं कि देश के प्रवर वर्ग का भ्रष्टाचार नज़र नहीं आता। यह जयपुर लिटरेरी फोरम के मंच पर कही गई गई थी। आशीष नन्दी से असहमति प्रकट करने के तमाम तरीके मौज़ूद हैं। पर सीधे एफआईआर का मतलब क्या है? एक मतलब यह कि विमर्श का नहीं कार्रवाई का विषय है। कार्रवाई होनी चाहिए। बेहतर हो कि इस बहस को आगे बढ़ाएं, पर उसके पहले वह माहौल तो बनाएं जिसमें कोई व्यक्ति कुछ कहना चाहे तो वह कह सके।

Monday, January 28, 2013

हेडली से ज्यादा हमें उसके सरपरस्तों की ज़रूरत है


अक्सर कुछ रहस्य कभी नहीं खुलते। कुछ में संकेत मिल जाता है कि वास्तव में हुआ क्या था। और कुछ में पूरी कहानी सामने होती, पर उसे साबित किया नहीं जा सकता। 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों के साथ ऐसा ही हुआ। पाकिस्तान के लश्करे तैयबा का इस मामले में हाथ होने और उसके कर्ता-धर्ताओं के नाम सामने हैं। भारत में अजमल कसाब को स्पष्ट प्रमाणों के आधार पर फाँसी दी जा चुकी है। और अब अमेरिकी अदालत ने पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक डेविड हेडली को 35 साल की सजा सुनाकर उन आरोपों की पुष्टि कर दी है। बावज़ूद इसके हम पाकिस्तान सरकार के सामने साबित नहीं कर सकते हैं कि हमलों के सूत्रधार आपके देश में बाइज़्ज़त खुलेआम घूम रहे हैं। अमेरिकी अदालत में डेविड हेडली को सजा सुनाने वाले डिस्ट्रिक्ट जज ने अभियोजन पक्ष द्वारा हेडली के लिए हल्की सजा की माँग किए जाने पर अपनी नाखुशी जाहिर की थी। सजा में पैरोल का कोई प्रावधान नहीं है और दोषी को कम से कम 85 फीसदी सजा पूरी करनी होगी। 52 वर्षीय हेडली जब जेल से बाहर आएगा तब उसकी उम्र 80 से 87 साल के बीच होगी। अमेरिकी अभियोजक उसके लिए मौत या उम्र कैद की सजा भी माँग सकते थे, पर हेडली के साथ एक समझौते के तहत उन्होंने यह सजा नहीं माँगी।
जज ने सजा सुनाते हुए कहा हेडली आतंकवादी हैं। उसने अपराध को अंजाम दिया, अपराध में सहयोग किया और इस सहयोग के लिए इनाम भी पाया। जज ने कहा, इस सजा से आतंकवादी रुकेंगे नहीं। वे इन सब बातों की परवाह नहीं करते। मुझे हेडली की इस बात में कोई विश्वास नहीं होता जब वह यह कहता है कि वह अब बदल गया। पर 35 साल की सजा सही सजा नहीं है। इसके पहले शिकागो की अदालत ने इसी महीने की 18 तारीख को मुंबई हमले में शामिल हेडली के सहयोगी पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक 52 वर्षीय तहव्वुर राना को लश्कर-ए-तैयबा को साजो-सामान मुहैया कराने और डेनमार्क के अखबार पर हमले के लिए षड्यंत्र में शामिल होने के लिए 14 साल की सजा सुनाई गई थी। पर राना को मुम्बई मामले में शामिल होने के लिए सजा नहीं दी गई। इन दोनों मामलों का दुखद पहलू यह है कि हमारे देश में हुए अपराध के लिए हम इन अपराधियों पर मुकदमा नहीं चला सकते। हालांकि सरकार कह रही है कि हम हेडली और राना के प्रत्यर्पण की कोशिश करेंगे, पर लगता नहीं कि प्रत्यर्पण होगा। अमेरिकी सरकार के अभियोजन विभाग ने हैडली से सौदा किया था कि यदि वह महत्वपूर्ण जानकारियां देगा तो उसे भारत के हवाले नहीं किया जाएगा। राना के मामले में अभियोजन पक्ष ने 30 साल की सजा माँगी थी, पर अदालत ने कहा, सुनवाई के दौरान मिली जानकारियों और उपलब्ध कराई गई सामग्री को पढ़ने पर पता लगता है कि राना एक बुद्धिमान व्यक्ति है, जो लोगों का मददगार भी है। यह समझना मुश्किल है कि इस तरह का व्यक्ति कैसे इतनी गहरी साजिश में शामिल हो गया। दोनों मामलों में सजा देने वाले जज एक हैं शिकागो के डिस्ट्रिक्ट जज हैरी डी लेनिनवेबर। हेडली और तहव्वुर राना के भारत प्रत्यर्पण में 1997 में अमरीका से की गई संधि भी एक अड़चन है। यह संधि उस व्यक्ति की सुपुर्दगी की इजाजत नहीं देती जो पहले ही उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा चुका हो अथवा बरी  हो चुका हो। प्रत्यर्पण संधि के तहत राना को इसलिए सौंपा नहीं जा सकता, क्योंकि मुम्बई हमलों के लिए उसे  दोषी नहीं ठहराया गया है। हेडली इस दलील के साथ अपना बचाव करेगा कि उसे दोषी ठहराया जा चुका है और वह सजा पा रहा है।

Saturday, January 26, 2013

राजनीति का चिंताहरण दौर


भारतीय राजनीति की डोर तमाम क्षेत्रीय, जातीय. सामुदायिक, साम्प्रदायिक और व्यक्तिगत सामंती पहचानों के हाथ में है। और देश के दो बड़े राष्ट्रीय दलों की डोर दो परिवारों के हाथों में है। एक है नेहरू-गांधी परिवार और दूसरा संघ परिवार। ये दोनों परिवार इन्हें जोड़कर रखते हैं और राजनेता इनसे जुड़कर रहने में ही समझदारी समझते हैं। मौका लगने पर दोनों ही एक-दूसरे को उसके परिवार की नसीहतें देते हैं। जैसे राहुल गांधी के कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने पर भाजपा ने वंशवाद को निशाना बनाया और जवाब में कांग्रेस ने संघ की लानत-मलामत कर दी। जयपुर चिंतन शिविर में उपाध्यक्ष का औपचारिक पद हासिल करने के बाद राहुल गांधी ने भावुक हृदय से मर्मस्पर्शी भाषण दिया। इसके पहले सोनिया गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को सलाह दी थी कि समय की ज़रूरतों को देखते हुए वे आत्ममंथन करें। नगाड़ों और पटाखों के साथ राहुल का स्वागत हो रहा था। पर उसके पहले गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे के एक वक्तव्य ने विमर्श की दिशा बदल दी। इस हफ्ते बीजेपी के अध्यक्ष का चुनाव भी तय था। चुनाव के ठीक पहले गडकरी जी से जुड़ी कम्पनियों में आयकर की तफतीश शुरू हो गई। इसकी पटकथा भी किसी ने कहीं लिखी थी। इन दोनों घटनाओं का असर एक साथ पड़ा। गडकरी जी की अध्यक्षता चली गई। राजनाथ सिंह पार्टी के नए अध्यक्ष के रूप में उभर कर आए हैं। पर न तो राहुल के पदारोहण का जश्न मुकम्मल हुआ और न गडकरी के पराभव से भाजपा को कोई बड़ा धक्का लगा।