Saturday, November 27, 2021

ममता अब राष्ट्रीय-राजनीति में उतरेंगी, कांग्रेस और बीजेपी दोनों का विकल्प बनेंगी?


ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने पिछले कुछ वर्षों में जो गतिविधियाँ की उन्हें देखते हुए उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की भनक लगती थी, पर पिछले एक हफ्ते की गतिविधियों से लगता है कि वे अब खुलकर इस मैदान में हैं और भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के रूप में कांग्रेस के बजाय खुद को पेश करने जा रही हैं। यह बात उनकी पार्टी के हित में जरूर है, पर कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है।

जानकारों का यह भी कहना है कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस के नेताओं को तोड़ा है, कुछ समय बाद बीजेपी के भी कई क्षुब्ध नेताओं को भी तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने का रास्ता नजर आ सकता है। यशवंत सिन्हा पहले ही शामिल हो चुके हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस कई अन्य 'क्षुब्ध' बीजेपी नेताओं से संपर्क बना रही है. हाल में ममता बनर्जी ने अपने दिल्ली दौरे के दौरान भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी से मुलाकात की। टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के दिल्ली आवास पर हुई बैठक के बाद राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगाई जाने लगी कि भाजपा नेता स्वामी टीएमसी में शामिल होने वाले हैं। अलबत्ता स्वामी ने इन आरोपों को नकार दिया।

ममता बनर्जी ने भविष्य में मुम्बई यात्रा का कार्यक्रम भी बनाया है। वहाँ शरद पवार और शिवसेना के उद्धव ठाकरे के साथ वे एक लंबे अर्से से संपर्क में हैं। शरद पवार वर्षों से यह बात कह रहे हैं कि कांग्रेस से टूटी पार्टियों को एकसाथ आना चाहिए। तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अलावा आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस भी ऐसी ही एक पार्टी है।

मेघालय में बगावत

हाल में अपने दो दिन के दौरे पर आई ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मुलाकात नहीं की, तो पत्रकारों ने उनसे पूछा कि ऐसा क्यों हुआ। उन्होंने जो जवाब दिया, उससे लगता है कि वे कांग्रेस से टकराव मोल लेने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी से मुलाकात करने की कोई सांविधानिक जिम्मेदारी नहीं है। मुलाकात न होने की तुलना में दोनों के रिश्तों में कड़वाहट के ज्यादा बड़े कारण मेघालय में पैदा हुए हैं, जहाँ पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा समेत कांग्रेस पार्टी के 17 में 12 विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।

Monday, November 22, 2021

आंदोलन फिर से जागेंगे, राजनीतिक अंतर्विरोध अब और मुखर होंगे

आंदोलन को जारी रखने की घोषणा करते हुए बलवीर सिंह राजेवाल

देश में चल रहे किसान आंदोलन, उसकी राजनीति और अंतर्विरोध अब ज्यादा स्पष्ट होने का समय आ गया है। तीन कानूनों की वापसी इसका एक पहलू था। इसके साथ किसानों की दूसरी माँगें भी जुड़ी हैं। ये माँगे फिलहाल पंजाब और हरियाणा के किसानों की नजर आती हैं, क्योंकि इनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी रूप देने की माँग भी शामिल है।

कृषि क़ानूनों की वापसी की घोषणा के बाद नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर भी आंदोलन फिर से शुरू करने की सुगबुगाहट है। अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' के अनुसार असम में सीएए के ख़िलाफ़ कई समूह फिर से जागे हैं और 12 दिसंबर को प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं।

उधर केंद्रीय कैबिनेट 24 नवंबर को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मंजूरी पर विचार करेगी। इसके बाद कानूनों को वापस लेने वाले बिल संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किए जाएंगे। संसद का सत्र 29 नवंबर से शुरू होने वाला है।

आंदोलन जारी रहेगा

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) का आंदोलन फिलहाल जारी रहेगा। रविवार को यह फैसला मोर्चे की बैठक में लिया गया। भारतीय किसान यूनियन राजेवाल के अध्यक्ष बलवीर सिंह राजेवाल और जतिंदर सिंह विर्क ने बताया- 22 नवंबर को लखनऊ में महापंचायत बुलाई गई है। 26 नवंबर को काफी किसान आ रहे हैं। 27 को आंदोलन के अगले कदम के बारे में विचार किया जाएगा।

इसके पहले संयुक्त किसान मोर्चा की नौ सदस्यीय कोऑर्डिनेशन कमेटी की शनिवार बैठक हुई, जिसमें मोर्चा के शीर्ष नेता बलवीर सिंह राजेवाल, डॉ. दर्शन पाल, गुरनाम सिंह चढूनी, हन्नान मोल्ला, जगजीत सिंह डल्लेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, शिवकुमार शर्मा (कक्काजी), युद्धवीर सिंह आदि उपस्थित थे।

कुछ और माँगें

राजेवाल के मुताबिक, प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिखा है, जिसमें कुछ मांगें की जाएंगी। ये हैं- एमएसपी-गारंटी बिल के लिए कमेटी बनाई जाए, बिजली के शेष बिल को रद्द किया जाए और पराली जलाने के लिए लाए गए कानून को रद्द किया जाए। पत्र में अजय मिश्र टेनी को लखीमपुर मामले का मास्टरमाइंड मानते हुए कहा गया है कि उन्हें पद से हटाकर गिरफ्तार किया जाए।

Sunday, November 21, 2021

किसानों की जीत, पर समस्या जहाँ की तहाँ है


मोदी सरकार ने कृषि-कानूनों की वापसी के लिए जो खास दिन और समय चुना है, उसके पीछे चुनावी-रणनीति नजर आती है। इसके अलावा यह मजबूरी भी है। पंजाब और उत्तर प्रदेश दोनों के चुनावों पर किसान-आंदोलन का असर है। इन हालात में बीजेपी का चुनाव के मैदान में उतरना जोखिम से भरा था। हमारी लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए यह अच्छी खबर है। इसे किसी की जीत या हार मानने के बजाय यह मानना चाहिए कि सरकार को जनता के बड़े वर्ग की भावना को सुनना होता है। लोकतांत्रिक-राजनीति केवल चुनाव में बहुमत हासिल करने का काम ही नहीं है। बहरहाल कानूनों की वापसी से पार्टी पर राजनीतिक दबाव कम होगा। इससे यह भी साबित होता है कि बड़े बदलावों के उतने ही बड़े राजनीतिक जोखिम हैं। दूसरे यह भी कि तेज औद्योगीकरण के माहौल में भी हमारे देश में खेती बड़ी संख्या में लोगों की भावनाओं के साथ जुड़ी हुई है। 

तीसरी पराजय

पिछले सात साल में पार्टी की इस किस्म की यह तीसरी पराजय है। इसके पहले भूमि सुधार कानून में संशोधन और जजों की नियुक्ति से जुड़े न्यायिक नियुक्ति आयोग के मामले में सरकार को पीछे हटना पड़ा था। इतना ही नहीं सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन तो संसद से पास करा लिया, पर उससे जुड़े नियम अभी तक नहीं बना पाई है। उसे लेकर वैश्विक और आंतरिक राजनीतिक दबाव है। बहरहाल संयुक्त किसान मोर्चा ने कानूनों की वापसी को किसानों की ऐतिहासिक जीत बताया है। यह भी कहा है कि आंदोलन फ़सलों के लाभकारी दाम की वैधानिक गारंटी के लिए भी था, जिस पर अब भी कुछ फ़ैसला नहीं हुआ है। अब हम संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से घोषणा के प्रभावी होने तक इंतज़ार करेंगे। इन कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया भी वही है, जो कानून बनाने की है। संसद को विधेयक पास करना होगा।

राजनीतिक निहितार्थ

राहुल गांधी, शरद पवार, संजय राउत, अखिलेश यादव, चरणजीत सिंह चन्नी से लेकर जयंत चौधरी तक सबने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। वे इस बात को रेखांकित जरूर करेंगे कि भारतीय जनता पार्टी हार रही है और इसीलिए उसने कानून वापस लेने का फैसला किया है। उन्होंने इसे किसानों की जीत और सरकार की हार भी बताया है। सच यह है कि उनके हाथ से भी एक महत्वपूर्ण मसला निकल गया है, आंदोलन जारी रहना उनके हित में था। बहरहाल बीजेपी के कार्यकर्ताओं के सिर पर से एक बोझ उतर गया है।

तीनों कानून 17 सितंबर 2020 को संसद से पास हुए थे। उसके पहले अध्यादेश लाए गए थे। इससे लगता था कि सरकार जल्दबाजी में इन्हें लागू करना चाहती है। इसके बाद से लगातार किसान संगठनों की तरफ से विरोध कर इन कानूनों को वापस लेने की मांग की जा रही थी। किसान संगठनों का तर्क है कि इनके जरिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को खत्म कर देगी और उन्हें उद्योगपतियों के रहमोकरम पर छोड़ देगी। सरकार का तर्क था कि इन कानूनों के जरिए कृषि क्षेत्र में नए निवेश के अवसर पैदा होंगे और किसानों की आमदनी बढ़ेगी।

Saturday, November 20, 2021

कोरोना की दवाओं की ईज़ाद से बँधी एक और उम्मीद


अमेरिका की दो दवा कंपनियों ने एकसाथ कोरोना की दवाइयों की ईज़ाद का ऐलान करके कोविड-19 संक्रमण का सामना कर रही दुनिया को राहत दी है। ये दवाएं महंगी हैं, पर दुनिया को इनसे उम्मीद बँधी है। दोनों दवाएं गोलियों की शक्ल में हैं। इनमें से एक को ब्रिटेन की मेडिसंस एंड हैल्थकेयर प्रोडक्ट्स रेगुलेटरी एजेंसी (एमएचआरए) ने स्वीकृति दे दी है। दोनों को ही अमेरिकी फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) की मंज़ूरी भी मिलने की संभावना है। दावा किया गया है कि दोनों दवाएं वायरस को शरीर के भीतर बढ़ने से रोकती और उसके असर को खत्म करती हैं।

हालांकि इसके पहले भी कोविड-19 की दवाओं को तैयार किए जाने का दावा किया गया है, पर यह पहली बार है कि किसी सरकारी संस्थान ने दवा को मंजूरी दी है। इन दवाओं की प्रभावोत्पादकता पक्के तौर स्थापित हुई, तो कोविड-19 के विरुद्ध वैश्विक प्रयासों को यकीनन बड़ी सफलता मिलेगी। वैक्सीन के साथ-साथ अब ये दवाएं भी हमारे पास हैं।

गेम चेंजर

ब्रिटिश वायरोलॉजिस्ट स्टीफन ग्रिफिन का कहना है कि इन दवाओं की सफलता से सार्स-कोव2 के संक्रमण के घातक परिणामों को रोकने में काफी मदद मिलेगी। बीबीसी के अनुसार ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री साजिद जावेद ने इसे 'गेमचेंजर' बताया है। उन्होंने कहा, 'आज का दिन हमारे देश के लिए ऐतिहासिक है, क्योंकि ऐसे एंटी वायरल को मंजूरी देने वाला यूके विश्व का पहला देश बना गया है, जिसे घर पर लिया जा सकता है।'

अभी तक कोरोना का सबसे बेहतर इलाज सिंथेटिक-एंटीबॉडीज़ या मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल के रूप में उपलब्ध था, जिसे इंजेक्शन के सहारे दिया जाता था। अब जो दवाएं सामने आई हैं, उन्हें गोलियों के रूप में लिया जा सकता है। दावा यह भी किया गया है कि इनके साइड इफेक्ट भी नहीं हैं। दवा कंपनी मर्क ने बताया है कि उसकी दवाई मोलनुपिराविर को ब्रिटिश औषधि नियामक की स्वीकृति मिल गई है और अब अमेरिकी एफडीए से स्वीकृति देने का अनुरोध किया गया है। यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी भी कुछ औषधियों को स्वीकृति देने पर विचार कर रही है।

जोखिम कम हुआ

मर्क की घोषणा के अगले ही दिन फायज़र ने भी अपनी दवा पैक्सलोविड की सफलता की घोषणा की। दोनों ही एंटी-वायरल दवाएं हैं, जो वायरस की शरीर के भीतर वृद्धि को रोकने की क्षमता रखती हैं। दोनों कंपनियों का दावा है कि इनके सेवन से संक्रमित व्यक्ति को अस्पताल में भरती करने की जरूरत बहुत कम रह जाएगी। दवा को ब्रिटिश-स्वीकृति मिलने के पहले ही मर्क और अमेरिकी सरकार के बीच मोलनुपिराविर के 17 लाख कोर्सों की सप्लाई का सौदा हो चुका है। कोर्स यानी पाँच दिन की पूरी दवाई।

फायज़र ने बताया कि पैक्सलोविड ब्रांड नाम की इस गोली को मरीज को दिन में दो बार देना होता है। शर्त है कि उसे एफडीए की स्वीकृति मिल जाए। कंपनी का कहना है कि साल के अंत तक हम दवाई के एक करोड़ कोर्स तैयार कर लेंगे और 2022 में हमारा लक्ष्य दो करोड़ कोर्स तैयार करने का है। मर्क ने इसे बनाने का लाइसेंस कुछ दूसरी कंपनियों को भी दिया है।

भारत में भी इसका ट्रायल चल रहा है और संभव है कि किसी कंपनी को इसके उत्पादन का लाइसेंस मिले। गेट्स फाउंडेशन के ग्लोबल हैल्थ कार्यक्रम के अध्यक्ष ट्रेवर मंडेल ने कहा है कि अपेक्षाकृत कम अमीर देशों में जेनरिक दवाएं बनाने वाली कई कंपनियाँ मोलनुपिराविर की माँग का इंतजार कर रही हैं, इसलिए फाउंडेशन ने 12 करोड़ डॉलर इस मद में रख दिए हैं, ताकि उत्पादन-व्यवस्था के लिए उनकी मदद की जा सके।  

आंतरिक सुरक्षा और अदृश्य ‘बाहरी-हाथ’

भारत जैसे महादेश की एकता और अखंडता को बनाए रखना आसान काम नहीं है। खतरों की बात जब होती है, तब उसे भौगोलिक-सीमाओं तक महदूद मान लिया जाता है। आंतरिक-सुरक्षा के सामने खड़ा खतरा दिखाई नहीं पड़ता। दिखाई भी पड़ता है, तो उसके पीछे के बाहरी-हाथ को हम देख नहीं पाते हैं। फिफ्थ-कॉलम (घर के भीतर बैठा दुश्मन) तो अदृश्य होता ही है। आर्थिक-सामरिक हितों के समांतर आंतरिक-सुरक्षा की चुनौतियाँ बढ़ रही हैं, जो कम से कम तीन भौगोलिक-क्षेत्रों में दिखाई पड़ रही हैं। कश्मीर में लंबे अरसे से चल रहा हिंसक-प्रतिरोध और उन्हीं ताकतों से प्रेरित पंजाब में अलगाववाद, जिसे फिर से जगाने की कोशिश हो रही है। पूर्वोत्तर की हिंसा, जो काफी हद तक कमजोर हो चुकी थी, उसे भी भड़काने की कोशिशें हुई हैं। और मध्य भारत के लाल गलियारे की माओवादी हिंसा। तीनों हमारे सामने हैं, पर तीनों को जोड़ने वाले सूत्र अदृश्य हैं, दिखाई नहीं पड़ते।

चीन-पाक धुरी

हाल में भारत के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने अफगानिस्तान को लेकर जब मध्य एशिया और पड़ोस के देशों का सम्मेलन बुलाया, तब पाकिस्तान ने उसके बहिष्कार की घोषणा की और चीन ने बहाना बनाकर कन्नी काटी। पाकिस्तान ने बैठक का न केवल विरोध किया, बल्कि अफगानिस्तान में शांति-स्थापना को लेकर भारत पर कई प्रकार के आरोप लगाए। चीन ने बैठक से अनुपस्थित होकर पाकिस्तानी-रणनीति का समर्थन किया। दोनों की जुगलबंदी शक्ल ले रही है।

जम्मू-कश्मीर में कुछ महीनों से एक के बाद एक हिंसक घटनाएं हो रही हैं। निशाने पर हैं, प्रवासी कामगार, कश्मीरी पंडित-सिख और सरकार के वफादार मुसलमान। पुंछ में करीब एक महीने से घुसपैठियों के खिलाफ सेना का अभियान जारी है। पाकिस्तान की ओर से बड़े स्तर पर घुसपैठ हुई है। राजौरी में भी घुसपैठ हुई है। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों में असामान्य बदलाव है।

लगता है कि चीन-पाकिस्तान साझेदारी में भारत को अर्दब में लेने के लिए कोई नया खेल शुरू हुआ है। पूर्वी लद्दाख में जारी गतिरोध को सुलझाने के लिए चीन के साथ 13वें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही। इधर चीन की संसद ने गत 23 अक्तूबर को अपनी ज़मीनी सीमा की पहरेदारी को लेकर एक कानून को पास किया है, जिसके तहत सीमावर्ती नागरिकों को कुछ अधिकार और दायित्व सौंपे गए हैं। खासतौर से तिब्बत की सीमा से लगे भारत, भूटान और नेपाल के गाँवों के नागरिकों को पहली रक्षा-पंक्ति के रूप में काम करने की जिम्मेदारी गई है।

चीनी हरकतें

इस कानून के ठीक पहले चीन ने भूटान के साथ एक समझौता किया है। उसका निहितार्थ स्पष्ट नहीं है, पर लगता है कि वह भूटान को फुसलाने की कोशिश कर रहा है। भारत की सीमा पर चीन ने हाल में अपनी सैन्य-क्षमता को बढ़ाया है, नए हवाई अड्डे तैयार किए हैं। भूटान की सीमा पर एक नया गाँव ही बसा दिया है। उधर अमेरिकी रक्षा विभाग ने चीन के सैन्य आधुनिकीकरण पर एक बड़ी रिपोर्ट में कहा है कि भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अपने दावों पर जोर डालने के लिए चीन लगातार रंग बदलने वाली हरकतें कर रहा है।

गत 13 नवंबर को मणिपुर में भारत-म्यांमार सीमा पर चुराचंदपुर जिले में हुए आतंकवादी हमले में 46 असम राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल विप्लव त्रिपाठी, उनकी पत्नी और बेटे और चार सैनिकों की हत्या के बाद हमारी निगाहें पूर्वोत्तर की आतंकवादी गतिविधियों की ओर घूमी हैं। मणिपुर में 2015 के बाद यह पहला बड़ा हमला है। उग्रवादी संगठन रिवॉल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ) ने एक प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया है कि कॉन्वॉय पर हमला हमारी सशस्त्र शाखा पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) और एमएनपीएफ ने किया है। यह पीएलए चीनी-समर्थन पर फली-फूली है।

Friday, November 19, 2021

सिविल सोसायटी ‘दुश्मन’ नहीं , अलबत्ता उसकी आड़ में दुश्मनी संभव है


राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप में इस शनिवार को प्रकाशित होने वाला एक आलेख जब मैंने लिखा था, उसके पहले 12 नवंबर को हैदराबाद में सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में भारतीय पुलिस सेवा के प्रोबेशनरी अधिकारियों' के दीक्षा समारोह में नागरिक समाज को युद्ध का नया मोर्चा' कहा था। अपने आलेख में मैंने उनके बयान का जिक्र नहीं किया, पर इस बात की ओर इशारा किया था कि आंतरिक-सुरक्षा की अनेक चुनौतियों में यह बात भी शामिल है कि बाहरी ताकतें हमारी लोकतांत्रिक-व्यवस्था और उसमें उपलब्ध आजादी का फायदा उठा सकती हैं।

कौन है दुश्मन?

सिविल सोसायटी वस्तुतः देश का समझदार मध्यवर्ग है। उसके ऊपर देश की लोकतांत्रिक-व्यवस्था और जनता के हितों की रक्षा का भार भी है। राज्य के जन-विरोधी कार्यों का विरोध करना भी उसकी जिम्मेदारी है, पर मामला यहीं तक सीमित नहीं है। मैंने अजित डोभाल के बयान पर ध्यान भी नहीं दिया था, क्योंकि जो बात उन्होंने कही है, वह बात आज दुनिया के अनेक रक्षा-विशेषज्ञ कह रहे हैं। पर इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अरुणा रॉय के एक लेख ने मेरा ध्यान खींचा। इसमें उन्होंने लिखा है कि सिविल सोसायटी दुश्मन नहीं है।

उनके अलावा वायर के प्रमुख सिद्धार्थ वरदराजन ने अपनी वैबसाइट में लिखा है कि बीते सप्ताह नरेंद्र मोदी सरकार के दो ज़िम्मेदार अधिकारियों-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत-ने व्यापक राष्ट्रहित के नाम पर क़ानून के शासन के उल्लंघन को जायज़ ठहराने के लिए नए सिद्धांतों को गढ़ने की कोशिश की है। जनरल रावत ने 13 नवंबर को टाइम्स नाउ के समिट में कहा कि कश्मीर में जनता कह रही है कि हम आतंकवादियों को लिंच करेंगे। यह एक सकारात्मक संकेत है। 

संवैधानिकता

वरदराजन के अनुसार पुलिस पर जिन कानूनों को लागू करवाने का दायित्व है, उनमें से ज्यादातर औपनिवेशिक काल के हैं, जो किसी लोकतांत्रिक बहस की उपज नहीं थे। मिसाल के लिए, राजद्रोह के कानून को ही ले सकते हैं। दूसरी बात, कानून निर्माताओं द्वारा पारित कई कानून खराब तरीके से या अस्पष्ट तरीके से लिखे गए होते हैं और उन पर काफी अपर्याप्त बहस हुई होती है और उनके दुरुपयोग का दरवाजा खुला रहता है। तीसरी बात, सारे कानून और कार्यपालिका के सभी फैसले न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं। दूसरे शब्दों में, कानून का अच्छा होना उसकी संवैधानिकता पर निर्भर करता है और इसका फैसला कोर्ट करता है और न कि वे जो मतदान पेटियों के द्वारा निर्वाचित होते हैं।

पुलिस-स्टेट का चार्टर

सवाल है कि वरदराजन कानूनों की संवैधानिकता या उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं या उन्हें बनाने वाली राजनीति पर। उनके अनुसार सिविल सोसाइटी के आलोचकों को परोक्ष चेतावनी के साथ-साथ डोभाल ने लोकतंत्र की जो परिभाषा दी है, वह एक पुलिस वाले द्वारा एक पुलिस राज्य के चार्टर के अलावा और कुछ नहीं है। इसके तहत चुने हुए प्रतिनिधियों-यानी सरकार-की इच्छा को चुनौती देने वालों को ‘युद्ध के चौथे मोर्चे’ पर आंतरिक शत्रु के तौर पर देखा जाना है। डोभाल और रावत, दोनों ने दरअसल सिर्फ पिछले महीने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रखे गए पक्ष को दोहराने का काम किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘कुछ लोग कुछ घटनाओं में मानवाधिकार के उल्लंघन को देखते हैं, लेकिन कुछ में नहीं।

Wednesday, November 17, 2021

असली भारत का सम्मान


सोमवार 8 और मंगलवार 9 नवंबर को राष्ट्रपति भवन में हुए पद्म पुरस्कार वितरण समारोह में इसबार कुछ ऐसी हस्तियाँ थीं, जिन्हें देखकर हर्ष और विस्मय दोनों होते हैं। इनमें एक थे इसमें एक थे कर्नाटक से आए हरेकला हजब्बा। साधारण कपड़े पहने हजब्बा पद्मश्री पुरस्कार लेने नंगे पाँव आए थे। जब उन्हें सम्मान-पत्र दिया गया, तब पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। वे सड़क के किनारे संतरे बेचते थे। जिस गांव में पैदा हुए वहां स्कूल नहीं था, इसलिए पढ़ नहीं पाए। उन्होंने ठान लिया कि अब इस वजह से गांव का कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। संतरा बेचकर पाई-पाई जुटाए पैसों से उन्होंने गांव में स्कूल खोला, जो आज 'हजब्बा आवारा शैल' यानी हजब्बा का स्कूल के नाम से जाना जाता है।

इसी समारोह में कर्नाटक की 72 वर्षीय आदिवासी महिला तुलसी गौडा पद्मश्री पुरस्कार लेने नंगे पाँव आई थीं। तुलसी गौडा पिछले छह दशक से पर्यावरण-संरक्षण का अलख जगा रही हैं। कर्नाटक के एक गरीब आदिवासी परिवार में जन्मीं तुलसी कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन उन्हें जंगल के वाले पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों के बारे में इतनी जानकारी है कि उन्हें 'एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट' कहा जाता है। हलक्की जनजाति से ताल्लुक रखने वाली तुलसी गौडा ने 12 साल की उम्र से अबतक कितने पेड़ लगाए गिनकर वे बता नहीं सकतीं। अंदाज़ा लगाती हैं शायद चालीस हजार, पर असली संख्या शायद एक लाख से भी ऊपर है। उनके सम्मान में हॉल में उपस्थित प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से लेकर तमाम उपस्थित अतिथि हाथ जोड़े खड़े थे।

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले की आदिवासी महिला राहीबाई सोमा पोपेरे भी पद्मश्री ग्रहण करने आईं। उन्हें 'सीड मदर' के नाम से जाना जाता है। 57 साल की पोपेरे स्वयं सहायता समूहों के जरिए 50 एकड़ जमीन पर 17 से ज्यादा देसी फसलों की खेती करती हैं। दो दशक पहले उन्होंने बीजों को इकट्ठा करना शुरू किया। आज वे सैकड़ों किसानों को जोड़कर वैज्ञानिक तकनीकों के जरिए जैविक खेती करती हैं।

सम्मानित होने वालों में अयोध्या से आए मोहम्मद शरीफ भी थे, जो अपने ढंग से समाज सेवा में लगे हैं। हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके समाजसेवी मोहम्मद शरीफ को निस्वार्थ सेवा के लिए राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। बताया जाता है कि पिछले 25 वर्षों में 25,000 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। 30 वर्ष पूर्व उनके एक जवान बेटे की कहीं सड़क दुर्घटना से मौत हो गई थी। घरवालों को इस बात की जानकारी भी नहीं हो पाई और पुलिस ने लावारिस मानकर अंतिम संस्कार कर दिया। उसके बाद से मोहम्मद शरीफ ने निश्चय किया कि लावारिसों का वारिस मैं बनूँगा। आर्थिक तंगी के बावजूद वे इस जिम्मेदारी को निभाते रहे हैं।

अभिजात्य से हटकर

पुरस्कारों और सम्मानों की बात जब होती है, तब सम्मानित लोगों की जो छवि हमारे मन में बनी है, उससे कुछ अलग किस्म के लोगों का सम्मान देखकर मन प्रफुल्लित होता है। यह असली भारत का सम्मान है, साथ ही बदलते भारत की तस्वीर। यह उन लोगों का सम्मान है, जो अपनी धुन और लगन से काम करते चले आ रहे हैं। ये हैं इस देश के वास्तविक नायक। आम धारणा रही है कि पद्म पुरस्कार ज्यादातर उन्हीं को मिलते हैं जिनकी सत्ता के गलियारों तक पहुंच हो। पर भारत सरकार के इस नए चलन से धारणा बदलेगी। देश के वास्तविक नायकों को खोजना और उन्हें सम्मानित करना बड़ी बात है। अभिजात्यवाद से हटकर उन ज़मीनी लोगों को खोजना जो इस देश के वास्तविक रत्न हैं। ऐसे रत्नों की कमी नहीं है। उन्हें खोजने की जरूरत भर है।

Sunday, November 14, 2021

कांग्रेस पर भारी पड़ेगी ‘हिंदू-विरोधी’ छवि


कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद सुलझे हुए और समझदार नेता माने जाते हैं
, पर उन्होंने अपनी नई किताब में हिंदुत्व की तुलना इस्लामी आतंकी संगठनों बोको हरम और इस्लामिक स्टेट से करके सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की आग में घी डालने का काम किया है। इस बहस में कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक रूप से नुकसान पहुँचेगा। इस किस्म की बातों से रही-सही कसर पूरी हो जाएगी। पार्टी की हिंदू-विरोधी छवि को ऐसे विचारों से मजबूती मिलती है। बोको हरम और तालिबान की तुलना बीजेपी से करके आप कुछ हासिल नहीं करेंगे, बल्कि अपने बचे-खुचे आधार को खो देंगे। ऐसी बातों को चुनौती दी जानी चाहिए, खासतौर से उन लोगों की ओर से, जो खुद को धार्मिक कट्टरपंथी नहीं मानते हैं।  

केवल हिंदू-कट्टरता

सलमान खुर्शीद को राहुल गांधी का समर्थन मिला है। दोनों राजनीतिक-हिंदुत्व को सनातन-हिंदू धर्म से अलग साबित करना चाहते हैं। व्यावहारिक सच यह है कि सामान्य व्यक्ति को दोनों का अंतर समझ में नहीं आता है। जब आप हिंदुत्व का नाम लेते हैं, तब केवल नाम ही नहीं लेते, बल्कि सनातन-धर्म से जुड़े तमाम प्रतीकों, रूपकों, परंपराओं, विचारों, प्रथाओं का एकमुश्त मजाक उड़ाते हैं। वामपंथी इतिहास लेखकों ने इसकी आधार भूमि तैयार की, जिन्हें पचास के दशक के बाद कांग्रेसी-व्यवस्था में राज्याश्रय मिला था। एक समय तक कट्टरपंथ के नाम पर हर प्रकार की धार्मिक कट्टरताओं का विरोध होता था, पर अब धार्मिक कट्टरता का अर्थ केवल हिंदू-कट्टरता रह गया है। इससे पैदा हुए ध्रुवीकरण का राजनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला है।

कांग्रेसी-अंतर्विरोध

स्वतंत्रता के पहले देश में कांग्रेस की छवि हिंदू और मुस्लिम लीग की मुस्लिम पार्टी के रूप में थी। स्वतंत्रता के बाद पार्टी के अंतर्विरोध उभरे। सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू के मतभेद जगजाहिर हैं। पुरुषोत्तम दास टंडन और नेहरू के विवाद को फिर से पढ़ने की जरूरत है। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस की ही उस धारा को अपने साथ लिया है, जो हिंदू-भावनाओं को अपने साथ लेकर चलना चाहती थी। इस वैचारिक टकराव को मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण, शाहबानो और अयोध्या प्रकरणों से हवा मिली। ऐसे सवालों की गंभीरता पर 1947 से पहले विचार किया जाना चाहिए था, जिससे न केवल बचने की कोशिश की गई, बल्कि भारतीय इतिहास-लेखन को सायास बड़ा मोड़ दिया गया।

Wednesday, November 10, 2021

अफगानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान की समांतर बैठकों का औचित्य

 

अफगानिस्तान पर दिल्ली में बैठक

अफगानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान में दो अलग-अलग बैठकें हो रही हैं। एक बैठक आज 10 नवंबर को भारत में और दूसरी कल पाकिस्तान में। इन बैठकों से भारत और पाकिस्तान के दो नजरियों की पुष्टि हो रही है, साथ ही यह बात भी स्पष्ट हो रही है कि अफगानिस्तान की समस्या के हल के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों से बात करनी होगी। पाकिस्तान को महत्व इसलिए मिला है, क्योंकि तालिबान के साथ उसके रिश्तों को अब दुनिया जान चुकी है। भारत की जरूरत इसलिए है, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान की विकास-योजनाओं में भारत की भूमिका है। इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान के काफी गैर-पश्तून कबीले भारत के करीब हैं।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने दिल्ली में क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद नाम से जो बैठक बुलाई है, उसमें रूस, ईरान और मध्य एशिया के पाँच देशों, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और किर्गिस्तान के सुरक्षा सलाहकार या मुख्य सुरक्षा अधिकारी भाग ले रहे हैं। एक दिन की इस बैठक में एक संयुक्त घोषणापत्र भी जारी हुआ है, जिसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं। एक, अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में नहीं होना चाहिए और दूसरे, वहाँ सभी समुदायों के मेल से समावेशी सरकार का गठन होना चाहिए।

भारत में हुई इस बैठक का फॉर्मेट सितंबर 2018 और दिसंबर 2019 में ईरान में हुई बैठकों में तय हुआ था। इसका उद्देश्य तालिबान के बारे में एक सामान्य राय बनाना है। हालांकि इन देशों ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, पर इन्होंने तालिबान से संपर्क बनाकर रखा है। हालांकि भारत अशरफ गनी की चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करने के तरीकों से असहमत है, फिर भी वह तालिबान के साथ संपर्क बनाए रखना चाहता है। इस बैठक का एक उद्देश्य यह भी है कि भारत यह बताना चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में हालात को सुधारने के काम में भारत को भी साथ में रखना पड़ेगा।

Sunday, November 7, 2021

खतरा! नशे की संस्कृति का


आर्यन खान के मामले की जाँच एनसीबी के अधिकारी समीर वानखेड़े के हाथ से लेकर एक दूसरी टीम को देने का फैसला करने से और कुछ हो या नहीं हो, इसके राजनीतिकरण की शिद्दत कुछ कम होगी। खबर है कि नवाब मलिक के दामाद समीर खान के केस से भी समीर वानखेड़े को हटा दिया गया है। दिल्ली की टीम अब आर्यन खान केस, समीर खान केस, अरमान कोहली केस, इकबाल कासकर केस, कश्मीर ड्रग केस और एक अन्य केस की जांच करेगी।

ऐसा क्यों किया गया है, यह स्पष्ट नहीं है, पर जिस तरह से देश का सारा ध्यान समीर वानखेड़े पर केंद्रित हो गया था, उससे हटने की जरूरत थी। नशे के बढ़ते कारोबार और नौजवानों के बीच फैलती नशा-संस्कृति पर ध्यान देने के लिए यह जरूरी है। हो सकता है कि यह मामला भी अंततः एनआईए को सौंपा जाए, क्योंकि कुछ समय पहले गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर पकड़ी गई तीन हजार किलोग्राम हेरोइन का मामला एनआईए को सौंपा गया है।

राजनीतिक रंग

सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद मीडिया में वह मामला आत्महत्या या कुछ और जैसे सवालों में उलझा रहा, पर खतरनाक तरीके से बढ़ती नशाखोरी की ओर हमारा ध्यान नहीं गया। कुछ समय पहले उड़ता पंजाबने इस तरफ ध्यान खींचा, पर हम उसे जल्द भूल गए। इस समय भी हमारा ज्यादातर ध्यान इसलिए है, क्योंकि इसके साथ बॉलीवुड के सितारों का नाम जुड़ा है। पर मामले को राजनीतिक रंग देने से इसकी दिशा बदल गई है।

गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर पकड़ी गई 21 हजार करोड़ रुपये की तीन हजार किलोग्राम 'हेरोइन' के मामले को भी हम उस गहराई के साथ देखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, जिसकी जरूरत है। उसमें भी राजनीतिक-रंग ज्यादा है, आपराधिक विवेचन कम। बहरहाल शुरुआती जांच में कुछ गिरफ्तारियों के बाद उस मामले की जाँच एनआईए को सौंप दी गई है।  सवाल है कि क्या इन सब घटनाओं की तह पर पहुँचने में कामयाबी मिलेगी? कौन लोग हैं, जो इस कारोबार को चला रहे हैं? 21 हजार करोड़ रुपये की इतनी बड़ी मात्रा में हेरोइन मँगाने वाला कौन है?

सवाल ही सवाल

इस कारोबार के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन हैं। क्या हम उन्हें पकड़ पाएंगे? नशाखोरी और आतंकवाद के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्कों की कोई साठगाँठ तो नहीं? हेरोइन की इतनी बड़ी खेप में अफ़ग़ानिस्तान का कनेक्शन क्या है? नशाखोरी से लड़ने वाली हमारी व्यवस्था क्या पर्याप्त कुशल है? या वह वसूली करके अपनी जेब भर रही है? फिल्मी सितारों के यहां छापे मारकर सुर्खियां बटोरने वाली 'एनसीबी' के पास 18 महीने से स्थायी डीजी नहीं है, क्यों नहीं है? क्या अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है? क्या हमारे कानून अपर्याप्त हैं?

इस मामले को कम से कम तीन अलग-अलग शीर्षकों में देखा जाना चाहिए। नशे क वैश्विक नेटवर्क, उसके साथ भारतीय नेटवर्कों का सम्पर्क और भारतीय कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की अकुशलता। इन सबसे अलग एक चौथे विषय पर भी विचार करना होगा। हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था में ऐसी क्या खराबी है, जो युवा वर्ग में नशे की पलायनवादी प्रवृत्ति जन्म ले रही है।  

Wednesday, November 3, 2021

अमरिंदर ने कांग्रेस छोड़ी और पंजाब लोक कांग्रेस नाम से नई पार्टी बनाई


पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अंततः औपचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया है। मंगलवार को उन्होंने औपचारिक तौर पर कांग्रेस को छोड़ने और नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस को बनाने की घोषणा की। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजे 7 पन्नों के इस्तीफे में उन्होंने अपने पूरे सियासी सफर का जिक्र किया है। अमरिंदर ने कांग्रेस हाईकमान के साथ नवजोत सिद्धू पर भी सवाल खड़े किए। दूसरी तरफ नवजोत सिंह सिद्धू और नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच तनातनी बढ़ती जा रही है।

अमरिंदर ने 18 सितंबर को पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ने की घोषणा कर दी थी। मंगलवार को उन्होंने अपनी नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस की घोषणा कर दी। अमरिंदर पहले ही राज्य की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं। इसके लिए पहले किसान आंदोलन का हल निकलवाएंगे, फिर भाजपा और अकाली दल के बागी नेताओं से गठजोड़ करेंगे। खबर है कि कांग्रेस ने कैप्टन को मनाने की कोशिश की थी, लेकिन वे नहीं माने।

अमरिंदर ने नवजोत सिद्धू को पंजाब कांग्रेस प्रधान बनाने पर भी बड़े सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मेरे और पंजाब के सभी सांसदों के विरोध के बावजूद सिद्धू को जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने सिद्धू को पाक-परस्त करार देते हुए कहा कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान के आर्मी चीफ और प्रधानमंत्री इमरान खान को गले लगाया। यह दोनों ही भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं।

चन्नी-सिद्धू के बीच ठनी

पंजाब में नवजोत सिंह की नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी से फिर ठन गई है। पंजाब सरकार पर सिद्धू के हमले जारी हैं। हाल में सिद्धू की आलोचना के कारण राज्य के एडवोकेट जनरल एपीएस देओल ने इस्तीफा दे दिया था, जिसे मुख्यमंत्री ने नामंजूर कर दिया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा है कि नवजोत सिद्धू ने जिस तरह से अपनी ही पार्टी की सरकार पर फिर से हमला बोला है उसी के जवाब में मुख्यमंत्री ने यह क़दम उठाया है।

महामारी ने वैश्विक-अर्थशास्त्र को दी ‘तीसरी लहर’


महामारी ने हमें क्या दिया? सोशल डिस्टेंसिंग, लॉक डाउन, क्वारंटाइन, सैनिटाइज़ेशन, वैक्सीनेशन वगैरह-वगैरह। इसके अलावा वर्क फ्रॉम होम, संयुक्त राष्ट्र से लेकर क्वॉड तक की वर्चुअल बैठकें, यार-दोस्तों और परिवारों की ज़ूम मुलाकातें, ऑनलाइन स्कूल, ऑनलाइन पेमेंट, ऑनलाइन फूड, मनोरंजन के ओटीटी प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स वगैरह-वगैरह। पिछले एक-डेढ़ साल में दुनिया की कार्य-संस्कृति में ज़मीन-आसमान का फर्क आ गया है।

जिन्दगी में एक महत्वपूर्ण ट्विस्ट और अर्थशास्त्र जैसे संजीदा विषय में रोचक मोड़ आया है, जिसकी तरफ जिन्दगी में एक महत्वपूर्ण ट्विस्ट और अर्थशास्त्र जैसे संजीदा विषय में रोचक मोड़ आया है, जिसकी तरफ साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट के 23 अक्तूबर के अंक ने ध्यान खींचा है। पत्रिका ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में कहा है कि इस महामारी के दौरान मैक्रो-इकोनॉमिक्स जैसे भारी-भरकम विषय की जगह एक नए रियल टाइम अर्थशास्त्र ने ले ली है। इसे उसने अर्थशास्त्र की तीसरी लहर बताया है। यह डेटा-क्रांति इंटरनेट के आगमन के साथ ही हो गई थी, पर महामारी ने डेटा के नए स्रोतों और तुरंता विश्लेषण के दरवाजे खोल दिए हैं, जिसके परिणाम आने लगे हैं और अब आएंगे।

तुरंता-विश्लेषण

पत्रिका ने लिखा है कि क्या किसी को समझ में आ रहा है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में क्या हो रहा है?

महामारी ने तमाम पर्यवेक्षकों को हैरत में डाल दिया है। शायद ही किसी को उम्मीद थी कि तेल की कीमतें 80 डॉलर पार करेंगी, अमेरिका और चीन के बंदरगाहों में खाली कंटेनर पोतों की कतारें लगी होंगी। पिछले साल जब कोविड-19 अपने पंखा फैला रहा था, अर्थशास्त्रियों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि साल के अंत तक बेरोजगारी कितनी जबर्दस्त होगी। आज कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और किसी को पता नहीं है कि मुद्रास्फीति कहाँ पहुँचेगी। परम्परागत-अर्थशास्त्री अपने पत्रे खोले बैठे हैं और समझ नहीं पा रहे हैं कि कौन सी नीतियाँ रोजगार बढ़ाएंगी।

दूसरी तरफ अर्थशास्त्र में रियल टाइम रिवॉल्यूशन है। एमेज़ॉन से लेकर नेटफ्लिक्स जैसी बड़ी कम्पनियाँ रियल टाइम डेटा की मदद से फौरन पता कर ले रही हैं कि ग्रोसरी-डिलीवरी की हालत क्या है और कितनी बड़ी संख्या में लोग दक्षिण कोरिया के ड्रामा स्क्विड गेम को देख रहे हैं। महामारी की देन है कि देशों की सरकारें और उनके केंद्रीय बैंक रेस्तराँ-बुकिंग और कार्ड-पेमेंट से अर्थव्यवस्था की गति का अनुमान लगा रहे हैं।

गूगल कम्युनिटी मोबिलिटी रिपोर्ट से पता लग जाता है कि लोग अपने घरों से कितना बाहर निकल रहे हैं। यह व्यवस्था कोविड-19 की देन है। यह सब आपके मोबाइल फोन की मदद से हो रहा है। वैसे ही जैसे आपको गूगल मैप से पता लग जाता है कि राजमार्ग पर कितना ट्रैफिक है। गूगल ने कैमरे नहीं लगा रखे हैं, बल्कि आपके मोबाइल फोनों के जीपीएस से तुरंत पता लग जाता है कि ट्रैफिक की स्थिति क्या है।

Tuesday, November 2, 2021

2070 होगा भारत का नेट-ज़ीरो लक्ष्य


अंततः भारत ने नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लिए अपनी समय-सीमा दुनिया को बता दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 26वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (कॉप 26) में कहा कि हम 2070 तक नेट-ज़ीरो के लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। इसके अलावा भारत, 2030 तक ऊर्जा की अपनी 50 प्रतिशत जरूरत अक्षय ऊर्जा से पूरी करेगा।

मोदी की इस घोषणा से बहुत से विशेषज्ञों को हैरत हुई है, क्योंकि अभी तक भारत कहता रहा है कि नेट-ज़ीरो लक्ष्य इस समस्या का समाधान नहीं है और भारत इस मामले में किसी के दबाव में नहीं आएगा। हालांकि यह लक्ष्य अमीर देशों द्वारा घोषित लक्ष्य से पीछे है, पर दुनिया के उन विशेषज्ञों के अनुमान के करीब है, जो भारत के संदर्भ में इसे व्यावहारिक मानते हैं। हाल में भारत के एक थिंकटैंक कौंसिल ऑन इनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्लू) ने अनुमान लगाया था कि भारत के लिए 2070 से 2080 के बीच का लक्ष्य रखना व्यावहारिक होगा। दूसरे विकसित देशों और चीन की तुलना में भी भारत अपने औद्योगिक विकास के शिखर से कई दशक दूर है। अभी यहाँ ऊर्जा का उपभोग काफी बढ़ेगा। भारत में इस समय जरूरत की 70 फीसदी ऊर्जा कोयले से उत्पन्न हो रही है।

हालांकि भारत में दुनिया की सबसे सस्ती सौर-ऊर्जा तैयार हो रही है, पर अभी इसे ग्रिड से जोड़ने की तकनीक विकसित नहीं हो पाई है। इसके अलावा भारत को हाइड्रोजन और उसके भंडारण की तकनीक विकसित करने में समय लगेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह काम 2040 तक हो पाएगा। भारत के पास इतनी पूँजी भी नहीं है कि वह तेजी से इन सब की व्यवस्था कर सके। इसीलिए भारत जो व्यावहारिक है उसे करने यानी क्लाइमेट जस्टिस की बात कर रहा है।

चार अल्पकालिक लक्ष्य

प्रधानमंत्री मोदी ने चार अल्पकालिक लक्ष्य और बताए हैं। नेट-जीरो लक्ष्य का मतलब है कि उसे तय करने वाला देश वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड या अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन उस सीमा से ज्यादा नहीं होने देगा, जिस सीमा तक इन गैसों को प्रकृति यानी वनस्पतियाँ और दुनिया भर में विकसित हो रही तकनीकें सोख लें।  

पिछले कुछ वर्षों में कुछ देशों ने अपने लक्ष्य घोषित किए हैं। अमेरिका, यूके, जापान और अन्य अमीर देशों ने इसके लिए सन 2050 को अपना लक्ष्य वर्ष घोषित किया है। दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक चीन ने 2060 का लक्ष्य रखा है। रूस और सऊदी अरब ने भी 2060 का लक्ष्य तय किया है।

पाँच अमृत तत्व

नरेंद्र मोदी के इस भाषण में जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत की प्रशासनिक-नीतियों के अलावा परंपरागत समझ भी झलकती है। उन्होंने सम्मेलन में भारत की ओर से पांच वायदे किए। उन्होंने कहा, जलवायु परिवर्तन पर इस वैश्विक मंथन के बीच, मैं भारत की ओर से, इस चुनौती से निपटने के लिए पांच अमृत तत्व रखना चाहता हूं, पंचामृत की सौगात देना चाहता हूं। पहला- भारत, 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावॉट तक पहुंचाएगा। दूसरा-हम 2030 तक अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं में से 50 फीसदी अक्षय-ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करने लगेंगे। तीसरा- अब से लेकर 2030 तक के कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में हम एक अरब टन की कमी करेंगे। चौथा- 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (इन्टेंसिटी) को 45 प्रतिशत से भी कम करेगा। और पाँचवाँ- वर्ष 2070 तक भारत, नेट-जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।

Monday, November 1, 2021

कॉप26 शुरू, भारत की दुविधा और जी-20 का कोई वायदा नहीं

 ग्लासगो में कॉप26 के उद्घाटन के अवसर पर कॉप के अध्यक्ष आलोक शर्मा से हाथ मिलाते हुए संरा महासभा के अध्यक्ष अब्दुल्ला शाहिद। सम्मेलन की कार्यकारी सचिव पैट्रीशिया ऐस्पिनोसा (बाएं से दूसरी) और सम्मेलन की निवृत्तमान अध्यक्ष चिली की पर्यावरण मंत्री कैरलीना श्मिट भी चित्र में हैं।  

रविवार
, 31 अक्टूबर, को स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में संयुक्त राष्ट्र के कांफ्रेंस ऑफ द पार्टीज़ (कॉप26) की शुरुआत हुई। 12 नवम्बर तक चलने वाले इस सम्मेलन में सभी मोर्चों पर महत्वाकांक्षा बढ़ाने और सन 2015 के पेरिस जलवायु समझौते को कारगर ढंग से लागू करने के लिए दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप देने पर चर्चा होगी। सम्मेलन में ब्रिटेन की 95 वर्षीय महारानी एलिज़ाबेथ के आगमन की संभावना थी, पर शारीरिक असमर्थता के कारण वे नहीं आ पाईं। उनके स्थान पर सोमवार को राजकुमार चार्ल्स आने वाले हैं।

सम्मेलन से ठीक पहले अनेक रिपोर्टें और अध्ययन जारी किए गए हैं, जिनके निष्कर्षों में मौजूदा जलवायु कार्रवाई को अपर्याप्त क़रार दिया गया है। इन अध्ययनों में, पेरिस जलवायु समझौते के तहत वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 1।5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य तक सीमित रखने के लिये महत्वाकांक्षी जलवायु संकल्पों की अहमियत को रेखांकित किया गया है।

कार्यकारी सचिव पैट्रीशिया ऐस्पिनोसा ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में, दुनिया एक अहम पड़ाव पर खड़ी है। उन्होंने कॉप26 में सफलता को पूर्ण रूप से सम्भव बताते हुए अपने आशावादी रुख़ की वजह बताई। उन्होंने कहा, मेरे विचार में हम जो समझ व देख रहे हैं, हम जानते हैं कि यह रूपांतरकारी बदलाव हो सकता है। यहाँ औज़ार हैं, यहाँ उपकरण हैं, यहाँ समाधान हैं। भिन्नताएँ हैं, पर यह बात भरोसा दिलाती है कि उद्देश्यों को लेकर एकता है।

‘अस्तित्व पर संकट’

यूएन महासभा के अध्यक्ष अब्दुल्ला शाहिद ने उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान कहा कि मानवता के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। हमारे पास इस संकट को हल करने के लिए क्षमता और संसाधन मौजूद हैं, पर हम पर्याप्त क़दम नहीं उठा रहे हैं। उन्होंने पुख़्ता जलवायु कार्रवाई के लिये अक्षय ऊर्जा टेक्नोलॉजी और नवाचारों को सभी देशों तक पहुँचाने के प्रयासों में तेज़ी लाने, निजी सेक्टर द्वारा नेट-शून्य उत्सर्जन संकल्पों को प्राथमिकता देने, उन्हें स्पष्ट व ज़्यादा असरदार बनाने का आग्रह किया।

Sunday, October 31, 2021

त्रिपुरा की हिंसा के राजनीतिक निहितार्थ


हाल में बांग्लादेश में मंदिरों पर हमलों के बाद देश के पूर्वोत्तर के राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा हुई है। इसमें भी सबसे ज्यादा गंभीर खबरें त्रिपुरा से आ रही हैं। राज्य सरकार का कहना है कि बाहर से आए कुछ तत्व राज्य में हिंसा भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। गत 15 अक्तूबर को बांग्लादेश में कुछ दुर्गापूजा पंडालों और मंदिरों पर हमले हुए थे। उसकी प्रतिक्रिया पूर्वोत्तर में हुई है। त्रिपुरा में भी बांग्लादेश की हिंसा के विरोध में रैलियाँ हुई हैं। अब सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों से अफवाहें फैलाई जा रही हैं।

हालांकि बांग्लादेश सरकार ने तेजी से कार्रवाई करके अपने यहाँ हिंसा को दबा दिया और इसकी साजिश रचने वालों की गिरफ्तारियाँ की हैं, पर पूर्वोत्तर भारत में इसकी प्रतिक्रिया हुई है। सत्तारूढ़ पार्टी अवामी लीग ने हिंसा के विरोध में रैलियां निकालीं। मीडिया रिपोर्टों में सामने आया है कि बांग्लादेश पुलिस ने 693 लोगों को हिरासत में लिया है। भारत में विश्व हिंदू परिषद ने इन घटनाओं को बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार बताते हुए, इसे रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र को भी चिट्ठी लिखी है। त्रिपुरा की रैली भी इसी अभियान का एक हिस्सा थी।

शेष भारत में भी इस हिंसा के राजनीतिक निहितार्थ हैं। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम पर हिंसा भड़काने के आरोप लगाए हैं। वहीं कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा है, हमारे मुसलमान भाइयों के साथ त्रिपुरा में हिंसा की जा रही है। हिंदू होने के नाम पर हिंसा और नफ़रत फैलाने वाले लोग हिंदू नहीं हैं। सरकार कब तक नहीं देखने और सुनने का नाटक करती रहेगी।

राजधानी अगरतला से अरीब 155 किलोमीटर दूर स्थित पानीसागर इलाके में विश्व हिंदू परिषद ने 26 अक्टूबर को एक रैली निकाली। रैली के दौरान कुछ मुस्लिम व्यापारियों के घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की गई और फिर उन्हें जला दिया गया। आरोप है कि एक मस्जिद में भी तोड़फोड़ की गई। स्थानीय पुलिस का कहना है कि विश्व हिंदू परिषद की रैली में करीब 3,500 कार्यकर्ता शामिल थे। हिंसा के संबंध में दो मामले दर्ज किए हैं लेकिन अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।

पत्रकार समृद्धि सकुनिया ने एक ट्वीट में बताया कि पिछले एक हफ्ते में पूरे राज्य में नफरती अपराधों के कम से कम 21 मामलों की पुष्टि हुई है। इनमें से 15 मामले अलग-अलग मस्जिदों के तोड़ फोड़ के थे। त्रिपुरा पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर झूठी खबरें, तस्वीरें और वीडियो फैला कर मामले को और भड़काने की कोशिश की जा रही है। पुलिस ने कहा है कि झूठी खबरों को फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

उत्तर त्रिपुरा ज़िले में गुरुवार 28 अक्तूबर को फिर सांप्रदायिक हिंसा की खबर है। यह हमला उस जगह से थोड़ी ही दूर पर हुआ जहां 48 घंटे पहले एक मस्जिद तोड़ दी गई थी, दुकानें जला दी गईं थीं और अल्पसंख्यकों के घरों में तोड़फोड़ की गई थी। इस हमले के लिए विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। उत्तर त्रिपुरा ज़िले के एसपी भानुपाड़ा चक्रवर्ती ने कहा कि पानीसागर इलाके में मस्जिद के जलाए जाने की ग़लत ख़बर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है।