Sunday, February 7, 2016

फिर ढलान पर उतरेगी राजनीति

संसद का पिछले साल का बजट जितना रचनात्मक था, इस बार उतना ही नकारात्मक रहने का अंदेशा है। कांग्रेस ने घोषणा कर दी है कि वह गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन के खिलाफ मामले उठाएगी। साथ ही रोहित वेमुला और अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन के मामले भी उठाए जाएंगे। दो भागों में चलने वाला यह सत्र काफी लम्बा चलेगा और इसी दौरान पाँच राज्यों के विधान सभा चुनाव भी होंगे, इसलिए अगले तीन महीने धुआँधार राजनीति का दौर चलेगा। और 13 मई को जब यह सत्र पूरा होगा तब एनडीए सरकार के पहले दो साल पूरे हो रहे होंगे।

Thursday, February 4, 2016

टेक्नोट्रॉनिक राजनीति का नया दौर

हाल में खबर थी कि ओडिशा के बालासोर (बालेश्वर) जिले में भारत ज्ञान-विज्ञान समिति के 800 कार्यकर्ता घर-घर जाकर जानकारियाँ हासिल कर रहे हैं. बीजू जनता दल के लोकसभा सदस्य रवीन्द्र कुमार जेना का यह क्षेत्र है. गाँवों में काम कर रहे कार्यकर्ता इस सूचना को एक एप की मदद से टैबलेट्स में दर्ज करते जाते हैं. जानकारियों का वर्गीकरण किया गया है. ज्यादातर सूचनाएं स्कूलों, आँगनवाड़ी केन्द्रों, स्वास्थ्य सुविधाओं, पंचायती राज संस्थाओं, सड़कों, परिवहन, विद्युतीकरण और खेती के बारे में हैं. इस डेटा का विश्लेषण एक गैर-लाभकारी संस्था कर रही है, जो सांसद को इलाके का डेवलपमेंट प्लान बनाकर देगी.

Sunday, January 31, 2016

छोटे राज्यों की बड़ी राजनीति

आम आदमी पार्टी की निगाहें पंजाब और उत्तराखंड पर हैं। अभी वह दिल्ली में सत्तारूढ़ है। यदि उसे पंजाब और उत्तराखंड में सफलता मिले तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर उभरने में बड़ी सफलता भी मिल सकती है। और वहाँ विफल रही तो आने वाले वक्त में दिल्ली से भी वह गायब हो सकती है। उसकी सफलता या विफलता के आधार दो छोटे राज्य बन सकते हैं। वाम मोर्चे की समूची राष्ट्रीय राजनीति अब केरल और त्रिपुरा जैसे दो छोटे राज्यों के सहारे है। कांग्रेस की राजनीति भी अब ज्यादातर छोटे राज्यों के भरोसे है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों का अपना महत्व है। वे लोकसभा में सीटें दिलाने का काम करते हैं, पर माहौल बनाने में छोटे राज्यों की भूमिका भी है। हाल में केरल और अरुणाचल इसीलिए महत्वपूर्ण बन गए हैं।

Tuesday, January 12, 2016

Global Innovation Index 2015

भारत में बड़ी खोज क्यों नहीं होती?

प्रयोगशाला

Image copyrightThinkstock

बीते 10 साल में भारत में दिए गए हर छह पेटेंट में से सिर्फ़ एक की खोज भारतीयों ने की थी.
इंडियास्पेंड ने अपने विश्लेषण में ये पाया कि बाकी के पांच पेटेंट देश में काम कर रही विदेशी कंपनियों को मिले, जो अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा करना चाहती थीं.
दूसरे अध्ययनों से भी पता चला है कि नई चीजों को खोजने या नई तकनीक विकसित करने मे भारत निहायत ही कमज़ोर है.
चार नोबेल पुरस्कार विजेताओं का कहना है कि ये भारत की पारंपरिक कमज़ोरी है और इसे ठीक करना बेहद ज़रूरी है.

Image copyrightReuters

इन नोबेल विजेताओं का कहना है कि भारत को मैनुफ़ैक्चरिंग का केंद्र बनाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना 'मेक इन इंडिया' से पहले यह ज़रूरी है कि कंपनियां भारत में नई चीज़ें खोजें.
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) ने साल 2015 में जो ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स जारी किया उसमें भारत 81वें स्थान पर है.

बीबीसी हिन्दी की रपट पढ़ें यहाँ
Rank Country Score Value Percentage Rank S/W
1 Switzerland 68.3 - 1
2 United Kingdom 62.4 - 0.99
3 Sweden 62.4 - 0.99
4 Netherlands 61.6 - 0.98
5 United States of America 60.1 - 0.97
6 Finland 60 - 0.96
7 Singapore 59.4 - 0.96
8 Ireland 59.1 - 0.95
9 Luxembourg 59 - 0.94
10 Denmark 57.7 - 0.94
11 Hong Kong (China) 57.2 - 0.93
12 Germany 57.1 - 0.92
13 Iceland 57 - 0.91
14 Korea, Republic of 56.3 - 0.91
15 New Zealand 55.9 - 0.9
16 Canada 55.7 - 0.89
17 Australia 55.2 - 0.89
18 Austria 54.1 - 0.88
19 Japan 54 - 0.87
20 Norway 53.8 - 0.86
21 France 53.6 - 0.86
22 Israel 53.5 - 0.85
23 Estonia 52.8 - 0.84
24 Czech Republic 51.3 - 0.84
25 Belgium 50.9 - 0.83
26 Malta 50.5 - 0.82
27 Spain 49.1 - 0.81
28 Slovenia 48.5 - 0.81
29 China 47.5 - 0.8
30 Portugal 46.6 - 0.79
31 Italy 46.4 - 0.79
32 Malaysia 46 - 0.78
33 Latvia 45.5 - 0.77
34 Cyprus 43.5 - 0.76
35 Hungary 43 - 0.76
36 Slovakia 43 - 0.75
37 Barbados 42.5 - 0.74
38 Lithuania 42.3 - 0.74
39 Bulgaria 42.2 - 0.73
40 Croatia 41.7 - 0.72
41 Montenegro 41.2 - 0.71
42 Chile 41.2 - 0.71
43 Saudi Arabia 40.7 - 0.7
44 Moldova, Republic of 40.5 - 0.69
45 Greece 40.3 - 0.69
46 Poland 40.2 - 0.68
47 United Arab Emirates 40.1 - 0.67
48 Russian Federation 39.3 - 0.66
49 Mauritius 39.2 - 0.66
50 Qatar 39 - 0.65
51 Costa Rica 38.6 - 0.64
52 Viet Nam 38.3 - 0.64
53 Belarus 38.2 - 0.63
54 Romania 38.2 - 0.62
55 Thailand 38.1 - 0.61
56 TFYR Macedonia 38 - 0.61
57 Mexico 38 - 0.6
58 Turkey 37.8 - 0.59
59 Bahrain 37.7 - 0.59
60 South Africa 37.4 - 0.58
61 Armenia 37.3 - 0.57
62 Panama 36.8 - 0.56
63 Serbia 36.5 - 0.56
64 Ukraine 36.5 - 0.55
65 Seychelles 36.4 - 0.54
66 Mongolia 36.4 - 0.54
67 Colombia 36.4 - 0.53
68 Uruguay 35.8 - 0.52
69 Oman 35 - 0.51
70 Brazil 34.9 - 0.51
71 Peru 34.9 - 0.5
72 Argentina 34.3 - 0.49
73 Georgia 33.8 - 0.49
74 Lebanon 33.8 - 0.48
75 Jordan 33.8 - 0.47
76 Tunisia 33.5 - 0.46
77 Kuwait 33.2 - 0.46
78 Morocco 33.2 - 0.45
79 Bosnia and Herzegovina 32.3 - 0.44
80 Trinidad and Tobago 32.2 - 0.44
81 India 31.7 - 0.43

Saturday, January 9, 2016

‘फ्री बेसिक्स’ संचार महा-क्रांति या कमाई का नया फंडा?


नए दौर का सूत्र है नेट-साक्षरता. आने वाले वक्त में इंटरनेट पटु होना सामान्य साक्षरता का हिस्सा होगा. जो इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाएगा वही सजग नागरिक होगा. वजह साफ है. जीवन से जुड़ा ज्यादातर कार्य-व्यवहार इंटरनेट के मार्फत होगा. इसीलिए इसका व्यावसायिक महत्व बढ़ रहा है. इंटरनेट की भावी पैठ को अभी से पढ़ते हुए नेट-प्रदाता और टेलीकॉम कंपनियां इसमें अपनी हिस्सेदारी चाहती हैं. सरकारों की भी यही कोशिश है कि नीतियाँ ऐसी हों ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को ऑनलाइन किया जा सके.
नेट के विस्तार के साथ-साथ कुछ अंतर्विरोधी बातें सामने आ रही हैं. इसके साथ दो बातें और जुड़ी हैं. एक है तकनीक और दूसरे पूँजी. इंटरनेट की सार्वजनिक जीवन में भूमिका होने के बावजूद इसका विस्तार निजी पूँजी की मदद से हो रहा है. निजी पूँजी मुनाफे के लिए काम करती है. सूचना-प्रसार केवल व्यावसायिक गतिविधि नहीं है. वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था है. जानकारी पाना या देना, कनेक्ट करना और जागृत विश्व के सम्पर्क में रहना समय की सबसे बड़ी जरूरत है.  

Thursday, January 7, 2016

मुम्बई से पठानकोट तक के सबक

पठानकोट पर हुए हमले के बाद भारत में लगभग वैसी ही नाराजगी है जैसी 26 नवम्बर 2008 के बाद पैदा हुई थी. बाद में खबरें मिलीं कि तब भारत सरकार ने लश्करे तैयबा के मुख्यालय मुरीद्के पर हमले की योजना बनाई थी. तब दोनों देशों के बीच किसी प्रकार सहमति बनी कि पाकिस्तान हमलावरों की खोज और उन्हें सज़ा देने के काम में सहयोग करेगा. इसमें अमेरिका की भूमिका भी थी. इस बार भी खबर है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने मंगलवार को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया और एयरफोर्स बेस पर हुए हमले की जांच में हर संभव मदद का आश्वासन दिया. उसके पहले पाकिस्तान सरकार ने औपचारिक रूप से इस हमले की भर्त्सना भी की. बहरहाल टेलीफोन पर दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बातचीत में नरेंद्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि हमले के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए. इससे पहले पाकिस्तानी विदेश विभाग ने सोमवार की रात एक बयान में कहा था कि भारत द्वारा उपलब्ध कराए गए 'सुरागों' पर पाकिस्तान काम कर रहा है.

‘ऑड-ईवन’ ने मौका दिया है तो सोचिए

दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए सम और विषम संख्या की कारों का फॉर्मूला एक माने में बेहद सफल नजर आता है, भले ही वह अपने मूल उद्देश्य में विफल रहा हो। अब तक की जानकारी के अनुसार कारों पर पाबंदी की इस योजना से प्रदूषण को रोकने में किसी प्रकार की नाटकीय सफलता नहीं मिली है। बेशक कुछ प्रदूषण कम हुआ है, पर वह इतना कम नहीं हुआ कि इसे स्थायी समाधान मान लें। पर इस अभियान को जिस किस्म की सफलता मिली है, वह जरूर अविश्वसनीय है। इसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश की जनता के भीतर अपनी समस्याओं के समाधान को लेकर जबर्दस्त ललक है। वह बड़े फैसले खुद नहीं कर सकती। उसके लिए उसे सरकारों का मुँह देखना पड़ता है, पर जब उसे किसी फैसले का महत्व समझ में आ जाता है तब वह उसे सफल बनाने में पीछे नहीं रहती।

Monday, January 4, 2016

पठानकोट के बाद

पठानकोट पर हमले के बाद देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रतिक्रिया बेहद आक्रामक रही है, वहीं अखबारों की प्रतिक्रिया संतुलित है। आज के इंडियन एक्सप्रेस का सम्पादकीय है कि बातचीत जारी रहनी चाहिए। बात करना समर्पण नहीं है। अलबत्ता अखबार की सलाह है कि हमें काउंटर टैररिज्म सामर्थ्य को सुधारना चाहिए। आज के हिन्दूटाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स ने  भी तकरीबन यही राय व्यक्त की है। पाकिस्तान के अखबार डॉन का भी यही कहना है। डॉन का यह भी कहना है कि सन 2008 के मुम्बई हमले को लेकर पाकिस्तान की ओर से जो कमी रह गई है उसका नुकसान उसे होगा। 

Indian Express

After Pathankot

Dialogue with Pakistan must go on. But India urgently needs counter-terrorism capacity-building.


Exactly a week after Prime Minister Narendra Modi landed in Lahore, hoping to “turn the course of history”, his ambitious project is being tested by fire. This weekend’s terrorist attack on Pathankot was no surprise; indeed, many in India’s intelligence community had predicted it. Each past effort at peace, after all, has provoked similar strikes. It is too easy, though, to attribute the strike to unnamed spoilers. The more complex truth is that while Pakistan’s all-powerful army seeks to avert a military crisis that would drain its energies at a time of grave internal turmoil, it does not seek normalisation. Pakistan’s army chief, General Raheel Sharif, has made it clear that he will not accept the status-quo on Kashmir. The strike on Pathankot, carried out by the Inter-Services Intelligence’s old client, the Jaish-e-Muhammad, serves a very specific purpose. It signals to Indian policymakers that the Pakistan army can inflict pain, but at a threshold below that which makes it worthwhile for New Delhi to retaliate. Barring reflexive hawks, after all, no one would argue that it makes sense for Delhi to risk even limited conflict after the strike on Pathankot. 

Sunday, January 3, 2016

अभी कई तीखे मोड़ आएंगे राष्ट्रीय राजनीति में

भारतीय राज-व्यवस्था, प्रशासन और राजनीति के लिए यह साल बड़ी चुनौतियों से भरा है। उम्मीद है कि इस साल देश की अर्थ-व्यवस्था की संवृद्धि आठ फीसदी की संख्या को या तो छू लेगी या उस दिशा में बढ़ जाएगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संसद के बजट सत्र में क्या होता है। पिछले दो सत्रों की विफलता के बाद यह सवाल काफी बड़े रूप में सामने आ रहा है कि भविष्य में संसद की भूमिका क्या होने वाली है। देश के तकरीबन डेढ़ करोड़ नए नौजवानों को हर साल नए रोजगारों की जरूरत है। इसके लिए लगातार पूँजी निवेश की जरूरत होगी साथ ही आर्थिक-प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारना होगा। व्यवस्था की डोर राजनीति के हाथों में है। दुर्भाग्य से राजनीति की डोर संकीर्ण ताकतों के हाथ में रह-रहकर चली जाती है।

Thursday, December 31, 2015

ऐसी भी कोई शाम है, जिसकी सहर न हो

सुबह और शाम के रूपक हमें आत्म निरीक्षण का मौका देते हैं. गुजरते साल की शाम ‘क्या खोया, क्या पाया’ का हिसाब लगाती है और अगली सुबह उम्मीदों की किरणें लेकर आती है. पिछले साल दिसम्बर के अंत में यानी इन्हीं दिनों मुम्बई के कुछ नौजवानों ने तय किया कि कुछ अच्छा काम किया जाए. उन्होंने किंग्स सर्किल रेलवे स्टेशन को साफ-सुथरा बनाने का फैसला किया. शुरुआत एक गंदे किनारे से की. देखते ही देखते इस टीम का आकार बढ़ता चला गया. इस टीम ने इस साल इस स्टेशन की शक्ल बदल कर रख दी. उन्होंने न केवल स्टेशन की सफाई की, बल्कि दीवारों पर चित्रकारी की, रोशनी की और 100 पेड़ लगाए. गौरांग दमानी के नेतृत्व में वॉलंटियरों की इस टीम के सदस्यों की संख्या 500 के ऊपर पहुँच चुकी है.

Thursday, December 24, 2015

संसद केवल शोर का मंच नहीं है

संसद के शीत सत्र को पूरी तरह धुला हुआ नहीं मानें तो बहुत उपयोगी भी नहीं कहा जा सकता. पिछले कुछ वर्षों से हमारी संसद राजनीतिक रोष और आक्रोश व्यक्त करने का मंच बनती जा रही है. वह भी जरूरी है, पर वह मूल कर्म नहीं है.  शीत सत्र में पहले दो दिन गम्भीर विमर्श देखने को मिला, जब संविधान दिवस से जुड़ी चर्चा हुई. अच्छी-अच्छी बातें करने के बाद के शेष सत्र अपने ढर्रे पर वापस लौट आया. सत्र के समापन के एक दिन पहले जुवेनाइल जस्टिस विधेयक के पास होने से यह भी स्पष्ट हुआ कि हमारी राजनीति माहौल के अनुसार खुद को बदलती है.

राजनीतिक दलों की दिलचस्पी होमवर्क में नहीं

प्रमोद जोशी


भारतीय संसदImage copyrightAP
संसद का शीत सत्र पूरी तरह नाकाम नहीं रहा. एक अर्थ में मॉनसून सत्र से बेहतर रहा पर उसे सफल कहना सही नहीं होगा. सरकार कुछ महत्वपूर्ण विधेयक पास नहीं करा पाई.
सवाल जीएसटी या ह्विसिल ब्लोवर जैसे क़ानूनों के पास न हो पाने का नहीं है. पूरे संसदीय विमर्श में गिरावट का भी है.
इस सत्र में दोनों सदनों ने संविधान पर पहले दो दिन की चर्चा को पर्याप्त समय दिया. यह चर्चा आदर्शों से भरी थी. उन्हें भुलाने में देर भी नहीं लगी.
संसदीय कर्म की गुणवत्ता केवल विधेयकों को पास करने तक सीमित नहीं होती. प्रश्नोत्तरों और महत्वपूर्ण विषयों पर भी निर्भर करती है.
देश में समस्याओं की कमी नहीं. संसद में उन्हें उठाने के अवसर भी होते हैं, पर राजनीतिक दलों की दिलचस्पी होमवर्क में नहीं है.
तमिलनाडु में भारी बारिश के कारण अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई. उस पर दोनों सदनों में चर्चा हुई. सूखे पर भी हुई.
लोकसभा Image copyrightPTI
महंगाई को 23 मिनट का समय मिला. इन दिनों दिल्ली में प्रदूषण की चर्चा है, पर संसद में कोई खास बात नहीं हुई. विसंगति है कि विधायिका और कार्यपालिका को जो काम करने हैं, वे अदालतों के मार्फ़त हो रहे हैं.
जुवेनाइल जस्टिस विधेयक पास हो गया. इसमें 16 साल से ज़्यादा उम्र के किशोर अपराधी पर जघन्य अपराधों का मुक़दमा चलाने की व्यवस्था है. किशोर अपराध के तमाम सवालों पर बहस बाक़ी है.
कांग्रेस ने लोकसभा में इसका विरोध किया था. अनुमान था कि राज्यसभा उसे प्रवर समिति की सौंप देगी.
इसके पहले शुक्रवार को सर्वदलीय बैठक में जिन छह विधेयकों को पास करने पर सहमति बनी थी उनमें इसका नाम नहीं था, पर मंगलवार को राज्यसभा में इस पर चर्चा हुई और यह आसानी से पास हो गया. कांग्रेस का नज़रिया तेजी से बदल गया.
वजह थी निर्भया मामले से जुड़े किशोर अपराधी की रिहाई के ख़िलाफ़ आंदोलन. यह लोकलुभावन राजनीति है. विमर्श की प्रौढ़ता की निशानी नहीं.

Sunday, December 20, 2015

इतनी तेजी में क्यों हैं केजरीवाल?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने शुक्रवार को ट्वीट किया कि केंद्र सरकार उन सभी विरोधियों के खिलाफ सीबीआई का इस्तेमाल करने जा रही है जो बीजेपी की बात नहीं मानते। ट्वीट में केजरीवाल ने दावा किया कि यह बात उन्हें एक सीबीआई अधिकारी ने बताई है। प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा, केजरीवाल को सीबीआई के अधिकारी का नाम बताना चाहिए और सबूत देने चाहिए, पर नाम कौन बताता है? यह बात सच हो तब भी यह राजनीतिक बयान है। इसका उद्देश्य मोदी विरोधी राजनीति और वोटों को अपनी तरफ खींचना है।

केजरीवाल धीरे-धीरे विपक्षी एकता की राजनीति की अगली कतार में आ गए हैं। इस प्रक्रिया में एक बात तो यह साफ हो रही है कि केजरीवाल ‘नई राजनीति’ की अपनी परिभाषाओं से बाहर आ चुके हैं। वे अपने अंतर्विरोधों को आने वाले समय में किस तरह सुलझाएंगे, इसे देखना होगा। फिलहाल उनकी अगली परीक्षा पंजाब में है। शायद वे असम की वोट-राजनीति में भी शामिल होने की कोशिश करेंगे।

अपने संरक्षकों की बेरुखी का शिकार नेशनल हेरल्ड

नेशनल हेरल्ड अख़बार को कांग्रेस पार्टी के उत्थान और पतन के साथ जोड़कर भी देखा जाना चाहिए. सन 1938 में जब यह अख़बार शुरू हुआ था देश में 11 प्रांतीय असेम्बलियों के पहली बार हुए चुनावों में से आठ में जीत हासिल करके कांग्रेस ने अपनी धाक जमाई थी. और 2008 में जब यह बंद हुआ कांग्रेस का पराभव शुरू हो चुका था.

अख़बार के मास्टहैड के ठीक नीचे उद्देश्य वाक्य लिखा रहता था, फ्रीडम इज़ इन पेरिल, डिफेंड इट विद ऑल योर माइट-जवाहर लाल नेहरू (आज़ादी खतरे में है, अपनी पूरी ताकत से इसकी रक्षा करो). यह वाक्य एक पोस्टर से उठाया गया था, जिसे सन 1939 में इंदिरा गांधी ने ब्रेंटफोर्ड, मिडिलसेक्स से नेहरू जी को भेजा था. यह ब्रिटिश सरकार का पोस्टर था. नेहरू को यह वाक्य इतना भा गया कि इसे उन्होंने अपने अख़बार के माथे पर चिपका दिया. दुर्भाग्य है कि नेहरू के वारिस तमाम बातें करते रहे, पर वे इस अख़बार और उसके संदेश की रक्षा करने में असफल रहे.

Tuesday, December 15, 2015

ग्लोबल इंडिया की खोज में

प्रमोद जोशी
First Published:06-09-2009 10:38:53 PMLast Updated:06-09-2009 10:39:10 PM
हमारे गाँवों के विकास की निशानी है, बिजली का बल्ब। जिस गाँव में बिजली का लट्टू जल जाय, समझ लो उसका विकास हो गया। पिछले मंगलवार को यूरोपियन यूनियन ने बिजली के इस बल्ब को हमेशा के लिए विदा कर दिया। नागरिक अधिकारवादियों के विरोध के बावजूद इसके इस्तेमाल पर पाबंदी लग गई। उन्नीसवीं सदी की वैज्ञानिक क्रांति के बाद जितने आविष्कार हुए, उनमें शायद यह लट्टू ही अकेला ऐसा था, जिसने तकरीबन अपने मूल रूप में इतनी लम्बी सेवा की।

करीब 120 साल की सेवा के बाद इसके रिटायर होने की एक वजह  थी कि ग्लोबल वार्मिग बढ़ाने में इसका बड़ा हाथ था। इसका उत्तराधिकारी सीएफएल इसकी तुलना में कम बिजली खर्च करता है और चलता भी ज्यादा है। परम्परागत बल्ब की सेवानिवृत्ति के बाद ईयू को आशा है कि करीब डेढ़ करोड़ टन कार्बनडाईऑक्साइड का उत्सजर्न कम होगा। सीएफएल के उत्तराधिकारी के रूप में एलईडी बल्ब भी तैयार हो रहा है। शायद कुछ दिन बाद वही जलता नजर आए। विडंबना है कि जो यूरोप में अवांछित है, वह भी हमें उपलब्ध नहीं।

माल्थस को अंदेशा था कि एक रोज दुनिया में इतनी खाद्य सामग्री नहीं होगी कि बढ़ती आबादी की जरूरत पूरी हो सके। उसके वक्त से ही बहस चली आ रही है कि क्या मानवीय समझ इतनी अच्छी है कि वह आसन्न संकटों का सामना करते हुए समानता, न्याय और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर आधारित खुशहाल समाज बना सके। बहरहाल उन्नीसवीं सदी की वैज्ञानिक क्रांति ने औद्योगीकरण और कृषि क्रांति का रास्ता साफ किया। वह संकट यूरोप का था। उसने ही उसका समाधान खोज। तकनीक और विज्ञान का विकास भी वहीं हुआ। पर आज वैश्वीकरण का दौर है।

वैश्वीकरण सिर्फ पूँजी का नहीं। हर चीज का। ग्लोबल वॉर्मिग का और स्वाइन फ्लू का। आर्थिक मंदी भी वैश्वीकृत है। फर्क इतना है कि हमारे जसे विकासशील देशों की भूमिका बढ़ गई है। पिछले हफ्ते विश्व व्यापार संगठन के वाणिज्य मंत्रियों की अनौपचारिक बैठक दिल्ली में होने का कारण इस बात को रेखांकित करना भी था कि भारत पर कुछ वैश्विक जिम्मेदारियाँ हैं। इस बैठक का औपचारिक अर्थ नवम्बर-दिसम्बर में जेनेवा में होने वाली बैठक के बाद समझ में आएगा। बल्कि सन् 2010 के अंत तक दोहा-चक्र पूरा होने पर पता लगेगा कि हम किधर जा रहे हैं। बहरहाल हमारे कंधों पर दुनिया बदलने का बोझ है, पर हम अभी बिजली के लट्टू के दौर में हैं।

दुनिया की राजनैतिक, व्यापारिक, मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सीमाएं खुल रहीं हैं। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब हमने वैश्वीकरण शब्द का इस्तेमाल शुरू किया तब उसका अर्थ अमेरिकी संस्कृति और जीवन-शैली की वैश्विक स्वीकृति से था। फ्रांसिस फुकुयामा के इतिहास का अंत यहीं पर था। पर तबसे अब तक दो बड़ी घटनाएं हुईं। एक 9/11 और दूसरे वैश्विक मंदी। अल कायदा ने बताया कि आतंक का वैश्वीकरण भी सम्भव है। सम्भावना है कि पूँजी के वैश्विक विस्तार के विरोध में वश्विक जनांदोलन भी खड़ा होगा। पर उससे बड़ा वैश्वीकरण प्रकृति कर रही है। ग्लोबल वॉर्मिग, मौसम में बदलाव, बीमारियां, पीने के पानी और भोजन का संकट पूरी मानवता के प्रश्न हैं। इनके समाधान के लिए हमें अपनी चेतना का लेवल बढ़ाना चाहिए।

सन् 2008 ने बड़े स्तर पर खाद्य संकट देखा। इस संकट के पीछे फसलों के खराब होने के अलावा वैश्विक व्यापार की प्रवृत्तियां भी थीं। एक थी तेल के लिए वनस्पतियों का इस्तेमाल। पिछले साल पेट्रोलियम की कीमतों में जबर्दस्त इजाफे के साथ-साथ इथेनॉल जैसे एग्रोफ्यूल की ओर उत्पादकों का ध्यान गया। मक्का, सोया और पामऑयल का इस्तेमाल बायोफ्यूल के लिए होने लगा है। दूसरी ओर विश्व में मांसाहार बढ़ रहा है। अमेरिका के किसान सुअरों को खिलाने के लिए मक्का उगा रहे हैं। व्यापारिक कारण मानवीय कारणों पर हावी हो रहे हैं। खेती का कॉरपोरेटाइजेशन उत्पादकता को बढ़ाने में मददगार हो तो हर्ज नहीं, पर भोजन सबके लिए जरूरी है। ऐसा न हो कि गरीब भूखे रह जाएं।

अर्थव्यवस्था का काफी बड़ा हिस्सा या समूची अर्थव्यवस्था बाजार के हवाले हो इसमें भी हर्ज नहीं, पर साधनों के वितरण की व्यवस्था सामाजिक देखरेख में ही होगी। बाजार भी सामाजिक निगरानी में ही चल सकते हैं। फ्री मार्केट और फ्री ट्रेड का प्रतिफल पिछले साल अमेरिकन बैंकिंग में देखने को मिला। सामाजिक निगरानी की अभी जरूरत है। संयोग है कि अमेरिका जैसी फ्री इकॉनमी में उद्योगों को बचाने के लिए पिछले साल सरकार का सहारा लेना पड़ा। ओबामा सरकार जिन उम्मीदों पर आई है, वे टूटती जा रहीं हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य और बूढ़े लोगों की पेंशन व्यवस्था के लिए दीर्घकालीन कार्यक्रम बनाना मुश्किल हो रहा है।

भारत जैसे देश कई मानों में बेहतर स्थिति में हैं। हम ऐसी तकनीक ला सकते हैं, जो पर्यावरण-मित्र हो। सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की नई प्रणाली शुरू कर सकते हैं। हम ऐसे विज्ञान और तकनीक को बढ़ावा दे सकते हैं, जो हमारी समस्याओं का समाधान करे। उसके लिए नए ढंग से सोचने की जरूरत है। क्या हम नए ढंग से सोच पाते हैं? हमारा पूरा फिल्म उद्योग हॉलीवुड की नकल करने पर उतारू है। इतनी समृद्ध संगीत परम्परा के बावजूद धुनें नकल की हैं। उद्योग-व्यापार और प्रबंध के सारे मॉडल विदेशी हैं। मगर विकास, नियोजन, राजमार्ग, भवन निर्माण वगैरह की समझ पश्चिमी है। इसमें गलत कुछ नहीं। पश्चिम के पास तकनीक है तो वहां से लेनी चाहिए।

कुछ साल पहले प्रो. यशपाल ने शायद किसी प्रबंध संस्थान में देश भर में चलने वाले जुगाड़ की तारीफ की। तारीफ इसलिए नहीं कि उसकी तकनीक विलक्षण है, बल्कि इसलिए कि ऐसी मशीन जो पानी निकाल दे, बिजली बना दे। जरूरत पड़े तो ठेलागाड़ी बन जाय या नाव चला दे। यानी अपनी जरूरतों को पूरा करे। विज्ञान और तकनीक की यही भूमिका है। अपनी समस्याओं के अपने समाधान खोजने के लिए हमें वैचारिक क्रांति की जरूरत है।

दो साल पहले देश में रिटेल कारोबार का हल्ला था। आज उस कारोबार में मंदा हैं। इसलिए नहीं कि पूँजी कम पड़ गई। इसलिए कि रिटेल के देशी मॉडल के मुकाबले पश्चिमी सुपर मार्केट का बिजनेस मॉडल कमजोर है। आपके मुहल्ले का दुकानदार आपको जो सुविधाएं दे रहा है, उसके मुकाबले फैंसी स्टोर सिर्फ दिखावटी हैं। उसे आप देखने जाते हैं, खरीदारी करने नहीं। यही बाजार का नियम है। पश्चिम का जो ग्राह्य है, उसे जरूर लेना चाहिए। पर हमें आविष्कार करने चाहिए। हमारे माल्थस सवाल उठाएं और हमारे गैलीलियो विश्वदृष्टि के उपकरण दें।
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लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं।

6.9.2009 के हिन्दुस्तान में प्रकाशित