सोशल-मीडिया का जन्म किसी स्वस्थ विमर्श को बढ़ावा देने के लिए नहीं हुआ है। वह सामान्य संपर्क और यारी-दोस्ती के संपर्कों के लिए शुरू हुआ था। पर अब यह न केवल विमर्श, बल्कि सूचना-समाचार के माध्यम के रूप में भी तैयार हो गया है। यह विकास कहाँ तक जाएगा, अभी कहना मुश्किल है। पर इसके कथ्यों और तथ्यों पर विचार करना संभव है।
बहरहाल जब मेरे या
आपके किसी विचार पर ध्यान देने के बजाय लोग उन्हें व्यक्त करने वालों की राजनीतिक
वफादारी का अनुमान लगाने लगें, तब यकीनन खुले विमर्श की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। बेशक व्यक्तिगत धारणाएँ
किसी भी विमर्श या विश्लेषण को प्रभावित करती हैं, पर बौद्धिक वस्तुनिष्ठता का तकाज़ा होता है कि आप
अपने तर्कों और तथ्यों को विवाद की संभावनाओं से जितना दूर रख सकें, उतना बेहतर है।
मतभेद, स्वस्थ
समाज का परिचय देते हैं। इसमें आमराय हमेशा संभव नहीं है, पर आमराय भी होती है। यदि बात को सही तरीके से रखा
जाए, तो कुछ लोग अपनी धारणाओं
को बदलते भी हैं। अपने विचारों पर दृढ़ रहना या तो अत्यधिक समझे-सुलझे व्यक्ति के
लिए संभव है या अल्पज्ञानी के लिए। परिधि पर खड़े लोगों के मन में संशय होते हैं।
वे एकदम से किसी एक पक्ष के साथ नहीं जाते। अपेक्षाकृत अपनी वैचारिक दृढ़ता को
परखने के लिए प्रतिस्पर्धी विचार को समझने की कोशिश भी होनी चाहिए।
सोशल मीडिया में ट्रोल शब्द का चलन है, जिसमें उपहास या उपेक्षा का भाव है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि जो लोग एक-दूसरे को करीब से कम जानते हैं, या एकदम अपरिचित हैं, तब उनकी प्रतिक्रिया पथरीली होती है। ट्रोलिंग पथरीली प्रतिक्रिया है।
आज हमें सबसे बड़ी समस्या ध्रुवीकरण की लगती है। सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण। इसमें लोग बगैर कुछ सोचे समझे किसी एक ध्रुव पर खड़े हो जाते हैं। उनके अपने विचार नहीं होते, बल्कि जिस राजनीतिक धारणा का वे समर्थन करते हैं, उसके विचारों की प्रतिध्वनि उनकी बातों में होती है।
एंटी
एस्टेब्लिशमेंट
डिजिटल युग में
सोशल मीडिया ने एंटी-एस्टेब्लिशमेंट आवाज़ों को बढ़ावा दिया, लेकिन फेक न्यूज, पोलराइज़ेशन और ट्रोल आर्मी की समस्या भी पैदा की है।
कॉरपोरेट मालिकाना हक़ ने मुख्यधारा के मीडिया को कुछ हद तक एस्टेब्लिशमेंट का
हिस्सा बना दिया है, इसलिए सोशल
मीडिया जैसी स्वतंत्र/नागरिक पत्रकारिता का महत्व बढ़ा है। मेरी समझ में सच्ची
पत्रकारिता न तो ‘सरकार-विरोधी’ होती है, न ‘सरकार-समर्थक’। वह सत्य-समर्थक होती है, जिसे मैं ऑब्जेक्टिव सत्य कह रहा
हूँ।
पत्रकारिता का
एंटी-एस्टेब्लिशमेंट पहलू शक्ति का नियंत्रण है, और सार्वजनिक हित का आशय है जनता को जानकार और सशक्त
बनाना है। पर यह जानकारी एकतरफा नहीं हो सकती। दोनों मिलकर लोकतंत्र को जीवंत रखते
हैं। जब ये दोनों कमजोर होते हैं, तो सत्ता बिना रोक-टोक चलती है और जनता अंधेरे में रहती है।
निष्पक्ष राय
अब एक सवाल और है।
क्या कोई राय निष्पक्ष हो सकती है? यदि उस राय के विपरीत भी कोई राय है, तब उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।
इसके बाद अगला सवाल बनेगा कि ऑब्जेक्टिव
विमर्श क्या संभव ही नहीं है? मेरी समझ से ऑब्जेक्टिव विमर्श
(objective discourse) संभव है, लेकिन यह
स्वतःस्फूर्त या आसान नहीं होता। यह कुछ शर्तों, अनुशासन और संस्थागत ढाँचों पर निर्भर करता है। पर
सोशल मीडिया उस अनुशासन से बँधा नहीं होता। ऐसा अकादमिक कार्यों में हो सकता है और
यदि अखबारों की परंपरागत संरचना पर ध्यान दें, तो उसमें इसके कुछ सूत्र मिलेंगे।
पर पहला सवाल है
कि ऑब्जेक्टिव विमर्श होता क्या? मेरी समझ से वह चर्चा, जिसमें:
·
दावे
तथ्यों, सबूतों और तर्कों पर
आधारित हों
·
व्यक्तिगत
भावना, पहचान, समूह-हित या विचारधारा को जितना संभव हो कम
किया जाए
·
विरोधी
दृष्टिकोण को गलत साबित करने के बजाय उसकी कमजोरियों और मजबूत पक्षों दोनों की
जाँच की जाए
· निष्कर्ष अस्थायी हों और वे नए सबूत आने पर बदले जा सकें
यह ‘पूर्ण
निष्पक्षता’ नहीं है (जो मानवीय सीमाओं के कारण असंभव है), बल्कि अंतर-व्यक्तिगत (intersubjective) निष्पक्षता है—यानी कई स्वतंत्र दिमाग एक ही
निष्कर्ष पर पहुँच सकें अगर वे समान सबूत और तर्क के नियमों का पालन करें। यह कैसे
संभव होगा?
साझा मानक और नियम: तर्कशास्त्र (logic),
साक्ष्य-आधारित विधि (evidence-based
reasoning), और वैज्ञानिक पद्धति ये
मानक प्रदान करते हैं। जब सभी पक्ष ‘दावा + सबूत + प्रति-तर्क’ के ढाँचे में बात
करें, तो व्यक्तिगत पूर्वग्रह कम
हो जाता है।
पूर्वग्रह की
स्वीकारोक्ति और नियंत्रण
हर व्यक्ति के पास
पुष्टि पूर्वग्रह (confirmation bias) होते हैं, यानी कि यदि वह मानता है कि ‘सभी नेता भ्रष्ट होते हैं’, तो वह सिर्फ ऐसी खबरें या घटनाएँ ध्यान से पढ़ेगा जो
इस बात को सही साबित करती हों, और इसके उलट खबरों की वह अनदेखी करेगा।
दूसरा है प्रेरित
तर्क (motivated reasoning) यानी
कि लोग सच खोजने के बजाय अपने मनपसंद नतीजे (desired conclusion) तक पहुँचने के लिए तर्कों को ढाल लेते हैं।
और तीसरा है समूह
निष्ठा (group loyalty) यानी
अपनी टीम, पार्टी, समुदाय, समाज या संस्था के प्रति निष्ठा।
ऑब्जेक्टिव विमर्श
तब संभव है जब प्रतिभागी इन अवरोधों से बचने की कोशिश करें। जैसे प्रतिस्पर्धी
विचार के सबसे मजबूत तर्क को पहले समझना या यह सोचना कि ‘मैं गलत भी हो सकता हूँ’।
भाषा और
अवधारणाओं की स्पष्टता
जब शब्द अस्पष्ट
या भावनात्मक रूप से लोडेड होते हैं, विमर्श आसानी से पक्षपाती हो जाता है। परिभाषाओं को पहले साझा करना, मापने योग्य संकेतक तय करना और ‘क्या है’ को
‘क्या होना चाहिए’ से अलग रखना जरूरी है।
सत्य की खोज को
प्राथमिकता देना
जब लक्ष्य ‘जीतना’
या ‘अपनी पहचान बचाना’ हो, तो
ऑब्जेक्टिव विमर्श मुश्किल हो जाता है। जब लक्ष्य ‘सही बात क्या है’ हो, तब संभावना बढ़ जाती है। यह सांस्कृतिक और
व्यक्तिगत मूल्य का सवाल है।
सीमाएँ भी हैं
पूर्ण निष्पक्षता
असंभव है क्योंकि हम मूल्य-निर्णय, नैतिक प्राथमिकताएँ और अनुभवों से बंधे होते हैं। कुछ विषयों (नैतिकता,
सौंदर्य, अर्थ) में ‘ऑब्जेक्टिव’ उत्तर नहीं होते; वहाँ केवल सुसंगत और सुविचारित दृष्टिकोण
संभव हैं। सत्ता, मीडिया
इको-चैंबर और सोशल मीडिया के प्रोत्साहन तंत्र अक्सर विमर्श को विकृत करते हैं।
फिर भी जब हम
व्यक्तिगत पूर्वग्रह को स्वीकार करें, साझा तर्क-नियम अपनाएँ, सबूतों
को प्राथमिकता दें और संस्थागत रूप से प्रतिकूल जाँच को बढ़ावा दें, तब ऑब्जेक्टिव
विमर्श संभव है यह एक आदर्श है जिसे
निरंतर अभ्यास से लगभग हासिल किया जा सकता है। पूर्ण रूप से कभी नहीं, लेकिन काफी हद तक हाँ।

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