अरसे से अनुमान था कि पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की पहल पर पचास के दशक में हुए ‘बग़दाद पैक्ट’ या ‘सेंटो’ को फिर से जगाया जा सकता है, जिसे ‘इस्लामिक ‘नेटो’ भी कहा गया था. कमोबेश उसी तर्ज पर एक नई संधि की शुरुआत पिछले हफ्ते हो गई है.
सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में गत 7 अगस्त को
क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान और पाकिस्तान के
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं.
हालांकि मिस्र और क़तर ने शुरुआती चर्चाओं में भाग लिया था, लेकिन शुक्रवार
को हुई चर्चा में उनका उल्लेख प्रतिभागी के रूप में नहीं किया गया. फिर भी, कुछ नए
देशों के इसमें शामिल होने की संभावनाएँ खुली हुई हैं.
समझौते को दुनियाभर के विशेषज्ञों ने अलग-अलग नज़रों से देखा है. मसलन क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति, सऊदी-ईरान और इसराइल रिश्ते, अमेरिका और दूसरी ताकतों की भूमिका और भारत का नज़रिया. मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी की सार्थकता को लेकर भी सवाल हैं.
समझौते पर हस्ताक्षर होने के 48 घंटे बाद ही उसे पहली गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा है. ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने जाज़ान में अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला किया, जिससे आग लग गई.
