Saturday, December 10, 2022

हम कैसे वापस ले सकते हैं अपनी खोई ज़मीन?

 देस-परदेस


कश्मीर की पहेली-3

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इस तरह उलझता गया कश्मीर का मसला

इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है कि हम अपनी खोई ज़मीन वापस कैसे लेंगे. सैनिक हस्तक्षेप आसान नहीं है और उससे जुड़े तमाम जोखिम हैं. बैकरूम डिप्लोमेसी अदृश्य होती है, पर कारगर भी होती है. पिछले 75 वर्षों में वैश्विक स्थिति और भारत की भूमिका में बड़ा बदलाव आया है. यह बात समस्या के समाधान में भूमिका निभाएगी.

पश्चिमी देशों को 1947-48 में डर था कि कहीं सोवियत संघ को अरब सागर तक का रास्ता हासिल नहीं हो जाए. अब उन्हें नज़र आ रहा है कि रूस से जिस रास्ते पर कब्जे का डर था, उसे तो चीन ने हथिया चुका है. शीतयुद्ध के कारण पश्चिमी खेमा हमारे खिलाफ था, पर आज हालात बदले हुए हैं.

चीनी पकड़

अगस्त 2010 में अमेरिका के सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी के डायरेक्टर सैलिग एस हैरिसन का न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख छपा, जिसमें बताया गया था कि पाकिस्तान अपने अधीन कश्मीर में चीनी सेना के लिए जगह बना रहा है. चीन के सात हजार से ग्यारह हजार फौजी वहाँ तैनात हैं. इस इलाके में सड़कें और सुरंगें बन रहीं हैं, जहाँ पाकिस्तानियों का प्रवेश भी प्रतिबंधित है. यह बात इसके बाद भारत के अखबारों में प्रमुखता से छपी.

चीन ने इस इलाके पर अपनी पकड़ बना ली है. समुद्री रास्ते से पाकिस्तान के ग्वादर नौसैनिक बेस तक चीनी पोत आने में 16 से 25 दिन लगते हैं. गिलगित से सड़क बनने पर यह रास्ता सिर्फ 48 घंटे का रह गया है. इसके अलावा रेल लाइन भी बिछाई जा रही है.

अगस्त 2020 की खबर थी कि कंगाली से जूझ रही तत्कालीन इमरान खान सरकार ने पीओके में रेल लाइन बनाने के लिए 6.8 अरब डॉलर (करीब 21 हजार करोड़ भारतीय रुपये) के बजट को मंजूरी दी. यह रेल लाइन सीपैक का हिस्सा है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने इस्लामाबाद से शिनजियांग प्रांत के काशगर तक सड़क के एक हिस्से को आम लोगों के लिए खोल दिया है.

दशकों पुरानी परिकल्पना

पाकिस्तान और चीन के बीच आर्थिक गलियारे सीपैक की परिकल्पना 1950 के दशक में ही की गई थी, लेकिन वर्षों तक पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता रहने के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सका. बासठ की लड़ाई के एक साल बाद ही पाकिस्तान ने कश्मीर की 5,189 किमी जमीन चीन को सौंप दी.

इस जमीन से होकर चीन के शिनजियांग स्वायत्त क्षेत्र के काशगर शहर से लेकर पाकिस्तान के एबटाबाद तक एक सड़क बनाई गई, जिसे कराकोरम राजमार्ग कहा जाता है. कश्मीर अब सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच का मसला नहीं है. चीन इसमें तीसरी पार्टी है. और इसीलिए 2019 में उसने 370 के मसले को सुरक्षा परिषद में उठाने की कोशिश की.

सिंगापुर से करार तोड़ा

पाकिस्तान ने सन 2007 में पोर्ट ऑफ सिंगापुर अथॉरिटी के साथ 40 साल तक ग्वादर बंदरगाह के प्रबंध का समझौता किया था. यह समझौता अचानक अक्टूबर 2012 में खत्म करके बंदरगाह चीन के हवाले कर दिया गया. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित क्षेत्र में चीन ने सड़क बनाई है, जो उसके शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान से जोड़ती है. यह सड़क ग्वादर तक जाती है.

चीन को अरब सागर तक जाने का जमीनी रास्ता मिल गया है. चीन ने 2014 में इस आर्थिक गलियारे की आधिकारिक रूप से घोषणा की. इसके जरिए चीन ने पाकिस्तान में विभिन्न विकास कार्यों के लिए तब करीब 46 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की थी.

Thursday, December 8, 2022

इस तरह उलझता गया कश्मीर का मसला

 देस-परदेस

नेहरू, माउंटबेटन के चीफ ऑफ स्टाफ हेस्टिंग इज़्मे, माउंटबेटन और जिन्ना

कश्मीर की पहेली-
2

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कैसे और कब होगी पाकिस्तानी कब्जे से ज़मीन की वापसी?

अविभाजित भारत में 562 देशी रजवाड़े थे. कश्मीर भी अंग्रेजी राज के अधीन था, पर उसकी स्थिति एक प्रत्यक्ष उपनिवेश जैसी थी और 15 अगस्त 1947 को वह भी स्वतंत्र हो गया. देशी रजवाड़ों के सामने विकल्प था कि वे भारत को चुनें या पाकिस्तान को.

देश को जिस भारत अधिनियम के तहत स्वतंत्रता मिली थी, उसकी मंशा थी कि कोई भी रियासत स्वतंत्र देश के रूप में न रहे. पर कश्मीर राज के मन में असमंजस था. इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के तहत 15 अगस्त 1947 को जम्मू कश्मीर पर भी अंग्रेज सरकार का आधिपत्य (सुज़रेंटी) समाप्त हो गया.

पाकिस्तान ने कश्मीर के महाराजा को कई तरह से मनाने का प्रयास किया कि वे पकिस्तान में विलय को स्वीकार कर लें. स्वतंत्रता के ठीक पहले जुलाई 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना ने महाराजा को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें हर तरह की सुविधा दी जाएगी.

स्टैंडस्टिल समझौता

महाराजा ने भारत और पाकिस्तान के साथ ‘स्टैंडस्टिल समझौते’ की पेशकश की. यानी यथास्थिति बनी रहे. भारत ने इस पेशकश पर कोई फैसला नहीं किया, पर पाकिस्तान ने महाराजा की सरकार के साथ ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ कर लिया. इसके बावजूद उसने समझौते का अनुपालन किया नहीं, बल्कि आगे जाकर कश्मीर की नाकेबंदी कर दी और वहाँ पाकिस्तान की ओर से जाने वाली रसद की आपूर्ति रुक गई.

अक्तूबर 1947 में पाकिस्तान सेना की छत्रछाया में कबायली हमलों के बाद 26 अक्तूबर को महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर दस्तखत कर दिए. एक दिन बाद दिन भारत के गवर्नर जनरल ने उसे मंजूर भी कर लिया. भारतीय सेना कश्मीर भेजी गई और करीब एक साल तक कश्मीर की लड़ाई चली. भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद नवम्बर में पाकिस्तानी सेना भी आधिकारिक रूप से बाकायदा इस लड़ाई में शामिल हो गई.

इस सिलसिले में कुछ और बातों पर ध्यान देने की जरूरत है. 1.पुंछ में मुस्लिम आबादी ने बगावत की. 2.गिलगित-बल्तिस्तान में महाराजा की सेना ने बगावत की. सेना में ज्यादातर सैनिक मुसलमान थे और कमांडर अंग्रेज. 3.जम्मू में सांप्रदायिक हिंसा हुई और 4.कश्मीर के अलावा हैदराबाद और जूनागढ़ पर पाकिस्तान की नजरें थी.

Wednesday, December 7, 2022

कैसे और कब होगी पाकिस्तानी कब्जे से ज़मीन की वापसी?

 देस-परदेश

कश्मीर की पहेली-1

पाकिस्तान के नए सेनाध्यक्ष जनरल सैयद आसिम मुनीर ने पिछले शनिवार को कहा कि हमारी सेना पूरी ताक़त के साथ दुश्मन को जवाब देने के लिए तैयार है. पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष के तौर पर यह सामान्य बयान है, पर यह समझने की जरूरत है कि यह बयान क्यों दिया गया है. उन जटिलताओं को समझना चाहिए, जो जम्मू-कश्मीर विवाद से जुड़ी हैं.

गत 29 नवंबर को नया पद संभालने के बाद जनरल मुनीर पहली बार पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के दौरे पर आए थे. वहाँ जाकर उन्होंने कहा कि भारतीय नेतृत्व ने गिलगित-बल्तिस्तान और कश्मीर को लेकर हाल में ग़ैर-जिम्मेदाराना बयान दिए हैं, इसलिए मैं साफ़ करना चाहता हूं कि पाकिस्तान की सेना अपने इलाके के एक-एक इंच की रक्षा करने को तैयार है.

रक्षामंत्री का बयान

पहली नजर में यह बात पाकिस्तानी राजनीति के आंतरिक इस्तेमाल के लिए कही गई है. ऐसे बयान वहाँ से आते ही रहते हैं. यह भी माना जा सकता है कि यह बात हाल में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और सेना की नॉर्दर्न कमांड के अध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी के बयानों के जवाब में कही गई है.

उन वक्तव्यों से संदेश गया था कि शायद पाक-अधिकृत कश्मीर को वापस लेने के लिए भारत फौजी कार्रवाई करने का विचार कर रहा है. व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए नहीं लगता कि भारत का इरादा सैनिक कार्रवाई करने का है.

यूक्रेन-युद्ध से पैदा हुए घटनाचक्र से भी लगता नहीं कि भारत इस समय युद्ध का जोखिम मोल लेना चाहेगा. वह इस समय जी-20 का अध्यक्ष भी है, इसलिए वैश्विक-शांति को भंग करने की तोहमत भी भारत अपने ऊपर नहीं लेना चाहेगा. पर रक्षामंत्री का बयान भी निराधार नहीं है. उसके पीछे दो कारण नजर आते हैं. एक, डिप्लोमैटिक और दूसरा आंतरिक राजनीति से जुड़ा है.

ताकि सनद रहे

भारत इस बात को रेखांकित करना चाहता है कि कश्मीर विवाद का मतलब है, कश्मीर पर पाकिस्तानी कब्जा. हमें वह ज़मीन वापस चाहिए. यह भी लगता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पीओके की वापसी को भी बीजेपी एक मुद्दा बना सकती है. 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद कश्मीर से अनुच्छेद 370 की वापसी हुई थी. इस प्रक्रिया की सहज परिणति है शेष जमीन की वापसी.

गत 27 अक्टूबर को श्रीनगर में शौर्य दिवस के मौके पर रक्षामंत्री राजनाथ ने कहा था कि हमारी यात्रा उत्तर की दिशा में जारी है. हम पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को भूले नहीं हैं, बल्कि एक दिन उसे वापस हासिल करके रहेंगे. जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में सर्वांगीण विकास का लक्ष्य पीओके के हिस्से वाले गिलगित-बल्तिस्तान तक पहुंचने के बाद ही हासिल होगा.

Tuesday, December 6, 2022

राष्ट्रीय-एकता के प्रतीक बन सकते हैं अयोध्या के मंदिर-मस्जिद


अयोध्या के मंदिर-मस्जिद विवाद ने देश को बहुत कुछ सोचने समझने का मौका दिया है और आज हम ठंडे दिमाग से देश की एकता और संस्कृति की बहुलता पर विचार कर सकते हैं। दो साल पहले 2020 में स्वतंत्रता दिवस के ठीक दस दिन पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने के साथ एक नए युग की शुरुआत हुई थी। आशा है कि मंदिर की छत और गुंबद का काम अगस्त 2023 में पूरा हो जाएगा और हाल में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर का निर्माण दिसंबर 2023 तक पूरा हो जाने की बात कही है।

संभवतः जनवरी 2024 में मकर संक्रांति के बाद मंदिर में विधिवत दर्शन-पूजन शुरू कर हो जाएंगे। मंदिर के प्रथम तल का निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा और सूर्य के उत्तरायण होते ही शुभ मुहूर्त में मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाएगी। संभावना है कि उसी समय मंदिर से करीब 25 किलोमीटर दूर प्रस्तावित मस्जिद के पहले चरण का निर्माण भी पूरा हो जाएगा।

2019 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला जब आया तब एक बात कही जा रही थी कि भारतीय राष्ट्र-राज्य के मंदिर का निर्माण सर्वोपरि है और इसमें सभी धर्मों और समुदायों की भूमिका है। हमें इस देश को सुंदर और सुखद बनाना है। मंदिर आंदोलन के कारण गाड़ी ऐसी जगह फँसी, जहाँ से बाहर निकालने रास्ता सुझाई नहीं देता था। अदालत ने उस जटिल गुत्थी को सुलझाया, जिस काम से वह पहले बचती रही थी। यह फैसला दो कारणों से उल्लेखनीय था। एक तो इसमें सभी जजों ने एकमत से फैसला किया और केवल एक फैसला किया। उसमें कॉमा-फुलस्टॉप का भी फर्क नहीं रखा। यह बात बहुत से लोगों को अच्छी लगी और कुछ लोगों को खराब भी लगी।

सुप्रीम कोर्ट के सामने कई तरह के सवाल थे और बहुत सी ऐसी बातें, जिनपर न्यायिक दृष्टि से विचार करना बेहद मुश्किल काम था। पर उसने एक जटिल समस्या के समाधान का रास्ता निकाला। और अब इस सवाल को हिन्दू-मुस्लिम समस्या के रूप में देखने के बजाय राष्ट्र-निर्माण के नजरिए से देखा जाना चाहिए। सदियों की कड़वाहट को दूर करने की यह कोशिश हमें सही रास्ते पर ले जाए, तो इससे अच्छा कुछ नहीं होगा।  

अदालत ने इस मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद सभी पक्षों से एकबार फिर से पूछा था कि आप बताएं कि समाधान क्या हो सकता है। इसके पहले अदालत ने कोशिश की थी कि मध्यस्थता समिति के मार्फत सभी पक्षों को मान्य कोई हल निकल जाए। ऐसा होता, तो और अच्छा होता। पर इसके साथ ही कुछ सवाल भी खड़े हुए। क्या यह राष्ट्र-निर्माण का मंदिर बन पाएगा? क्या यह एक नए युग की शुरुआत है? ये बड़े जटिल प्रश्न हैं।

Sunday, December 4, 2022

कांग्रेस की ‘सेल्फ-गोल’ राजनीति


कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के रावण वाले बयान को लेकर राजनीति गर्म है। इस मामले में जयराम रमेश और पवन खेड़ा ने खड़गे जी के बयान का बचाव करते हुए कहा है कि मोदी जी आप हमारे नेताओं और बुजुर्गों के बारे में बोलते हो, तो सुनने की भी हिम्मत रखिए। आप क्या छुई-मुई बनकर राजनीति करेंगे? आप किसी को कुछ भी बोलते रहें...मसलन इटली की बेटी, जर्सी गाय, 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड और शूर्पनखा। आप क्या खास हैं? स्वर्ग से आए हैं? राजनीति में आए हैं, बोलना जानते हैं, तो सुनना भी सीखिए। जयराम रमेश ने भी सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बारे में की गई मोदी की टिप्पणियों का उल्लेख किया। कांग्रेसी नेताओं की टिप्पणी के पीछे के तर्कों और राजनीतिक-भाषा की गरिमा पर अलग से विचार करने की जरूरत है। जो सवाल खेड़ा और रमेश ने किए हैं, वैसे ही सवाल बीजेपी की तरफ से भी हैं। फिलहाल यहाँ एक व्यावहारिक प्रश्न है। गुजरात के चुनाव में ऐसी बात कहने से क्या कोई फायदा होगा? 2007 के चुनाव की शुरुआत सोनिया गांधी ने मौत का सौदागर से की थी, हासिल क्या हुआ? मोदी के खिलाफ इस किस्म की अपमानजनक टिप्पणियाँ कांग्रेस की पुरानी और फेल रणनीति रही है। इस बार भी शुरुआत मधुसूदन मिस्त्री ने मोदी की औकातबताने से की है। पार्टी का मन मोदी को कोसते हुए भर नहीं रहा है। इससे मोदी ही केंद्रीय विषय बन गए हैं। भले ही यह प्रसिद्धि नकारात्मक है, पर मोदी को गुजरात से उठकर राष्ट्रीय नेता बनने में इस बात का बड़ा योगदान है। 

बदलती रणनीति

टिप्पणियाँ ही रणनीति है, तो फिर उसे पूरी शक्ल दीजिए। दिसंबर, 2017 में ऐसी ही एक टिप्पणी पर मणि शंकर अय्यर को हाथोंहाथ निलंबित कर दिया गया। जिस वक्त मणि शंकर अय्यर की मुअत्तली की खबरें आ रहीं थीं उसी वक्त अमित शाह का ट्वीट भी सायबर-स्पेस में था। उन्होंने एक सूची देकर बताया था कि कांग्रेस मोदी को किस किस्म की इज्जत बख्शती रही है। इनमें से कुछ विशेषण हैं, यमराज, मौत का सौदागर, रावण, गंदी नाली का कीड़ा, मंकी, वायरस, भस्मासुर, गंगू तेली, गून वगैरह। दिसंबर, 2017 में कांग्रेस पार्टी अपनी छवि किसी और दिशा में बना रही थी। अनुभव बताता है कि कांग्रेस का दांव बार-बार उल्टा ही पड़ा है।

उल्टा पड़ा निशाना

आज मोदी जब अपने को चायवालाबताते हैं, तो लगता है कि वे अपना प्रचार कर रहे हैं। याद करें कि किसने उन्हें चायवाला कहा था? 2014 के चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस महा समिति की बैठक में मणि शंकर ने ही मोदी को चाय बेचने का सुझाव दिया था, जो पार्टी पर भारी पड़ा था। बीजेपी ने ‘चाय पर चर्चा’ को राजनीतिक रूप दे दिया। चाय वाले का वह रूपक मौके-बेमौके आज भी कांग्रेस को तकलीफ पहुँचाता है। नरेंद्र मोदी ने भी व्यक्तिगत टिप्पणियों को सुनने और उन्हें अपने पक्ष में करने में महारत हासिल कर ली है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब कांग्रेस ने सीधे तौर पर पीएम मोदी पर हमला किया, लेकिन हर बार उन्होंने सफलतापूर्वक बाजी पलट दी और विजयी हुए। इस समय ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि गुजरात में क्या होने वाला है?  गुजरात में ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति को लेकर उसकी रणनीति क्या है?