Friday, March 6, 2026

औद्योगिक-आत्मनिर्भरता के प्रवेशद्वार पर भारत

भारत ने हाल में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश किया है, जो अपेक्षाकृत नए हैं और जिनमें भारी पूँजी निवेश की ज़रूरत होती है। ये क्षेत्र हैं: आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा और रक्षा उत्पादन। इसके अलावा हमारा परंपरागत वस्त्र और परिधान-उद्योग, ऑटोमोबाइल्स, फार्मा और सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है। इन बातों का सकल परिणाम है: नई पूंजी+ नई तकनीक=औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार। हमारे वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, औषधियाँ, केमिकल ज़्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। नतीजा: उत्पादन बढ़ेगा, रोज़गार बढ़ेगा, उद्योगों का विस्तार होगा।

इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए हमें दो स्तरों पर काम करने की ज़रूरत है। एक स्तर छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का है, जो बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और आम उपभोग की वस्तुएँ तैयार करते हैं। ऐसे उद्योग भी तभी सफल होंगे, जब हमारे पास नवीनतम उच्चस्तरीय तकनीक होगी। साथ ही हमें ऐसे सामाजिक विकास की ज़रूरत है, जो बड़ी संख्या में लोगों की समृद्धि का कारण बने। जब लोगों के पास पैसा होगा, तभी वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदेंगे। जब उनका उपभोग बढ़ेगा, तब औद्योगिक विकास भी होगा।

भारी उद्योगों की भूमिका

हमने ऊपर जिन उद्योगों का ज़िक्र किया है, उनमें से ज्यादातर भारी उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योगों से आशय उन बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्यमों से है, जिनमें भारी मात्रा में पूँजी, जटिल मशीनरी और कच्चे माल का उपयोग होता है। ये उद्योग, जैसे इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, मशीनरी, सीमेंट, पोत और विमान निर्माण और ऑटोमोबाइल आदि बुनियादी ढाँचे के विकास, अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाने और अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Wednesday, March 4, 2026

पश्चिम एशिया को इस ‘भँवर’ से निकालना मुश्किल होगा


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है. लगता है कि भानुमती के पिटारे की तरह एक के बाद एक नई चीजें सामने आ रही हैं और अभी आएँगी।

उनका यह ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे गया है, जिनमें अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा करना होगा. यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है.’

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है. हो सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत रखता है. बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रहेगी.

इस आक्रमण के बाद जहाँ एकाध अपवाद को छोड़कर पूरा यूरोप, अमेरिका और इसराइल के साथ खड़ा नज़र आ रहा है, वहीं रूस और चीन ने आयतुल्ला खामनेई की हत्या की निंदा की है.

चीन ने इसे 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया और कहा कि हम इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करते हैं. पर वे निंदा तक ही सीमित रह सकते हैं. वे जो भी करेंगे, दूर रहते हुए परोक्ष तरीकों से करेंगे, प्रत्यक्ष तरीके से नहीं. 

दुबई की पहचान खतरे में और पेट्रोलियम-संकट के आसार

 

28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी और इसराइली हमलों के जवाब में ईरान की जवाबी कार्रवाई ने दुबई की सुरक्षित छवि को हिलाकर रख दिया है। आलीशान कृत्रिम आवास पाम जुमेराह पर स्थित फेयरमों होटल पहले ही दिन आग की चपेट में आ गया। अमेज़न वैब सर्विसेज का एक डेटा सेंटर भी जल गया। विश्व की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन, अमीरात एयरलाइंस का मुख्यालय और दुबई के पर्यटन व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हवाई अड्डा क्षतिग्रस्त हो गया और उड़ानें स्थगित कर दी गईं। अमीरात के तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाह और माल ढुलाई केंद्र, जबल अली, में परिचालन रोक दिया गया।

दुबई, संयुक्त अरब अमीरात ( यूएई ) के बाकी हिस्सों की तरह, अब तक इस स्थिति से अप्रभावित रहा था; युद्ध के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन जो कुछ दिन पहले तक गुप्त रखा गया था, वह अब हकीकत बन गया है। हालांकि ज्यादातर विदेशी निवासी सुरक्षित हैं, कुछ लोग ओमान या सऊदी अरब के रास्ते, जहां हवाई क्षेत्र खुला है, कुछ समय के लिए ही सही, देश छोड़ रहे हैं या छोड़ने की योजना बना रहे हैं। अमेरिका के विदेश विभाग ने नागरिकों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी है। व्यवसायी अभी टिके हुए हैं, लेकिन इमर्जेंसी योजनाएँ बना रहे हैं। सवाल यह है कि क्या दुबई को वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने वाले लोग और पैसा पहले की तरह आता रहेगा?

Tuesday, March 3, 2026

ईरानी आपदा पर चीन की चुप्पी

 

इकोनॉमिस्ट से साभार

ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की चीन ने निंदा की है, पर उसने अमेरिका का उतना कड़ा विरोध नहीं किया है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इसके पीछे के कारणों को विशेषज्ञों ने समझने की कोशिश भी की है।

हांगकांग के अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि चीन ने ईरान में अपने एक चीनी नागरिक की मौत और देश से अपने 3,000 नागरिकों को निकालने की पुष्टि की और शनिवार को रूस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई और सैन्य कार्रवाई की निंदा की। सोमवार को रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन कॉल में, चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी ने ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की निंदा करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया।

इस प्रकार के शाब्दिक विरोध के अलावा, चीन ने ईरान के लिए किसी प्रकार की ठोस मदद की पेशकश से परहेज किया है, ठीक वैसे ही जैसे उसने तब किया था जब इसराइल ने पिछले साल जून में ईरान के सैन्य और परमाणु स्थलों पर हमले किए थे।

बीजिंग की प्रतिक्रिया राजनयिक समर्थन देने और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचने की उसकी पुरानी रणनीति के अनुरूप है, जैसा कि उसने जनवरी में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अमेरिकी अपहरण के समय भी किया था। लेकिन हमलों से एक दिन पहले प्रकाशित चैटम हाउस के एसोसिएट फैलो अहमद अबूदूह के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान विवाद में चीन के राजनयिक संयम को चीनी अविश्वसनीयता या उदासीनता के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए

अल्मोड़ा की होली


हिंदी की लोकप्रिय लेखिका गौरा पंत शिवानी ने अपनी आत्मकथा
सुनहु तात यह अकथ कहानी में एक जगह अल्मोड़ा की होली का बड़ा सुंदर विवरण दिया है, गौर करें:

होली आती तो अल्मोड़ा के छोटे से बाजार की शोभा ही द्विगुणित हो जाती…. पहाड़ की होली का तब अपना ही जादू था। आमल की एकादशी से होली की बैठकें लगतीं। मोट के दन (कालीन), उन पर बिछती दुग्ध-धवल चादरें, सफेद गिलाफ चढ़ा गाव-तकिया, उनका सहारा लिए लखनऊ की अम्बरी तम्बाकू की सुगन्धित धूम्र-रेखा से हुक्के का कश खचते प्रतिष्ठित व्यक्ति। थोड़ी ही देर में थाल के थाल जम्बू हुँके आलू और गोझे परिवेशित होते, पीतल के चमचमाते गिलासों में मसाले डली अदरक की चाय। फिर आरभ्भ होती बैठक होली

अपनों बीरन मोहे दे री ननदिया

मैं होली खेलन जाऊँ वृन्दावन।

           या

जाय पड़ईं पी के अंक

चाहे कलंक लगै री़

तबले पर संगत करते कुमाऊँ के अल्लारक्खा, दाम दा, हारमोनियम पर पहाड़ के जलगाँवकर, कांति दा; और रसीले कंठ का माधुर्य बिखेरते वे संगीत रसिक गायक, जिन्होंने न कभी विधिवत संगीत की शिक्षा पाई, न किसी गुरु का गंडा ही बाँधा। स्वयं विधाता ने जिनके कंठ में प्रतिभा को खूँटे की गाय-सा बाँधकर रख दिया था। न कह अश्लील प्रलाप, न छींटाकशी; वह मधुर स्वरलहरी, सम पार आती, तो वाह-वाह की साधुध्वनि छज्जे को गुंजायमान करती सड़क तक चली जाती।

राह चलते लोग ठिठककर खड़े हो जाते, ‘‘कौन गा रहा है यह? भवानी शाह या बद्रिया?’’

भारत की सतरंगी-संस्कृति का पर्व होली

रंगों की बौछार से कड़वाहटों को भुलाने का मौका

होली रंगों का त्योहार है, पर केवल रंग उड़ाने या मौज मस्ती तक सीमित नहीं है। अवध के इलाके में परंपरा है कि होली के बाद सब एक-दूसरे के गले मिलते हैं। यह क्रम करीब एक पखवाड़े तक चलता है। हरेक परिवार अपने पड़ोस के हरेक घर में होली मिलने जाता है। पड़ोसी उनके घर आते हैं। यह क्रम एक पखवाड़े से ज्यादा समय तक चलता है। ऐसी परंपराएँ होली को सामाजिक मेलजोल का सबसे बड़ा त्योहार बनाती हैं। पूरे देश में ऐसा ही कुछ किसी न किसी रूप में और किसी न किसी परंपरा के साथ होता है।

यह कई दिन चलने वाली गतिविधि है, जो चार महीनों की ठंडक के कारण जड़ीभूत निष्क्रियता को तोड़ने का काम करती है। पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में इससे जुड़ी रोचक परंपराएँ हैं, जो केवल रंग बिखरने से ही नहीं जुड़ी है। इसके साथ खान-पान, संगीत, दस्तकारी और लोक कलाओं की जबर्दस्त परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। होली के रंग ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति और धर्म के बंधनों को तोड़कर, वैर-भाव भूलकर सभी को समान धरातल पर लाते हैं। यह पर्व सामाजिक सद्भाव और दोस्ताना समाज की स्थापना करता है।  

वसंत पंचमी से ही फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। प्रकृति भी इस समय खिली हुई होती है। सरसों के पीले फूल धरती को रंग देते हैं। गेहूँ की बालियाँ निकल आती हैं। आम पर बौर फूलने लगते हैं। किसान खुश होकर गीत गाते हैं। यह त्योहार सभी पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाता है, जाति, पंथ और उम्र की बाधाओं को पार करते हुए एकता और समुदाय की भावना को बढ़ावा देता है। क्षमा और मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करता है। खुशी की बेलाग अभिव्यक्ति और कड़वाहटों को भुलाने का दिन।

सबसे पुराना त्योहार

जब हम इसके इतिहास पर जाते हैं, तब पता लगता है कि यह देश के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों में इस पर्व का प्रचलन था। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ से प्राप्त ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में होली मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गाहय-सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। सातवीं शताब्दी के राजा हर्ष ने अपनी रचना 'रत्नावली' में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है।

Saturday, February 28, 2026

केजरीवाल की वापसी


दिल्ली सरकार के आबकारी मामले में अदालत से छुट्टी पाने के बाद आम आदमी पार्टी ने बड़ी तेजी से गतिविधियाँ शुरू कर दी हैं, जिसकी शुरुआत रविवार 1 मार्च को जंतर-मंतर पर मेगा रैली से होगी। पार्टी का कहना है कि इसमें मोहल्ला क्लीनिक से हटाए गए डॉक्टर, नर्स और दस हजार बस मार्शल भी शामिल होंगे, जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया, कंडक्टरों, बस मार्शलों, डॉक्टरों और फार्मेसिस्टों की ओर से मुद्दे उठाएँगे।

2025 के विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद अरविंद केजरीवाल खामोश हो गए थे, तब उन्होंने कहा था कि जब तक अदालत उन्हें निर्दोष साबित नहीं कर देती, तब तक उन्होंने चुप रहने का फैसला किया है। चूँकि अदालत ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है, इसलिए संभवतः वे फिर से गरजते-बरसते दिखी पड़ेंगे। दिल्ली में विधानसभा चुनाव 2030 में होंगे, इसलिए फिलहाल उनकी सक्रियता का एक लक्ष्य राष्ट्रीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने का होगा। दूसरे वे 2027 में पंजाब और गुजरात के चुनाव की तैयारी करेंगे, जहाँ उनकी पार्टी ने अपनी जगह बना ली है।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

कांग्रेस की शुरुआती प्रतिक्रिया से लगता है कि वह केजरीवाल की वापसी को वह बीजेपी की साजिश मानती है। बीजेपी देश भर में मुख्य विरोधी दल के रूप में आप को खड़ा करना चाहती है। कांग्रेस की तरफ से पवन खेड़ा ने इस मुद्दे को लेकर मोर्चा खोला है। उन्होंने केजरीवाल के बरी होने को भाजपा के कांग्रेस मुक्त अभियान का हिस्सा बता दिया। उन्होंने कहाभाजपा की तरफ से कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान चलाया जा रहा है। इसी अभियान के तहत केजरीवाल और सिसोदिया को रिहा किया गया है। उन्होंने कहाअब आम आदमी पार्टी पंजाबतमिलनाडु हर जगह चुनाव लड़ेगी। खेड़ा ने कहा कि भाजपा चुनाव के लिए केजरीवाल को धोकर लाई है और विपक्ष में कौन होगायह भी बीजेपी तय करना चाहती है। राष्ट्रीय राजनीति मेंचूंकि इंडिया ब्लॉक के कई घटक दल कई मुद्दों पर कांग्रेस से सहमत नहीं हैंइसलिए केजरीवाल के फिर से जोश में लौटने से आम आदमी पार्टी की स्थिति अब और भी मजबूत होगी।

Tuesday, February 24, 2026

अपने ही ‘चक्रव्यूह’ में घिरने लगा ट्रंप-प्रशासन


अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को अवैध घोषित करके राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की योजना को जहाँ बड़ा धक्का पहुँचाया है, वहीं अमेरिका और दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर कई तरह की अनिश्चितताओं को जन्म भी दे दिया है.  

फैसले का एक निहितार्थ यह भी है कि वृहत स्तर पर अमेरिकी लोकतंत्र दुनिया पर एकपक्षीय राज करने का समर्थक नहीं है. और यह भी कि व्यापार-समझौते दोतरफा साझेदारी से तय होने चाहिए, एकतरफा अकड़ से नहीं. 

धक्का लगने के बावज़ूद ट्रंप की आक्रामकता में कमी नहीं आई है. उन्होंने फौरन एक नए आधार पर 10 प्रतिशत सार्वभौमिक टैरिफ की घोषणा कर दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है. पर इससे उनकी आर्थिक-रणनीति का लक्ष्य पूरा नहीं होगा.

ट्रंप के आर्थिक एजेंडा के कारण संघीय बजट में एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का छेद पैदा हो गया है. पिछले साल पदभार संभालने के बाद उन्होंने आयकर में भारी कटौती कर दी थी, जिसे लेकर अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी थी कि पहले से ही कर्ज़ में डूबे देश को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

जवाब में ट्रंप प्रशासन ने व्यापक रणनीति तैयार की, जिसके तहत शेष विश्व से अमेरिकी बाजारों में आने वाली सामग्री पर भारी टैरिफ लगाना शामिल है. इससे दुनियाभर के देशों की आर्थिक-गतिविधियाँ प्रभावित होने के अलावा कुछ बोझ निम्न और मध्यम आय वाले अमेरिकियों पर भी पड़ा, क्योंकि ज़रूरत की चीजें महँगी होने लगीं.   

Friday, February 20, 2026

एआई फिज़ूल सपना नहीं, उसमें दम है

 


दिल्ली में गलगोटिया विवि के रोबोटिक डॉग औरड्रोन सॉकर एरीनाके कारण हुई फज़ीहत के बाद कुछ लोग पूछ रहे हैं कि आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत वास्तव में क्या कुछ कर भी पाएगा? हमारे पास उसके लिए पर्याप्त तकनीकी आधार और टेलेंट है भी या नहीं? बहरहाल इस घटना ने सरकार समर्थित टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्मों पर स्वदेशी नवाचार की गलत व्याख्या की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है। साथ ही हमारे प्रचार-प्रिय सूचना तंत्र की पोल भी खोली है, जिससे सारी दुनिया में हमारी भद्द पिटी। सोशल-मीडिया के लिए ऐसी घटनाएँ चटपटे मसाले की तरह होती हैं, कुछ समय तक याद रहती हैं और फिर बिसरा दी जाती हैं। बहरहाल इस घटना ने हमें इसकी उपयोगिता और अपनी उपलब्धियों पर विचार करने की सलाह भी दी है।  

इसके पहले जनवरी में दावोस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जिवा की इस टिप्पणी को लेकर भी विवाद हुआ था कि भारत 'सेकंड-टियर' एआई पावर है। राजनीति-शास्त्री आयन ब्रेमर ने भी इस बात का हवाला देते हुए कहा था कि नए उभरते देशों को अमेरिका या चीन के साथ तालमेल बिठाना चाहिए। इन दोनों बातों का तीखा जवाब देते हुए भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, अश्विनी वैष्णव ने कहा, भारत एआई देशों क ‘साफ पहली कतार’ में है।

उन्होंने एआई आर्किटेक्चर की पाँच परतों के रूप में वर्णित भारत की प्रगति का विवरण दिया: एप्लीकेशन, मॉडल, चिप, बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा के सभी पाँच स्तरों पर ' भारत अच्छी प्रगति' कर रहा है। उन्होंने स्टैनफर्ड विवि की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत को एआई प्रवेश और तैयारियों में तीसरे स्थान पर और वैश्विक स्तर पर एआई प्रतिभा में दूसरे स्थान पर रखा गया है। बाद में आईएमएफ की चीफ ने इस विवाद को ठंडा करते हुए कहा कि संगठन भारत की एआई प्रगति के लिए भारी प्रशंसा करता है। उन्होंने इस गलतफहमी के लिए मॉडरेटर को दोषी ठहराया।

Wednesday, February 18, 2026

बांग्लादेश की ‘लोकतांत्रिक’ पेचीदगियाँ


शेख हसीना के अपदस्थ होने के 18 महीने बाद, बांग्लादेश में जन-प्रतिनिधि सरकार की स्थापना हो गई है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत के बाद अब वहाँ स्थिरता की उम्मीदें हैं.  

आम चुनाव के साथ संवैधानिक-सुधारों के लिए जनमत संग्रह भी हुआ है. तमाम बदलावों को जनता ने स्वीकार कर लिया है, पर असल सवाल है कि वास्तव में बांग्लादेश का लोकतंत्र कैसा होगा? वहाँ क्या शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की व्यवस्था कायम हो पाएगी?

नए सांसदों ने शपथ ले ली है, लेकिन संवैधानिक सुधार परिषद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई है क्योंकि बीएनपी सदस्यों ने सांसदों के रूप में शपथ तो ले ली, लेकिन प्रस्तावित परिषद के सदस्यों के रूप में शपथ नहीं ली. उन्होंने कहा कि संविधान में इस परिषद के लिए पद की शपथ लेने का कोई प्रावधान नहीं है.

यह सब मुहम्मद यूनुस की अस्थायी सरकार की देखरेख में हुआ, जो अपनी घोषणाओं के बावज़ूद बढ़ते सांप्रदायिक उन्माद और आर्थिक बदहाली को रोक नहीं पाई. भारत से रिश्ते बिगाड़ने में भी उसने कसर नहीं छोड़ी.  

दक्षिण एशिया में समावेशी-आधुनिकता और संकीर्ण सांप्रदायिक-प्रवृत्तियों का टकराव बड़ी समस्या है. भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में होने वाली घटनाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. तीनों के साझा अतीत में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों बातें हैं.

Wednesday, February 11, 2026

ईरान से झगड़े क्या निपटा पाएँगे ट्रंप?


दुनिया भर में धूम-धड़ाके के बाद क्या अब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ईरान के साथ अपने संघर्ष को खत्म करने जा रहे हैं? झगड़े निपटाने के माने क्या? ईरान की हार या बराबरी का समझौता?

बेशक, टकराव खत्म हुआ, तो इस इलाके की बड़ी समस्या खत्म हो जाएगी,  पर क्या ऐसा होगा? पिछले शुक्रवार को ओमान में हुई अप्रत्यक्ष-वार्ता के पहले दौर के बाद दोनों पक्षों ने इसे बहुत अच्छी शुरुआतबताया है.

यह बैठक मिस्र, तुर्की और खाड़ी देशों कोशिशों से तय हुई थी. इन देशों में से कोई भी क्षेत्रीय युद्ध नहीं चाहता. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप प्रशासन भी लड़ाई टालने के लिए ईरान के साथ बात करना चाहता है.

हालाँकि दोनों पक्षों ने संकेत दिया है कि बातचीत के दौर भविष्य में भी होंगे, पर यह स्पष्ट नहीं है कि वार्ता कैसे आगे बढ़ेगी. अमेरिका के काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष माइकल फ्रोमैन के अनुसार, भविष्य की बातचीत में कई दिक्कतें आएँगी. ट्रंप का मनमौजी स्वभाव है और तयशुदा सौदों को रद्द करने की उनकी आदत है.  

Thursday, February 5, 2026

वॉशिंगटन पोस्ट में भारी छँटनी से मीडिया जगत में हंगामा

प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट में बड़े पैमाने पर हुई छँटनी दुनियाभर के पत्रकारों के बीच चिंता का विषय बन गई है। जेफ बेजोस की इस कंपनी ने अपने 30 प्रतिशत कर्मचारियों को निकाल दिया है, जिनमें 300 से ज्यादा पत्रकार शामिल हैं। अखबार ने भारत, मिस्र और ऑस्ट्रेलिया समेत अनेक देशों के अपने दफ्तरों को बंद करने की घोषणा की है। इसका सबसे ज्यादा असर अखबार के स्पोर्ट्स, लोकल न्यूज और इंटरनेशनल कवरेज पर पड़ा है।

पोस्ट के कार्यकारी संपादक मैट मरे ने कहा है कि छँटनी से अखबार मे ‘स्थिरता’ आएगी। लेकिन इस घोषणा की अखबार के कर्मचारियों और कुछ पूर्व अमेरिकी नेताओं ने कड़ी निंदा की, जिनमें से एक ने इसे प्रतिष्ठित अखबार के ‘इतिहास के सबसे काले दिनों’ में से एक बताया है। कुछ का कहना है कि छँटनी बताती है कि इंटरनेट के मार्फत सामान बेचकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में जगह बनाने वाले जेफ बेजोस, मुनाफे वाला अखबार चलाने का सही तरीका नहीं ढूँढ पाए हैं। उनके मालिक बनने के शुरुआती आठ वर्षों में अखबार का विस्तार हुआ, लेकिन हाल में उसकी रफ्तार धीमी पड़ गई ।

अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक ने लिखा: हम एक हत्या के साक्षी बन रहे हैं।  पोस्ट के अरबपति मालिक जेफ बेजोस और उनके द्वारा 2023 के अंत में नियुक्त प्रकाशक विल लुईस, अखबार की हर उस खासियत को खत्म करने की अपनी योजना के नवीनतम चरण पर आगे बढ़ रहे हैं, जो इसे विशिष्ट बनाती है। द पोस्ट लगभग 150 वर्षों से अस्तित्व में है, एक स्थानीय पारिवारिक अखबार से विकसित होकर एक अपरिहार्य राष्ट्रीय संस्था और लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक स्तंभ बन गया है। लेकिन अगर बेजोस और लुईस इसी राह पर चलते रहे, तो शायद यह ज्यादा समय तक टिक न पाए।

पिछले कुछ वर्षों में, उन्होंने बार-बार न्यूज़ रूम में कटौती की है—रविवार की पत्रिका बंद कर दी, कर्मचारियों की संख्या में सैकड़ों की कमी की, मेट्रो डेस्क को लगभग आधा कर दिया—लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने वाले खराब व्यावसायिक निर्णयों को स्वीकार नहीं किया और न ही भविष्य के लिए कोई स्पष्ट योजना प्रस्तुत की। आज सुबह, कार्यकारी संपादक मैट मरे और एचआर प्रमुख वेन कॉनेल ने सुबह-सुबह एक वर्चुअल मीटिंग में न्यूज़ रूम के कर्मचारियों को बताया कि वे खेल विभाग और पुस्तक अनुभाग को बंद कर रहे हैं, अपने प्रमुख पॉडकास्ट को समाप्त कर रहे हैं, और अंतर्राष्ट्रीय और मेट्रो विभागों में भारी कटौती कर रहे हैं, साथ ही सभी टीमों में भी बड़े पैमाने पर छंटनी कर रहे हैं। पोस्ट के नेतृत्व—जिनमें अपने कर्मचारियों से व्यक्तिगत रूप से बात करने का साहस भी नहीं था—ने फिर सभी को एक ईमेल का इंतजार करने के लिए छोड़ दिया, जिसमें उन्हें बताया जाएगा कि उनकी नौकरी रहेगी या नहीं।

पोस्ट की छँटनी को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट

वॉशिंगटन पोस्ट ने बुधवार को कर्मचारियों को बताया कि वह छंटनी का एक व्यापक दौर शुरू कर रहा है, जिससे संगठन के खेल, स्थानीय समाचार और अंतर्राष्ट्रीय कवरेज को नुकसान पहुंचने की आशंका है। निर्णय की जानकारी रखने वाले दो लोगों के अनुसार, कंपनी अपने सभी कर्मचारियों में से लगभग 30 प्रतिशत को नौकरी से निकाल रही है। लोगों ने कहा कि इसमें व्यवसायिक पक्ष के लोग और न्यूज़ रूम के लगभग 800 पत्रकारों में से 300 से अधिक शामिल हैं।

कटौती इस बात का संकेत है कि जेफ बेजोस, जो इंटरनेट पर चीजें बेचकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बन गए, अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि इंटरनेट पर एक लाभदायक प्रकाशन कैसे बनाया और बनाए रखा जाए। उनके स्वामित्व के पहले कई वर्षों के दौरान अखबार का विस्तार हुआ, लेकिन कंपनी हाल ही में तेजी से आगे बढ़ी है।

 

द पोस्ट के कार्यकारी संपादक मैट मरे ने बुधवार सुबह न्यूज़ रूम के कर्मचारियों के साथ एक कॉल पर कहा कि कंपनी को बहुत लंबे समय से बहुत अधिक धन का नुकसान हुआ है और वह पाठकों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा कि सभी वर्ग किसी न किसी तरह से प्रभावित होंगे, और इसका परिणाम यह होगा कि एक प्रकाशन राष्ट्रीय समाचार और राजनीति के साथ-साथ व्यवसाय और स्वास्थ्य पर और भी अधिक केंद्रित होगा, और अन्य क्षेत्रों पर बहुत कम।

 

मरे ने कहा, ‘अगर कुछ भी हो, तो आज का दिन अधिक भीड़भाड़, प्रतिस्पर्धी और जटिल होते मीडिया परिदृश्य में लोगों के जीवन के लिए खुद को और अधिक आवश्यक बनने के लिए तैयार करना है।’’और कुछ वर्षों के बाद, स्पष्ट रूप से, द पोस्ट को संघर्ष करना पड़ा।’

मरे ने एक ईमेल में तर्क को आगे समझाते हुए कहा कि पोस्ट ‘एक अलग युग में निहित है, जब हम एक प्रमुख, स्थानीय प्रिंट उत्पाद थे’ और ऑनलाइन खोज ट्रैफ़िक, आंशिक रूप से जेनरेटिव एआई के उदय के कारण, पिछले तीन वर्षों में लगभग आधे से गिर गया था। उन्होंने कहा कि द पोस्ट का ‘दैनिक स्टोरी आउटपुट पिछले पांच वर्षों में काफी हद तक गिर गया है।’

उन्होंने कहा, ‘भले ही हम कई बेहतरीन काम करते हैं, हम अक्सर एक ही नजरिए से, दर्शकों के एक वर्ग के लिए लिखते हैं।’

पोस्ट का खेल अनुभाग बंद हो जाएगा, हालांकि इसके कुछ रिपोर्टर वहीं रहेंगे और खेल की संस्कृति को कवर करने के लिए फीचर विभाग में चले जाएंगे। पोस्ट का मेट्रो अनुभाग सिकुड़ जाएगा, और पुस्तक अनुभाग बंद हो जाएगा, साथ ही ‘पोस्ट रिपोर्ट’ दैनिक समाचार पॉडकास्ट भी बंद हो जाएगा।

मरे ने कर्मचारियों से कहा कि जबकि द पोस्ट का अंतरराष्ट्रीय कवरेज भी कम हो जाएगा, पत्रकार लगभग एक दर्जन स्थानों पर बने रहेंगे। पश्चिम एशिया के साथ-साथ भारत और ऑस्ट्रेलिया में रिपोर्टरों और संपादकों को नौकरी से हटा दिया गया।

उनके निर्णय की जानकारी रखने वाले दो लोगों के अनुसार, अनुभाग के संपादक, पीटर फिन ने अनुरोध किया कि जब उन्हें कटौती के दायरे के बारे में पता चला तो उन्हें कटौती की योजना बनाने में शामिल होने के बजाय हटा दिया जाए।

 

जैसे ही कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने की सूचना देने वाले ईमेल इनबॉक्स में आने लगे, द पोस्ट के पत्रकारों ने अपने सहकर्मियों को सूचित करना शुरू कर दिया कि उनके पदों में कटौती कर दी गई है। ‘हटा दिया गया,’ हटा दिया गया,’ ‘हटा दिया गया,’ उन्होंने एक दूसरे को संदेश भेजे।

बेजोस ने द पोस्ट के लिए फायदे का रास्ता खोजने के लिए 2023 के अंत में विल लुईस को प्रकाशक के रूप में नियुक्त किया, जो दर्शकों में गिरावट और घटती सदस्यता से पीड़ित था। लुईस ने संगठन को बदलने के लिए कई बदलावों का प्रयोग किया है, विशेष रूप से टिप्पणियों, पॉडकास्ट और समाचार एकत्रीकरण को सशक्त बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाया है।

उनका अधिकांश कार्यकाल उथल-पुथल भरा रहा है, जिसमें न्यूज रूम नेतृत्व में बदलाव और न्यूज कॉर्प के लिए काम करने के दौरान फोन-हैकिंग घोटाले में उनके संबंधों की जांच शामिल है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले, श्री लुईस ने द पोस्ट के संपादकीय बोर्ड द्वारा राष्ट्रपति पद के समर्थन को समाप्त करने के लिए श्री बेजोस की एक नई नीति की घोषणा की, जिसने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार, उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के मसौदा समर्थन को अवरुद्ध कर दिया। प्रतिक्रिया में सैकड़ों हजारों पोस्ट ग्राहकों ने अपनी सदस्यता रद्द कर दी।

2024 में एक स्टाफ मीटिंग में, लुईस ने आगाह किया कि पोस्ट संकट में है। उन्होंने कहा, ‘हम बड़ी मात्रा में पैसा खो रहे हैं।’ हाल के वर्षों में हमारे पाठक दर्शक आधे हो गए हैं। लोग आपकी सामग्री नहीं पढ़ रहे हैं।’

2024 के अंत में, बेजोस ने द न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में एक साक्षात्कार में संघर्ष का वर्णन किया: ‘हमने वाशिंगटन पोस्ट को एक बार बचाया, और हम इसे दूसरी बार बचाने जा रहे हैं।’

प्रॉफिट हासिल करने के संघर्ष में प्रकाशकों के बीच पोस्ट अकेला नहीं है। कई आउटलेट्स के लिए, प्रिंट सर्कुलेशन लगातार कम हो रहा है, जेनरेटर एआई के कारण डिजिटल ट्रैफिक में बाधा आ रही है और दर्शक विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर बंट गए हैं। घाटे की भरपाई के लिए प्रकाशकों को विभिन्न राजस्व धाराओं, जैसे इवेंट और प्रीमियम सदस्यता, के साथ प्रयोग करना पड़ा है।

 

‘यह अमेरिकी पत्रकारिता, वाशिंगटन शहर और पूरे देश के लिए एक दुखद दिन है,’ द पोस्ट के मुख्य आर्थिक संवाददाता जेफ स्टीन ने कहा, जो बुधवार को निकाले गए लोगों में से नहीं थे।

न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक बयान में उन्होंने कहा, ‘मैं उन पत्रकारों के लिए शोक मना रहा हूं जिन्हें मैं प्यार करता हूं और जिनके काम ने पेशे के सबसे सच्चे और सबसे महान आह्वान को बरकरार रखा है।’’उन्हें उन गलतियों के लिए दंडित किया जा रहा है जो उन्होंने नहीं कीं।’

डॉन ग्राहम, जिनके परिवार के पास आधी सदी से भी अधिक समय तक द पोस्ट का स्वामित्व था और उन्होंने वॉटरगेट को ब्रेक करने वाले पहले दर्जे के समाचार पत्र में इसके विस्तार की देखरेख की, ने फेसबुक पर एक पोस्ट में कहा कि उन्हें ‘पेपर पढ़ने का एक नया तरीका सीखना होगा, क्योंकि मैंने 1940 के दशक के अंत से खेल पेज के साथ शुरुआत की है।’

द पोस्ट के पूर्व कार्यकारी संपादक, मार्टी बैरन ने एक बयान में कहा कि बुधवार ‘दुनिया के सबसे महान समाचार संगठनों में से एक के इतिहास में सबसे काले दिनों में से एक है।’

बैरन ने लिखा, ‘वाशिंगटन पोस्ट की महत्वाकांक्षाएं तेजी से कम हो जाएंगी, इसके प्रतिभाशाली और बहादुर कर्मचारी और भी कम हो जाएंगे और जनता को हमारे समुदायों और दुनिया भर में जमीनी स्तर, तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग से वंचित कर दिया जाएगा, जिसकी पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है।’

इस अखबार में कांग्रेस के नेता शशि थरूर के पुत्र ईशान थरूर भी काम करते थे। उन्हें भी हटा दिया गया है। उन्होंने एक्स पर अपने ट्वीट में इस बात पर अफसोस व्यक्त किया है। पोस्ट के दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा ने एक्स पर पोस्ट किया:

यह बताते हुए बहुत दुख हो रहा है कि मुझे वाशिंगटन पोस्ट से हटा दिया गया है। मेरे कई प्रतिभाशाली दोस्त भी चले गए, उनके लिए दुख है। पिछले चार वर्षों से यहां काम करना सौभाग्य की बात है। अखबार के नई दिल्ली ब्यूरो प्रमुख के रूप में काम करना एक सम्मान की बात थी।

 


 

Wednesday, February 4, 2026

पश्चिम एशिया की भूल-भुलैया में भारत


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस महीने संभावित इसराइल-यात्रा से पहले, पिछले शनिवार को अरब विदेश मंत्रियों के साथ दूसरी बैठक की मेजबानी करके भारत ने स्पष्ट कर दिया कि पश्चिम एशिया में हमारी गहरी दिलचस्पी है और इस इलाके के आर्थिक-विकास में हम भी भागीदार हैं.

केवल इस इलाके की बात ही नहीं है, बल्कि विश्व-राजनीति में भी भारत की सक्रिय भूमिका बढ़ने जा रही है. यूके, ईयू और अमेरिका के साथ व्यापार और दीर्घकालीन नीतिगत समझौते होने के बाद यह स्पष्ट होता है कि भारत की अर्थव्यवस्था पश्चिमी देशों के साथ ज्यादा बड़े स्तर पर जुड़ने जा रहा है.

बेहतर तरीके से वैश्विक-संतुलन बनाने में भारत भी महत्त्वपूर्ण किरदार निभाएगा. अरब विदेशमंत्रियों की बैठक की पृष्ठभूमि में डॉनल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस के गठन और उसमें शामिल होने के लिए भारत को प्राप्त आमंत्रण और उसपर चुप्पी पर भी ध्यान देना होगा. अकसर लोगों को लगता है कि भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. पश्चिम एशिया की जटिलता को देखते हुए तीखी प्रतिक्रियाएँ संभव नहीं है. संज़ीदा डिप्लोमेसी से ऐसी उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए.

ध्यान दें कि गज़ा क्षेत्र के पुनर्निर्माण में भारत के लोगों और कंपनियों को भी काम मिलेगा. दूसरी तरफ ईरान में चल रहे आंदोलन और उसे लेकर अमेरिकी धमकियों पर भी हमें निगाहें रखनी होंगी. विदेश-नीति केवल नैतिक-आधारों पर नहीं चलती हैं. वे राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है. पश्चिम एशिया की डगर आसान नहीं है, क्योंकि वहाँ हर कदम पर जोखिम हैं, फिर भी भारतीय डिप्लोमेसी वहाँ संतुलित और शालीन तरीके से आगे बढ़ रही है.

Tuesday, February 3, 2026

राज्यपालों की भूमिका पर फिर खिंचीं तलवारें


तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक विधानसभाओं में राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच टकराव की खबरें इस साल भी आई हैं। ऐसा किसी न किसी रूप में पिछले कुछ वर्षों से हो रहा है। वर्तमान टकराव राज्य सरकारों द्वारा तैयार किए गए अभिभाषणों के पढ़ने से जुड़ा है। प्रत्यक्षतः ऐसा अनजाने में नहीं हो रहा है। इन मामलों से जुड़े सभी पक्ष संवैधानिक व्यवस्थाओं और उनसे जुड़ी मर्यादा-रेखाओं से भली भाँति परिचित हैं। राज्यपाल जानते-समझते हैं और राज्य सरकारें भी। तब ऐसा क्यों होता है?

इन राज्यों में मुख्यमंत्री और राज्यपालों के रिश्ते काफी समय से तनावपूर्ण रहे हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन कई बार स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर होने वाले राज्यपालों के ‘एट होम’ कार्यक्रमों का बहिष्कार कर चुके हैं। मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच सीधा संवाद बहुत कम है। इस वक्त तो चुनाव करीब हैं, इसलिए माहौल में वैसे ही गर्मी भरी है।

दक्षिण के जिन तीन राज्यों में विवाद खड़े हुए हैं, उनमें इंडिया गठबंधन का हिस्सा रही पार्टियों की सरकारें हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी केंद्र सरकार के विरोध में हैं। ऐसे विवाद होते ही तभी हैं, जब केंद्र और राज्य की सरकारों का आपसी विरोध हो। बंगाल और पंजाब में भी इससे मिलते-जुलते प्रकरण हुए हैं।

राज्यपालों या राष्ट्रपति के लिए निर्वाचित सरकारों द्वारा तैयार किए गए भाषणों या विशेष संबोधनों को हूबहू पढ़ना एक संवैधानिक परंपरा है। यह ब्रिटिश परंपरा है, जिसपर आधारित भारत की संसदीय प्रणाली में भी उन्हीं परंपराओं के पालन की उम्मीद की जाती है। ऐसा कभी नहीं हुआ, जब ब्रिटिश राजा या रानी ने आधिकारिक भाषण को लेकर ना-नुकुर की हो।

Monday, February 2, 2026

‘नए हाईस्पीड भारत’ का रचनात्मक बजट


वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण के पहले वाक्य से ही नए भारत के निर्माण की घोषणा की है, जिसमें पाँच नए क्षेत्रीय मेडिकल हब, तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान और पाँच विश्वविद्यालय टाउनशिप, सात नए हाई स्पीड ट्रेन कॉरिडोर और एक नया फ्रेट कॉरिडोर शामिल हैं। आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी, तेज शहरीकरण, परिवहन, इंफ्रास्ट्रक्चर, सेवा क्षेत्र का विस्तार, उच्च शिक्षा, मेडिकल टूरिज़्म, नाभिकीय ऊर्जा और ज्ञान-आधारित ऑरेंज इकोनॉमीनए भारत के ग्रोथ इंजन बनकर उभर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद आधुनिकीकरण की ज़रूरतों को देखते हुए रक्षा-व्यय में करीब 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गई है।

उन्होंने डायरेक्ट टैक्स और कस्टम ड्यूटी प्रणाली में बड़े बदलावों की घोषणा की है। अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की अनिश्चितता और 50 फीसदी टैरिफ के असर को कम करने के लिए भी उन्होंने कुछ उपायों की घोषणा की है। उन्होंने कच्चे माल पर कस्टम ड्यूटी में कटौती, कंटेनर निर्माण और टेक्सटाइल मशीनरी के आधुनिकीकरण के लिए पूँजीगत सहायता की घोषणा की। हालाँकि आयकर में कमी की कोई घोषणा नहीं है, पर कहा है कि नया इनकम टैक्स क़ानून एक अप्रैल, 2026 से लागू होगा। आयकर नियमों को और आसान बनाया जा रहा है, जिन्हें जल्द अधिसूचित किया जाएगा।

12.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के भारी पूँजी निवेश के बावज़ूद आगामी वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 4.3 प्रतिशत के नीचे आने की आशा है। कोविड काल में यह घाटा नौ प्रतिशत के ऊपर चला गया था। देश का ऋण-जीडीपी अनुपात घटकर 55.6 प्रतिशत होने की आशा है, जो चालू वित्तवर्ष के संशोधित अनुमानों में 56.1 फीसदी है। इससे पूँजी की उपलब्धता बेहतर होने की आशा है।  

Wednesday, January 28, 2026

‘ट्रंप-टैंट्रम’ के बाद यूरोप से ‘मदर ऑफ ऑल डील्स!’

गणतंत्र दिवस की परेड एक तरफ भारत की सांस्कृतिक-विविधता और सामरिक शक्ति का प्रदर्शन करती है, वहीं विदेश-नीति की झलक भी पेश करती है. कम से कम इस साल ऐसा ही हुआ है.

इस साल मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय संघ को बुलाया गया. यह पहला मौका था, जब 27 देशों के संघ को मुख्य अतिथि बनने का आमंत्रण दिया गया. 27 जनवरी को नई दिल्ली में यूरोपीय संघ के साथ एक व्यापार समझौते पर दस्तखत हो गए.

ईयू का प्रतिनिधित्व, यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय कौंसिल के प्रेसीडेंट एंटोनियो कोस्टा ने किया. उर्सुला वॉन डेर लेयेन, जहाँ जर्मनी की रक्षामंत्री रह चुकी हैं, वहीं भारतीय मूल के कोस्टा पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री हैं.

स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक फोरम में शिरकत करते हुए उर्सुला वॉन डेर लेयेन कह चुकी हैं कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ होने जा रही है.

रक्षा और रणनीतिक भी

यह केवल व्यापार समझौता ही नहीं होगा, बल्कि रक्षा और दूसरे रणनीतिक मसलों पर भी सहमतियाँ बनने जा रही हैं. उर्सुला ने कहा कि यूरोप, अरब प्रायद्वीप के रास्ते महाद्वीप को भारत से जोड़ने वाले एक नए व्यापारिक गलियारे में निवेश करेगा.

Monday, January 26, 2026

चुनाव आयोग की साख और ममता की आक्रामक राजनीति की परीक्षा


पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया राजनीतिक-विवाद का विषय बन गई है, वैसे ही जैसे बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले हुआ था। ममता बनर्जी ने इसे ऐसे राजनीतिक हथियार के रूप में पेश किया है, जो खासतौर से गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और अन्य कमजोर समुदायों के मतदाताओं को निशाना बनाता है, जिनके पास अक्सर सही दस्तावेज या स्थिर पते नहीं होते हैं।

निर्वाचन आयोग के अनुसार एसआईआर का उद्देश्य डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना, त्रुटियों को ठीक करना और यह सुनिश्चित करना है कि पात्र मतदाताओं के नाम ही सूची में रहें। आयोग ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि पश्चिम बंगाल में सूची का सत्यापन कर रहे चुनाव-कर्मचारियों के लिए धमकी भरे माहौल में काम करना मुश्किल हो रहा है। उसने राज्य की मुख्यमंत्री पर उत्तेजक भाषण देने, एसआईआर के बारे में भ्रामक दावे करने और जनता के मन में संदेह पैदा करने का आरोप लगाया है।

यह मसला अब सुप्रीम कोर्ट में है, जिसे तय करना है कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता की रक्षा कैसे की जाए और उसके अधिकारियों के लिए सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों को कैसे सुनिश्चित किया जाए। साथ ही यह भी कि वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से कटने से किस प्रकार रोके जाएँ। क्या आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है, जिसमें गलत तरीके से हटाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय हैं? और यह भी कि राज्य सरकार क्या संविधानिक संस्थाओं की आलोचना से जुड़ी मर्यादा-रेखा पार कर चुकी है?

Saturday, January 24, 2026

ग्रोकीपीडिया क्या है?

एलन मस्क की कंपनी एक्सएआई ने एआई-पावर्ड ऑनलाइन एनसाइक्लोपीडिया तैयार किया है, जिसका नाम ग्रोकीपीडिया है। इससे तथ्यों की खोज में एआई की संभावनाओं का पता भी लगेगा। विकीपीडिया का संकलन मनुष्य करते हैं, जबकि इसमें एआई यह काम करता है। 27 अक्टूबर 2025 को इसका वर्ज़न 0.1 लॉन्च किया गया था, जो अब 0.2 है। एक्सएआई के ग्रोक एआई मॉडल के अनुसार यह जानकारी को तेजी से और ट्रुथफुल (सत्य) अपडेट करता है। शुरुआत में इसके कई आलेख विकिपीडिया से, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के तहत, सीधे लिए गए हैं। कुछ में बदलाव भी किए गए हैं। लॉन्च के समय इसमें 8.85 लाख लेख थे, जो अब साठ लाख से ऊपर हैं। एलन मस्क का कहना है कि विकिपीडिया में लेफ्ट-विंग बायस (वामपंथी पक्षधरता) है, पर ग्रोकीपीडिया ज्यादा निष्पक्ष और तथ्य-आधारित होगा। यह वैबसाइट grokipedia.com पर उपलब्ध है, जहाँ सर्च बार से टॉपिक सर्च कर सकते हैं। यह सर्च केवल अंग्रेजी में उपलब्ध है। शुरुआती रिपोर्ट्स कहा गया कि इसके कुछ लेखों में तथ्यात्मक गलतियां हैं, स्रोत कम हैं, या राइट-विंग दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया गया है। अभी तक किसी और संस्था ने ऐसा पूर्ण एआई-जेनरेटेड विश्वकोश लॉन्च नहीं किया है।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में 24 जनवरी 2026 को प्रकाशित

Wednesday, January 21, 2026

अमेरिका ने ईरान पर हमले से हाथ क्यों खींचे?

ईरान के सेनाधिकारी

ईरान में करीब तीन हफ्ते से ज्यादा समय तक चला झंझावात पिछले हफ्ते  धीमा पड़ गया. इसके पीछे कई तरह के कयास हैं. यह किसी नए तूफान से पहले का ठहराव है या स्थायी शांति की तैयारी. या फिर साबित यह हुआ कि ट्रंप के बादल गरजते ज्यादा है, बरसते कम है.  

मोटे तौर पर लगता है कि दोनों पक्षों ने हाथ खींचे हैं. खबरें हैं कि ईरानी शासन ने बड़े पैमाने पर दमन करके प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त कर दिए हैं. देश में कई सौ लोगों को सामूहिक रूप से फाँसी देने की तैयारी थी.

फाँसियाँ होतीं, तो टकराव बढ़ जाता, जिससे घबराकर ईरान ने हाथ खींच लिए. ट्रंप ने कहा था, फाँसियाँ हुईं तो अमेरिका हमला बोलेगा. इस बात की पुष्टि करते हुए वॉशिंगटन पोस्ट ने वाइट हाउस के एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट छापी है, कि ईरान सरकार के एक संदेश के बाद 'राष्ट्रपति ट्रंप ने हमले के फ़ैसले को रद्द कर दिया.'

अख़बार के मुताबिक़, ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची की ओर से ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ को भेजे गए संदेश ने माहौल को शांत किया और संकट को टाला. संदेश में कहा गया था कि ईरान सरकार का प्रदर्शनकारियों को फाँसी देने का कोई इरादा नहीं है.

अख़बार ने राजनयिक के हवाले से कहा है कि सऊदी अरब, क़तर, ओमान, मिस्र और यूएई जैसे आसपास के कुछ देशों ने वाइट हाउस से अनुरोध किया कि ईरान पर हमला नहीं किया जाए. जेरूसलम पोस्ट की खबर के अनुसार इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी ट्रंप से कहा कि जल्दबाज़ी में हमला न करें. 

सेना तैयार नहीं थी

दूसरी तरफ ऐसी खबरें भी आईं कि गुरुवार की शाम होते-होते स्पष्ट होने लगा था कि पारा ठंडा हो रहा है. अमेरिका ने क़तर में अपने अल-उदैद एयर बेस पर सुरक्षा अलर्ट का स्तर घटा दिया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक सूत्र के हवाले से खबर दी कि बुधवार को जिन अमेरिकी लड़ाकू विमानों को इस बेस से हटा लिया गया था, वे अब धीरे-धीरे वापस लौट रहे हैं.

लंदन के अख़बार 'द टेलीग्राफ़' ने ख़बर दी कि अमेरिकी सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी. इस ख़बर के मुताबिक़ ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा टीम को निर्देश दिया कि वे कार्रवाई तभी करें, जब निर्णायक प्रहार की गारंटी दे सकें.

अधिकारियों ने कहा कि वे ऐसी गारंटी नहीं दे सकते और यह भी कहा कि फौजी कार्रवाई करेंगे, तो बड़ी लड़ाई शुरू हो सकती है, जो हफ़्तों तक चल सकती है.

अखबार ने एक और खबर में लिखा, ट्रंप का कोई भरोसा नहीं. उन्होंने मंगलवार को प्रदर्शनकारियों से कहा, मदद रास्ते में है. उसके 24 घंटे बाद वह यह कहते हुए पीछे हट गए कि ईरान सरकार अब अपने विरोधियों को मार नहीं रही है, और गिरफ्तार लोगों को फाँसी नहीं दी जाएगी.

बहरहाल अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को इस तरफ भेजा है, जिससे लगता है कि वह दबाव बनाकर रखेगा.   

ट्रंप पर आरोप

शनिवार को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई ने माना कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई हजार लोग मारे गए हैं. अभी तक ईरान सरकार कह रही थी कि आंदोलन की अफवाहें हैं, वास्तविकता कम. अब मौतों को लेकर आधिकारिक स्वीकृति उसकी भयावहता को बताती है.

आयतुल्ला खामनेई ने देश में हताहतों, विनाश और उथल-पुथल के लिए डॉनल्ड ट्रंप को सीधे दोषी ठहराया. उन्होंने कहा, ईरानी राष्ट्र को हुई क्षति और बदनामी के लिए हम उन्हें अपराधी मानते हैं.

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, इस उत्पात में अमेरिकी राष्ट्रपति व्यक्तिगत रूप से शामिल थे. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संदेश भेजा कि हम आपको फौजी मदद देंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति खुद इस देशद्रोह में शामिल हैं. यह आपराधिक कृत्य हैं.

खामनेई के इस आरोप के जवाब में ट्रंप ने फिर कहा कि ईरान को आयतुल्ला के लंबे शासन को समाप्त करते हुए नए नेतृत्व की तलाश करनी चाहिए. वे देश के विनाश और जनता के विरुद्ध ऐसी हिंसा के प्रयोग के दोषी हैं, जैसी पहले कभी नहीं हुई.

अमेरिका ईरान पर सैनिक कार्रवाई करेगा या नहीं, इसके बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा, फिलहाल उन्होंने अच्छा काम यह किया है कि 800 से अधिक लोगों को फाँसी देने का फैसला रोक दिया है.

कनेक्टिविटी बहाल

अब खबरें आ रही हैं कि ईरान ने आंशिक रूप से इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी. अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर ने कहा कि कुछ उपयोगकर्ता ऑनलाइन वापस आ गए हैं, एसएमएस सेवाएँ फिर से शुरू हो गई हैं.

इंटरनेट निगरानी समूह नेटब्लॉक्स ने कहा कि 200 घंटे से अधिक समय तक लगभग पूरी तरह बंद रहने के बाद कनेक्टिविटी कुछ बेहतर हुई है, लेकिन यह सामान्य के लगभग दो प्रतिशत पर है.

ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा है कि विदेश से से निर्देशित हो रहे आतंकवादी अभियानों को रोकने के मक़सद से इंटरनेट को बंद किया गया है, पर उन्होंने या सरकार ने यह नहीं बताया है कि इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह कब वापस आएँगी.

मीडिया रिपोर्टों से ऐसा संकेत भी मिला है कि ईरानी अधिकारी इसे स्थायी रूप से प्रतिबंधित करने या चीन की तरह नियंत्रित करने की योजना बना रहे हैं.

ईरान इस समय दुनिया की सबसे खराब मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है, जो 50 प्रतिशत से अधिक और खाद्य सामग्री के मामले में 70 प्रतिशत है. उसकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले 80 प्रतिशत से अधिक गिर गई है.

आंदोलन का क्या होगा?

सवाल है कि क्या ईरान के भीतर आंदोलन चलेगा या खत्म हो जाएगा? अमेरिका के तमाम पर्यवेक्षकों का कहना है कि अमेरिका को सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि आंदोलन के प्रभाव को देखना चाहिए. ट्रंप प्रशासन को यह नहीं मान लेना चाहिए कि ईरान सरकार इस विस्फोट को दबा लेगी.

आंदोलन और हिंसा के बाद स्थितियाँ चाहे, जिस दिशा में जाएँ, राज-व्यवस्था वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी अभी तक चल रही थी. इसके पहले 1953 और 1979 में ईरान ने दो बड़े बदलाव देखे

1979 के पिछले बदलाव में ईरान के लोग तीन बड़े आदर्शों को लेकर खड़े हुए थे: आज़ाद राज व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय. उस क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति, रूस की बोल्शेविक क्रांति और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विश्व की सबसे महान क्रांतियों में गिना जाता है.

रसूख में कमी

पिछले कुछ वर्षों से देश में सरकारी रसूख कम हुआ है. विरोध के स्वर तेज हुए हैं. सितंबर 2022 में महिलाओं के लिए देश के ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार ईरानी-कुर्द महिला महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. उनके दमन के लिए सरकार ने सख्ती का सहारा लिया था.

क्या अब वही सख्ती काम करेगी? खबरें हैं कि लोगों के मन से अब डर निकल गया है. पर क्या वे निर्णायक जीत हासिल कर पाएँगे? या सरकारी दमन के भय से पूरी तरह दब जाएँगे? सरकार के समर्थन में भी रैलियाँ हुई हैं.

ज्यादा बड़ा सवाल है कि क्या सत्ता परिवर्तन होगा? मान लिया अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप से परिवर्तन हो भी जाए, तो उसके बाद क्या होगा? अमेरिका दूध का जला है. क्या गारंटी है कि ईरान में भी वैसी ही अराजकता पैदा नहीं होगी, जैसी इराक, लीबिया और अफगानिस्तान में हो गई?

सरकारी कामयाबी?

दूसरी तरफ क्रूरता के सहारे विरोध को दबाने में सरकार कामयाब हो भी जाए, तब भी उसके पास आम ईरानियों के जीवन स्तर में सुधार करने और महिलाओं के बीच जन्म लेते विरोध का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं है. इस आंदोलन के छींटे कमोबेश पश्चिम एशिया के कुछ और देशों पर भी पड़ेंगे.  

ईरान में सर्वोच्च सत्ता 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खामनेई के हाथों में है. वे अपने सबसे वफादार बलों से घिरे हुए हैं, जिनमें इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर भी शामिल है. उसका ईरान की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सुरक्षा पर दबदबा है.

आंदोलनकारियों का कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं है. इस दौरान पुरानी राजशाही के पक्ष में भी नारे लगे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप से ईरान में हस्तक्षेप करने का आह्वान करने वालों में निर्वासित पूर्व युवराज रज़ा पहलवी भी शामिल हैं, जिनके पिता को 1979 की इस्लामी क्रांति में ईरान के शाह के पद से हटा दिया गया था.

शांतिपूर्ण परिवर्तन?

समझदार लोगों का मानना ​​है कि स्थायी परिवर्तन तभी आ सकेगा, जब वह शांतिपूर्ण होगा, और देश के भीतर से ही हो. लोगों में बदलाव की इच्छा है, पर कैसा बदलाव? कुछ लोग परिचित या पुराने प्रतीकों की ओर लौट रहे हैं. सिंह और सूर्य वाले ईरान के क्रांति-पूर्व ध्वज एक बार फिर सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं.

पहलवी ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि वे ईरान में राजशाही को बहाल नहीं करना चाहते. उनका दावा है कि वे एक ऐसे परिवर्तन का नेतृत्व करना चाहते हैं जो ईरान को लोकतंत्र की ओर ले जाए.

दो हफ्ते पहले, जब देश की मुद्रा के तीव्र अवमूल्यन के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे थे, तब अधिकारियों ने उनकी शिकायतों को जायज़ माना था, पर अब वे उन्हें आतंकवादी बता रहे हैं. पिछले दो हफ्तों में, शहरों के बाज़ारों और विश्वविद्यालयों में छोटे-छोटे प्रदर्शन एक बड़े जनांदोलन में बदल गए हैं.

सरकारी समझदारी

28 दिसंबर को, तेहरान में आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाले व्यापारी देश की करेंसी के अचानक और तेज़ अवमूल्यन से हैरान रह गए. उन्होंने अपनी दुकानें बंद कर दीं और हड़ताल पर चले गए, और बाज़ार के अन्य व्यापारियों से भी उनका साथ देने का आह्वान किया.

सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया त्वरित और समझौते वाली थी. राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने व्यापारियों से बातचीत करने का वादा किया. आम लोगों की तकलीफों को कम करने के लिए हरेक के बैंक खाते में लगभग सात डॉलर का नया भत्ता जमा किया गया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ. चीजों की कीमतें और बढ़ गईं और प्रदर्शनों की लहर और तेज़ हो गई.

पश्चिम एशिया के अन्य देशों के मुकाबले ईरानी जनता, सुशिक्षित, जागरूक और अनुशासित है. यह दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक है.

ईरानी क्रांति

1979 की ईरानी क्रांति ने पहलवी राजवंश का अंत किया और आयतुल्ला खुमैनी को नए धर्मतंत्र का प्रमुख बनाया. वहाँ सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम होते हैं, पर शासन एक निर्वाचित राष्ट्रपति चलाता है.

उस क्रांति का उद्देश्य अमेरिकी प्रभुत्व को समाप्त करना, राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देना और संपदा के वितरण के लिए एक निष्पक्ष प्रणाली स्थापित करना था.

क्रांति के 47 वर्षों के बाद, ईरान के बहुत से नागरिक नई व्यवस्था को उन आदर्शों के वाहक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विफलता के रूप में देखते हैं. इस दौरान राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताएँ कम हो गईं. उनकी जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद भी निगरानी और दमन की शिकार हो गई.

नए ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ शुरू से ही रंजिश मोल ले ली. अपने नाभिकीय-कार्यक्रम के कारण वह विवादों में घिर गया और फिर इराक, लेबनॉन, सीरिया और फलस्तीन में पैर फँसा दिए. इससे उसकी अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा.

पश्चिमी हस्तक्षेप

अंतिम बादशाह शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिका और इसराइल के करीबी सहयोगी थे. तख्त पर उनकी वापसी भी अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से हुई थी, जिन्होंने 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्देक़ का तख्ता-पलट कराया था.

इस क्रिया की प्रतिक्रिया होनी थी. जनता के मन में विरोध ने जन्म ले लिया था. परिणाम यह हुआ कि ईरान में इस्लामिक-क्रांति ने जन्म लिया, जिसके कारण 1979 में आयतुल्ला खुमैनी की वापसी हुई.

1979 की क्रांति में वामपंथियों ने भी शाह के शासन के खिलाफ एकजुट विपक्ष का हिस्सा बनकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें मार्क्सवादी और वामपंथी इस्लामी समूह शामिल थे. क्रांति के बाद आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में वामपंथियों को दबा दिया गया. उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया, जिसके बाद धार्मिक सत्तावादी शासन स्थापित हुआ.

वर्तमान राजव्यवस्था का सिद्धांत है ‘विलायत-ए-फ़कीह.’ यानी फ़कीह (इस्लामी न्यायविद) का संरक्षण, जो शिया वैचारिक-आधारशिला से जुड़ा है. मौजूदा वली-ए-फ़कीह (संरक्षक न्यायविद-गार्डियन ज्यूरिस्‍ट) आयतुल्ला अली खामनेई हैं. सवाल है कि क्या वे ऐसी व्यवस्था कायम कर पाएँगे, जो सर्वस्वीकृत हो?

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

Friday, January 16, 2026

दक्षिण में चुनावी बयार और भाषा की राजनीति


तमिलनाडु में इन दिनों दो फिल्में चर्चा का विषय हैं। एक है फिल्म अभिनेता से राजनेता बने विजय की जन नायकन और दूसरी शिवकार्तिकेयन की पराशक्ति।दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सुपरस्टार विजय ने करीब डेढ़ साल पहले ‘तमिषगा वेत्री कषगम’ (टीवीके) नाम से पार्टी बनाकर राजनीति में प्रवेश किया है। दूसरी तरफ पराशक्ति अपनी एंटी-हिंदी थीम के कारण चर्चित है। दोनों को फिल्म सेंसर बोर्ड की कुछ आपत्तियों का सामना करना पड़ा है। इस वजह से जन नायकन रिलीज़ नहीं हो पाई, जबकि पराशक्ति करीब बीस बदलाव करके रिलीज़ हो गई है।

तमिल राजनीति में दोनों फिल्मों के गहरे निहितार्थ हैं। हालाँकि विजय पेरियार के रास्ते पर चलने का दावा करते हैं और राज्य की द्रविड़ पार्टियों की भाषा नीति के पक्षधर हैं, पर वे सत्तारूढ़ डीएमके के सामने चुनौती के रूप में उभर कर आना चाहते हैं। उनकी फिल्म की थीम जनता के बीच से उभर कर आए ऐसी ही नेता पर केंद्रित है। इसमें जनता के नायक की अवधारणा, विजय के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है।  

तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा के कलाकारों का बोलबाला पचास के दशक से ही शुरू हो गया था। वहाँ की ‘कटआउट’ संस्कृति में ‘आसमानी कद’ के राजनेता सिनेमा के पर्दे से आए। तमिलनाडु शायद अकेला ऐसा राज्य है, जहाँ लगातार पाँच मुख्यमंत्री सिनेमा जगत से आए। केवल कलाकारों की बात ही नहीं है, वहाँ की फिल्मों की स्क्रिप्ट में द्रविड़ विचारधारा को डालने का काम भी किया। 1952 की फिल्म ‘पराशक्ति’ ने द्रविड़ राजनीतिक संदेश जनता तक पहुँचाया था। इस फिल्म का स्क्रीनप्ले और संवाद के करुणानिधि ने लिखे थे, जो बाद में राज्य के मुख्यमंत्री बने।