Tuesday, September 22, 2026

ट्रंप की ‘ग्राहम लिंडसे तलवार’?


अमेरिकी संसद से हाल में पास हुए ग्राहम लिंडसे विधेयक की गाज भारत पर गिरेगी या नहीं गिरेगी, इसे लेकर अटकलें ही हैं, पर इतना साफ है कि दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व को बनाए रखने की यह एक और कोशिश है.

डॉनल्ड ट्रंप मानते हैं कि यूक्रेन की लड़ाई रोकने के लिए रूस को कमज़ोर करना ज़रूरी है और इसके लिए सबसे बड़ा हथियार आर्थिक पाबंदियाँ हैं.

पिछले साल शुरू हुए अपने टैरिफ-संग्राम में ट्रंप ने भारत को रूसी पेट्रोलियम की खरीद के नाम पर घसीटा. अब वे ग्राहम लिंडसे की तलवार घुमाएँगे.  

हालाँकि भारत की तुलना में चीन ने रूस से ज्यादा मात्रा में पेट्रोलियम का आयात किया है, पर ट्रंप की तलवारबाज़ी चीन के खिलाफ उतनी चपल नहीं होती है, जितनी तेजी से भारत के खिलाफ चलती है.

वजह भी साफ है. चीन के पास भी अमेरिका को अर्दब में लेने के आर्थिक और तकनीकी औजार हैं. वह भारत से बेहतर स्थिति में है. इस वजह से दोनों एक-दूसरे से सीधे पंगा लेने में सतर्कता बरत रहे हैं.

इस हफ्ते 24 सितंबर को ट्रंप और सी चिनफिंग की वार्ता में स्पष्ट हो जाएगा कि अमेरिका-चीन टकराव वास्तव में होगा, या ‘नूरा-कुश्ती’ चलती रहेगी.

Saturday, September 19, 2026

ट्रंप-परिवार की कंपनी पाकिस्तान को बेचेगी ड्रोन

फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ वेलिकोविच।

डॉनल्ड ट्रंप के परिवार से जुड़ी अमेरिकी ड्रोन कंपनी पावरयूएस ने पाकिस्तानी सेना के साथ एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत वह ड्रोन और उनसे जुड़ी तकनीक पाकिस्तानी सेना को प्रदान करेगी। कंपनी के को-फाउंडर ब्रेट वेलिकोविच ने बुधवार 16 सितंबर को समाचार एजेंसी रॉयटर्स को यह जानकारी दी।

वेलिकोविच ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इस बारे में विस्तार से जानकारी देने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्होंने बताया कि यह डील 'अनमैन्ड एरियल सिस्टम' यानी बिना पायलट वाले हवाई सिस्टम की श्रेणी में आती है। वेलिकोविच ने कहा, ‘लक्ष्य है एक संयुक्त प्रौद्योगिकी संबंध स्थापित करना, जिसमें अमेरिका की सर्वश्रेष्ठ प्रौद्योगिकी को पाकिस्तान की सर्वश्रेष्ठ प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ा जाएगा।’

Friday, September 18, 2026

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में कड़वाहट और बढ़ी


‘चीन-पाकिस्तान सीमा’ का तमाशा और पोतों का टकराव

भारत और पाकिस्तान के बीच दो दिन में लगातार दो ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जिनसे रिश्तों में कड़वाहट बढ़ती हुई नज़र आ रही है। इसमें एक घटना में चीन की भूमिका भी है। इनमें पहली घटना है गत 15 सितंबर को उत्तरी अरब सागर में भारत और पाकिस्तान के युद्धपोतों का टकराव। और दूसरी घटना है उसके अगले ही दिन 16 सितंबर को ‘पाकिस्तान और चीन के सीमा-आयोग को सक्रिय’ करने का फैसला।

गत 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के हाशिए पर चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच संवाद से पर्यवेक्षकों नें अनुमान लगाया था कि दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को गति मिलने वाली है। हालाँकि पर्यवेक्षकों ने दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास को लेकर भी संदेह व्यक्त किया था।

भारत ने पाक-चीन सीमा-आयोग को खारिज करते हुए, उसे ‘नाटक’ करार दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में पाकिस्तान और चीन के बीच सीमा के अस्तित्व से स्पष्ट रूप से इनकार किया और कहा कि आयोग ‘बिना किसी कानूनी आधार के बना लिया गया है। भारत ने इस बात को दोहराया कि जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के संपूर्ण केंद्र शासित प्रदेश भारत के ‘अविभाज्य’ अंग हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संपूर्ण केंद्र शासित प्रदेश भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग रहे हैं, हैं और हमेशा रहेंगे। पाकिस्तान को अपने अवैध और जबरन कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र से संबंधित किसी भी समझौते में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं है’।

लिंडसे ग्राहम बिल की भारत-अमेरिका रिश्तों पर छाया

गत 16 सितंबर को अमेरिकी संसद ने एक व्यापक विधेयक पारित किया जिसका उद्देश्य यूक्रेन के खिलाफ रूसी युद्ध को मदद देने वाली वित्तीय-व्यवस्था को तोड़ना है। एक साल से अधिक समय से चल रहे विरोध को पार करते हुए, संसद ने राष्ट्रपति ट्रंप को एक ऐसा विधेयक भेजा है, जिसके आधार पर वे मॉस्को पर कड़े नए प्रतिबंध लगा सकते हैं।

'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' अमेरिकी राष्ट्रपति को मॉस्को से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अभूतपूर्व शक्तियाँ प्रदान करता है। वे चीन और भारत सहित उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकते हैं, जो रूसी तेल या गैस के शीर्ष पाँच खरीदारों में शामिल हैं, और तथाकथित 'अवैध जहाजों के बेड़े' के प्रमुख सूत्रधार हैं, जिनका उपयोग रूस के तेल निर्यात पर प्रतिबंधों से बचने के लिए किया जाता है।

भारत पर असर

हालाँकि विधेयक पारित हो जाने के बाद यह टैरिफ अपने आप नहीं लग जाएगा, बल्कि अब यह ट्रंप पर निर्भर करेगा कि वे किसपर, कितना और कब टैरिफ लगाएँगे। अलबत्ता भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है, ‘भारत अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है।’ इसके साथ ही भारत ने अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर संभावित प्रभावों की चेतावनी भी दी। विदेश मंत्रालय ने एक बयान में इस बात पर जोर दिया है कि इस मुद्दे पर हाल के महीनों में विभिन्न अमेरिकी वार्ताकारों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा की गई है।

Tuesday, September 15, 2026

पश्चिम और भारतीय नज़रिए में ब्रिक्स


ब्रिक्स समूह का दिल्ली शिखर-सम्मेलन जिस मापदंड पर सफल रहा है, वह है ‘नई दिल्ली घोषणा’, जो सर्वानुमति से जारी हो गई. इससे संकेत मिलता है कि ब्रिक्स का काफी समय भू-राजनीति की विसंगतियों को दूर करने में लगा है.  

सम्मेलन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की उपस्थिति के बावज़ूद पश्चिम एशिया की लड़ाई से संदर्भ में कोई अड़चन नहीं आई. यह डिप्लोमेटिक सफलता है, क्योंकि इसे लेकर कई तरह के अंदेशे थे.

अंतिम घोषणापत्र उस संतुलन को दर्शाता है, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे युद्धों और तनावों को संबोधित किया गया है, लेकिन किसी एक देश को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना गया है.

सम्मेलन के समांतर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत-यात्रा और नरेंद्र मोदी के साथ उनकी वार्ता को भी इन उपलब्धियों में शामिल किया जाएगा, पर वह अपने आप में अलग और विषद विषय है.

भारत ने लगातार अपनी गैर-पश्चिमी पहचान पर बल दिया है. इसकी जटिलता को समझना आसान नहीं है. पश्चिम के राजनीतिक और मानवीय-मूल्यों को भारत भी स्वीकार करता है, लेकिन वह अमेरिका और यूरोप की भू-राजनीति का अनिवार्य हिस्साा बनने से इनकार करता है.  

Wednesday, September 9, 2026

राजनीति का नया फॉर्मूला ‘टार्गेट एम!’


भारतीय राजनीति में महिला मतदाता (साइलेंट वोटर) सबसे निर्णायक वोट बैंक बनकर उभरी हैं, जिसके कारण राजनीतिक दल उन्हें आकर्षित करने के लिए पारंपरिक उपहारों से लेकर बड़े पैमाने पर नकदी हस्तांतरण योजनाओं की घोषणाएँ कर रहे हैं। अतीत में मंगलसूत्र, कन्यादान, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी मुफ्त वस्तुएँ महिलाओं को लुभाने के चुनावी रणनीतियों का एक बड़ा हिस्सा रही हैं, जो समय के साथ आर्थिक और सामाजिक रूप से विकसित होती जा रही हैं। क्या यह प्रवृत्ति रेवड़ी संस्कृति को बढ़ा रही है, या यह सामाजिक-विकास में मददगार है? मोदी, मुसलमान, मंगलसूत्र (हिंदू वैवाहिक प्रतीक), और यहाँ तक ​​कि मटन और मछली भी चुनावी शब्दावली का हिस्सा बन चुके हैं। विरोधी दल अपनी दुर्दशा के लिए मीडिया, मार्केटिंग और मनी (तीन और 'एम') को कोस सकते हैं, वोटिंग मशीन को तो कोस ही रहे हं। सच्चाई यह है कि चुनावों में कम से कम एक 'एम' निर्णायक साबित हो रहा है। देश के चुनावी इतिहास में महिला वोट का महत्व बढ़ता जा रहा है।

हालाँकि कॉक्रोच आंदोलन के कारण देश का ध्यान जेन-ज़ी और युवा वर्ग की ओर गया है, पर चुनावी-राजनीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी दल महिला वोटरों को लुभाने से जुड़े कार्यक्रमों को वरीयता दे रहे हैं। उन्हें समझ में आ रहा है कि महिला वोटर एक ‘ब्लॉक’ है, जेन-ज़ी के बारे में फिलहाल कहना मुश्किल है कि वह ‘ब्लॉक’ के रूप में मतदान करेगा या नहीं। राजनीति-शास्त्रियों का कहना है कि जेन-ज़ी की भूमिका किसी के पक्ष में माहौल को बनाने या किसी के विरोध में माहौल बिगाड़ने में हो सकती है, पर जेन-ज़ी वोटर ब्लॉक नहीं है। इनमें से कुछ तो वोटर भी नहीं हैं।

Tuesday, September 8, 2026

वैश्विक आर्थिक-प्रशासन को ब्रिक्स की चुनौती

1925 का एक अमेरिकी कार्टून, जो
आज सच साबित हो रहा है
विश्व-व्यवस्था की बदलती तस्वीर धीरे-धीरे सामने आ रही है. दुनिया के देशों के तीन महत्त्वपूर्ण समूहों के इर्द-गिर्द चल रही गतिविधियों से इस बदलाव के संकेत मिल रहे हैं.  

हमारी दृष्टि में इन गतिविधियों में भारत की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है. खासतौर से ऐसे समय में जब भारत-अमेरिका और भारत-चीन संबंध नए सिरे से परिभाषित हो रहे हैं.

संबंधों के अलावा अपनी अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने के विचार से भी यह समय महत्त्वपूर्ण है. भारत को तीन महत्त्वपूर्ण समूहों के साथ अपने रिश्तों को संयोजित करना है.

ये तीन समूह हैं, जी7, जी20 और ब्रिक्स. इनके मार्फत बड़े देशों के बीच ऊर्जा संसाधनों, टेक्नोलॉजी और वित्तीय प्रभाव के मद्देनज़र बढ़ती प्रतिस्पर्धा की झलक नज़र आ रही है. देखना होगा कि भारत को यह स्पर्धा कितना प्रभावित करेगी. 

इनमें जी7 और ब्रिक्स दो ध्रुवों पर हैं और जी20 बीच में है, जिसमें अमेरिका और चीन-रूस दोनों हैं. 12-13 सितंबर को ब्रिक्स के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन और इस साल जी20 की अमेरिकी अध्यक्षता के साथ इन गतिविधियों की आहट सुनाई पड़ने लगी है.   

ब्रिक्स की सफलता

हालाँकि पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले जी7 का वित्त और उन्नत प्रौद्योगिकी में अभी तक दबदबा है, पर जनसंख्या, पीपीपी-आधारित आर्थिक शक्ति, विनिर्माण और बहुध्रुवीय विश्व का झंडा ब्रिक्स बुलंद कर रहा है.

ताज़ा खबर है कि विस्तारित ब्रिक्स ब्लॉक ने पर्चेज़िंग पावर पैरिटी के आधार पर जी7 को आधिकारिक तौर पर पीछे छोड़ दिया है. जहाँ पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ मात्र 1% की धीमी वार्षिक दर से आगे बढ़ रही हैं, वहीं ब्रिक्स ब्लॉक 4% से अधिक की दर से तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो वैश्विक जीडीपी के लगभग 40% और विश्व की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है.

एक समय तक ब्रिक्स को उभरते बाजारों के लिए अनौपचारिक चर्चा मंच के रूप में देखा गया था, पर अब वह पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व के खिलाफ एक दुर्जेय, बहु-महाद्वीपीय प्रति-संतुलनकारी ताकत के रूप में खड़ा हो रहा है.

Tuesday, September 1, 2026

बदलते वैश्विक-हालात में चीन से सुधरते रिश्ते


पिछले दो साल से भारत और चीन के रिश्तों की बर्फ पिघलाने के प्रयास चल रहे हैं. अब लगता है कि प्रयास रंग लाएँगे. शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के हाशिए पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को लेकर राजनयिक-सरगर्मियाँ अचानक बढ़ गई हैं. 

यह शिखर सम्मेलन एससीओ के 25 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया था, जिसमें पीएम मोदी 31 अगस्त और 1 सितंबर तक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में थे.

शिखर सम्मेलन से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत की और अन्य एससीओ नेताओं के साथ एक समूह तस्वीर खिंचवाई. बाद में उन्होंने शिखर सम्मेलन की चर्चाओं में भाग लिया और अन्य सदस्य देशों के नेताओं के साथ एससीओ घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए.

दो हफ्ते बाद 12-13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन भी है, जिसमें दोनों नेताओं की फिर से मुलाकात होने की संभावनाएँ हैं. दोनों सम्मेलनों में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उपस्थिति भी महत्त्वपूर्ण है.

चीनी राष्ट्रपति की दिल्ली-यात्रा के बड़े निहितार्थ हैं. इस यात्रा की सीधी जानकारी रखने वाले एक भारतीय सूत्र ने रॉयटर्स को बताया, ‘चीनी अधिकारी होटल और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हैं’. उनके साथ क़रीब 400 अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल आने की संभावना है.

Monday, August 31, 2026

अच्छी तरह पिटने तक लड़ाई जारी क्यों रखता है अमेरिका?


न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर ग्रेग जैफ ने अपने एक लेख में लिखा है कि अमेरिका  का सबसे लंबा युद्ध ठीक पाँच साल पहले अफगानिस्तान में समाप्त हुआ था। आज यह ईरान में अंतहीन युद्ध से बचने की कोशिश कर रहे नीति निर्माताओं के लिए सबक पेश करता है। ग्रेग जैफ ने 15 साल तक अफगानिस्तान की रिपोर्टिंग की थी। उन्होंने इस लेख में अमेरिका की नीतियों की बखिया उधेड़ी है। इस लेख का हिंदी में अनुवाद नीचे पेश कर रहा हूँ। आप चाहें तो न्यूयॉर्क टाइम्स की वैबसाइट पर जाकर भी इसे अंग्रेजी मूल रूप में पढ़ सकते हैं। उसका लिंक नीचे दिया है। 

अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अधिकांश समय, अमेरिका के लिए जीत से भी ज्यादा मुश्किल काम युद्ध खत्म करना था।

देश का सबसे लंबा युद्ध पाँच साल पहले अराजकता और हार के साथ समाप्त हुआ। तालिबान विद्रोहियों से बचने के लिए बेताब लाखों अफगान नागरिक काबुल हवाई अड्डे पर उमड़ पड़े। वहाँ एक आत्मघाती बम के हमले में तेरह अमेरिकी सैनिक मारे गए।

तब से, तीन राष्ट्रपतियों के वे भय निराधार साबित हुए हैं, जिन्हें लेकर उन्हें लगता था कि लड़ाई खत्म करना खतरे से खाली नहीं है। अफगानिस्तान न तो आतंकवाद का अड्डा बना, और न अमेरिका पर हमले हुए।

आज अमेरिकी सेना ईरान में एक नए युद्ध में उलझी हुई है। एक बार फिर, फौजी जीत की संभावनाएं धूमिल हैं। यहाँ तक ​​कि राष्ट्रपति ट्रंप ने भी युद्ध खत्म करने की इच्छा जताई थी, लेकिन बाद में अपना रुख बदलते हुए युद्ध में बने रहने की वकालत की।

उन्होंने ओवल ऑफिस में अपने भाषण में कहा, ‘हमें वहां रहने की जरूरत नहीं है। हमें उनके तेल की जरूरत नहीं है। हमें उनकी किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। लेकिन हम अपने सहयोगियों की मदद के लिए वहां मौजूद हैं।’

अफगानिस्तान में लंबे समय से चल रहे युद्ध ने ईरान के भविष्य पर विचार कर रहे जनरलों और नीति निर्माताओं के सामने कई कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं: अफगानिस्तान से पीछे हटना इतना कठिन क्यों था? वहां हार स्वीकार करने के लिए किया गया लंबा संघर्ष ईरान में ट्रंप प्रशासन की दुविधा के बारे में क्या बताता है?

Tuesday, August 25, 2026

वर्णाश्रम व्यवस्था पर महात्मा गांधी


इधर मनुस्मृति और वंदे मातरम जैसे प्रश्नों पर बहस के दौरान ऐसे उद्धरण खोजे जा रहे हैं, जिनसे किसी एक तरह का निष्कर्ष निकाला जा सके। ऐसा अपनी धारणा को स्थापित करने के लिए ज्यादा होता है, किसी विषय पर संज़ीदगी से बहस चलाना नहीं। गांधी जी हिंदू धर्म के रूपकों का सहारा लेते थे। शायद यह उनकी रणनीति भी थी, क्योंकि वे हिंदुओं को अपने साथ रखना चाहते रहे होंगे। इन रूपकों के कारण उनकी बातों में वैचारिक अंतर्विरोध पैदा हो गए थे, जो बीआर आंबेडकर की किताब ‘जाति-व्यवस्था का उच्छेद’ के बाद दोनों के बीच चली बहस में देखे जा सकते हैं। डॉ आंबेडकर मानते थे कि जाति व्यवस्था हिंदू धर्मग्रंथों में निहित है और इसे केवल सामाजिक सुधारों से नहीं मिटाया जा सकता, बल्कि इसके धार्मिक आधार को पूरी तरह नकारना होगा। इसके विपरीत, गांधी जी वर्ण व्यवस्था और हिंदू धर्म के आदर्श स्वरूप में विश्वास रखते थे और उनका मानना था कि बुराइयों को दूर करके और वर्ण व्यवस्था को शुद्ध करके सामाजिक समरसता बनाए रखी जा सकती है। भारत के वर्तमान राजनीतिक-अंतर्विरोधों को समझने के लिए हमें राममोहन रॉय, जोतिबा फुले, गोपाल कृष्ण गोखले, सावरकर, महात्मा गांधी, आंबेडकर, नेहरू और लोहिया समेत दूसरे समकालीन विचारकों की बातों को समझने की कोशिश करनी होगी। यहाँ मैं गांधी के वर्णाश्रम-व्यवस्था के विचारों पर कृष्णन नंदेला के एक आलेख को प्रकाशित कर रहा हूँ।

कृष्णन नंदेला*

गांधी जी को वर्ण-आश्रम व्यवस्था के समर्थक के रूप में व्यापक रूप से आलोचना का सामना करना पड़ता है। जी हां, गांधी जी वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे और उनके अनुसार हिंदू होने के लिए वर्ण-आश्रम व्यवस्था में विश्वास करना एक अनिवार्य योग्यता थी। हालांकि, गांधी जी की वर्ण व्यवस्था में आंतरिक लचीलापन था और हिंदू समाज में वर्ण परस्पर विनिमय योग्य थे। गांधी जी की वर्ण व्यवस्था में, एक शूद्र को अपने पैतृक कर्तव्य का पालन करना होता था और यदि वह पुरोहिती कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम है, तो उसे अपने पैतृक कर्तव्यों का त्याग या अस्वीकार किए बिना उनका पालन करना चाहिए। यह लचीलापन गांधी जी की वर्ण-आश्रम व्यवस्था में सभी वर्णों के लिए लागू होता था। एक ब्राह्मण शस्त्र उठाना और युद्ध की तकनीक सीखना, शूद्र के कर्तव्यों का पालन करना या वैश्य के कर्तव्यों का पालन करना स्वतंत्र था, लेकिन अपने पैतृक पुरोहिती कर्तव्यों का पालन किए बिना नहीं। गांधी जी के लिए, वर्ण व्यवस्था पदानुक्रमित नहीं थी। चारों वर्ण समान दर्जा रखते थे और समाज के लिए कार्यात्मक थे। चारों वर्णों को क्षैतिज रूप से रखा गया था और वे परस्पर प्रतिस्थापनीय थे।

कश्मीर पर गोर का बयान, कहीं कुछ चल रहा है


कश्मीर के बारे में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के एक बयान ने भारत और पाकिस्तान के पर्यवेक्षकों का ध्यान खींचा है. कश्मीर-विवाद के अलावा भारत-अमेरिका रिश्तों के लिहाज से भी यह बयान महत्त्वपूर्ण है.

भारतीय पर्यवेक्षक मानते हैं कि भारत को इस विषय पर आत्यंतिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करनी चाहिए. बयान के मतलब को समझने का प्रयास अभी किया ही जा रहा है.

सच यह भी है कि किसी राजदूत का बयान अंतिम नहीं होता. यह बयान कोई संधि नहीं है, और न राष्ट्रपति की घोषणा या विदेश विभाग के बयान जैसा आधिकारिक. फिर भी डिप्लोमेसी में शब्दावली और समय का महत्त्व होता है.

Wednesday, August 19, 2026

चुनाव बताएँगे ट्रंप और नेतन्याहू की दशा-दिशा


अमेरिका और इसराइल ने 28 फरवरी को ईरान में सत्ता बदलने के मकसद से जो युद्ध शुरू किया था, वह बड़ी नाकामी साबित हुआ है. इससे दुनिया में पैदा हुआ संकट अपनी जगह है, पर अब देखना होगा कि अमेरिका और इसराइल की राजनीति पर उसका क्या प्रभाव पड़ा है.  

इसका पहला अनुमान इस साल अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों और इसराइल के आम चुनावों से लगेगा. हालाँकि डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में दो साल बाकी हैं, पर मध्यावधि चुनावों से उनकी लोकप्रियता का पता ज़रूर लगेगा.

अमेरिका में हरेक चार साल पर राष्ट्रपति, पूरे प्रतिनिधि सदन और उच्च सदन सीनेट के एक तिहाई सदस्यों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं. उसके दो साल बाद मध्यावधि चुनाव होते हैं, जिसमें प्रतिनिधि सदन का चुनाव होता है.

प्रतिनिधि सदन का कार्यकाल दो साल का होता है, इसलिए हरेक दो साल में पूरे सदन का नया गठन होता है, साथ ही सीनेट के खाली हो रहे एक तिहाई स्थानों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं.

Sunday, August 16, 2026

भारत ने हॉकी विश्वकप में क्राउडफंडिंग से बनी वेल्स की टीम को हराया

 


हरमनप्रीत सिंह ने दो गोल दागकर भारत को ऐसी टीम के खिलाफ 3-1 से जीत दिलाई, जिसे प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चंदे से करके उतनी रकम का इंतज़ाम और करना था, जितना भारतीय कोच क्रेग फुल्टन का दो महीने का वेतन होता है। आज के इंडियन एक्सप्रेस में मिहिर वासवडा की यह रिपोर्ट पढ़ने लायक है। मैंने उसके मशीन-अनुवाद को कुछ सँवारते हुए यहाँ पेश किया है। नीचे पढ़ें यह रिपोर्ट:

वेल्स ने विश्व कप में भाग लेने से पहले एक लक्ष्य हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी थी। यह वैगनर स्टेडियम के अंदर वाला स्कोरबोर्ड नहीं, बल्कि क्राउडफंडिंग पेज पर बना स्कोरबोर्ड था। उनका लक्ष्य 40,000 पाउंड था। टूर्नामेंट शुरू होने तक भी उनके 1,929 पाउंड कम पड़ रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो, उन्होंने जो 38,071 पाउंड जुटाए, लगभग 49.26 लाख रुपये, वह लगभग उतनी ही रकम है, जितनी भारतीय कोच क्रेग फुल्टन दो महीने में कमाते हैं।

मैदान पर, भारत ने एमस्टेलवीन में पूल डी के अपने पहले मैच में वेल्स को 3-1 से हराया। मैच में ज्यादातर समय तक भारत का प्रदर्शन वैसा ही संयमित रहा जैसा फुल्टन ने उम्मीद की होगी। रक्षापंक्ति अंतिम कुछ मिनटों तक मज़बूत बनी रही, पेनल्टी कॉर्नर सटीक साबित हुए, कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने दो गोल किए और रिजर्व खिलाड़ी संजय ने भी एक गोल दागा। यह प्रदर्शन एक क्लीन शीट और एक फील्ड गोल से पूर्णता के करीब था। हालांकि, यह कहना अतिशयोक्ति होगी,  खासकर तब जब यह एक लंबे टूर्नामेंट का पहला मैच था।

स्कोरलाइन ने कहानी का सिर्फ एक हिस्सा बताया। यह दो बिल्कुल अलग-अलग हॉकी प्रणालियों का भी मुकाबला था। एक टीम पूरी तरह से वित्त पोषित राष्ट्रीय शिविर में कई महीने बिताने के बाद पहुँची थी। दूसरी टीम समर्थकों से अपने विश्व कप सफर के लिए आर्थिक सहायता मांगने के बाद पहुँची थी।

इस मंच पर अपनी दूसरी उपस्थिति से कुछ महीने पहले, हॉकी वेल्स ने एक ऑनलाइन क्राउडफंडिंग अभियान शुरू किया। इस अपील की शुरुआत 'हम कौन हैं' यह बताते हुए होती है और आगे कहा गया है: “हॉकी विश्व कप में प्रतिस्पर्धा करने के लिए खिलाड़ियों, कर्मचारियों और पूरे कार्यक्रम से जबरदस्त प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। एक टीम के रूप में, हम पहले से कहीं अधिक प्रशिक्षण ले रहे हैं क्योंकि हम उच्च स्तरीय अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की माँगों के लिए तैयारी कर रहे हैं। अतिरिक्त प्रशिक्षण शिविरों और तैयारी मैचों से लेकर प्रदर्शन सहायता और यात्रा तक, इस स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में शामिल लागतें काफी अधिक हैं।”

‘कॉक्रोच-विद्रोह’ क्या उलट सकता है भाजपा के सत्ता-समीकरण?


मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं/सक्रियतावादियों की तुलना ‘कॉक्रोच’ और ‘परजीवियों’ से करती अदालती टिप्पणी के जवाब में आम आदमी पार्टी के पूर्व कम्युनिकेशन स्ट्रैटजिस्ट और बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र अभिजीत दीपके ने व्यंग्यात्मक ‘कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ शुरू की। इसका नाम ही बीजेपी की पैरोडी है। यह जल्दी ही मीम से बड़े डिजिटल आंदोलन में बदल गया—इंस्टाग्राम पर करोड़ों फॉलोअर्स (बीजेपी/कांग्रेस हैंडल्स से ज्यादा), लाखों रजिस्ट्रेशन हो गए। यह बेरोजगारी, परीक्षा लीक (खासकर NEET), जवाबदेही और व्यवस्था से नाराजगी का प्रतीक बन गया।

इसके दवाब में जुलाई में 36-37 दिनों के जंतर-मंतर धरने, ‘संसद चलो’ मार्च और देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। मोदी सरकार (2014 के बाद) पर सार्वजनिक दबाव से यह मंत्री का दुर्लभ इस्तीफा था। सरकार ने अन्य माँगों (मुआवजा, FIR वापसी, परीक्षा सुधारों पर बात) पर भी सहमति जताई, जिसके बाद CJP ने आंदोलन स्थगित कर दिया।

इसके बाद सीजेपी ने अपनी राष्ट्रीय टीम घोषित कर दी, जिसके दीपके राष्ट्रीय संयोजक हैं। इसने 15 अगस्त से ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया है, जिला-स्तरीय संगठन बनाने की योजना है, ‘क्या बोलती पब्लिक’ जैसा सुनने वाली यात्रा और ‘सीजन-2’ की घोषणा भी की गई है। इतना होने के बावज़ूद यह ग्रुप औपचारिक पार्टी नहीं, बल्कि युवा राजनीतिक आंदोलन/प्रेशर ग्रुप के रूप में आगे बढ़ रहा है।

पहली नज़र में साफ दिखाई पड़ता है कि बीजेपी ने इसे शुरू में गंभीरता से नहीं लिया, पर बाद में इसे लेकर अफरा-तफरी में फैसले करना शुरू कर दिया। सवाल है कि यह आंदोलन व्यवस्था-परिवर्तन के लिए है या बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए? व्यवस्था-परिवर्तन करना है, तो इस संगठन की व्यवस्था योजना क्या है? सत्ता-परिवर्तन कराना है, तो किस पार्टी के पक्ष में? क्या यह संगठन बीजेपी से टक्कर ले सकता है? पहले एक नज़र में दोनों की तुलनात्मक ताकतों पर नज़र डालें:

बीजेपी की मजबूती: चुनावी मशीनरी, संगठन (RSS), कल्याण योजनाएं, हिंदू राष्ट्रवाद और विपक्ष की कमजोरी या आपसी टकराव, अब भी प्रमुख हैं। 2024 में बीजेपी को 37% वोट मिले थे; हाल के राज्य चुनावों में भी उसका असर दिखाई पड़ा है। CJP अभी चुनावी ताकत नहीं है—वह न तो पंजीकृत पार्टी है, न उसके पास राष्ट्रीय प्रतीक हैं, न बड़े पैमाने पर संगठन या काडर। हाँ, यह विचार का विषय ज़रूर है कि उसके पास संसाधन कहाँ से आ रहे हैं? इस विषय में कोई जानकारी हासिल हो पाई, तो यह बीजेपी के पक्ष में होगा।

CJP की सीमाएं: व्यंग्य और मुद्दा-आधारित (शिक्षा, युवा बेरोजगारी) होने से व्यापक वैचारिक आधार या ग्रामीण/जातिगत गठबंधन बनाना मुश्किल काम है। कई विश्लेषक कहते हैं कि गुस्सा अस्थायी हो सकता है; बीजेपी मांगों को को-ऑप्ट कर सकती है या दमन/अवहेलना कर सकती है। विपक्ष इसे अपना मंच बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन CJP खुद स्वतंत्र रहने पर जोर दे रहा है।

संभावनाएं: युवा (भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा) असंतोष अगर स्थायी संगठन और स्थानीय मुद्दों में बदल जाए, तो शहरी/युवा वोट प्रभावित हो सकते हैं, खासकर अगर परीक्षा लीक, नौकरियां या संस्थागत विश्वसनीयता जैसे मुद्दे दोहराए जाएं। दक्षिण एशिया में Gen-Z आंदोलनों (बांग्लादेश, नेपाल आदि) ने सरकारें गिराईं—भारत में संस्थाएं मजबूत हैं, लेकिन सड़क दबाव ने पहली बार मंत्री गिराया। यह ‘बीजेपी के अजेय’ होने की छवि को चुनौती ज़रूर देता है। पर इसके आगे क्या?

Wednesday, August 12, 2026

पश्चिम एशिया में ‘सेंटो’ जैसा नया गठबंधन


अरसे से अनुमान था कि पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की पहल पर पचास के दशक में हुए ‘बग़दाद पैक्ट’ या ‘सेंटो’ को फिर से जगाया जा सकता है, जिसे ‘इस्लामिक ‘नेटो’ भी कहा गया था. कमोबेश उसी तर्ज पर एक नई संधि की शुरुआत पिछले हफ्ते हो गई है.   

सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में गत 7 अगस्त को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं.

हालांकि मिस्र और क़तर ने शुरुआती चर्चाओं में भाग लिया था, लेकिन शुक्रवार को हुई चर्चा में उनका उल्लेख प्रतिभागी के रूप में नहीं किया गया. फिर भी, कुछ नए देशों के इसमें शामिल होने की संभावनाएँ खुली हुई हैं.

समझौते को दुनियाभर के विशेषज्ञों ने अलग-अलग नज़रों से देखा है. मसलन क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति, सऊदी-ईरान और इसराइल रिश्ते, अमेरिका और दूसरी ताकतों की भूमिका और भारत का नज़रिया. मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी की सार्थकता को लेकर भी सवाल हैं.

समझौते पर हस्ताक्षर होने के 48 घंटे बाद ही उसे पहली गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा है. ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने जाज़ान में अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला किया, जिससे आग लग गई. 

Tuesday, August 4, 2026

बांग्लादेश पर चीनी प्रभाव और भारत से रिश्ते


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा के दौरान कुछ पर्यवेक्षकों ने टिप्पणी की कि, अपनी 'एक्ट-ईस्ट पॉलिसी' के तहत भारत सुदूर-पूर्व के देशों के साथ रिश्ते बनाने के पहले अपने निकटतम पड़ोसी बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने का काम क्यों नहीं करता? अब समय आ रहा है, जब इस सवाल का जवाब मिल सकता है.

भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है. हालांकि, बांग्लादेश सरकार ने इस निमंत्रण पर अभी कोई निर्णय नहीं किया है, पर इससे कुछ संकेत मिलेंगे.

नया फौजी-गठबंधन

इस विषय पर आगे बात करने के पहले एक नई खबर पर भी ग़ौर करना चाहिए. सऊदी अरब ने एक समुद्री-सुरक्षा गठबंधन की घोषणा की है, जिसमें पाकिस्तान, तुर्की और बांग्लादेश समेत 13 देश शामिल हैं.

Sunday, August 2, 2026

कॉक्रोच-विद्रोह के तीन चेहरे

 


वायरल युवा-आक्रोश से प्रेरित, कॉक्रोच जनता पार्टी का तेजी से उदय तीन बेहद अलग-अलग व्यक्तियों के कारण हुआ, जिनके कौशल, महत्त्वाकांक्षाओं और राजनीतिक इतिहास ने एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान को एक राष्ट्रीय विरोध में बदल दिया, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। आज यानी 2 अगस्त 2026 के द हिंदू में तीन व्यक्तियों के जीवन-वृत्त पर रोशनी डाली गई हैं। मैंने इसे हिंदी में अपने पाठकों के लिए तैयार किया है। इसमें कुछ जगहों पर ज़रूरत के हिसाब से अपनी टिप्पणी भी की है, जो इटैलिक्स में है। इसे लिखा है शोभना के. नायर और निखिल एम बाबू ने।

व्यंग्य से लेकर धरने तक, यह छात्रों के उस विरोध आंदोलन की सबसे लोकप्रिय और शायद सबसे आसान व्याख्या है, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह व्याख्या अपनी सरलता में सशक्त प्रतीत होती है। लेकिन यह अपूर्ण है।

अब तक तो सभी को पता ही है कि कहानी क्या है। 15 मई, 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सक्रियता और सोशल मीडिया का सहारा लेने वाले बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉक्रोचों’ से की, जिससे व्यापक विरोध हुआ। इस टिप्पणी को भुनाते हुए, बोस्टन में पढ़ रहे एक भारतीय छात्र अभिजीत दीपके ने अपने जैसे ‘कॉक्रोचों’ के लिए एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन मंच शुरू किया और इस अपमान को असंतुष्ट युवाओं के लिए एक एकजुटता के आह्वान में बदल दिया। पहले 24 घंटों के भीतर ही 50,000 लोगों ने इसमें पंजीकरण कराया। पाँच दिनों के भीतर यह संख्या बढ़कर दस लाख से अधिक हो गई, जबकि इस आंदोलन के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 2.2 करोड़ से अधिक फॉलोवर हो गए।

वायरल पोस्ट, फॉलोवरों की बढ़ती संख्या और रंगीन प्रतीकों के पीछे तीन शख्सियतें थीं: अभिजीत दीपके (30), आशुतोष रांका (30) और सौरभ दास (27), जिनकी प्रतिभाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। वे देश के अलग-अलग हिस्सों, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आते हैं और उनके स्वभाव भी काफी भिन्न हैं।

Wednesday, July 29, 2026

सऊदी एटमी-डील से पश्चिम एशिया में होड़ बढ़ेगी


पश्चिम एशिया का अनिश्चय खत्म होकर नहीं दे रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच समझौता-ज्ञापन पर दस्तखत होने के बावज़ूद लड़ाई खत्म नहीं हुई है. दूसरी तरफ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने पिटारे से नई-नई चीजें निकाल रहे हैं.

पिछले बुधवार को उन्होंने सऊदी अरब के साथ नाभिकीय-सहयोग के समझौते की घोषणा करके खलबली पैदा कर दी है. इस समझौते के तहत अमेरिकी सहयोग से सऊदी अरब अपने असैनिक परमाणु-कार्यक्रम का संचालन कर सकेगा.

यह 30 वर्षीय समझौता नाभिकीय-सहयोग पर तो रोशनी डालता है, लेकिन साथ ही कई महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलावों की ओर इशारा भी कर रहा है.

वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियों का उपयोग करते हुए रियाद को एक दीर्घकालिक अमेरिकी तकनीकी और सुरक्षा ढाँचे में बाँधकर, वाशिंगटन का लक्ष्य खाड़ी में चीन और रूस के बढ़ते राजनयिक और आर्थिक प्रभाव को कम करना है.

Saturday, July 25, 2026

अराजक और हास्यास्पद राजनीति और व्यवस्था बदलने के इरादे


जंतर-मंतर पर सोनल वांगचुक के अनशन, संसद-भवन मार्च और उसके बाद हुई हिंसा ने अंततः इस आंदोलन के राजनीतिक चेहरे पर पड़ी नकाब हटा दी है। बेशक इस आंदोलन के समर्थकों में बड़ी संख्या किशोरों और उनके अभिभावकों की है, जिनका प्रतियोगी परीक्षाओं से भरोसा टूट रहा है। पर इस आंदोलन को चलाने वाली ताकत कहीं और से काम कर रही है। इसमें देश के विरोधी दल भी शामिल हैं, और बुनियादी तौर पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हैं, जिनके पुराने नाम की साख अब काफी कम हो चुकी है। किशोरों के प्रति सहानुभूति से ज्यादा इस आंदोलन के पीछे सत्ता-प्राप्ति की उनकी मनोकामना है। जनता के मसलों को लेकर आंदोलन चलाना उनका वैधानिक अधिकार है, ज्यादा बड़ा सवाल है कि ‘संपूर्ण-व्यवस्था’ में उनकी भूमिका क्या है। अब चूँकि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया है, इसलिए यह देखना रोचक होगा कि आगे क्या होता है। 

पहली नज़र में ऐसा लगता है कि सरकार करीब-करीब उसी रास्ते पर जा रही है, जिसपर 2013 में केंद्र सरकार गई थी। एनडीए सरकार जो समाधान पेश कर रही है, वह है कड़ी सजा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को एक मसौदा विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसमें 10 साल तक की कैद, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना, त्वरित अदालतों के लिए वैधानिक समर्थन और मामलों की जाँच और मुकदमे के लिए पाँच महीने की समय सीमा का प्रावधान है।

इसके कुछ घंटों बाद, इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार आधी रात को प्रसारित अपने वीडियो पर मिली प्रतिक्रियाओं और सकारात्मक सुझावों के लिए सभी को धन्यवाद दिया, जिसमें उन्होंने सरकार के फैसले की घोषणा की थी। उन्होंने कहा, ‘धन्यवाद दोस्तो। मुझे आधी रात को आप लोगों से बात करने का मौका मिला। मेरे वीडियो पर आपकी प्रतिक्रिया और आपके सकारात्मक सुझावों के लिए आप सभी का धन्यवाद। आपका प्यार ऐसे ही बरसता रहेगा; हमारे रिश्ते और भी मजबूत होते जाएँगे। धन्यवाद, धन्यवाद दोस्तो’।

दोस्त क्या चाहते हैं?

अब 13 साल पीछे चलें। 2012 के निर्भया कांड के बाद भारी जनाक्रोश के बीच केंद्र सरकार ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2013 पास करा दिया। यह वह कानून है, जिसे जल्दबाज़ी में राजनीतिक व सामाजिक दबाव के तहत पारित गैंगरेप कानून के रूप में मुख्य रूप से याद किया जाता है। इस कानून में गैंगरेप के लिए न्यूनतम 20 साल से लेकर उम्रकैद (शेष प्राकृतिक जीवन) तक की अनिवार्य सजा का प्रावधान किया गया। अदालतों से विशेष कारणों का हवाला देकर न्यूनतम सजा से कम देने का अधिकार छीन लिया गया वगैरह।  

कानूनी विशेषज्ञों का मानना था कि संसद ने बिना किसी व्यापक व शांत-चित्त सार्वजनिक विमर्श के इसे अत्यधिक दबाव में पारित किया। कानून केवल सजा को कठोर बनाने पर केंद्रित था, जबकि पुलिस जाँच में सुधार, फॉरेंसिक क्षमता और त्वरित न्याय की प्रणाली पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम सामने है, न बलात्कार कम हुए और न गैंगरेप। 

पेपर लीक की सजा बढ़ाने का लाभ क्या होगा, यह बाद में पता लगेगा, पर सवाल है कि ‘कॉक्रोच-आंदोलन’ में शामिल लोग किस उम्मीद से आए हैं? मुझे नहीं लगता कि सामूहिक रूप से कोई एक उम्मीद है। इसके नेताओं के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, पर राजनीतिक दलों के नेताओं के इरादे साफ हैं। वे विरोध करते हुए नज़र आना चाहते हैं। जनता के मन में भी गुस्सा है, वह उसे व्यक्त करना चाहती है। 

Wednesday, July 22, 2026

पाकिस्तान फिर से टूटने का खतरा

बलोच हमलों में महिला आत्मघातियों की संख्या बढ़ रही है। यह है सुमैया कलंदरानी बलोच जिसने 24 जून 2023 को तुरबत में एक सैन्य काफिले पर आत्मघाती हमला किया। हमले के पहले बलोच लिबरेशन आर्मी के ध्वज के सामने खड़े होकर उसने फोटो खिंचवाया।

अशांत बलोचिस्तान में मस्तुंग के पास गुरुवार 16 जुलाई को सुरक्षा काफिले पर हुए हमले में 45 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है. बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है, जो दो सप्ताह से भी कम समय में सुरक्षा-कर्मियों पर तीसरा बड़ा हमला है.

उपरोक्त जानकारी ‘बलोचिस्तान पोस्ट’ ने दी है, हालाँकि पाकिस्तानी सेना ने हमले की पुष्टि की, लेकिन मरने वालों की संख्या नहीं बताई. बीएलए के प्र
वक्ता जियंद बलोच ने बताया कि मीडिया को बयान जारी करते समय भी बीएलए के लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना के बीच लड़ाई जारी थी, और हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.

आर्थिक-गिरावट और आंतरिक-संघर्षों के कारण पाकिस्तान, गंभीर अस्थिरता का सामना कर रहा है. बलोचिस्तान में विद्रोह और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हो रहे प्रदर्शनों से देश की अखंडता को खतरा पैदा हो गया है. सवाल है कि क्या पाकिस्तान फिर से टूटेगा?