Tuesday, June 16, 2026

ईरान-समझौते के अटकते-खटकते निष्कर्ष


अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक-समझौता हो गया है, जिसके तहत 60 तक युद्धविराम लागू रहेगा और होर्मुज़ का रास्ता खुलेगा. समझौते पर दस्तखतों को लेकर अंतिम क्षण तक असमंजस बना रहा, पर अब बताया गया है कि दस्तखत 19 जून को होंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अब हम ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त कर देंगे, जो महीनों की बातचीत में सबसे बड़ी सफलता है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सरकारी टीवी का कहना है कि तेहरान ने अमेरिका को शांति समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

दोनों पक्षों ने समझौते का विवरण तुरंत जारी नहीं किया है, पर मीडिया में दोनों तरफ से आई बातों में अंतर्विरोध हैं. इसके अलावा ईरान के कट्टरपंथी और इसराइली सरकार अपने-अपने कारणों से नाराज़ हैं।

इस समझौते से दोनों पक्षों के बीच दोस्ती कायम नहीं हो जाएगी. सच यह है कि यह दो दुश्मनों के बीच सीमा रेखाएँ तय करने का समझौता है, जिसकी सफलता या विफलता का फैसला समय करेगा.

दस्तखतों पर संशय

अब शुक्रवार 19 जून को जिनीवा में हस्ताक्षर समारोह होगा. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि मैं वहाँ मौजूद रहूँगा और ट्रंप भी इसमें शामिल हो सकते हैं.

पहले कहा जा रहा था कि रविवार को ही दस्तखत हो जाएँगे. ट्रंप ने शनिवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि अगले दिन समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं, जो उनका जन्मदिन भी होता है.   

दूसरी तरफ ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने कहा कि रविवार को किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे. अलबत्ता उन्होंने आने वाले दिनों में समझौते की संभावना को खुला रखा था.

समझौते का प्रारूप

हालाँकि दोनों ही पक्षों ने समझौते का लिखित प्रारूप जारी नहीं किया है, पर रायटर्स ने एक ईरानी अधिकारी के मार्फत इससे जुड़ा समाचार दिया है.

वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने रायटर्स को बताया कि ईरान ने जिस मसौदे पर सहमति जताई है, उसमें नाभिकीय-अस्त्र बनाने और हासिल करने पर रोक लगाने की बात है. दोनों पक्ष इसपर औपचारिक दस्तखतों के बाद अगले 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर चर्चा करेंगे.

रायटर्स के अनुसार मसौदे में निम्नलिखित प्रावधान शामिल हैं:

परमाणु कार्यक्रम

·      ईरान परमाणु हथियार न तो बनाएगा और न ही हासिल करेगा।

·      अंतिम समझौता होने तक ईरान अपना वर्तमान परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा, जिसमें यूरेनियम संवर्धन न करना और परमाणु सुविधाओं का विस्तार न करना शामिल है।

·      अमेरिका ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार को देश के भीतर कम करने के लिए तैयार है, और दोनों पक्ष 60 दिनों के भीतर इस प्रक्रिया पर चर्चा करेंगे।

होर्मुज जलडमरूमध्य

रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक ईंधन व्यापार के लिए महत्वपूर्ण प्रमुख समुद्री मार्ग पर दोनों पक्ष निम्नलिखित बातों पर सहमत हुए हैं:

·      ईरान तुरंत सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल देगा।

·      ईरानी बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक नाकाबंदी अमेरिका हटा लेगा।

वित्तीय उपाय

·      जब तक दोनों पक्ष अंतिम समझौते पर नहीं पहुँच जाते, अमेरिका, ईरान पर नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा।

·      वाशिंगटन एक निश्चित अवधि के लिए तेल प्रतिबंधों में छूट देगा, जिससे ईरान को तेल बेचने और उससे प्राप्त आय तक पहुँच प्राप्त करने की अनुमति मिलेगी।

·      अमेरिका प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण, क्षेत्रीय देशों के सहयोग और वित्तीय ऋण लाइनों के माध्यम से ईरान की 25 अरब डॉलर की संपत्ति जारी करने में सहायता करेगा।

ईरानी विवरण

ईरान की अर्ध सरकारी समाचार एजेंसी मेहर न्यूज़ के मुताबिक़ प्रस्तावित बिंदुओं में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर स्थायी युद्धविराम का मुद्दा शामिल है.

इसके अलावा अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजनाएं बनाएँगे. अंतिम वार्ता तभी शुरू होगी, जब ईरान की फ़्रीज़ संपत्तियों का कम से कम आधा हिस्सा रिलीज़ हो जाएगा, ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध निलंबित होंगे और नौसैनिक नाकाबंदी हट जाएगी.  

रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव के ज़रिए मंज़ूरी दी जाएगी.

ईरान में विरोध

शनिवार को संकेत मिले थे कि ईरान के कुछ कट्टरपंथी समूह, समझौते के विरोध में हैं. दो रूढ़िवादी सांसदों ने इसकी आलोचना भी की. इनमें से एक, अमीर हुसैन साबेती ने सोशल मीडिया पर विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची के खिलाफ़ महाभियोग की माँग करते हुए पोस्ट किया.

दूसरे सदस्य, महमूद नबीवियन ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा कि इस समझौते के तहत, ‘ईरान अमेरिका का उपनिवेश बन जाएगा.’ लेबनान में भी लड़ाई जारी है, जहाँ हिज़्बुल्ला के खिलाफ इसराइल का महीनों से अभियान चल रहा है. ईरानी चाहते हैं कि इस लड़ाई को भी खत्म करने का मसला समझौते में शामिल किया जाए.  

इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर से संबद्ध अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्स ने बताया कि मशहद में विदेश मंत्रालय के बाहर दर्जनों लोगों ने समझौते के खिलाफ प्रदर्शन किया और ईरान के अब्बास अराग़ची के खिलाफ नारे लगाए.

रुख पर कायम

इस लड़ाई से इतना साबित ज़रूर हुआ है कि अमेरिका अपनी वैश्विक-भूमिका पर अड़ा है. वहीं ईरान ने लड़ाई को लंबा खींचकर अपने हौसलों का प्रदर्शन ज़रूर किया है.

अपने नाभिकीय-ऊर्जा कार्यक्रम को जारी रखने के संकल्प से वह अभी तक विचलित नहीं हुआ है. उसने बम बनाने का दावा कभी नहीं किया, पर अमेरिका और इसराइल मानते हैं कि वह बम बना रहा है.

अमेरिका और इसराइल ने ईरान में रेजीम-चेंज के इरादे से युद्ध छेड़ा था. वहाँ सत्ता परिवर्तन तो हुआ, लेकिन वैसा नहीं जैसा वे चाहते थे. कुछ लोगों ने नई व्यवस्था को इस्लामिक रिपब्लिक 3.0 नाम दिया है.

रेजीम-चेंज की पहेली

कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि ईरान अब धार्मिक-व्यवस्था की तुलना में आईआरजीसी के प्रभुत्व वाली सैनिक-तानाशाही में तब्दील हो गया है. एक समय वह कमज़ोर नज़र आ रहा था, पर अब वह ताल ठोक रहा है.

उसके नए शासकों में इस बात का आत्मविश्वास है कि अपने व्यापक क्षेत्रीय लक्ष्यों में बड़े बदलाव किए बिना, लड़ाई के फिर से भड़कने की स्थिति में भी वे टिके रहेंगे.

अमेरिका और इसराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने और उससे उत्पन्न खतरे को समाप्त करने के लक्ष्य से भी युद्ध छेड़ा था. वह लक्ष्य अब भी है, पर उसके बारे में बात अब आगे होगी. 

ईरानी इरादे

ईरान न्यूनतम स्तर पर भी यूरेनियम संवर्धन का अधिकार अपने पास बनाए रखना चाहेगा. वह उस वैज्ञानिक ज्ञान और उपकरणों को भी अपने पास रखना चाहेगा, जो उसे नाभिकीय-राज्य बनाएँ.

अमेरिका और इसराइल उसे किस तरीके से ऐसा करने से रोकेंगे, यह देखना होगा. संभवतः ईरानी-शासक आश्वस्त हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप का बड़े स्तर पर लड़ाई फिर से छेड़ने का कोई इरादा नहीं है.

वे मानते हैं कि उनके दबाव में ट्रंप ने इसराइल पर भी अंकुश लगाया है. शायद इसी वजह से पिछले हफ्ते, जब इसराइल ने लेबनान में हिज़्बुल्ला के गढ़ों पर बमबारी की, तब ईरान ने इसराइल पर सीधा हमला किया.

आर्थिक लाभ

हालाँकि इसराइल सीधे तौर पर बातचीत में शामिल नहीं है, लेकिन बिन्यामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने गुरुवार देर रात एक बयान में कहा कि उन्होंने ट्रंप से बात की थी, जिन्होंने आश्वासन दिया है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध ‘अंतिम समझौते’ का हिस्सा होंगे.

यह भी साफ है कि केवल समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने से ईरान को आर्थिक लाभ नहीं मिल जाएँगे. अमेरिकी सूत्रों के अनुसार ऐसी अटकलें गलत हैं कि समझौते पर हस्ताक्षर होते ही तेहरान को अरबों डॉलर मिल जाएँगे.

उनके अनुसार, आर्थिक लाभ तभी जारी किए जाएँगे जब ईरान समझौते के तहत अपने दायित्वों को पूरा करेगा. ईरानी संवर्धित यूरेनियम सौंप देंगे, तो उन्हें कुछ वित्तीय राहत मिलेगी. यदि वे परमाणु संयंत्रों को नष्ट कर देंगे, तो कुछ और मिलेगा.

नाभिकीय-कार्यक्रम

अमेरिकी सूत्र अभी यह नहीं बता रहे हैं कि किन परमाणु स्थलों को नष्ट किया जाएगा या ईरान को कितने वर्षों के लिए यूरेनियम संवर्धन रोकना होगा. यह भी स्पष्ट नहीं है कि ईरानी अपने परमाणु ईंधन के भंडार को कैसे निकालेंगे और नष्ट करेंगे, जिसका काफी हिस्सा एक साल पहले अमेरिकी बमबारी में इस्फ़हान संयंत्र के मलबे में दब गया था.

अमेरिका मानता है कि यह समझौता एक व्यापक क्षेत्रीय शांति-संरचना को जन्म देगा, जिसमें इसराइल, लेबनान, फारस की खाड़ी के देश और ईरान शामिल होंगे. तेहरान अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की गारंटी के बदले में क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को वित्तपोषण बंद कर देगा.

बदले ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिलेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी वापसी का रास्ता खुलेगा.  

ईरानी स्वीकृति

ईरान के विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची ने देश को संबोधित करते हुए एक लाइव टेलीविजन भाषण में कहा कि समझौता, लेबनान समेत सभी मोर्चों पर संघर्ष को समाप्त कर देगा और 47 वर्षों में पहली बार ईरान और अमेरिका दोनों लिखित रूप में यह कहेंगे कि वे एक-दूसरे की संप्रभुता और शासन का सम्मान करते हैं.

देश के भीतर विरोधी-स्वरों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि ‘मीडिया को अटकलों से बचना चाहिए.’ हमारी टीम ने अमेरिका से कहा है कि हम लेबनान से इसराइल की वापसी और वहाँ हमलों को भी बंद होते देखना चाहते हैं.

अमेरिकी अधिकारियों ने अपने बयानों में लेबनान का कोई जिक्र नहीं किया, और इसराइल सरकार ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि हम वाशिंगटन और तेहरान के प्रस्तावित समझौते में शामिल नहीं हैं.

ईरानी रणनीति

पिछले हफ्ते ईरान ने इसराइल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जो हिज़्बुल्ला पर हुए इसराइली हमलों के जवाब में थे. इससे संदेह पैदा हुआ कि क्या लड़ाई फिर से शुरू होने वाली है.

आमतौर पर ईरान पलटवार तब करता है जब उसके हितों पर सीधे चोट लगती है, लेकिन इसबार उसने अपने सहयोगी हिज़्बुल्ला पर हमले के बाद कार्रवाई की.

यह भी लगता था कि जवाब में इसराइल फिर से फौजी कार्रवाई करेगा, और अमेरिका के साथ चल रही वार्ता में व्यवधान पड़ेगा. पर शायद ईरान संदेश देना चाहता था कि हम हिज़्बुल्ला के साथ पूरी तरह खड़े हैं.

नया दौर, नई चुनौतियाँ

ईरान जानता है कि अमेरिका अब सीधी लड़ाई नहीं चाहता, इसलिए वह अपने आत्मविश्वास को व्यक्त कर रहा है. कुछ हद तक इसलिए भी कि उसके समर्थकों को लगे कि वे जीत रहे हैं.

लड़ाई के दीर्घकालीन निष्कर्ष अभी नहीं निकाले जा सकते हैं, पर यह भी सच है कि ईरान कुछ मामलों में कमज़ोर हुआ है. बेशक मुश्किल हालात में भी लड़ने की उसकी जिजीविषा व्यक्त हुई है, पर उसके सामने बड़ी आर्थिक और सामरिक चुनौतियाँ हैं.  

ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध हैं, वह समुद्री नाकाबंदी से घिरा है, फिर भी  डिगा नहीं. वहाँ की सरकार का व्यवस्था पर नियंत्रण है, और रक्षा-संरचना कायम है. अमेरिकी भविष्यवाणियों के बावजूद सरकार-विरोधी कोई जनांदोलन वहाँ खड़ा नहीं हुआ.

उसे लगता है कि वह मुश्किल दौर को पार कर चुका है और अब नया दौर शुरू होगा. ईरान के अंदरूनी अंतर्विरोधों पर भी नज़र रखनी होगी. देखें कि पेज़ेश्कियान का नेतृत्व कायम रहेगा या आईआरजीसी का वर्चस्व स्थापित होगा?

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

Sunday, June 14, 2026

'सभी मनुष्य समान हैं', इस वाक्य में क्या महिलाएं भी शामिल हैं?


न्यूयॉर्कटाइम्स में पारुल सहगल के लेख का हिंदी अनुवाद

5 नवंबर, 1872 को न्यूयॉर्क के रोचेस्टर में, 15 अमेरिकी महिलाएँ एक अपराध को अंजाम देने के लिए अपने घर से निकलीं। उनकी 50 वर्षीय नेता को, जो अपनी शांत और अडिग निगाहों के लिए प्रसिद्ध थी, उसी महीने गिरफ्तार किया गया था। उसने अपने अपराध से इनकार नहीं किया था। और  एक साल बाद अपने मुकदमे में जज के सामने दिए बयान में, उसने अन्य महिलाओं से आह्वान किया, ‘ठीक वैसा ही करो जैसा मैंने किया है, मानव निर्मित, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक कानूनों के खिलाफ विद्रोह करो।’

मतदान करने के लिए सूज़न बी एंथनी की गिरफ्तारी ठीक उसी तरह हुई जैसा उन्होंने और उनकी साथी मताधिकार समर्थकों ने चाहा था, जिससे उनके आंदोलन को प्रचार मिला और यह बात उनके आंदोलन की परीक्षा साबित हुई। एंथनी ने मुकदमे से पहले भाषण देने के लिए कई जगहों का दौरा किया और घोषणा की कि अब धैर्य का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने 14वें संशोधन का हवाला देते हुए अपने श्रोताओं से इसकी भाषा और तर्क का गहन अध्ययन करने का आग्रह किया। और फिर उन्होंने अपनी बात को बहुत ही सरल शब्दों में कहा।

1873 के भाषण में उन्होंने कहा: अब सिर्फ एक बात तय होनी बाकी रह गई है, क्या स्त्रियाँ व्यक्ति (इनसान) हैं​​​​​​? (The only question left to be settled, now, is: Are women persons?)

यह बात बहुत साफ और बहुत मजबूत है। खासकर आखिरी शब्द ध्यान खींचता है। एंथनी ने ‘लोगों’ की जगह ‘व्यक्तियों’ का इस्तेमाल किया है क्योंकि वह संविधान के सटीक शब्दों का प्रयोग कर रही थीं: ‘संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त सभी व्यक्ति’, जो इसके अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं, संयुक्त राज्य अमेरिका और उस राज्य के नागरिक हैं जहाँ वे रहते हैं। कोई भी राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा या लागू नहीं करेगा जो संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिकों के विशेषाधिकारों या स्वतंत्रताओं को कम करे।’

यदि एंथनी जैसी महिलाएं व्यक्ति थीं, तो वे नागरिक भी थीं। और यदि वे नागरिक थीं, तो न्यूयॉर्क जैसे किसी भी राज्य के कानूनों को उनके विशेषाधिकारों या उन्मुक्तियों (Immunities) को, जैसे कि मतदान के अधिकार को, कम नहीं करना चाहिए।

एंथनी द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे मामले में यह महत्वपूर्ण बिंदु था, जिसके के दूरगामी परिणाम होने थे।

महिलाओं के मताधिकार के लिए संघर्ष अमेरिकी इतिहास के सबसे लंबे और सबसे कठिन संघर्षों में से एक था। इसे शराब लॉबी के भयंकर विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्हें डर था कि मताधिकार प्राप्त महिलाएं शराबबंदी के पक्ष में मतदान करेंगी; उद्योगपतियों को यह भी डर था कि वे बाल श्रम कानूनों के पक्ष में तर्क देंगी; और मताधिकार विरोधी महिलाओं के विशाल और शक्तिशाली समूह ने भी इसका विरोध किया।

Wednesday, June 10, 2026

ट्रंप की पहेलियों और पुतिन के दावों के दौर में भारत


डॉनल्ड ट्रंप की फुलझड़ियों, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बयानों और चीनी गतिविधियों को एक सतह पर रखकर विचार करें, तो भारत की विदेश-नीति को लेकर कुछ सवाल बनते हैं.

एक तरफ गाहे-बगाहे ट्रंप के पहेली जैसे बयान सुनाई पड़ते हैं, वहीं अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत को अमेरिका के दबाव में आना बंद करना चाहिए. अमेरिका का सूर्यास्त और ब्रिक्स का सूर्योदय होने वाला है.

ईरान-युद्ध की वजह से मिली छूट के कारण रूस से पेट्रोलियम की खरीद में वृद्धि हुई है, पर कहना मुश्किल है कि आने वाले समय में अमेरिका इसे रोकने के लिए किस प्रकार के दबाव डालेगा.

सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिका के सूर्यास्त की घड़ी आ गई है? भारत क्या वास्तव में अमेरिका के दबाव में है? क्या अब हमारी दूरियाँ बढ़ने वाली हैं? ट्रंप कैसी पहेली बूझ रहे हैं? हमें वाइट हाउस प्रशासन की पल में तोला, पल में माशानीति के प्रति सचेत रहना होगा.

देखना यह भी होगा कि ब्रिक्स के मंच पर भारत-रूस और चीन के सहयोग की नई संभावनाएँ क्या हैं? वस्तुतः भारत को न सबके बीच से अपना रास्ता खुद खोजना होगा और स्वतंत्र-नीति का संचालन करना होगा. क्या ऐसा संभव है

फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि भारत किसी ध्रुवीकरण में शामिल नहीं होगा और उसके अमेरिका के साथ रिश्ते बने रहेंगे, जो इस समय भले ही कारोबारी लेन-देन तक सिमट गए हैं. दूसरी तरफ उसे न तो 'अमेरिकी-पिट्ठू' साबित किया जा सकता है और न उसके दबाव में.  

Monday, June 8, 2026

फुटबॉल के जुनून का मेला


आगामी 11 जून से 2026 का फीफा विश्व कप शुरू हो रहा है, जो 19 जुलाई तक चलेगा। रविवार, 19 जुलाई को न्यू जर्सी के मेटलाइफ स्टेडियम में फाइनल मैच होगा। यह विश्व कप पहली बार तीन देशों के 16 शहरों में आयोजित किया जाएगा: संयुक्त राज्य अमेरिका में 11, मैक्सिको में तीन और कनाडा में दो।

मैक्सिको में उद्घाटन समारोह मैक्सिको सिटी स्टेडियम में होगा, जो विश्व कप के तीन संस्करणों की मेजबानी करने वाला पहला स्थल बनकर इतिहास रच देगा, इसके अलावा ग्वाडालाजारा और मॉन्टेरी में भी मैच होंगे। ये मैच कनाडा के दो स्थानों, टोरंटो और वैंकूवर में खेले जाएँगे। मुख्य मेजबान अमेरिका है। उसके यहाँ एटलांटा, बोस्टन, डलेस, ह्यूस्टन, कैनसस सिटी, लॉस एंजेलस, मायामी, न्यूयॉर्क या न्यू जर्सी, फिलाडेल्फ़िया, सैन फ्रांसिस्को या सांता क्लारा और सिएटल में आयोजित किए जाएँगे।

यह विश्व कप का 23वां संस्करण है। पहली बार इसमें 48 टीमें भाग लेंगी, जो चार साल पहले कतर में भाग लेने वाली टीमों की तुलना में 16 अधिक हैं। इससे यह इतिहास का सबसे बड़ा विश्व कप बन जाएगा, जिसमें मैचों की संख्या बढ़कर 104 हो जाएगी, और यह पहली बार तीन देशों में आयोजित किया जाएगा।

उत्तरी अमेरिका में हो रहे इस विश्व कप के बारे में कुछ बातें जानना जरूरी है।

बारह समूह

नए प्रारूप में चार-चार टीमों के 12 समूह होंगे। प्रत्येक समूह से शीर्ष दो टीमें और शीर्ष आठ तृतीय स्थान पर रहने वाली टीमें नॉकआउट चरण में प्रवेश करेंगी। अंक, गोल अंतर और कुल गोल तीसरे स्थान के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के निर्धारण के मुख्य मापदंड होंगे। यह दौर 39 दिनों तक चलेगा, जो कतर के 29 दिनों और 2014 और 2018 संस्करणों के 32 दिनों से 10 दिन अधिक है।

उद्घाटन समारोह गुरुवार, 11 जून को मैक्सिको सिटी के ऐतिहासिक एज़्टेका स्टेडियम में मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका के बीच एक मैच के साथ आयोजित किया जाएगा। उद्घाटन दिवस से लेकर शनिवार, 27 जून तक 17 दिनों में कुल 72 समूह चरण के मैच आयोजित किए जाएंगे।

इसके बाद 32 टीमों का पहला दौर (28 जून-3 जुलाई), फिर 16 टीमों का दूसरा दौर (4-7 जुलाई), क्वार्टर फाइनल (9-11 जुलाई), सेमीफाइनल (14-15 जुलाई) और अंत में तीसरे स्थान के लिए मुकाबला (18 जुलाई) होगा।

चूंकि फीफा स्टेडियमों के लिए पहले से मौजूद वाणिज्यिक नामों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है, इसलिए 2026 विश्व कप के आयोजन स्थलों का नाम मेजबान शहर के नाम पर रखा जाएगा।

चूँकि मैच चार अलग-अलग टाइम जोन में और 4,500 किलोमीटर तक की दूरी पर स्थित स्थानों पर खेले जाएँगे, इसलिए मैच कुल 13 अलग-अलग समय पर शुरू होंगे। अमेरिका महाद्वीप होगा विश्व कप का सबसे आसानी से आनंद ले सकेगा, क्योंकि सभी मैच दोपहर 1 बजे आधिकारिक सीटी बजने से लेकर आधी रात को खेल समाप्त होने तक अपने-अपने स्थानों पर आयोजित किए जाएँगे। अर्जेंटीना, उरुग्वाय और ब्राजील के अधिकतर हिस्सों में, यदि वे दिन के आखिरी मैच देखना चाहते हैं, तो उन्हें कुछ मामलों में सुबह 4 बजे के बाद तक जागना पड़ेगा।

अन्य महाद्वीपों के लिए समय अलग-अलग होगा। यूरोप में, ज्यादातर मैच शाम 6 बजे से अगले दिन सुबह 5 बजे के बीच खेले जाएँगे। पूर्वी एशिया और ओसनिया में, ये मैच मुख्य रूप से सुबह के समय दिखाई पड़ेंगे।

कौन जीतेगा?

खिलाड़ियों और प्रशंसकों के लिए, यहाँ तक कि पूरे देशों के लिए भी, विश्व कप जीतना एक परम आनंद है। विश्व कप कौन जीतेगा, इससे बेहतर सवाल यह है: किसे जीतना चाहिए? साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने इस सवाल का रोचक तरीके से जवाब देने की कोशिश की है। उसके अनुसार, विश्व कप अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक शाखा है। यह मेजबान देशों के शक्ति-प्रदर्शन का एक साधन है और एक प्रकार की सौम्य-डिप्लोमेसी। मैदान में कई मुकाबले ऐसे होते हैं, जैसे युद्ध का मैदान हो। जैसे, 2022 में ईरान बनाम अमेरिका हुआ था। कुछ टीमें भविष्य की आशा का प्रतीक बनती हैं, जैसे कि डिएगो माराडोना के नेतृत्व वाली अर्जेंटीना टीम, जिसने 1986 में, सैन्य तानाशाही के अंत के कुछ ही समय बाद, जीत हासिल की थी। कमजोर टीमों की चौंकाने वाली जीत यह आशा जगाती है कि शायद सौम्य और विनम्र लोग ही अंतिम विजेता बनेंगे।

सवाल है कि इस विश्व कप का विजेता कौन होना चाहिए? यहाँ कौन होगा कि बात नहीं है, बल्कि यह है कि किसे विजेता बनना चाहिए? वस्तुतः 48 प्रतिस्पर्धी टीमों में से आधी या उससे अधिक के जीतने की कोई संभावना नहीं है। उन्हें हटा दें। इसके बाद, निष्पक्षता और रोमांच के लिए, उन आठ देशों को भी हटा दें जो पहले जीत चुके हैं। इंग्लैंड को भी, जिसकी एकमात्र जीत 60 साल पहले हुई थी। इससे ज्यादातर दावेदार बाहर हो जाते हैं। शेष में से, प्रमुख दावेदार दो श्रेणियों में आते हैं।

पहले समूह में ऐसे साहसी छोटे देश हैं जिनमें जनसंख्या के अंतर को मात देने की प्रतिभा है। जैसा कि साइमन कूपर ने अपने मनोरंजक संस्मरण ‘वर्ल्ड कप फीवर’ में लिखा है, यह टूर्नामेंट एक उलटी-सीधी वैश्विक रैंकिंग प्रस्तुत करता है जिसमें अमेरिका ‘एक पिछड़ी हुई टीम है और चीन का तो कोई नामोनिशान भी नहीं है’। उनकी टीम, नीदरलैंड्स, एक छोटा सा देश है जो तीन फाइनल में पहुँच चुका है और इसबार उसके पास जीतने का अच्छा मौका है। फिर भी, जैसा कि कूपर स्वीकार करते हैं, नीदरलैंड्स पहले से ही एक खुशहाल और सफल देश है; उसे फुटबॉल की कोई गहरी ज़रूरत या जुनून नहीं है जिसे दूर करने की उसे ज़रूरत हो।

स्वतंत्र राज्य के रूप में अपने 35 वर्षों में, क्रोआसिया (जनसंख्या: 40 लाख से कम) ने आश्चर्यजनक रूप से तीन सेमीफाइनल तक का सफर तय किया है। क्रोआसियाई पत्रकार अलेक्जेंडर होलिगा के अनुसार, फुटबॉल एक ऐसा दुर्लभ क्षेत्र है जिसमें उनका देश कह सकता है, ‘हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों में से हैं।’ हालांकि, कुल मिलाकर देखा जाए तो सबसे योग्य दावेदार पुर्तगाल है, जिसने कम उपलब्धियाँ हासिल की हैं और लंबे समय तक इंतजार किया है, साथ ही तानाशाही और आर्थिक संकट का सामना भी किया है।

फुटबॉल लेखक मिगुएल परेरा इस खेल के प्रति पुर्तगाल के जुनून के बारे में कहते हैं, ‘पुर्तगाल एक जुनूनी देश है।’ एक ऐसा देश जिसने महान खिलाड़ी तो दिए हैं लेकिन विश्व स्तर पर शीर्ष टीम नहीं, वहाँ जीत ‘अत्यंत आनंद और उल्लास’ का संचार करेगी।

दूसरे योग्य समूह में वे बड़े, फुटबॉल प्रेमी देश शामिल हैं जो हमेशा से ही टूर्नामेंट में पिछड़ते रहे हैं। उदाहरण के लिए, जापानी प्रशंसक आज भी 2018 के रोस्तोव की हार का शोक मनाते हैं, जब उनकी टीम ने बेल्जियम के खिलाफ 2-0 की बढ़त गँवा दी थी, और 1993 के दोहा की हार का भी, जब इराक के एक गोल ने उन्हें टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था। जापान में रहने वाले पत्रकार डैन ओर्लोविट्ज़ का मानना ​​है कि टीम का विकास जापान के विश्व के साथ एकीकरण को दर्शाता है। अगर जापान जीतता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। हालाँकि, एक कारण यह है कि बेसबॉल जापान का सबसे बड़ा खेल है, फुटबॉल नहीं। इसी वजह से अमेरिका भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने के योग्य नहीं है।

किसी भी अफ्रीकी देश ने विश्व कप नहीं जीता है। अफ़्रीका के सबसे मजबूत दावेदारों में से एक सेनेगल, कर्ज़ संकट के राजनीतिक नतीजों में फँसा हुआ है। लेकिन, फ्रांस 24 के संवाददाता एलिमाने नडाओ कहते हैं, ‘जब भी राष्ट्रीय टीम खेलती है, हर कोई राजनीतिक समस्याओं को भूल जाता है।’ विश्व कप का उसका सबसे यादगार पल 2002 में पूर्व औपनिवेशिक शक्ति फ्रांस पर 1-0 की जीत थी; गोल करने वाले खिलाड़ी ने कॉर्नर फ्लैग के पास टीम के साथ डांस किया था। अगर वह जीत जाता है, तो देश ‘एक हफ्ते या एक महीने’ तक जश्न मनाएगा।

फिर मोरक्को की बात आती है, जो चार साल पहले सेमीफाइनल तक पहुँचा था। मोरक्को वर्ल्ड न्यूज़ के सह-संस्थापक और राजनीतिक सलाहकार समीर बेनिस कहते हैं कि इससे मोरक्को की प्रतिष्ठा को काफी फायदा हुआ और यह साबित हुआ कि देश ‘विश्व मंच पर अपनी चमक बिखेर सकता है’। बेनिस कहते हैं, ‘जब टीम खेल रही होती है, तो मोरक्को में सब कुछ थम सा जाता है। हर कोई मैच देख रहा होता है और जीत के लिए प्रार्थना कर रहा होता है।’ लेकिन अफ़्रीका के लिए यह गौरवशाली पल 2030 में और भी अधिक सुखद हो सकता है, जब मोरक्को मेजबान देशों में से एक होगा।

 कुल मिलाकर, लैटिन अमेरिकी देश ऐसे हैं, जहाँ पहली बार जीत मिलने पर सबसे अधिक लोगों को सबसे अधिक खुशी मिलेगी। कोलंबिया में राष्ट्रपति चुनाव का तनावपूर्ण माहौल है; दैनिक समाचार पत्र एल टिएम्पो के रिकार्डो एविला कहते हैं कि फुटबॉल ‘देश में एकता का मुख्य कारक’ है। लेकिन जीत का सबसे अधिक महत्व मैक्सिको में होगा, जो 13.3 करोड़ आबादी वाला फुटबॉल का दीवाना देश है। स्तंभकार और पॉडकास्टर लियोन क्राउज़ मज़ाक में कहते हैं, ‘हम सभी आवर लेडी ऑफ ग्वाडालूप में विश्वास करते हैं, लेकिन हमारा एकमात्र सच्चा धर्म फुटबॉल है।’ वे आगे कहते हैं कि अमेरिका में रहने वाले लाखों मैक्सिकन लोगों के लिए, यह टीम उनकी मातृभूमि से आखिरी जुड़ाव है। जीत ‘उस देश के लिए चमत्कार कर देगी जिसने कई कठिनाइयों का सामना किया है’, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई आलोचना भी शामिल है । कल्पना कीजिए कि वे मैक्सिको के कप्तान को ट्रॉफी प्रदान कर रहे हैं।

तीन बार के चैंपियन पेले ने ब्राज़ील को कप उठाते हुए देखने के अनुभव को याद करते हुए कहा, ‘भावनाओं की ऐसी तीव्रता मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी।’ इसबार इसे कौन महसूस करेगा? वास्तव में, सबसे संभावित विजेता फ्रांस और स्पेन हैं। फिर भी, एक खराब रेफरी या एक गलत पेनल्टी किक के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ सकता है। अगर 19 जुलाई को होने वाले फाइनल में मैक्सिको पुर्तगाल से खेले और उसे हरा दे, तो यह एक रोमांचक और रोमांचक मुकाबला होगा। ऐसा हो सकता है। बहरहाल जब तक आखिरी सीटी नहीं बजती, हम सभी उम्मीदें लगा सकते हैं।

आपके इलाके में किस दिन और कितने बजे होंगे मैच

कार्यक्रम



Sunday, June 7, 2026

टेलेंट होती है या होता है?


यह भी रोचक विषय हो सकता है। हाल में मैंने फेसबुक पर लिखा, देश के सभी राजनीतिक दल इस बात पर सहमत हैं कि टेलेंट नेताओं की संतानों या रिश्तेदारों में ही होती है।यह बात यों ही और हल्के अंदाज़ में एक ईमोज़ी के साथ चेंप दी थी। इसपर मेरे मित्र केवल तिवारी ने लिखा, टेलेंट होती है या होता है?’ मैंने लिखते समय इसे स्त्री लिंग में क्यों लिखा, पता नहीं। इसके बारे में सोचा नहीं, पर अब यह सवाल ज़रूर है कि होती है या होता है?

हिंदी के शब्दों का लिंग निर्धारण हम किसी न किसी तरीके से कर लेते हैं, पर विदेशज शब्दों का लिंग निर्धारण कैसे हो। मेरे मन में शायद प्रतिभाशब्द था, पर टेलेंट के लिए भी स्त्री लिंग लिख दिया, पर आप क्या समझते हैं? इसपर अकारांत का नियम लागू होगा या कुछ और? इस सिलसिले में मैंने गूगल ग्रुप में कभी चली एक चर्चा को पढ़ने का प्रयास किया। उसमें पूछा गया था कि क्या कोई ऐसा शब्दकोश है, जो विदेशज शब्दों का लिंग-निर्धारण करता है। उस बहस में कुछ शब्दों के बारे में पूछा गया था कि इन शब्दों के लिंग क्या होंगे? ये शब्द हैं:

1. टेम्पलेट

2. एप्लिकेशन/ऐप्लिकेशन (संदर्भ: कंप्यूटर या मोबाइल वाले एप्लिकेशन)

3. प्रोफ़ाइल

4. ईमेल

5. पोस्ट (संदर्भ: ब्लॉग पोस्ट)

6. डिवाइस

7. फ़ीड

8. फ़ील्ड

9. आईडी

10. लिंक

इस सवाल के जवाब में किसी ने लिखा, मेरे विचार से इनके लिंग इस प्रकार होंगे:

टैम्पलेट- पुल्लिंग

ऐप्लिकेशन- स्त्रीलिंग

प्रोफ़ाइल- पुल्लिंग

ईमेल- दोनों

पोस्ट- स्त्रीलिंग

डिवाइस- पुल्लिंग

फ़ीड- स्त्रीलिंग

फ़ील्ड- पुल्लिंग

आईडी- दोनों

लिंक- पुल्लिंग

नोट: इस बात पर भी ध्यान दें कि सवाल टेम्पलेट के बारे में था, जवाब टैम्पलेट पर मिला। यानी वर्तनी का मसला भी है। मेरा भी सवाल बनता है कि टेलेंट है या टैलेंट? और यह भी कि विदेशज शब्दों की वर्तनी कैसे तय होगी?

वायुसेना की मदद से होगी नीट-यूजी पुनर्परीक्षा

प्रधानमंत्री कार्यालय की निगरानी में होने वाली नीट-यूजी पुनर्परीक्षा में केंद्र सरकार ने प्रश्नपत्रों के परिवहन के लिए भारतीय वायुसेना का उपयोग करने का फैसला किया है। यह कदम नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की उस घोषणा के बाद उठाया गया है, जिसमें 3 मई को आयोजित नीट-यूजी 2026 परीक्षा को रद्द करने का फैसला किया गया था। जाँच में पाया गया कि प्रस्तावित-प्रश्नपत्र के प्रश्नों से मिलते-जुलते कई प्रश्न परीक्षा से पहले ही प्रसारित हो गए थे। पुनर्परीक्षा 21 जून को होगी।

केंद्र सरकार अब यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है कि नीट-यूजी की पुनः परीक्षा बिना किसी गड़बड़ी या चूक के संपन्न हो। यहाँ मुख्य प्रयास विश्वास की स्थापना का भी है। यह विश्वास, नई व्यवस्था कायम करने के लिए भी ज़रूरी है। देश में सेना के प्रति जनता का विश्वास सबसे ज्यादा है। इसलिए उम्मीद की जा  रही है कि इस कदम से विश्वास पैदा होगा। बार-बार हो रहे लीक के कारण जन्मे गहरे अविश्वास को दूर करने के लिए इसकी ज़रूरत भी है।  

नीट परीक्षा के लिए विशेषज्ञों का एक गुप्त पैनल प्रश्नपत्र तैयार करता है। इसके बाद, उन्हें चुनींदा प्रिंटिंग प्रेसों में भेजा जाता है, जिन्हें उच्च स्तरीय जाँच के बाद चुना जाता है। इनकी छपाई सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होती है, जिनकी फुटेज को कम से कम एक वर्ष तक सुरक्षित रखा जाता है। प्रेस के अंदर केवल सीमित संख्या में ऑपरेटरों को ही अनुमति होती है। छपाई के बाद, पेपरों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जाता है। 3 मई के मामले की जाँच कर रही सीबीआई के सामने सवाल है कि लीकपरिवहन में हुआ या छपाई के दौरान। ऐसे जोखिमों को खत्म करने के लिए सरकार अंततः रक्षा बलों की मदद लेने का फैसला किया है।

Thursday, June 4, 2026

देसी बनाम विदेशी बनाम भाषा की शिक्षा


नई शिक्षा नीति के तहत स्कूलों में भाषाओं के अध्ययन से जुड़े कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल उच्चतम न्यायालय के सामने उठे हैं। इनके पीछे दक्षिण में हिंदी बनाम विदेशी भाषा के मसले भी हैं। अभिभावकों की व्यावहारिक समस्याएँ, विद्यालयों के पास उपलब्ध संसाधनों और अध्यापकों की संख्या जैसे सवालों का पिटारा भी अब खुलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने गत 27 मई को सीबीएसई की उस नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई है, जिसमें 1 जुलाई से कक्षा 9 के छात्रों के लिए दो भारतीय मूल भाषाओं सहित तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है।

बहरहाल, न्यायालय 15 और 16 जुलाई को दलीलें सुनेगा। उसी समय इस आदेश को लागू किया जा रहा होगा। शैक्षिक-प्रश्न के अलावा यह राजनीतिक प्रश्न भी है। अपनी भाषा-नीति के अनुरूप डीएमके ने इस कदम का विरोध किया है, वहीं कांग्रेस ने बिना परामर्श के अधिसूचना जारी होने की आलोचना की है। दक्षिण भारत, खासतौर से तमिलनाडु में कहा जा रहा है कि सीबीएसई का यह आदेश हिंदी थोपने का प्रयास है। यह आदेश सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों पर ही लागू होता है, जबकि राज्यों के बोर्डों के नियम अलग-अलग हैं। यदि यह ठीक से लागू हो गया, तो राज्यों में भी किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ेगा।  

हालाँकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली के पीठ ने इस मामले में कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है, पर उन्होंने केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी को नोटिस जारी करके दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब माँगा है। अदालत ने अलबत्ता यह कहा है कि बोर्ड का तीसरी भाषा को शामिल करने का निर्णय सिद्धांत रूप में ‘प्रशंसनीय’ हो सकता है, लेकिन इसे वर्तमान शैक्षणिक वर्ष से लागू करने में कुछ व्यावहारिक प्रश्न उठेंगे। शिक्षकों और पुस्तकों की कमी के मद्देनज़र इस नीति को लागू करने की तार्किक और तथ्यात्मक चुनौतियों को लेकर अदालत अधिक चिंतित है।

Wednesday, June 3, 2026

डिजिटल क्रांति के बीच RBI का प्लास्टिक नोट लाने का फैसला


डिजिटल दौर में भी बढ़ती नकदी को संभालने और फटे नोटों के खर्च से बचने के लिए आरबीआई अब टिकाऊ और सुरक्षित पॉलीमर नोट लाने की तैयारी कर रहा है। इस विषय पर बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादकीय में लिखा गया है कि:

 सरसरी तौर पर भले ही यह अनावश्यक लगे लेकिन यह निर्णय ध्यान देने लायक है। खासतौर पर तब जबकि भारत डिजिटल भुगतान में दुनिया में अग्रणी देश के रूप में उभरा है। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। नकदी को अप्रासंगिक बनाने के बजाय भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति के साथ-साथ मुद्रा के उपयोग में लगातार वृद्धि हुई है।

महँगाई और विदेशी-मुद्रा पलायन रोकने के भारतीय प्रयास

पश्चिम एशिया की लड़ाई का कोई हल नजर नहीं आ रहा है। होर्मुज जलसंधि मार्ग को, अमेरिका और ईरान दोनों ने बंद कर रखा है। इस रास्ते से भारत के 45-55 फीसदी खनिज तेल का आवागमन होता है। भारत के निर्यात पर भी असर पड़ा है। अर्थव्यवस्था पर दबाव नज़र आने लगा है। रुपये और शेयर बाजार की गिरावट ने भी चिंता का माहौल बनाया है।

लड़ाई शुरू होने के बाद से विदेशी मुद्रा भंडार में 38 अरब डॉलर की गिरावट और खनिज तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने के कारण बढ़ता दबाव नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से मितव्ययिता का आह्वान किया है, जिसके पीछे कारण है सोने का आयात और विदेश-यात्राओं पर विदेशी मुद्रा का खर्च।

खबर है कि इस तनाव के कारण भारत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों को बचाने के लिए रिजर्व बैंक ने अपने सोने के भंडार का एक हिस्सा बेचा है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स (BE) की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ भारत अर्थशास्त्री अभिषेक गुप्ता के अनुसार, RBI ने 22 मई को समाप्त हुए दो हफ्तों के भीतर लगभग 12 अरब डॉलर (करीब 1.14 लाख करोड़ रुपये) मूल्य का सोना बेचा है। इसी अवधि के दौरान केंद्रीय बैंक ने 7.5 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां खरीदीं। हालांकि इस मामले पर अभी तक रिजर्व बैंक की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

अमेरिका-ईरान: कभी हाँ, कभी ना की राजनीति


अनुमान है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अब किसी भी क्षण हो सकता है. फिर भी दोनों ने अपने हाथ खींच रखे हैं. इसके पीछे दो कारण नज़र आते हैं.

एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बना ले, वहीं ईरान का नेतृत्व दो हिस्सों में बँटा हुआ है. वहाँ का अनुदार तबका छूट देना नहीं चाहता.

अमेरिका इसे और व्यापक आधार देना चाहता है, जिसमें इसराइल की समस्या का समाधान भी है. वह मुस्लिम देशों से इसराइल को मान्यता दिलाना चाहता है, जो इस लड़ाई की बुनियाद में है.

बहरहाल दोनों देशों की सहमतियों के बावज़ूद, समझौता अटका हुआ है. राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को वाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अपने प्रमुख सलाहकारों के साथ बैठक की, लेकिन उन्होंने अंतिम फैसला टाल दिया.

इस कक्ष का इस्तेमाल बड़े संकटों से निपटने की रणनीति बनाने या चर्चा करने के लिए होता है. अभी स्पष्ट नहीं है कि समझौते की घोषणा कब होगी, होगी भी या नहीं.

ईरान के मुख्य वार्ताकार, जनरल मोहम्मद बग़ेर ग़ालिबफ़ ने दिन में  सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, तेहरान को वाशिंगटन पर भरोसा नहीं है. उनके किसी कदम के बिना, हम पहला कदम नहीं उठाएँगे.

Friday, May 29, 2026

दही होता है या होती है?


दही होता है या होती है? हाथी चलता है या चलती है? पतंग उड़ती है या उड़ता है? प्याज होती है या होता है? जेब होती है या होता है? चौपाल लगती है या लगता है? ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों शब्द हैं। हिंदी की वर्तनी को लेकर, जितनी ज्यादा बहस है, उतने समाधान नहीं हैं। हिंदी में 'शिकागो मैनुअल ऑफ स्टाइल' जैसा ग्रंथ बनाने की कोशिश नहीं हुई, जिसे कम से कम भाषा-बरतने वाले बड़े वर्ग का समर्थन मिले। केंद्रीय भाषा निदेशालय की वर्तनी पुस्तिका है, पर वह केवल वर्तनी तक सीमित है, और उसे भी पूरा समर्थन प्राप्त नहीं है। हिंदी की पाठ्य पुस्तकों, पत्र सूचना कार्यालय की प्रेस विज्ञप्तियों, रेलवे और मेट्रो स्टेशनों के सूचना पटों, यहाँ तक कि करेंसी नोटों में भी विसंगतियाँ हैं। सरकारी वैबसाइटों के हिंदी संस्करण गूगल ट्रांसलेटर की हिंदी के सहारे चलते हैं।   

करीब डेढ़ दशक पहले मुझसे एक पत्रकार मित्र ने पूछा मॉनसून क्यों, मानसून क्यों नहीं? दक्षिण भारतीय भाषाओं में और अंग्रेज़ी सहित अनेक विदेशी भाषाओं में ओ और औ के बीच में एक ध्वनि और होती है। ऐसा ही ए और ऐ के बीच है। Call को देवनागरी में काल लिखना अटपटा है। देवनागरी ध्वन्यात्मक लिपि है तो हमें अधिकाधिक ध्वनियों को उसी रूप में लिखना चाहिए। इसलिए वृत्तमुखी ओ को ऑ लिखते हैं। हिंदी के अलग-अलग क्षेत्रों में औ और ऐ को अलग-अलग ढंग से बोला जाता है। मेरे विचार से बाल और बॉल को अलग-अलग ढंग से लिखना बेहतर होगा।

Thursday, May 28, 2026

मुस्लिम देश क्या अब्राहम समझौते को स्वीकार करेंगे?

15 सितंबर 2020 को वाइट हाउस में हुए समझौते के समय की तस्वीर

 अब्राहम समझौते को पश्चिम एशिया में ऐतिहासिक शांति पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वास्तव में, वे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के पहले दौर में किए गए समझौते थे, जिसके तहत कुछ अरब देशों ने फलस्तीनी मुद्दे को हल किए बिना इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य कर लिया । अब ट्रंप फिर से समझौतों का विस्तार करने के इच्छुक दिखाई देते हैं। वे वर्तमान क्षेत्रीय-अस्थिरता का इस्तेमाल करते एक बड़ा समझौता करना चाहते हैं, जो पश्चिम एशिया की एक मूल समस्या को संबोधित करता है।

क्या वे इसमें सफल होंगे? हालाँकि कुछ देश इसमें शामिल हो चुके हैं, पर शेष मुस्लिम देशों के लिए इसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल होगा। पर इसमें सऊदी अरब शामिल हुआ, तो पाकिस्तान जैसे देश के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। पाकिस्तानी दृष्टिकोण रहा है कि इसराइल को तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती जब तक कि फलस्तीनियों  के लिए एक उचित समाधान और एक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य के निर्माण पर स्पष्टता नहीं होती है।

उधर इसराइल ने इस समस्या के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ने की बहुत कम इच्छा दिखाई है। उसके कब्जे वाले क्षेत्र में यहूदी बस्तियों का विस्तार जारी है। गज़ा का इलाका बमबारी से तबाह हो गया है। जॉर्डन नदी के पश्चिमी किनारे में हिंसा जारी है। ऐसी परिस्थितियों में ट्रंप की नए सिरे से रुचि इसराइली लॉबी के प्रभाव को दर्शाती है। सरकारें रणनीतिक कारणों से इस किस्म की डिप्लोमेसी में शामिल हो सकती हैं, पर आम लोग फलस्तीनी समस्या को पश्चिम एशिया में न्यायपूर्ण समझौते के रूप में देखना चाहते हैं।

अब्राहम समझौते क्या हैं?

राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार 25 मई को पश्चिम एशियाई देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने का आह्वान किया। अब्राहम समझौते अमेरिका की मध्यस्थता से इसराइल और कई अन्य देशों के बीच हुए सामान्यीकरण समझौते हैं, जिन्हें उन्होंने अपने पहले कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक उपलब्धियों में से एक बताया था।

ट्रंप ने अब सोशल मीडिया पर कहा कि अगर और देश इस समझौते में शामिल होते हैं तो मध्य पूर्व में सहयोग और भी मजबूत होगा, और उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ईरान भी उनमें से एक हो सकता है। उन्होंने एक अलग पोस्ट में इस आह्वान को दोहराते हुए कहा कि उन्होंने सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए ‘तैयार, इच्छुक और समर्थ’ हों। पिछले साल नवंबर में, कजाकिस्तान भी इसमें शामिल हो गया। उसके इसराइल के साथ पहले से ही पूर्ण राजनयिक संबंध थे।

Wednesday, May 27, 2026

भारत-अमेरिका रिश्तों में ‘गाँठ’ तो पड़ ही गई है


हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बीजिंग में रंगारंग कार्यक्रमों के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जमकर तारीफ करते हुए उन्हें ‘महान नेता’ और ‘मित्र’ बताया. इसके बाद वे एशिया के किसी और देश में रुके बिना अमेरिका वापस लौट आए. यात्रा के दौरान और बाद के साक्षात्कारों में उन्होंने अमेरिकी सहयोगियों या साझेदारों के बारे में कोई आश्वस्तिकारक बात नहीं कही.

ऐसा ही उन्होंने पिछले साल भारत-पाकिस्तान टकराव के बाद फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का स्वागत करते हुए किया था. भारत की जनता और विश्लेषकों ने पिछले एस साल से खामोशी के साथ उनके बर्ताव को देखा है.

उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया, कि ट्रंप ने बीजिंग में फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिका और चीन के बीच संबंधों को संदर्भित करने के लिए जी2 शब्द का इस्तेमाल किया. टू ग्रेट कंट्रीज़.

और अब भारत आए अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यापार और ऊर्जा पर चर्चा की. हालाँकि वे क्वॉड विदेशमंत्रियों की बैठक के सिलसिले में भारत आए हैं, पर पर्यवेक्षक इसे भारत-अमेरिका रिश्तों को पटरी पर वापस लाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं.

दरार पाटेंगे

वे मानते हैं कि यह यात्रा वॉशिंगटन द्वारा लगाए गए टैरिफ और पाकिस्तान और चीन के साथ अमेरिका के बदलते रिश्तों के कारण भारत के साथ संबंधों में आई दरार को भरने के इरादे से की गई है.

भारत के साथ संबंधों को ‘रणनीतिक गठबंधन’ बताते हुए, रूबियो ने रविवार को इस बात पर जोर दिया कि भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जिनका ‘वैश्विक प्रभाव’ है और ‘वैश्विक घटनाओं को प्रभावित करने की क्षमता’ है.

विदेशमंत्री एस जयशंकर के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में रूबियो ने भारत से वैध प्रवासन, भारतीयों और भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियों और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ अमेरिका के घनिष्ठ संबंधों से जुड़ी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की. साथ ही आश्वासन दिया कि भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कोई कमी नहीं आई है.

रूबियो के बराबर खड़े भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने कहा, ट्रंप प्रशासन ने अपनी विदेश-नीति को 'अमेरिका फर्स्ट' के रूप में व्यक्त किया है.’ और, ‘हमारी नीति 'इंडिया फर्स्ट' है.’

Tuesday, May 26, 2026

आशा की किरण, भारत-ओमान समुद्री पाइपलाइन


होर्मुज़ जलसंधि का रास्ता बंद होने और भारत में ऊर्जा-संकट के बादल गहराने से जुड़ी खबरों के बीच एक खबर को ज्यादा सुर्खियाँ नहीं मिल पाईं कि भारत, गहरे समुद्र में एक गैस पाइपलाइन परियोजना पर विचार कर रहा है, जो हमें ओमान से जोड़ेगी। भारत सरकार ने अब इसपर तेजी से काम करना शुरू किया है, जिसके परिणामों का इंतजार है।  

हाल में कुछ मीडिया स्रोतों ने पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारियों को उद्धृत करते हुए खबर दी है कि मंजूरी मिली, तो करीब 4.8 अरब डॉलर की लागत से बनने वाली परियोजना खाड़ी क्षेत्र से निर्बाध गैस आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। परियोजना को समय से हरी झंडी मिली, तब भी इसे पूरा होने में पाँच से सात साल लगेंगे। उसके पहले इसके सभी आर्थिक और तकनीकी पहलुओं पर विचार करना भी ज़रूरी होगा।

सौ साल से ज्यादा समय से इसकी परिकल्पना चल रही है। इसपर यूपीए सरकार के दौर में भी बात चली थी। ओमान की वैबसाइट मस्कट डेलीकी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार नई दिल्ली स्थित निजी क्षेत्र के कंसोर्शियम साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (सेज) द्वारा प्रस्तुत पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन पर विचार कर रही है, जो समुद्र तल की स्थितियों का अध्ययन करने के लिए टेस्ट-सेक्शन बिछा रह है।

Saturday, May 23, 2026

क्या हम बंदरों की संतानें हैं?


विज्ञान के अनुसार, मनुष्य सीधे तौर पर आज के बंदरों की संतान नहीं है।  इसके बजाय, दूसरे शब्दों में कहें कि इंसान और आज के बंदर (जैसे चिम्पांजी) दोनों एक ही विलुप्त हो चुके प्राचीन 'वानर (Ape)' प्रजाति के वंशज हैं। लाखों वर्ष के क्रमिक विकास (Evolution) के बाद दोनों अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए हैं। मानव उत्पत्ति और विकास के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस प्रकार है:

उद्विकास सिद्धांत (Evolution Theory) साझा पूर्वज (Common Ancestor): लगभग 60-80 लाख वर्ष पहले एक ऐसा जीव धरती पर मौजूद था, जो इंसानों और आज के चिम्पांजी दोनों का साझा पूर्वज था। समय के साथ उस प्रजाति के जीव अलग-अलग वातावरण में रहने लगे और खुद को ढालने (Evolve) लगे। इसी प्रक्रिया में एक शाखा आधुनिक मानव (Homo sapiens) के रूप में विकसित हुई।

डीएनए (DNA) प्रमाण: आनुवंशिक शोध बताते हैं कि आधुनिक मानव का डीएनए चिम्पैंजी के डीएनए से लगभग 98.8% तक मेल खाता है, जो दर्शाता है कि हमारे पूर्वज एक ही थे। अधिक जानकारी के लिए आप स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के मानव उत्पत्ति कार्यक्रम के आनुवंशिकी प्रमाण देख सकते हैं।

सवाल है कि मनुष्य और चिंपैंजी के बीच फर्क कैसे पैदा हुआ? मनुष्य सभी प्राणियों से भिन्न और विवेकशील कैसे बना? वैज्ञानिक मानते हैं कि करोड़ों साल पहले इनके साझा पूर्वज हुआ करते थे। वातावरण में बदलाव, प्राकृतिक चयन और आनुवंशिक उत्परिवर्तन (Genetic Mutation) के कारण दोनों की प्रजातियों के रास्ते अलग हो गए। इन दोनों प्रजातियों में यह बड़ा अंतर मुख्य रूप से इन कारकों से पैदा हुआ:

मस्तिष्क का विकास और क्षमता: इंसानों का मस्तिष्क चिंपैंजी से लगभग तीन गुना बड़ा हो गया, विशेषकर 'सेरेब्रम' (Cerebrum) का हिस्सा। इससे इंसानों में अमूर्त सोच (Abstract Thinking), जटिल भाषा और योजना बनाने की क्षमता विकसित हुई।

सीधे खड़े होकर चलना (Bipedalism): लाखों साल पहले जलवायु परिवर्तन के कारण जब जंगल कम होने लगे, तब मानव पूर्वजों ने जमीन पर सीधे खड़े होकर चलना शुरू किया। इससे उनके हाथ औजार बनाने और उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हो गए।

सुरजीत भल्ला की आलोचनात्मक टिप्पणी

सुरजीत भल्ला को आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार का समर्थक माना जाता है, पर हाल में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित उनके एक लेख को भाजपा-विरोधियों ने भी खूब शेयर किया है। इसकी वजह है कि भल्ला ने सरकार की बुनियादी आर्थिक-नीतियों की आलोचना की है। वे आर्थिक-सुधारों के पक्षधर हैं, पर उन्हें लगता है कि सरकार राजनीतिक कारणों से सुधारों को भूल रही है। मैंने यहाँ उनके आलेख के मुख्य अंश को हिंदी में पेश किया है, साथ ही उनकी इंडिया टुडे की प्रतिनिधि मारिया शकील और आज तक के प्रतिनिधि साहिल जोशी से बातचीत के अंश को भी प्रस्तुत किया है। पहले पढ़ें उनका लेख:

भाजपा चुनाव तो जीत रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था को खो रही है

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत राजनीतिक प्रदर्शन की चरम सीमा और एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। 2029 में नरेंद्र मोदी को मिली ज़बरदस्त जीत ही पार्टी के लिए बंगाल में हासिल की गई चुनावी सफलता को पार करने का एकमात्र रास्ता है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा द्वारा अर्थव्यवस्था को संभालने का तरीका बेहद खराब रहा है और यह कहना मुश्किल है कि स्थिति और खराब नहीं होगी। सबसे अहम सवाल यह है: क्या ये दोनों घटनाएं महज़ संयोग हैं या एक साथ घटित हुईं? जवाब है दूसरा विकल्प-आगे विस्तार से बताया जाएगा।

आर्थिक संकट के लिए चार कारक जिम्मेदार हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारक स्वयं सरकार है। सरकार समस्या को पहचानती तो है, लेकिन संकट के लिए दूसरों को दोष देने में संतुष्ट है-इस मामले में, दूसरा कारक: प्रमुख उद्योग। तीसरा कारक कांग्रेस पार्टी है, जो गांधी परिवार के नेतृत्व में इतनी सहज है कि भाजपा का एकदलीय लोकतांत्रिक शासन लगभग सुनिश्चित है। चौथा कारक शीर्ष तीन को नियंत्रित करने वाला कठपुतली शासक है: गुप्त राज्य। संकट इसलिए बना हुआ है क्योंकि अर्थव्यवस्था लगातार उस गति से बढ़ रही है जिसे दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ने का दावा किया जाता है।

Tuesday, May 19, 2026

किसे चाहिए ईमानदारी?

पत्रकारिता या दूसरे शब्दों में कहें, तो ईमानदार पत्रकारिता की ज़रूरत किसे है? पत्रकारों को, उनके संगठनों को, प्रेस क्लबों को, मीडिया-मालिकों को, राजनीतिक दलों को या आम जनता यानी पाठकों और दर्शकों को? सिद्धांततः पत्रकारिता खुद में एक प्रकार की राजनीति है। ऐसी राजनीति जिसका केंद्रीय विषय सार्वजनिक हित है, सत्ता पाना नहीं। सत्ता की राजनीति भी ऐसा ही दावा करती है, पर वह जिन आधारों पर चल रही है, वे संकीर्ण होते जा रहे हैं। पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि वह उन संकीर्ण आधारों पर चोट करे। इसके लिए उसे अपनी साख बनानी होगी।

यह काम पत्रकारिता ने अपने लिए खुद तय नहीं किया है, बल्कि समाज ने तय किया है। शुरूआती पत्रकार ताकतवर राजनेताओं के लिए पैम्फलेट लिखते हुए ही इस धंधे में आए थे। पर आज की लोकतांत्रिक-व्यवस्था में पत्रकार की जरूरत सोसायटी को है, और इस बात में ही तमाम पेच हैं। वोटर को सूचना चाहिए, जिसके आधार पर वह अपनी राय बनाए।

सोलह साल पहले नीरा राडिया ने बड़ी ईमानदारी से अपना काम किया। पता नहीं वे अपने क्लाइंट्स के दृष्टिकोण को किस हद तक मीडिया में ला पाने में कामयाब हुईं, पर इतना तय है कि उन्होंने उसी तरह काम किया जैसी हमारे मीडिया की संरचना है। एक दौर तक इस मीडिया के भीतर कुछ आदर्श थे, जो अब आउटडेटेड हैं। ओल्ड स्टाइल मीडिया माने जो सूचना के गैर-वाजिब इस्तेमाल को तैयार न हो। और नए स्कूल के माने? सवाल है कि क्या सब ऐसे ही रहेगा?

मुझे रसूख चाहिए

कुछ साल पहले मुझे माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल जाने और नए पुराने छात्रों से संवाद करने का मौका मिला। मौका था नए सत्र का आरम्भ, जिसका समारोह था। मैंने सभा में बैठे छात्रों से पूछा- आप पत्रकार क्यों बनना चाहते हैं?  ज्यादातर का जवाब था- सामाजिक जरूरत के लिए। पाठकों को सही जानकारी देने के लिए। एक छात्र ने खड़े होकर कहा, “ मैं पैसे, पहचान और ऊंची पहुंच और रसूख बनाने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं।” पूरे हाउस में ठहाका लगा।

पता नहीं उस छात्र ने वह बात गंभीरता में कही या मजाक में, पर यह महत्वपूर्ण बात थी। सभी न सही कुछ पत्रकार सेलिब्रिटी बन रहे हैं। पैसे, पद औऱ पहचान के लिहाज से वे टॉप पर आने लगे हैं। इसकी कीमत कौन देता है? पत्रकार महात्मा गांधी थे, तिलक भी। महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर राजेंद्र माथुर तक तमाम नाम हैं। उस छात्र का आशय जो भी रहा हो, पर उसने कहा, मैं ताकत चाहता हूँ जिससे लोग डरें।