Tuesday, April 14, 2026

‘युद्धविराम’ जो है ही नहीं!


पश्चिम एशिया की लड़ाई में युद्धविराम के बाद इस्लामाबाद में हुई पहली बातचीत के सफल नहीं होने का मतलब यह भी नहीं है कि वह विफल हो गई. ऐसे मसले एक दिन की वार्ता से हल होते भी नहीं हैं.

अब सवाल पूछा जा सकता है कि तब क्या दो हफ्ते बाद लड़ाई फिर से उसी बिंदु से शुरू हो जाएगी, जहाँ पर वह रुकी थी? कोई नहीं कह सकता कि अब क्या होगा. सबसे बड़ी बात है कि लड़ाई रुकी नहीं है, बल्कि उसका तरीका बदला है.

लेबनान में तो लड़ाई चल ही रही है. और ट्रंप की घोषणा के बरक्स अमेरिकी सेंटकॉम ने होर्मुज की नाकाबंदी शुरू कर दी है, जिसके बाद दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने हैं. यह बात बड़े खतरनाक परिदृश्य को जन्म दे रही है.  

दूसरी तरफ बातचीत भी रुकी नहीं है, किसी न किसी स्तर पर चल ही रही है. ऐसे मसलों के फैसले सोशल मीडिया की पोस्टों और मीडिया के विश्लेषणों से तय नहीं होते हैं, बल्कि बैकरूम वार्ताओं से ही तय होते हैं.

इन बातों के मद्देनज़र तीन-चार प्रत्यक्ष मुद्दे सामने आ चुके हैं, परोक्ष मुद्दे अक्सर कभी सामने नहीं आते. 

हरमूज़ की नाकाबंदी

इस्लामाबाद वार्ता खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना ने रविवार को कहा कि वह ‘ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहाँ से निकलने वाले’ किसी भी जहाज की नाकाबंदी करेगी. उसके पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग हरमूज़ (या होर्मुज) को पूरी तरह से अवरुद्ध करने की घोषणा की थी.

अब यह नाकाबंदी शुरू हो चुकी है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा था कि ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे (यानी भारतीय समयानुसार रात 8.30 बजे) से शुरू होगी. 

इसमें यह भी कहा गया है कि अमेरिकी सेनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य से गैर-ईरानी बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेंगी. एक तरह से यह लड़ाई जारी रहने की घोषणा ही है.

Sunday, April 12, 2026

बात हुई, पर बनी नहीं

जेडी वेंस की इस्लामाबाद से वापसी

पश्चिम एशिया की लड़ाई, जितने नाटकीय तरीके से शुरू हुई, उतने ही नाटकीय तरीके से उसका युद्धविराम हुआ। चारों तरफ नाटकों की भरमार नज़र आ रही है। नाटकीय तरीके से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त
ड्राफ्ट को अपना कहकर एक्स पर जारी किया। उस सूचना की पर्याप्त फज़ीहत होती, उसके पहले ही शनिवार की शाम इस्लामाबाद वार्ताका नाटकीय पटाक्षेप हो गया। अब इस नाटक के दूसरे अंक की प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि समस्या जस की तस है। देखना यह भी होगा कि पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता जारी रहेगी या इस शतरंज की बिसात पर कोई नया मोहरा रखा जाएगा।

Wednesday, April 8, 2026

अब अंतरिक्ष में वर्चस्व की चीन-अमेरिका दौड़


अमेरिका ने 2 अप्रैल को चंद्रमा की परिक्रमा करने के लिए आर्टेमिस 2 यान भेजा है, जिसमें चार यात्री सवार है. 54 वर्षों में यह पहली मानवयुक्त चंद्र उड़ान है, जो चंद्रमा के चक्कर लगाकर 10 अप्रैल को पृथ्वी पर लौटेगी.

यह यान एक बार फिर से मनुष्य को चंद्रमा पर उतारने की तैयारी में गया है. उधर चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) को उम्मीद है कि वह 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतार देगी. चीन पहले ही कई रोबोट चंद्रमा पर भेज चुका है और चंद्र नमूने वापस ला चुका है. 

ये दो समांतर यात्राएँ केवल चंद्रमा तक पहुँचने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि भविष्य के अंतरिक्ष-अनुसंधान में वर्चस्व की कहानी लिखने वाली हैं. पाँच दशक पहले के चंद्र मिशन अमेरिका और सोवियत संघ के बीच श्रेष्ठता की होड़ का हिस्सा थे. यह स्पर्धा अब चीन और अमेरिका के बीच है.

आर्टेमिस 2 का लॉन्च ऐसे वक्त में हुआ है, जब ईरान की लड़ाई चल रही है. पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस रेस का आग़ाज़ करके अमेरिका अपने वर्चस्व की याद दिलाना चाहता है. वहीं कुछ मानते हैं कि चीन साबित करना चाहता है कि यह अमेरिकी पराभव का प्रारंभ है.

चंद्रमा का महत्त्व

आर्टेमिस मिशन में भारत सहित 50 से अधिक देश शामिल हैं. इसकी टीम अगले दो वर्षों में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की खोज करने के लिए प्रारंभिक कार्य करने का इरादा रखती है. इस इलाके में पानी है और बर्फ के भंडार भी. इससे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का उत्पादन करके रॉकेटों के लिए ईंधन तैयार किया जा सकता है.

आर्टेमिस मिशन के यात्री 2028 में चंद्रमा पर उतरने से पहले जीवन-सहायता प्रणालियों और नेवीगेशन क्षमताओं का परीक्षण करेंगे. इस काम में वे चीन के लक्ष्य से दो साल आगे हैं. चीन का लक्ष्य 2030 में चंद्रमा पर अपने यात्रियों को उतारने का है.

Monday, April 6, 2026

पाँच राज्यों के चुनाव: एनडीए और ‘इंडिया’ दोनों की परीक्षा

यों तो हरेक चुनाव महत्त्वपूर्ण होता है, पर पाँच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भावी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस की प्रासंगिकता की एक और परीक्षा होंगी, वहीं बंगाल में बीजेपी की संगठन-क्षमता की परीक्षा होगी। क्या वह तृणमूल कांग्रेस के चक्रव्यूह को इस बार भेद पाएगी? पार्टी के सामने तमिलनाडु और केरल के प्रवेशद्वार को पार करने की परीक्षा भी है। 

2024 के लोकसभा चुनावों में विरोधी इंडिया गठबंधन के मन में एक आस जागी थी। उस आस की भी परीक्षा इन चुनावों में होगी। 2024 के बाद छह में से चार राज्यों में बीजेपी के हाथों शिकस्त खाने के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विरोधी दलों के पास नई रणनीति बनाने और नए राजनीतिक मुहावरे गढ़ने का मौका है। कांग्रेस के लिए अब करो या मरो की स्थिति है।

संसद में विपक्षी गठबंधन की तीसरी और चौथी सबसे बड़ी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके को अपनी ताकत को साबित करने का मौका भी अब मिलेगा। वहीं ठंडे पड़ते वाममोर्चे को केरल में कुछ अभूतपूर्व कर दिखाने और बंगाल में कम से कम  हाज़िरी लगाने का एक मौका और मिलेगा। बंगाल और केरल में विरोधी गठबंधन के अंतर्विरोध भी दिखाई पड़ेंगे। बंगाल में जहाँ टीएमसी, कांग्रेस और वामपंथी दल अकेले चुनाव लड़ रहे हैं, और केरल में, जहाँ कांग्रेस और वामपंथी दल आमने-सामने हैं।

कांग्रेस

2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 2014 के बाद के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रूप में 99 सीटें मिली थीं। इससे उम्मीद जागी थी कि कांग्रेस का पुनरुत्थान हो सकता है। उसके बाद से पार्टी एक भी राज्य का चुनाव नहीं जीत पाई है। हरियाणा और दिल्ली में उसे भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा और महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा नीत गठबंधन के हाथों।

Friday, April 3, 2026

अंतरिक्ष में चीन और अमेरिका की रेस


अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासाने 2 अप्रैल को ऐतिहासिक आर्टेमिस 2 मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से सुबह 3:54 बजे (भारतीय समयानुसार) एसएलएस रॉकेट के जरिए चार अंतरिक्ष यात्री 10 दिनों की चंद्रमा यात्रा पर निकले हैं। 54 वर्षों में यह पहली मानवयुक्त चंद्र उड़ान है, जो चंद्रमा चक्कर लगाकर 10 अप्रैल को पृथ्वी पर लौटेगी। उधर चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) को उम्मीद है कि वह 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतार देगी। चीन पहले ही कई रोबोट चंद्रमा पर भेज चुका है और चंद्र नमूने वापस ला चुका है।  

चीन इस साल अपने नए मेंगझोऊ (ड्रीम शिप) अंतरिक्ष यान की परीक्षण उड़ान आयोजित करने जा रहा है। पुराने शेनझोउ की जगह लेने वाला यह अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्र कक्षा में ले जाएगा। संभव है कि चंद्रमा पर अमेरिकी यात्री पहले उतर जाए, पर इस बात के आसार बन रहे हैं कि स्पेस साइंस में अब अमेरिका के साथ चीन बराबरी के स्तर पर आने की होड़ में है।

अभी इसे बराबरी कहना आसान नहीं है, पर एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें वह अमेरिका के बराबर आ गया है या कुछ आगे निकल गया है। वह है स्पेस नेवीगेशन। चीन के बेइदू ने अमेरिकी जीपीएस को पीछे कर दिया है। इस बात को अमेरिकी विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं। चीन को उम्मीद है कि वह 2035 तक चंद्रमा पर समानव वैज्ञानिक बेस का एक बुनियादी संस्करण तैयार कर लेगा, जिसे इंटरनेशनल ल्यूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस) कहा जाएगा।

यह बेस चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास बनाया जाएगा, जहाँ बर्फ के रूप में पानी मौजूद होने की संभावना है। इस परियोजना में रूस भी चीन के साथ है। दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन ने लगभग 20 अरब डॉलर की लागत से चंद्रमा पर एक बेस बनाने का कार्यक्रम शुरू किया है।

इसके विपरीत, नासा का आर्टेमिस चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम लगातार पिछड़ रहा है। आर्टेमिस 2 समानव फ्लाई बाय यान है, लैंडिंगक्राफ्ट नहीं। कई बार स्थगित होने के बाद 2 अप्रैल को इसका प्रक्षेपण हो पाया। पहली अमेरिकी मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग को आर्टेमिस 4 तक टाल दिया गया है, जो 2028 से पहले संभव नहीं। चीन का कार्यक्रम, जो तीन दशकों से अधिक समय से एक एकीकृत योजना पर आधारित है, काफी हद तक उस राजनीतिक उथल-पुथल से अछूता रहा है, जो अमेरिका में तल रही हैं।  

Thursday, April 2, 2026

बंगाल माँगे एक और ‘पोरिबोर्तोन!’

पिछले सात-दशक के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो साफ दिखाई पड़ता है कि पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाम राजनीति और राजनीति के मायने हिंसा हो गए हैं।  2011 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जबर्दस्त जीत दिलाकर जब ममता बनर्जी सत्ता के रथ पर सवार हुईं थीं, तब उनका ध्येय-वाक्य था ‘पोरिबोर्तोन।’ आज भारतीय जनता पार्टी का भी यही ध्येय-वाक्य है। वे परिवर्तन का नारा लेकर सफल हुई थीं, क्योंकि बंगाल की जनता वामपंथी तौर तरीकों से परेशान हो गई थी। वह बदलाव चाहती थी।

ममता बनर्जी कम से कम तीन कारणों से अपना रौब-दाब कायम रखने में अब तक सफल हुई हैं: एक, जुझारू छवि, दो, कल्याणकारी कार्यक्रम और तीन, सांप्रदायिक झुकाव। अपनी जुझारू छवि क उन्होंने केंद्र से विरोध को जोड़कर रखा है। मतदाता सूचियों में गहन संशोधन की प्रक्रिया का जिस स्तर का विरोध उन्होंने किया है, वह अभूतपूर्व है। इसके अलावा उन्होंने राज्य में केंद्र सरकार द्वारा घोषित कल्याण कार्यक्रमों का प्रवेश वस्तुतः पूरी तरह रोक रखा है।

आगामी चुनाव में वे भवानीपुर सीट से खड़ी हुई हैं, जहाँ उनके मुकाबले बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी खड़े हैं, जिन्होंने 2021 में उन्हें नंदीग्राम से अपमानजनक हार दी थी। इस वर्ष रमज़ान और नवरात्र एक साथ थे। दोनों प्रत्याशियों ने अपने अभियान की शुरुआत अपने-अपने सांकेतिक तरीकों से की। ममता बनर्जी कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फ़ित्र की नमाज में शामिल हुईं, और सुवेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर गए।

ममता बनर्जी के पिछले 15 साल के कार्यकाल को देखें, तो यह बात आसानी से समझ में आ जाएगी। इनमें से पहले से चली आ रही कुछ बातों को उन्होंने अपनाया और कुछ का आविष्कार किया। उनकी राजनीति की शुरुआत शहरों से हुई थी। बंगाल के शहरों में रहने वाला मध्य वर्ग, वामपंथी राजनीति से आजिज़ आ गया था। वही मध्यवर्ग आज ममता से नाराज़ नजर आता है, क्या गाँवों में भी यही स्थिति है?

अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं, सवाल किया जा रहा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी, राज्य में एक और बड़े परिवर्तन की सूत्रधार बनेगी? क्या परिस्थितियाँ 2011 जैसी हैं? वामपंथी दलों के 34 साल के शासन की अभेद्य नज़र आने वाली दीवार को ममता ने तोड़ा था। अब ममता के शासन के भी 15 साल हो रहे हैं। क्या उनकी विदाई होगी? क्या ऐसा संभव है?

Wednesday, April 1, 2026

कहाँ जाकर रुकेगा पाक-अफ़ग़ान टकराव?


पश्चिम एशिया में युद्ध भड़क के बाद हमारा ध्यान यूक्रेन और अफ़ग़ानिस्तान से हट गया, जबकि वहाँ भी लड़ाइयाँ चल रही हैं. ईरान की लड़ाई रुक भी जाएगी, पर लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव जल्द खत्म नहीं होगा.

पाकिस्तान ने पिछली 25 मार्च को कहा कि उसकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ अभियान फिर से शुरू कर दिया है. क्या वजह है कि पाकिस्तान ने इस समय बड़ा फौजी अभियान चलाने का फैसला किया है? क्या इसका संबंध भी ईरान-युद्ध से है? क्या इसके पीछे अमेरिका की सहमति या उसकी ही योजना है?

ऐसे कुछ सवाल भी ज़ेहन में आते हैं. जो बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान के मामले में भारत को महत्त्व दिया था, पर इस समय ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान पर पूरा भरोसा है. ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा है कि तालिबान हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा करने का पाकिस्तान को पूरा अधिकार है.

अस्पताल पर हमला

हाल में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तानी हवाई हमले में 400 से अधिक लोग मारे गए थे. पाकिस्तान का कहना है कि हमने ये हमले ‘फौजी ठिकानों और आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए’ किए थे.

बहरहाल ईद के मौके पर तुर्की, कतर और सऊदी अरब के अनुरोध पर युद्ध-विराम की घोषणा की गई थी. इसके बाद इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग में प्रवक्ता ताहिर अंदराबी ने कहा, यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो जाते.

Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दुष्प्रभावों से निपटने को तैयार भारत


जिन लोगों को आज से तीन दशक पहले की बातें याद हैं, उन्हें गैस एजेंसियों, सरकारी राशन और चीनी की दुकानों के आगे लगी कतारें भी याद होंगी. पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ कुछ यादें ताज़ा हो गई हैं.

उसके पहले चीन युद्ध के बाद देश में खाद्य संकट पैदा हुआ था और हमें काफी समय तक अमेरिकी गेहूँ खाना पड़ा था. शायद वह काफी पुरानी बात हो गई, पर कोविड महामारी तो हाल की बात है, जब शहर-शहर गाँव-गाँव लॉकडाउन के कारण रोज़ी-रोज़गार पर तो संकट आया, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी चुनौती बन गई.

पश्चिम एशिया की लड़ाई ने हमें एकबार फिर से चौंकाया है. आपदाएँ किसी भी वक्त आ सकती हैं, पर भारत की विशेषता है कि वह संकटों का सामना आसानी से कर लेता है. आपको समझना ही है, तो इस समय अपने पड़ोसी देशों की स्थिति पर एक बार नज़र ज़रूर डालें.

कहना मुश्किल है कि लड़ाई जल्द खत्म होगी या देर से होगी. इसलिए मानकर चलिए कि समस्याएँ नए रूप में भी आ सकती है. ऐसे में आपके धैर्य, अनुशासन और एकजुटता की सबसे बड़ी ज़रूरत है. भाईचारा बनाकर रखें. बेशक संकट आया है, तो दूर भी होगा.

प्रधानमंत्री का बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारत के सामने खड़ी 'अप्रत्याशित चुनौतियों' का ज़िक्र करते हुए कहा है कि हम उनका सामना करने में समर्थ हैं. सच यह है कि देश अतीत में ऐसे संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर चुका है.

अलबत्ता प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि इस टकराव का असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका है. ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि महामारी और युद्ध का आगमन आगे-पीछे हुआ है. कोविड के दौरान भी सप्लाई चेन में संकट पैदा हुआ था और देश ने एकजुटता से उसका मुकाबला किया.

भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी अनेक ज़रूरी चीजें होर्मुज़ जलसंधि मार्ग से आती हैं. युद्ध के बाद से ही वहाँ से जहाज़ों का आना-जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. बावजूद इसके, हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बहुत ज़्यादा प्रभावित न हो.

Wednesday, March 25, 2026

ट्रंप को अब युद्ध से निकलने के रास्ते की तलाश


ईरान-युद्ध शुरू होने के पहले से ही कहा जा रहा था कि लड़ाई शुरू हो गई, तो उसे खत्म करना मुश्किल हो जाएगा. यह बात अब सच साबित हो रही है. अब ट्रंप अपनी योजनाओं को लेकर किंतु-परंतु करने लगे हैं. पहले धमकी दी कि ईरानी ऊर्जा केंद्रों पर हमले करेंगे और फिर कहा कि 120 घंटे तक ऐसा नहीं करेंगे.

उनका यह भी कहना है कि ईरान से बात चल रही है. पाकिस्तान के हाथों 15 सूत्री प्रस्ताव भेजा है.  उधर ईरान के नेता कह रहे हैं कि हमारी कोई बात नहीं हो रही है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि जब से राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान-युद्ध में ‘प्रवेश’ किया है, तब से वे इस सवाल से रूबरू हैं कि इसे समाप्त कब करेंगे? सच यह है कि युद्ध के उनके कई घोषित लक्ष्य अब भी अधूरे हैं.

ट्रंप ने ईरान-युद्ध के लिए ‘भ्रमण’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया है, ताकि लगे कि कोई बड़ी परेशानी की बात नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से लगता है कि वे फँस गए हैं.

अब वे परेशान हैं. पिछले शुक्रवार शाम को जब ट्रंप फ्लोरिडा के लिए रवाना हुए, तो ऐसा लग रहा था कि वे शायद लड़ाई को कोई मोड़ देकर एक्ज़िट यानी हाथ खींचने की घोषणा करेंगे.

बहरहाल अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है. दूसरी तरफ उनकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की परेशानियाँ बढ़ती जा रही हैं. पेट्रोल की औसत कीमतें आसमान छूने की तैयारी कर रही है. फारस की खाड़ी में बुनियादी ढाँचा खंडहर में तब्दील हो चुका है, वहीं ईरान की कमजोर धार्मिक सत्ता की पकड़ मजबूत होती जा रही है.

Monday, March 23, 2026

हरीश राणा के मार्फत ‘इच्छामृत्यु’ से जुड़े सवाल


ग़ाज़ियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के लिए एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में शिफ्ट कर दिया गया है। इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को पूरा होने में कई सप्ताह लग सकते हैं, क्योंकि इसमें कई चरण शामिल हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया की व्यावहारिकता से जुड़े कई सवाल अभी हैं, पर अब बहस एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा देकर या किसी दूसरे तरीके से मृत्यु देने पर भी होगी। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि संसद इस विषय पर कानून बनाए। 2018 और 2026 के फैसलों के बावजूद संसद ने अभी तक समग्र कानून नहीं बनाया। कोर्ट ने कई बार विधायिका से कानून बनाने की अपील की है

पैलिएटिव केयर में ऐसी चिकित्सा देखभाल होती है, जिसका उद्देश्य गंभीर या असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीज को आराम देना और बीमारी को पूरी तरह ठीक करने के बजाय मरीज के दर्द, साँस लेने में तकलीफ, घबराहट, बेचैनी या अन्य शारीरिक-मानसिक परेशानियों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। सक्रिय इच्छामृत्यु मृत्यु का एक नया कारण उत्पन्न करती है; निष्क्रिय इच्छामृत्यु पहले से ही चल रही प्राकृतिक मृत्यु में बाधा को दूर करती है। एक मृत्यु का कारण बनती है; दूसरी मृत्यु को स्वाभाविक रूप से होने देती है। एक्टिव इच्छामृत्यु यानी दवा या किसी दूसरे तरीके से मौत देना पूरी तरह अवैध है।

प्रश्न है कि संविधान के अनुच्छेद 21के तहत ‘जीने के अधिकार’ में ‘गरिमापूर्ण मरने का अधिकार’ शामिल है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अधिकार है, लेकिन सीमित परिस्थितियों में। हरीश राणा केस के फैसले के बाद भी, यह बहस अभी अपूर्ण है। इच्छामृत्यु के विरोध में जो तर्क है, उसके अनुसार जीवन ईश्वर का दिया हुआ है, उसमें मानवीय हस्तक्षेप गलत है। इच्छामृत्यु के अधिकार का दुरुपयोग होने का खतरा भी है। डॉक्टर ‘किलर’ बन जाएँगे। कोमा में पड़े लोगों को व्यर्थ समझ लिया जाएगा। कैथलिक चर्च, कई हिंदू संगठन और इस्लामी विद्वान इसे जीवन के खिलाफ मानते हैं।

Wednesday, March 18, 2026

ईरान-युद्ध और भारत का ‘डिप्लोमैटिक-कैलकुलेशन’


पश्चिम एशिया की लड़ाई अब तीसरे हफ्ते में है. इसके साथ जुड़े भारत के गहरे हित नज़र आने लगे हैं. वहाँ रहने वाले एक करोड़ भारतीयों के अलावा ऊर्जा आवश्यकताओं, पूँजी निवेश और रक्षा-तकनीक से जुड़े मसलों के कारण भी हमारी दिलचस्पी इस इलाके में रही है और रहेगी.

हमारी विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के अलावा सकल राष्ट्रीय हितों से निर्धारित होती है. यह गणित यानी कैलकुलेशन है, जो दीर्घकालीन हितों पर आधारित होता है.  

इस गणित का सहारा सभी देश लेते हैं, और इसी गणित का परिणाम है कि जबर्दस्त फायर वर्क्स के बीच से पेट्रोलियम और एलपीजी के कुछ टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए भारत आने में कामयाब हुए हैं. यही गणित हमें मुखर होने और कई बार खामोश रहने का सुझाव देता है.

हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को 30 दिन के लिए निलंबित करने का निर्णय ऐसे ही गणित के तहत ही किया है. ट्रंप के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को आकार देने में तेल समृद्ध रूस के महत्त्व के प्रति वाशिंगटन की व्यावहारिक समझ व्यक्त होती है.

Wednesday, March 11, 2026

नेपाल में जेन-ज़ी की नई सरकार


 

नेपाल की तीन साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने पिछले सप्ताह हुए संसदीय चुनाव में शानदार जीत हासिल की और अगली सरकार बनाने के लिए तैयार है। हर मायने में, यह चुनाव नेपाल के युवाओं ने जीता है। सितंबर में हुए जनरेशन जेड के विरोध प्रदर्शनों में इन्हीं युवाओं ने हिस्सा लिया था, तत्कालीन सरकार को गिराया था, आरएसपी को अपना पूरा समर्थन दिया था और 35 वर्षीय पूर्व रैपर बलेंद्र शाह को नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता संभालने का मार्ग प्रशस्त किया था ।

पड़ोसी देश बांग्लादेश के युवाओं ने भी अपने देश के हालिया राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, हालांकि पिछले महीने हुए चुनाव में मतदाताओं ने अंततः दो स्थापित पार्टियों में से एक, यानी पुराने नेताओं को ही देश का नेतृत्व करने के लिए चुना।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए, बांग्लादेश का चुनाव चीजों को करने के एक पुराने और परिचित तरीके की ओर इशारा करता है, लेकिन नेपाल के नए नेतृत्व के भू-राजनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण करने के लिए उन्हें एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता हो सकती है।

भारत उन देशों में से एक है जिन्हें नेपाल के प्रति इस तरह के नए दृष्टिकोण की आवश्यकता हो सकती है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किया कि उनकी आरएसपी नेताओं के साथ "सौहार्दपूर्ण टेलीफोन वार्ता" हुई और उन्होंने "अपनी शुभकामनाएं दीं", साथ ही दोनों पड़ोसी देशों की "आपसी समृद्धि, प्रगति और कल्याण" के लिए नई सरकार के साथ काम करने की भारत की प्रतिबद्धता का उल्लेख किया।

जनरेशन Z के कई प्रदर्शनकारियों और मतदाताओं को 2015 और 2016 की कड़वी यादें जरूर होंगी, जब दक्षिणी मैदानी इलाकों में सीमा नाकाबंदी लागू कर दी गई थी, जिससे भारत से खाद्य पदार्थों, दवाओं और ईंधन का आयात आधे साल तक रुक गया था। कमी का सामना करते हुए, काठमांडू और अन्य शहरों के कई भोजनालय केवल कुछ ही व्यंजन परोस पा रहे थे, जिन्हें स्थानीय लोग व्यंग्यपूर्वक "मोदी मेनू" कहते थे।

उस समय नई दिल्ली ने दावा किया था कि वह नाकाबंदी के पीछे नहीं थी, लेकिन काठमांडू को लगा कि भारत इसमें शामिल था और सरकार ने अंततः उन दबावों को कम करने और आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए चीन की ओर रुख किया।

फिलहाल, नई दिल्ली काठमांडू के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करना चाहती है। मोदी के इस बयान में यह इरादा स्पष्ट रूप से झलकता है: "मुझे विश्वास है कि हमारे संयुक्त प्रयासों से भारत और नेपाल के संबंध आने वाले वर्षों में नई ऊंचाइयों को छुएंगे।"

लेकिन सीमा विवाद जैसे लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे द्विपक्षीय संबंधों पर हमेशा ही नकारात्मक प्रभाव डालते रहेंगे। मोदी सरकार को नेपाल की नई पीढ़ी (जेनरेशन जेड) से निपटना भी सीखना होगा, जो देश की राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की क्षमता से सशक्त हुई है । चीन सहित हिमालयी क्षेत्र के देशों को भी भू-राजनीतिक गणनाओं में इन नए बदलावों को ध्यान में रखना होगा।

निकी एशिया से साभार

 

पश्चिम एशिया-युद्ध में वैश्विक-मीडिया की भूमिका


पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई की स्थिति को समझने के लिए ज्यादातर लोग मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर हैं। इंटरनेट के आगमन के बाद से मीडिया के स्वरूप में भारी बदलाव आया है।

युद्ध की कवरेज आसान नहीं होती। इसके दो कारण हैं। एक तरफ मौत का खतरा और दूसरी तरफ सरकारों की बंदिशें। इस कवरेज में पारदर्शिता नहीं होती। कोई देश पत्रकारों को छूट नहीं देता।

अलबत्ता मीडिया की टेक्नोलॉजी में बदलाव आने से सूचनाओं की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ी है। पर सब सही तथ्य नहीं होते। अफवाहें और प्रचार भी खबरों के लिफाफे में लपेट कर पेश किए जाते हैं। इस समय ऐसा ही हो रहा है।

1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की टाइम पत्रिका ने वर्ष के व्यक्ति (मैन ऑफ द इयर) के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज टेड टर्नर को नामित किया, जिनके केबल न्यूज नेटवर्क (सीएनएन) ने युद्ध की लाइव कवरेज करके मीडिया-कवरेज के एक नए आयाम का उद्घाटन किया था।

उसके बाद से समाचार की परिभाषा किसी घटना के घटित हुआ था या उसकी विलंबित सूचना से बदलकर, जैसा घटित हो रहा है, हो गई।’ टाइम पत्रिका ने लिखा, घटनाओं की गतिशीलता को प्रभावित करने और 150 देशों के दर्शकों को इतिहास का तात्कालिक गवाह बनाने के लिए, रॉबर्ट एडवर्ड टर्नर को 1991 के लिए टाइम पत्रिका का 'मैन ऑफ द ईयर' चुना गया है।’

समाचार मीडिया के रूप में टेलीविजन के उदय ने पत्रकारों के एक ताकतवर तबके का उदय भी किया। सीएनएन के लैरी किंग का टॉक शो अमेरिकी राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण शो बन गया और लैरी किंग को किंग ऑफ किंग्स कहा गया।

एम्बैडेड पत्रकारिता

1991 की लड़ाई के बाद 2003 में पत्रकारिता की एक नई विधा का जन्म हुआ, जिसे एम्बैडेड पत्रकारिता (Embedded Journalism) नाम दिया गया। उस दौरान कुछ पत्रकारों ने युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान सीधे मिलिट्री यूनिट के साथ रहते हुए रिपोर्टिंग की।

बेशक उस कवरेज में बहुत सी जानकारियाँ विश्वसनीय होती थीं, पर बहुत से वे बातें, जिन्हें सेना छिपाना चाहती थीं, छिपा ली जाती थीं।

सूचनाओं की रिपोर्टिंग के साथ पत्रकारिता की साख जुड़ी है। आज के सोशल मीडिया-युग में इस साख को बनाए रखने के सवाल भी उभर कर सामने आ रहे हैं। ये सवाल पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई के सिलसिले में भी उठे हैं।

इस बीच मैंने सामग्री की तलाश की तो तीन जानकारियाँ मुझे मिलीं, जिन्हें मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। इनके पहले इसराइली व्यवस्था के आलोचक माने जाने वाले मीडिया हाउस हारेट्ज़ की एक रिपोर्ट साथ ही टाइम्स ऑफ इसराइल में प्रकाशित एक रिपोर्ट को भी पढ़ें। इस पूरे विवरण में मैंने भारतीय मीडिया को शामिल नहीं किया है। उसके लिए अलग से लिखना होगा। 

Tuesday, March 10, 2026

कब और कैसे खत्म होगा ‘शह और मात’ का खेल?

 


पश्चिम एशिया में पहले से इस बात का इमकान था कि लड़ाई शुरू होने वाली है, पर आज कहना मुश्किल है कि वह कब और कैसे खत्म होगी. चौतरफा बयानबाज़ी से लगता है कि वह आसानी से तो खत्म नहीं होगी.

कुछ भरोसा बैकरूम-विमर्श पर है, जो किसी न किसी स्तर पर चल रहा है. इसमें चीन ने पहल की है. चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने अपने 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' के तहत मध्यस्थता की पेशकश की है.  

'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा अप्रैल 2022 में प्रस्तावित एक सुरक्षा अवधारणा है, जो अविभाज्य सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था की जवाबी वैश्विक सुरक्षा का ढाँचा तैयार करना है.

गहरी दरारें

इसके पहले भी इस इलाके में 1991 और 2003 में लड़ाई हुई है, पर सही मानों में असली खाड़ी युद्ध इस बार ही हुआ है. फारस की खाड़ी से सटे सभी आठ देश, साथ ही आधा दर्जन से ज़्यादा दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं.

लड़ाई रुकी भी, तो इस इलाके की शक्ल और भावनात्मक रिश्ते पहले जैसे नहीं रहेंगे. अब्राहमिक धर्मों और समाज की ऐतिहासिक दरारें और गहरी होंगी.

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने शनिवार को कहा कि हम अब अपने पड़ोसी देशों को तब तक निशाना नहीं बनाएँगे, जब तक कि हमले उनके क्षेत्र से न किए जाएँ. बावज़ूद इसके हमले अभी ज़ारी हैं. शायद पेज़ेश्कियान की बात अपने देश में उतननहीं मानी जाती, जितनी हम समझते हैं.

Friday, March 6, 2026

औद्योगिक-आत्मनिर्भरता के प्रवेशद्वार पर भारत

भारत ने हाल में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश किया है, जो अपेक्षाकृत नए हैं और जिनमें भारी पूँजी निवेश की ज़रूरत होती है। ये क्षेत्र हैं: आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा और रक्षा उत्पादन। इसके अलावा हमारा परंपरागत वस्त्र और परिधान-उद्योग, ऑटोमोबाइल्स, फार्मा और सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है। इन बातों का सकल परिणाम है: नई पूंजी+ नई तकनीक=औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार। हमारे वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, औषधियाँ, केमिकल ज़्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। नतीजा: उत्पादन बढ़ेगा, रोज़गार बढ़ेगा, उद्योगों का विस्तार होगा।

इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए हमें दो स्तरों पर काम करने की ज़रूरत है। एक स्तर छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का है, जो बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और आम उपभोग की वस्तुएँ तैयार करते हैं। ऐसे उद्योग भी तभी सफल होंगे, जब हमारे पास नवीनतम उच्चस्तरीय तकनीक होगी। साथ ही हमें ऐसे सामाजिक विकास की ज़रूरत है, जो बड़ी संख्या में लोगों की समृद्धि का कारण बने। जब लोगों के पास पैसा होगा, तभी वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदेंगे। जब उनका उपभोग बढ़ेगा, तब औद्योगिक विकास भी होगा।

भारी उद्योगों की भूमिका

हमने ऊपर जिन उद्योगों का ज़िक्र किया है, उनमें से ज्यादातर भारी उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योगों से आशय उन बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्यमों से है, जिनमें भारी मात्रा में पूँजी, जटिल मशीनरी और कच्चे माल का उपयोग होता है। ये उद्योग, जैसे इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, मशीनरी, सीमेंट, पोत और विमान निर्माण और ऑटोमोबाइल आदि बुनियादी ढाँचे के विकास, अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाने और अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Wednesday, March 4, 2026

पश्चिम एशिया को इस ‘भँवर’ से निकालना मुश्किल होगा


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है. लगता है कि भानुमती के पिटारे की तरह एक के बाद एक नई चीजें सामने आ रही हैं और अभी आएँगी।

उनका यह ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे गया है, जिनमें अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा करना होगा. यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है.’

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है. हो सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत रखता है. बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रहेगी.

इस आक्रमण के बाद जहाँ एकाध अपवाद को छोड़कर पूरा यूरोप, अमेरिका और इसराइल के साथ खड़ा नज़र आ रहा है, वहीं रूस और चीन ने आयतुल्ला खामनेई की हत्या की निंदा की है.

चीन ने इसे 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया और कहा कि हम इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करते हैं. पर वे निंदा तक ही सीमित रह सकते हैं. वे जो भी करेंगे, दूर रहते हुए परोक्ष तरीकों से करेंगे, प्रत्यक्ष तरीके से नहीं. 

दुबई की पहचान खतरे में और पेट्रोलियम-संकट के आसार

 

28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी और इसराइली हमलों के जवाब में ईरान की जवाबी कार्रवाई ने दुबई की सुरक्षित छवि को हिलाकर रख दिया है। आलीशान कृत्रिम आवास पाम जुमेराह पर स्थित फेयरमों होटल पहले ही दिन आग की चपेट में आ गया। अमेज़न वैब सर्विसेज का एक डेटा सेंटर भी जल गया। विश्व की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन, अमीरात एयरलाइंस का मुख्यालय और दुबई के पर्यटन व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हवाई अड्डा क्षतिग्रस्त हो गया और उड़ानें स्थगित कर दी गईं। अमीरात के तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाह और माल ढुलाई केंद्र, जबल अली, में परिचालन रोक दिया गया।

दुबई, संयुक्त अरब अमीरात ( यूएई ) के बाकी हिस्सों की तरह, अब तक इस स्थिति से अप्रभावित रहा था; युद्ध के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन जो कुछ दिन पहले तक गुप्त रखा गया था, वह अब हकीकत बन गया है। हालांकि ज्यादातर विदेशी निवासी सुरक्षित हैं, कुछ लोग ओमान या सऊदी अरब के रास्ते, जहां हवाई क्षेत्र खुला है, कुछ समय के लिए ही सही, देश छोड़ रहे हैं या छोड़ने की योजना बना रहे हैं। अमेरिका के विदेश विभाग ने नागरिकों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी है। व्यवसायी अभी टिके हुए हैं, लेकिन इमर्जेंसी योजनाएँ बना रहे हैं। सवाल यह है कि क्या दुबई को वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने वाले लोग और पैसा पहले की तरह आता रहेगा?

Tuesday, March 3, 2026

ईरानी आपदा पर चीन की चुप्पी

 

इकोनॉमिस्ट से साभार

ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की चीन ने निंदा की है, पर उसने अमेरिका का उतना कड़ा विरोध नहीं किया है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इसके पीछे के कारणों को विशेषज्ञों ने समझने की कोशिश भी की है।

हांगकांग के अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि चीन ने ईरान में अपने एक चीनी नागरिक की मौत और देश से अपने 3,000 नागरिकों को निकालने की पुष्टि की और शनिवार को रूस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई और सैन्य कार्रवाई की निंदा की। सोमवार को रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन कॉल में, चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी ने ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की निंदा करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया।

इस प्रकार के शाब्दिक विरोध के अलावा, चीन ने ईरान के लिए किसी प्रकार की ठोस मदद की पेशकश से परहेज किया है, ठीक वैसे ही जैसे उसने तब किया था जब इसराइल ने पिछले साल जून में ईरान के सैन्य और परमाणु स्थलों पर हमले किए थे।

बीजिंग की प्रतिक्रिया राजनयिक समर्थन देने और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचने की उसकी पुरानी रणनीति के अनुरूप है, जैसा कि उसने जनवरी में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अमेरिकी अपहरण के समय भी किया था। लेकिन हमलों से एक दिन पहले प्रकाशित चैटम हाउस के एसोसिएट फैलो अहमद अबूदूह के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान विवाद में चीन के राजनयिक संयम को चीनी अविश्वसनीयता या उदासीनता के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए

अल्मोड़ा की होली


हिंदी की लोकप्रिय लेखिका गौरा पंत शिवानी ने अपनी आत्मकथा
सुनहु तात यह अकथ कहानी में एक जगह अल्मोड़ा की होली का बड़ा सुंदर विवरण दिया है, गौर करें:

होली आती तो अल्मोड़ा के छोटे से बाजार की शोभा ही द्विगुणित हो जाती…. पहाड़ की होली का तब अपना ही जादू था। आमल की एकादशी से होली की बैठकें लगतीं। मोट के दन (कालीन), उन पर बिछती दुग्ध-धवल चादरें, सफेद गिलाफ चढ़ा गाव-तकिया, उनका सहारा लिए लखनऊ की अम्बरी तम्बाकू की सुगन्धित धूम्र-रेखा से हुक्के का कश खचते प्रतिष्ठित व्यक्ति। थोड़ी ही देर में थाल के थाल जम्बू हुँके आलू और गोझे परिवेशित होते, पीतल के चमचमाते गिलासों में मसाले डली अदरक की चाय। फिर आरभ्भ होती बैठक होली

अपनों बीरन मोहे दे री ननदिया

मैं होली खेलन जाऊँ वृन्दावन।

           या

जाय पड़ईं पी के अंक

चाहे कलंक लगै री़

तबले पर संगत करते कुमाऊँ के अल्लारक्खा, दाम दा, हारमोनियम पर पहाड़ के जलगाँवकर, कांति दा; और रसीले कंठ का माधुर्य बिखेरते वे संगीत रसिक गायक, जिन्होंने न कभी विधिवत संगीत की शिक्षा पाई, न किसी गुरु का गंडा ही बाँधा। स्वयं विधाता ने जिनके कंठ में प्रतिभा को खूँटे की गाय-सा बाँधकर रख दिया था। न कह अश्लील प्रलाप, न छींटाकशी; वह मधुर स्वरलहरी, सम पार आती, तो वाह-वाह की साधुध्वनि छज्जे को गुंजायमान करती सड़क तक चली जाती।

राह चलते लोग ठिठककर खड़े हो जाते, ‘‘कौन गा रहा है यह? भवानी शाह या बद्रिया?’’

भारत की सतरंगी-संस्कृति का पर्व होली

रंगों की बौछार से कड़वाहटों को भुलाने का मौका

होली रंगों का त्योहार है, पर केवल रंग उड़ाने या मौज मस्ती तक सीमित नहीं है। अवध के इलाके में परंपरा है कि होली के बाद सब एक-दूसरे के गले मिलते हैं। यह क्रम करीब एक पखवाड़े तक चलता है। हरेक परिवार अपने पड़ोस के हरेक घर में होली मिलने जाता है। पड़ोसी उनके घर आते हैं। यह क्रम एक पखवाड़े से ज्यादा समय तक चलता है। ऐसी परंपराएँ होली को सामाजिक मेलजोल का सबसे बड़ा त्योहार बनाती हैं। पूरे देश में ऐसा ही कुछ किसी न किसी रूप में और किसी न किसी परंपरा के साथ होता है।

यह कई दिन चलने वाली गतिविधि है, जो चार महीनों की ठंडक के कारण जड़ीभूत निष्क्रियता को तोड़ने का काम करती है। पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में इससे जुड़ी रोचक परंपराएँ हैं, जो केवल रंग बिखरने से ही नहीं जुड़ी है। इसके साथ खान-पान, संगीत, दस्तकारी और लोक कलाओं की जबर्दस्त परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। होली के रंग ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति और धर्म के बंधनों को तोड़कर, वैर-भाव भूलकर सभी को समान धरातल पर लाते हैं। यह पर्व सामाजिक सद्भाव और दोस्ताना समाज की स्थापना करता है।  

वसंत पंचमी से ही फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। प्रकृति भी इस समय खिली हुई होती है। सरसों के पीले फूल धरती को रंग देते हैं। गेहूँ की बालियाँ निकल आती हैं। आम पर बौर फूलने लगते हैं। किसान खुश होकर गीत गाते हैं। यह त्योहार सभी पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाता है, जाति, पंथ और उम्र की बाधाओं को पार करते हुए एकता और समुदाय की भावना को बढ़ावा देता है। क्षमा और मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करता है। खुशी की बेलाग अभिव्यक्ति और कड़वाहटों को भुलाने का दिन।

सबसे पुराना त्योहार

जब हम इसके इतिहास पर जाते हैं, तब पता लगता है कि यह देश के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों में इस पर्व का प्रचलन था। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ से प्राप्त ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में होली मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गाहय-सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। सातवीं शताब्दी के राजा हर्ष ने अपनी रचना 'रत्नावली' में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है।