Monday, February 28, 2022

कनाडा के ट्रक-आंदोलन से उभरे सवाल


कनाडा में करीब
हफ्ते से जारी ट्रक ड्राइवरों का विरोध प्रदर्शन खत्म हो गया है, पर यह परिघटना कनाडा के इतिहास में याद रखी जाएगी। इतिहास में दूसरी बार कनाडा में आपातकाल की घोषणा की गई। सरकार ने जो कड़े कदम उठाए, वे कनाडा की सौम्य-व्यवस्था से मेल नहीं खाते हैं। प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पुलिस ने पेपर स्प्रे और स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल करके संसद के सामने के ज्यादातर हिस्से को साफ किया।

आंदोलन खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने आपातकाल की घोषणा को वापस ले लिया है। कनाडा के इतिहास में दूसरी बार इन शक्तियों का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि इन शक्तियों के इस्तेमाल की पुष्टि संसद में होनी थी, पर उससे पहले ही इन्हें वापस ले लिया गया है। देश में शांति-व्यवस्था की स्थापना तो हो गई है, पर बहुत से सवाल खड़े हैं, जिनके जवाबों का इंतजार है।

यह आंदोलन केवल कनाडा के लिए ही नहीं अमेरिका समेत पश्चिमी-लोकतंत्र के लिए एक नज़ीर बनेगा। हजारों की भीड़ ने कनाडा की राजधानी पर धावा बोला और मुख्य-मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। ट्रक यातायात में गिरावट ने फलों, सब्ज़ियों, ग्रोसरी और अन्य जरूरी वस्तुओं की क़ीमतें बढ़ा दीं, जिससे व्यापक अशांति फैल गई है। ख़ासतौर पर अमेरिका और कनाडा के बीच कार और ट्रक-कंपनियों का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ।

अराजकता का अनुभव

इस किस्म की अराजकता पश्चिम के अनुशासित जीवन में नए किस्म का अनुभव है। एक तरफ नाराज ड्राइवर थे और दूसरी तरफ इस आंदोलन से नाराज नागरिक। कनाडा के लोग देश के राजनीतिक भविष्य के बारे में सवाल कर रहे हैं। कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह आंदोलन भारत के किसान-आंदोलन से प्रेरित था। पर पश्चिमी सरकारों ने इस आंदोलन की भर्त्सना की और इसके दमन का समर्थन। अमेरिका और यूरोप में भी वैक्सीन की अनिवार्यता और कोविड-19 प्रतिबंधों के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं।

पिछले एक दशक में अमेरिका और यूरोप में इस प्रकार के जनांदोलन बढ़ते जा रहे हैं। क्या यह सिर्फ फौरी-उफान था या पश्चिमी-व्यवस्था के तख़्तापलट की भूमिका?  देश के राजनीतिक परिदृश्य में कहीं बुनियादी बदलाव की शुरुआत तो नहीं है? ऑक्यूपाई वॉलस्ट्रीट से लेकर पेरिस के पीली-कुर्ती आंदोलन तक सोशल मीडिया एक प्रेरक शक्ति रहा है। क्या यह एक नए युग की शुरुआत है? क्या यह एक बड़े राजनीतिक-विभाजन की शुरुआत है?

प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो उदार विचारों के राजनेता हैं, पर जनता का एक बड़ा तबका इस बात से नाराज है कि उन्होंने हफ्तों तक देश में अराजकता फैलाने की अनुमति दी और इस अराजकता को देश की राजधानी ओटावा तक आने का मौका दिया। हजारों प्रदर्शनकारियों ने शहर की सड़कों पर जाम लगा दिया और पार्लियामेंट हिल को घेर लिया। इस परिस्थिति का सामना करने के लिए कनाडा और अमेरिका की सरकारों ने आपसी विमर्श के बाद कठोर कदम उठाने की रणनीति अपनाई और आंदोलन को तितर-बितर कर दिया गया, पर सवाल शेष हैं। क्यों हुआ था यह आंदोलन? कौन था इसके पीछे?

टीके की अनिवार्यता

कनाडा सरकार ने कुछ हफ़्ते पहले अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार आने-जाने वाले ट्रक वालों के लिए कोरोना का टीका लगाना अनिवार्य कर दिया था। इस नियम के अनुसार किसी व्यक्ति ने वैक्सीन नहीं लगाई हो, तो उसे 14 दिन तक घर पर ही क्वारंटाइन करना होगा। बड़ी संख्या में ट्रक वाले इस अनिवार्यता का विरोध कर रहे हैं। ट्रक वालों का कहना है कि जब महामारी चरम पर थी, तब ट्रकों को आवश्यक सेवा में शामिल किया गया था और उनपर कोई प्रतिबंध नहीं था। अब जब महामारी समाप्त होने वाली है तो टीका अनिवार्य कर दिया गया है।

सरकारी नियम 15 जनवरी को लागू किए गए, जिसके बाद अमेरिका से कनाडा आने वाले ट्रक ड्राइवर इससे प्रभावित हुए। सीमा पार करने के लिए कोरोना टेस्ट और क्वारंटाइन का भी प्रावधान किया गया था। 28 जनवरी से ‘फ्रीडम कॉन्वॉय 2022’ के बैनर तले ट्रक ड्राइवरों ने ओटावा पर धावा बोलना शुरू किया। प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को इन प्रदर्शनकारियों की वजह से अपने घर को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाना पड़ा। करीब दो हफ्ते तक धैर्य रखने के बाद ट्रूडो ने विरोध को खत्म करने के लिए 14 फरवरी को इमरजेंसी एक्ट लागू किया और उसके बाद गिरफ्तारियाँ शुरू की गईं। ट्रक ड्राइवरों के नेता पैट किंग को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने अल्बर्टा और ओटावा में बैरीकेडिंग की जगहों से कई हथियार और बहुत सारा गोला-बारूद भी बरामद किया। 20 फरवरी के आसपास सड़कें साफ हो गईं।

आंदोलन खत्म हो गया, पर देश के राजनीतिक क्षितिज पर उसकी धूल काफी देर तक उड़ती रहेगी। ट्रक-ड्राइवरों ने महत्वपूर्ण हाइवे ठप कर दिए और एक महत्वपूर्ण पुल पर आवागमन बंद कर दिया, जहाँ से होकर अमेरिका और कनाडा के बीच करीब 25 फीसदी माल आता-जाता है। इन अवरोधों को हटाने में पुलिस को करीब छह दिन का समय लगा। 

राजनीतिक बहस

कनाडा के काफी नागरिक कोविड-प्रतिबंधों के पक्ष में हैं। देश में करीब 90 प्रतिशत आबादी के टीके लग चुके हैं, पर वे ट्रक-ड्राइवरों के विरोध करने के अधिकार के भी समर्थक हैं। लोग जस्टिन ट्रूडो की रणनीति के विरोधी भी हैं। उनका कहना है कि जब आंदोलन शुरू हुआ था, तब सरकार ने ट्रक-ड्राइवरों से बात भी नहीं की। जब आंदोलन बढ़ा तब उन्होंने आंदोलनकारियों पर एंटी-सेमिटिज़्म, इस्लामोफोबिया, एंटी-ब्लैक, होमोफोबिया और ट्रांसफोबिया जैसे आरोप लगा दिए।

यों लॉकडाउन के कारण भी लोग परेशान हैं। बहुत से युवाओं का रोजगार चला गया। ट्रक-ड्राइवरों को अमेरिका के दक्षिणपंथियों का समर्थन भी प्राप्त था। उन्हें बाहर से पैसा भी मिला। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप से लेकर फॉक्स न्यूज़ तक ने उनका खुलकर समर्थन किया। आंदोलन के दौरान हिंसक और फासिस्टी विचारों को भी व्यक्त होने का मौका मिला। एकाध जगह हिटलर के स्वास्तिका चिह्न के साथ झंडे देखे गए। उन्हें लेकर बहस है। उन्हें फहराने का मतलब क्या है?

इस आंदोलन के दूरगामी प्रभाव होंगे। देश के हेट-स्पीच कानूनों में बदलाव होने जा रहे हैं। कनाडा के मानवाधिकार ट्रायब्यूनल को हेट-स्पीच का इस्तेमाल करने वालों पर भारी जुर्माना लगाने का अधिकार मिलेगा। दूसरी तरफ हेट-स्पीच की परिभाषा और उसके संदर्भों को लेकर बहस भी चलेगी। सवाल है कि क्या इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगेगी? कनाडा की राजनीति पर अनुदार वामपंथी-प्रभाव भी बढ़ रहा है। कहा जा रहा है कि कानूनों में बदलाव से पुरातनपंथियों, परंपरावादियों और धार्मिक-प्रवृत्ति के लोगों को सताए जाने की संभावनाएं बढ़ेंगी। इससे दक्षिणपंथी-राजनीतिक विचारों को आगे आने का मौका मिलेगा, कनाडा में ही नहीं अमेरिका में भी।

नवजीवन में प्रकाशित

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