Wednesday, December 14, 2016

क्या राहुल के पास वास्तव में कुछ कहने को है?

राहुल गांधी ने विस्फोट भले ही नहीं किया, पर माहौल विस्फोटक जरूर बना दिया है. यह उनकी छापामार राजनीति की झलक है, जिसे उन्होंने पिछले साल के मॉनसून सत्र से अपनाया है. यह संजीदा संसदीय विमर्श का विकल्प नहीं है. वे क्या कहना चाहते हैं और क्या जानकारी उनके पास है, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए. उन्होंने जिस अंदाज में बातें की हैं, उनसे लगता है कि अब कुछ धमाके और होंगे.

यह सवाल जरूर उठता है कि जब सत्र समापन के कगार पर आ गया, तब राहुल ने अपने रुख में बदलाव क्यों किया? यदि वे किसी भी नियम के तहत बहस को तैयार थे, तब दिक्कत क्या थी? क्यों नहीं समय रहते बहस हुई? जब शुरू हुई भी तो उस बहस को किसने रोका?
कांग्रेस की ऐसी ही रणनीति पिछले साल मॉनसून सत्र में देखने को मिली थी. सत्र शुरू होते वक्त कांग्रेस की रणनीति गतिरोध पैदा करने की नहीं थी. वह व्यापम और ललित मोदी को लेकर सरकार पर दबाव बनाना चाहती थी. इसलिए उसके नेताओं ने चर्चा के नोटिस दिए.
बाद में पार्टी का इरादा बदल गया और उसकी जगह छापामार राजनीति ने ले ली. पूरा सत्र हंगामे की भेंट हो गया. पर वह काम भी पूरा नहीं हुआ. जब पूरा सत्र धुल गया तो अचानक अंतिम दिन उसका इरादा बदल गया. परिणाम यह हुआ कि सुषमा स्वराज ने कांग्रेस की धुलाई कर दी.
नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को देखते हुए इस बात की उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वे खामोश बैठे रहेंगे. राहुल का कहना है कि मोदी भयभीत हैं. वास्तव में क्या ऐसा है? उनके पास कोई जानकारी है तो उसे देशहित में सामने लाना चाहिए. संसद नहीं तो बाहर.
संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने कहा है कि कांग्रेस पिछले एक महीने से नियमों का बहाना बनाकर बहस से भाग रही है. राहुल के पास बताने के लिए कोई जानकारी थी तो वे संसद को पहले दिन ही जानकारी देते. अनेक नियमों के तहत ऐसा किया जा सकता था. उन्हें किसने रोका?
उधर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन का कहना है कि आप वैल में भी आएंगे और यह भी कहेंगे कि बोलने नहीं दिया जाता. हाउस का न चल पाना दुखद है. सदन बात को रखने के लिए है.
फिलहाल सवाल है कि क्या शीत सत्र के बचे दो दिनों में कुछ होगा? क्या राहुल को वह गोपनीय विस्फोटक बात बताने का मौका मिलेगा? और क्या यह वही बात है जिसके बारे में पिछले हफ्ते उन्होंने दावा किया था कि भूचाल आ जाएगा?
आज सुबह शीत सत्र के सिर्फ तीन दिन बचे थे. लगता नहीं कि कांग्रेस की दिलचस्पी चर्चा में थी. ऐसा था तो फिर हंगामा क्यों हुआ? जहाँ तक मोदी की पर्सनल इनफॉर्मेशन का सवाल है, उसके लिए लोकसभा में बोलने के मौके का इंतजार क्यों? क्यों नहीं वे बाहर उस बात को बताते हैं?
राहुल का कहना है कि मेरे पास जानकारी है, जिससे नरेंद्र मोदी का गुब्बारा फूटेगा. हमें हाउस में बोलने नहीं दे रहे हैं. अभी तक कहा जाता था कि विपक्ष पर आरोप लगता था कि वह किसी को बोलने नहीं दे रहा. अब सरकार हमें बोलने नहीं दे रही. ऐसी क्या बात थी जो वे पिछले एक महीने में बोल नहीं पाए?
उम्मीद थी कि आज नोटबंदी और उससे जुड़े मसलों पर कोई बात होगी. प्रधानमंत्री लोकसभा में उपस्थित थे. वे संसदीय विमर्श में भाग लेने के इरादे से ही आए होंगे. शोर किसने किया? बहरहाल लोकसभा पूरे दिन के लिए स्थगित हो गई.
अब दो ही सवाल बचते हैं. क्या अगले दो दिन में बहस संभव है? अभी तक सरकार और कांग्रेस के बीच इस बात पर असहमति थी कि किस नियम के तहत बहस होगी. अब कांग्रेस कोई शर्त नहीं रख रही है. दूसरा सवाल यह है कि क्या सरकार अपने ऊपर बहस से भागने की तोहमत लेगी?
बहरहाल आज के घटनाक्रम से इतना जाहिर हुआ कि कांग्रेस पार्टी के साथ तृणमूल और एनसीपी के आ जाने के बाद विपक्ष का काफी बड़ा धड़ा एक स्वर में बोल रहा है. तृणमूल के प्रवक्ता ने दावा किया कि 16 पार्टियाँ हमारे साथ हैं.

सरकारी सूत्रों को अंदेशा है कि कांग्रेस की रणनीति है कि राहुल बोलें और फिर हंगामे का माहौल बनाकर संसद का समापन हो जाए. ऐसा है भी तो इससे किसका नुकसान होगा? इसलिए जरूरी है कि राहुल को बोलने का मौका मिलना चाहिए. अब भी संभव है तो उन्हें मौका दिया जाना चाहिए. 

2 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15.12.16 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2557 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  2. राहुल के पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं है, वह भी केजरी की तरह झूठे आरोप लगा सनसनी लाने की कोशिश कर रहे हैं , कांग्रेस का लक्ष्य है अपनी बात कह कर सदन में हंगामा करना व सरकार को अपना पक्ष न रखने देना , सरकार पहले वित मंत्री से अपनी बात रखवा कर फिर बहस चाहती है , राहुल के पास यदि पी एम् के खिलाफ इतने पुख्ता सबूत हैं कि भूकम्प आ जायेगा तो उन्हें यह सब संसद के पटल का इन्तजार नहीं करना चाहिए खुले में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बता देना चाहिए अन्यथा कोर्ट के द्वार खुले हैं वहां जा कर सरकार को कठघरे में खड़े करना चाहिए
    लेकिन ऐसा कुछ है ही नहीं , संसद में खड़े हो कर कुछ भी बोल दो बिगड़ेगा नहीं बाहर बोलते ही झूठ को सिद्ध करना मुश्किल होगा और लेने के देने पड़ जायेंगे , केजरी की तरह मान हानि के मुकदमों की तारीखें भुगतनी होंगी व हवालात की भी
    जिसे वह मोदी का गुब्बारा बता रहे हैं वे खुद गुब्बारा बन फिस्स जाएंगे व हास्यस्पद भी , कांग्रेस की रही सही इज्जत भी मिटटी पलीद हो जाएगी

    ReplyDelete