Sunday, August 20, 2017

बार-बार क्यों हो रहीं है ट्रेन दुर्घटनाएं?


खतौली के पास हुई ट्रेन दुर्घटना ने तीन-चार किस्म की चिंताओं को जन्म दिया है. पहली नजर में लगता है कि यह दुर्घटना मानवीय गलती का परिणाम है. एक तरफ भारतीय रेलवे 200 किलोमीटर की स्पीड से रेलगाड़ियाँ चलाने जा रहा है, दूसरी तरफ मानवीय गलतियों की संभावना अब भी बनी हुई है.

इन रेल दुर्घटनाओं को लेकर तीन बड़ी चिंताएं सामने आती हैं. पहली चिंता यह कि रेल संरक्षा (सेफ्टी) को लेकर काकोदकर समिति की सिफारिशें प्राप्त होने के पाँच साल बाद भी हम कोई बड़ा कदम नहीं उठा पाए हैं.

दूसरी चिंता यह है कि हम रेलगाड़ियों की स्पीड बढ़ाने पर लगातार जोर दे रहे हैं, जबकि दुर्घटनाएं बता रहीं हैं कि सेफ्टी के सवालों का संतोषजनक जवाब हमारे पास नहीं है. तीसरी बड़ी चिंता इस बात को लेकर भी है कि इनके पीछे तोड़फोड़ या आतंकी संगठनों का हाथ तो नहीं है.

खतौली की दुर्घटना को लेकर फौरन नतीजों पर नहीं पहुँचा जा सकता. अलबत्ता तोड़फोड़ या आतंकी गतिविधि के अंदेशे की जाँच करने के लिए उत्तर प्रदेश एटीएस की टीम भी घटनास्थल पर पहुँची है. तोड़फोड़ के अंदेशे की जाँच फौरन करने की जरूरत होती है, क्योंकि देर होने पर साक्ष्य मिट जाते हैं.

दुर्घटनाओं का संख्या बढ़ी है

बहरहाल यह बात परेशान करती है कि हाल में रेल दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ी है. खासतौर से रेलगाड़ियों के पटरी से उतरने की संख्या काफी ज्यादा है. हाल में 9 अप्रैल को दक्षिण पूर्व रेलवे के हावड़ा-खड़गपुर खंड पर एक मालगाड़ी पटरी से उतरी.

युद्ध के नगाड़े क्यों बजा रहा है मीडिया?

एबीपी न्यूज़ पर रात में एक कार्यक्रम आ रहा था कि भारत और चीन के बीच लड़ाई छिड़ी तो कौन सा देश किसके साथ होगा। कार्यक्रम-प्रस्तोता ने अपने मन से और कुछ सामान्य समझ से दोनों देशों के समर्थकों के नाम तय किए और सूची बनाकर पेश कर दी। इसी तरह जी न्यूज पर एक कार्यक्रम चल रहा था, जिससे लगता था कि भारत और चीन के युद्ध की उलटी गिनती शुरू हो गई है। क्या हिंदी या अंग्रेजी के ज्यादातर चैनलों की टीआरपी लड़ाई का नाम लेने से बढ़ती है? क्या वजह है कि शाम को ज्यादातर चैनलों की सभाओं में भारत और पाकिस्तान के तथाकथित विशेषज्ञ बैठकर एक-दूसरे को गाली देते रहते हैं? चैनल जान-बूझकर इसे बढ़ावा देते हैं? सवाल है कि क्या दर्शक यही चाहता है? 


चैनलों के इस जुनूनी व्यवहार के मुकाबले भारत सरकार का रुख काफी शांत और संयत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त के भाषण में चीन और पाकिस्तान का नाम तक नहीं था। केवल कश्मीर के बारे में कुछ बातें थीं और एक जगह भारत की शक्ति के संदर्भ में सर्जिकल स्ट्राइक का जिक्र था। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात सुषमा स्वराज ने हाल में राज्यसभा में कही। उन्होंने सपा नेता रामगोपाल यादव के युद्ध की तैयारी के बयान पर कहा कि युद्ध से समाधान नहीं निकलता। सेना को तैयार रखना होता है। धैर्य और भाषा-संयम और राजनयिक रास्तों से हल निकालने की कोशिश की जा रही है। आज सामरिक क्षमता बढ़ाने से ज्यादा अहम है आर्थिक क्षमता को बढ़ाना।

Friday, August 18, 2017

चुनाव सुधार पर कुछ खरी बातें

पिछले कुछ वर्षों का अनुभव है कि देश के राजनीतिक दलों ने वोटिंग मशीन के विरोध पर जितना वक्त लगाया है, उतना वक्त वे चुनाव सुधार से जुड़े मसलों पर नहीं लगाते। वे चाहें तो आसानी से संसद ऐसा कानून बना सकती है, जिसमें चंदे की व्यवस्था पारदर्शी बन जाए। सभी (खासतौर से बीजेपी -कांग्रेस तथा क्षेत्रीय दलों) की दिलचस्पी इस बात में होती है कि चंदा देने वाले का नाम छिपाया जाए। बहरहाल दिल्ली में गुरुवार को हुई दो गतिविधियाँ इस लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। 

मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने गुरुवार 17 अगस्त 2017 को दिल्ली में हुई एक बैठक में कहा कि हमारी राजनीतिक नैतिकता में कुछ नई बातें शामिल होती जा रहीं हैं (creeping new normal of political morality)। अब हम किसी भी कीमत पर जीतने को सामान्य बात मानकर चलने लगे हैं। यह बैठक एसोसिएशन ऑफ डैमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नामक संस्था ने बुलाई थी। बैठक का विषय था ‘Consultation on Electoral and Political Reforms।’  

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि सामान्य व्यक्ति ने कुछ बातों को स्वीकार कर लिया है, “In this narrative, poaching of legislators is extolled as smart political management; strategic introduction of money for allurement, tough-minded use of state machinery for intimidation etc. are all commended as resourcefulness.

“The winner can commit no sin; a defector crossing over to the ruling camp stands cleansed of all the guilt as also possible criminality. It is this creeping ‘new normal’ of political morality that should be the target for exemplary action by all political parties, politicians, media, civil society organisations, constitutional authorities and all those having faith in democratic polity for better election, a better tomorrow,” he added.

Wednesday, August 16, 2017

कश्मीरियों को गले लगाने वाली बात में कोई पेच है क्या?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन की दो-तीन खास बातों पर गौर करें तो पाएंगे कि वे 2019 के चुनाव से आगे की बातें कर रहे हैं. यह राजनीतिक भाषण है, जो सपनों को जगाता है. इन सपनों की रूपरेखा 2014 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में और जून 2014 में सोलहवीं संसद के पहले सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण में पेश की गई थी.

मोदी ने 2014 में अपने जिन कार्यक्रमों की घोषणा की थी, अब उन्होंने उनसे जुड़ी उपलब्धियों को गिनाना शुरू किया है. वे इन उपलब्धियों को सन 2022 से जोड़ रहे हैं. इसके लिए उन्होंने सन 1942 की अगस्त क्रांति से 15 अगस्त 1947 तक स्वतंत्रता-संकल्प को रूपक की तरह इस्तेमाल किया है. 

हालांकि मोदी के संबोधन में ध्यान देने लायक बातें कुछ और भी हैं, पर लोगों का ध्यान जम्मू-कश्मीर को लेकर कही गई कुछ बातों पर खासतौर से गया है.

कश्मीरी लोग हमारे हैं, बशर्ते...

सत्तर साल का आजाद भारत: कितने कदम चले हम?

करीब डेढ़ दशक पहले कहावत प्रसिद्ध हुई थी, ‘सौ में नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान।’ यह बात ट्रकों के पीछे लिखी नजर आती थी। यह एक प्रकार का सामाजिक अंतर्मंथन था। कि हम अपना मजाक उड़ाना भी जानते हैं। यह एक सचाई की स्वीकृति भी थी।  
घटनाओं को एकसाथ मिलाकर पढ़ें तो विचित्र बड़े रोचक अनुभव होते हैं। हाल में उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में 771 वोट पड़े। इनमें से 11 वोट अवैध घोषित हुए। उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य वोट डालते हैं। वोट डालने में यह गलती सांसदों ने की है। इसे बड़ी गलती न मानें, पर यह बात किस तरफ इशारा करती है? यही कि हमारे लोकतंत्र ने संस्थाओं की रचना तो की, पर उनकी गुणवत्ता को सुनिश्चित नहीं किया।

Tuesday, August 15, 2017

स्मृतियों की नींव पर नए भारत का सपना

पाश की कविता है, सबसे ख़तरनाक होता है/ हमारे सपनों का मर जाना। सपने तमाम तरह के होते हैं। भरमाने वाले, उकसाने वाले और परेशान करने वाले। वे टूटते भी हैं। पर सपनों को होना चहिए। ऐसे सपने जो हम सब मिलकर देखें।
अगस्त का यह महीना कुछ जबर्दस्त यादें साथ लेकर आता है। स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए महत्त्वपूर्ण याद है। पर यह हिरोशिमा और नगासाकी की तबाही का महीना भी है। 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा शहर पर एटम बम गिराया गया। फिर भी जापान ने हार नहीं मानी तो 9 अगस्त को नगासाकी शहर पर बम गिराया गया। इन दो बमों ने विश्व युद्ध रोक दिया। दुनिया में इसके पहले इतने सारे लोगों की एकसाथ मौत पहले कभी नहीं हुई थी। मीठी हों या खौफनाक, यादें को भुलाई नहीं जातीं।
उस बमबारी को बहत्तर साल हो गए हैं। हमारी आजादी से दो साल ज्यादा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापानी संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत व्यवस्था कर दी गई थी कि जापान भविष्य में युद्ध नहीं करेगा। पर अब जापान फिर से इन कानूनों में बुनियादी बदलाव कर रहा है। वजह है कि वैश्विक राजनीति बदल रही है, शक्ति संतुलन बदल रहा है। जापान को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने द्वितीय विश्व युद्ध की पराजय और विध्वंस का सामना करते हुए पिछले बहत्तर साल में एक नए देश की रचना कर दी। वह आज भी दुनिया की तीसरे नम्बर की अर्थव्यवस्था है। भले ही चीन उससे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर तकनीकी गुणवत्ता में चीन अभी उसके करीब नहीं हैं। हमारे पास जापान से सीखने को बहुत कुछ है।

Sunday, August 13, 2017

बीजेपी की अगस्त क्रांति

पिछले तीन साल में नरेंद्र मोदी सरकार न केवल कांग्रेस के सामाजिक आधार को ध्वस्त किया है, बल्कि उसके लोकप्रिय मुहावरों को भी छीन लिया है। गांधी और पटेल को वह पहले ही अंगीकार कर चुकी है। मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का प्रतीक चिह्न गांधी का गोल चश्मा है। गांधी के सत्याग्रह के तर्ज पर मोदी ने स्वच्छाग्रह शब्द का इस्तेमाल किया। सरदार वल्लभ भाई पटेल को वे पहले ही अपना चुके हैं। इस साल 9 अगस्त क्रांति दिवस संकल्प दिवस के रूप में मनाने का आह्वान करके मोदी ने कांग्रेस की एक और पहल को छीन लिया।
अगस्त क्रांति के 75 साल पूरे होने पर बीजेपी सरकार ने जिस स्तर का आयोजन किया, उसकी उम्मीद कांग्रेस पार्टी ने नहीं की होगी। मोदी ने 1942 से 1947 को ही नहीं जोड़ा है, 2017 से 2022 को भी जोड़ दिया है। यानी मोदी सरकार की योजनाएं 2019 के आगे जा रही हैं। भारत छोड़ो आंदोलन की याद में संसद में आयोजित विशेष बैठक में मोदी ने जिन रूपकों का इस्तेमाल किया, उनसे उन्होंने सामान्य जन-भावना को जीतने की कोशिश की। दूसरी ओर सोनिया गांधी ने उस आंदोलन को कांग्रेस पार्टी के आंदोलन के रूप में ही रेखांकित करने की कोशिश की। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी वार किया। इससे उन्हें वांछित लाभ मिला या नहीं, कहना मुश्किल है। बेहतर होता कि वे ऐसे मौके को राष्ट्रीय पर्व तक सीमित रहने देतीं।

Wednesday, August 9, 2017

ताजा करें अगस्त क्रांति की याद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ताजा 'मन की बात' में भारत छोड़ो आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा है कि देश की जनता को अस्वच्छता, गरीबी, आतंकवाद, जातिवाद और संप्रदायवाद को खत्म करने की शपथ लेनी चाहिए. यह बड़े मौके की बात है. उस आंदोलन को हम आज के हालात से जोड़ सकते हैं. हालांकि वह आंदोलन संगठित तरीके से नहीं चला, पर सन 1857 के बाद आजादी हासिल करने की सबसे जबर्दस्त कोशिश थी.

अगस्त क्रांति वास्तव में वह जनता के संकल्प का आंदोलन था, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व सलाखों के पीछे चला गया था और जनता आगे आ गई थी. जिस तरह पिछले साल सरकार ने नोटबंदी के परिणामों पर ज्यादा विचार किए बगैर फैसला किया था, तकरीबन वैसा ही सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का फैसला था. उस आंदोलन ने देश को फौरन आजाद नहीं कराया, पर विदेशी शासन की बुनियाद हिलाकर रख दी.

Sunday, August 6, 2017

किधर जा रही है कांग्रेस?

हाल में सोशल मीडिया में एक चुटकुला लोकप्रिय हो रहा था कि अमित शाह को मौका लगे तो बीजिंग में भी बीजेपी की सरकार बनवा दें। यह मजाक की बात है, पर सच यह है कि बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष ने सन 2019 के चुनाव के सिलसिले में राज्यों के दौरे शुरू कर दिए हैं। सवाल है कि कांग्रेस क्या कर रही है? हाल में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव के पहले सोनिया गांधी ने 17 दलों को एकसाथ लाने का दावा किया था। चुनाव के दिन तक ये 16 ही रह गए। दूसरी ओर बीजेपी के प्रत्याशी का 40 पार्टियों ने समर्थन किया।

बेशक इन 40 दलों का लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन होगा, ऐसा मान लेना उचित नहीं है, पर सच यह है कि पार्टी लगातार अपनी पहुँच का दायरा बढ़ा रही है। अब खबरें हैं कि बीजेपी ने अद्रमुक को भी अपने साथ जोड़ लिया है। दो दिन बाद गुजरात में राज्यसभा के चुनाव हैं। वहाँ अहमद पटेल को जिताने लायक विधायक कांग्रेस के पास थे, पर अचानक शंकर सिंह वाघेला की बगावत से कहानी बदल गई है। 

Saturday, August 5, 2017

अब दाँव पर कांग्रेस का सर्वस्व

कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर में प्रवेश कर गई है। अगले साल यानी 24 मार्च 2018 को सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बने 20 साल पूरे हो जाएंगे। एक जमाने में पार्टी अध्यक्ष एक-एक साल के लिए बनते थे। फिर एक ही अध्यक्ष एक साल से ज्यादा वक्त तक काम करने लगा। इंदिरा गांधी 1978 से 1984 तक रहीं तो वह लंबी अवधि थी। फिर 1992 से 1996 तक पीवी नरसिंहराव अध्यक्ष रहे।
सोनिया गांधी का इतनी लंबी अवधि तक अध्यक्ष बने रहने से उनकी ताकत और प्रभाव का पता लगता है। साथ ही यह भी कि उनका विकल्प तैयार नहीं है। उम्मीद थी कि इस साल अक्तूबर तक राहुल गांधी पूरी तरह अध्यक्ष पद संभाल लेंगे, पर अब यह बात पूरी होती लग नहीं रही है। इसका मतलब है कि 2019 का चुनाव पार्टी सोनिया जी की अध्यक्षता में ही लड़ेंगी।
क्या फर्क पड़ता है, सोनिया हों या राहुल? औपचारिक रूप से यह इस बात का संकेतक कि पार्टी करवट ले भी रही है या नहीं। यह सवाल मई 2014 से पूछा जा रहा है कि कांग्रेस को पुनर्जीवन कैसे मिलेगा? जवाब है कि हम बाउंस-बैक करेंगे, पहले भी किया है। पर कैसे? संगठन में कोई जुंबिश नहीं, बुनियादी बदलाव नहीं, नारों और कार्यक्रमों में कोई नयापन नहीं और नेतृत्व में ठहराव।

Friday, August 4, 2017

आतंकवाद का सायबर संग्राम

पिछले हफ्ते राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए पाकिस्तान से पैसा लाने की साजिश के सिलसिले में कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है. एजेंसी ने अपनी जाँच में कश्मीर की घाटी के करीब चार दर्जन ऐसे किशोरों का पता लगाया है जो नियमित रूप से सुरक्षा बलों पर पत्थर मारने का काम करते हैं.

इन किशोरों के बारे में दूसरी बातों के अलावा यह बात भी पता लगी कि वे वॉट्सएप ग्रुपों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हैं. इन ग्रुपों को पाकिस्तान में बैठे लोग चलाते हैं. ये लोग एक तरफ तो बच्चों को बरगलाने के लिए भड़काने वाली सामग्री डालते हैं और दूसरी तरफ पत्थर मारने से जुड़े कार्यक्रमों और दूसरे निर्देशों से इन्हें परिचित कराते हैं. वॉट्सएप जैसे एनक्रिप्टेड संदेशों को पकड़ना आसान भी नहीं है.

क्या कांग्रेस को रास्ता दिखाएंगे प्रणब?

प्रणब मुखर्जी बड़े विकट समय में राष्ट्रपति रहे। यूपीए सरकार के अंतिम दो साल राजनीतिक संकट से भरे थे। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे, अर्थ-व्यवस्था अचानक ढलान पर उतर गई थी और सत्तारूढ़ दल अचानक नेतृत्व विहीन नजर आने लगा था। यूपी सरकार के जाने के बाद एक ताकतवर राजनेता प्रधानमंत्री के रूप में दिल्ली आया तो राजनीति में जबर्दस्त बदलाव की लहरें उठने लगीं। ऐसे में राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी ने जिस संयम और धैर्य के साथ काम किया, वह कम महत्वपूर्ण नहीं है।   

प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के वरिष्ठतम राजनेताओं में से एक हैं। उनके सामने पिछले दो साल में ऐसे अनेक मौके आए होंगे, जब उनके निर्णयों को लेकर राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा सकते थे। ऐसा हुआ नहीं। उनके पहले दो साल के कार्यकाल में इस बात की संभावना नहीं थी, पर अंतिम तीन साल में थी। पर वे अत्यंत संतुलित, सुलझे हुए राष्ट्रपति साबित हुए। संसदीय व्यवस्था के सुदीर्घ अनुभव का पूरा इस्तेमाल करते हुए उन्होंने हर मौके पर वही किया, जिसकी एक राजपुरुष यानी स्टेट्समैन से अपेक्षा की जाती है। संविधान में लिखे अक्षरों और उनके पीछे की भावना का पूरा सम्मान और अपने विवेक का इस्तेमाल। उनकी सेवानिवृत्ति के बाद एक सवाल आया है कि क्या वे वापस जाकर कांग्रेस की सेवा करेंगे?

Wednesday, July 26, 2017

कर्नाटक का राज्य-ध्वज और हिंदी-विरोध

अगले साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. उसकी तैयारी में राज्य की कांग्रेस सरकार कई तरह के लोक-लुभावन कार्यक्रमों की घोषणाएं कर रही है. 15 अगस्त से नागरिकों को सस्ता भोजन देने की इंदिरा गांधी कैंटीन योजना शुरू होने वाली है, जिसका उद्घाटन करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खासतौर से बेंगलुरु आएंगी. यह कार्यक्रम तमिलनाडु की अम्मा कैंटीन से प्रभावित है. लोक-लुभावन कार्यक्रम राजनीति का हिस्सा हैं. उन्हें स्वीकार कर लिया गया है. पर कर्नाटक की हाल की कुछ घटनाओं से लगता है कि वहाँ लोगों की भावनाओं से खेलने की कोशिश की जा रही है.   

मुख्यमंत्री एस सिद्धरमैया ने पिछले सोमवार को राज्य का अलग से ध्वज डिजाइन करने के लिए नौ सदस्यों की समिति बनाने की घोषणा की है. उसके बाद यह बहस शुरू हो गई है कि किसी राज्य का अपना अलग ध्वज होना चाहिए या नहीं. यह बहस चल ही रही है. सन 2004 में कर्नाटक राज्य ने अपना राज्य-गान भी स्वीकार किया था. राज्य के संगीतकार सी अश्वथ ने उसकी धुन तैयार की थी, पर उस धुन के मानक स्वरूप को अभी स्वीकार नहीं किया गया है. महाराष्ट्र के साथ राज्य की सीमा को लेकर भी विवाद हैं.

Sunday, July 23, 2017

बे-काम दुनिया में जीवन का अर्थ




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Monday, July 17, 2017

राष्ट्रपति चुनाव के बाद मोदी के हाथ मजबूत होंगे

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
17 जुलाई 2017
देश की राजनीति के लिहाज़ से सोमवार को दो बड़ी घटनाएं होंगी. पहला दिल्ली में सोलहवीं संसद का चौथा मॉनसून सत्र शुरू होगा, और दूसरा दिल्ली और देश के सभी राज्यों की राजधानियों में देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे. 

ऐसे में सहज जिज्ञासा होती है कि इस चुनाव का औपचारिकता से ज़्यादा कोई मतलब भी है या नहीं? लगता है कि बीजेपी गठबंधन के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद यह चुनाव जीत जाएंगे. 

सवाल है कि नए राष्ट्रपति के आगमन से बीजेपी गठबंधन सरकार की स्थिति में क्या बदलाव आएगा? क्या मोदी सरकार की स्थिति बेहतर हो जाएगी?

प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक थे. उनके कार्यकाल में भी मोदी सरकार को कभी परेशानी नहीं हुई. 

हाल में नरेंद्र मोदी ने उन्हें कृतज्ञता में पिता-तुल्य माना और कहा, 'मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रणब दा की उँगली पकड़ कर दिल्ली की ज़िंदगी में ख़ुद को स्थापित करने का मौका मिला.'

राष्ट्रपति का चुनाव हालांकि राजनीतिक गतिविधि है, पर उसके नाटकीय निहितार्थ नहीं होते. ज़्यादा से ज़्यादा सत्तारूढ़ दल के रसूख का पता लगता है. आमतौर पर उसके नतीजों का पहले से अनुमान होता है.

इस पद की संवैधानिक भूमिका भी काफी हद तक औपचारिक है. कहते हैं कि वह केवल 'रबर स्टांप' है. पर बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह भूमिका कुछ ख़ास मौकों पर महत्वपूर्ण भी हो सकती है.

नए दौर में प्रवेश करती भारतीय राजनीति

राजनीतिक गलियारों में डेढ़-दो महीने की अपेक्षाकृत चुप्पी के बाद आज दो बड़ी राजनीतिक घटनाएं होने जा रहीं हैं, जिनका राजनीति पर असर देखने को मिलेगा. देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के अलावा संसद का मॉनसून सत्र आज शुरू हो रहा है. सोलहवीं लोकसभा के तीन साल गुजर जाने के बाद यह पहला मौका है, जब 18 विरोधी दल एक सामूहिक रणनीति के साथ संसद में उतर रहे हैं. पिछले मंगलवार को इन दलों ने उप-राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का नाम तय करने के साथ अपनी भावी रणनीति का खाका भी तय किया है. ये दल अब महीने में कम से कम एक बार बैठक करेंगे. ये बैठकें दिल्ली में ही नहीं अलग-अलग राज्यों में होंगी. ज्यादा महत्वपूर्ण है संसदीय गतिविधियों में इनका समन्वय. राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया अब क्रमशः तेज होगी.

Sunday, July 16, 2017

काजल की कोठरी क्यों बनी राजनीति?

एक सामान्य कारोबारी को लखपति से करोड़पति बनने में दस साल लगते हैं, पर आप राजनीति में हों तो यह चमत्कार इससे भी कम समय में संभव है। वह भी बगैर किसी कारोबार में हाथ लगाए। बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी का दावा है कि लालू प्रसाद का परिवार 2000 करोड़ रुपये की संपत्ति का मालिक है। इस दावे को अतिरंजित मान लें, पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी मिल्कियत करोड़ों में है। कई शहरों में उनके परिवार के नाम लिखी अचल संपत्ति के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है। 

Saturday, July 15, 2017

राजनीति नहीं चाहती सीबीआई को स्वतंत्र बनाना

इस साल मई में लालू यादव के पारिवारिक ठिकानों पर जब सीबीआई की छापा-मारी हुई तो लालू यादव ने ट्वीट किया,बीजेपी में हिम्मत नहीं कि लालू की आवाज को दबा सकेलालू की आवाज दबाएंगे तो देशभर में करोड़ों लालू खड़े हो जाएंगे। यह राजनीतिक बयान था। उन छापों के बाद यह भी समझ में आने लगा कि लालू और नीतीश कुमार के बीच खलिश काफी बढ़ चुकी है। छापों की खबर आते ही लालू ने अपने ट्वीट में एक ऐसी बात लिखी जिसका इशारा नीतीश कुमार की तरफ़ था। उन्होंने लिखा, बीजेपी को उसका नया एलायंस पार्टनर मुबारक हो। बात का बतंगड़ बनने के पहले ही लालू ने बात बदल दी। उन्होंने कहा बीजेपी के पार्टनर माने आयकर विभाग और सीबीआई।

लालू ने एक तीर से दो शिकार कर लिए। वे जो कहना चाहते थे, वह हो गया। उधर नीतीश कुमार ने कहा, बीजेपी जो आरोप लगा रही है, उसमें सच्चाई है तो केंद्र सरकार अपनी एजेंसियों से जांच या कार्रवाई क्यों नहीं कराती? पिछले साल नवंबर में नोटबंदी का नीतीश कुमार ने स्वागत किया था। उसके साथ उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री को बेनामी संपत्ति के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करनी चाहिए। लालू यादव के परिवार की जिस सम्पत्ति को सीबीआई ने छापे डाले हैं, उसका मामला नीतीश की पार्टी ने ही सन 2008 में उठाया था। तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। आज बीजेपी सरकार है और बेनामी सम्पत्ति कानून में बदलाव हो चुका है। लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती और उनके पति इन दिनों सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के घेरे में हैं।

Friday, July 14, 2017

‘मोदी संस्कृति’ को चुनौती हैं गोपाल कृष्ण गांधी

प्रशासक, विचारक, लेखक और आंशिक रूप से राजनेता गोपाल कृष्ण गांधी की देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के पक्षधर के रूप में पहचान है. उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है उनकी विरासत और विचारधारा. उनके पिता देवदास गांधी थे और माँ लक्ष्मी गांधी, जो राजगोपालाचारी की बेटी थीं. दादा महात्मा गांधी और नाना चक्रवर्ती राजगोपालाचारी.
गोपाल कृष्ण गांधी सामाजिक बहुलता के पुजारी हैं, और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित हो रहे राजनीतिक हिन्दुत्व के मुखर विरोधी. विपक्षी दलों ने उन्हें उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनकर यह बताने की कोशिश की है कि भारत जिस सांस्कृतिक चौराहे पर खड़ा है, उसमें वे वैचारिक विकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे मोदी के सामने सांस्कृतिक चुनौती के रूप में खड़े हैं. 

Sunday, July 9, 2017

विपक्षी एकता की निर्णायक घड़ी

सीबीआई लालू ने यादव के परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके शुक्रवार को देशभर में 12 स्थानों पर छापामारी की है। लालू परिवार पिछले कुछ महीनों से सीबीआई के अलावा इनकम टैक्स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की निगाहों में है। इस गतिविधि के आपराधिक निहितार्थ एक तरफ हैं और राजनीतिक निहितार्थ दूसरी तरफ। इसका फौरी असर बिहार के महागठबंधन पर पड़ने का अंदेशा है। पर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रभाव 2019 के चुनाव को लेकर चल रहे विपक्षी-एकता के प्रयासों पर पड़ेगा।

दूसरी ओर एनडीए की रणनीति भी इन छापों से जुड़ी है। इस छापामारी ने महागठबंधन की राजनीति के अंतर्विरोधों को खोला है। महागठबंधन में सेंध लगाने की एनडीए-राजनीति कितनी सफल होगी, इसका भी इंतजार है। फिलहाल सारी निगाहें नीतीश कुमार पर हैं। उनका नजरिया इन सभी बातों को प्रभावित करेगा।

पिछले दो-तीन हफ्ते में नीतीश कुमार ने अचानक कुछ अप्रत्याशित फैसले किए हैं। राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्षी एकता से अलग होकर उन्होंने पहला झटका दिया और अपने दृष्टिकोण में आए बदलाव का संकेत भी दिया। उसके बाद उन्होंने कांग्रेस की बुनियादी समझ पर प्रहार किए। फिर भी उन्होंने खुद को व्यापक स्तर पर विपक्षी-एकता से अलग नहीं किया।

Friday, July 7, 2017

भारतीय भाषाओं को लड़ाने की कोशिश

बंगाल में जड़ें जमाने की कोशिश में भारतीय जनता पार्टी साम्प्रदायिक सवालों को उठा रही है. उसके लिए परिस्थितियाँ अच्छी हैं, क्योंकि ममता बनर्जी ने इस किस्म की राजनीति के दूसरे छोर पर कब्जा कर रखा है. भावनाओं की खेती के अर्थशास्त्र को समझना है तो वोट की राजनीति पढ़ना चाहिए. ऐसी ही खेती का जरिया भाषाएं हैं. कर्नाटक में अगले साल चुनाव होने वाले हैं. उसके पहले वहाँ भाषा को लेकर एक अभियान शुरू हुआ है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस तीन भाषा सूत्र की समर्थक है, पर बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी विरोध की वह समर्थक है. साम्प्रदायिक राजनीति का यह एक और रूप है, इसमें सम्प्रदाय की जगह भाषा ले लेती है. भाषा सामूहिक पहचान से जुड़ी है. इस आंदोलन के पीछे अंग्रेजी-परस्त लोग भी शामिल हैं, क्योंकि अंग्रेजी उन्हें 'साहब' की पहचान देने में मददगार है.
इन दिनों बेंगलुरु मेट्रो के सूचना-पटों में अंग्रेजी और कन्नड़ के साथ हिंदी के प्रयोग को लेकर एक आंदोलन चलाया जा रहा है. इस आंदोलन को अंग्रेजी मीडिया ने हवा भी दी है. शहर के कुछ मेट्रो स्टेशनों में हिंदी में लिखे नाम ढक दिए गए हैं. ऐसा ही एक आंदोलन कुछ समय पहले दक्षिण भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के नाम-पटों में हिंदी को शामिल करने के विरोध में खड़ा हुआ था. हाल में राम गुहा और शशि थरूर जैसे लोगों ने बेंगलुरु मेट्रो-प्रसंग में हिंदी थोपे जाने का विरोध किया है. एक तरह से यह भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने की कोशिश है. साथ ही अंग्रेजी के ध्वस्त होते किले को बचाने का प्रयास भी.

Thursday, July 6, 2017

डगमग होती विपक्षी एकता

बुधवार को मीरा कुमार ने औपचारिक रूप से पर्चा दाखिल करने के बाद अपने प्रचार-अभियान की शुरूआत कर दी है. उनका कहना है कि यह सिद्धांत की लड़ाई है. संविधान की रक्षा के लिए और देश को साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ में जाने से रोकने के लिए वे खड़ी हुई हैं. वस्तुतः यह सन 2019 के चुनाव में गैर-बीजेपी गठजोड़ का प्रस्थान बिंदु है. देशभर में असहिष्णुता और अल्पसंख्यकों की हत्याओं के खिलाफ आंदोलन खड़ा हो गया है. यह उस राजनीति का पहला अध्याय है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उभरेगी.
मीरा कुमार के नामांकन के वक्त 17 दलों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. इनके नाम हैं कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, वाममोर्चा के चार दल, तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, नेशनल कांफ्रेंस, डीएमके, झामुमो, जेडीएस, एआईयूडीएफ, केरल कांग्रेस, मुस्लिम लीग. आम आदमी पार्टी इस प्रक्रिया में शामिल नहीं थी, पर वह भी मीरा कुमार के साथ जाएगी. यह प्रभावशाली संख्या है, पर इसके मुख्य सूत्रधार कांग्रेस और वामदल हैं. धर्म-निरपेक्ष राजनीति का काफी बड़ा हिस्सा इस राजनीति से बाहर है.

Wednesday, July 5, 2017

गांधी का लेख 'यहूदी लोग'


इस बात को लेकर बहस चल निकली है कि गांधी ने इस्रायल का समर्थन किया था या नहीं। सन 1938 के उनके इस लेख से इतना जरूर पता लगता है कि वे चाहते थे कि यहूदी लोग बंदूक के जोर पर इस्रायल बनाने के बजाय अरबों की सहमति से अपने वतन वापस आएं। व्यावहारिक सच यह भी है कि इस लेख के लिखे जाने के कुछ साल बाद वे धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान को रोक नहीं पाए। नीचे मैंने इस लेख का अंग्रेजी प्रारूप भी दिया है। गांधी समग्र के खंड 68 में यह लेख हिंदी में पढ़ा जा सकता है। 

Monday, July 3, 2017

प्रणब के प्रति मोदी की कृतज्ञता क्या कहती है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पिता-तुल्य बताना पहली नजर में सामान्य औपचारिकता लगती है. प्रणब दा के विदा होने की बेला है. ऐसे में औपचारिक बातें ही होती हैं. पर दूसरी नजर में दोनों नेताओं का एक दूसरे की तारीफ करना कुछ बातों की याद दिला देता है.  

रविवार के राष्ट्रपति भवन में एक पुस्तक के विमोचन समारोह में नरेंद्र मोदी ने कहा, जब मैं दिल्ली आया, तो मुझे गाइड करने के लिए मेरे पास प्रणब दा मौजूद थे. मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रणब दा की उँगली पकड़ कर दिल्ली की जिंदगी में खुद को स्थापित करने का मौका मिला.

Sunday, July 2, 2017

जीएसटी के समर्थन-विरोध का ‘तमाशा’


कांग्रेस पार्टी जीएसटी को लेकर संविधान संशोधन लेकर कभी आई नहीं, पर सच यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी या गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने जीएसटी के विरोध में स्वर उठाए थे। उनका कहना था कि जीएसटी की संरचना ऐसी है कि बिना आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए यह लागू नहीं हो सकता। यह भी सच है कि जीएसटी की परिकल्पना सन 1999 में अटल बिहारी सरकार ने की थी। सन 2003 में केलकर समिति उसने ही बनाई थी। बाद में यूपीए सरकार ने सन 2010 तक उसे लागू करने का बीड़ा उठाया, पर जीएसटी कमेटी से असीम दासगुप्त के इस्तीफे के बाद वह काम रुक गया। मार्च 2011 में एक संविधान संशोधन पेश किया गया, जिसपर आगे विचार नहीं हुआ।

एनडीए सरकार ने जब इस काम को शुरू किया तो कांग्रेस ने ना-नुकुर करना शुरू कर दिया। इससे क्या निष्कर्ष निकाला जाए? यही कि व्यावहारिक-राजनीति तमाम ऐसे कार्यों में अड़ंगा लगाती है, जो सामान्य हित से जुड़े होते हैं। एनडीए को इस संविधान संशोधन को पास कराने और लागू कराने का श्रेय जाता है। इसके लिए कांग्रेस तथा दूसरे दलों को मनाने का श्रेय भी उसे जाता है। जीएसटी कौंसिल के रूप में एक संघीय व्यवस्था कायम करने का भी।

जीएसटी अभी लागू होना चाहिए था या नहीं? उसके लिए पर्याप्त तैयारी है या नहीं? क्या इसबार भी नोटबंदी जैसी अफरा-तफरी होगी? ऐसे तमाम सवाल हवा में हैं। जो लोग इस वक्त यह सवाल कर रहे हैं उन्हें पिछले साल 16 सितम्बर को संसद से संविधान संशोधन पास होते वक्त यह सवाल करना चाहिए था। संविधान संशोधन के अनुसार एक साल के भीतर जीएसटी को लागू होना है। यानी 16 सितम्बर तक उसे लागू करना ही है। अब इस सवाल को बीजेपी या कांग्रेस के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। देश के नागरिक होने के नाते हमें उस प्रवृत्ति को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए, जिसे बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने मौका आने पर अपनाया है। इस वक्त भी तमाशा हुआ है तो दोनों और से हुआ है।  

कांग्रेस को जीएसटी समारोह पर आपत्ति है। पर समारोह हो ही गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। जब संविधान संशोधन पास कराने में उसकी भूमिका थी, तो इस समारोह के वक्त वह भी इस सहयोग का श्रेय ले सकती थी। अंततः यह कानून भारत का है, बीजेपी का नहीं। इस मामले को देश की स्वतंत्रता से जोड़ने की कोशिश निहायत बचकाना है। देश को आजादी एक वृहत आंदोलन और बदलती ऐतिहासिक स्थितियों के कारण मिली है। कांग्रेस के भीतर भी कई प्रकार की धारणाएं थीं। वही कांग्रेस आज नहीं है। सन 1969 के बाद कांग्रेस बुनियादी रूप से बदल चुकी है। देश के राजनीतिक दलों के स्वरूप और भूमिका को लेकर यहाँ बहस करने का कोई मतलब नहीं है। इस वक्त जो सरकार है, वह देश की प्रतिनिधि सरकार है। जीएसटी कानून एक सांविधानिक प्रक्रिया से गुजर कर आया है। बेहतर हो कि संसद के भीतर और बाहर उसे लेकर बहस करें।

Thursday, June 29, 2017

मोदी के इसी बयान का था इंतजार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गो-भक्ति के नाम पर हो रही हत्याओं पर बयान देने में कुछ देर की है. उन्होंने कहा है कि गो-रक्षा के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती. उनके इस बयान का पिछले कुछ समय से इंतजार था. खासतौर से दिल्ली के पास बल्लभगढ़ में एक किशोर जुनैद की हत्या के बाद देश का नागरिक समाज गो-रक्षा के नाम पर हिंसा फैलाने वालों से नाराज है.

ऐसा नहीं कि अतीत में प्रधानमंत्री इस विषय पर कुछ बोले नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक की हत्या से लेकर गुजरात के उना में दलितों की पिटाई तक की उन्होंने आलोचना की. पर अब जरूरत इस बात की है कि वे अपनी बात को कड़ाई से कहें और गो-रक्षा के नाम पर बढ़ती जा रही अराजकता को रुकवाएं. अन्यथा यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित होगा.

Tuesday, June 27, 2017

कश्मीर पर इंटरनेट सामग्री

कश्मीर को लेकर हाल में इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को मैने एक जगह सूचीबद्ध किया है। यदि आपकी दिलचस्पी इस संग्रह को और बेहतर बनाने में है तो आप इसके कमेंट सेक्शन में लिंक लगा सकते हैं। मैं उन्हें मुख्य आलेख में लगा दूँगा।







Post cold war US Policy on Kashmir
Security Council Resolution 47
मुशर्रफ ने कहा, हमने जनमत संग्रह के प्रस्ताव से किनारा कर लिया है
AG Noorani
Arundhati Roy
Kashmir : The unwritten history
Guardian's report on BalochistanCurfew without end
Three generations of Azadi

Monday, June 26, 2017

अंतरिक्ष में जीवन की घोषणा होने वाली है?

एक हैक्टिविस्ट ग्रुप ने दावा किया है कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को अंतरिक्ष में जीवन के चिह्न मिल गए हैं और जल्द ही यह संस्था इस बात की घोषणा करने वाली है। इस ग्रुप ने यूट्यूब पर एक वीडियो जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि हाल में नासा के एक आधिकारिक प्रवक्ता ने अमेरिका की विज्ञान, अंतरिक्ष और तकनीकी समिति की बैठक में कहा कि अंतरिक्ष में जीवन होने के प्रमाण मिल गए हैं। इस हैक्टिविस्ट ग्रुप ने अपनी वैबसाइट में कहा, "Latest anonymous message in 2017 just arrived with a huge announcement about the Intelligent Alien Life! NASA says aliens are coming!"..."Many other planets throughout the universe probably hosted intelligent life long before Earth did."

अप्रेल में एक संसदीय सुनवाई में नासा के साइंस मिशन डायरेक्टरेट के एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर प्रोफेसर टॉमस जुर्बुचेन ने कहा था कि हम अंतरिक्ष में जीवन की सम्भावनाओं के करीब पहुँच रहे हैं।  
https://www.youtube.com/watch?time_continue=4&v=HGh8n1XxDrg

आईबी टाइम्स में यह खबर पढ़ें
एक और खबर यहाँ पढ़ें

पिछले हफ्ते इस खबर के छपने के बाद नासा ने सफाई दी कि उसकी तरफ से ऐसी कोई घोषणा नहीं होने वाली है। ऐसी एक खबर पढ़ें यहाँ-
Washington:
US space agency NASA said that it has no pending announcement regarding extraterrestrial life, following a wave of media reports that it was about to announce the evidence of alien life.


Thomas Zurbuchen, associate administrator for the agency's Science Mission Directorate, on Monday denied the reports and confirmed that NASA scientists are still looking for proof of alien life, reports Xinhua news agency.

"Are we alone in the universe? While we do not know yet, we have missions moving forward that may help answer that fundamental question," he tweeted
पूरी खबर पढ़ें



Sunday, June 25, 2017

विरोधी दलों के उभरते अंतर्विरोध

बीजेपी ने रामनाथ कोविंद का नाम राष्ट्रपति पद के लिए घोषित नहीं किया होता तो शायद विरोधी दल मीरा कुमार के नाम को सामने नहीं लाते। इस मुकाबले की बुनियादी वजह दलित पहचान है। यह बात राजनीति की प्रतीकात्मकता और पाखंड को व्यक्त करती है। अलबत्ता इस घटना क्रम के कारण महा-एकता कायम करने की विपक्षी राजनीति की जबर्दस्त धक्का भी लगा है। सवाल यह है कि राष्ट्रपति चुनाव के बहाने जन्मी एकता केवल राष्ट्रपति चुनाव तक सीमित रहेगी या सन 2019 के चुनाव तक जारी रहेगी? दूसरे क्या केवल साम्प्रदायिकता-विरोध के आधार पर कायम की गई वैचारिक-एकता लम्बी दूरी की राजनीति का आधार बन सकती है?
लालू प्रसाद यादव का यह कहना कि जेडीयू ने रामनाथ कोविंद का समर्थन करके ऐतिहासिक भूल की है, एक नई राजनीति का प्रस्थान बिंदु है। बिहार में इन दोनों पार्टियों के बीच जो असहजता है, वह खुले में आ गई है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का एक मंच पर आना भी एक नई राजनीति की शुरुआत है। देखना होगा कि इस एकता के पीछे कितनी संजीदगी है। मायावती ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि विपक्ष ने दलित प्रत्याशी को नहीं उतारा तो उनके पास रामनाथ कोविंद का समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।

Saturday, June 24, 2017

प्रणब मुखर्जी: विकट दौर के सहज राष्ट्रपति


भारतीय संविधान के अनुसार देश का राष्ट्रपति भारत सरकार का प्रशासनिक प्रमुख है, पर व्यवहार में वह अपने ज्यादातर काम सत्तारूढ़ सरकार की सलाह पर करता है। बहुत कम काम ऐसे होते हैं, जिन्हें उनका व्यक्तिगत निर्णय कहा जाए। हर साल संसद के बजट सत्र की शुरुआत में उनका भाषण एक तरह से सत्तारूढ़ दल की सरकार लिखती है। सरकारी काम-काज के बाहर की सभाओं, गोष्ठियों में कई बार राष्ट्रपति अपने निजी विचार व्यक्त करते हैं, जिन्हें बड़े गौर से सुना जाता है। ऐसी टिप्पणियों से, अध्यादेशों को पुनर्विचार के लिए सरकार के पास वापस भेजने और कैदियों की सज़ा-माफी और कुछ नियुक्तियों के फैसलों से ही राष्ट्रपतियों के व्यक्तित्व के फर्क का पता लगता है।

डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ राधाकृष्णन, डॉ ज़ाकिर हुसेन, ज्ञानी जैल सिंह, केआर नारायण, एपीजे अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी तक सभी राष्ट्रपतियों की कुछ न कुछ खास बातें याद की जाती हैं, खासतौर से तब जब वे विदा होते हैं। 24 जुलाई को प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल के पाँच साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में यह समझना बेहतर होगा कि ऐसी कौन सी बातें हैं, जिनके लिए उन्हें विशेष रूप से याद किया जाए।

परिपक्व राजपुरुष

जैसा कि अंदेशा था, सन 2014 में त्रिशंकु संसद होती तब शायद प्रणब मुखर्जी की समझदारी की परीक्षा होती। उन्होंने इसके लिए पहले से विशेषज्ञों से राय भी ले रखी थी। पर ऐसा मौका आया नहीं। पर इतना जरूर है कि पिछले तीन साल में उन्होंने कोई ऐसा फैसला नहीं किया, जिससे उन्हें विवादास्पद कहा जाए। जब भी उन्हें मौका मिला उन्होंने अपनी राय गोष्ठियों और सभाओं में जाहिर कीं। यह एक परिपक्व राजपुरुष (स्टेट्समैन) का गुण है।

Tuesday, June 20, 2017

रामनाथ कोविंद का चयन बीजेपी का सोचा-समझा पलटवार है

कोविंद को लेकर यह बेकार की बहस है कि वह प्रतिभा पाटिल जैसे ‘अनजाने और अप्रत्याशित’ प्रत्याशी हैंPramod Joshi | Published On: Jun 20, 2017 09:21 AM IST | Updated On: Jun 20, 2017 09:21 AM IST

रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित करने के बाद से एक निरर्थक बहस इस बात को लेकर शुरू हो गई है कि वे क्या प्रतिभा पाटिल जैसे ‘अनजाने और अप्रत्याशित’ प्रत्याशी हैं? उनकी काबिलियत क्या है और इसके पीछे की राजनीति क्या है वगैरह.

भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रत्याशी का नाम अपने दूरगामी राजनीतिक उद्देश्यों के विचार से ही तय किया है, पर इसमें गलत क्या है? राष्ट्रपति का पद अपेक्षाकृत सजावटी है और उसकी सक्रिय राजनीति में कोई भूमिका नहीं है, पर राजेंद्र प्रसाद से लेकर प्रणब मुखर्जी तक सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी राजनीतिक कारणों से ही चुने गए.

इमर्जेंसी : यादों के कुछ काले-सफेद पन्ने

सुबह के अखबारों में जेपी की रैली की खबर थी, जिसमें देश की जनता से अपील की गई थी कि वह इस अवैधसरकार को खारिज कर दे। टैक्स देना बंद करो, छात्र स्कूल जाना बंद करें, सैनिक, पुलिस और सरकारी कर्मचारी अपने अफसरों के हुक्म मानने से इंकार करें। रेडियो स्टेशनों को चलने नहीं दें, क्योंकि रेडियो झूठबोलता है। लखनऊ के स्वतंत्र भारत में काम करते हुए मुझे डेढ़-दो साल हुए थे। सम्पादकीय विभाग में मैं सबसे जूनियर था। खबरों को लेकर जोश था और सामाजिक बदलाव का भूत भी सिर पर सवार था। 26 जून 1975 की सुबह किसी ने बताया कि रेडियो पर इंदिरा गांधी का राष्ट्र के नाम संदेश आया था, जिसमें उन्होंने घोषणा की है कि राष्ट्रपति जी ने देश में आपातकाल की घोषणा की है।
आपातकाल या इमर्जेंसी लगने का मतलब मुझे फौरन समझ में नहीं आया। एक दिन पहले ही अखबारों में खबर थी कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी को अपने पद पर बनाए रखा है, पर उनके तमाम अधिकार खत्म कर दिए हैं। वे संसद में वोट भी नहीं दे सकती हैं। इंदिरा गांधी के नेतृत्व और उसके सामने की चुनौतियाँ दिखाई पड़ती थीं, पर इसके आगे कुछ समझ में नहीं आता था।
हमारे सम्पादकीय विभाग में दो गुट बन गए थे। कुछ लोग इंदिरा गांधी के खिलाफ थे और कुछ लोग उनके पक्ष में भी थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमे की खबर की कॉपी मुझे ही अनुवाद करने के लिए मिलती थी, जिससे मुझे मुकदमे की पृष्ठभूमि समझ में आती थी। हमारे यहाँ हिन्दी की एजेंसी सिर्फ हिन्दुस्तान समाचार थी। वह भी जिलों की खबरें देती थी, जो दिन में दो या तीन बार वहाँ से आदमी टाइप की गई कॉपी देने आता था। हिन्दुस्तान समाचार का टेलीप्रिंटर नहीं था। आज के मुकाबले उस जमाने का मीडिया बेहद सुस्त था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम पर सुबह और रात की रेडियो खबरें ही थीं। टीवी लखनऊ में उसी साल नवम्बर में आया, जून में वह भी नहीं था। आने के बाद भी शाम की छोटी सी सभा होती थी। आज के नज़रिए से वह मीडिया नहीं था। केवल शाम को खेती-किसानी की बातें बताता और प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री के भाषणों का विवरण देता था। 

Sunday, June 18, 2017

राष्ट्रपति चुनाव का गणित और अब तक के परिणाम

चुनाव का गणित

दल
विधायक
सांसद
वि.सभा वोट
संसदीय वोट
कुल वोट
प्रतिशत
कुल
4114
784
5,49,474
5,55,072
11,04,546
100
एनडीए
1691
418
2,41,757
2,95,944
5,37,683
48.64
यूपीए
1710
244
2,18,987
1,73,460
3,91,739
35.47
अन्य
510
109
71,495
72,924
1,44,302
13.06
उपरोक्त गणना सार्वजनिक मीडिया स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर है। इसे मोटा अनुमान ही कहा जा सकता है। यह आधिकारिक डेटा नहीं है। इन संख्याओं का जोड़ लगाने के बाद भी लगभग 3 प्रतिशत वोटों की विसंगति है या उनका विवरण उपलब्ध नहीं है।


अब तक के चुनाव परिणाम

वर्ष
राष्ट्रपति
दूसरे नम्बर के प्रत्याशी
जीत का अंतर
1952
डॉ राजेन्द्र प्रसाद
केटी शाह
5,07,400
1957
डॉ राजेन्द्र प्रसाद
चौधरी हरि राम
4,59,698
1962
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
चौधरी हरि राम
5,53.067
1967
डॉ ज़ाकिर हुसेन
कोका सुब्बाराव
4,71,244
1969
वीवी गिरि
नीलम संजीव रेड्डी
4,20,077
1975
फ़ख़रुद्दीन अली अहमद
त्रिदिब चौधरी
7,65,587
1977
नीलम संजीव रेड्डी
निर्विरोध
-------------
1982
ज्ञानी जैल सिंह
हंसराज खन्ना
7,54.113
1987
आर वेंकटरामन
वीआर कृष्ण अय्यर
7,40,148
1992
डॉ शंकर दयाल शर्मा
जीजी स्वेल
6,75,864
1997
केआर नारायण
टीएन शेषन
9,56,290
2002
एपीजे अब्दुल कलाम
कैप्टेन लक्ष्मी सहगल
8,15,366
2007
श्रीमती प्रतिभा पाटील
भैरों सिंह शेखावत
3,06,810
2012
प्रणब मुखर्जी
पीए संगमा
3,97,776