Thursday, April 24, 2014

क्या हिंदुत्व का मतलब जहर बुझे तीर हैं?

 गुरुवार, 24 अप्रैल, 2014 को 15:15 IST तक के समाचार
नरेंद्र मोदी
संघ परिवार से जुड़े लोगों के 'ज़हरीले' बयानों ने नरेंद्र मोदी को एकबारगी सांसत में डाल दिया है. पिछले कुछ दिन से मोदी अपनी छवि को सौम्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इस बयानबाज़ी ने इस छवि-निर्माण को कुछ देर के लिए छिन्न-भिन्न कर दिया है.
क्या ये अमानत में ख़यानत है? अपनों की दगाबाज़ी? या अतिशय नासमझी? इसे संघ परिवार के भीतर बैठे मोदी विरोधियों का काम मानें या कोई और बात?
पार्टी ने अमित शाह के बयान पर ठंडा पानी डालकर हालात सुधारे ही थे कि विहिप नेता क्लिक करेंप्रवीण तोगड़िया और बिहार में भाजपा के एक प्रत्याशी गिरिराज सिंह के बयानों ने सारी कोशिशों पर काफ़ी पानी फेर दिया. शिवसेना के रामदास कदम ने रही-सही कसर पूरी कर दी.
पीछा छुड़ाने के लिए नरेंद्र मोदी ने इन टिप्पणियों को 'ग़ैर ज़िम्मेदाराना' ज़रूर करार दिया है, पर 'कालिख' लग चुकी है. फिलहाल मोदी खुद और उनकी पार्टी नहीं चाहती कि विकास और सुशासन का जो दावा वे कर रहे हैं, उस पर इन बयानों की आंच आए.
मोदी ने एक के बाद एक दो ट्विटर संदेशों में कहा, "'जो लोग बीजेपी का शुभचिंतक होने का दावा कर रहे हैं, उनके बेमतलब बयानों से कैंपेन विकास और गवर्नेंस के मुद्दों से भटक रही है. मैं ऐसे किसी भी ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान को खारिज करता हूं और ऐसे बयान देने वालों से अपील कर रहा हूं कि वे ऐसा न करें."

Tuesday, April 22, 2014

क्यों छेड़ा गिलानी ने दूतों का प्रसंग?

क्या नरेंद्र मोदी ने वास्तव में कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के पास अपने दूत भेजे थे? भाजपा ने इस बात का खंडन किया है. सम्भवतः लोजपा के प्रतिनिधि गिलानी से मिले थे. मिले या नहीं मिले से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है कि गिलानी ने इस बात को ज़ाहिर क्यों कियाकश्मीर के अलगाववादी हालांकि भारतीय संविधान के दायरे में बात नहीं करना चाहते, पर वे भारतीय राजनेताओं के निरंतर सम्पर्क में रहते हैं. उनके साथ खुली बात नहीं होती, पर भीतर-भीतर होती भी है. इसमें ऐसी क्या बात थी कि कांग्रेस ने उसे तूल दी और भाजपा ने कन्नी काटी?

अगस्त 2002 में हुर्रियत के नरमपंथी धड़ों के साथ अनौपचारिक वार्ता एक बार ऐसे स्तर तक पहुँच गई थी कि उस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में हुर्रियत के हिस्सा लेने की सम्भावनाएं तक पैदा हो गईं. और उस पहल के बाद मीरवायज़ उमर फारूक और सैयद अली शाह गिलानी के बीच तभी मतभेद उभरे और हुर्रियत दो धड़ों में बँट गई. उस वक्त दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और राम जेठमलानी के नेतृत्व में कश्मीर कमेटी ने इस दिशा में पहल की थी. कश्मीर कमेटी एक गैर-सरकारी समिति थी, पर माना जाता था कि उसे केंद्र सरकार का समर्थन प्राप्त था. सरकार हुर्रियत की काफी शर्तें मानने को तैयार थी, फिर भी समझौता नहीं हो पाया. पर इतना ज़ाहिर हुआ कि अलगाववादी खेमे के भीतर भी मतभेद हैं. गिलानी के बयान को इस रोशनी में भी देखा जाना चाहिए. गिलानी के इस वक्तव्य की मीर वायज़ वाले धड़े ने निंदा की है.

Sunday, April 20, 2014

हमारी राजनीति में 'कट्टरता' का स्थान

राजनीति को क्या ‘परिवारों’ से मुक्ति मिलेगी?

खुदा न खास्ता 16 मई के बाद दिल्ली में मोदी सरकार बन जाए तो क्या होगा? हिन्दुत्व से ओत-प्रोत सरकारी फैसले होने लगेंगेमुसलमानों का जीना मुश्किल हो जाएगानिरंकुश और अहंकारी व्यवस्था कायम हो जाएगी? ये काल्पनिक सवाल हैं. पहले हमें देखना होगा कि परिणाम क्या होते हैं. पर ऐसा हुआ भी तो याद करें कि सन 1998 और फिर 1999 में बनी भाजपा-नीत दो सरकारों का अनुभव हिंसक, उग्र और बर्बर नहीं था. पर तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे, नरेंद्र मोदी नहीं. गुजरात में सन 2002 के तीन या चार दिनों को छोड़ दें तो मोदी सरकार के काम-काज में निरंकुशता और बर्बरता का वह रूप नजर नहीं आया, जिसकी चेतावनी दी जा रही है. फिर भी कहा जा सकता है कि केंद्रीय सत्ता पर संघ परिवार का कब्जा होगा.

Saturday, April 19, 2014

आप और आईपीएल


हिंदू में सुरेंद्र का कार्टून
आज के अखबारों में दो लेखों ने मेरा ध्यान खींचा है। इनमें पहला है अमित बरुआ का जिन्होंने आम आदमी पार्टी की सम्भावनाओं पर लिखा है। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी कितनी सफल होगी इसपर इस किस्म की राजनीति का भविष्य निर्भर करेगा। अमित बरुआ मूलतः आप के पक्ष में हैं और उसे कांग्रेस, भाजपा की राजनीति के विकल्प के रूप में देखते हैं।  पर उनका कहना है कि इस चुनाव के बाद ही इस राजनीति की दशा-दिशा साफ होगी। उनके लेख का अंत इस प्रकार हैः-

While the Lok Sabha poll will definitely test AAP’s mettle, many pundits believe that the party has spread itself too thin and expanded much too quickly for its own good.
These pundits are of the view that the party might have had a better chance had it concentrated on fewer seats, but the die has been cast.
The people, however, will have the final say. And they have had a history of proving the pundits wrong.
पूरा लेख पढ़ें यहाँ 

आज हिंदुस्तान में प्रकाशित राम गुहा का आईपीएल क्रिकेट पर लेख पठनीय है। खेल की सामाजिक भूमिका को समझने के लिहाज से यह अच्छा लेख है।

चुनाव से जुड़े ओपीनियन पोल की बारीकियों पर ईपी़ब्ल्यू में प्रकाशित यह लेख अच्छा है। दिलचस्पी हो तो पढ़ें
http://www.epw.in/election-specials/status-opinion-polls.html

Friday, April 18, 2014

देवी का स्वागत

कोलकाता के दैनिक टेलीग्राफ ने आज पहले सफे पर एक रोचक तस्वीर छापी है, जिसमें जयललिता के हैलिकॉप्टर का इंतज़ार करते उनके समर्थक नज़र आ रहे हैं। सबसे आगे हैं उनकी सरकार के मंत्री। रोचक है वह विवरण जो तस्वीर के साथ दिया गया है। लोग हैलिकॉप्टर के जमीन पर उतरते ही साष्टांग दंडवत करते हैं। अपने नेता को लगभग भगवान की तरह पूजने वाला समाज आधुनिक लोकतंत्र को किस प्रकार अपने जीवन में उतारतो होगा, यह बात आसानी से समझ में आती है।

एक रोचक खबर आज के अमर उजाला में गढ़वाल के उस गाँव के बारे में है जहाँ लोकसभा के पन्द्रह चुनावों में कभी कोई प्रत्याशी वोट माँगने नहीं आया। इस गाँव तक पहुँचना काफी मुश्किल काम है। 

Tuesday, April 15, 2014

सोनिया के आखिरी तीर

 मंगलवार, 15 अप्रैल, 2014 को 13:02 IST तक के समाचार
सोनिया गांधी
सोमवार की रात देश के कई सारे महत्वपूर्ण चैनलों से प्रसारित कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की वीडियो अपील को सामान्य चुनाव प्रचार से अलग करके देखा जाना चाहिए.
चुनाव के चार चरण पूरे होने और 110 सीटों यानी लगभग 20 फीसदी का फैसला ईवीएम में बंद हो जाने के बाद यह अपील सामने खड़ी पराजय को टालने की कोशिश में आखि़री आवाज़ जैसी लगती है.
यह अपील केवल इस बात पर केंद्रित नहीं थी कि कांग्रेस को जिताओ, बल्कि इस बात पर थी कि भारतीय जनता पार्टी या दूसरे शब्दों में नरेंद्र मोदी को आने से रोको. हालांकि उन्होंने मोदी या भाजपा का नाम नहीं लिया, पर समझा जा सकता है कि निशाने पर कौन था.
उन्होंने कहा, उनके पास नफ़रत, लालच और निरंकुश सत्ता की भूख का अंधेरा है. उनकी क्लिक करेंविभाजनकारीऔर निरंकुश विचारधारा हमारी भारतीयता और हिंदुस्तानियत को पतन की ओर ले जाएगी. 'हम इस चुनाव में एक ऐसे भारत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें सत्ता कुछ चंद लोगों की नहीं हो बल्कि जिस पर सबका बराबर अधिकार हो.'

Sunday, April 13, 2014

चुनाव आयोग के नख-दंत और तीखे होने चाहिए

इन पंक्तियों के छपने तक चुनाव के चार दौर पूरे हो चुके हैं. कुल 110 यानी बीस फीसदी से ज्यदा सीटों का फैसला देश का वोटर कर चुका है. इस बार के चुनाव को देश के लिए युगांतरकारी माना जा रहा है. इस उम्मीद से कि इस बार युवा वोटरों की काफी बड़ी तादाद है. माना जा रहा है कि देश की बेशर्म राजनीति को जनता कुछ करारे तमाचे लगाना चाहती है. बावजूद इस उम्मीद के मतदान के दो-एक रोज पहले से कुछ ऐसी प्रवृत्तियों ने सिर उठाया है जो शर्मसार करती हैं. राजनीतिक दल सामाजिक ध्रुवीकरण के अभियान में जुट गए हैं. खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कुछ ऐसे वक्तव्य आए हैं जो कत्तई घटिया और फूहड़ हैं. अनावश्यक रूप से देश की सेना को भी इसमें घसीट लिया गया.

Friday, April 11, 2014

चुनाव सुधारों को भी तो मुद्दा बनाएं

तृणमूल कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय चुनाव घोषणापत्र में चुनाव और प्रशासनिक सुधार को महत्वपूर्ण मसला बनाया है. इस घोषणापत्र में पार्टियों के धन संचय को लेकर कुछ कड़ी बातें भी कही गईं हैं. कहना मुश्किल है कि तृणमूल कांग्रेस इस मसले पर कितनी संजीदा है, पर उसने औपचारिक रूप से ही सही इसे चुनाव का सवाल बनाया है. अभी तक का अनुभव है कि देश के राजनीतिक दल और सरकारें चुनाव सुधारों का या तो विरोध करते हैं या उन्हें लागू करने में देर लगाते हैं. सरकार ने जितनी आसानी से चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाने का सुझाव मान लिया, उतनी आसानी से पार्टियों के धन-संग्रह के नियमन से जुड़े सुझावों को भी मान लेना चाहिए. खर्च की सीमा बढ़ाने के इस फैसले के पीछे भी पाखंड नजर आता है. हर पार्टी चाहती है कि खर्च की सीमा बढ़ाई जाए, जबकि अभी तक अधिकतर प्रत्याशी खर्च का विवरण देते वक्त सीमा के आधे के आसपास का खर्च ही दिखाते हैं. जब खर्च करते ही नहीं तो सीमा बढ़ाना क्यों चाहते हैं?

Tuesday, March 25, 2014

राजनीति माने यू-टर्न और भगदड़

प्रमोद मुतालिक भाजपा में शामिल क्यों हुए और पाँच घंटे के भीतर बाहर क्यों कर दिए गए? क्या वजह है कि पार्टी को जसवंत सिंह, आडवाणी और हरिन पाठक जैसे वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करनी पड़ती है? यह कहानी सिर्फ भाजपा की नहीं है. बूटा सिंह, सतपाल महाराज, सीके जाफर शरीफ, डी पुरंदेश्वरी और जगदम्बिका पाल जैसे नेताओं ने कांग्रेस क्यों छोड़ी? राम कृपाल यादव और राम विलास पासवान ने अपना भाजपा विरोध क्यों त्यागा? बंगाल में माकपा विधायक पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल क्यों हो रहे हैं? ये सवाल मन में तो आते हैं पर हम उन्हें पूछते नहीं. हमने मान लिया है कि राजनीति में सब जायज है.

Monday, March 24, 2014

राजनीति में उल्टा-पुल्टा

लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़कर बिहार में रामकृपाल सिंह भाजपा में शामिल हो गए। इसके पहले राम विलास पासवान की पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। बिहार में भारतीय जनता पार्टी के एक हाथ में जाति का कार्ड है। नरेंद्र मोदी को पिछड़ी जाति के नेता के रूप में भी पेश किया जा रहा है। उधर मुलायम सिंह यादव और मायावती ब्राह्मण वोटर का मन जीतने की कोशिश में लगे हैं। कांग्रेस पार्टी ने जाटों को आरक्षण देने की घोषणा की है। लगभग हर राज्य में जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर बने राजनीतिक गठजोड़ों ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। टिकट वितरण शुरू होते ही अचानक पार्टियों से भगदड़ शुरू हो गई है। अब कोई नहीं देख रहा है कि किस पार्टी में जा रहे हैं। कल तक उसके बारे में कुछ कहते थे। आज कुछ और कहते हैं। आरजेडी के गुलाम गौस ने लालटेन छोड़कर जेडीयू का तीर थाम लिया। वहीं पप्पू यादव ने फिर राजद में आ गए हैं। बीजेपी में नरेंद्र मोदी के लिए वाराणसी और राजनाथ सिंह के लिए लखनऊ की सीट खाली कराना मुश्किल हो रहा है।

वोट जो सिर्फ बैंक नहीं है

भारतीय राजनीति में अनेक दोष हैं, पर उसकी कुछ विशेषताएं दुनिया के तमाम देशों की राजनीति से उसे अलग करती हैं। यह फर्क उसके राष्ट्रीय आंदोलन की देन है। बीसवीं सदी के शुरू में इस आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ल ली और तबसे लगातार इसकी शक्ल राष्ट्रीय रही। इस आंदोलन के साथ-साथ हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद, दलित चेतना और क्षेत्रीय मनोकामनाओं के आंदोलन भी चले। इनमें कुछ अलगाववादी भी थे। पर एक वृहत भारत की संकल्पना कमजोर नहीं हुई। सन 1947 में भारत का एकीकरण इसलिए ज्यादा दिक्कत तलब नहीं हुआ। छोटे देशी रजवाड़ों की इच्छा अकेले चलने की रही भी हो, पर जनता एक समूचे भारत के पक्ष में थी। यह एक नई राजनीति थी, जिसकी धुरी था लोकतंत्र। कुछ लोग कहेंगे कि भारत हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक अवधारणा है। पर वह सांस्कृतिक अवधारणा थी। लोकतंत्र एकदम नई अवधारणा है। पर यह निर्गुण लोकतंत्र नहीं है। इसके कुछ सामाजिक लक्ष्य हैं।

Sunday, March 16, 2014

आप चाहेंगे तो सब बदलेगा

इस राज़ को एक मर्दे फिरंगी ने किया फाश/हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते/जम्हूरियत एक तर्जे हुकूमत है कि जिसमें/बंदों को गिना करते हैं तोला नहीं करते
चुनावी लोकतंत्र को लेकर हमारे समाज में हमेशा अचम्भे और अविश्वास का भाव रहा है। इकबाल की ये मशहूर पंक्तियाँ लोकतंत्र की गुणवत्ता पर चोट करती हैं। पर सच यह है कि खराबियाँ समाज की हैं, बदनाम लोकतंत्र होता है। सन 2009 की बात है किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी का वक्तव्य अखबारों में प्रकाशित हुआ। उनका कहना था, मैं राजनीति में आना चाहता हूँ। उनकी माँ को यकीन  था कि बेटा राजनीति में आकर मंत्री बनेगा। जौनपुर या उसके आसपास के इलाके से वे जीत भी सकते हैं।


मुन्ना बजरंगी ही नहीं तमाम लोग राजनीति में आना चाहते हैं। लोकतांत्रिक दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित करने वाले मधु कोड़ा अपनी पार्टी के अकेले विधायक थे। फिर भी मुख्यमंत्री बने। उन्होंने लोकतंत्र को क्या दिया?जोनाथन स्विफ्ट ने लिखा है, 'दुनिया जिसे राजनीति के नाम से जानती है वह केवल भ्रष्टाचार है और कुछ नहीं।' सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के इंग्लैंड में स्विफ्ट अपने दौर के श्रेष्ठ पैम्फलेटीयर थे। उन्होंने उस दौर की दोनों महत्वपूर्ण पार्टियों टोरी और ह्विग के लिए पर्चे लिखे थे। वे श्रेष्ठ व्यंग्य लेखक थे। अखबारों में सम्पादकीय लेखन के सूत्रधार। कहा जा सकता है कि दुनिया के पहले सम्पादकीय लेखक थे। पर राजनीति के बारे में उनकी इतनी खराब राय क्यों थी?

ऐसा क्यों बोले केजरीवाल?

पत्रकारों को जेल भेजने की धमकी इतने मुखर रूप में इससे पहले शायद किसी ने नहीं दी होगी। इसके पीछे दुर्भावना से ज्यादा नासमझी नजर आती है। अरविंद केजरीवाल या उनकी टोली जिस राजनीतिक राह पर चल रही है, उसकी सदाशयता की परीक्षा समय पर होगी, पर उसके पीछे बचकानापन है यह बात साफ दिखाई पड़ रही है। इस नासमझी के कारण वे अपनी राजनीतिक जमीन को हार भी सकते हैं, जो ठीक नहीं होगा। उन्हें पहली बात यह समझनी चाहिए कि वे राष्ट्रीय क्षितिज पर दो कारणों से उभरे हैं। पहला व्यवस्था की बेरुखी से जनता नाराज़ है और उसे वैकल्पिक शक्तियों की तलाश है। दूसरे, आम आदमी पार्टी खुद को विकल्प के रूप में पेश कर रही है और जनता पहली नज़र में उस पर भरोसा करती है। यह भरोसा टूटना नहीं चाहिए। पूरे मीडिया पर बिका होने का आरोप राजनीतिक है। और उस आरोप को वापस लेना राजनीति है।

Saturday, March 15, 2014

जातीय-राजनीति को गढ़ने के साथ उसे पढ़ें भी

लोकसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी जातीय आरक्षण पर विचार करने की बात कहकर एक नई बहस को जन्म देने की कोशिश की थी। चूंकि कांग्रेस ने द्विवेदी के बयान को  सिरे से खारिज कर दिया इसलिए बात आई-गई हो गई। लेकिन जातीय आरक्षण का सवाल देश की राजनीति से अलग नहीं हो पाएगा। हजारों साल का सामाजिक अन्याय सबसे प्रमुख कारण है। पर उससे बड़ा कारण है राजनीतिक यथार्थ। चुनाव के ठीक पहले जाटों को पिछड़ी जातियों की केंद्रीय सूची में शामिल करने का फैसला शुद्ध रूप से राजनीतिक है। इसका असर उत्तर भारत के उन राज्यों पर पड़ेगा जहाँ जाट आबादी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन राज्यों में तकरीबन नौ करोड़ जाट रहते हैं। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से जाट आबादी का रुझान भारतीय जनता पार्टी की ओरहुआ है। उसे रोकने की यह कोशिश है। जाट समुदाय की गिनती बड़े या मध्यम दर्जे के संपन्न किसानों के रूप में होती है। उनके वोट तकरीबन 100 लोकसभा सीटों पर बड़े स्तर पर या आंशिक रूप से असर डाल सकते हैं। और यह बात सबसे महत्वपूर्ण है। हालांकि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह बात है कि इस फैसले को लागू करने में अभी काफी कानूनी अड़चनें हैं। क्या जाट समुदाय इस बात को नहीं समझता है?

Tuesday, March 11, 2014

रक्षा-विमर्श गम्भीर हो, सनसनीखेज़ नहीं

पिछले शुक्रवार और शनिवार को नौसेना के दो उत्पादन केंद्रों में दो बड़ी दुर्घटनाएं होने के बाद मीडिया में अचानक उफान आ गया. अभी तक कहा जा रहा था कि हमारे उपकरण पुराने पड़ चुके हैं. उन्हें समय से बदला नहीं गया है. इस कारण दुर्घटनाएं हो रहीं हैं. सबसे ताज़ा दुर्घटनाएं दो प्रतिष्ठित उत्पादन केंद्रों से जुड़ी हैं. परमाणु पनडुब्बी अरिहंत और कोलकाता वर्ग के विध्वंसक पोत सबसे आधुनिक तकनीक से लैस हैं. हालांकि दुर्घटना का कारण जहाज निर्माण केंद्र के रखरखाव से जुड़ा है, पर सवाल पूरी रक्षा-व्यवस्था को लेकर है. उससे पहले सवाल यह है कि हमारा मीडिया और सामान्य-जन रक्षा तंत्र से कितने वाकिफ हैं? क्या कारण है कि हमने इस तरफ तभी ध्यान दिया, जब दुर्घटनाएं हुईं? पिछले महीने संसद ने दो लाख चौबीस हजार करोड़ का अंतरिम रक्षा-बजट पास किया. बेशक यह अंतरिम बजट था, पर वह देश के आय-व्यय का लेखा-जोखा था. यह बगैर किसी गम्भीर विचार-विमर्श के पास हो गया. राजनीतिक में भी खोट है. 

Sunday, March 9, 2014

असली तीसरा मोर्चा है ममता, जया और माया का ‘मजमा’

ममता बनर्जी ने पिछले महीने कहीं कहा था कि राजनीति में फिलहाल पोस्ट पेडका ज़माना है प्री पेड का नहीं। लोकसभा के इस चुनाव को लेकर यह बात काफी हद तक सही लगती है। फिर भी पिछले महीने 25 फरवरी को प्रकाश करात ने अपनी प्री पेड स्कीम की घोषणा करते हुए तीसरा मोर्चा बनाया, तभी समझ में आ गया था कि इसमें लोचा है। बताया गया कि 11 दल इस मोर्चे में शामिल हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम बोले कि इन पार्टियों की संख्या 15 तक हो जाएगी। शरद यादव के शब्दों में यह तीसरा नहीं पहला मोर्चा है। जिस वक्त यह घोषणा की गई उस वक्त प्रकाश करात, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव,नीतीश कुमार, एबी बर्धन और एचडी देवेगौड़ा मौजूद थे। करात ने बताया कि कुछ जरूरी वजहों से असम गण परिषद और बीजेडी के अध्यक्ष इस बैठक में शामिल नहीं हो सके, लेकिन वे तीसरे मोर्चे के साथ हैं। जयललिता भी इस बैठक में नहीं थीं।

Sunday, March 2, 2014

‘नो उल्लू बनाविंग’ यानी ‘जनता जागिंग’

यानी इन दिनों एक विज्ञापन लोकप्रिय हो रहा है जिसकी एक लाइन है, चुनावों में चूना लगाविंग, नो उल्लू बनाविंग-नो उल्लू बनाविंग। यह बदलते वक्त का गीत है। अन्ना द्रमुक की महासचिव और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने पिछले मंगलवार को आम चुनाव के लिए पार्टी का घोषणापत्र जारी किया। इसमें जनता को मुफ्त लैपटॉप, मिक्सर ग्राइंडर, पंखे, बकरियाँ, भेड़ें और गाय देने का वादा किया। छात्रों को मुफ्त साइकिलें और किताबें देने के अलावा बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट खुलवाने का वादा भी किया गया है। गरीब लड़कियों को विवाह के उपहार के रूप में सौर बिजली से युक्त घर और चार ग्राम सोना देने का आश्वासन भी है। घोषणापत्र में आर्थिक, राजनीतिक और विदेश नीति से जुड़ी बातें भी हैं, पर सबसे रोचक हैं मुफ्त की चीजें।
कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी ने कुछ सीटों पर निचले लेवल के कार्यकर्ताओं से परामर्श के आधार पर टिकट देने का फैसला किया है। टिकट वितरण की इस व्यवस्था को अमेरिकी राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी तय करने की व्यवस्था के आधार पर प्राइमरीज कहा गया है। इसी व्यवस्था के तहत हाल में दिल्ली प्रदेश के दफ्तर में सिर-फुटौवल की नौबत आ गई। दिल्ली में सरकार बनाने को लेकर जनमत संग्रह करने वाली आम आदमी पार्टी के भीतर कई जगह बगावत की स्थिति है। कारण यह है कि पार्टी ने तमाम लोगों से प्रार्थना पत्र माँगे और उनपर विचार करने के पहले ही उन जगहों से प्रत्याशी भी घोषित कर दिए। टिकट पाने की सिर-फुटौवल तकरीबन हर पार्टी में है।

Tuesday, February 25, 2014

सीमांध्र का सच, बिहार-झारखंड का सवा सच

जिस तरह केन्द्र सरकार तेलंगाना का वादा करके उससे भाग रही थी, लगभग उसी तरीके से बिहार-झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा देने से वह कन्नी काट रही है. राजनीतिक शोर में अक्सर महत्वपूर्ण सवाल पीछे रह जाते हैं. सीमांध्र को पाँच साल तक विशेष आर्थिक पैकेज देने की बात केंद्र सरकार ने तकरीबन स्वीकार कर ली है. केंद्र को सिर्फ सीमांध्र की फिक्र क्यों है? इन्हीं कारणों से बिहार और झारखंड को विशेष दर्जा देकर उनका आर्थिक विकास सुनिश्चित करने की माँग उठती रही है. वह उनकी अनदेखी क्यों कर रही है? क्या वजह है कि क्षेत्रीय असंतुलन का महत्वपूर्ण काम चुनावी शोर में दबता चला गया है, बावजूद इसके कि विशेषज्ञों ने लगातार इस ओर ध्यान दिलाया है?

Sunday, February 23, 2014

तेलंगाना पर कांग्रेस का जोड़-घटाना

पन्द्रहवीं लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन की जद्दो-जहद को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति बेहद डरावने दौर से गुजरने वाली है। शोर-गुल, धक्का-मुक्की मामूली बात हो गई। लगातार तीन सत्रों पर तेलंगाना मुद्दा छाया रहा, जिसकी परिणति पैपर-स्प्रे के रूप में हुई। किसी ने चाकू भी निकाला। बिल को लोकसभा से पास कराने के लिए टीवी ब्लैक आउट किया गया। कई तरह की अफवाहें सरगर्म थीं। लगता नहीं कि हम इक्कीसवीं सदी में आ गए हैं। राहुल गांधी जिन भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों को पास कराना चाहते थे, वे इस तेलंगाना-तूफान के शिकार हो गए। किसी तरह से विसिल ब्लोवर विधेयक संसद से पास हो पाया है। सदा की भांति महिला विधेयक ठंडे बस्ते में ही पड़ा रहा। लोकसभा के सामने विचारार्थ रखे तकरीबन सत्तर विधेयक लैप्स हो गए।

भारत के संसदीय इतिहास में पन्द्रहवीं लोकसभा एक ओर अपनी सुस्ती और दूसरी ओर शोर-गुल के लिए याद की जाएगी। आंध्र की जनता के लिए क्या वास्तव में इतना बड़ा मसला था कि हम तमाम बड़े राष्ट्रीय सवालों को भूल गए? तेलंगाना बिल के पास होते ही मीडिया में कयास शुरू हो गए हैं कि इसका फायदा किसे मिलेगा। क्या यह सब कुछ चुनावी नफे-नुकसान की खातिर था? कांग्रेस पार्टी के लिए इस विधेयक को पास कराना जीवन-मरण का सवाल बन गया था। सवाल है कि यह सब सदन के आखिरी सत्र के लिए क्यों रख छोड़ा गया था? और अब जब यह काम पूरा हो गया है तो क्या कांग्रेस को तेलंगाना की जनता कोई बड़ा पुरस्कार देगी?

Saturday, February 22, 2014

पन्द्रहवीं लोकसभा के कुछ निराशाजनक पहलू

 शनिवार, 22 फ़रवरी, 2014 को 08:45 IST तक के समाचार
भारत की संसद
15वीं लोकसभा को ये श्रेय जाता है कि उसने नागरिकों को शिक्षा का अधिकार दिया. खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण कानून बनाए और 'विसिल ब्लोवर' संरक्षण और लोकपाल विधेयक पास किए.
बेशक वैश्विक मंदी के दौर में देश की अर्थव्यवस्था के अचानक धीमी पड़ने और अनेक प्रकार के राजनीतिक विवादों का सीधा असर संसदीय कामकाज पर भी पड़ा.
इस लिहाज से इस लोकसभा ने देश के संसदीय इतिहास के सबसे चुनौती भरे समय को देखा.
इसकी उपलब्धियों को हमेशा याद रखा जाएगा लेकिन इस दौरान कुछ ऐसी बातें हुईं, जिन्हें टाला जा सकता था या बेहतर तरीके से निपटाया जा सकता था.

पेपर-स्प्रे का इस्तेमाल

Wednesday, February 19, 2014

नफे-नुकसान की राजनीति

मंजुल का कार्टून
हिंदू में केशव

तेलंगाना बिल का पास होना और राजीव हत्याकांड के अभियुक्तों को मृत्युदंड से मुक्ति। आज के अखबारों की दो सुर्खियाँ हैं। तेलंगाना विधेयक के पास होने के तरीके और खासतौर से लोकसभा चैनल का प्रसारण रोके जाने की घटना को देशभर ने गौर से देखा है। सरकार इसकी सफाई देने में ही फँस गई है। बेहद नासमझी के इस फैसले का लब्बो-लुबाव यह है कि पारदर्शिता की राह में तमाम अड़ंगे अभी कायम हैं।

कोलकाता के अखबार टेलीग्राफ का आज का शीर्षक है

इतिहास का एक पन्ना फाड़े जाने के मायने

 बुधवार, 19 फ़रवरी, 2014 को 12:40 IST तक के समाचार
तेलंगाना
तेलंगाना मुद्दे पर लोकसभा में हुई बहस को देखने सुनने का जनता को पूरा अधिकार था.
ये भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि जिस उद्देश्य से लोकसभा का चैनल शुरू किया गया था उसका एक अहम दिन भारतीय जनता ने गंवा दिया.
इसमें कोई दो राय नहीं है कि चैनल पर लोकसभा की क्लिक करेंकार्यवाही के प्रसारण को जानबूझकर बंद किया गया होगा. हालांकि सरकार ने स्पष्टीकरण दिया है कि तकनीकी कारणों से ऐसा हुआ है.
मान लीजिए कि यह सहमति बन गई थी कि इस प्रसारण से आंध्र प्रदेश में क़ानून व्यवस्था की स्थिति खराब होती तो फिर इसके लिए स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं थी.
हालांकि आंध्र में आप जो देख रहे हैं उससे ख़राब स्थिति और क्या हो सकती थी. राज्य के मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा दे चुके हैं और एक बड़े इलाके में विरोध और बंद हो रहे हैं.

Monday, February 17, 2014

धोनी की टीम का केजरीवाल से गठजोड़ है क्या?

मंजुल का कार्टून
हिंदू में सुरेंद्र का कार्टून


सतीश आचार्य का कार्टून
न्यूजीलैंड में खेल रही भारतीय क्रिकेट टीम ने आम आदमी पार्टी के साथ कोई समझौता कर लिया है। हर रोज और तकरीबन हर वक्त और तकरीबन हर चैनल पर एक ही बात है। बहरहाल बीस सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित करके पार्टी ने चुनाव के पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। बजट के दिन भी बजट पर कोई चर्चा नहीं।  तेलंगाना बिल पर भी नहीं। आज के जागरण ने शेखर गुप्ता के लेख का संक्षिप्त अनुवाद छापा है। उसे पढ़कर लगता है कि भारतीय राजनीति और कॉरपोरेट हाउसों के बीच गड़बड़ घोटाला तो है। आप वाले भी इसमें शामिल होंगे या नहीं कहना मुश्किल है। 
नवभारत टाइम्स


Sunday, February 16, 2014

अब शुरू होगा झाड़ू चलाओ, बेईमान भगाओ अभियान

मंजुल का कार्टून

v  दिल्ली में विधानसभा भंग न करके उसे निलंबित रखने का केवल एक मतलब है कि भविष्य में भाजपा की सरकार बन सकती है। भाजपा अभी सरकार बनाना नहीं चाहती, क्योंकि उससे लोकसभा चुनाव में उसकी छवि खराब होगी। पर कांग्रेस की केंद्र सरकार भी लोकसभा चुनाव के साथ दिल्ली विधानसभा चुनाव नहीं चाहती। केजरीवाल की राजनीति का अगला चरण क्या होगा, अब यह मीडिया की ुत्सुकता का विषय है। ज्यादातर अखबारों में खबर है कि केजरीवाल अब हरियाणा से अपना चुनाव अभियान शुरू करने वाले हैं। फिलहाल इस कयास को विराम लगा है कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ होंगे। 
 नवभारत टाइम्स


सड़क छाप राजनीति के खतरे

पिछले दिनों दिल्ली में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरने के बाद यह सवाल उठा था कि दफा 144 को तोड़कर धरना देना क्या उचित है?  केजरीवाल ने संविधान की रक्षा करने की शपथ ली थी। धारा 144 का उल्लंघन करना क्या उन्हें शोभा देता है? और उनके कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने जिस तरह दिल्ली के एक इलाके में छापा मारा वह क्या उचित था? पर अब केजरीवाल सांविधानिक बंधनों से मुक्त हैं। मुख्यमंत्री का पद छोड़ते ही उन्होंने घोषणा की है कि भ्रष्टाचार-विरोधी अपनी मुहिम को वे सड़कों पर ले जाएंगे। यानी देश की सड़कों पर अब अफरा-तफरी बढ़ेगी। व्यवस्था के शुद्धीकरण की दिशा में क्या यह बेहतर कदम होगा? या अराजकता का नंगा नाच शुरू होने वाला है? इस हफ्ते कुछ ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं, जो डर पैदा करती हैं। केजरीवाल की तरह आंध्र के मुख्यमंत्री किरण कुमार भी तेलंगाना के सवाल पर धरने पर बैठे थे। हो सकता है कि वे भी इस्तीफा देकर अपनी लड़ाई सड़कों पर ले जाने की घोषणा करें। क्या वजह है कि हमारा संसद पर से विश्वास उठ रहा है और राजनीतिक दल अपनी लड़ाई सड़कों पर ले जाने की घोषणा कर रहे हैं? और क्या वजह है कि वे संसद और सड़क का अंतर नहीं कर पा रहे हैं?

Saturday, February 15, 2014

केजरीवाल हिट विकेट @49

मंजुल का कार्टून

हिंदू में सुरेंद्र

इंडियन एक्सप्रेस में उन्नी

केजरीवाल के इस्तीफे को मीडिया ने अलग-अलग अर्थ में लिया है। जागरण में आज का शीर्षक है 'सत्ता छोड़ भागे केजरी', नवभारत टाइम्स के पहले पेज की सुर्खी है 'केजरी का ब्रेकअप डे' भीतर के पेज पर खबर है 'AK का परफेक्ट एक्ज़िट प्लान', भास्कर की लीड है 'आप जैसे आए वैसे ही गए', राष्ट्रीय सहारा की लीड है 'जनलोकपाल पर सरकार 'कुर्बान', हिन्दुस्तान की लीड है 'केजरीवाल ने मैदान छोड़ा', टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है 'DAYS FOR KEJRIFALL', कोलकाता के टेलीग्राफ की लीड है 'KEJRI QUITS' केजरी और क्विट्स के बीच एक मफलर है, इंडियन एक्सप्रेस की लीड है 'Arvind Kejriwal’s second act begins'। इन सभी शीर्षकों से ज़ाहिर है कि किसी को विस्मय नहीं हुआ। केजरीवाल के चक्कर में आज के अखबार सीमांध्र के सांसदों को भूल गए।

नवभारत टाइम्स