Tuesday, November 20, 2012

सोशल मीडिया और शाहीन की गिरफ्तारी



जस्टिस मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से
Letter to Maharashtra CM on arrest of the young girl for her facebook status.

To,
The Chief Minister
Maharashtra
Dear Chief Minister,
I am forwarding an email I have received stating that a woman in Maharashtra has been arrested for protesting on Facebook against the shut down in Mumbai on the occasion of the death of Mr. Bal Thackeray. It is alleged that she has been arrested for
allegedly hurting religious sentiments.

To my mind it is absurd to say that protesting against a bandh hurts religious sentiments. Under Article 19(1)(a) of our Constitution freedom of speech is a guaranteed fundamental right . We are living in a democracy, not a fascist dictatorship. In fact this arrest itself appears to be a criminal act since under sections 341 and 342 it is a crime to wrongfully arrest or wrongfully confine someone who has committed no crime.

Hence if the facts reported are correct, I request you to immediately order the suspension, arrest, chargesheeting and criminal prosecution of the police personnel (however high they may be) who ordered as well as implemented the arrest of that woman, failing which I will deem it that you as Chief Minister are unable to run the state in a democratic manner as envisaged by the Constitution to which you have taken oath, and then the legal consequences will follow

Regards
Justice Katju
(Chairman, Press Council of India, and former Judge, Supreme Court of India)


Second Letter to Maharashtra CM

Dear Chief Minister,

You have not replied to my email but only forwarded it to someone called Amitabh Rajan, whom I do not know, and who has not had the courtesy to respond to me. Please realize that the matter is much too serious to be taken in this cavalier manner, because the principle of liberty is at stake.The entire nation wants to know what action you ha
ve taken. I would therefore request you to immediately let me know what you are doing in this matter.

Are we living in a democracy or not ? How can a person be arrested for objecting to the shutdown in Mumbai on Thackeray's death ? Article 21 of the Constitution, to uphold which you have taken an oath, states that no one can be deprived of his life or liberty except in accordance with law. Does Article 21 not exist in Maharashtra ? Does freedom of speech guaranteed by Article 19(1)(a) also not exist in your state ?

Please realize that silence is not an option for you in the matter. The entire nation is furious at this apparently illegal arrest. Therefore I once again request you to tell me, and through me the entire nation, why this arrest of a woman was made in Mumbai just for putting up an apparently innocuous material on the Facebook, and what action you have taken against the delinquent policemen and others involved in this high handedness and blatant misuse of state machinery
Regards
Justice Katju


फेसबुक में आलोक दीक्षित की वॉल से 
भारत में अभिव्यक्ति की आजादी कितनी सुरक्षित है इसका एक नमूना देखिये. बाला साहब ठाकरे के निधन पर एक फेसबुक यूजर Shaheen Dhada ने फेसबुक स्टेटस लिखा और उसकी दोस्त Renu Srinivasan ने उसे शेयर कर दिया. शिवसैनिक भड़क उठे और लड़की को जबरन पुलिस स्टेशन ले आए. साथ ही शाहीन के चाचा के अस्पताल पर धावा बोल दिया और हास्पिटल को बुरी तरह से बर्बाद कर दिया. शाहीन और रेनू को सारी रात पुलिस स्टेशन में बैठना पड़ा. 
सुबह कोर्ट में पेशी हुई और दोनो को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. बाद में दबाव पड़ने पर 15,000 रूपये की जमानत पर दोनों को छो़ड़ दिया गया.

लड़की और उनके घर वाले बुरी तरह से घबराए हुए हैं. शाहीन तो इस कदर डरी हुई है कि उसने कभी किसी सोशल नेटवर्किग प्लेटफार्म पर नहीं जाने की कसम खा ली है. शाहीन के अंकल के हास्पिटल को 10 लाख से भी ज्यादा का नुकसान हुआ है.

अब आप नीचे शाहीन के लिखे स्टेटस को पढ़िये और बताइये कि उसकी गलती क्या है. आखिर हमारी फ्रीडम आफ स्पीच आज कितनी सुरक्षित है?

"With all respect, every day, thousands of people die, but still the world moves on. Just due to one politician died a natural death, everyone just goes bonkers. They should know, we are resilient by force, not by choice. When was the last time, did anyone showed some respect or even a two-minute silence for Shaheed Bhagat Singh, Azad, Sukhdev or any of the people because of whom we are free-living Indians? Respect is earned, given, and definitely not forced. Today, Mumbai shuts down due to fear, not due to respect."


फर्स्ट पोस्ट में रपट का अंश

The most bizarre thing about the arrest of Shaheen Dhada and Renu Srinivasan on Monday over  a Facebook post that questioned the wisdom of a bandh to mark Shiv Sena leader Bal Thackeray‘s death is that no laws were actually violated by the post. In tone and in content, the post is remarkably restrained, particularly when compared to the rather more incendiary messages that  are commonplace on social media platforms. Nor was it even halfways defamatory in the way that many rants on Twitter and Facebook have unfortunately come to be.
पूरी रपट यहाँ

Tweets

Tiny Klout Flag63Malini Parthasarathy ‏@MaliniP
I'm heartened by civil society's vigorous defence of freedom of speech, be it cartoonist Trivedi or girls posting on FB. Way to go, India!


Tiny Klout Flag82barkha dutt ‏@BDUTT
Two young girls in Mumbai arrested for online posts against Thakeray. Will the social media champions of free speech speak up for them?


Tiny Klout Flag73Kiran Bedi ‏@thekiranbedi
How many police old/new personnel being made aware of IT Act+power/variety of social media? Is police in step? Worth a sample check!

Monday, November 19, 2012

दिल्ली धमाका! तैयारी विंटर सेल की!


यह हफ्ता काफी नाज़ुक साबित होने वाला है। कांग्रेस पार्टी ने देर से, लेकिन अपेक्षाकृत व्यवस्थित तरीके से महीने की शुरूआत की है, पर 22 तारीख से शुरू हो रहे संसद के सत्र में साफ हो जाएगा कि अगले लोकसभा चुनाव 2014 में होंगे या 2013 में। मनमोहन सिंह ने डिनर पर मुलायम सिंह से और लंच पर मायावती से मुलाकात कर ली है। किसी को भी समझ में आता है कि बात लोकसभा के फ्लोर मैनेजमेंट को लेकर हुई होगी। मतदान की नौबत आई तो क्या करेंगे? संगठन के स्तर पर भी बात हुई होगी। पर प्रधानमंत्री की मुलाकात का मतलब समझ में आता है। उन्होंने सरकारी नीतियों को स्पष्ट किया होगा या गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की होगी। सपा और बसपा पर दारोमदार है। सहयोगी दलों के अलावा बीजेपी के साथ भी कांग्रेस का बैकरूम संवाद चल रहा है। आर्थिक उदारीकरण के सवाल पर दोनों पार्टियों में वैचारिक सहमति है।

Sunday, November 18, 2012

बाल ठाकरे के बारे में कुछ बातें


नीचे कुछ पैराग्राफ अभय कुमार दुबे की किताब बाल ठाकरे से लिए हैं। यह किताब 1999 में प्रकाशित हुई थी। सात किताबों की सीरीज़ का यह हिस्सा थी। सीरीज़ का नाम था आज के नेता/आलोचनात्मक अध्ययनमाला। यह वह दौर था, जब भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय नेताओं का उठान शुरू हुआ था। इसकी प्रस्तावना में कहा गया था, 'ये लोग आज के नेता तो हां लेकिन आज़ादी के आंदोलन से निकले नेताओं की तरह सभी भारतीयों के नेता नहीं हैं। वे कुछ तबकों, जाति समूहों या किसी एक प्रवृत्ति के प्रतिनिधि नज़र आते हैं।...इनमें से अधिकांश नेताओं का आगमन साठ के दशक के आसपास हुआ था और इसी किस्म के जो नेता सत्तर और अस्सी के दशक में उभरे उनके लिए अनुकूल इतिहास बनाने की शुरूआत भी साठ के ज़माने ने ही कर दी थी।...निश्चय ही ये नेता ज़मीन के जिस टुकड़े से जुड़े हुए हैं उसमें उनकी जड़ें बहुत गहरी हैं।...इनका सौन्दर्यबोध, राजनीति से इतर विषयों की जानकारी और दिलचस्पी नेहरू युग के नेताओं के मुकाबले हीन प्रतीत होती है।...यही नेता हमारी राजनीति के वर्तमान हैं और ये भविष्य का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व नहीं करते, तो भी भविष्य इन्हीं के बीच से निकलने वाला है।' इस सीरीज़ में जिन नेताओं को कवर किया गया था वे थे मुलायम सिंह, ज्योति बसु, लालू यादव,  कांसीराम, कल्याण सिंह, बाल ठाकरे और मेधा पाटकर। यह सीरीज़ आगे बढ़ी या नहीं, मेरे लिए कहना मुश्किल है। बहरहाल बाल ठाकरे का संदर्भ शुरू हुआ है, तो उनसे जुड़ी किताब के कुछ अंश पढ़ें--

Saturday, November 17, 2012

मुलायम क्या जल्दी चुनाव चाहते हैं?

उत्तर प्रदेश की 80 में से 55 लोकसभा सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित करके क्या मुलायम सिंह ने चुनाव का बिगुल बजा दिया है? हालांकि यह बात उनकी राजनीति से असंगत नहीं है और इस साल विधानसभा चुनाव में विजय पाने के बाद उन्होंने कहा था कि जल्द ही लोकसभा चुनाव के लिए तैयार रहें। ऐसा माना जाता है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, अन्ना द्रमुक, अकाली दल जैसे क्षेत्रीय दलों को फायदा मिलेगा। पर जल्द चुनाव के  माने क्या हैं? क्या लोकसभा के इसी सत्र में यह फैसला होगा? या सरकार बजट पेश करने के बाद चुनाव की घोषणा करेगी? करेगी भी तो क्यों करेगी? क्या जल्दी चुनाव कराने से कांग्रेस का कुछ भला होने वाला है?

Friday, November 16, 2012

चीन एक वैकल्पिक मॉडल भी है

चीनी व्यवस्था को लेकर हम कितनी भी आलोचना करें, दो बातों की अनदेखी नहीं कर सकते। एक 1949 से, जब से नव-चीन का उदय हुआ है, उसकी नीतियों में निरंतरता है। यह भी सही है कि लम्बी छलांग और सांस्कृतिक क्रांति के कारण साठ के दशक में चीन ने भयानक संकटों का सामना किया। इस दौरान देश ने कुछ जबर्दस्त दुर्भिक्षों का सामना भी किया। सत्तर के दशक में पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद भी उभरे। देश के वैचारिक दृष्टिकोण में बुनियादी बदलाव आया। माओ के समवर्ती नेताओं में चाऊ एन लाई अपेक्षाकृत व्यावहारिक थे, पर माओ के साथ उनका स्वास्थ्य भी खराब होता गया। माओ के निधन के कुछ महीने पहले उनका निधन भी हो गया। उनके पहले ल्यू शाओ ची ने पार्टी की सैद्धांतिक दिशा में बदलाव का प्रयास किया, पर उन्हें कैपिटलिस्ट रोडर कह कर अलग-थलग कर दिया गया और अंततः उनकी 1969 में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। उसके बाद 1971 में लिन बियाओ माओ के खिलाफ बगावत की कोशिश में मारे गए। 1976 में माओ जेदुंग के निधन के बाद आए हुआ ग्वो फंग और देंग श्याओ फंग पर ल्यू शाओ ची की छाप थी। कम से कम देंग देश को उसी रास्ते पर ले गए, जिस पर ल्यू शाओ ची जाना चाहते थे। चीन का यह रास्ता है आधुनिकीकरण और समृद्धि का रास्ता। कुछ लोग मानते हैं कि चीन पूँजीवादी देश हो गया है।  वे पूँजीवाद का मतलब निजी पूँजी, निजी कारखाने और बाजार व्यवस्था को ही मानते हैं। पूँजी सरकारी हो या निजी इससे क्या फर्क पड़ता है? यह बात सोवियत संघ में दिखाई पड़ी जहाँ व्यवस्था का ढक्कन खुलते ही अनेक पूँजीपति घराने सामने आ गए। इनमें से ज्यादातर या तो पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हैं या कम्युनिस्ट शासन से अनुग्रहीत लोग। चीनी निरंतरता का दूसरा पहलू यह है कि 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बावजूद चीन की शासन-व्यवस्था ने खुद को कम्युनिस्ट कहना बंद नहीं किया। वहाँ का नेतृत्व लगातार शांतिपूर्ण तरीके से बदलता जा रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि वहाँ पार्टी का बड़ा तबका प्रभावशाली है, केवल कुछ व्यक्तियों की व्यवस्था नहीं है।

Thursday, November 15, 2012

चीन में नया नेतृत्व

General Secretary of the Central Committee of the Communist Party of China (CPC) Xi Jinping (C) and the other newly-elected members of the Standing Committee of the 18th CPC Central Committee Political Bureau Li Keqiang (3rd R), Zhang Dejiang (3rd L), Yu Zhengsheng (2nd R), Liu Yunshan (2nd L), Wang Qishan (1st R), Zhang Gaoli (1st L) meet with journalists at the Great Hall of the People in Beijing, capital of China, Nov. 15, 2012. Photo: Xinhua 


चीन के पोलित ब्यूरो की स्थायी समिति के सात सदस्यों की घोषणा हो गई है। जैसा अनुमान था इसके सदस्यों की संख्या नौ से घटकर सात हो गई है। ऊपर के चित्र से आपको नेतृत्व के वरिष्ठता क्रम का पता भी लग जाएगा। केन्द्रीय समिति के नेताओं में से तकरीबन आधे सेवा-निवृत्त हो गए  हैं। वर्तमान राष्ट्रपति हू जिंताओ और प्रधानमंत्री वेन जियाओ बाओ के नाम इसमें नहीं हैं। चीनी अखबरा ग्लोबल टाइम्स की खबर के अंश पढ़ें

The Constitution of the Communist Party of China (CPC) has enshrined the "Scientific Outlook on Development," a political guideline that puts people first and calls for balanced and sustainable development, the 18th CPC National Congress announced as the week-long event concluded on Wednesday.

Some 2,270 Party delegates cast votes Wednesday, electing the new CPC Central Committee and the new Central Commission for Discipline Inspection.

Nearly 50 percent of the new Central Committee are newcomers, indicating that the CPC, with 91 years of history and more than 82 million members, has again completed its leadership transition.
Other members of 17th Party leadership, Hu Jintao, Wu Bangguo, Wen Jiabao, Jia Qinglin, Li Changchun, He Guoqiang and Zhou Yongkang, are not in the new Central Committee. 

Wednesday, November 14, 2012

चीन में राजनीतिक बदलाव




चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की एक हफ्ते से चल रही कांग्रेस खत्म हो गई है और नए नेताओं की घोषणा भी हो गई है। इसके निहितार्थ क्या हैं, इसके बारे में अब कुछ समय तक अटकलें लगेंगी। पहला चुनाव पार्टी की नई केंद्रीय समिति का हुआ है, जिसमें में देश की सर्वोच्च नीति निर्धारण संस्था पोलित ब्यूरो और उसकी स्थायी समिति का गठन किया गया है। अगले राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और दूसरे नीति निर्धारकों के नाम भी स्पष्ट हो गए हैं।

चीन में हर दस साल में नेतृत्व परिवर्तन होता है। अठारहवीं कांग्रेस केवल नेतृत्व परिवर्तन के कारण महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व है राजनीतिक, आर्थिक और संवैधानिक सुधारों का। पार्टी कांग्रेस के उदघाटन भाषण में राष्ट्रपति हू ने भ्रष्टाचार को बड़ी चुनौती बताया था, जिससे अगर नहीं निपटा गया तो उसके घातक परिणाम हो सकते हैं। कांग्रेस के समापन भाषण में उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने पुराने नेताओं की जगह नए युवा नेताओं को चुन लिया है और ऐतिहासिक महत्व के फैसले किए हैं। अनुमान है कि पार्टी की केन्द्रीय समिति में चीन के सबसे अमीर लियांग वेनजेन इस संस्था में शामिल होने वाले पहले प्राइवेट बिजनेसमैन होंगे।

Monday, November 12, 2012

डूडल फॉर गूगल प्रतियोगिता


चंडीगढ़ के छात्र अरुण कुमार यादव ने इस साल बाल दिवस का Doodle4Google पुरस्कार जीता है। इसके पहले भी मैने डूडल फॉर गूगल के बारे में लिखा है। गूगल ने अपने लोगो के सहारे रचनात्मक आंदोलन खड़ा कर दिया है। एक और गूगल अपने तईं दुनियाभर के देशों में अलग-अलग मौकों पर लोगो ज़ारी करता है। इन लोगो के माध्यम से जीवन के विविध क्षेत्रों की जानकारी हमें मिलती है। साथ ही गूगल को दुनिया भार से जुड़ने का मौका मिलता है। इस साल भारत के गूगल अभियान का विषय था 'विविधता में एकता'। इसके लिए 1000 से ज्यादा स्कूलों से 2,00,000 से ज्यादा प्रविष्टियाँ आईं थीं। प्रतियोगिता के निर्णायकों में अभिनेता बोमन ईरानी और कार्टूनिस्ट अजित नायनन थे। 

National Winner

Arun Kumar Yadav, Kendriya Vidyalaya, Chandigarh
Arun Kumar Yadav

India : A prism of multiplicity
India has diverse cultures, religions, languages, customs and traditions. This diversity can be witnessed in enthusiasm for sports; unique folk culture; extraordinary remarkable handicrafts; wide range of flora and fauna; agricultural practices with worldwide farming output; unparalleled spices and cuisines... Such colossal diversities represent Indias oneness.


Category Winners
Vasudevan DeepakClass 1-3
Vasudevan Deepak, Devgiri CMI Public School, Calicut
The Great Banyan
India is like a large banyan tree that shelters and protects everyone who comes to it. It brings different kinds of living things together under the same roof.



Shravya ManjunathClass 4-7
Shravya Manjunath, Mitra Academy, Bangalore
Unity in dance disperses vibrant colours
The Google Doodle portrayed by me represents the different dance forms of India. Dance, being the common topic in my doodle has many sub-divisions. Hence the different dances performed by Indians come under a united category dance. So my doodle represents the topic, "Unity in Diversity"


Class 8-10
S. Preetham Paul, Sri Prakash Vidyaniketan, T.P.T. Branch, Vishakhapatnam
Striding Forward the Unity
S. Preetham PaulIndia is the home to a wide variety of languages, crops, religions, architectural masonry, music and dance forms, and so on, with blurred boundaries between them. Despite such immense diversity of culture across the country, Indians tend to be together, and take the nation forward, towards progress.

गूगल लोगो पर मेरी पिछली पोस्ट



चीन के खामोश बदलाव को भी देखिए

अमेरिका में पिछले हफ्ते राष्ट्रपति चुनाव हुआ। छह महीने से दुनिया भर का मीडिया चुनाव-चुनाव चिल्ला रहा था। भारत में कब चुनाव होगा, इसे लेकर संग्राम मचा है। पर इस हफ्ते चीन में सत्ता परिवर्तन हो रहा है तो इसका ज़िक्र वैसे ही हो रहा है जैसे अखबारों के सांस्कृतिक समाचार। दुनिया की दूसरी नम्बर की आर्थिक महाशक्ति जो सामरिक ताकत से लेकर ओलिम्पिक खेलों के मैदान तक अपना झंडा गाड़ चुकी है, अपने राजनीतिक नेतृत्व की अगली पीढ़ी को आगे ला रही है। जैसा कि इमकान है शी जिनपिंग देश के नए राष्ट्रपति होंगे और ली केचियांग नए प्रधानमंत्री। पर इस देश में केवल दो नेता ही नहीं होते। चीन की सर्वोच्च राजनीतिक संस्था पोलित ब्यूरो के 25 सदस्य सबसे महत्वपूर्ण राजनेता होते हैं। इनमें भी सबसे महत्वपूर्ण होते हैं पोलित ब्यूरो की स्थायी समिति के नौ सदस्य। इनमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी शामिल हैं। कुछ लोगों को लगता है कि दुनिया से कम्युनिज़्म का सफाया हो चुका है, उनके लिए चीन अभी अध्ययन का विषय है। वहाँ की अर्थ-व्यवस्था बड़ी संख्या में लोगों को पूँजीवादी लगती है। कम से कम नीतियों के संदर्भ में चीन के मुकाबले भारत ज़्यादा बड़ा समाजवादी देश लगता है। चीन के खुदरा बाज़ार में सौ फीसदी विदेशी निवेश सम्भव है। भारत में 49 फीसदी सीमित निवेश लागू कराने में लाले लगे हैं। पश्चिमी देशों की निगाह में न सिर्फ पूँजी निवेश के मामले में बल्कि व्यापार शुरू करने और उसे चलाने के मामले में भारत के मुकाबले चीन बेहतर है।

Sunday, November 11, 2012

Biggest tree in the world / दुनिया का सबसे बड़ा पेड़


अद्भुत विश्व-2
Amazing World-2


दुनिया का सबसे ऊँचा पेड़
 दुनिया का सबसे ऊँचा जीवित पेड़ है रेडवुड नेशनल पार्क, कैलिफोर्निया में खड़ा कोस्ट रेडवुड जिसकी ऊँचाई है 115.66 मीटर यानी 379 फुट। कुतुब मीनार से भी ऊँचे इस पेड़ की तुलना कुछ और चीजों से करें तो पाएंगे कि यह अमेरिकी संसद भवन और स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ज्यादा ऊँचा है।


और सबसे बड़ा यानी सबसे ज्यादा जगह घेरने वाला पेड़ है जनरल शर्मन। आसानी से समझने के लिए सबसे ज्यादा लकड़ी देने वाला पेड़।

Friday, November 9, 2012

मछली बाज़ार और मीडिया की भाषा एक जैसी नहीं हो सकती


वित्तमंत्री पी चिदंबरम के बेटे के खिलाफ ट्वीट करने पर युवा उद्योगपति रवि श्रीनिवासन को इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 66-ए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। इसके पहले बंगाल में कार्टून प्रकरण हुआ था। असीम त्रिवेदी का प्रकरण भी हाल की बात है। सायबर स्पेस में अपराध बढ़ रहे हैं। बैंकों के साथ धोखाधड़ी, क्रेडिट कार्ड और एटीएम के दुरुपयोग बढ़ रहे हैं। अब तो एमएस आते हैं कि आपके नाम पाँच करोड़ की लॉटरी खुल गई है। अपने बारे में जानकारी भेजें। हर रोज़ ई-मेल के इनबॉक्स में अनेक स्पैम-मेल होती है। बावज़ूद इसके कि जीमेल सिस्टम अपनी तरफ से काफी मेल स्पैम मानकर ट्रैश में भेज देता है। सायबर स्पेस का संवाद दोधारी तलवार की तरह घाव करता है। अभद्रता बढ़ी है और शालीन तरीके से अपनी बात कहने वाले दबे हैं। बदमज़गी का माहौल है।

Monday, November 5, 2012

राहुल, रिफॉर्म और भैंस के आगे बीन





गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस को इस रैली से फायदा होगा, पर इससे नुकसान भी कुछ नहीं होने वाला। पार्टी के पास अब आक्रामक होने के अलावा विकल्प भी नहीं बचा था। उसकी अतिशय रक्षात्मक रणनीति के कारण पिछले लगभग तीन साल से बीजेपी की राजनीति में प्राण पड़ गए थे, अन्यथा जिस वक्त आडवाणी जी को हटाकर गडकरी को लाया गया था, उसी वक्त बीजेपी ने अपना भविष्य तय कर लिया था। रविवार को जब कांग्रेस रामलीला मैदान में रैली कर रही थी, तब दिल्ली में मुरली मनोहर जोशी कुछ व्यापारियों के साथ भैस के आगे बीन बजा रहे थे। खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को लेकर बीजेपी ने जो स्टैंड लिया है वह नकारात्मक है सकारात्मक नहीं। हमारी राजनीति में कांग्रेस भी ऐसा ही करती रही है। ज़रूरत इस बात की है कि सकारात्मक राजनीति हो। बहरहाल कांग्रेस को खुलकर अपनी बात सामने रखनी चाहिए। यदि राजनीति इस बात की है कि तेज आर्थिक विकास हमें चाहिए ताकि उपलब्ध साधनों को गरीब जनता तक पहुँचाया जा सके तो इस बात को पूरी शिद्दत से कहा जाना चाहिए। गैस के जिस सिलेंडर को लेकर हम बहस में उलझे हैं, उसका सबसे बड़ा उपभोक्ता मध्य वर्ग है। शहरी गरीब आज भी महंगी गैस खरीदते हैं, क्योंकि उनके पास केवाईसी नहीं है। घर के पते का दस्तावेज़ नहीं है। वे अपने नाम कनेक्शन नहीं ले सकते हैं और मज़बूरन छोटे सिलंडरों में बिकने वाली अवैध गैस खरीदते हैं। राहुल गांधी ने जिस सिस्टम की बात कही है, वह वास्तव में गरीबों का सिस्टम नहीं है। आम आदमी की पहुँच से काफी दूर है। पिछले साल दिसम्बर में सरकार ने संसद में Citizen's Charter and Grievance Redressal Bill 2011 पेश किया था। यह बिल समय से पास हो जाता तो नागरिकों को कुछ सुविधाओं को समय से कराने का अधिकार प्राप्त हो जाता। अन्ना हजारे आंदोलन के कारण कुछ हुआ हो या न हुआ हो जनता का दबाव तो बढ़ा ही है। यह आंदोलन व्यवस्था-विरोधी आंदोलन था। कांग्रेस ने इसे अपने खिलाफ क्यों माना और अब राहुल गांधी वही बात क्यों कह रहे हैं?

Saturday, November 3, 2012

नायपॉल को लेकर इतने उत्तेजित क्यों हुए गिरीश कर्नाड?

नायपॉल और उनकी पत्नी नादिरा के बीजेपी दफ्तर में जाने की
यह तस्वीर भी आज फिर से दिखाई पड़ी।

लेखक-अभिनेता गिरीश कर्नाड ने मुम्बई लिटफेस्ट में वीएस नायपॉल के बारे में जो बातें कहीं हैं, उन्हें लेकर विचार करने की ज़रूरत है। गिरीश कर्नाड की सेक्युलर पहचान ज़ाहिर है और वीएस नायपॉल के मुस्लिम-जगत को लेकर विचार से भी काफी लोग परिचित हैं। नायपॉल को नोबेल पुरस्कार 9/11 के कारण मिला यह भी मान लेते हैं, पर कर्नाड ने जिस मौके पर अपने विचार व्यक्त किए उसे उचित कैसे ठहराया जा सकता है? यों भी उन्हें आयोजकों ने अपने रंगमंचीय जीवन के बारे में विचार व्यक्त करने के लिए बुलाया था, पर उन्होंने उस विषय पर कुछ भी नहीं बोला। केवल नायपॉल पर बोला। बहरहाल कर्नाड की इस वक्तृता के बाद सेक्युलरवाद, छद्म धर्मनिरपेक्षता, मुस्लिम शासन और भारतीय संस्कृति को लेकर वह बहस शायद फिर से शुरू हो जाएगी, जो कुछेक साल से पृष्ठभूमि में चली गई थी। पिछले साल जयपुर फेस्टिवल में सलमान रुश्दी के आगमन को लेकर इस बहस ने सिर उठाया था, पर वह समय रहते दब गई। यों इस बात का धर्मनिरपेक्षता से कोई लेना-देना नहीं है। भारतीय इतिहास को लेकर कई तरह की दृष्टियों के टकराव का यह भी एक रूप है।  गिरीश कर्नाड ने जो कुछ भी कहा, वह अनायास नहीं था। और उन्होंने जो कहा, वह नई बात भी नहीं थी। इस खबर के फैलने के बाद सायबर स्पेस में यह बहस शुरू हो भी चुकी है। फर्स्ट पोस्ट में आर जगन्नाथ ने कर्नाड की भर्त्सना करते हुए टिप्पणी की है।

आज के इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रपट के अंश बताते हैं कि वे कितने उत्तेजित थेः-

 Not only did he cast aspersions on the credibility of some accounts in Naipaul’s book India: A Wounded Civilisation, Karnad also lashed out at the Nobel laureate for his critical views on the influence of Islam on India. Naipaul was given the award on Wednesday at the Tata Literature Live! LitFest, which is now in its third year. Karnad was invited on Friday to talk about his life as a theatre person but he chose to launch an attack against the Trinidadian-born writer, who was not in the audience... While he admitted that “Naipaul is certainly among the great English writers of our generation”, Karnad said Naipaul had painted even the Taj Mahal in poor light. “Of the Taj, probably the most beloved of the monuments in India, Naipaul writes, ‘The Taj is so wasteful, so decadent and in the end, so cruel that it is painful to be there for very long. This is an extravagance that speaks of the blood of the people’,” Karnad said.

Karnad said Naipaul had visited the BJP office in Delhi some years ago and made some controversial remarks. “Ayodhya, he said, is a sort of passion. Any passion is creative. Passion leads to creativity,” Karnad quoted Naipaul as having said. Foreign writers such as William Dalrymple had spoken about these incidents connected to Naipaul but not Indian writers, Karnad added.

“Naipaul is a foreigner and he is entitled to his opinion. But why give an award to a man who calls Indian Muslims ‘raiders’ and ‘marauders’? I have Muslim friends and I feel strongly about this,” he said...When the session was thrown open to the audience, Naipaul’s friend, writer Farrokh Dhondy, rose to ask a question. But Karnad refused to entertain any queries from him. “This is like a court where the prosecution has been presenting its case without giving any opportunity to the defence,” Dhondy remarked in anger.

Festival director Anil Dharker was disappointed by the way the session had turned out. “We gave you the chance to speak about your life in theatre, but you never spoke about it. Instead, you chose to go on about a writer who has won the Nobel Prize for literature,” Dharker said, addressing Karnad from the audience. “When we gave him the award, it was because of his entire body of work and not any one particular book. To have taken this up here was not polite.”

Soon after, the session was brought to an abrupt end. Speaking about the incident later, Dhondy said Naipaul never made the remarks about Ayodhya Karnad had attributed to him. “In fact, his wife, Nadira, is a Muslim and so is his adopted son. By not letting me quiz him, Karnad imposed censorship, something that he himself vehemently opposes,” Dhondy said.

नायपॉल का सम्मान बुधवार को हुए समारोह में किया गया था। उसमें उन्होंने कहा था कि  मैं भारत के बारे में काफी लिख चुका हूँ। इस पर अब और नहीं लिखूँगा। मैंने भारत के बारे में चार किताबें, दो उपन्यास और बहुत से निबंध लिखे हैं।' उन्होंने 1962 में किताब लिखने के लिए भारत यात्रा के अपने फैसले के बारे में बात करते हुए कहा, 'मेरी पृष्ठभूमि भारतीय है और मेरी रुचि हमेशा अपनी पृष्ठभूमि में रही है।' सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल बुधवार की शाम नैशनल सेंटर फॉर प्रोग्रामिंग आर्ट्स(एनसीपीए) संचालित लिटरेचर लाइव फेस्ट के तीसरे आयोजन में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड हासिल करने के लिए मुम्शबई में थे। त्रिनिदाद-ब्रिटिश लेखक उस समय भावुक हो उठे जब उनसे उनके व्यक्तिगत फिक्शन 'ए हाउस फॉर बिस्वास' के बारे में बात की गई। यह 1961 में प्रकाशित हुआ था और उनके पिता के जीवन के इर्द-गिर्द घूमता है। नायपॉल जब उन यादों के बारे में बात कर रहे थे, तो उनकी पत्नी नादिरा ने उनका इंटरव्यू ले रहे लेखक फारूख ढोंडी से इस विषय को छोड़कर आगे बढ़ने की गुजारिश की।


शुक्रवार के कार्यक्रम में कर्नाड ने कहा कि जहां भारत की हर गली, हर रेस्त्रां और सभी जगह संगीत की उपस्थिति दिखाई देती है, ऐसे में आपको उम्मीद होती है कि वह इस पर भी कुछ लिखेंगे। नायपॉल ने भारत पर तीन किताबें लिखी हैं। तीन बड़ी किताबें, जिनमें से एक में भी संगीत का जिक्र तक नहीं है। अब मुझे लगता है कि वह टोन-डेफ (संगीत की कद्र न करने वाले) हैं। अगर आप संगीत नहीं समझते हैं, अगर आप संगीत पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे सकते हैं, तो आप भारत के इतिहास पर भी अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे सकते क्योंकि भारतीय संस्कृति की असल पहचान संगीत से ही रही है। भारतीय संस्कृति को समझने में यही नायपॉल की समस्या रही है। वह भक्ति और सूफी के बारे में हिंदूओं और मुस्लिमों के कलाकौशल से अनजान रहे हैं, जो भारत को विरासत में मिले हैं।

कर्नाड ने नायपॉल पर पश्चिमी सभ्यता को लाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, विदेशी आते हैं, भारतीय संस्कृति को देखते हैं। वे हिदुओं की मूल संस्कृति को देखते हैं। वे देखते हैं कि ये मुस्लिमों द्वारा भ्रष्ट है। नायपॉल की किताबों में आप इन्हीं चीजों को पाएंगे, जिनका वह दावा करते हैं कि उन्होंने यह खोज खुद से की है, बल्कि ये पहले से ही की गई हर इंडोलॉजिक स्टडी में मौजूद हैं।

कर्नाड ने कहा, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक वास्तुकला पर लिखते हैं, जिस पर उन्होंने लिखा भी है, लेकिन वही मुस्लिम विरोधी विचारों के साथ। आज भी वह यही भविष्यवाणी करने में लगे हैं कि मुस्लिम भरतीय वास्तुकला को नष्ट कर देंगे। वह बस यही कहते रहते हैं कि वे छापेमार थे, वे ध्वंसक थे और आप मुस्लिमों के शासन के दौरान की किसी भी बिल्डिंग को देखो, क्या हाल है उनका। और ताज के बारे में लोगों द्वारा आपत्ति जताए जाने पर उन्होंने कहा, ताज एकदम बर्बाद है और अंत में मुझे वह बेहद क्रूर लगा, जिस वजह से मैं वहां अधिक देर तक नहीं रुक सका। कर्नाड ने व्यंग्यात्मक ढंग से कहा, हममें से कोई भी अगर ताज में मौजूद होता, तो इसे बेहद फिजूल का समझता जो वहां खड़े होकर लोगों के खून की बात कर रहा है! अब आप समझे, इसीलिए आपको नोबेल पुरस्कार मिला है।

काफिला में शिवम विज का आलेख जिसमें गिरीश कर्नाड के भाषण को विभिन्न स्रोतों से जोड़ा गया है।
इंडियन एक्सप्रेस में प्रताप भानु मेहता का आलेख
कर्नाड के समर्थन में हिन्दू में गीता हरिहरन का आलेख
हिन्दू में मुशीरुल हसन



Friday, November 2, 2012

ब्रेक के उस पार है रोचक तमाशा

कुछेक साल पुराना कार्टून जो हमेशा ताज़ा लगेगा
इस बात की सम्भावना है कि संसद का शीत सत्र 22 नवम्बर से शुरू होकर 20 दिसम्बर तक चलेगा। उस दौरान गुजरात विधान सभा के चुनाव का मतदान भी हो रहा होगा। जैसी कि उम्मीद है सरकार पेंशन और इंश्योरेंस से जुड़े कानूनों में संशोधन के अलावा भूमि अधिग्रहण विधेयक भी इस दौरान पास कराना चाहेगी। कम्पनी कानून में बदलाव का विधेयक भी इस दौरान आएगा। 

संसद के पिछले सत्र में बीजेपी ने कोल ब्लॉक्स को लेकर प्रधानमंत्री के इस्तीफे की माँग की थी और सदन में कार्य नहीं होने दिया था। क्या इस बार यह पार्टी संसदीय कार्य में हिस्सा लेगी? तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि  सरकार अल्पमत में है, उसे सदन का विश्वास हासिल करना चाहिए। यह टेस्ट विधेयकों के पास होते समय भी किया जा सकता है। उस स्थिति में समाजवादी पार्टी और बसपा पर काफी कुछ निर्भर करेगा। दोनों पार्टियों ने फिलहाल सरकार गिराने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया है। बसपा ने फैसला अपनी नेता पर छोड़ दिया है, जो बहुजन समाज के हित को देखते हुए उचित निर्णय करेंगी। 

अन्ना हज़ारे और उनके साथ आए जनरल वीके सिंह संसद के घेराव की योजना बना रहे हैं। ममता बनर्जी भी कह रहीं हैं कि संसद भंग कर दो। कुछ लोगों को लगता है कि इस सत्र के दौरान सरकार की छुट्टी हो जाएगी, पर मुझे यह बात समझ में नहीं आती। कोई भी पार्टी अभी चुनाव के लिए तैयारदिखाई नहीं पड़ती। कोई सांसद यों भी अपनी सदस्यता डेढ़ साल पहले छोड़ना नहीं चाहेगा। अगले चुनाव में जीतने की कोई गारंटी नहीं है। संसद का कार्यक्रम घोषित होने के बाद पार्टियों के वक्तव्यों पर ध्यान देंगे तो राजनीति के अनेक रोचक अंतर्विरोध सामने आएंगे। तमाशा देखने लायक होगा। 

Thursday, November 1, 2012

गौरी भोंसले के नाम पर क्या यह खबर भी सीरियल की पब्लिसिटी थी?

इस बात पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने ध्यान दिया। खबर में खास बात नहीं थी, पर लगता है कि कुछ बड़े अखबार इस खबर के लपेटे में आ गए। हाँ इससे एक बात यह भी साबित हुई कि लगभग सभी अखबार पुलिस की ब्रीफिंग का खुले तरीके से इस्तेमाल करते हैं और हर बात ऐसे लिखते हैं मानो यही सच है। पत्रकारिता की ट्रेनिंग के दौरान उन्हें बताया जाता है कि सावधानी से तथ्यों की पुष्टि करने के बाद लिखो, पर व्यवहार में ऐसा होता नहीं।

पहले आप यह विज्ञापन देखें जो कुछ दिन पहले कई अखबारों में छपा, जिसमें गौरी भोंसले नामक लड़की के लंदन से लापता होने की जानकारी दी गई थी। विज्ञापन देखने से ही पता लग जाता था कि यह किसी चीज़ की पब्लिसिटी के लिए है। इस सूचना की क्लिप्स लगभग खबर के अंदाज़ में एबीपी न्यूज़ में आ रहीं थीं। हालांकि एबीपी न्यूज़ का स्टार टीवी से सम्बन्ध अब नहीं है, पर विज्ञापन क्लिप्स खबर के अंदाज़ में आना क्या गलतफहमी पैदा करना नहीं है? पर स्टार के पास इसका जवाब है कि विज्ञापन को खबर के फॉ्र्मेट में देना मार्केटिंग रण नीति है। बहरहाल पहले से लग रहा था कि स्टार पर कोई सीरियल आने वाला है, जिसमें इस किस्म की कहानी है। अचानक 31 अक्टूबर को दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस, मेल टुडे और हिन्दू ने खबर छापी कि वह लड़की उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक गाँव से बरामद की गई है। हिन्दू ने खबर में लड़की का नाम नहीं दिया, जबकि बाकी दोनों अखबारों ने उसका नाम गौरी भोंसले, वही विज्ञापन वाला नाम।

Monday, October 29, 2012

संज़ीदगी के चक्कर में क़मेडी सर्कस बनती राजनीति


हक़ीक़त में मैं एक बुलबुल हूँ, मगर चारे की ख़्वाहिश में/ बना हूँ मिम्बर-ए-कौंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर
अकबर इलाहाबादी की सिफत थी कि वे अपने आसपास की दिखावटी दुनिया पर पुरज़ोर वार करते थे। आज वे होते तो उन्हें लिखने का जो माहौल मिलता, वह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरुआती दो दशकों से बेहतर होता, जिस दौर में उन्होंने लिखा। आज आप जिधर निगाहें उठाएं तमाम मिट्ठू मियाँ नज़र आएंगे। जसपाल भट्टी की उलट बाँसियों में भी उसी किस्म का आनंद मिलता था। अपने दौर को किसी किस्म की छूट दिए बगैर महीन किस्म की डाँट लगाने का फन हरेक के बस की बात नहीं। पर ज़माने की रफ्तार है कि पहले से ज्यादा तेज़ हुई जा रही है। फेसबुक में किसी ने हाल के घोटालों की लिस्ट बनाकर पेश की है। पढ़ते जाएं तो खत्म होने का नाम नहीं लेती। आलम यह है कि आज एक लिस्ट बनाओ, कल चार नाम और जुड़े जाते हैं। भारतीय घोटाला-सेनानियों के खुश-खबरी यह है कि इधर दुनिया के कुछ और नाम सुनाई पड़े हैं। पहले लगता था कि घोटालों में नाम जुड़ने से बदनामी होती है, पर अब लगता है कि इससे एक किस्म की मान्यता मिलती है कि आदमी काम का है। संसद के मॉनसून सत्र को सिर पर उठाने वाले भाजपाई नेताओं को अरविन्द केजरीवाल ने नितिन गडकरी के नाम फूलों के गुलदस्ते भेजे तो सबने खुशी जताई कि इत्ती सा बात। हम तो ज्यादा बड़े घोटालों की उम्मीद कर रहे थे। बहरहाल गडकरी जी के करिअर में गतिरोध आ रहा है। हालांकि पार्टी के नेता साथ खड़े हैं, पर कहना मुश्किल है कि वे अगले सत्र के लिए अध्यक्ष चुने जाएंगे या नहीं। उन्हें फिर से अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी ने संविधान में संशोधन तक कर लिया था।