Thursday, September 11, 2014

दिल्ली-गतिरोध अब टूटना चाहिए


हिंदू में सुरेंद्र का कार्टून
दिल्ली में लोकतांत्रिक सरकार बननी चाहिए। यह काम फौरन नहीं हो सकता तो चुनाव कराने चाहिए। पिछले दो महीने से जो सुगबुगाहट सुनाई पड़ रही है वह खत्म होनी चाहिए। यदि भाजपा को आम आदमी पार्टी के कुछ विधायकों से समर्थन मिलने की आशा है तो उसे साफ सामने आना चाहिए। आम आदमी पार्टी को लगता है कि वह सरकार बना सकती है तो उसे गम्भीरता के साथ दुबारा कांग्रेस के पास जाकर यह साफ करना चाहिए कि हम गम्भीरता से सरकार चलाना चाहते हैं। पिछले सात महीने से जिस तरह से दिल्ली में शासन चल रहा है वह भी ठीक नहीं। 
बहरहाल कोई हैरत नहीं कि किसी भी वक्त  लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने का न्योता दे दें। फिलहाल गतिरोध टूटना चाहिए और आम आदमी पार्टी को उसकी तार्किक परिणति की और जाना चाहिए। ताज़ा खबर है कि भाजपा नेतृत्व की पेशकश को नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दे दी है। अब सरकार बनी तो पहला सवाल यह होगा कि दिसम्बर में पार्टी ने हाथ क्यों खींच लिया था? और यह कि अब बहुमत जुटाने की कीमत वह क्या देगी? नैतिक दृष्टि से भाजपा इस फैसले को सही नहीं ठहरा पाएगी, पर व्यावहारिक रूप से इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता दिल्ली के असमंजस को तोड़ने के लिए उपलब्ध नहीं है। भाजपा के कुछ पुराने हारे हुए नेताओं के अलावा कोई नहीं चाहता कि दुबारा चुनाव हों।

आपका विचार, हमारा कारोबार

सोशल मीडिया पर इन दिनों किताब पर चर्चा है. किताब माने किताब. इसे कुछ लोग मेरी पसंदीदा दस किताबेंशीर्षक देकर अपनी राय दे रहे हैं या ले रहे हैं. अगस्त के आखिरी दो हफ्तों में फेसबुक ने अपनी ओर से एक सर्वे किया था, जिसमें एक लाख 30 हजार सैम्पल अपडेटों की मदद से यह जानने की कोशिश की थी कि लोगों की दस सबसे पसंदीदा किताबें कौन सी हैं. इसके सहारे फेसबुक ने सौ किताबों की सूची तैयार की. इस सूची को बनाने के पहले उसने जवाब देने वालों से कहा कि ज्यादा देर सोचे बगैर और ज्यादा गहराई में जाए बगैर तुरत-फुरत जवाब दो. उद्देश्य यह जानना था कि लोगों के मन में कौन सी किताब बैठी है. जरूरी नहीं कि वह महान साहित्यिक रचना हो या कोई महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ हो. इस सर्वे में शामिल सबसे ज्यादा लोग अमेरिकी थे 63.7 फीसदी, दूसरे नम्बर पर भारतीय थे 9.3 फीसदी और तीसरे नम्बर पर यूके के थे 6.3 फीसदी. प्रतिभागियों की औसत उम्र 37 थी.

Monday, September 8, 2014

सिर्फ लिटरेसी नहीं, टेक-लिटरेसी

साक्षरता की अवधारणा ने तभी जन्म लिया जब अक्षर का आविष्कार हुआ. अक्षर के पहले भाषा, बोली और नज़र आने वाले चिह्नों का आविष्कार हुआ था. जो लोग उस नए ज्ञान से लैस नहीं थे, वे निरक्षर थे. यह बात ईसा के आठ से दस हजार साल पहले की है. दुर्भाग्य है कि निरक्षरता आज भी कायम है. खासतौर से हमारे जैसे समाज में. यूनेस्को के अनुसार साक्षरता का मतलब है विभिन्न संदर्भों में मुद्रित और लिखित सामग्री को पहचान पाना, समझ पाना, गिन पाना और दूसरों को बता पाना. यानी यह केवल अक्षर ज्ञान नहीं है. इसका अर्थ निरंतर बदल रहा है. अपने समुदाय से लेकर वैश्विक गतिविधियों तक को समझना और अपनी भागीदारी को सुनिश्चित करना अब इसमें शामिल है. यह टेक्नोट्रॉनिक लिटरेसी और डिजिटल डिवाइड का ज़माना है. बेशक हम अभी अक्षर ज्ञान के दौर में हैं, पर हमें साक्षरता के नए इलाकों की सैर भी करनी होगी.

साक्षरता का मतलब
अनपढ़ या निरक्षर होना सामाजिक-आर्थिक विषमता का पहला प्रतीक है. इसका मतलब यह भी है कि व्यक्ति दुनिया के तौर-तरीकों से वाकिफ नहीं है. विज़ुअल लिटरेसी का मतलब है फोटो, नक्शे, वीडियो और बॉडी लैंग्वेज का मतलब समझ पाना. आप कल्पना करें दो सौ साल पहले दुनिया से गया कोई व्यक्ति आज वापस आए और उसे सिनेमा दिखाया जाए तो वह क्या समझ पाएगा. एक फ्रेम के लांग शॉट में हाथी और क्लोज़अप में मक्खी को देखने-समझने में हमें जितनी आसानी है, वह दो सौ साल पुराने व्यक्ति के लिए उतनी ही मुश्किल भरी होगी. उसे सिनेमा की भाषा समझ में नहीं आएगी. साउंड ट्रैक का इस्तेमाल उसकी कल्पना के परे होगा.

शहरी और ग्रामीण जीवन में बढ़ रहा है फासला
वैश्विक प्रतीक तेजी से बदल रहे हैं. शहरी जीवन से अपरिचित व्यक्ति के लिए कार के हॉर्न की आवाज का कोई मतलब नहीं. एम्बुलेंस के सायरन का मतलब भी वह नहीं समझता, ट्रैफिक कांस्टेबल के संकेतों का उसके लिए कोई अर्थ नहीं. मेट्रो का दरवाजा खुलने और बंद होने की सूचना देने वाली आवाजें उसके लिए कोई माने नहीं रखतीं. दूर से आती रेलगाड़ी के वेग का उसे अनुमान नहीं होता. शहरी जीवन ने समय के साथ जो बॉडी लैंग्वेज तैयार की है उससे उसका परिचय नहीं है. वह पढ़ना जानता भी हो तो शायद इलेक्ट्रॉनिक टेक्स्ट पढ़ना नहीं जानता. हमारी लिपियों में हाल में स्माइली शामिल हो गई और हमें पता नहीं चला. पर तमाम लोग आज भी उनसे अपरिचित हैं. वे साक्षर हैं, पर मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक टेक्स्ट के बदलावों से परिचित नहीं हैं. यानी साक्षरता अब सिर्फ संख्याओं और अक्षरों के ज्ञान तक सीमित नहीं है. अब केवल लिखने या पढ़ने से काम नहीं होता. आपको सुविधाएं चाहिए तो किसी न किसी तकनीक की मदद लेनी होगी.

Sunday, September 7, 2014

मोदी का बच्चों से संवाद

नरेन्द्र मोदी की हर बात पर दो किस्म की प्रतिक्रियाएं होती हैं। भारी समर्थन, घनघोर विरोध। शिक्षक दिवस पर उनके कार्यक्रम पर भी प्रतिक्रियाएं पूर्व-निर्धारित थीं। उनका भाषण जितने ध्यान से उनके समर्थक सुनते हैं उससे ज्यादा गौर से उनके विरोधी सुनते हैं। वे उसे खारिज करते हैं, पर अनदेखी नहीं करते। सोशल मीडिया पर लगी झटपट-टिप्पणियों की झड़ी से यह बात साबित होती है। मोदी जब बोलते हैं तब सारा देश सुनता है। भले ही नापसंद करे। उन्होंने नकारात्मक प्रचार को जिस तरह अपने पक्ष में किया है उसे देखना भी रोचक है।

Friday, September 5, 2014

लोकतंत्र माने केवल बहुजनाधिपत्य नहीं

दिसम्बर 1992 में जिन दिनों अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी तब यह बात कही जा रही थी कि देश के बहुमत की आस्था का सवाल है तो इसमें आश्चर्य की बात क्या है। तभी थोड़े से लोगों ने यह भी कहा था कि लोकतंत्र केवल बहुमत की आवाज़ पर चलने वाली व्यवसथा नहीं है। सम्भव है केवल एक व्यक्ति की आवाज 99 आवाजों के मुकाबले ज्यादा समझदारी की हो। उसे सुनने और उसपर विचार करने वाली व्यवस्था का नाम लोकतंत्र है। लोकतंत्र के और भी तमाम मतलब हैं। मोटे तौर पर समझदारी, विज्ञान सम्मत, मानवीय और तार्किक व्यवस्था ही बेहतर लोकतंत्र की ओर ले जाती है। इस लोकतंत्र का विकास हो ही रहा है। हाल में स्वतंत्रता दिवस पर साप्ताहिक पत्रिका आउटलुक ने इस सवाल पर केंद्रित विशेषांक निकाला था, जिसमें सबा नकवी का मुख्य लेख था। दूसरे लेख भी इस बात को लेकर थे कि बहुसंख्यावाद का लोकतंत्र से क्या रिश्ता है।

पर बात केवल नम्बर तक सीमित नहीं हो सकती। सवाल है कि नम्बर नहीं तो क्या? लोकतंत्र के बरक्स तानाशाही है जो अल्पसंख्यावाद की सबसे बेहतरीन प्रतीक है। फिर अल्पसंख्यकों की परिभाषा करना बड़ा मुश्किल है। एक बात यह भी कही गई कि जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तभी बहुसंख्यक की तानाशाही पर नज़र क्यों पड़ी? यह विसंगति तो पहले से है। सन 1975 में तानाशाही फैसले करने वाली सरकार भी जबर्दस्त लोकतांत्रिक ज्वार के सहारे उभर कर आई थी। भारत में प्रायः मुसलमानों को मसले को अल्पसंख्यकों का मसला माना जाता है। पर योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि जहाँ मुसलमान एक बड़ी तादाद में रहते हैं झगड़े वहाँ होते हैं। इसका दूसरा मतलब यह भी निकलता है कि अल्पसंख्यक जब अपनी हित-रक्षा की बात सोचते हैं और उसके लिए जद्दो-जहद करते हैं तब टकराव होता है। खामोश रहें तो नहीं होता। सवाल यह भी है कि कौन हमें बताता है कि हमारा धर्म खतरे में है? और क्यों बताता है? धर्म की भूमिका हमारे जीवन में कितनी है? भारत में सेक्युलरिज्म की परिभाषा भी अस्पष्ट है।

आउटलुक के विशेषांक के बाद 5 सितम्बर के हिंदू में ज़ोया हसन का एक विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ है। बेहतर हो कि इन लेखों को पढ़कर हम विचार करें कि हमारा लोकतंत्र कैसा हो। इन लेखों के लिंक नीचे दिए हैं। सामग्री पठनीय और विचारणीय है।

Numerocracy

Will the majoritarian project subvert the very democratic tradition that has brought the BJP to power?

SABA NAQVI

Some weeks ago, on a hot, humid evening, there was a book release in Delhi’s Constitution Club, a short walk from Parliament House where the Narendra Modi government was engaged in its first session. Union cabinet minister for micro, small and medium enterprises Kalraj Mishra had written Hindutva: Ek Jeevan Shaili (Hindutva: A Way of Life) in the twilight of his political career. At 73, Mishra—one of the old hands from Uttar Pradesh—is one of the more fortunate 70-plus leaders of the Bharatiya Janata Party to be accommodated in the Modi cabinet. But with 75 being the cut-off mark, he will probably last no more than two years. Good reason for the soft-spoken Mishra to be engaged in philosophical and ideological pursuits.

So there he was, flanked by the high priests of the mythical Hindu nation. Master of ceremonies was Yogi Adityanath, four-term BJP MP from Gorakhpur (and next in line to take over the influential Gorakhnath math) plus founder of the Hindu Yuva Vahini. All the speakers basically said that the inconve­nient word “secular” does not mean that Hin­dus have to be shy about their religion. Star speaker Baba Ramdev waxed eloquent: “People ask me, will Modi change anything? I believe he is the individual who will take India to a new direction.” What could that direction be? The yoga guru’s answer: “Maths, science, social system, ecosystem, agri­cultural system are all there in Hindutva. The Muslims of India have not come from Saudi Arabia, Iran or Iraq. They are from here, from Hindutva. The Christians have not come from Vatican city, they are from here, from Hindutva. Hinduism is the oldest religion, Islam and Christianity cannot match it, and we are all descendants of Hindus.”
A historical walkthrough of how majoritarianism has made appearances in idea and practice....


Politics without the minorities

ZOYA HASAN
We have two parallel narratives running simultaneously in the first 100 days of the Narendra Modi government. In the first one, as a heroic Prime Minister in total command of his government and party, Mr. Modi is busy revving up the sputtering economy with his decisive leadership and “good governance” much acclaimed by economists, the middle classes, the media, and the twitterati. After taking charge, Mr. Modi has been quick in framing rules and taking some strong decisions: from the announcement to scrap the Planning Commission to calling off Foreign Secretary-level talks with Pakistan to clearing 49 per cent foreign direct investment in insurance to launching the Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana with a promise to end “financial untouchability.”
The second narrative unfolding at the same time focusses on the template of majoritarianismdefined by the Sangh Parivar’s principal belief that India is a Hindu nation. The Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) chief, Mohan Bhagwat, declared that “India is a Hindu state and citizens of Hindustan should be known as Hindus.” Endorsing the RSS view, the Union Minister for Minority Affairs, Najma Heptulla, said, “there is nothing wrong in calling all Indians Hindus,” which she later denied. A similar statement was made by the Bharatiya Janata Party (BJP) MP Yogi Adityanath while opening the Lok Sabha debate on communal violence — “Hindutva is a symbol of Indian nationalism.” That this speech evoked table thumping from his fellow BJP MPs makes it even more significant.

Wednesday, September 3, 2014

बदलती दुनिया की रोशनी में भारत-जापान

नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा को भारत के पुनर्जागरण की नजर से देखा जाना चाहिए। बेशक यह मोदी की राजनीतिक उपलब्धि है, पर उससे ज्यादा यह वैश्विक मंच पर भारत के आगमन की घोषणा है। मोदी ने इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी बताया है। इसमें भारत-जापान रिश्तों की सबसे बड़ी भूमिका होगी। साथ ही इसमें चीन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। मोदी ने क्योटो और वाराणसी के बीच सांस्कृतिक सेतु बनाने की घोषणा करके दोनों देशों के परम्परागत सम्पर्कों को रेखांकित किया है। दोनों देशों के बीच नाभिकीय समझौता फिर भी नहीं हो पाया। अलबत्ता जापान ने कुछ भारतीय कम्पनियों पर लगी पाबंदियाँ हटाने की घोषणा की है। हमें उच्चस्तरीय तकनीक भी चाहिए, जो जापान के पास है। भारत सरकार नए औद्योगिक शहरों को बसाने की योजना बना रही है। हमें इन्फ्रास्ट्रक्चर की कम-खर्च व्यवस्था चाहिए, जिसमें चीन की भूमिका होगी। बहरहाल जापान-यात्रा आर्थिक और सामरिक दोनों प्रकार के सहयोगों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

Sunday, August 31, 2014

भारत-जापान रिश्तों का सूर्योदय

जापान में बौद्ध धर्म चीन और कोरिया के रास्ते गया था। पर सन 723 में बौद्ध भिक्षु बोधिसेन का जापान-प्रवास भारत-जापान रिश्तों में मील का पत्थर है। बोधिसेन आजीवन जापान में रहे। भारत में जापान को लेकर और जापान में भारत के प्रति श्रद्धा का भाव है। बोधिसेन को जापान के सम्राट शोमु ने निमंत्रित किया था। वे अपने साथ संस्कृत का ज्ञान लेकर गए थे और माना जाता है कि बौद्ध भिक्षु कोबो दाइशी ने 47 अक्षरों वाली जापानी अक्षरमाला को संस्कृत की पद्धति पर तैयार किया था। जापान के परम्परागत संगीत पर नृत्य पर भारतीय प्रभाव भी है। पर हम जापानियों को उनकी कर्म-निष्ठा के कारण पहचानते हैं। हाल के वर्षों में चीन ने दुनिया में अपनी धाक कायम की है, पर जापानियों ने उन्नीसवीं सदी के मध्य से ही अपना सिक्का बुलंद कर रखा है।

अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस समेत तमाम देशों के साथ हमारे रिश्ते रहे हैं, पर दुनिया में एक देश ऐसा है, जिसे लेकर भारतीय जन-मन बेहद भावुक है। हमारे वैदेशिक सम्बन्धों में अनेक ऐसे मौके आए जब जापान ने हमारा विरोध किया, खासतौर से 1998 में एटमी धमाकों के बाद फिर भी हमारे यहाँ जापान की छवि कभी खराब नहीं हुई। आर्थिक प्रगति और पश्चिमी प्रभाव के बाद भी दोनों देशों में परम्परागत मूल्य बचे हैं। दोनों देश देव और असुर को इन्हीं नामों से पहचानते हैं। जापान को हम सोनी, टयोटा, होंडा और सुज़ुकी के कारण भी जानते हैं। दिल्ली की शान मेट्रो के लिए हमें जापान ने आर्थिक मदद दी थी। सुभाष बोस और रासबिहारी बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानी भारत-जापान के रिश्तों की कड़ी रहे हैं। जापानी लोग जस्टिस राधा विनोद पाल के मुरीद हैं, जिन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सुदूर पूर्व के लिए बने मिलिटरी ट्रिब्यूनल के सदस्य जज के रूप में दूसरे जजों के खिलाफ जाकर अकेले जापान के पक्ष में फैसला सुनाया था।

Saturday, August 30, 2014

बिहार-प्रयोग के किन्तु-परन्तु

बिहार के विधान सभा उपचुनावों में जीत के बाद जेडीयू के अध्यक्ष शरद यादव ने कहा है कि उन्हें पहले से पता था कि गठबंधन की जीत होगी। अब इस एजेंडे को देश भर में ले जाएंगे। जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन के नेताओं का कहना है कि जनता ने साबित किया है कि नरेंद्र मोदी के रथ को आसानी से रोका जा सकता है। लालू और नीतीश ने कांग्रेस को साथ लेकर मोर्चा बनाने का जो प्रयोग किया वह अपनी पहली परीक्षा में सफल साबित हुआ। इन परिणामों से यह बात तो साबित हुई कि इन दोनों नेताओं का पिछड़ी जातियों में जनाधार मजबूत है और यह भी कि लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को मिली जीत के पीछे बड़ा कारण 'मोदी लहर' के साथ-साथ वोटों का बिखराव भी था। यह बात भी समझ में आती है कि इस प्रयोग को देश भर में ले जाने की कोशिश की जाएगी।

इस गठबंधन में कोई नई बात है तो बस यही कि यह गैर-भाजपा गठबंधन था, गैर-कांग्रेस गठबंधन नहीं। अतीत में यह एक ही जड़ी का नाम होता था। अब तक ऐसा गठबंधन इसलिए नहीं बना कि कांग्रेस, राजद और जेडीयू तीनों तुर्रम खां थे। अब तीनों डरे हुए हैं। अब देखना होगा कि यह गठबंधन अगले साल विधानसभा चुनाव तक रहता भी है या नहीं। बना रहा तो राष्ट्रीय शक्ल लेगा या नहीं। इनकी टोली में कौन से दल शामिल होंगे और क्यों। यह तीसरा मोर्चा है, चौथा है या एनडीए के जवाब में दूसरे मोर्चे की कोई नई अवधारणा है? यह लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की प्राण-रक्षा है या सुविचारित सैद्धांतिक गठबंधन है? क्या सभी या बहुसंख्यक धर्म निरपेक्ष पार्टियाँ शामिल होंगी?

धुरी में कौन है कांग्रेस या जनता परिवार?
इन सवालों के जवाब पाने के पहले एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या जनता दल का गैर-कांग्रेसवाद अब खत्म हो चुका है? लालू प्रसाद का राजद तो लम्बे अरसे से कांग्रेस के साथ गठबंधन करता आ रहा है, पर जेडीयू ने पहली बार किया। इन चुनाव परिणामों के बाद शरद यादव ने दिल्ली के एक अख़बार से कहा कि जनता दल ने कांग्रेस के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ी है, पर अब गैर-कांग्रेसवाद का दौर खत्म हो चुका है। क्या अब जनता परिवार के गठबंधनों में कांग्रेस भी शामिल होगी? लालू और नीतीश की पहचान बिहार के बाहर नहीं है। कांग्रेस की पहचान अखिल भारतीय है। अभी तक तीसरे या चौथे मोर्चे की धुरी वाम मोर्चे की पार्टियाँ बनती थीं। क्या अब कांग्रेस इसकी धुरी बनेगी? यह सोचने में कोई खराबी नहीं कि देश की सारी धर्म-निरपेक्ष पार्टियाँ एक छतरी के नीचे आ जाएं, पर यह व्यावहारिक नहीं है। हमें पहले कांग्रेस के भविष्य का अनुमान लगाना होगा। वह किधर जाने वाली है?

लोकसभा चुनाव के समय ऐसा मोर्चा क्यों नहीं बना? शायद ऐसी पिटाई का अंदेशा न नीतीश कुमार को था और न लालू को। जब जान पर बन आई तब इस मोर्चे का विचार आया है। चुनाव के ठीक पहले जिस धर्मनिरपेक्ष मोर्चे को बनाने की कोशिश की गई थी वह विफल रहा, क्योंकि ममता, जयललिता, नवीन पटनायक और मायावती ने इसमें शिरकत नहीं की। क्षेत्रीय दलों में ये चार सबसे प्रभावी दल हैं। बिहार उपचुनावों के परिणाम आने के बाद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि हम उत्तर प्रदेश में ऐसे गठबंधन पर विचार कर सकते हैं, पर मायावती ने इसकी सम्भावना को खारिज कर दिया था। पर क्या मुलायम के उस प्रस्ताव पर मायावती पुनर्विचार करेगी जिसमें बसपा-सपा गठबंधन की बात थी? सन 1993 में उत्तर प्रदेश में सफल होने के बाद पिछले 21 साल से ये दोनों दल एक-दूसरे के मुख्य प्रतिस्पर्धी हैं। उनकी प्रतिस्पर्धा के कारणों को भी समझना होगा। इसी तरह क्या कर्नाटक में जनता परिवार कांग्रेस के साथ आएगा? क्या पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, वाम मोर्चा और कांग्रेस एक साथ आएंगे? क्या इस मोर्चे के प्रस्तावकों के पास तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा, असम, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान के लिए भी फॉर्मूले है? मुलायम सिंह, मायावती और कांग्रेस तीनों एक भाजपा को हराने के लिए एकजुट क्यों नहीं हो सकते? क्या ममता बनर्जी और वाम दल मिलकर काम कर सकते हैं?

थोड़ा सा इंतज़ार कीजिए
इन सब बातों के पहले उत्तर प्रदेश में तथा कुछ अन्य राज्यों में 13 सितम्बर को होने वाले उपचुनावों के परिणामों का इंतज़ार भी करना होगा। उसके बाद देखें कि झारखंड में विधान सभा चुनाव में महागठबंधन बनता है या नहीं। फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और सम्भवतः दिल्ली के परिणामों पर नज़र डालनी होगा। बिहारी महागठबंधन की गतिविधियों पर निगाह रखनी होगी। यानी इसका नेता कौन? फिलहाल तो झगड़ा नहीं है, पर अगले साल गठबंधन की जीत हुई तो मुख्यमंत्री कौन? राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की अवधारणा तो और भी महत्वाकांक्षी लगती है। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बना तो नेतृत्व किसके पास रहेगा? ऐसे कुछ सवाल हैं, जिनके जवाब पेचीदा हैं।

बिहार के चुनाव परिणामों के गम्भीर निष्कर्ष निकालने के पहले दो-तीन बातों को समझ लिया जाना चाहिए। इन दसों सीटों के चुनावों का मुद्दा लोकसभा चुनाव के मुद्दे से फर्क था। उस चुनाव में राष्ट्रीय राजनीति प्रभावी थी, इसमें स्थानीय मसले हावी थे। लोकसभा चुनाव के भारी मतदान के मुकाबले इस चुनाव में मतदान तकरीबन 20 से 25 फीसदी कम हुआ। जो तबका तब नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट देने के लिए निकला था, वह इस बार नहीं निकला। वह विधान सभा चुनाव में भी वोट नहीं देगा ऐसा नहीं कह सकते। जरूरी नहीं कि वह अगली बार भाजपा को ही वोट दे, पर वह महत्वपूर्ण साबित होगा। उसका वोट जाति और धर्म के बाहर जाकर पड़ता है। भाजपा का रूप विधान सभा चुनाव में क्या होगा कहना मुश्किल है। जातीय ध्रुवीकरण की काट में क्या वह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के रास्ते पर जाएगी? उत्तर प्रदेश भाजपा अपेक्षाकृत आक्रामक है और हिन्दुत्व की लाइन पर जा रही है।

भाजपा को रोका जा सकता है
बिहार के इन परिणामों ने यह साबित किया है कि भाजपा को रोकना मुश्किल काम नहीं है, बशर्ते स्थानीय नेता त्याग करें। किसी ताकत को रोकना एक बात है और एक सुगठित, सुचारु विकल्प कायम करना दूसरा काम है। गठबंधन हमारी ही नहीं दुनिया भर की राजनीति का सत्य बनकर उभरे हैं। सन 2010 में ब्रिटेन में लिबरल डेमोक्रेट और कंजर्वेटिव पार्टियों के बीच अचानक गठबंधन बना, पर दोनों पार्टियों ने काफी पेपरवर्क करके उसे सलीके से औपचारिक रूप दिया। बावजूद इसके वहाँ भी बगावत होती रहती है। सन 2015 में दोनों पार्टियों को अलग-अलग चुनाव लड़ना है इसलिए वहाँ असहमतियाँ दिखाई पड़ने लगी हैं। गठबंधन का लक्ष्य सत्ता को हासिल करना है, उसे सिद्धांत से सजाने का काम राजनीतिक कौशल से जुड़ा है। बिहार में लालू-नीतीश कौशल ने काम किया, पर कब तक और कहाँ तक?
राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप में प्रकाशित

Friday, August 29, 2014

क्या पाकिस्तानी समाज खूनी नसरीन को स्वीकार कर लेगा?

पाकिस्तान में अगले महीने से कॉमिक्स उपन्यास का एक ऐसा चरित्र सामने आने वाला है, जिसे लेकर अंदेशा है कि वहाँ के कट्टरपंथियों का तीखी प्रतिक्रिया होगी। यह पात्र है नसरीन का।  27 साल की नसरीन कॉलेज जाने वाली किसी आम लड़की है। वह कराची की रहने वाली है। कराची की हिंसा की कहानियाँ दूर-दूर तक फैसी है। ऐसा शहर जो जातीय हिंसा का शिकार है। जहां गरीब और कमजोर को इंसाफ नहीं मिलता और रोजाना दर्जनों खून होते हैं। नसरीन एक हाथ में तलवार रखती है तो दूसरे में पिस्तौल। निशाने पर होते हैं आतंकी, ड्रग माफिया और भ्रष्ट लोग। जिन्हें वह बेहद फुर्ती के साथ खत्म करती है।  हाल में दैनिक भास्कर ने नसरीन के बारे में एक समाचार कथा प्रकाशित की है। लाहौर के रहने वाले कलाकार शाहन जैदी ने बनाया है यह नसरीन का किरदार। यह इसी अक्टूबर में कॉमिक्स के रूप में बाजार में जाएगा। फिर टीवी और यूट्यूब पर सीरीज़। शाहन का कहना है कि कराची में जो कुछ हो रहा है उसमें कमजोरों को ताकतवरों से बचाने की कल्पना ही की जा सकती है। मैंने एक ऐसा कैरेक्टर तैयार किया है जो यह समझती है कि इज्जत की रोटी और इज्जत की जिंदगी पर गरीबों और कमजोरों का भी हक है।

लेकिन इस किरदार से मुल्क के कट्‌टरपंथी अभी से खफा हैं। सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें होने लगी हैं। नसरीन चुस्त और टाइट लिबास जो पहनती है। सवाल उठाया जा रहा है कि वह दुपट्‌टा क्यों नहीं पहनती? उसके हाथ में सिगरेट है। वो मोटरसाइकिल चलाती है और उसने पियरसिंग भी करवाई है। यानी वह हर ऐसा काम करती है, जिसकी पाकिस्तानी मुस्लिम समाज में लड़कियों से उम्मीद नहीं की जाती। 

अच्छी बात यह है कि पाकिस्तान में तालिबान ने औरतों की जिंदगी जिस तरह से मुश्किल बना दी है उसका नसरीन जैसा फिक्शनल कैरेक्टर ही जवाब है। शाहन कहते हैं हमें आनेवाली पाकिस्तानी नस्ल को महफूज बनाना है। जहां लड़कियां, लड़के, मर्द, औरतें एकसाथ खुश रह सकें। 

पाकिस्तान में इससे पहले पिछले साल बुर्का अवेंजर नाम से एक टीवी सीरियल भी चला जिसमें जिया नाम की एक साधारण सी लड़की बुर्का पहने सुपरहीरोइन बन जाती है और अपराधियों को सजा देती है। उसे तख्त कबड्डी नाम की मार्शल आर्ट में महारत हासिल है। टाइम मैगज़ीन ने बुर्का अवेंजर को सन 2013 के सबसे प्रभावशाली काल्पनिक चरित्रों में एक बताया था। 









Thursday, August 28, 2014

राजनीति ने बनाया राजभवनों को अपना अखाड़ा

 बुधवार, 27 अगस्त, 2014 को 16:51 IST तक के समाचार
भारत की संसद
लोकसभा में नेता विपक्ष के पद और राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति और बर्ख़ास्तगी का सवाल पहले भी सुप्रीम कोर्ट में उठा है.
इसी के साथ इन सवालों के इर्द-गिर्द देश की क्लिक करेंलोकतांत्रिक संस्थाओं पर विमर्श एक नई शक्ल में शुरू हुआ है. सरकार भले ही फिलहाल राज्यपालों को बदल दे, पर आने वाले वक्त में यह काम आसान नहीं रहेगा.
दिल्ली में नरेंद्र मोदी की सरकार के बनने के बाद पहली खबरें थी कि अब राज्यपालों की बारी है. पहले भी ऐसा ही होता रहा है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को काम देने के लिए राज्यपाल का पद सबसे उचित माना जाता है.

पढ़िए विश्लेषण

इसके बाद ख़बर आई कि क्लिक करेंछह राज्यपालों को सलाह दी गई है कि वे अपने इस्तीफ़े दे दें. कुछ ने इस्तीफ़े दिए और कुछ ने आना-कानी की. ताज़ा मामला महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल के शंकरनारायणन का है, जिनका तबादला मिज़ोरम कर दिया गया था.
मनमोहन सिंह और पृथ्वीराज चौहान के साथ के शंकरनारायण (बीच में)
मनमोहन सिंह और पृथ्वीराज चौहान के साथ के शंकरनारायण (बीच में).
उन्होंने वहां जाने की बजाय इस्तीफा देना उचित समझा. हाल में कमला बेनीवाल वहीं लाने के बाद हटाई गईं थीं. इस मायने में मिज़ोरम काला पानी साबित हो रहा है.
इस बीच, केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित ने भी मिज़ोरम तबादला किए जाने की खबरों के बीच इस्तीफा दे दिया है. सोमवार को गृहमंत्री से उनकी मुलाकात के बाद उनके इस्तीफे से जुड़ी अटकलें शुरू हो गई थीं.
हालांकि कुछ क्लिक करेंसियासी हलकों में माना जा रहा था कि वे लड़ने के मूड में हैं, लेकिन आख़िरकार उन्होंने इस्तीफे का रास्ता चुना. मौजूदा परिदृश्य में राज्यपाल का पद राजनीति की ज़बर्दस्त जकड़ में है.

विवादों का लम्बा इतिहास

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और केरल की पूर्व राज्यपाल शीला दीक्षित.
राज्यपालों की राजनीतिक भूमिका को लेकर क्लिक करेंभारतीय इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं. लंबे अरसे तक राजभवन राजनीति के अखाड़े बने रहे. अगस्त, 1984 में एनटी रामाराव की सरकार को आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रामलाल की सिफ़ारिश पर बर्ख़ास्त किया गया.
उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी, झारखंड में सिब्ते रज़ी, बिहार में बूटा सिंह, कर्नाटक में हंसराज भारद्वाज और गुजरात में कमला बेनीवाल के फ़ैसले राजनीतिक विवाद के कारण बने.
अनेक मामलों में क्लिक करेंसुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों की भूमिका की आलोचना भी की है. जब राजनेता-राज्यपाल का मुकाबला दूसरी रंगत के मुख्यमंत्री से होता है तब परिस्थितियाँ बिगड़ती हैं.
सन 1994 में तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जे जयललिता और राज्यपाल एम चेन्ना रेड्डी के बीच टकराव का नुकसान प्रशासनिक व्यवस्था को उठाना पड़ा था. हाल में बिहार और झारखंड में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच टकराव देखा गया.

Wednesday, August 27, 2014

...और न रिटायर नेताओं के आरामगाह हैं राजभवन

महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल के शंकरनारायणन के बाद केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित ने भी इस्तीफा देकर मोदी सरकार के काम को आसान कर दिया है, पर राज्यपालों की बर्खास्तगी और नियुक्ति को लेकर राष्ट्रीय विमर्श का समय आ गया है. सरकारिया आयोग ने सुझाव दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 155 में संशोधन करके राज्यपालों की योग्यता और नियुक्ति प्रक्रिया को तय किया जाना चाहिए. यह भी तय किया जाना चाहिए कि राज्यपाल का पद क्या इस हद तक राजनीतिक है कि सरकार बदलते ही उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या उनका कार्यकाल गारंटीड हो जैसी कि सरकारिया आयोग की सलाह थी. सन 2004 में जब यूपीए ने एनडीए के राज्यपाल हटाए थे तब भाजपा के जो तर्क थे, वे आज कांग्रेसी ज़ुबान पर हैं.

Sunday, August 24, 2014

कश्मीर में नई लक्ष्मण रेखा

पाकिस्तान के साथ 25 अगस्त को प्रस्तावित सचिव स्तर की बातचीत अचानक रद्द होने के बाद पहला सवाल पैदा होता है कि अपने शपथ ग्रहण समारोह में पूरे दक्षिण एशिया को निमंत्रित करने वाले नरेन्द्र मोदी बदले हैं या हालात में कोई बुनियादी बदलाव आ गया है? क्या पाकिस्तान सरकार दिखावा कर रही है? या कोई तीसरी ताकत नहीं चाहती कि दक्षिण एशिया में हालात सुधरें। बैठक रद्द होने का फैसला जितनी तेजी से हुआ उससे लगता है कि भारत ने जल्दबाज़ी की है। या फिर मोदी सरकार रिश्तों का कोई नया बेंचमार्क कायम करना चाहती है।

पहली नज़र में लगता है कि 18 अगस्त को पाकिस्तानी उच्चायुक्त के साथ शब्बीर शाह की बैठक के मामले को कांग्रेस ने उछाला। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे दिन भर दिखाया। सरकार घबरा गई। पाकिस्तानी राजनीति में चल रहे टकराव को लेकर वह पहले ही असमंजस में थी। पर क्या भारत सरकार ने बगैर सोचे यह फैसला किया होगा? भारत सरकार इसके पहले भी हुर्रियत नेताओं के साथ पाकिस्तानी नेतृत्व की मुलाकातों की आलोचना करती रही है। हर बार औपचारिक विरोध भी दर्ज कराती रही है, पर इस तरह पूर्व निर्धारित बैठकें रद्द नहीं हुईं।

अनायास नहीं है नियंत्रण रेखा पर घमासान

जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा से जो खबरें आ रहीं है वे चिंता का विषय बनती जा रही हैं। शुक्र और शनिवार की आधी रात के बाद से अर्निया और रघुवीर सिंह पुरा सेक्टर में जबर्दस्त गोलाबारी चल रही है। इसमें कम से कम दो नागरिकों के मरने और छह लोगों के घायल होने की खबरें है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने भारत की 22 सीमा चौकियों और 13 गाँवों पर जबर्दस्त गोलाबारी की है। पुंछ जिले के हमीरपुर सब सेक्टर में भी गोलाबारी हुई है। उधर पाकिस्तानी मीडिया ने भी सियालकोट क्षेत्र में भारतीय सेनाओं की और से की गई गोलाबारी का जिक्र किया है और खबर दी है कि उनके दो नागरिक मारे गए हैं और छह घायल हुए हैं। मरने वालों में एक महिला भी है।
सन 2003 का समझौता होने के पहले नियंत्रण रेखा पर भारी तोपखाने से गोलाबारी होती रहती थी। इससे सीमा के दोनों और के गाँवों का जीवन नरक बन गया था। क्या कोई ताकत उस नरक की वापसी चाहती है? चाहती है तो क्यों? बताया जाता है कि सन 2003 के बाद से यह सबसे जबर्दस्त गोलाबारी है। भारतीय सुरक्षा बलों ने इस इलाके की बस्तियों से तकरीबन 3000 लोगों को हटाकर सुरक्षित स्थानों तक पहुँचा दिया है। अगस्त के महीने में नियंत्रण रेखा के उल्लंघन की बीस से ज्यादा वारदात हो चुकी हैं। अंदेशा इस बात का है कि यह गोलाबारी खतरनाक स्तर तक न पहुँच जाए।
सुरंग किसलिए?
भारतीय सुरक्षा बलों ने इस बीच एक सुरंग का पता लगाया है जो सीमा के उस पार से इस पार आई है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान की और से घुसपैठ की कोशिशें खत्म नहीं हुईं हैं। आमतौर पर सर्दियों के पहले घुसपैठ कराई जाती है। बर्फबारी के बाद घुसपैठ कराना मुश्किल हो जता है। दो-एक मामले ऐसे भी होते हैं जिनमें कोई नागरिक रास्ता भटक जाए या कोई जानवर सीमा पार कर जाए, पर उतने पर भारी गोलाबारी नहीं होती। आमतौर पर फायरिंग कवर घुसपैठ करने वालों को दिया जाता है ताकि उसकी आड़ में वे सीमा पार कर जाएं। अंदेशा इस बात का है कि पाकिस्तान के भीतर एक तबका ऐसा है जो अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी का इंतज़ार कर रहा है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक और सीरिया में वहाबी ताकत पुनर्गठित हो रही है। कहीं यह उसकी आहट तो नहीं?

Saturday, August 23, 2014

कश्मीर को लेकर क्या कोई नई लकीर खींचना चाहते हैं मोदी?

पाकिस्तान के साथ 25 अगस्त को होने वाली सचिव स्तर की वार्ता अचानक रद्द होने के बाद दो तरह की बातें दिमाग में आती हैं। पहली यह कि भारत ने जल्दबाज़ी की है। या फिर मोदी सरकार इन रिश्तों का कोई नया बेंचमार्क कायम करना चाहती है। दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायुक्त के साथ शब्बीर शाह की बैठक के मामले को कांग्रेस ने उछाला। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे दिन भर दिखाया। सरकार इन बातों से घबरा गई। पाकिस्तानी राजनीति में चल रहे टकराव को लेकर वह पहले ही असमंजस में थी। पर क्या भारत सरकार ने बगैर सोचे जल्दबाज़ी में यह फैसला किया होगा? भारत सरकार हुर्रियत नेताओं के साथ पाकिस्तानी नेतृत्व की मुलाकातों की आलोचना करती रही है। औपचारिक विरोध दर्ज भी हुआ, पर बैठकें रद्द नहीं हुईं। जब हम दक्षिण एशिया में विकास और बदलाव की बात करते हैं तब कश्मीर जैसे मसलों को उनपर हावी नहीं होना चाहिए। भारत-पाकिस्तान रिश्तों को अब कश्मीर से हटकर भी देखा जाना चाहिए।

मार्च 1993 में हुर्रियत की स्थापना के बाद से पाकिस्तान सरकार और हुर्रियत के बीच लगातार संवाद चलता रहा है। मई 1995 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति फारूक लेघारी जब दक्षेस बैठक के लिए दिल्ली आए तो इनसे मिले। सन 2001 में जब परवेज़ मुशर्रफ आगरा शिखर सम्मेलन के लिए आए तब मिले, अप्रैल 2005 में वे फिर मिले। अप्रैल 2007 में दिल्ली आए पाक प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज इनसे मिले। कई मौकों पर इनकी पाकिस्तानी नेताओं से मुलाकात होती रहती है। हुर्रियत नेता 23 मार्च को होने वाले पाकिस्तान दिवस में शामिल होने के लिए दिल्ली आते हैं। 15 अप्रैल 2005 को भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन से सवाल किया गया था कि दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री से मिलने से पहले हुर्रियत नेताओं से राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ की मुलाक़ात पर भारत को क्या कोई समस्या है? उन्होंने कहाहम लोकतांत्रिक देश हैं। हमें इस तरह की मुलाक़ातों से कोई दिक़्क़त नहीं।”

सोमवार की सुबह विदेश सचिव सुजाता सिंह ने पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित को आगाह कर दिया था कि वे अलगाववादी नेताओं से न मिलें, वरना 25 अगस्त की बैठक रद्द कर दी जाएगी। इसके बावजूद उच्चायुक्त का अलगाववादियों से मिलना जितना विस्मयकारी है उतना ही विस्मयकारी है बैठक का रद्द होना। तब क्या माना जाए कि भारत सरकार ने जल्दबाज़ी में फैसला नहीं किया है, बल्कि मोदी सरकार पाकिस्तान के रिश्तों में कोई नई लक्ष्मण रेखा खींचना चाहती है।

अलगाववादियों के मुलाकात करने या न करने से इस मसले में कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ेगा। फर्क तब पड़ेगा जब हम अपने प्रकट सिद्धांत से हटें। भारत सरकार 1972 के शिमला समझौते की भावना के अनुरूप ही अब कश्मीर पर कोई समझौता करना चाहती है। सन 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की यात्रा के बाद जारी लाहौर घोषणापत्र में यह बात कही गई है। सन 2001 और 2005 में परवेज़ मुशर्रफ के साथ बातचीत के बाद दोनों देश इस दिशा में काफी आगे बढ़ गए थे। यूपीए सरकार ने पाकिस्तान के साथ कम्पोज़िट बातचीत की जो प्रक्रिया शुरू की है उसमें कश्मीर मसले को किनारे रखा गया है। उसमें व्यापारिक सम्पर्क, रेल और सड़क, नदियों के पानी से जुड़े विवाद, सांस्कृतिक, सामुदायिक और वैज्ञानिक-तकनीकी सहयोग तथा वीज़ा और पारगमन के मसले बातचीत में शामिल हैं। इस सारे मामलों में अब तक काफी प्रगति हो जाती, पर 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई में हुए हमले ने तमाम शांति प्रक्रियाओं पर विराम लगा दिया। इन रिश्तों की अब एक बड़ी शर्त यह है कि मुम्बई पर हमले के दोषियों को जल्द से जल्द सज़ा मिले।  

अपने शपथ ग्रहण समारोह को दक्षिण एशिया सम्मेलन में तबदील करके नरेन्द्र मोदी ने जो शुरुआत की थी उसकी तार्किक परिणति 25 अगस्त की बैठक थी, जो भावी बैठकों की तैयारी की योजना बनाने के लिए थी। यह बैठक भारत की पहल पर हो रही थी। सुजाता सिंह ने अपनी तरफ से बातचीत का कार्यक्रम बनाया था। नवाज शरीफ की यात्रा से बातचीत के दरवाज़े खुले थे। अब दरवाजे बंद होते नज़र आ रहे हैं। खासकर ऐसे समय में जब नवाज़ शरीफ़ आंतरिक राजनीति में घिरे हैं। बातचीत से पहले हुर्रियत नेताओं और पाकिस्तानी उच्चायुक्त की मुलाक़ात की परम्परा को वे तोड़ते तो देश की राजनीति में उनकी फज़ीहत होती। पाकिस्तान में कोई भी राजनीतिक नेता खुले आम यह कहने की हिम्मत नहीं रखता कि हुर्रियत नेताओं से संवाद नहीं करेंगे।

माना जा रहा है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद पाकिस्तानी जेहादी कश्मीर की ओर रुख करेंगे। दूसरी और देश आर्थिक संकटों से घिरा है। जेहादी संस्कृति उसके गले में हड्डी बन गई है। इससे निपटने की जिम्मेदारी पाकिस्तानी राजनीति की है। नवाज़ शरीफ मई में जब भारत आए तो उन्होंने न तो कश्मीर का मुद्दा उठाया था और न ही वे हुर्रियत नेताओं से मिले। पाकिस्तान में उनकी आलोचना भी हुई। हाफिज़ सईद ने खुले आम कहा कि नवाज शरीफ को भारत नहीं जाना चाहिए। कहा जाता है कि पाकिस्तान की सेना नागरिक सरकार पर हावी है। हमें उनके अंतर्विरोधों को समझना होगा।

दो साल पहले भारत सरकार ने पाकिस्तान के निवेशकों पर भारत में लगी रोक हटाई थी। अब पाकिस्तानी निवेशक रक्षा, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों के अलावा अन्य कारोबारों में निवेश कर सकेंगे। यह आर्थिक निर्णय है, पर इसके राजनीतिक पहलू भी हैं। पाकिस्तान में तबका भारत से रिश्ते बनाने में अड़ंगे लगाता है। पर खेल, संगीत और कारोबारी रिश्ते दोनों देशों को जोड़ते भी हैं। पाकिस्तान में अराजक स्थितियों के कारण पूँजी का पलायन हो रहा है। अमेरिका, यूरोप और दुबई जाने के अलावा भारत आना बेहतर होगा। अनेक पाकिस्तानी उद्यमी परिवारों की पृष्ठभूमि स्वतंत्रता से पहले की है। जब तक हमारे आर्थिक हित नहीं मिलेंगे हम एक-दूसरे की स्थिरता के प्रति ज़िम्मेदार नहीं बनेंगे। दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंकाओं को दूर करने के लिए आर्थिक पराश्रयता विकसित करनी होगी। दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत होनी चाहिए। सब ठीक रहा तो कभी भारत-पाकिस्तान की संयुक्त कम्पनियाँ बनेंगी।

पाकिस्तान-भारत नहीं दक्षिण एशिया के संदर्भ में सोचें। पिछले दिनों श्रीलंका में हुए सार्क चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ की बैठक में कहा गया कि दक्षिण एशिया में कनेक्टिविटी न होने के कारण व्यापार सम्भावनाओं के 72 फीसदी मौके गँवा दिए जाते हैं। इस इलाके के देशों के बीच 65 से 100 अरब डॉलर तक का व्यापार हो सकता है। ये देश परम्परा से एक-दूसरे के साथ जुड़े रहे हैं। म्यांमार यानी बर्मा अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण आसियान में चला गया, अन्यथा यह पूरा क्षेत्र एक आर्थिक ज़ोन के रूप में काम कर सकता है। इसकी परम्परागत कनेक्टिविटी राजनीतिक कारणों से खत्म हो गई है। पाकिस्तान को बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका से जोड़ने में भारत की भूमिका हो सकती है। भारत को अफगानिस्तान से जोड़ने में पाकिस्तान की। पर उसके पहले अपने राजनीतिक अंतर्विरोधों को सुलझाना होगा। इसकी शुरुआत भारत और पाकिस्तान से ही होगी।
DIFFERENT ACTORS, SAME SCRIPT: (clockwise from top left) Pervez Musharraf and Atal Bihari Vajpayee in Agra in 2001; Nawaz Sharif and Narendra Modi in New Delhi in May; Nawaz Sharif and Manmohan Singh in New York in September 2013; and YHouzaf Raza Gilani and Manmohan Singh in Sharm El-Sheikh.
DIFFERENT ACTORS, SAME SCRIPT: (clockwise from top left) Pervez Musharraf and Atal Bihari Vajpayee in Agra in 2001; Nawaz Sharif and Narendra Modi in New Delhi in May; Nawaz Sharif and Manmohan Singh in New York in September 2013; and YHouzaf Raza Gilani and Manmohan Singh in Sharm El-Sheikh.

Monday, August 18, 2014

मॉनसून सत्र तो ठीक गुज़रा, पर भावी टकराव का अंदेशा कायम है

 सोमवार, 18 अगस्त, 2014 को 12:43 IST तक के समाचार
सोलहवीं लोकसभा का पहला बजट सत्र पिछले चार साल का सबसे सकारात्मक सत्र रहा. लोकसभा ही नहीं, संसद के दोनों सदनों ने कम व्यवधान और ज्यादा काम का रिकॉर्ड बनाया.
पन्द्रहवीं लोकसभा के अंतिम सत्र में जितनी क्लिक करेंगहमा-गहमी और शोरगुल देखने को मिली थी, उसके मुकाबले इस बार का सत्र अपेक्षाकृत शांति और सद्भाव के माहौल में गुजरे हैं.
संसदीय कार्यवाही का बेहतर माहौल में चलना क्या संकेत दे रहा है? क्या इससे भविष्य की राजनीति को लेकर कोई संकेत दिख रहा है? क्या लंबे समय से लंबित विधेयकों को सरकार पास कराने की कोशिश करेगी?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने.

पढ़िए विस्तार से

संसद की बैठकें शुरू होने के पहले आशंका व्यक्त की जा रही थी कि बहुमत के चलते कहीं ऐसा न हो कि सरकार विमर्श के बगैर ही अपने फ़ैसले करके उन्हें पास कराने की औपचारिकता भर पूरी करे. फिलहाल ऐसा नहीं लगता. अच्छी बात यह है कि सदन में पहली बार आए सदस्यों में भारी उत्साह नज़र आया और प्रश्नोत्तर काल में भी सुधार हुआ.

हंगामों की विदाई

लोकसभा ने 27 बैठकों में 167 घंटे और राज्यसभा में 142 घंटे काम हुआ. व्यवधान में लोकसभा ने तकरीबन 14 घंटे गंवाए जिसकी भरपाई 28 घंटे से ज़्यादा समय अलग से बैठकर की गई.
क्लिक करेंराज्यसभा में हंगामे के कारण 34 घंटे काम काज नहीं हो सका, लेकिन उसने 38 घंटे अतिरिक्त काम करके उसकी भरपाई की. इसकी तुलना पन्द्रहवीं लोकसभा से करें तो सन 2010 का पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया था और 2013 के बजट सत्र के दौरान सिर्फ 19 घंटे 36 मिनट काम हुआ था.
इस सत्र में दोनों सदनों ने न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक और उससे जुड़े संविधान विधेयक को तकरीबन आम सहमति से पास किया, वहीं बीमा विधेयक को राज्यसभा ने प्रवर समिति को सौंप कर गहरी राजनीतिक असहमति का अहसास भी कराया है.
संसद के इस सत्र के शांति-सद्भाव और सहमति-असहमति से जुड़े कुछ सवाल भी उठे हैं, जिनके जवाबों मे भविष्य की राजनीति और प्रशासन की दिशा छिपी है. एक ओर संसदीय सद्भाव वापस हुआ है, वहीं राजनीति में टकराव के कुछ नए मोर्चे खुलते दिखाई पड़ रहे हैं.

आर्थिक उदारीकरण पर टकराव

इंश्योरेंस कानून में संशोधन को लेकर यूपीए और एनडीए के बीच टकराव व्यावहारिक राजनीति का है. सिद्धांततः दोनों पक्ष इंश्योरेंस में विदेशी निवेश को बढ़ाकर 49 फीसदी करना चाहते हैं. यह विधेयक यूपीए सरकार ने ही पेश किया था और पन्द्रहवीं लोकसभा ने इसे पास कर दिया था.
अभी श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर राजनीतिक विरोध होगा. यूपीए सरकार भी इन कानूनों को पास कराना चाहती थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहा कि दुनिया के देशों से कहें ‘कम एंड मेक इन इंडिया.’
मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में विदेशी निवेश के लिए देश के श्रम कानूनों में बदलाव की बड़ी शर्त है. इससे जुड़े बदलावों को लाने के पहले सरकार को अलोकप्रियता का सामना करने को तैयार होना होगा.
खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश के यूपीए सरकार के फ़ैसले को हालांकि मोदी सरकार ने वापस नहीं किया है, पर यह साफ कर दिया है कि इसे हम लागू नहीं करेंगे. डब्ल्यूटीओ में टीएफए करार पर हाथ खींचकर भी सरकार ने कमोबेश ऐसा ही काम किया है.

कांग्रेस का अंदरूनी संकट

कांग्रेस पार्टी अभी तक नेतृत्व के संकट से उबर नहीं पाई है. लोकसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करने वाले राहुल गांधी सदन में पीठे की सीट पर बैठते हैं. इधर 6 अगस्त को अचानक सदन में उन्होंने आक्रामक रुख अपना लिया.
सांप्रदायिक हिंसा पर बहस की मांग को लेकर उन्होंने न सिर्फ अपना रोष प्रकट किया, बल्कि अन्य सांसदों के साथ अध्यक्ष के आसन के क़रीब तक पहुंच गए. उन्होंने अध्यक्ष पर पक्षपात के आरोप भी लगाए.
यह आक्रामकता केवल एक दिन तक सीमित थी. अगले दिन से वे फिर खामोश हो गए. ऐसा माना जा रहा है कि इंश्योरेंस कानून पर पार्टी के भीतर दो राय हैं. लोकसभा में पार्टी यों भी संख्या के लिहाज़ से कमज़ोर है. नेतृत्व का असमंजस उसे और कमज़ोर कर रहा है.