Tuesday, June 10, 2014

असम्भव तो नहीं, पर है यह अविश्वसनीय-स्वप्न


संसद के दोनों सदनों के सामने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अभिभाषण में केंद्र की नई सरकार का आत्मविश्वास बोलता है। पिछली सरकार के भाषणों के मुकाबले इस सरकार के भाषण में वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण एक सचाई के रूप में सामने आता है, मजबूरी के रूप में नहीं। उसमें बुनियादी तौर पर बदलते भारत का नक्शा है। फिर भी इस भाषण को अभी एक राजनेता का सपना ही कह सकते हैं। इसमें एक विशाल परिकल्पना है, पर उसे पूरा करने की तज़बीज़ नजर नहीं आती। बेशक कुछ करने के लिए सपने भी देखने होते हैं। मोदी ने यह सपना देखा है तो सम्भव है वे अपने पुरुषार्थ से इसे पूरा करके भी दिखाएं। सम्भव है कि सारी कायनात इस सपने को पूरा करने में जुट जाएं। असम्भव तो कुछ भी नहीं है।

नरेंद्र मोदी जनता की कल्पनाओं को उभारने वाले नेता हैं। उनकी सरकार अपने हर कदम को रखने के पहले उसके असर को भी भाँप कर चलती है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर नज़र डालें तो उसमें देश के टेक्नोट्रॉनिक बदलाव की आहट है तो सामाजिक क्षेत्र में बदलाव का वादा भी है। महिलाओं के आरक्षण को प्रतीक बनाकर आधी आबादी की आकांक्षाओं को रेखांकित किया है तो हर हाथ को हुनर और हर खेत को पानी का भरोसा दिलाया गया है। यह भाषण मध्यवर्गीय भारत की महत्वाकांक्षाओं को भी परिलक्षित करता। देश में एक सौ नए शहरों का निर्माण, अगले आठ साल में हर परिवार को पक्का मकान, गाँव-गाँव तक ब्रॉडबैंड पहुँचाने का वादा और हाई स्पीड ट्रेनों के हीरक चतुर्भुज तथा राजमार्गों के स्वर्णिम चतुर्भुज के अधूरे पड़े काम को पूरा करने का वादा किया है। न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन के मंत्र जैसी शब्दावली से भरे इस भाषण पर नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत मुहर साफ दिखाई पड़ती है। ट्रेडीशन, टैलेंट, टूरिज्म, ट्रेड और टेक्नोलॉजी के 5-टी के सहारे ब्रांड-इंडिया को कायम करने की मनोकामना इसके पहले नरेंद्र मोदी किसी न किसी रूप में व्यक्त करते रहे हैं।

भारत के भव्य विकास का मोदी-स्वप्न

 सोमवार, 9 जून, 2014 को 21:11 IST तक के समाचार
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी
संसद के दोनों सदनों के सामने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अभिभाषण में केंद्र की नई सरकार का आत्मविश्वास बोलता है. पिछली सरकार के भाषणों के मुकाबले इस सरकार के भाषण में वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण एक सच्चाई के रूप में सामने आती है, मजबूरी के रूप में नहीं. उसमें बुनियादी तौर पर बदलते भारत का नक्शा है.
‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ के मंत्र जैसी शब्दावली से भरे इस भाषण पर नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत मुहर साफ़ दिखाई पड़ती है. ट्रेडीशन, टैलेंट, टूरिज्म, ट्रेड और टेक्नोलॉजी के 5-टी के सहारे ब्रांड-इंडिया को कायम करने की मनोकामना इसके पहले नरेंद्र मोदी किसी न किसी रूप में व्यक्त करते रहे हैं.
भाषण में कई जगह महात्मा गांधी का उल्लेख है- 1915 में भारत के महानतम प्रवासी भारतीय महात्मा गांधी भारत लौटे थे और उन्होंने भारत की नियति को ही बदल डाला. अगले वर्ष हम गांधी के भारत लौटने की शतवार्षिकी मनाएंगे और साथ ही ऐसे कदम भी उठाएंगे जिनसे प्रत्येक प्रवासी भारतीय का भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ हो और वे भारत के विकास में भागीदार बने.

सुनने में अच्छे लगते हैं

नरेंद्र मोदी का नारा है, 'पहले शौचालय, फिर देवालय'. राष्ट्रपति ने इसी तर्ज पर कहा, देश भर मे ‘स्वच्छ भारत मिशन’ चलाया जाएगा और ऐसा करना महात्मा गांधी को उनकी 150वीं जयंती पर हमारी श्रद्धांजलि होगी जो वर्ष 2019 में मनाई जाएगी.
भविष्य में सॉफ़्टवेयर के अलावा भारत को रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में एक विश्वव्यापी प्लेटफॉर्म के रूप में उभारने की सम्भावना को भी इस भाषण में रेखांकित किया है. भारत अभी तक रक्षा सामग्री के निर्यात से बचता रहा है.

Sunday, June 8, 2014

कैसे थामेगी महंगाई के तूफान को सरकार?

संसद के चालू सत्र में सरकार के सामने मुश्किलें नहीं है, पर कुछ समय बाद ही उसके सामने महंगाई को नाथने की जिम्मेदारी आएगी। इस साल मॉनसून देर से आया है और उसके कमज़ोर होने का खतरा भी है। सरकार किस तरह महंगाई का सामना करेगी? आज के अखबारों में कैबिनेट सचिव की बैठकों का जिक्र है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी लोकतांत्रिक झंझावात से गुजर रही है। उसके भीतर संकटं का सामना करने की कितनी सामर्थ्य है यह भी दिखाई पड़ रहा है। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक के पहले दिन का विवकण भी आज की सुर्खियों में है। आज के भास्कर ने विवेकानंद फाउंडेशन पर अच्छी रिपोर्ट दी है। वहीं टेलीग्राफ ने भारत-चीन रिश्तों में तिब्बत की प्रवासी सरकार की कसक पर अच्छी रपट दी है। हिंदू की वैबसाइट पर चंद्रबाबू नायडू का इंटरव्यू पढ़ने को मिला, जिसमें उन्होंने कहा है कि आंध्र की राजधानी विजयवाड़ा-गुंटूर के बीच कहीं बनेगी। यह दुनिया का सबसे अच्छा नियोजित नगर होगा और यह चेन्नई और हैदराबाद के साथ बुलेट ट्रेन से जुड़ेगा। दिल्ली में मोदी सरकार भी बुलेट ट्रेन को आने वाले समय का प्रतीक बनाकर चल रही है। 








We have to build from scrtach : Naidu


I have to fight for funds for Capital, special status’
“We will have our capital on the Vijayawada-Guntur stretch that will be the world’s best planned city, fully loaded with ultra modern facilities. I have even plans for introducing a bullet train to Chennai and Hyderabad.”
That is “hi-tech” N. Chandrababu Naidu, sharing his vision for the new capital of Andhra Pradesh, exclusively with The Hindu on the eve of his swearing-in as the first Chief Minister of a State which he insists “has to start from scratch.”
“Nothing is impossible if you have a clear vision of how you want your city to be. I have done it in Hyderabad and I will do it here. It will be much more than Singapore. It will be a hub of economic activities and a most favoured destination for investments, having the best connectivity. There will be no dearth of avenues for entertainment and social life,” he said.
Brimming with confidence, Mr. Naidu was unstoppable during a chat with this correspondent in his bullet- proof SUV as he travelled from Raj Bhavan to his home on Friday. “Having gained experience from the Hyderabad example, we will opt for dispersed development, transforming the upcoming capital region, Visakhapatnam and Tirupati into three mega cities and turn major corporations into hubs of investments giving a choice to investors. That is why I have invited top industrialists across the country for my swearing-in.”
पूरी खबर पढ़ें यहाँ

अब मोदी सरकार की परीक्षा


 

सोलहवीं लोकसभा के पहले सत्र का उद्देश्य नए सदस्यों को शपथ दिलाना और संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के अभिभाषण के मार्फत नई सरकार की प्राथमिकताओं पर चर्चा करना है। एक प्रकार से यह नई सरकार के कामकाज पर बहस का आग़ाज़ होगा। कल 9 जून को राष्ट्रपति का अभिभाषण होगा। और उसके बाद एक या दो दिन उस भाषण पर चर्चा होगी। चर्चा पर का उत्तर देते हुए प्रधानमंत्री जो कुछ बोलेंगे वही नई सरकार का एजेंडा होगा। एक माने में यह औपचारिकताओं और दूसरे माने में सैद्धांतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण सत्र है। इस संसदीय बहस की छाप हमें अगेले महीने पेश होने वाले बजट में दिखाई पड़ेगी। इस हफ्ते रिजर्व बैंक की ऋण एवं मौद्रिक नीति की दूसरी द्विमासिक समीक्षा में हालांकि ब्याज की दरें कम नहीं की गईं हैं, पर वैधानिक तरलता अनुपात को 0.50 प्रतिशत कम कर 22.50 प्रतिशत कर दिया है जिससे लगभग 50 हजार करोड़ की नकदी बाजार में आ जाएगी।

Saturday, June 7, 2014

आप का पत्र संग्राम

नरेंद्र मोदी की अपने सांसदों को सलाह, मोदी की विदेश यात्राओं का कार्यक्रम, शशि थरूर के मोदी को लेकर बयान पर कांग्रेस के भीतर की चर्चा के साथ-साथ आज के अखबारों में अरविंद केजरीवाल और नितिन गडकरी के केस की कवरेज भी है। इधर बंगाल में सीपीएम की कलह भी सामने आ रही है। आम आदमी पार्टी नकारात्मक या सकारात्मक दोनों कारणों से मीडिया में रहती है। इधर मनीष सिसोदिया की योगेंद्र यादव के नाम चिट्ठी सुर्खियों में है। इन चिट्ठियों को पढ़ने से इस बात का पता लगता है कि इस संगठन के भीतर लोकतंत्र की दशा क्या है और इसके फैसले किस तरह हुए होंगे। नीचे आप उस चिट्ठी का पूरा पाठ और योगेंद्र यादव की चिट्ठी को पढ़ें ताकि सनद रहेः-







योगेंद्र यादव के नाम मनीष सिसोदिया की चिट्ठी

Respected Yogendra Bhai!

Over the last 15 days, an ugly spat has developed between you and Naveen Jai Hind. The unfortunate part is that the two of you have been fighting your personal battles in public and through media forums. This is continuously damaging the party. What is even more unfortunate and sad is that you wanted disciplinary action taken against Naveen Jai Hind, and when you could not have your way, you dragged Arvind (Kejriwal) into the fight.

You have alleged that Arvind does not listen to the advice of the PAC. It is surprising to read this allegation in your email because Arvind has always supported you. Indeed, so long he was listening to you, you were full of praise for him. For example, your decision to contest from Gurgaon was opposed by many members of PAC. But Arvind not only supported you, he got everybody on board on your candidature. Arvind was democratic then. Even before that, when you wanted to be in-charge of Haryana and the party's chief ministerial candidate, several PAC members opposed it. Even then, Arvind had supported you, and in your eyes Arvind was democratic.

Thursday, June 5, 2014

अब संसद में होगा कांग्रेसी सेहत का पहला टेस्ट

 गुरुवार, 5 जून, 2014 को 08:09 IST तक के समाचार
राहुल गांधी, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह
पिछले साल जून में भाजपा के चुनाव अभियान का जिम्मा सम्हालने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से 'कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण' के लिए जुट जाने का आह्वान किया था.
उस समय तक वे अपनी पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नहीं बने थे. उन्होंने इस बात को कई बार कहा था.
सोलहवीं क्लिक करेंसंसद के पहले सत्र में मोदी सरकार की नीतियों पर रोशनी पड़ेगी. संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार का पहला नीतिपत्र होगा. इसके बाद बजट सत्र में सरकार की असली परीक्षा होगी.
एक परीक्षा कांग्रेस पार्टी की भी होगी. उसके अस्तित्व का दारोमदार भी इस सत्र से जुड़ा है. आने वाले कुछ समय में कुछ बातें कांग्रेस का भविष्य तय करेंगी. इनसे तय होगा कि कांग्रेस मज़बूत विपक्ष के रूप में उभर भी सकती है या नहीं.

सबसे कमज़ोर प्रतिनिधित्व

मोदी की बात शब्दशः सही साबित नहीं हुई लेकिन सोलहवीं लोकसभा में बिलकुल बदली रंगत दिखाई दे रही है. कांग्रेस के पास कुल 44 सदस्य हैं. पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की उम्र से एक ज्यादा. लोकसभा के इतिहास में पहली बार कांग्रेस इतनी क्षीणकाय है.

राहुल बाबा चाहते क्या हैं?

हिंदू में सुरेंद्र का कार्टून
इतनी लल्लो-चप्पो शायद ही किसी नेता की की गई होगी। राजनीति में हार-जीत लगी रहती है, पर मौके पर सही फैसला करने वाले ही सफल होते हैं। राहुल गांधी को नेतृत्व करना है, तो पूरी तरह करना चाहिए। नहीं करना है तो शांति से अलग हो जाना चाहिए। लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व किए बगैर वे किस तरीके की राजनीति करेंगे? सोलहवीं लोकसभा के पहले सत्र में वे कांग्रेस की सबसे पिछलीं बेंच में बैठे।

 कांग्रेस के भीतर असंतोष है, यह बात उजागर होने लगी है। दिल्ली में टूट-फूट का अंदेशा है। पार्टी की केरल शाखा केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ प्रस्ताव पास करने जा रही थी। आज के जागरण में छपी खबर से ऐसा लगता है कि दिल्ली में बची-खुची कसर पूरी होने वाली है। आज की कतरनों पर एक नजर

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Tuesday, June 3, 2014

रक्षा में विदेशी निवेश के अलावा विकल्प ही नहीं है

इस हफ्ते 4 जून से शुरू हो रहे संसद के पहले सत्र में नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों पर रोशनी पड़ेगी. संसद के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति का अभिभाषण इस सरकार का पहला नीतिपत्र होगा. सरकार के सामने फिलहाल तीन बड़ी चुनौतियाँ हैं. महंगाई, आर्थिक विकास दर बढ़ाने और प्रशासनिक मशीनरी को चुस्त करने की. मंहगाई को रोकने और विकास की दर बढ़ाने के लिए सरकार के पास खाद्य सामग्री की सप्लाई और विदेशी निवेश बढ़ाने का रास्ता है. सरकार एफसीआई के पास पड़े अन्न भंडार को निकालने की योजना बना रही है. इस साल मॉनसून खराब होने का अंदेशा है, इसलिए यह कदम जरूरी है.

तेलंगाना में झगड़े अभी और भी हैं

छोटे राज्य बनने से विकास का रास्ता खुलेगा या नहीं यह बाद में देखा जाएगा अभी आंध्र के विभाजन की पेचीदगियाँ सिर दर्द पैदा करेंगी। तेलंगाना का जन्म अटपटे तरीके से हुआ है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड का जन्म जितनी शांति से हुआ वैसा यहाँ नहीं है। कांग्रेस ने तेलंगाना बनाने का आश्वासन देकर 2004 का चुनाव तो जीत लिया, पर अपने लिए गले की हड्डी मोल ले ली, जिसने उसकी जान ले ली। एक माने में यह देश की सबसे पुरानी माँग है। अलग राज्य तेलंगाना बनाने की माँग देश के पुनर्गठन का सबसे महत्वपूर्ण कारक बनी थी। 1953 में पोट्टी श्रीरामुलु की आमरण अनशन से मौत के बाद तेलुगुभाषी आंध्र का रास्ता तो साफ हो गया था, पर तेलंगाना इस वृहत् आंध्र योजना में जबरन फिट किया गया। भाषा के आधार पर देश का पहला राज्य आंध्र ही बना था, पर उस राज्य को एक बनाए रखने में भाषा मददगार साबित नहीं हुई। राज्य पुनर्गठन आयोग की सलाह थी कि हैदराबाद को विशेष दर्जा देकर तेलंगाना को अलग राज्य बना दिया जाए और शेष क्षेत्र अलग आंध्र बने। नेहरू जी भी आंध्र और तेलंगाना के विलय को लेकर शंकित थे। उन्होंने शुरू से ही कहा था कि इस शादी में तलाक की संभावनाएं बनी रहने दी जाएं। और अंततः तलाक हुआ।

हड़बड़ी में बना राज्य
पन्द्रहवीं लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन तक इसकी जद्दो-जेहद चली। शोर-गुल, धक्का-मुक्की मामूली बात थी। सदन में पैपर-स्प्रे फैला, किसी ने चाकू भी निकाला। टीवी ब्लैक आउट किया गया। और अभी तय नहीं है कि शेष बचे राज्य का नाम सीमांध्र होगा या कुछ और। उसके मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू 8 जून को कहाँ शपथ लेंगे, विजयवाडा में या गुंटूर में। कर्मचारियों के बँटवारे का फॉर्मूला इस रविवार को ही बन पाया है। दोनों राज्यों की सम्पत्ति, जल तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों का बँटवारा समस्याएं पैदा करेगा।
हैदराबाद शहर दोनों राज्यों की राजधानी का काम करेगा, पर इससे तमाम समस्याएं खड़ी होंगी। नई राजधानी बनाने के लिए दस साल का समय है, पर उसके पहले भौगोलिक समस्याएं हैं। व्यावहारिक रूप से हैदराबाद तेलंगाना में है। तेलंगाना के समर्थक हैदराबाद को अपनी स्वाभाविक राजधानी मानते हैं, क्योंकि भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से यह शहर तेलंगाना की राजधानी रहा है। शेष आंध्र या सीमांध्र किसी भी जगह पर हैदराबाद से जुड़ा नहीं है। उसकी सीमा हैदराबाद से कम से कम 200 किलोमीटर दूर होगी। हैदराबाद राज्य का सबसे विकसित कारोबारी केन्द्र है। अब किसी नए शहर का विकास करने की कोशिश होगी तो उसमें काफी समय लगेगा। अविभाजित आंध्र प्रदेश का तकरीबन आधा राजस्व इसी शहर से आता है। सीमांध्र के पास इस किस्म का औद्योगिक आधार बनाने का समस्या है। यहाँ के कारोबारियों में ज्यादातर लोग गैर-तेलंगाना हैं।

प्राकृतिक साधनों का झगड़ा
केवल हैदराबाद की बात नहीं है, छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों के लेकर भी विवाद हैं। तेलंगाना के शहरों में रहने वाली बड़ी आबादी की भावनाएं सीमांध्र से जुड़ी हैं। भविष्य की राजनीति में यह तत्व महत्वपूर्ण साबित होगा। चंद्रबाबू नायडू के तेलगुदेशम का प्रभाव तेलंगाना में भी है। पानी के ज्यादातर स्रोत तेलंगाना से होकर गुजरते हैं। कृष्णा और गोदावरी दोनों नदियां तेलंगाना से आती हैं, जबकि ज्यादातर खेती सीमांध्र में है। तेलंगाना के गठन के समय सीमांध्र को विशेष पैकेज देने की बात कही गई थी। यह पैकेज कैसा होगा, इसे लेकर विवाद खड़ा होगा। इधर पोलावरम बाँध को लेकर विवाद शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने इस परियोजना के लिए खम्मम जिले के कुछ गांव सीमांध्र को देने का विरोध किया है, जबकि सरकार ने इन गांवों को लेकर अध्यादेश जारी किया है।
राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित

Sunday, June 1, 2014

भारत के पड़ोस का महत्व

इस साल मॉनसून के देर से आने का अंदेशा है. बारिश कम हुई या असंतुलित हुई तो खेती-बाड़ी से जुड़े लोगों के सामने संकट पैदा हो जाएगा और अकाल के कारण पूरी अर्थ-व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. यह खतरा सिर्फ भारत के सिर पर नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया पर है. खासतौर से भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान इसके शिकार होंगे. हम आतंकवाद को बड़ा खतरा समझते हैं और एक हद तक वह है भी. पर हमारे सामने खतरे दूसरे भी हैं. आतंकवाद और कट्टरपंथ भी अशिक्षा, नासमझी और गरीबी की देन है. इस किस्म के अनेक खतरे हम सब के सामने हैं. पर्यावरण और प्राकृतिक आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को नहीं देखतीं. इन आपदाओं के बरक्स हमारे पास ऐसे अनुभव भी हैं जब इंसान ने सामूहिक प्रयास से इन पर काबू पाया. पिछले साल भारत के पूर्वी तट पर आए फाइलिन तूफान के कारण भारी नुकसान का अंदेशा था, पर मौसम विज्ञानियों को अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों की मदद से सही समय पर सूचना मिली और आबादी को सागर तट से हटा लिया गया. 1999 के ऐसे ही एक तूफान में 10 हजार से ज्यादा लोग मरे थे. अंतरिक्ष की तकनीक के साथ जुड़ी अनेक तकनीकों का इस्तेमाल चिकित्सा, परिवहन, संचार यहाँ तक कि सुरक्षा में होता. विज्ञान की खोज की सीढ़ियाँ हैं. पर क्या हम इन सीढ़ियों पर चलना चाहते हैं?

पीएमओ का सक्रिय होना

सरकार क्या करेगी और कितनी सफल होगी, कहना मुश्किल है, पर पीेमओ अब सक्रिय हुआ है और सरकार को दिशा दे रहा है, इसमें दो राय नहीं। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स के रास्ते को त्याग कर सरकार ने अपने काम को पुरानी परम्परा से जोड़ा है। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की व्यवस्था भी हमें ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था से मिली है, पर उस व्यवस्था में ऐसे ग्रुप की ज़रूरत कभी-कभार पड़ती है।यूपीए सरकार ने अपनी छवि सुधारने और प्रेस को ब्रीफ करने जैसे काम के लिए जीओएम बना दिए थे और बाकी काम राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) को दे दिए। इससे सरकार निकम्मी हो गई। इस तरह के ग्रुपों की शुरूआत 1989 में केन्द्र में बहुदलीय सरकार बनने के बाद शुरू ही थी। एनडीए के कार्यकाल में 32 जीओएम बनाए गए और यूपीए-1 के कार्यकाल में 40। यूपीए-2 में बने समूहों की संख्या 200 तक बताते है। तमाम मसलों पर अलग-अलग राय होने के कारण आम सहमति बनाने के लिए मंत्रियों के छोटे ग्रुपों की ज़रूरत महसूस हुई। लगभग इसी वजह से संसदीय व्यवस्था में कैबिनेट की जरूरत पैदा हुई थी। जब तक ताकतवर प्रधानमंत्री होते थे तब तक कैबिनेट प्रधानमंत्री के करीबी लोगों की जमात होती थी। इससे व्यक्ति का रुतबा और रसूख जाहिर होता था। पर यूपीए के कार्यकाल में ये ग्रुप गठबंधन धर्म की मजबूरी और फैसले करने से घबराते नेतृत्व की ओर इशारा करने लगे। फिलहाल वर्तमान सरकार की गति तेज है। पर अभी तक यह कार्यक्रम तय करने के दौर में है। कार्यक्रम बनाना मुश्किल काम नहीं है। उनपर अमल करना दिक्कततलब होता है। कुछ समय बाद इस सरकार के कौशल का पता भी लग जाएगा।

नई सरकार कैसी होगी, यह बात एक हफ्ते के कामकाज को देखकर नहीं बताई जा सकती, पर उसकी गति तेज होगी और वह बड़े फैसले करेगी यह नज़र आने लगा है। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के पहले ही उसकी धमक दिल्ली की गलियों में सुनाई पड़ने लगी थी। सोमवार को शपथ ग्रहण समारोह हुआ। मंगलवार को नवाज शरीफ से बातचीत। बुधवार को अध्यादेश की मदद से भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण(ट्राई) के पूर्व अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र को प्रधान सचिव नियुक्त किया। नई सरकार का यह पहला अध्यादेश था। उसे लेकर राजनीतिक क्षेत्रों में विरोध व्यक्त किया गया है, पर मोदी सरकार ने इतना स्पष्ट किया कि फैसला किया है तो फिर संशय कैसा। ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद कई अन्य अफसर पीएमओ में आएंगे। स्वाभाविक है कि भरोसे के अफसर होने भी चाहिए। अलबत्ता यह याद दिलाया जा सकता है कि मनमोहन सिंह के पीएमओ के अफसरों की नियुक्ति में भी फैसले उनके नहीं थे। ऐसा नहीं लगता कि देश की नीतियों मे कोई बुनियादी बदलाव आने वाला है, पर इतना जरूर लगता है कि काम के तरीके में बुनियादी बदलाव आ चुका है।

Friday, May 30, 2014

हिंदी पत्रकारिता की साख बचाने का सवाल

188 साल की हिंदी पत्रकारिता का खोया-पाया, बता रहे हैं प्रमोद जोशी

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
हिंदी से जुड़े मसले, पत्रकारिता से जुड़े सवाल और हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियां किसी एक मोड़ पर जाकर मिलती हैं। कई प्रकार के अंतर्विरोधों ने हमें घेरा है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह कारोबार जिस लिहाज से बढ़ा है उस कदर पत्रकारिता की गुणवत्ता नहीं सुधरी। मीडिया संस्थान कारोबारी हितों को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, पर पाठकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभा नहीं पाते हैं। इस बिजनेस में परम्परागत मीडिया हाउसों के मुकाबले चिटफंड कंपनियां, बिल्डर, शिक्षा के तिज़ारती और योग-आश्रमों तथा मठों से जुड़े लोग शामिल होने को उतावले हैं, जिनका उद्देश्य जल्दी पैसा कमाने के अलावा राजनीति और प्रशासन के बीच रसूख कायम करना है। हिंदी का मीडिया स्थानीय स्तर पर छुटभैया राजनीति के साथ तालमेल करता हुआ विकसित हुआ है।
हाल के वर्षों में अखबारों पर राजनीतिक झुकाव, जातीय-साम्प्रदायिक संकीर्णता और मसाला-मस्ती बेचने का आरोप है। उन्होंने गम्भीर विमर्श को त्याग कर सनसनी फैलाना शुरू कर दिया है। उनके संवाद संकलन में खोज-पड़ताल, विश्लेषण और सामाजिक प्रश्नों की कमी होती जा रही है। निष्पक्ष और स्वतंत्र टिप्पणियों का अभाव है, बल्कि अक्सर वह महत्वपूर्ण प्रश्नों पर अपनी राय नहीं देता। जीवन, समाज, राजनीति और प्रशासन पर उसका प्रभाव यानी साख कम हो रही है। मेधावी नौजवानों को हम इस व्यवसाय से जोड़ने में विफल हैं।
हिंदी का पहला अखबार 1826 में निकला और एक साल बाद ही बन्द हो गया। कानपुर से कलकत्ता गए पंडित जुगल किशोर शुक्ल के मन में इस बात को लेकर तड़प थी कि बांग्ला और फारसी में अखबार है। हिंदी वालों के हित के हेत में कुछ होना चाहिए। इस बात को 188 साल हो गए। हम ‘उदंत मार्तंड’ के प्रकाशन का हर साल समारोह मनाते हुए यह भूल जाते हैं कि वह अखबार बंद इसलिए हुआ क्योंकि उसे चलाने लायक समर्थन नहीं मिला। पं जुगल किशोर शुक्ल ने बड़ी कड़वाहट के साथ अपने पाठकों और संरक्षकों को कोसते हुए उसे बंद करने की घोषणा की थी। आज इस कारोबार में पैसे की कमी नहीं है। पर पाठक से कनेक्ट कम हो रहा है।

Thursday, May 29, 2014

टाइम के कवर पर विज्ञापन, यानी हंगामा हो गया




 

भारत के पाठकों को यह जानकारी निरर्थक लगेगी कि अमेरिका की प्रसिदध पत्रिका टाइम के कवर पेज पर छोटा सा विज्ञापन छपने लगा है। पत्रिका की प्रकाशक संस्था टाइम इनकॉरपोरेट ने टाइम और स्पोर्ट्स इलस्ट्रेटेड इन दो पत्रिकाओं के कवर पेज पर विज्ञापन लेना शुरू कर दिया है। भारत में दैनिक अखबारों के पहले सफे के पहले चार-चार पेज के जैकेट देखने के आदी भारतीय पाठकों के विस्मय होगा कि अमेरिका में इस नई परम्परा को लेकर बहस शुरू हो गई है। वहाँ की पत्रकारिता में इसे परम्परा तोड़ना माना जा रहा है। पत्रिकाओं को बचाने की कोशिश में इसे एक कदम माना जा रहा है, पर मीडिया से जुड़े लोगों का कहना है कि यह विज्ञापन कल कितना बड़ा हो जाएगा कौन जाने? अब देखना यह है कि इससे सीख कितनी पत्रिकाएं लेती हैं। बाईं ओर प्रकाशित चित्र में नया कवर है और  नीचे उस विज्ञापन का कुछ बड़ा करके दिखाया गया चित्र।



इस विषय पर विवरण पढ़ें यहाँ

इसी विषय से जुड़ा न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित समाचार पढ़ें यहाँ


Wednesday, May 28, 2014

और अब चुनौतियाँ

बादल छँटने के बाद अर्थव्यवस्था की वास्तविकता से सामना हिंदू में केशव का कार्टून

सरकार अब काम-काज के मोड में आ रही है। शपथ-ग्रहण समारोह के बाद दक्षेस के सात देशों और मॉरिशस के प्रतिनिधियों के आगमन ने माहौल को सरगर्म बना दिया। खासतौर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की यात्रा से विमर्श का स्तर अच्छा हो गया। भारतीय मीडिया में पाकिस्तानी विशेषज्ञों ने आकर इस बातचीत को सार्थक बनाया। लगता है भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की सरकारें मीडिया की बातों को घुमाने की प्रवृत्ति से घबराती हैं। कल विदेश सचिव सुजाता सिंह जिस तरह शब्दों को चुन-चुनकर बोल रहीं थीं, उससे लगता था कि उन्हें इस बात की घबराहट थी कि कहीं कुछ गलत मुँह से न निकल जाए। नवाज शरीफ ने अपना बयान पढ़कर सुनाया। उनकी ब्रीफिंग में सवाल-जवाब नहीं हुए। पर इतना तय है कि कुछ होता हुआ लग रहा है। क्या यह सरकार काम करेगी? इस बात के जवाब के लिए कुछ समय इंतज़ार करें, पर स्मृति ईरानी की पढ़ाई और जितेन्द्र सिंह के अनुच्छेद 370 वाले बयान ने विवादों की शुरूआत कर दी है। मीडिया से अपेक्षा थी कि वह वह कुछ महत्वपूर्ण नेताओं की शिक्षा के बारे में बताता मसलन के कामराज, जयललिता, राबड़ी देवी या सोनिया गांधी की शैक्षिक पृष्ठभूमि के बारे में बताया जाता। उपरोक्त नेताओं ने समय आने पर अपनी योग्यता को साबित किया। इस सरकार से काले धन को लेकर अपेक्षाएं हैं और कैबिनेट ने एक विशेष जाँच दल बनाने का फैसला किया है। रोचक बात है कि पिछली यूपीए सरकार ने सत्ता में आखिरी दिन तक इस जाँच दल को बनाने का विरोध किया था। सरकार ने पहला कदम उठाया है इसकी तार्किक परिणति सामने आने में समय लगेगा। देखना है कि स्विस सरकार के साथ सूचनाएं देने वाले समझौते की स्थिति क्या है। आज के टेलीग्राफ में राधिका रमाशेसन की खबर अच्छी है कि स्मृति, अरुण और निर्मला के नामों की चर्चा क्यों हो रही है।






Tuesday, May 27, 2014

मोदी के शपथ ग्रहण की भड़कीली कवरेज

नरेंद्र मोदी का शपथ ग्रहण समारोह जबर्दस्त मीडिया ईवेंट साबित होना ही था। पर पत्रकारों की समझदारी इस बात में थी कि वे अंतर्विरोधों को कितनी बारीकी से पकड़ते हैं। हिंदी के ज्यादातर अखबारों ने भक्तिभाव से कवरेज की और ज्यादा प्रभाव डिजाइन से डालने की कोशिश की। मास्टहैड की तस्वीर को लेकर कोई रचनात्मक योजना दिखाई नहीं पड़ी। ज्यादातर मुहावरे राजतिलक, राज्याभिषेक तक सीमित हैं। इनसे तो एक्सप्रेस का He Signs in बेहतर है। अंतर्कथाएं भी नहीं हैं। खबरों में भी दिल्ली के एक्सप्रेस और कोलकाता के टेलीग्राफ में नयापन था। खासतोर से टेलीग्राफ में शंकर्षण ठाकुर की रपट। अलबत्ता पाकिस्तान के अखबारों ने आज इस खबर को जैसा महत्व दिया है, वह ध्यान खींचता है। आज की कुछ कतरनें





The Telegraph



Indian Express

Pakistan