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| ग्रैफिक: टाइम्स नाउ से साभार |
होर्मुज़ जलसंधि का रास्ता बंद होने और भारत में ऊर्जा-संकट के बादल गहराने से जुड़ी खबरों के बीच एक खबर को ज्यादा सुर्खियाँ नहीं मिल पाईं कि भारत, गहरे समुद्र में एक गैस पाइपलाइन परियोजना पर विचार कर रहा है, जो हमें ओमान से जोड़ेगी। भारत सरकार ने अब इसपर तेजी से काम करना शुरू किया है, जिसके परिणामों का इंतजार है।
हाल में कुछ मीडिया स्रोतों ने पेट्रोलियम
मंत्रालय के एक अधिकारियों को उद्धृत करते हुए खबर दी है कि मंजूरी मिली, तो करीब 4.8
अरब डॉलर की लागत से बनने वाली परियोजना खाड़ी क्षेत्र से निर्बाध गैस आपूर्ति
सुनिश्चित करेगी। परियोजना को समय से हरी झंडी मिली, तब भी इसे पूरा होने में पाँच
से सात साल लगेंगे। उसके पहले इसके सभी आर्थिक और तकनीकी पहलुओं पर विचार करना भी
ज़रूरी होगा।
सौ साल से ज्यादा समय से इसकी परिकल्पना चल रही है। इसपर यूपीए सरकार के दौर में भी बात चली थी। ओमान की वैबसाइट ‘मस्कट डेली’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार नई दिल्ली स्थित निजी क्षेत्र के कंसोर्शियम साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (सेज) द्वारा प्रस्तुत पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन पर विचार कर रही है, जो समुद्र तल की स्थितियों का अध्ययन करने के लिए ‘टेस्ट-सेक्शन’ बिछा रहा है।
‘सेज’ ने प्रस्तावित मार्ग पर लगभग 3,000 मीटर परीक्षण पाइपलाइन बिछाकर प्रारंभिक चरण का तकनीकी सत्यापन कर
लिया है, जिस पर लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत आई है। यह पाइपलाइन इंजीनियरों के
लिए चुनौती भी होगी, क्योंकि कुछ जगहों पर यह करीब साढ़े तीन किलोमीटर तक की गहराई
पर बिछानी पड़ेगी, जो अब तक
समुद्र के नीचे बिछाई गई दुनिया की किसी भी पाइपलाइन की तुलना में चार गुना अधिक
गहरी होगी।
इस अध्ययन का उद्देश्य समुद्र तल की स्थितियों
का आकलन करना और इंजीनियरिंग संभावनाओं की पुष्टि करना है। संभावना है कि भारत का पेट्रोलियम
मंत्रालय, सरकारी कंपनियों गेल, इंजीनियर्स इंडिया और इंडियन
ऑयल कॉर्पोरेशन को विस्तृत व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश देगा।
रिपोर्ट सकारात्मक हुई, तो ओमान के साथ गैस आपूर्ति, वित्तपोषण
और परियोजना कार्यान्वयन पर औपचारिक बातचीत का रास्ता खुलेगा।
पश्चिम एशिया से भारत तक समर्पित पाइपलाइन बनी,
तो हम किसी ट्रांज़िट देश या समुद्री अवरोध बिंदु पर निर्भर नहीं रहेंगे और
किफायती लागत पर गैस की आपूर्ति लगातार जारी रहेगी। मिडिल-ईस्ट-इंडिया डीप-वाटर
पाइपलाइन (एमईआईडीपी) अरब सागर के नीचे लगभग 2,000 किलोमीटर तक लंबी होगी, जो ओमान को भारत के गुजरात तट से जोड़ेगी। इस परियोजना से भारत को ओमान,
संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और कतर से गैस आपूर्ति प्राप्त
करने में मदद मिलेगी।
2025 में भारत के एलएनजी आयात का लगभग दो-तिहाई
हिस्सा होर्मुज़ जलसंधि से होकर गुजरा था। इस साल फरवरी के अंत में होर्मुज़ संकट
शुरू होने के बाद, वैश्विक एलएनजी आपूर्ति में 20 प्रतिशत से
अधिक की गिरावट आई, जिससे कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई। इस
गिरावट के कारण भारत के उर्वरक संयंत्रों, बिजलीघरों और उद्योगों
की आपूर्ति में अचानक लगे झटकों ने चिंता पैदा की है। खनिज तेल की ऊँची कीमतों ने
आयात लागत को पहले ही बढ़ा दिया है।
इस पृष्ठभूमि में, टैंकरों
पर निर्भरता को कम करने और प्राकृतिक गैस का स्थिर प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए दशकों
पुरानी इस परियोजना को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इस परियोजना से प्रतिदिन लगभग 31 मिलियन मानक घन मीटर (एमएमएससीएमडी) प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होने की
उम्मीद है। वर्तमान राष्ट्रीय गैस खपत लगभग 190 से 195 मिलियन मानक घन मीटर
प्रतिदिन है, जो औद्योगिक और शहरी गैस नेटवर्क के विस्तार और
उर्वरक क्षेत्र की माँग में वृद्धि पर भी निर्भर है। 2030 तक, यह माँग 290 से 300 मिलियन वर्ग मीटर प्रतिदिन तक पहुँचने का अनुमान है।
भारत को खाड़ी देशों
से जोड़ने वाली समुद्री पाइपलाइन की अवधारणा नई नहीं है। 1990 के दशक से इस प्रस्ताव के विभिन्न रूप
समय-समय पर सामने आते रहे हैं, लेकिन द्विपक्षीय वार्ता की जटिलता, वित्तपोषण की अनिश्चितता और अपर्याप्त राजनीतिक उत्साह
के कारण वे ठंडे बस्ते में चले गए। बहरहाल इसबार की पहल तीन
कारणों से उत्साहवर्धक है। एक, समुद्र में पाइप बिछाने की तकनीक में काफी प्रगति हुई
है। पर्याप्त भू-राजनीतिक झटकों की वजह से राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा हो गई है, और तीसरे,
सरकारी संस्थाओं को काम के औपचारिक निर्देश मिले हैं। यह परियोजना अब केवल
सैद्धांतिक मनोकामना नहीं है, बल्कि सक्रिय इंजीनियरिंग और डिप्लोमैटिक प्रयास है।
इस पाइपलाइन की संरचना से भारत को ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और कतर से प्राकृतिक गैस
प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है। इन देशों के पास सामूहिक रूप से लगभग 2,500
ट्रिलियन घन फुट प्राकृतिक गैस का भंडार है। कतर के पास लगभग 868 ट्रिलियन घन फुट और
ईरान के पास लगभग 1,649 ट्रिलियन घन फुट का भंडार है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की तुलना चीन से करें, तो
पाएँगे कि चीन ने अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ समय रहते उठा लिया है। भारत, जहाँ
लगभग पूरी तरह से समुद्री पोतों से आने वाली एलएनजी पर निर्भर है, वहीं चीन ने व्यवस्थित रूप से भूमि और क्षेत्रीय पाइपलाइन गलियारों का एक
नेटवर्क बना लिया है। इसके कारण वह होर्मुज़ पाइपलाइन के व्यवधान से काफी हद तक सुरक्षित
हो गया है।
चीन की पावर ऑफ साइबेरिया पाइपलाइन, जो दिसंबर 2019 से चालू है, पूरी क्षमता से रूस के
साइबेरिया गैस क्षेत्रों से प्रति वर्ष 38 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) तक गैस की
आपूर्ति करती है। उसकी दूसरी पाइपलाइन, पावर ऑफ साइबेरिया 2
है, जिसकी प्रस्तावित क्षमता 50 बीसीएम प्रति वर्ष है। वह मंगोलिया
से होकर आएगी, पर अभी उसपर बातचीत चल रही है।
इसके अलावा तुर्कमेनिस्तान से चीन का मध्य
एशियाई पाइपलाइन नेटवर्क, तीन समानांतर लाइनों के माध्यम से 55 बीसीएम प्रति वर्ष
गैस की ढुलाई करता है। चौथी लाइन निर्माणाधीन है जो कुल क्षमता को 85 बीसीएम प्रति
वर्ष तक बढ़ा देगी। चीन की पाइपलाइनें, वैश्विक-बाजार में एलएनजी के दाम गिराएँगी,
जो भारत के लिए अच्छी बात होगी।
भारत और चीन की भंडारण क्षमता में बड़ा अंतर है।
भारत में 22 से 24 एलएनजी भंडारण टैंकों में लगभग 2 से 2.5 अरब घनमीटर गैस का
भंडार है, जो राष्ट्रीय गैस खपत के 10 से 12 दिनों के बराबर
है। वहीं, चीन 2026 के अंत तक लगभग 80 अरब घनमीटर भंडारण
क्षमता हासिल करने की राह पर है , जो उसकी वार्षिक खपत का
लगभग 20 प्रतिशत है।
भारत के पड़ोस में रूस जैसा पेट्रोलियम-धनी देश
नहीं है, पर अतीत में पाकिस्तान के रास्ते तुर्कमेनिस्तान और ईरान से पाइपलाइनें
बिछाने की परियोजनाओं पर काम हुआ था, पर वे बन नहीं पाईं। भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षा चुनौतियों के कारण
दशकों से प्रस्तावित 1800 किलोमीटर लंबी तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान,
पाकिस्तान-इंडिया (तापी) पाइपलाइन नहीं बन पाई। यह पाइपलाइन करीब 33 अरब घनमीटर गैस
का परिवहन करती।
दूसरी पाइपलाइन
थी ईरान-पाकिस्तान-इंडिया (आईपीआई) लाइन। भारत ने भू-राजनीतिक कारणों और अमेरिकी
प्रतिबंधों के दबाव में खुद को इस परियोजना से लगभग अलग कर लिया। पाकिस्तान ने
अकेले ईरान के साथ इस समझौते को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन वह भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ठप है।
भारत ने खनिज तेल का एक दीर्घकालीन भंडार ढाँचा
बना लिया है, पर गैस-भंडारण की विशाल अवसंरचना मौजूद नहीं है। अमेरिका-चीन व्यापार
युद्ध और पश्चिम एशिया की लड़ाई के कारण, हमारी ऊर्जा सुरक्षा, जोखिम में पड़ गई
है। यह पाइपलाइन आशा की एक किरण बन सकती है।

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