Thursday, May 14, 2026

अमेरिका-ईरान ‘अनिर्णीत’ युद्ध


पश्चिम एशिया की लड़ाई को तीन महीने पूरे हो गए हैं, और वह पूरी तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक महीने से ज्यादा चली ताबड़तोड़ बमबारी से इस इलाके के देशों का काफी नुकसान हुआ है, पर समस्या का कोई स्थायी समाधान नज़र आता दिखाई नहीं पड़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों ने होर्मुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप्प होने का खतरा पैदा हो गया है। इस दौरान पाकिस्तान में दोनों पक्षों की वार्ता के बाद उसके दूसरे दौर की नौबत ही नहीं आई है। उधर अमेरिका का साथ देने वाले देशों की संख्या कम होती जा रही है।

राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि हमने ईरान की कमर तोड़ दी है, पर वास्तविकता कुछ और नज़र आती है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी इंटेलिजेंस के हवाले से खबर दी है कि, इस महीने की शुरुआत में किए गए गोपनीय आकलन से पता चलता है कि ईरान ने अपने ज्यादातर मिसाइल स्थलों, लॉन्चरों और भूमिगत सुविधाओं तक दोबारा पहुँच हासिल कर ली है, और इस संबंध में ट्रंप प्रशासन द्वारा सार्वजनिक रूप से ईरान की सेना को बिखरी हुई स्थिति में चित्रित करना अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा नीति निर्माताओं को बंद दरवाजों के पीछे बताई जा रही जानकारी से बिल्कुल विपरीत है।

रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के किनारे स्थित अपने 33 मिसाइल स्थलों में से 30 तक परिचालन पहुंच बहाल कर दी है, जिससे संकरे जलमार्ग से गुजरने वाले अमेरिकी युद्धपोतों और तेल टैंकरों को खतरा हो सकता है। इन सूचनाओं से अलग-अलग स्थलों पर हुए नुकसान के स्तर के आधार पर पता लगता है, कि ईरानी इन स्थलों के अंदर मौजूद मोबाइल लॉन्चरों का उपयोग करके मिसाइलों को अन्य स्थानों पर ले जा सकते हैं।

आकलनों के अनुसार, ईरान के पास अभी देश भर में लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर तैनात हैं और उसने युद्ध-पूर्व मिसाइल भंडार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बरकरार रखा है। इस भंडार में बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं, जो क्षेत्र के अन्य देशों को निशाना बना सकती हैं, और क्रूज मिसाइलों की एक छोटी आपूर्ति भी है, जिनका उपयोग जमीन या समुद्र पर कम दूरी के लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है।

सीधा युद्ध

यों तो लंबे अर्से से इस इलाके में 'छाया युद्ध' चल रहा था, पर 28 फरवरी से शुरू हुए हमलों ने इसे 'छाया युद्ध' से सीधे युद्ध में बदल दिया है। इस दौरान अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई के मारे जाने के बाद तनाव और बढ़ गया है। लड़ाई के दौरान अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले बोले, तो ईरान और उसके समर्थक हूतियों (यमन), हिज़बुल्ला (लेबनान), और अन्य समूहों ने इसराइल तथा अमेरिकी ठिकानों (कतर, बहरीन, कुवैत) को निशाना बनाया।

यह संघर्ष गज़ा, लेबनान, ईरान, इराक, यमन और होर्मुज जलसंधि तक फैला हुआ है। स्थायी युद्धविराम के प्रयासों के साथ-साथ तनाव बरकरार है। इसराइल लेबनान/गज़ा में लगातार हमले कर रहा है। उधर ईरान-अमेरिका के बीच डिप्लोमेसी की कोशिशें चल रही हैं, जिनका परिणाम सामने नहीं आया है। इस लड़ाई की वजह से वैश्विक तेल कीमतें, शिपिंग और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान ने तेल टैंकरों और रिफाइनरियों (जैसे यूएई का फुजइराह) को निशाना बना, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मच गई है। इस संकट से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को भी सीधे खतरा पैदा हो गया है। अमेरिका ने श्रीलंका के तट के पास एक ईरानी युद्धपोत आइरिस डेना को डुबा दिया, जिससे लड़ाई भारत के समुद्री पड़ोस तक पहुँच गई है।

लंबा दाँव

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है। लगता है कि भानुमती के पिटारे की तरह एक के बाद एक नई चीजें सामने आ रही हैं और अभी आएँगी। उनका यह ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे गया है, जिनमें अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। लड़ाई की शुरुआत में ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा करना होगा। यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है।’ अब ट्रंप इस किस्म की बातें नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस समय ज्यादातर बातें ईरान की नाभिकीय-शक्ति और होर्मुज़ जलसंधि से आवागमन पर आ गई हैं। 

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है। हो सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत रखता है। बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रही और अब अमेरिका को चुनौती दे रही है।

ईरान में रेजीम चेंज

पिछले कुछ वर्षों से कहा जा रहा था कि क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन किया जा सकेगा, जिसका दावा डॉनल्ड ट्रंप कर रहे हैं। ऐसा नहीं हो पाया, तब और हो गया तब भी अनिश्चय के बादल छँटने में समय लगेगा। इस इलाके में लड़ाई होने का मतलब है, पेट्रोलियम आपूर्ति में व्यवधान। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले टैंकरों को रोक दिया है, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर चली गई हैं।  

इसराइली सूत्रों के अनुसार हमले की तारीख पर दो हफ्ते पहले ही सहमति बन गई थी। इसका फैसला हमले के दो दो हफ्ते पहले नेतन्याहू की वाशिंगटन यात्रा के दौरान कर लिया गया था। ट्रंप को उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में ईरानी धार्मिक सत्ता को समाप्त कर देंगे। हालाँकि इस इलाके में ईरान पहले से काँटे की तरह चुभ रहा था, पर 7 अक्तूबर 2023 की हमास की कार्रवाई के बाद वह पूरी तरह निशाने पर आ गया। यह वह वक्त था, जब अरब देशों का इसराइल के साथ कोई महत्त्वपूर्ण समझौता होने जा रहा था। उस समझौते में हमास के हमले ने पलीता लगा दिया। इसके पीछे ईरान का हाथ दिखाई पड़ रहा था।

अरब देशों की भूमिका

इस लड़ाई ने केवल इसराइल और ईरान के बीच के टकराव को ही रेखांकित नहीं किया है, बल्कि अरब देशों के बीच दरार को भी बढ़ाया है। इसका नवीनतम उदाहरण है, 1 मई को यूएई का तोल निर्यातक देशों के समूह ओपेक से हटना। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि इस दौरान गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) यानी अरब देशों ने ईरान की खुलकर निंदा की। यानी सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते, जो पहले से ही खराब हैं, अब और खराब हो जाएँगे। जीसीसी में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, सऊदी अरब, ओमान, क़तर और कुवैत शामिल हैं। इस अर्थ में, ईरान के विरुद्ध इसराइल अकेला नहीं है। उसके साथ न केवल अमेरिका है, बल्कि बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात सहित उनके कई अरब पड़ोसी भी हैं।

पहली प्रतिक्रियाएँ

आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या के बाद बुनियादी तौर पर दो-तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। पहली प्रतिक्रिया अमेरिकी दादागीरी को लेकर थीं। हाल में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ कर ले जाने के बाद से वैश्विक स्तर पर पहले से ही अमेरिका की थू-थू हो रही है। फिर इस हत्याकांड ने उस आलोचना को और ऊँचे धरातल पर पहुँचा दिया। एक संप्रभु देश के सुप्रीम नेता की ऐसे खुलेआम हत्या मंज़ूर नहीं है। यह प्रतिक्रिया निष्पक्ष रूप से सोचने वाले लोगों की है, जो विश्व-व्यवस्था के समर्थक हैं।

ट्रंप ने ईरान को वैश्विक खतरा भी बताया था। यदि वह वैश्विक खतरा है, तो उस पर हमले का प्रस्ताव संरा सुरक्षा परिषद से पास होना चाहिए। बेशक ईरान का इस्लामी शासन उनका शत्रु है, लेकिन उसे भी आत्मरक्षा का अधिकार है। दूसरी प्रतिक्रिया दुनिया भर के मुसलमानों की थी, जिनमें ज्यादा बड़ी संख्या शिया मुसलमानों की है, जो ईरान के सर्वोच्च नेता को अपना धर्मगुरु मानते हैं।

उन्हें गहरा धक्का लगा है और इस नाराज़गी का प्रदर्शन उन्होंने ईरान के बाहर इराक़, पाकिस्तान के कराची और भारत में लखनऊ, हैदराबाद और श्रीनगर में जैसे शहरों में किया है, जहाँ बड़ी संख्या में शिया रहते हैं। केवल मुसलमान ही नहीं, गैर-मुसलमान नागरिकों ने भी नाराज़गी व्यक्त की है, जो अमेरिकी दादागीरी को पसंद नहीं करते। पिछले कुछ समय से ट्रंप की बातों ने भारत के नागरिकों के मन में पहले से ट्रंप के प्रति नाराज़गी भर दी है, जो इस समय व्यक्त हो रही है।

इसमें दो राय नहीं कि इसराइल और अमेरिका की इंटेलिजेंस बेहद कामयाब है। ईरान के चप्पे-चप्पे में उनके एजेंट हैं और आकाश में उड़ते उनके विमानों की निगाहें कोने-कोने पर हैं, पर केवल हवाई हमलों से सत्ता परिवर्तन नहीं होता। 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन के शासन का पतन भी अमेरिका के नेतृत्व वाले एक बड़े जमीनी युद्ध का परिणाम था, जिसमें करीब डेढ़ महीने का समय लगा था। लीबिया की विद्रोही सेनाएं 2011 में मुअम्मार गद्दाफी की सरकार को तभी उखाड़ कर फेंक पाईं, जब उन्हें नाटो और कुछ अरब देशों से लगातार हवाई सहायता मिली। दोनों ही मामलों में, राजव्यवस्था टूटी, गृहयुद्ध छिड़ा और हजारों लोगों की मौत हुई।

लीबिया आज भी विफल राज्य बना हुआ है, और इराक व्यापक रक्तपात से जूझ रहा है। ईरान में सत्ता परिवर्तन हो भी जाए, तब भी इस बात की गारंटी नहीं कि मौजूदा इस्लामी सरकार की जगह मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली कोई उदार लोकतांत्रिक सरकार स्थापित हो जाएगी। अमेरिका वहाँ उदार लोकतांत्रिक सरकार चाहता है या अपनी पिट्ठू सरकार? पचास के दशक में अमेरिका ने ही ईरान में लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर उसकी जगह शाह की सरकार स्थापित की थी।

दायरा बढ़ा

अमेरिका और इसराइल ने इन हमलों को पेशबंदी बताया था, पर लगता नहीं कि ऐसा किसी तात्कालिक खतरे के जवाब में किया गया है, जैसा कि 'पेशबंदी' शब्द से प्रतीत होता है। ईरान छोटा देश नहीं है कि उसपर आसानी से कब्ज़ा कर लिया जाए। 86 वर्षीय खामनेई तीन दशकों से सत्ता में थे, जो दुनिया के सबसे लंबे शासन कालों में से एक है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से, ईरान में केवल दो सर्वोच्च नेता रहे हैं: आयतुल्ला रूहोल्ला खुमैनी और आयतुल्ला अली खामनेई।

इस पद में सभी शक्तियाँ निहित हैं; सर्वोच्च नेता राज्य के प्रमुख और क्रांतिकारी गार्डों सहित सभी सशस्त्र बलों के वे कमांडर भी होते हैं। ईरान के सत्ता के केंद्रों में उनका ऐसा स्थान है, जहाँ वे सरकारी नीतियों को वीटो कर सकते हैं और यहाँ तक कि सरकारी पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन भी स्वयं कर सकते हैं।

विरोध प्रदर्शन

2019 में, जब ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, तो खामनेई ने प्रदर्शनों को रोकने के प्रयास में कई दिनों तक इंटरनेट बंद कर दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल का आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को मशीन गनों से मार डाला। हालाँकि उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर लगे उन प्रतिबंधों को हटा दिया जो उनके पूर्ववर्ती आयतुल्ला ने लगाए थे, लेकिन वे लैंगिक समानता के समर्थक नहीं थे। उनके शासनकाल में हिजाब के खिलाफ अभियान चलाने वाली महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया और तनहाई में रखा गया।

2022 में घटी एक घटना इस्लामी क्रांति के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक साबित हुई। यह घटना पुलिस हिरासत में महसा अमिनी की मौत थी, जिन्हें हिजाब ठीक से न पहनने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, हत्या के बाद हुए प्रदर्शनों में सुरक्षा बलों ने 550 लोगों को मार डाला और लगभग 20,000 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया।

शीर्ष नेतृत्व पर निशाना

28 फरवरी को, बड़े पैमाने पर किए गए हमलों में ईरानी सैन्य ठिकानों और इस्लामी गणराज्य के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया, जिसमें सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई की मृत्यु हो गई। केवल उनकी ही नहीं ईरान के कई बड़े नेता इस लड़ाई में मारे गए हैं। तेहरान की विशेषज्ञ सभा ने अली खामनेई के बेटे, मोज़्तबा खामनेई को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त करके उनकी जगह भर तो दी है, पर ईरान के नेतृत्व में भी दरार दिखाई पड़ने लगी है।

ईरान ने क्षेत्रीय सैन्य ठिकानों, इसराइल और खाड़ी देशों में ऊर्जा और नागरिक अवसंरचना को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई की। इसराइली क्षेत्र पर हिज़्बुल्ला के रॉकेट दागे जाने के बाद इसराइल ने दक्षिणी लेबनान में सैन्य आक्रमण शुरू किया, जबकि यमन में ईरान समर्थित हूतियों ने इसराइल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। दोनों ने व्यापक क्षेत्रीय युद्ध के बीच ईरान के साथ एकजुटता दिखाई।

यह हमला देखते ही देखते एक क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो गया, जिसके महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं और मानवीय सहायता पर व्यापक प्रभाव पड़े। ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद करने से वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया है। ईरान, इसराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका 7 अप्रैल को दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमत हुए, लेकिन दो सप्ताह को गुज़रे भी कई सप्ताह हो चुके हैं और व्यापक समझौते की दिशा में बातचीत ठप हो गई है।

परमाणु कार्यक्रम

ईरान कम से कम 1957 से परमाणु कार्यक्रम चला रहा है, जिसमें उसे अलग-अलग स्तर की सफलता मिली है। इराक के साथ युद्ध के दौरान, ईरान ने 1980 के दशक के अंत में अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परमाणु हथियार विकसित करने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, ईरान ने 1990 के दशक में इस कार्यक्रम के अनुसंधान में सहयोग के लिए चीन और रूस के साथ समझौते किए। 2002 की गर्मियों में, ईरानी असंतुष्ट समूहों से गठित एक संगठन, नेशनल काउंसिल ऑफ रेज़िस्टेंस ऑफ ईरान ने ईरान के दो परमाणु स्थलों के अस्तित्व का खुलासा किया, जिन्हें इंटरनेशनल एटॉमिक इनर्जी एजेंसी (आईएईए) से छिपाया गया था।

2003 तक, राजनयिकों ने एक अभियान शुरू किया। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए गहन प्रयास किए गए। ईरान सहमत हो गया, लेकिन उसने केवल परमाणु ऊर्जा के लिए अपने सेंट्रीफ्यूज रखने पर जोर दिया। हालांकि, उसने आईएईए को पारदर्शी रिपोर्टिंग करने की अपनी प्रतिबद्धता का पालन नहीं किया और गुप्त गतिविधियाँ जारी रखीं, जिसके परिणामस्वरूप एक विवाद खड़ा हो गया। जून 2004 में फटकार और एक सितंबर 2005 में आईएईए द्वारा गैर-अनुपालन पाए जाने से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में भविष्य में मामला भेजे जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

2006 में, यूएनएससी ने संकल्प 1696 पास किया। ईरान को अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को निलंबित करने के लिए यह पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी आह्वान था। अगले कुछ वर्षों में, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने संवर्धन संबंधी गतिविधियों को निलंबित करने में ईरान की विफलता के लिए उस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले कई प्रस्ताव पारित किए।

2011 और 2015 के बीच, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बढ़ते प्रभावों के कारण ईरान की स्थिति बिगड़ गई। अर्थव्यवस्था में 20 प्रतिशत की गिरावट आएगी और बेरोजगारी बढ़कर 20 प्रतिशत हो जाएगी। 2013 में, एक प्रसिद्ध व्यावहारिक नेता हसन रूहानी ने ईरान का राष्ट्रपति चुनाव जीता, उन्होंने एक वादे पर चुनाव प्रचार किया था। यह वादा था, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटवाना और अर्थव्यवस्था को बहाल करना।

अगले दो वर्षों में, अमेरिका ने कई दौर की द्विपक्षीय वार्ता आयोजित की और ईरान के नए नेतृत्व के साथ वार्ता में अन्य पी5+1 गठबंधन सदस्यों, यानी चीन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और यूनाइटेड किंगडम, का नेतृत्व किया। इन प्रयासों का परिणाम संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेपीएल) को अपनाने के रूप में सामने आया। 2015 में जॉइंट कॉम्प्रीहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन यानी जेसीपीओए पर हस्ताक्षर किए गए थे। प्रमुख पक्षों द्वारा समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इसे मंजूरी दे दी।

जेसीपीओए के तहत ईरान को यह करना आवश्यक था कि...पंद्रह वर्षों के लिए समृद्ध यूरेनियम के अपने भंडार को 98 प्रतिशत तक कम करें, दस वर्षों के लिए कार्यरत सेंट्रीफ्यूजों की संख्या में दो-तिहाई की कटौती करें और निरीक्षकों को नियुक्त करें।16 जनवरी, 2016 को जेसीपीओए के लागू होने के बाद, ईरान पर कुछ प्रतिबंध समाप्त हुए। लगभग 100 अरब डॉलर की प्रतिबंधों में छूट दी गई। हालाँकि, ईरान ने अपना रुख जारी रखा। उसके बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास, अमेरिका के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 2231 का उल्लंघन है।

क्षेत्रीय सहयोगी

हालांकि जेसीपीओ ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित कर दिया था, लेकिन उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं बढ़ती रहीं। ईरान ने शिया उग्रवादियों को हथियारबंद करना और प्रशिक्षण देनाकुद्स फोर्स ने, जो इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) की अंतरराष्ट्रीय शाखा है, सांप्रदायिक विभाजन को और बढ़ा दिया है। ईरान ने फलस्तीनी आतंकवादी समूह हमास को वर्षों से सैन्य सहायता और प्रशिक्षण प्रदान किया है, जिसके कारण 7 अक्तूबर, 2023 को उसने इसराइल पर हमला किया। कुद्स फोर्स ने भी उसे  सहायता प्रदान की है।

लेबनान में हिज़्बुल्ला को उन्नत सशस्त्र ड्रोन दिए गए, प्रशिक्षित और वित्त पोषित किया गया। सीरिया में एक लाख शिया लड़ाके तैयार किए गए, जिन्हें बैलिस्टिक मिसाइलें दी गईं। यमन के हूतियों को ड्रोन मुहैया कराए गए और इराक में शिया मिलिशिया की मदद की। अमेरिका की सरकार ईरान को आतंकवाद को प्रायोजित करने वाला सबसे बड़ा देश मानती है। उसके अनुसार ईरान प्रति वर्ष एक अरब डॉलर से अधिक धनराशि आतंकवाद की संरचना पर खर्च करता है।

ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर की विदेशी शाखा, कुद्स फोर्स पश्चिम एशिया में सहयोगी मिलिशिया बलों का एक विशाल नेटवर्क संचालित करती है। अनुमान है कि कुद्स फोर्स के सीधे तौर पर 5,000 से 15,000 जवान हैं, लेकिन इसके नेतृत्व और समर्थन में कार्य करने वाले सहयोगी क्षेत्रीय लड़ाकों की संख्या हज़ारों से लेकर लाखों तक हो सकती है। कुद्स फोर्स के प्रमुख सहयोगी बल और अनुमानित ताकत:

हिज़बुल्ला (लेबनान): सबसे शक्तिशाली सहयोगी, जो लगभग 100,000 से अधिक लड़ाकों का दावा करता है।

इराकी शिया मिलीशिया हश्द अल-शाबी: इराक में दर्जनों समूहों का नेटवर्क, जिनमें कई कुद्स फोर्स से संबद्ध हैं।

अन्य समूह: यमन में हूती, सीरिया और अफगानिस्तान/पाकिस्तान के लड़ाके,  जो क्षेत्र में सक्रिय हैं।

ये समूह ईरान के हितों की रक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने और अमेरिकी/इसराइली ठिकानों को निशाना बनाने के लिए 'हाइब्रिड-युद्ध' लड़ते हैं। 2020 में कासिम सुलेमानी की मृत्यु के बाद, कुद्स फोर्स कुद्स फोर्स के कमांडर इस्माइल कानी के नेतृत्व में है, जो इन विदेशी समूहों को समन्वित करते हैं। इस नेटवर्क को एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस के नाम से पहचाना जाता है, जो मुख्य रूप से शिया बहुल और ईरान समर्थक विचारधारा से प्रेरित है।

ट्रंप से पहला टकराव

क्योंकि जेसीपीओए में केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम का जिक्र था, उसके संशोधन या बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों का नहीं था, इसलिए ट्रंप के पहले प्रशासन ने समझौते से खुद को अलग कर लिया और अधिक व्यापक समझौते की तलाश करने का वादा किया। 2018 में, ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर प्रतिबंधों को फिर से लागू करते हुए, शुरुआत की। ईरान को इस समय पिछले चालीस वर्षों में सबसे जबर्दस्त आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है। ईरानी तेल निर्यात आधे से भी कम हो गया है।

ट्रंप प्रशासन ने ईरान को दबाव में लाने के लिए अधिकतम दबाव की रणनीति अपनाई। उधर ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर जेसीपीओ के प्रतिबंधों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया, जिससे तनाव बढ़ गया। अप्रैल 2019 में, अमेरिका ने आईआरजीसी को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। जब ट्रंप प्रशासन को अमेरिकी सैनिकों पर संभावित ईरानी हमलों की खुफिया जानकारी मिली, तो उसने मध्य पूर्व में बमवर्षक विमान, विमानवाहक पोत और अतिरिक्त बल तैनात कर दिए। उन्हीं दिनों होर्मुज जलडमरूमध्य में या उसके आसपास छह तेल टैंकरों पर हमला किया गया, जिसके लिए अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को जिम्मेदार ठहराया।

3 जनवरी 2020 को इराक के बग़दाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास एक अमेरिकी ड्रोन हमला हुआ। यह हमला तत्कालीन राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के आदेश पर किया गया था, जिसमें कुद्स फोर्स के कमांडर कासिम सुलेमानी मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने कहा कि वह अब इन नीतियों का पालन नहीं करेगा। 2020 के अंत में, ट्रंप ने अलर्ट को और भी कड़ा कर दिया। एक शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक की हत्या के बाद, ईरान ने परमाणु समझौते की सीमाओं से कहीं अधिक स्तर तक यूरेनियम संवर्धन को बढ़ावा देना शुरू कर दिया।

इसराइल-हमास संघर्ष

अक्तूबर 2023 में इसराइल और ईरान समर्थित फ़लस्तीनी आतंकवादी समूह हमास के बीच युद्ध छिड़ने से ईरान और इसराइल के बीच तनाव बढ़ गया। ईरान समर्थित प्रॉक्सी बलों ने गज़ा पट्टी में इसराइल के सैन्य घुसपैठ के विरोध में हमले तेज कर दिए, जिनमें 100 से अधिक हमले शामिल हैं। इराक और सीरिया में अमेरिकी और इसराइली ठिकानों पर दो सौ हमले हुए । इसके जवाब में, अमेरिका ने 26 अक्तूबर, 2023 को ईरान समर्थित दो ठिकानों पर हवाई हमले का आदेश दिया और 2 फरवरी, 2024 को इन दोनों देशों में ईरान से जुड़े 85 और ठिकानों पर हमले किए गए।

2024 में, इसराइल और ईरान के बीच टकराव सीधे युद्ध में बदल गया। 1 अप्रैल को, सीरिया के दमिश्क में स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास पर इसराइली हवाई हमले में ईरान के दो जनरल और पाँच सैन्य सलाहकार मारे गए। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ड्रोन और मिसाइलों से तीन सौ से अधिक हमले किए। पहली बार ईरान ने सीधे तौर पर इसराइल को निशाना बनाया।

उसी दौरान इसराइल ने हमास और हिज़्बुल्ला के प्रमुख नेताओं की हत्या कर दी। जवाब में अक्तूबर 2024 में इसराइल पर 180 बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। इसराइल ने भी मिसाइलें दागीं। ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा सीधा हमला हुआ, जिसमें उसकी हवाई सुरक्षा और मिसाइल उत्पादन सुविधाओं को निशाना बनाया गया।

उसी दौरान सीरिया में बशर अल-असद शासन के पतन के कारण ईरान के प्रतिरोधी गठबंधन को काफी कमजोर कर दिया। 2025 में सत्ता में लौटने पर, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपने अधिकतम दबाव अभियान को फिर से शुरू किया और साथ ही उसके परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत भी शुरू की। 2018 में अमेरिका द्वारा परमाणु समझौते से हटने के बाद से वह पहली प्रत्यक्ष अमेरिकी-ईरान वार्ता थी। इसराइल इन वार्ताओं का पूर्णतः विरोधी रहा है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता बनाए हुए है। इसराइली अधिकारियों का तर्क है कि परमाणु हथियार विकसित करने के ईरान के गुप्त प्रयास क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को मौलिक रूप से बदल देंगे, जिससे इसराइल के अस्तित्व को सीधा खतरा होगा।

12 जून 2-15 को, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने घोषणा की कि ईरान बीस वर्षों में पहली बार अपने परमाणु अप्रसार दायित्वों का उल्लंघन कर रहा है, जिसके बाद ईरान ने एक गुप्त यूरेनियम संवर्धन स्थल खोलने की घोषणा की। अगले दिन, इसराइल ने ईरान के खिलाफ एकतरफा सैन्य हमला किया, जिसमें परमाणु सुविधाओं, मिसाइल कारखानों, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और परमाणु वैज्ञानिकों को निशाना बनाया गया। ईरान ने इस हमले को “युद्ध का कृत्य” घोषित किया और जवाबी कार्रवाई में ड्रोन और दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रक्षेपण किया। उस युद्ध में अमेरिका भी शामिल हो गया, पर ईरान ने 23 जून को कतर के अल उदैद हवाई अड्डे पर तैनात अमेरिकी सेना पर मिसाइल हमला करके जवाबी कार्रवाई की। ट्रंप ने उसी दिन युद्धविराम की घोषणा कर दी। उसके बाद 28 फरवरी का हमला हुआ, जिसके छींटे अभी तक बिखर रहे हैं।

ऐतिहासिक जड़ें

यह सिर्फ एक युद्ध नहीं बल्कि दशकों पुरानी भू-राजनीतिक, धार्मिक और सुरक्षा प्रतिद्वंद्विता का परिणाम है, जो अक्तूबर 2023 के बाद बड़े पैमाने पर भड़क गया। इसके पीछे इसराइल के जन्म और उसके विरोध की कहानी भी छिपी है। दो हजार साल पहले यहूदियों को अपनी इस ज़मीन जूडिया या यहूदिया, को छोड़ कर बाहर जाना पड़ा। यह स्वैच्छिक पलायन नहीं था, बल्कि रोमन साम्राज्य से हार के बाद नरसंहार, गुलामी का परिणाम था।

19वीं सदी के अंत में यूरोप में यहूदी-विरोध और उत्पीड़न के कारण ज़ायोनिज्म आंदोलन उभरा, जिसके संस्थापक थियोडोर हर्ज़ल थे। प्रथम विश्वयुद्ध में ऑटोमन साम्राज्य का विघटन होने पर यह इलाका ब्रिटिश मैंडेट में आ गया, जिसने 2 नवंबर 1917 को बालफोर घोषणा के मार्फत फलस्तीन में यहूदियों के देशका आश्वासन दिया। इस दौरान यूरोप से बड़ी संख्या में यहूदी यहाँ आए। यहूदियों और स्थानीय अरबों के बीच हिंसा भी हुई।

ब्रिटेन ने यह मसला संयुक्त राष्ट्र को सौंपा, जिसने 29 नवंबर 1947 को प्रस्ताव 181 के मार्फत इस इलाके को एक यहूदी और दूसरा अरब देश बनाने की सलाह दी। यहूदियों ने योजना मान ली, अरबों ने ठुकरा दी। ब्रिटिश मैंडेट 14 मई 1948 को समाप्त हुआ, उसी शाम डेविड बेन-गुरियन ने इसराइल की घोषणा की और अमेरिका ने 11 मिनट बाद उसे मान्यता दे दी। अगले दिन मिस्र, ट्रांस-जॉर्डन, सीरिया, इराक और लेबनान ने नए देश पर हमला कर दिया। तब से टकराव चल रहा है।

पहले इसराइल के विरोध की लड़ाई अरब देश लड़ रहे थे, पर 1979 की क्रांति के बाद ईरान भी इसमें शामिल हो गया। इसराइल ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम, सीरिया में उसके ठिकानों और प्रॉक्सी ग्रुप्स को टारगेट करता रहा है।

चित्र परिचय

ईरान में सरकार का समर्थन करते नागरिक

ईरान के पुराने और नए सुप्रीम लीडर

वार्ता के लिए पाकिस्तान गई अमेरिकी टीम

तेहरान पर युद्ध के बादल

इसराइली हमले से ध्वस्त लेबनान का बेरूत शहर

अकेला पड़ता अमेरिका

 

 

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