पश्चिम एशिया की लड़ाई का कोई हल नजर नहीं आ रहा है। होर्मुज जलसंधि मार्ग को, अमेरिका और ईरान दोनों ने बंद कर रखा है। इस रास्ते से भारत के 45-55 फीसदी खनिज तेल का आवागमन होता है। भारत के निर्यात पर भी असर पड़ा है। अर्थव्यवस्था पर दबाव नज़र आने लगा है। रुपये और शेयर बाजार की गिरावट ने भी चिंता का माहौल बनाया है।
लड़ाई शुरू होने के बाद से विदेशी मुद्रा भंडार
में 38 अरब डॉलर की गिरावट और खनिज तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने के कारण बढ़ता दबाव नीति निर्माताओं के
लिए चिंता का विषय है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से
मितव्ययिता का आह्वान किया है, जिसके पीछे कारण है सोने का आयात और विदेश-यात्राओं
पर विदेशी मुद्रा का खर्च।
दो वर्षों में सोने का आयात बिल लगभग दोगुना होकर 2025-26 में 72 अरब डॉलर हो गया है। विदेश-यात्रा पर उदारीकृत रेमिटेंस स्कीम के तहत व्यय 2025-26 के पहले 11 महीनों में, इस स्कीम का 57 प्रतिशत यानी कुल 26.34 अरब डॉलर में 15 अरब डॉलर रहा। विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजारों से डॉलर खींच रहे हैं, जिसके कारण मुद्रा भंडार घटकर 691 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। फरवरी में यह भंडार 728.49 अरब डॉलर के सार्वकालिक उच्च स्तर पर था।
केंद्र के आर्थिक मामलों के विभाग ने पिछले
महीने के अंत में जारी मासिक आर्थिक समीक्षा में मौजूदा वृहद आर्थिक हालात का
वास्तविक आकलन पेश किया है, साथ ही नीतिगत मार्ग भी सुझाए हैं।
लड़ाई जल्दी समाप्त हुई, तो बहुत व्यवधान नहीं होगा, पर जारी रही, तो हमें आर्थिक,
राजनयिक, राष्ट्रीय-सुरक्षा और मानवीय प्रभावों का सामना करना पड़
सकता है, जिन्हें निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
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सबसे बड़ी है ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियाँ। भारत
अपनी 80-85 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतें आयात से पूरी करता है। इसमें पश्चिम
एशिया से बड़ा हिस्सा, लगभग 45-55 प्रश आता है।
·
रसोई गैस की सप्लाई कम होने के साथ उसकी कीमत भी बढ़ती
है, जिससे महँगाई बढ़ती है।
·
महँगाई का वात्याचक्र है। तेल की कीमतें बढ़ने से
परिवहन और खाद्य पदार्थों की लागत प्रभावित होती है। एयरलाइंस पर भी उड़ान मार्गों
और ईंधन की महँगाई का असर पड़ता है।
·
विदेशी मुद्रा के प्रवाह यानी रेमिटेंसेस पर विपरीत प्रभाव
पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में 90 लाख भारतीय कामगार काम करते हैं, जो सालाना करीब
50 अरब डॉलर भारत भेजते हैं। युद्ध लंबा चला तो नौकरियाँ पर असर होगा, जिससे डॉलर
का प्रवाह कम हो सकता है। इससे रुपये और चालू खाते पर दबाव पड़ेगा।
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व्यापार और सप्लाई चेन में बाधा पड़ेगी। हमारा बहुत सा
निर्यात इस क्षेत्र से आयात पर निर्भर करता है। आयात रुका, तो निर्यात भी घटेगा।
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शिपिंग और बीमा की लागत बढ़ेगी।
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प्रस्तावित भारत-पश्चिम एशिया कॉरिडोर जैसी परियोजनाएँ
प्रभावित होंगी।
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भारत का ईरान के साथ ऊर्जा, चाबहार पोर्ट और
अफगानिस्तान के मार्ग के मामले में सहयोग हैं। यूएई, सऊदी अरब और शेष खाड़ी देशों के
साथ पेट्रोलियम के साथ-साथ कामगारों के रेमिटेंसेस जुड़े हैं।
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क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण पाकिस्तान में मौज़ूद चरमपंथी
समूहों को मौका मिल सकता है।
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मानवीय और सुरक्षा चुनौतियाँ बढ़ेंगी। लाखों भारतीयों
को निकासी की जरूरत पड़ सकती है।
भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। हमारे देश
ने समय से वैकल्पिक-ऊर्जा पर काम शुरू कर दिया है, हमारी डिप्लोमैटिक-सक्रियता
संतोषजनक है और करेंसी रिज़र्व कुछ कम होने के बावज़ूद अच्छा है। चूँकि हमें इस
इलाके के कई परस्पर विरोधी पक्षों के साथ संतुलित-संबंध बनाकर रखने हैं, इसलिए
डिप्लोमेसी की चुनौती भारी है। स्थिति लगातार बदल रही है, इसलिए
नवीनतम घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी है।
सरकारी कदम
भारत ने इस बीच कई तरह के कदम उठाए हैं। केंद्रीय
मंत्रिमंडल ने गत 5 मई को आपातकालीन ऋण गारंटी योजना 5.0 को मंजूरी दी है। यह
गारंटी व्यवसायों, विशेष रूप से एमएसएमई और एयरलाइन क्षेत्र
को, बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा उनकी अतिरिक्त
कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करने में मदद करने के लिए एक
महत्वपूर्ण कदम है।
इसके तहत कुल 2,55,000
करोड़ रुपये के अतिरिक्त ऋण प्रवाह का लक्ष्य है, जिसमें 5,000 करोड़ रुपये एयरलाइंस के लिए आबंटित हैं। सरकार ने 497 करोड़ रुपये के
परिव्यय के साथ 'रिलीफ' नामक योजना
शुरू की है, जो विशेष रूप से उन निर्यातकों के लिए है, जो पश्चिम एशिया और खाड़ी
क्षेत्र के 17-18 प्रभावित देशों में व्यापार कर रहे हैं। खनिज तेल और प्राकृतिक
गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भी कदम उठाए गए हैं, जिसमें एलपीजी का पश्चिम एशिया के बजाय दूसरे स्रोतों से आयात संभव है।
दुनिया के बहुत से देशों ने अपने यहाँ पेट्रोलियम
उत्पादों की खुदरा कीमतों में वृद्धि की है, पर भारत ने हाथ रोक रखे हैं। कुछ हद
तक तेल विपणन कंपनियों की रक्षा के लिए पेट्रोल और डीजल पर विशेष उत्पाद शुल्क कम
कर दिया, पर बाद में कुछ कीमतें बढ़ाई हैं। तेल कंपनियों पर नुकसान का वर्तमान
स्तर बना रहा, तो इस साल एलपीजी की बिक्री पर लगभग 80,000 करोड़ रुपये की अंडर
रिकवरी का सामना करना पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर भी बड़े नुकसान का अंदेशा
है।
सरकार का फोकस व्यापार मार्ग में व्यवधान के
कारण जहाजों को लंबा रास्ता लेने के कारण बढ़ी हुई लागत को कम करना है। महंगाई पर नियंत्रण
पाने और जमाखोरी-चोरबाजारी को रोकने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश दिए गए हैं। वाणिज्य
मंत्रालय ने टेक्सटाइल, फार्मा, कृषि
और जेम्स एंड ज्वैलरी जैसे सात प्रमुख क्षेत्रों को राहत देने के लिए आयात शुल्क
में कटौती की सिफारिश की है। उर्वरक की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए
विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के साथ समन्वय किया है।
मोदी की अपील
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से इस
परिस्थिति का सामना करने के लिए गत 10 मई को कुछ उपायों को अपनाने का सुझाव दिया
है। इनमें कुछ हैं:
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वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन मीटिंग्स और वर्चुअल
कॉन्फ्रेंसिंग अपनाएँ।
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कारपूलिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, इलेक्ट्रिक वाहनों का
इस्तेमाल करें और गैरज़रूरी विदेश-यात्राओं को टालें।
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महंगे समारोहों से बचें।
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खाने के तेल और सोने की अनावश्यक खरीदारी न करें।
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महंगी विदेशी शादियाँ टालें।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई लॉकडाउन या
अनिवार्य आदेश नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित में की गई
स्वैच्छिक अपील है। इन छोटे उपायों से आयात बिल कम होगा। विदेशी मुद्रा भंडार
सुरक्षित रहेगा और रुपये पर दबाव कम पड़ेगा।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक संकट के
समय ईंधन बचत और विदेशी मुद्रा संरक्षण बेहद जरूरी होता है। वे यह भी कहते हैं कि मितव्ययिता
की अपील ने शेयर बाजार की चिंता को बढ़ाया है, जिसके कारण सेंसेक्स में गिरावट
देखी जा रही है।

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