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| बीबीसी से कीर्तीश भट्ट का कार्टून साभार |
पाँच राज्यों में चुनाव-परिणाम क्या आएँगे, इसे लेकर अटकलें लगाना मीडिया और नेताओं का शगल है। खाली बैठे लोगों को बहसबाजी के लिए विषय मिल जाते हैं। एक अरसे से मैंने इन बहसों से बचना शुरू कर दिया है। मुझे लगता है कि इनके चक्कर में जाने-अनजाने कुछ महत्त्वपूर्ण बातों की अनदेखी हो जाती है। बहरहाल, दो बातों ने मुझे इन चुनावों के साथ संदर्भ जोड़ने को प्रेरित किया है। एक, खातों में सीधे नकद धनराशि का जाना और दूसरे देश में अलग-अलग जगहों पर असंगठित कामगारों की नाराज़गी।
यह नाराज़गी केवल नोएडा में ही नहीं है। नोएडा की परिघटना सनसनी के रूप में सामने आई, इसलिए उसे मीडिया में जगह मिल गई। इसमें शामिल कर्मचारी स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और उनसे जुड़ी कंपनियों से जुड़े हैं। इन कंपनियों को 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव्स दिए गए हैं। इन्होंने करोड़ों अरबों का मुनाफा भी कमाया है। राज्य सरकारों ने इन आंदोलनों को शांत करने के लिए ‘गाजर और छड़ी’ दोनों का इस्तेमाल किया। पुलिस कार्रवाई भी की और वेतन में वृद्धि करके रियायतें भी दी हैं।
नोएडा की परिघटना ने देश का ध्यान इस नई समस्या की ओर खींचा है। इसके पहले ज़ोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और ई-बिजनेस समूहों के माल को घर-घर पहुँचाने वाले गिग वर्कर्स की समस्याएँ सामने आईं। ऐसे ही समस्याएँ ओला, ऊबर और रैपिडो वगैरह के लिए काम करने वालों की हैं। ये शहरी गरीब हैं। भारत में लंबे अरसे तक गरीबी को हम गाँवों में तलाशते रहे, पर धीरे-धीरे वह शहरों में आती जा रही है, इसे आप बढ़ता शहरीकरण कह सकते हैं।
शहरी गरीब
बेशक ये वैसे नितांत गरीब नहीं हैं, जिन्हें गरीबी की रेखा के नीचे रखा जाता है, पर ये भी गरीब हैं। कोविड-काल में प्रवासी मज़दूरों के रूप में इनकी व्यथा दिखाई और सुनाई पड़ी थी। उसके बाद से किसी न किसी रूप में बार-बार सामने आ रही है। ये कामगार गैर-वाजिब बातें नहीं कर रहे हैं। एक मजदूर परिवार को शहरों में रहने के लिए अब किराए पर 5,000-6,000 रुपये, खाने पर 8,000-10,000 रुपये और पेट्रोल पर 3,000-4,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। बिजली, परिवहन, फोन, स्कूल फीस या दवाइयों के खर्च के बिना ही यह कुल खर्च 20,000 रुपये हो जाता है। वे केवल गुजारे लायक आय की माँग कर रहे हैं।
अफसोस इस बात का है कि राजनेताओं,
अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों ने इन शहरी कामगारों की ओर उतना ध्यान नहीं दिया है,
जितने के वे हकदार हैं। हाल में नोएडा में हुए आंदोलन को लेकर मीडिया में जो खबरें
आईं, उनमें साजिशों का जिक्र ज्यादा था, उनकी तकलीफों का कम। आंदोलन के पीछे
साज़िश थी या नहीं, यह अलग विषय है। साजिश हो भी हो सकती है, क्योंकि प्रतिस्पर्धी-राजनीति
में पार्टियों को मौके की तलाश रहती है। पर सच यह है कि कामगारों की व्यथा
वास्तविक है, और उनकी कोई राजनीति नहीं है।
अब चुनाव की तरफ आएँ। महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड
जैसे राज्यों में हाल में हुए चुनावों में और उससे भी पहले एक बात उभर कर आई कि
महिलाओं, वृद्धों, किशोरों या किसानों के बैंक खातों में नकद धनराशि पहुँचाने का
राजनीतिक-लाभ फौरन मिलता है। चुनावी-राजनीति में संप्रदाय, जाति, भाषा या क्षेत्र
की भावनाओं को भड़काने के फायदे मिलते हैं, पर आर्थिक-लाभ वोटर को लुभाता है।
पर्यवेक्षकों को लगता है कि सरकार कल्याण की भावना से काम कर रही है। कोई नहीं
पूछता कि यह सब्सिडी है, ‘कल्याण’ है या ‘घूस’?
रेवड़ी-चर्चा
पाँच राज्यों के परिणाम 4 मई को आएँगे। उन्हें
लेकर एक बात साफ है। हिमंत बिस्व सरमा को असम में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के
कारण फायदा मिलेगा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की मजबूती के पीछे वजह है
महिलाओं, बालिकाओं और किशोरों को मिलने वाली नकदी और मुस्लिम वोट। हिमंत सफल
होंगे, तो ममता क्यों नहीं?
लाभ और सुविधाएँ काम
करेंगी, जिन्हें राजनीतिक भाषा में ‘रेवड़ियाँ’ कहा जा रहा है।
यह ‘रेवड़ी-चर्चा’, चुनाव-चर्चा से आगे नहीं जाती है। राजनीतिक बहस के समांतर देश के उच्चतम
न्यायालय में इस विषय पर सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के दौरान मुफ्त
की रेवड़ियां बाँटने के वादों को अत्यंत गंभीर और देश की आर्थिक सेहत के लिए
हानिकारक माना है। इस बात को आमतौर पर स्वीकार किया जाता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य
और परिवहन जैसी सेवाओं को गरीबों के दायरे में रखा जाना चाहिए।
कल्याणकारी
राज्य की अवधारणा के तहत असहाय व्यक्तियों का सहारा भी राज्य होता है। सामाजिक
संस्थाएं और निजी तौर पर अपेक्षाकृत सबल व्यक्ति कमजोरों, वंचितों और हाशिए पर जा चुके लोगों की सहायता के लिए आगे आते हैं, पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी राज्य की होती है। हमारे
संविधान का अनुच्छेद 41 कहता है, ‘राज्य अपनी
आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के
अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।’ इसके साथ अनुच्छेद 42 और 43 भी
सामाजिक वर्गों की सहायता के लिए राज्य की भूमिका की ओर इशारा करते हैं।
लोक-लुभावन बातें
स्वतंत्र भारत में जनहित, आकर्षक शब्द बनकर उभरा
है। इसका सैद्धांतिक-अर्थ जो भी हो, व्यावहारिक अर्थ है लोक-लुभावन कार्यक्रम। इंदिरा
गांधी को 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के कारण भारी विजय मिली, पर 2004 में एनडीए को
परास्त करने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें
तलाशनी शुरू कीं। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने उसे 2009 का चुनाव जिताया।
पंचायत राज की शुरूआत का श्रेय भी उसके खाते में
जाता है। सूचना के अधिकार पर भी वह अपना दावा पेश करती है, पर
इसका श्रेय विश्वनाथ प्रताप सिंह को दिया जाना चाहिए। इसी तरह आधार योजना का
बुनियादी काम एनडीए शासन में हुआ था। सर्व शिक्षा कार्यक्रम भी एनडीए की देन है।
शिक्षा के अधिकार का कानून अभी तक प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हो पाया है। जेब
में नकद पैसा डालने की तुलना में इस कार्यक्रम के अच्छे परिणाम आने में लंबा समय
लगेगा, जिसके लिए राजनीतिक दल तैयार नहीं हैं। जिस दिन यह अपने पूरे अर्थ में लागू
होगा, वह दिन नई क्रांति का दिन होगा।
बहरहाल ‘कंडीशनल कैश ट्रांसफर’ कल्याणकारी कार्यक्रम के रूप में सामने आया है। इसका मतलब है कि सरकार
नागरिकों को जो भी सब्सिडी देगी वह नकद राशि के रूप में उसके बैंक खाते में जाएगी।
ज्यादातर हो यह रहा है कि सरकारें चुनाव के ठीक पहले बैंक ट्रांसफर करके ‘राजनीतिक-लाभ’ कमा रही हैं। पर क्या यह समस्या का समाधान है? कुछ हद तक इससे उस तबके तक पैसा पहुँचता है, जिसे उसकी जरूरत है, पर इसमें
भी लोगों ने छिद्र खोज लिए हैं।
आने वाले
वर्षों में शहरी कामगार ‘राजनीतिक-लक्ष्य’ बनेंगे। नोएडा में हुए आंदोलन ने इस महत्त्वपूर्ण बात की ओर ध्यान खींचा
है। सरकार का ध्यान ऐसे मसलों की ओर तभी जाता है, जब चुनावी नफा-नुकसान दिखाई
पड़े। मुख्यधारा की राजनीति और लोकतांत्रिक-प्रक्रिया का फिलहाल इतना ही मतलब
दिखाई पड़ता है।

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